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भूमि खण्ड · अध्याय 28

वेन के मंथित शरीर से पृथु का जन्म तथा पृथ्वी का पीछा

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (padma.2.28.1)

ऋषय ऊचुः- विस्तरेण समाख्याहि जन्म तस्य महात्मनः । पृथोश्चैव महाभाग श्रोतुकामा वयं पुनः

ṛṣaya ūcuḥ- vistareṇa samākhyāhi janma tasya mahātmanaḥ pṛthoścaiva mahābhāga śrotukāmā vayaṁ punaḥ

ऋषियों ने कहा — 'हे महाभाग! उस महात्मा पृथु के जन्म का विस्तार से वर्णन कीजिए; हम पुनः सुनना चाहते हैं —

श्लोक 2 (padma.2.28.2)

राज्ञा तेन यथा दुग्धा इयं धात्री महात्मना । पुनर्देवैश्च पितृभिर्मुनिभस्तत्त्ववेदिभिः

rājñā tena yathā dugdhā iyaṁ dhātrī mahātmanā punardevaiśca pitṛbhirmunibhastattvavedibhiḥ

—कि किस प्रकार उस राजा महात्मा द्वारा यह धात्री दुही गई; फिर देवताओं, पितरों, तत्त्ववेत्ता मुनियों द्वारा —

श्लोक 3 (padma.2.28.3)

यथा दैत्यैश्च नागैश्च यथा यक्षैर्यथा द्रुमैः । शैलैश्चैव पिशाचैश्च गंधर्वैः पुण्यकर्मभिः

yathā daityaiśca nāgaiśca yathā yakṣairyathā drumaiḥ śailaiścaiva piśācaiśca gaṁdharvaiḥ puṇyakarmabhiḥ

—जैसे दैत्यों, नागों, यक्षों, वृक्षों द्वारा; पर्वतों, पिशाचों, पुण्यकर्मा गंधर्वों द्वारा —

श्लोक 4 (padma.2.28.4)

ब्राह्मणैश्च तथा सिद्धै राक्षसैर्भीमविक्रमैः । पूर्वमेव यथा दुग्धा अन्यैश्च सुमहात्मभिः

brāhmaṇaiśca tathā siddhai rākṣasairbhīmavikramaiḥ pūrvameva yathā dugdhā anyaiśca sumahātmabhiḥ

—ब्राह्मणों और सिद्धों द्वारा, भीम पराक्रम वाले राक्षसों द्वारा भी — पहले जैसे अन्य महात्माओं द्वारा भी दुही गई थी —

श्लोक 5 (padma.2.28.5)

तेषामेव हि सर्वेषां विशेषं पात्रधारणम् । क्षीरस्यापि विधिं ब्रूहि विशेषं च महामते

teṣāmeva hi sarveṣāṁ viśeṣaṁ pātradhāraṇam kṣīrasyāpi vidhiṁ brūhi viśeṣaṁ ca mahāmate

—उन सभी का विशेष पात्र और दूध का विधान भी बताइए, वह विशेष रूप से, हे महामते।

श्लोक 6 (padma.2.28.6)

वेनस्यापि नृपस्यैव पाणिरेव महात्मनः । ऋषिभिर्मथितः पूर्वं स कस्मादिह कारणात्

venasyāpi nṛpasyaiva pāṇireva mahātmanaḥ ṛṣibhirmathitaḥ pūrvaṁ sa kasmādiha kāraṇāt

राजा वेन के महात्मा के हाथ को भी ऋषियों ने पहले क्यों मथा? किस कारण से यह हुआ —

श्लोक 7 (padma.2.28.7)

क्रुद्धश्चैव महापुण्यैः सूतपुत्र वदस्व नः । विचित्रेयं कथा पुण्या सर्वपापप्रणाशिनी

kruddhaścaiva mahāpuṇyaiḥ sūtaputra vadasva naḥ vicitreyaṁ kathā puṇyā sarvapāpapraṇāśinī

—और वे महापुण्य ऋषि किस कारण क्रुद्ध हुए, हे सूतपुत्र, हमें बताइए। यह विचित्र कथा पुण्यमय, समस्त पापों को नष्ट करने वाली है —

श्लोक 8 (padma.2.28.8)

श्रोतुकामा महाभाग तृप्तिर्नैव प्रजायते । सूत उवाच- वैन्यस्य हि पृथोश्चैव तस्य विस्तरमेव च

śrotukāmā mahābhāga tṛptirnaiva prajāyate sūta uvāca- vainyasya hi pṛthoścaiva tasya vistarameva ca

—हम इसे सुनना चाहते हैं, हे महाभाग! तृप्ति ही नहीं होती।' सूत जी ने कहा — वेन के पुत्र पृथु का ही, उसका विस्तृत वृत्तांत —

श्लोक 9 (padma.2.28.9)

जन्मवीर्यं तथा क्षेत्रं पौरुषं द्विजसत्तमाः । प्रवक्ष्यामि यथा सर्वं चरित्रं तस्य धीमतः

janmavīryaṁ tathā kṣetraṁ pauruṣaṁ dvijasattamāḥ pravakṣyāmi yathā sarvaṁ caritraṁ tasya dhīmataḥ

—जन्म, वीर्य, तथा क्षेत्र, पौरुष, हे द्विजसत्तमो — उस बुद्धिमान का संपूर्ण चरित्र मैं बताऊँगा।

श्लोक 10 (padma.2.28.10)

शुश्रूषध्वं महाभागा मामेवं द्विजसत्तमाः । अभक्ताय न वक्तव्यमश्रद्धाय शठाय च

śuśrūṣadhvaṁ mahābhāgā māmevaṁ dvijasattamāḥ abhaktāya na vaktavyamaśraddhāya śaṭhāya ca

मुझे सुनो, हे महाभागो, द्विजसत्तमो — यह अभक्त को, अश्रद्धालु को, शठ को नहीं कहना चाहिए —

श्लोक 11 (padma.2.28.11)

सुमूर्खाय सुमोहाय कुशिष्याय तथैव च । श्रद्धाहीनाय कूटाय सर्वनाशाय मा द्विजाः

sumūrkhāya sumohāya kuśiṣyāya tathaiva ca śraddhāhīnāya kūṭāya sarvanāśāya mā dvijāḥ

—मूर्ख को, मोहग्रस्त को, कुशिष्य को भी; श्रद्धाहीन को, कपटी को, सर्वनाशी को कभी नहीं कहना चाहिए, हे द्विजो!

श्लोक 12 (padma.2.28.12)

अन्यथा पठते यो हि निरयं च प्रयाति हि । भवंतो भावसंयुक्ताः सत्यधर्मपरायणाः

anyathā paṭhate yo hi nirayaṁ ca prayāti hi bhavaṁto bhāvasaṁyuktāḥ satyadharmaparāyaṇāḥ

जो इसे अन्यथा पढ़ता है, वह नरक को जाता है। आप सब भावयुक्त, सत्य-धर्म-परायण हैं —

श्लोक 13 (padma.2.28.13)

भवतामग्रतः सर्वं चरित्रं पापनाशनम् । संप्रवक्ष्याम्यशेषेण शृणुध्वं द्विजसत्तमाः

bhavatāmagrataḥ sarvaṁ caritraṁ pāpanāśanam saṁpravakṣyāmyaśeṣeṇa śṛṇudhvaṁ dvijasattamāḥ

—आपके समक्ष यह संपूर्ण पापनाशक चरित्र मैं पूरी तरह कहूँगा; सुनो, हे द्विजसत्तमो।

श्लोक 14 (padma.2.28.14)

स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धन्यं वेदैश्च संमितम् । रहस्यमृषिभिः प्रोक्तं प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तमाः

svargyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ dhanyaṁ vedaiśca saṁmitam rahasyamṛṣibhiḥ proktaṁ pravakṣyāmi dvijottamāḥ

स्वर्गदायक, यशदायक, आयुवर्धक, धन्य, वेदों के समान सम्मानित — यह ऋषियों द्वारा कहा गया रहस्य मैं बताऊँगा, हे द्विजोत्तमो।

श्लोक 15 (padma.2.28.15)

यश्चैनं कीर्तयेन्नित्यं पृथोर्वैन्यस्य विस्तरम् । ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्वा न स शोचेत्कृताकृतम्

yaścainaṁ kīrtayennityaṁ pṛthorvainyasya vistaram brāhmaṇebhyo namaskṛtvā na sa śocetkṛtākṛtam

जो कोई भी वेन के पुत्र पृथु के इस विस्तृत वृत्तांत का सदा कीर्तन करता है, ब्राह्मणों को नमस्कार करके, वह किए-अनकिए का शोक नहीं करता।

श्लोक 16 (padma.2.28.16)

सप्तजन्मार्जितं पापं श्रुतमात्रेण नश्यति । ब्राह्मणो वेदविद्वांश्च क्षत्रियो विजयी भवेत्

saptajanmārjitaṁ pāpaṁ śrutamātreṇa naśyati brāhmaṇo vedavidvāṁśca kṣatriyo vijayī bhavet

सात जन्मों में अर्जित पाप सुनने मात्र से नष्ट हो जाता है; ब्राह्मण वेदविद्वान बनता है, क्षत्रिय विजयी होता है —

श्लोक 17 (padma.2.28.17)

वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् । एवं फलं समाप्नोति पठनाच्छ्रवणादपि

vaiśyo dhanasamṛddhaḥ syācchūdraḥ sukhamavāpnuyāt evaṁ phalaṁ samāpnoti paṭhanācchravaṇādapi

—वैश्य धन-समृद्ध होता है, शूद्र सुख प्राप्त करता है। इस प्रकार पढ़ने और सुनने दोनों से यह फल प्राप्त होता है।

श्लोक 18 (padma.2.28.18)

पृथोर्जन्मचरित्रं च पवित्रं पापनाशनम् । धर्मगोप्ता महाप्राज्ञो वेदशास्त्रार्थकोविदः

pṛthorjanmacaritraṁ ca pavitraṁ pāpanāśanam dharmagoptā mahāprājño vedaśāstrārthakovidaḥ

पृथु का जन्म-चरित्र पवित्र, पापनाशक है। उस समय एक महाप्राज्ञ धर्मरक्षक था, वेदशास्त्रों के अर्थ में निपुण —

श्लोक 19 (padma.2.28.19)

अत्रिवंशसमुत्पन्नः पूर्वमत्रिसमः प्रभुः । स्रष्टा सर्वस्य धर्मस्य अंगो नाम प्रजापतिः

atrivaṁśasamutpannaḥ pūrvamatrisamaḥ prabhuḥ sraṣṭā sarvasya dharmasya aṁgo nāma prajāpatiḥ

—अत्रि के वंश में उत्पन्न, अत्रि के समान ही पूर्वकाल का प्रभु, समस्त धर्म का सृष्टिकर्ता, अंग नामक प्रजापति —

श्लोक 20 (padma.2.28.20)

य आसीत्तस्य पुत्रो वै वेनो नाम प्रजापतिः । धर्ममेवं परित्यज्य सर्वदैव प्रवर्तते

ya āsīttasya putro vai veno nāma prajāpatiḥ dharmamevaṁ parityajya sarvadaiva pravartate

—उसका पुत्र वेन नामक प्रजापति था, जो धर्म को इस प्रकार त्यागकर सदा अधर्म में प्रवृत्त रहता था।

श्लोक 21 (padma.2.28.21)

मृत्योः कन्या महाभागा सुनीथा नाम नामतः । तां तु अंगो महाभागः सुनीथामुपयेमिवान्

mṛtyoḥ kanyā mahābhāgā sunīthā nāma nāmataḥ tāṁ tu aṁgo mahābhāgaḥ sunīthāmupayemivān

मृत्यु की महाभागा कन्या, सुनीथा नाम की, उससे उस महाभाग अंग ने विवाह किया था।

श्लोक 22 (padma.2.28.22)

तस्यामुत्पादयामास वेनं धर्मप्रणाशनम् । मातामहस्य दोषेण वेनः कालात्मजात्मजः

tasyāmutpādayāmāsa venaṁ dharmapraṇāśanam mātāmahasya doṣeṇa venaḥ kālātmajātmajaḥ

उससे उसने धर्मनाशक वेन को उत्पन्न किया; अपने नाना के दोष के कारण, काल के पुत्र की पुत्र वेन —

श्लोक 23 (padma.2.28.23)

निजधर्मं परित्यज्य अधर्मनिरतोभवत् । कामाल्लोभान्महामोहात्पापमेव समाचरत्

nijadharmaṁ parityajya adharmaniratobhavat kāmāllobhānmahāmohātpāpameva samācarat

—अपने धर्म को त्यागकर अधर्म में रत हो गया; काम, लोभ और महामोह से वह पाप ही करने लगा।

श्लोक 24 (padma.2.28.24)

वेदाचारमयं धर्मं परित्यज्य नराधिपः । अन्ववर्तत पापेन मदमत्सरमोहितः

vedācāramayaṁ dharmaṁ parityajya narādhipaḥ anvavartata pāpena madamatsaramohitaḥ

वह नराधिप वेदाचारमय धर्म को त्यागकर, मद और मत्सर से मोहित होकर पाप का ही अनुसरण करने लगा।

श्लोक 25 (padma.2.28.25)

वेदाध्यायं विना लोके प्रावर्तंत तदा जनाः । निःस्वाध्यायवषट्काराः प्रजास्तस्मिन्प्रजापतौ

vedādhyāyaṁ vinā loke prāvartaṁta tadā janāḥ niḥsvādhyāyavaṣaṭkārāḥ prajāstasminprajāpatau

उस समय लोग वेदाध्ययन के बिना ही आचरण करने लगे; उस प्रजापति के अधीन प्रजाएँ स्वाध्याय और वषट्कार से रहित हो गईं —

श्लोक 26 (padma.2.28.26)

प्रवृत्तं न पपुः सोमं हुतं यज्ञेषु देवताः । इत्युवाच स दुष्टात्मा ब्राह्मणान्प्रति नित्यशः

pravṛttaṁ na papuḥ somaṁ hutaṁ yajñeṣu devatāḥ ityuvāca sa duṣṭātmā brāhmaṇānprati nityaśaḥ

—यज्ञों में देवताओं का हवि किया गया सोम नहीं पिया गया। वह दुष्टात्मा सदा ब्राह्मणों से यही कहता —

श्लोक 27 (padma.2.28.27)

नाध्येतव्यं न होतव्यं न देयं दानमेव च । न यष्टव्यं न होतव्यमिति तस्य प्रजापतेः

nādhyetavyaṁ na hotavyaṁ na deyaṁ dānameva ca na yaṣṭavyaṁ na hotavyamiti tasya prajāpateḥ

—'न अध्ययन करना है, न हवन करना है, न दान देना है; न यज्ञ करना है, न होम करना है' — उस प्रजापति की —

श्लोक 28 (padma.2.28.28)

आसीत्प्रतिज्ञा क्रूरेयं विनाशे प्रत्युपस्थिते । अहमिज्यश्च यष्टा च यज्ञश्चेति पुनः पुनः

āsītpratijñā krūreyaṁ vināśe pratyupasthite ahamijyaśca yaṣṭā ca yajñaśceti punaḥ punaḥ

—यह क्रूर प्रतिज्ञा थी, जब विनाश निकट आ रहा था — 'मैं ही पूज्य हूँ, मैं ही यष्टा और यज्ञ हूँ' — ऐसा वह बार-बार कहता —

श्लोक 29 (padma.2.28.29)

मयि यज्ञा विधातव्या मयि होतव्यमित्यपि । इत्यब्रवीत्सदा वेनो ह्यहं विष्णुः सनातनः

mayi yajñā vidhātavyā mayi hotavyamityapi ityabravītsadā veno hyahaṁ viṣṇuḥ sanātanaḥ

—'मुझमें ही यज्ञ किए जाने चाहिए, मुझमें ही हवन किया जाना चाहिए' — वेन सदा ऐसा कहता — 'मैं ही सनातन विष्णु हूँ —

श्लोक 30 (padma.2.28.30)

अहं ब्रह्मा अहं रुद्रो मित्र इंद्रः सदागतिः । अहमेव प्रभोक्ता च हव्यं कव्यं न संशयः

ahaṁ brahmā ahaṁ rudro mitra iṁdraḥ sadāgatiḥ ahameva prabhoktā ca havyaṁ kavyaṁ na saṁśayaḥ

—मैं ब्रह्मा हूँ, मैं रुद्र हूँ, मित्र, इंद्र, सदागति हूँ; मैं ही सब हव्य-कव्य का भोक्ता हूँ, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 31 (padma.2.28.31)

अथ ते मुनयः क्रुद्धा वेनं प्रति महाबलाः । ऊचुस्ते संगताः सर्वे राजानं पापचेतनम्

atha te munayaḥ kruddhā venaṁ prati mahābalāḥ ūcuste saṁgatāḥ sarve rājānaṁ pāpacetanam

तब वे महाबली मुनि वेन के प्रति क्रुद्ध हो गए; वे सभी एकत्र होकर उस पापी-चित्त राजा से बोले —

श्लोक 32 (padma.2.28.32)

ऋषय ऊचुः- राजा हि पृथिवीनाथः प्रजां पालयते सदा । धर्ममूर्तिः स राजेंद्र तस्माद्धर्मं हि रक्षयेत्

ṛṣaya ūcuḥ- rājā hi pṛthivīnāthaḥ prajāṁ pālayate sadā dharmamūrtiḥ sa rājeṁdra tasmāddharmaṁ hi rakṣayet

ऋषियों ने कहा — 'राजा ही पृथ्वी का स्वामी है, वह सदा प्रजा का पालन करता है; हे राजेंद्र! राजा धर्म की मूर्ति है, इसलिए उसे धर्म की ही रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 33 (padma.2.28.33)

वयं दीक्षां प्रवेक्ष्यामो यज्ञे द्वादशवार्षिकीम् । अधर्मं कुरु मा यागे नैष धर्मः सतां गतिः

vayaṁ dīkṣāṁ pravekṣyāmo yajñe dvādaśavārṣikīm adharmaṁ kuru mā yāge naiṣa dharmaḥ satāṁ gatiḥ

हम बारह वर्षों की दीक्षा में प्रवेश करेंगे इस यज्ञ में; अधर्म मत करो इस यज्ञ में, यह धर्म नहीं है, सज्जनों का मार्ग नहीं है।

श्लोक 34 (padma.2.28.34)

कुरु धर्मं महाराज सत्यं पुण्यं समाचर । प्रजाहं पालयिष्यामि इति ते समयः कृतः

kuru dharmaṁ mahārāja satyaṁ puṇyaṁ samācara prajāhaṁ pālayiṣyāmi iti te samayaḥ kṛtaḥ

धर्म करो, हे महाराज, सत्य और पुण्य का आचरण करो। 'मैं प्रजा का पालन करूँगा' — यह तुमने प्रतिज्ञा की थी।'

श्लोक 35 (padma.2.28.35)

तांस्तथाब्रुवतः सर्वान्महर्षीनब्रवीत्तदा । वेनः प्रहस्य दुर्बुद्धिरिममर्थमनर्थकम्

tāṁstathābruvataḥ sarvānmaharṣīnabravīttadā venaḥ prahasya durbuddhirimamarthamanarthakam

उन सभी महर्षियों के ऐसा कहने पर वेन, दुर्बुद्धि, हँसते हुए, इस अर्थहीन बात के उत्तर में बोला —

श्लोक 36 (padma.2.28.36)

वेन उवाच- स्रष्टा धर्मस्य कश्चान्यः श्रोतव्यं कस्य वा मया । श्रुतवीर्यतपः सत्ये मया वा कः समो भुवि

vena uvāca- sraṣṭā dharmasya kaścānyaḥ śrotavyaṁ kasya vā mayā śrutavīryatapaḥ satye mayā vā kaḥ samo bhuvi

वेन ने कहा — 'धर्म का सृष्टिकर्ता और कौन है? मुझे किसकी बात सुननी चाहिए? श्रुति, वीर्य, तप और सत्य में मेरे समान इस पृथ्वी पर कौन है?

श्लोक 37 (padma.2.28.37)

प्रभवं सर्वभूतानां धर्माणां च विशेषतः । संमूढा न विदुर्नूनं भवंतो मां विचेतसः

prabhavaṁ sarvabhūtānāṁ dharmāṇāṁ ca viśeṣataḥ saṁmūḍhā na vidurnūnaṁ bhavaṁto māṁ vicetasaḥ

समस्त प्राणियों का उद्गम, और विशेष रूप से धर्मों का — तुम सब मोहग्रस्त, अचेत होकर निश्चय ही मुझे नहीं जानते।

श्लोक 38 (padma.2.28.38)

इच्छन्दहेयं पृथिवीं प्लावयेयं जलैस्तथा । द्यां भुवं चैव रुंधेयं नात्र कार्या विचारणा

icchandaheyaṁ pṛthivīṁ plāvayeyaṁ jalaistathā dyāṁ bhuvaṁ caiva ruṁdheyaṁ nātra kāryā vicāraṇā

यदि मैं चाहूँ तो पृथ्वी को जला दूँ, या उसे जल से डुबो दूँ; स्वर्ग और भूमि को भी रोक दूँ — इसमें कोई विचार आवश्यक नहीं।'

श्लोक 39 (padma.2.28.39)

यदा न शक्यते मोहादवलेपाच्च पार्थिव । अपनेतुं तदा वेनं ततः क्रुद्धा महर्षयः

yadā na śakyate mohādavalepācca pārthiva apanetuṁ tadā venaṁ tataḥ kruddhā maharṣayaḥ

जब मोह और अहंकार के कारण उस राजा वेन को हटाया नहीं जा सका, तब क्रुद्ध हुए महर्षियों ने —

श्लोक 40 (padma.2.28.40)

विस्फुरंतं तदा वेनं बलाद्गृह्य ततो रुषा । वेनस्य तस्य सव्योरुं ममंथुर्जातमन्यवः

visphuraṁtaṁ tadā venaṁ balādgṛhya tato ruṣā venasya tasya savyoruṁ mamaṁthurjātamanyavaḥ

—उस राजते हुए वेन को बलपूर्वक पकड़कर, क्रोधवश उस वेन की बाईं जाँघ को मथ डाला, क्रोध से भरे हुए।

श्लोक 41 (padma.2.28.41)

कृष्णांजनचयोपेतमतिह्रस्वं विलक्षणम् । दीर्घास्यं च विरूपाक्षं नीलकंचुकवर्चसम्

kṛṣṇāṁjanacayopetamatihrasvaṁ vilakṣaṇam dīrghāsyaṁ ca virūpākṣaṁ nīlakaṁcukavarcasam

काले अंजन के ढेर के समान, अत्यंत छोटा, विलक्षण, लंबे मुख वाला, कुरूप नेत्रों वाला, नीले वस्त्र के वर्ण जैसा —

श्लोक 42 (padma.2.28.42)

लंबोदरं व्यूढकर्णमतिभीतं दुरोदरम् । ददृशुस्ते महात्मानो निषीदेत्यब्रुवंस्ततः

laṁbodaraṁ vyūḍhakarṇamatibhītaṁ durodaram dadṛśuste mahātmāno niṣīdetyabruvaṁstataḥ

—लटकते पेट वाला, बड़े कानों वाला, अत्यंत भयभीत, दुष्ट उदर वाला — उन महात्माओं ने देखा और कहा — 'बैठो!'

श्लोक 43 (padma.2.28.43)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा निषसाद भयातुरः । पर्वतेषु वनेष्वेव तस्य वंशः प्रतिष्ठितः

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā niṣasāda bhayāturaḥ parvateṣu vaneṣveva tasya vaṁśaḥ pratiṣṭhitaḥ

उनका यह वचन सुनकर वह भय से आतुर होकर बैठ गया; पर्वतों और वनों में ही उसका वंश स्थापित हुआ —

श्लोक 44 (padma.2.28.44)

निषादाश्च किराताश्च भिल्लानाहलकास्तथा । भ्रमराश्च पुलिंदाश्च ये चान्ये म्लेच्छजातयः

niṣādāśca kirātāśca bhillānāhalakāstathā bhramarāśca puliṁdāśca ye cānye mlecchajātayaḥ

—निषाद, किरात, भील, नाहल भी, भ्रमर और पुलिंद, और अन्य जो भी म्लेच्छ जातियाँ हैं —

श्लोक 45 (padma.2.28.45)

पापाचारास्तु ते सर्वे तस्मादंगात्प्रजज्ञिरे । अथ ते ऋषयः सर्वे प्रसन्नमनसस्ततः

pāpācārāstu te sarve tasmādaṁgātprajajñire atha te ṛṣayaḥ sarve prasannamanasastataḥ

—वे सभी पापाचारी उसी अंग से उत्पन्न हुए। फिर वे सभी ऋषि प्रसन्न मन से —

श्लोक 46 (padma.2.28.46)

गतकल्मषमेवं तं जातं वेनं नृपोत्तमम् । ममंथुर्दक्षिणं पाणिं तस्यैव च महात्मनः

gatakalmaṣamevaṁ taṁ jātaṁ venaṁ nṛpottamam mamaṁthurdakṣiṇaṁ pāṇiṁ tasyaiva ca mahātmanaḥ

—उस निष्पाप हो गए वेन, नृपोत्तम को देखकर, उस महात्मा के ही दाहिने हाथ को मथने लगे।

श्लोक 47 (padma.2.28.47)

मथिते तस्य पाणौ तु संजातं स्वेदमेव हि । पुनर्ममंथुस्ते विप्रा दक्षिणं पाणिमेव च

mathite tasya pāṇau tu saṁjātaṁ svedameva hi punarmamaṁthuste viprā dakṣiṇaṁ pāṇimeva ca

उसका हाथ मथे जाने पर पसीना ही उत्पन्न हुआ; उन विप्रों ने पुनः उसके दाहिने हाथ को ही मथा।

श्लोक 48 (padma.2.28.48)

सुकरात्पुरुषो जज्ञे द्वादशादित्यसन्निभः । तप्तकांचनवर्णांगो दिव्यमाल्यांबरावृतः

sukarātpuruṣo jajñe dvādaśādityasannibhaḥ taptakāṁcanavarṇāṁgo divyamālyāṁbarāvṛtaḥ

उस सुंदर हाथ से एक पुरुष उत्पन्न हुआ, बारह आदित्यों के समान, तपे स्वर्ण के वर्ण वाले अंग, दिव्य माला-वस्त्रों से आवृत —

श्लोक 49 (padma.2.28.49)

दिव्याभरणशोभांगो दिव्यगंधानुलेपनः । मुकुटेनार्कवर्णेन कुंडलाभ्यां विराजते

divyābharaṇaśobhāṁgo divyagaṁdhānulepanaḥ mukuṭenārkavarṇena kuṁḍalābhyāṁ virājate

—दिव्य आभूषणों से सुशोभित अंग, दिव्य सुगंध से लिप्त; सूर्य के समान मुकुट और दोनों कुंडलों से सुशोभित —

श्लोक 50 (padma.2.28.50)

महाकायो महाबाहू रूपेणाप्रतिमो भुवि । खड्गबाणधरो धन्वी कवची च महाप्रभुः

mahākāyo mahābāhū rūpeṇāpratimo bhuvi khaḍgabāṇadharo dhanvī kavacī ca mahāprabhuḥ

—महाकाय, महाबाहु, इस पृथ्वी पर रूप में अद्वितीय; खड्ग-बाणधारी, धनुर्धारी, कवचधारी, वह महाप्रभु —

श्लोक 51 (padma.2.28.51)

सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वालंकारभूषणः । तेजसा रूपभावेन सुवर्णैश्च महामतिः

sarvalakṣaṇasaṁpannaḥ sarvālaṁkārabhūṣaṇaḥ tejasā rūpabhāvena suvarṇaiśca mahāmatiḥ

—सर्वलक्षणसंपन्न, सर्वालंकारभूषित; तेज, रूप-भाव और स्वर्ण-वर्ण से वह महामति —

श्लोक 52 (padma.2.28.52)

दिवि इंद्रो यथा भाति भुवि वेनात्मजस्तथा । तस्मिञ्जाते महाभागे देवाश्च ऋषयोमलाः

divi iṁdro yathā bhāti bhuvi venātmajastathā tasmiñjāte mahābhāge devāśca ṛṣayomalāḥ

—जैसे स्वर्ग में इंद्र शोभित होता है, वैसे ही पृथ्वी पर वह वेन का पुत्र शोभित हुआ। उस महाभाग के उत्पन्न होने पर देवगण और निष्पाप ऋषियों ने —

श्लोक 53 (padma.2.28.53)

उत्सवं चक्रिरे सर्वे वेनस्य तनयं प्रति । दीप्यमानः स्ववपुषा साक्षादग्निरिवोज्ज्वलः

utsavaṁ cakrire sarve venasya tanayaṁ prati dīpyamānaḥ svavapuṣā sākṣādagnirivojjvalaḥ

—वेन के उस पुत्र के लिए सभी ने उत्सव मनाया, वह अपने ही शरीर के तेज से प्रज्वलित होता हुआ, साक्षात् अग्नि के समान उज्ज्वल।

श्लोक 54 (padma.2.28.54)

आद्यमाजगवं नाम धनुर्गृह्य महावरम् । शरान्दिव्यांश्च रक्षार्थे कवचं च महाप्रभम्

ādyamājagavaṁ nāma dhanurgṛhya mahāvaram śarāndivyāṁśca rakṣārthe kavacaṁ ca mahāprabham

उसने आदि आजगव नामक धनुष ग्रहण किया, वह महाश्रेष्ठ; रक्षा के लिए दिव्य बाण और महातेजस्वी कवच भी।

श्लोक 55 (padma.2.28.55)

जाते सति महाभागे पृथौ वीरे महात्मनि । संप्रह्रष्टानि भूतानि समस्तानि द्विजोत्तम

jāte sati mahābhāge pṛthau vīre mahātmani saṁprahraṣṭāni bhūtāni samastāni dvijottama

उस महाभाग वीर, महात्मा पृथु के उत्पन्न होने पर, समस्त प्राणी अत्यंत हर्षित हुए, हे द्विजोत्तम।

श्लोक 56 (padma.2.28.56)

सर्वतीर्थानि तोयानि पुण्यानि विविधानि च । तस्याभिषेके विप्रेंद्राः सर्व एव प्रतस्थिरे

sarvatīrthāni toyāni puṇyāni vividhāni ca tasyābhiṣeke vipreṁdrāḥ sarva eva pratasthire

समस्त तीर्थों के पुण्य, नाना प्रकार के जल, उसके अभिषेक के लिए, हे विप्रेंद्रो, सभी प्रस्थान कर गए।

श्लोक 57 (padma.2.28.57)

पितामहाद्या देवास्तु भूतानि विविधानि च । स्थावराणि चराण्येव अभ्यषिंचन्नराधिपम्

pitāmahādyā devāstu bhūtāni vividhāni ca sthāvarāṇi carāṇyeva abhyaṣiṁcannarādhipam

पितामह आदि देवगण, नाना प्रकार के स्थावर-जंगम प्राणी भी उस नराधिप को अभिषिक्त करने लगे —

श्लोक 58 (padma.2.28.58)

महावीरं प्रजापालं पृथुमेव द्विजोत्तम । पृथुर्वैन्यो राजराज्ये अभिगम्य चराचरैः

mahāvīraṁ prajāpālaṁ pṛthumeva dvijottama pṛthurvainyo rājarājye abhigamya carācaraiḥ

—उस महावीर, प्रजापालक पृथु को ही, हे द्विजोत्तम। वेन के पुत्र पृथु ने चराचर प्राणियों सहित राज्याभिषेक प्राप्त कर —

श्लोक 59 (padma.2.28.59)

देवैर्विप्रैस्तथा सर्वैरभिषिक्तो महामनाः । राज्ञां समधिराज्ये वै पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्

devairvipraistathā sarvairabhiṣikto mahāmanāḥ rājñāṁ samadhirājye vai pṛthurvainyaḥ pratāpavān

—देवताओं और समस्त विप्रों द्वारा अभिषिक्त होकर, वह महामना; राजाओं के सर्वोच्च राज्य में वह प्रतापी वेन-पुत्र पृथु —

श्लोक 60 (padma.2.28.60)

तस्य पित्रा प्रजाः सर्वाः कदा नैवानुरंजिताः । तेनानुरंजिताः सर्वा मुमुदिरे सुखेन वै

tasya pitrā prajāḥ sarvāḥ kadā naivānuraṁjitāḥ tenānuraṁjitāḥ sarvā mumudire sukhena vai

—जिसकी प्रजा उसके पिता द्वारा कभी संतुष्ट नहीं की गई थी, उसके द्वारा सभी संतुष्ट होकर सुखपूर्वक आनंदित हुईं।

श्लोक 61 (padma.2.28.61)

अनुरागात्तस्य वीरस्य नाम राजेत्यजायत । प्रयातस्य सुवीरस्य समुद्रस्य द्विजोत्तम

anurāgāttasya vīrasya nāma rājetyajāyata prayātasya suvīrasya samudrasya dvijottama

उस वीर के प्रति स्नेह से ही उसका नाम 'राजा' पड़ा। उस वीर पृथु के आगे बढ़ने पर, हे द्विजोत्तम, समुद्र का —

श्लोक 62 (padma.2.28.62)

आपस्तस्तंभिरे सर्वा भयात्तस्य महात्मनः । दुर्गं मार्गं विलोप्यैव सुमार्गं पर्वता ददुः

āpastastaṁbhire sarvā bhayāttasya mahātmanaḥ durgaṁ mārgaṁ vilopyaiva sumārgaṁ parvatā daduḥ

—समस्त जल उस महात्मा के भय से स्तब्ध हो गया; पर्वतों ने दुर्गम मार्गों को हटाकर सुगम मार्ग दिए।

श्लोक 63 (padma.2.28.63)

ध्वजभंगं न चक्रुस्ते गिरयः सर्व एव ते । अकृष्टपच्या पृथिवी सर्वत्र कामधेनवः

dhvajabhaṁgaṁ na cakruste girayaḥ sarva eva te akṛṣṭapacyā pṛthivī sarvatra kāmadhenavaḥ

उन सभी पर्वतों ने उसकी ध्वजा को भंग नहीं होने दिया; बिना जोते ही पृथ्वी सर्वत्र कामधेनु के समान फलदायी हो गई।

श्लोक 64 (padma.2.28.64)

पर्जन्यः कामवर्षी च वेदयज्ञान्महोत्सवान् । कुर्वंति ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च तथा परे

parjanyaḥ kāmavarṣī ca vedayajñānmahotsavān kurvaṁti brāhmaṇāḥ sarve kṣatriyāśca tathā pare

मेघ इच्छानुसार वर्षा करने लगा; समस्त ब्राह्मण और वैसे ही अन्य क्षत्रिय वेदयज्ञों के महोत्सव करने लगे —

श्लोक 65 (padma.2.28.65)

सर्वकामफला वृक्षास्तस्मिञ्छासति पार्थिवे । न दुर्भिक्षं न च व्याधिर्नाकालमरणं नृणाम्

sarvakāmaphalā vṛkṣāstasmiñchāsati pārthive na durbhikṣaṁ na ca vyādhirnākālamaraṇaṁ nṛṇām

—उस राजा के राज्य में वृक्ष सर्वकामनापूर्ण फल देने लगे; न दुर्भिक्ष था, न रोग, न मनुष्यों की असामयिक मृत्यु।

श्लोक 66 (padma.2.28.66)

सर्वे सुखेन जीवंति लोका धर्मपरायणाः । तस्मिञ्छासति दुर्धर्षे राजराजे महात्मनि

sarve sukhena jīvaṁti lokā dharmaparāyaṇāḥ tasmiñchāsati durdharṣe rājarāje mahātmani

सभी लोक धर्मपरायण होकर सुखपूर्वक जीने लगे, जब वह दुर्धर्ष, महात्मा राजाओं का राजा शासन करता था।

श्लोक 67 (padma.2.28.67)

एतस्मिन्नेव काले तु यज्ञे पैतामहे शुभे । सूत सूत्यां समुत्पन्नः सौम्येहनि महात्मनि

etasminneva kāle tu yajñe paitāmahe śubhe sūta sūtyāṁ samutpannaḥ saumyehani mahātmani

इसी समय, उस शुभ पैतामह यज्ञ में, हवनकुंड से सूत उत्पन्न हुआ, उस सौम्य, महान दिन में —

श्लोक 68 (padma.2.28.68)

तस्मिन्नेव महायज्ञे जज्ञे प्राज्ञोऽथ मागधः । पृथोःस्तवार्थं तौ तत्र समाहूतौ महर्षिभिः

tasminneva mahāyajñe jajñe prājño'tha māgadhaḥ pṛthoḥstavārthaṁ tau tatra samāhūtau maharṣibhiḥ

—उसी महायज्ञ में प्राज्ञ मागध भी उत्पन्न हुआ; पृथु की स्तुति के लिए महर्षियों ने उन दोनों को वहाँ बुलाया।

श्लोक 69 (padma.2.28.69)

सूतस्य लक्षणं वक्ष्ये महापुण्यं द्विजोत्तमाः । शिखासूत्रेण संयुक्तो वेदाध्ययनतत्परः

sūtasya lakṣaṇaṁ vakṣye mahāpuṇyaṁ dvijottamāḥ śikhāsūtreṇa saṁyukto vedādhyayanatatparaḥ

सूत का महापुण्य लक्षण मैं बताता हूँ, हे द्विजोत्तमो — शिखा-सूत्र से युक्त, वेदाध्ययन में तत्पर —

श्लोक 70 (padma.2.28.70)

सर्वशास्त्रार्थवेत्तासावग्निहोत्रमुपासते । दानाध्ययनसंपन्नो ब्रह्माचारपरायणः

sarvaśāstrārthavettāsāvagnihotramupāsate dānādhyayanasaṁpanno brahmācāraparāyaṇaḥ

—समस्त शास्त्रों के अर्थ का ज्ञाता, अग्निहोत्र की उपासना करने वाला; दान-अध्ययन से संपन्न, ब्रह्माचार में परायण —

श्लोक 71 (padma.2.28.71)

देवानां ब्राह्मणानां च पूजनाभिरतः सदा । याचकस्तावकैः पुण्यैर्वेदमंत्रैर्यजेत्किल

devānāṁ brāhmaṇānāṁ ca pūjanābhirataḥ sadā yācakastāvakaiḥ puṇyairvedamaṁtrairyajetkila

—देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा में सदा रत; याचक, अपनी पुण्यमय स्तुतियों और वेदमंत्रों से यजन करने वाला।

श्लोक 72 (padma.2.28.72)

ब्रह्माचारपरो नित्यं संबंधं ब्राह्मणैः सह । एवं स मागधो जज्ञे वेदाध्ययनवर्जितः

brahmācāraparo nityaṁ saṁbaṁdhaṁ brāhmaṇaiḥ saha evaṁ sa māgadho jajñe vedādhyayanavarjitaḥ

सदा ब्रह्माचार में परायण, ब्राह्मणों के साथ संबंध रखने वाला — इस प्रकार वह मागध उत्पन्न हुआ, वेदाध्ययन से रहित।

श्लोक 73 (padma.2.28.73)

बंदिनश्चारणाः सर्वे ब्रह्माचारविवर्जिताः । ज्ञेयास्ते च महाभागाः स्तावकाः प्रभवंति ते

baṁdinaścāraṇāḥ sarve brahmācāravivarjitāḥ jñeyāste ca mahābhāgāḥ stāvakāḥ prabhavaṁti te

सभी बंदी और चारण ब्रह्माचार से रहित होते हैं; वे महाभाग स्तावक इसी प्रकार उत्पन्न होते हैं, यह जानना चाहिए।

श्लोक 74 (padma.2.28.74)

स्तवनार्थमुभौ सृष्टौ निपुणौ सूतमागधौ । तावूचुर्ऋषयः सर्वे स्तूयतामेष पार्थिवः

stavanārthamubhau sṛṣṭau nipuṇau sūtamāgadhau tāvūcurṛṣayaḥ sarve stūyatāmeṣa pārthivaḥ

स्तुति के लिए ही वे दोनों, सूत और मागध, कुशल, सृजित हुए। सभी ऋषियों ने उनसे कहा — 'इस राजा की स्तुति की जाए —

श्लोक 75 (padma.2.28.75)

कर्मैतदनुरूपं च यादृशोयं नराधिपः । तावूचतुस्तदा सर्वांस्तानृषीन्बंदिमागधौ

karmaitadanurūpaṁ ca yādṛśoyaṁ narādhipaḥ tāvūcatustadā sarvāṁstānṛṣīnbaṁdimāgadhau

—वैसे ही कर्म से जैसा यह राजा है।' तब उस बंदी और मागध ने उन सभी ऋषियों से कहा —

श्लोक 76 (padma.2.28.76)

आवां देवानृषींश्चैव प्रीणयावः स्वकर्मभिः । न चास्य विद्वो वै कर्म न तथा लक्षणं यशः

āvāṁ devānṛṣīṁścaiva prīṇayāvaḥ svakarmabhiḥ na cāsya vidvo vai karma na tathā lakṣaṇaṁ yaśaḥ

—'हम दोनों देवताओं और ऋषियों को अपने-अपने कर्मों से प्रसन्न करते हैं; किंतु हम इसके कर्म को नहीं जानते, न ही इसके लक्षण और यश को —

श्लोक 77 (padma.2.28.77)

कर्मणा येन कुर्यावः स्तोत्रमस्य महात्मनः । जानीवस्तन्न विप्रेंद्रा अविज्ञातगुणस्य हि

karmaṇā yena kuryāvaḥ stotramasya mahātmanaḥ jānīvastanna vipreṁdrā avijñātaguṇasya hi

—किस कर्म से हम इस महात्मा की स्तुति करें? हम यह नहीं जानते, हे विप्रेंद्रो, क्योंकि इसके गुण अज्ञात हैं।'

श्लोक 78 (padma.2.28.78)

भविष्यैस्तैर्गुणैः पुण्यैः स्तोतव्योयं नरोत्तमः । कृतवान्यानि कर्माणि पृथुरेव महायशाः

bhaviṣyaistairguṇaiḥ puṇyaiḥ stotavyoyaṁ narottamaḥ kṛtavānyāni karmāṇi pṛthureva mahāyaśāḥ

'इस नरोत्तम की स्तुति उन भावी, पुण्यमय गुणों से ही की जानी चाहिए — जो कर्म वह महायशस्वी पृथु आगे करेगा ही।'

श्लोक 79 (padma.2.28.79)

ऊचुस्ते मुनयः सर्वे गुणान्दिव्यान्महात्मनः । सत्यवाञ्ज्ञानसंपन्नो बुद्धिमान्ख्यातविक्रमः

ūcuste munayaḥ sarve guṇāndivyānmahātmanaḥ satyavāñjñānasaṁpanno buddhimānkhyātavikramaḥ

उन सभी मुनियों ने उस महात्मा के दिव्य गुणों को बताया — सत्यवादी, ज्ञानसंपन्न, बुद्धिमान, विख्यात पराक्रम वाला —

श्लोक 80 (padma.2.28.80)

सदा शूरो गुणग्राही पुण्यवांस्त्यागवान्गुणी । धार्मिकः सत्यवादी च यज्ञानां याजकोत्तमः

sadā śūro guṇagrāhī puṇyavāṁstyāgavānguṇī dhārmikaḥ satyavādī ca yajñānāṁ yājakottamaḥ

—सदा शूर, गुणग्राही, पुण्यवान, त्यागी, गुणी; धार्मिक, सत्यवादी, यज्ञों का उत्तम याजक —

श्लोक 81 (padma.2.28.81)

प्रियवाक्सत्यवादी च धान्यवान्धनवान्गुणी । गुणज्ञः सगुणग्राही धर्मज्ञः सत्यवत्सलः

priyavāksatyavādī ca dhānyavāndhanavānguṇī guṇajñaḥ saguṇagrāhī dharmajñaḥ satyavatsalaḥ

—प्रियवचन, सत्यवादी, धान्यवान, धनवान, गुणी; गुणज्ञ, गुणग्राही, धर्मज्ञ, सत्यप्रिय —

श्लोक 82 (padma.2.28.82)

सर्वगः सर्ववेत्ता च ब्रह्मण्यो वेदवित्सुधीः । प्रज्ञावान्सुस्वरश्चैव वेदवेदांगपारगः

sarvagaḥ sarvavettā ca brahmaṇyo vedavitsudhīḥ prajñāvānsusvaraścaiva vedavedāṁgapāragaḥ

—सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, ब्राह्मणपरायण, वेदविद, सुबुद्धि; प्रज्ञावान, सुस्वर, वेद-वेदांगों में पारंगत —

श्लोक 83 (padma.2.28.83)

धाता गोप्ता प्रजानां स विजयी समरांगणे । राजसूयादिकानां तु यज्ञानां राजसत्तमः

dhātā goptā prajānāṁ sa vijayī samarāṁgaṇe rājasūyādikānāṁ tu yajñānāṁ rājasattamaḥ

—प्रजाओं का धाता और रक्षक, वह युद्धभूमि में विजयी; राजसूय आदि यज्ञों का —

श्लोक 84 (padma.2.28.84)

आहर्ता भूतले चैकः सर्वधर्मसमन्वितः । एते गुणा अस्य चांगे भविष्यंति महात्मनः

āhartā bhūtale caikaḥ sarvadharmasamanvitaḥ ete guṇā asya cāṁge bhaviṣyaṁti mahātmanaḥ

—पृथ्वी पर एकमात्र आहर्ता, समस्त धर्मों से युक्त। ये गुण उस महात्मा में भावी रूप से प्रकट होंगे।'

श्लोक 85 (padma.2.28.85)

ऋषिभिस्तौ नियुक्तौ तु कुर्वाणौ सूतमागधौ । गुणैश्चैव भविष्यैश्च स्तोत्रं तस्य महात्मनः

ṛṣibhistau niyuktau tu kurvāṇau sūtamāgadhau guṇaiścaiva bhaviṣyaiśca stotraṁ tasya mahātmanaḥ

ऋषियों द्वारा इस प्रकार नियुक्त, वे सूत और मागध, उन भावी गुणों से उस महात्मा की स्तुति करने लगे।

श्लोक 86 (padma.2.28.86)

तदा प्रभृति वै लोकास्तवैस्तुष्टा महामते । पुरतश्च भविष्यंति दातारः स्तावनैर्गुणैः

tadā prabhṛti vai lokāstavaistuṣṭā mahāmate purataśca bhaviṣyaṁti dātāraḥ stāvanairguṇaiḥ

तब से, हे महामते, लोग उन स्तुतियों से संतुष्ट होकर, ऐसी स्तवन-योग्य गुणों के कारण भविष्य में दाता बनते हैं —

श्लोक 87 (padma.2.28.87)

ततः प्रभृति लोकेस्मिन्स्तवेषु द्विजसत्तमाः । आशीर्वादाः प्रयुज्यंते तेषां द्रविणमुत्तमम्

tataḥ prabhṛti lokesminstaveṣu dvijasattamāḥ āśīrvādāḥ prayujyaṁte teṣāṁ draviṇamuttamam

—तब से इस लोक में स्तुतियों में, हे द्विजसत्तमो, आशीर्वाद दिए जाते हैं, और उनके लिए उत्तम धन दिया जाता है —

श्लोक 88 (padma.2.28.88)

सूताय मागधायैव बंदिने च महोदयम् । चारणाय ततः प्रादात्तैलंगं देशमुत्तमम्

sūtāya māgadhāyaiva baṁdine ca mahodayam cāraṇāya tataḥ prādāttailaṁgaṁ deśamuttamam

—सूत को, मागध को, बंदी को, और चारण को — उन्हें फिर तेलंग नामक उत्तम देश दिया गया।

श्लोक 89 (padma.2.28.89)

पृथुः प्रसादाद्धर्मात्मा हैहयं देशमेव च । रेवातीरे पुरं कृत्वा स्वनाम्ना नृपनंदनः

pṛthuḥ prasādāddharmātmā haihayaṁ deśameva ca revātīre puraṁ kṛtvā svanāmnā nṛpanaṁdanaḥ

पृथु ने कृपापूर्वक हैहय देश भी दिया; उस धर्मात्मा राजपुत्र ने रेवा के तट पर अपने ही नाम से नगर बनाकर —

श्लोक 90 (padma.2.28.90)

ब्राह्मणेभ्यो द्विजश्रेष्ठ यजन्दाता पृथुः पुरा । सर्वज्ञं सर्वदातारं धर्मवीर्यं नरोत्तमम्

brāhmaṇebhyo dvijaśreṣṭha yajandātā pṛthuḥ purā sarvajñaṁ sarvadātāraṁ dharmavīryaṁ narottamam

—हे द्विजश्रेष्ठ! ब्राह्मणों को यज्ञ करते हुए दानी पृथु ने पूर्वकाल में यह सब दिया। सर्वज्ञ, सर्वदाता, धर्मवीर्य, नरोत्तम —

श्लोक 91 (padma.2.28.91)

तं ददृशुः प्रजाः सर्वा मुनयश्च तपोमलाः । ऊचुः परस्परं पुण्या एष राजा महामतिः

taṁ dadṛśuḥ prajāḥ sarvā munayaśca tapomalāḥ ūcuḥ parasparaṁ puṇyā eṣa rājā mahāmatiḥ

—उसे समस्त प्रजा और तपस्वी मुनियों ने देखा; वे पुण्यशाली आपस में कहने लगे — 'यह राजा महामति है —

श्लोक 92 (padma.2.28.92)

देवादीनां वृत्तिदाता अस्माकं च विशेषतः । प्रजानां पालकश्चैव वृत्तिदो हि भविष्यति

devādīnāṁ vṛttidātā asmākaṁ ca viśeṣataḥ prajānāṁ pālakaścaiva vṛttido hi bhaviṣyati

—देवताओं आदि का वृत्तिदाता है, हमारा भी विशेष रूप से; वह प्रजा का पालक और वृत्तिदाता बनेगा।'

श्लोक 93 (padma.2.28.93)

इयं धात्री महाप्राज्ञा उप्तं बीजं पुरा किल । जीवनार्थं प्रजाभिस्तु ग्रासयित्वा स्थिराभवत्

iyaṁ dhātrī mahāprājñā uptaṁ bījaṁ purā kila jīvanārthaṁ prajābhistu grāsayitvā sthirābhavat

यह महाप्राज्ञा धात्री, जिस पर पहले बीज बोए गए थे, प्रजाओं द्वारा जीवन के लिए ग्रस लिए जाने पर स्थिर हो गई।

श्लोक 94 (padma.2.28.94)

ततः पृथुं द्विजश्रेष्ठ प्रजाः समभिदुद्रुवुः । विधत्स्वेति सुवृत्तिं नो मुनीनां वचनं तदा

tataḥ pṛthuṁ dvijaśreṣṭha prajāḥ samabhidudruvuḥ vidhatsveti suvṛttiṁ no munīnāṁ vacanaṁ tadā

तब, हे द्विजश्रेष्ठ, प्रजा पृथु के पास दौड़ी आई — 'हमें सुवृत्ति प्रदान करो' — यह मुनियों का वचन था।

श्लोक 95 (padma.2.28.95)

ग्रासयित्वा तदान्नानि पृथ्वी जाता सुनिश्चला । भयं प्रजानां सुमहत्स दृष्ट्वा राजसत्तमः

grāsayitvā tadānnāni pṛthvī jātā suniścalā bhayaṁ prajānāṁ sumahatsa dṛṣṭvā rājasattamaḥ

तब अन्न ग्रस लिए जाने के बाद पृथ्वी अत्यंत अस्थिर हो गई। प्रजा के इस अत्यंत महान भय को देखकर वह राजसत्तम —

श्लोक 96 (padma.2.28.96)

महर्षिवचनात्सोपि प्रगृह्य सशरं धनुः । अभ्यधावत वेगेन पृथ्वीं क्रुद्धो नराधिपः

maharṣivacanātsopi pragṛhya saśaraṁ dhanuḥ abhyadhāvata vegena pṛthvīṁ kruddho narādhipaḥ

—महर्षियों के वचन से, बाण सहित धनुष उठाकर, वह नराधिप क्रुद्ध होकर वेगपूर्वक पृथ्वी की ओर दौड़ा।

श्लोक 97 (padma.2.28.97)

कौंजरं रूपमास्थाय भयात्तस्य तु मेदिनी । वनेषु दुर्गदेशेषु गुप्ता भूत्वा चचार सा

kauṁjaraṁ rūpamāsthāya bhayāttasya tu medinī vaneṣu durgadeśeṣu guptā bhūtvā cacāra sā

हाथी का रूप धारण कर, उसके भय से वह मेदिनी वनों और दुर्गम स्थानों में छिपकर विचरण करने लगी।

श्लोक 98 (padma.2.28.98)

न पश्यति महाप्राज्ञः कुरूपं द्विजसत्तमाः । आचचक्षुर्महाप्राज्ञं कुंजरं रूपमास्थिता

na paśyati mahāprājñaḥ kurūpaṁ dvijasattamāḥ ācacakṣurmahāprājñaṁ kuṁjaraṁ rūpamāsthitā

वह महाप्राज्ञ उसे उस कुरूप रूप में नहीं देख पा रहा था, हे द्विजसत्तमो; किसी ने उस महाप्राज्ञ को बताया कि वह हाथी का रूप धारण किए हुए है।

श्लोक 99 (padma.2.28.99)

ततः कुंजररूपांतामभिदुद्राव पार्थिवः । ताड्यमाना च सा तेन निशितैर्मार्गणैस्ततः

tataḥ kuṁjararūpāṁtāmabhidudrāva pārthivaḥ tāḍyamānā ca sā tena niśitairmārgaṇaistataḥ

तब वह राजा उस हाथी-रूपी पृथ्वी के पीछे दौड़ा; तीक्ष्ण बाणों से आहत होकर वह तब —

श्लोक 100 (padma.2.28.100)

हरिरूपं समास्थाय पलायनपराभवत् । हरेरूपं समास्थाय अभिदुद्राव पार्थिवः

harirūpaṁ samāsthāya palāyanaparābhavat harerūpaṁ samāsthāya abhidudrāva pārthivaḥ

—सिंह का रूप धारण कर भागने लगी; और सिंह का रूप धारण कर वह राजा भी उसके पीछे दौड़ा।

श्लोक 101 (padma.2.28.101)

सोतिक्रुद्धो महाप्राज्ञो रोषारुणसुलोचनः । सुबाणैर्निशितैस्तीक्ष्णैराजघान स मेदिनीम्

sotikruddho mahāprājño roṣāruṇasulocanaḥ subāṇairniśitaistīkṣṇairājaghāna sa medinīm

वह अत्यंत क्रुद्ध महाप्राज्ञ, क्रोध से लाल नेत्रों वाला, तीक्ष्ण, पैने बाणों से उस मेदिनी पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 102 (padma.2.28.102)

आकुलव्याकुला जाता बाणाघातहता तदा । माहिषं रूपमास्थाय पलायनपराभवत्

ākulavyākulā jātā bāṇāghātahatā tadā māhiṣaṁ rūpamāsthāya palāyanaparābhavat

बाणों की चोट से आहत होकर वह अत्यंत व्याकुल हो गई; भैंसे का रूप धारण कर वह भागने लगी —

श्लोक 103 (padma.2.28.103)

अभ्यधावत वेगेन बाणपाणिर्धनुर्धरः । सा गौर्भूत्वा द्विजश्रेष्ठा स्वर्गमेव गता ध्रुवम्

abhyadhāvata vegena bāṇapāṇirdhanurdharaḥ sā gaurbhūtvā dvijaśreṣṭhā svargameva gatā dhruvam

—वह वेगपूर्वक दौड़ा, बाण हाथ में लिए, धनुर्धारी। वह गाय बनकर, हे द्विजश्रेष्ठ, निश्चय ही स्वर्ग को चली गई।

श्लोक 104 (padma.2.28.104)

ब्रह्मणः शरणं प्राप्ता विष्णोश्चैव महात्मनः । रुद्रादीनां च देवानां त्राणस्थानं न विंदति

brahmaṇaḥ śaraṇaṁ prāptā viṣṇoścaiva mahātmanaḥ rudrādīnāṁ ca devānāṁ trāṇasthānaṁ na viṁdati

उसने ब्रह्मा की शरण ली, और महात्मा विष्णु की भी; रुद्र आदि देवताओं में भी उसे रक्षा का स्थान नहीं मिला।

श्लोक 105 (padma.2.28.105)

अलभंती भृशं त्राणं वैन्यमेवान्वविंदत । तस्य पार्श्वं पुनः प्राप्ता बाणघातसमाकुला

alabhaṁtī bhṛśaṁ trāṇaṁ vainyamevānvaviṁdata tasya pārśvaṁ punaḥ prāptā bāṇaghātasamākulā

रक्षा न पाकर अंततः वह वेन-पुत्र के पास ही आई; उसके पास पुनः पहुँचकर, बाणों की चोट से व्याकुल —

श्लोक 106 (padma.2.28.106)

बद्धांजलिपुटाभूत्वा तं पृथुं वाक्यमब्रवीत् । त्राहित्राहीति राजेंद्र सा राजानमभाषत

baddhāṁjalipuṭābhūtvā taṁ pṛthuṁ vākyamabravīt trāhitrāhīti rājeṁdra sā rājānamabhāṣata

—हाथ जोड़कर उसने उस पृथु से यह वचन कहा — 'बचाओ, बचाओ!' हे राजेंद्र, इस प्रकार उसने राजा से कहा —

श्लोक 107 (padma.2.28.107)

अहं धात्री महाभाग सर्वाधारा वसुंधरा । निहतायां मयि नृप निहतं लोकसप्तकम्

ahaṁ dhātrī mahābhāga sarvādhārā vasuṁdharā nihatāyāṁ mayi nṛpa nihataṁ lokasaptakam

'मैं धात्री हूँ, हे महाभाग, सर्वाधार वसुंधरा। मेरे मारे जाने पर, हे राजन्, सातों लोक मारे जाएँगे —

श्लोक 108 (padma.2.28.108)

कृतांजलिपुटा भूत्वा पूज्या लोकैस्त्रिभिः सदा । उवाच चैनं राजानमवध्या स्त्री सदा नृप

kṛtāṁjalipuṭā bhūtvā pūjyā lokaistribhiḥ sadā uvāca cainaṁ rājānamavadhyā strī sadā nṛpa

—हाथ जोड़कर वह, जो तीनों लोकों द्वारा सदा पूज्य है, उस राजा से बोली — 'स्त्री सदा अवध्य होती है, हे राजन् —

श्लोक 109 (padma.2.28.109)

स्त्रीणां वधे महत्पापं दृष्टमस्ति द्विजोत्तमैः । गवां वधे महत्पापं दृष्टमस्ति द्विजोत्तमैः

strīṇāṁ vadhe mahatpāpaṁ dṛṣṭamasti dvijottamaiḥ gavāṁ vadhe mahatpāpaṁ dṛṣṭamasti dvijottamaiḥ

—स्त्रियों के वध में महापाप देखा गया है द्विजोत्तमों द्वारा; गायों के वध में भी महापाप देखा गया है द्विजोत्तमों द्वारा।

श्लोक 110 (padma.2.28.110)

मया विना महाराज कथं धारयसे प्रजाः । अहं यदास्थिरा राजंस्तदा लोकाश्चराचराः

mayā vinā mahārāja kathaṁ dhārayase prajāḥ ahaṁ yadāsthirā rājaṁstadā lokāścarācarāḥ

मेरे बिना, हे महाराज, तुम प्रजा को कैसे धारण करोगे? जब मैं अस्थिर होती हूँ, हे राजन्, तब चराचर लोक —

श्लोक 111 (padma.2.28.111)

स्थिरत्वं यांति ते सर्वे स्थिरीभूता यदा ह्यहम् । मां विना तु इमे लोका विनश्येयुश्चराचराः

sthiratvaṁ yāṁti te sarve sthirībhūtā yadā hyaham māṁ vinā tu ime lokā vinaśyeyuścarācarāḥ

—वे सभी तभी स्थिरता प्राप्त करते हैं जब मैं स्थिर होती हूँ। मेरे बिना ये चराचर लोक नष्ट हो जाएँगे —

श्लोक 112 (padma.2.28.112)

ततः प्रजा विनश्येयुर्मम नाशे समागते । कथं धारयिता चासि प्रजा राजन्मया विना

tataḥ prajā vinaśyeyurmama nāśe samāgate kathaṁ dhārayitā cāsi prajā rājanmayā vinā

—तब प्रजा नष्ट हो जाएगी, जब मेरा नाश हो जाएगा। बिना मेरे तुम प्रजा को कैसे धारण करोगे, हे राजन्?

श्लोक 113 (padma.2.28.113)

मयि लोकाः स्थिरा राजन्मयेदं धार्यते जगत् । मद्विनाशे विनश्येयुः प्रजाः सर्वा न संशयः

mayi lokāḥ sthirā rājanmayedaṁ dhāryate jagat madvināśe vinaśyeyuḥ prajāḥ sarvā na saṁśayaḥ

मुझमें ही लोक स्थिर हैं, हे राजन्, मुझसे ही यह जगत धारण किया जाता है। मेरे विनाश से समस्त प्रजा नष्ट हो जाएगी, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 114 (padma.2.28.114)

न मामर्हसि वै हंतुं श्रेयश्चेत्त्वं चिकीर्षसि । प्रजानां पृथिवीपाल शृणु देव वचो मम

na māmarhasi vai haṁtuṁ śreyaścettvaṁ cikīrṣasi prajānāṁ pṛthivīpāla śṛṇu deva vaco mama

तुम्हें मुझे मारना उचित नहीं है, यदि तुम प्रजा के कल्याण की इच्छा रखते हो, हे पृथ्वीपाल! मेरा वचन सुनो, हे देव!

श्लोक 115 (padma.2.28.115)

उपायैश्च महाभाग सुसिद्धिं यांत्युपक्रमाः । समालोक्य ह्युपायं त्वं प्रजा येन धरिष्यति

upāyaiśca mahābhāga susiddhiṁ yāṁtyupakramāḥ samālokya hyupāyaṁ tvaṁ prajā yena dhariṣyati

उपायों से ही, हे महाभाग, प्रयत्न सफल होते हैं; उपाय पर भली-भाँति विचार करो जिससे प्रजा धारण की जा सके।

श्लोक 116 (padma.2.28.116)

मां हत्वा त्वं महाराज धारणे पालने सदा । पोषणे च महाप्राज्ञ मद्विना हि कथं नृप

māṁ hatvā tvaṁ mahārāja dhāraṇe pālane sadā poṣaṇe ca mahāprājña madvinā hi kathaṁ nṛpa

मुझे मारकर, हे महाराज, तुम सदा धारण, पालन और पोषण में — मेरे बिना कैसे, हे महाप्राज्ञ, हे राजन् —

श्लोक 117 (padma.2.28.117)

धरिष्यसि प्रजां चेमां कोपं यच्छ त्वमात्मनः । अन्नमयी भविष्यामि धरिष्यामि प्रजामिमाम्

dhariṣyasi prajāṁ cemāṁ kopaṁ yaccha tvamātmanaḥ annamayī bhaviṣyāmi dhariṣyāmi prajāmimām

—इस प्रजा को धारण करोगे? अपने क्रोध को रोको। मैं अन्नमयी बनूँगी, इस प्रजा को धारण करूँगी।

श्लोक 118 (padma.2.28.118)

अहं नारी अवध्या च प्रायश्चित्ती भविष्यसि । अवध्यां तु स्त्रियं प्राहुस्तिर्यग्योनिगतामपि

ahaṁ nārī avadhyā ca prāyaścittī bhaviṣyasi avadhyāṁ tu striyaṁ prāhustiryagyonigatāmapi

मैं स्त्री हूँ, अवध्य हूँ; तुम प्रायश्चित्ती बनोगे यदि मुझे मारा। तिर्यक् योनि में गई हुई स्त्री को भी अवध्य कहा गया है।

श्लोक 119 (padma.2.28.119)

विचार्यैवं महाराज न धर्मं त्यक्तुमर्हसि । एवं नानाविधैर्वाक्यैरुक्तो धात्र्या नराधिपः

vicāryaivaṁ mahārāja na dharmaṁ tyaktumarhasi evaṁ nānāvidhairvākyairukto dhātryā narādhipaḥ

यह विचार कर, हे महाराज, तुम्हें धर्म नहीं त्यागना चाहिए।' इस प्रकार नाना प्रकार के वचनों से धात्री द्वारा कहे जाने पर वह नराधिप —

श्लोक 120 (padma.2.28.120)

कोपमेनं महाराज त्यज दारुणमेव हि । प्रसन्ने त्वयि राजेंद्र तदा स्वस्था भवाम्यहम्

kopamenaṁ mahārāja tyaja dāruṇameva hi prasanne tvayi rājeṁdra tadā svasthā bhavāmyaham

—'यह भयंकर क्रोध त्याग दो, हे महाराज! तुम्हारे प्रसन्न होने पर, हे राजेंद्र, तभी मैं स्वस्थ हो सकूँगी।'

श्लोक 121 (padma.2.28.121)

एवमुक्तस्तया राजा पृथुर्वैन्यः प्रजापतिः । तामुवाच महाभागां धरित्रीं द्विजसत्तमाः

evamuktastayā rājā pṛthurvainyaḥ prajāpatiḥ tāmuvāca mahābhāgāṁ dharitrīṁ dvijasattamāḥ

उसके ऐसा कहे जाने पर राजा पृथु, वेन का पुत्र, वह प्रजापति, उस महाभागा पृथ्वी से बोला, हे द्विजसत्तमो...

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