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भूमि खण्ड · अध्याय 31

अत्रि द्वारा अंग को इंद्रतुल्य पुत्र प्राप्ति का उपदेश

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (padma.2.31.1)

सूत उवाच- अथ त्वंगो महातेजा दृष्ट्वा इंद्रस्य संपदम् । भोगं चैव विलासं च लीलां तस्य महात्मनः

sūta uvāca- atha tvaṁgo mahātejā dṛṣṭvā iṁdrasya saṁpadam bhogaṁ caiva vilāsaṁ ca līlāṁ tasya mahātmanaḥ

सूत जी ने कहा — तब वह महातेजस्वी अंग, इंद्र की संपदा, भोग, विलास, और उस महात्मा की लीला को देखकर —

श्लोक 2 (padma.2.31.2)

कथं मे इंद्र सदृशः पुत्रः स्याद्धर्मसंयुतः । चिंतयित्वा क्षणं चैव अंगो धर्मभृतां वरः

kathaṁ me iṁdra sadṛśaḥ putraḥ syāddharmasaṁyutaḥ ciṁtayitvā kṣaṇaṁ caiva aṁgo dharmabhṛtāṁ varaḥ

—सोचने लगा 'मुझे इंद्र के समान, धर्मयुक्त पुत्र कैसे प्राप्त हो?' क्षणभर विचार कर वह अंग, धर्मधारियों में श्रेष्ठ —

श्लोक 3 (padma.2.31.3)

स्वकं गेहं समायातः स त्वंगः सत्यतत्परः । अत्रिं पप्रच्छ पितरं प्रणतो नम्रकंधरः

svakaṁ gehaṁ samāyātaḥ sa tvaṁgaḥ satyatatparaḥ atriṁ papraccha pitaraṁ praṇato namrakaṁdharaḥ

—अपने घर लौट आया, वह सत्यनिष्ठ अंग, और अपने पिता अत्रि से, झुककर, विनम्र होकर पूछा —

श्लोक 4 (padma.2.31.4)

कोऽयं पुण्यः समाचारैरिंद्रत्वं भुंजते महत् । कस्य पुण्यस्य वै पुष्टिः किं कृतं कर्म कीदृशम्

ko'yaṁ puṇyaḥ samācārairiṁdratvaṁ bhuṁjate mahat kasya puṇyasya vai puṣṭiḥ kiṁ kṛtaṁ karma kīdṛśam

—'यह पुण्यात्मा कौन है जो अपने आचरणों से इस महान इंद्रत्व को भोगता है? किसके पुण्य से यह वृद्धि हुई? क्या कर्म किया गया, कैसा?

श्लोक 5 (padma.2.31.5)

कीदृशं तप एतस्य कमाराधितवान्पुरा । एतन्मे विस्तरेण त्वं ब्रूहि सत्यवतां वर

kīdṛśaṁ tapa etasya kamārādhitavānpurā etanme vistareṇa tvaṁ brūhi satyavatāṁ vara

इसका कैसा तप था? इसने पूर्व में किसकी आराधना की थी? यह मुझे विस्तार से बताइए, हे सत्यवादियों में श्रेष्ठ।'

श्लोक 6 (padma.2.31.6)

अत्रिरुवाच- साधुसाधु महाभाग यद्येवं पृच्छसे मयि । चरित्रमिंद्रस्य वत्स तन्मे निगदतः शृणु

atriruvāca- sādhusādhu mahābhāga yadyevaṁ pṛcchase mayi caritramiṁdrasya vatsa tanme nigadataḥ śṛṇu

अत्रि ने कहा — 'साधु-साधु, हे महाभाग! तुम मुझसे ऐसा पूछ रहे हो, यह अच्छा है। इंद्र का चरित्र, हे वत्स, मेरे कहने पर सुनो —

श्लोक 7 (padma.2.31.7)

सुव्रतो नाम मेधावी पुरा ब्राह्मणसत्तमः । तेन कृष्णो हृषीकेशस्तपसा चैव तोषितः

suvrato nāma medhāvī purā brāhmaṇasattamaḥ tena kṛṣṇo hṛṣīkeśastapasā caiva toṣitaḥ

—सुव्रत नाम का एक मेधावी, श्रेष्ठ ब्राह्मण पहले हुआ था; उसके द्वारा कृष्ण हृषीकेश तप से ही प्रसन्न किए गए थे।

श्लोक 8 (padma.2.31.8)

पुण्यगर्भं पुनः प्राप्तो ह्यदित्याः कश्यपात्किल । विष्णोश्चैव प्रसादेन सुरराजो बभूव ह

puṇyagarbhaṁ punaḥ prāpto hyadityāḥ kaśyapātkila viṣṇoścaiva prasādena surarājo babhūva ha

वह पुनः पुण्यगर्भ में प्राप्त हुआ, कश्यप द्वारा अदिति के गर्भ में; और विष्णु की ही कृपा से वह सुरराज बना।'

श्लोक 9 (padma.2.31.9)

अंग उवाच- कथमिंद्रसमः पुत्रो मम स्यात्पुत्रवत्सल । तदुपायं समाचक्ष्व भवाञ्ज्ञानवतां वरः

aṁga uvāca- kathamiṁdrasamaḥ putro mama syātputravatsala tadupāyaṁ samācakṣva bhavāñjñānavatāṁ varaḥ

अंग ने कहा — 'मुझे इंद्र के समान पुत्र कैसे प्राप्त हो, हे पुत्रवत्सल? वह उपाय बताइए, आप ज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं।'

श्लोक 10 (padma.2.31.10)

अत्रिरुवाच- समासेनैव तस्यैव सुव्रतस्य महात्मनः । चरित्रमखिलं पुण्यं निशामय महामते

atriruvāca- samāsenaiva tasyaiva suvratasya mahātmanaḥ caritramakhilaṁ puṇyaṁ niśāmaya mahāmate

अत्रि ने कहा — 'संक्षेप में ही उस महात्मा सुव्रत का संपूर्ण पुण्य चरित्र, हे महामते, सुनो —

श्लोक 11 (padma.2.31.11)

यथा सुव्रत मेधावी पुराराधितवान्हरिम् । तस्य भावं च भक्तिं च ध्यानं चैव महात्मनः

yathā suvrata medhāvī purārādhitavānharim tasya bhāvaṁ ca bhaktiṁ ca dhyānaṁ caiva mahātmanaḥ

—जिस प्रकार वह मेधावी सुव्रत पूर्वकाल में हरि की आराधना करता था, उस महात्मा के उस भाव, भक्ति और ध्यान को —

श्लोक 12 (padma.2.31.12)

समालोक्य जगन्नाथो दत्तवान्वै महत्पदम् । स ऐंद्रं सर्वभोगाढ्यं त्रैलोक्यं सचराचरम्

samālokya jagannātho dattavānvai mahatpadam sa aiṁdraṁ sarvabhogāḍhyaṁ trailokyaṁ sacarācaram

—देखकर जगन्नाथ ने उसे वह महान पद दे दिया — इंद्रपद, समस्त भोगों से युक्त, चराचर सहित त्रैलोक्य —

श्लोक 13 (padma.2.31.13)

विष्णोश्चैव प्रसादाच्च पदं भुंक्ते त्रिलोकधृक् । एवं ते सर्वमाख्यातमिंद्रस्यापि विचेष्टितम्

viṣṇoścaiva prasādācca padaṁ bhuṁkte trilokadhṛk evaṁ te sarvamākhyātamiṁdrasyāpi viceṣṭitam

—विष्णु की ही कृपा से वह त्रिलोकधर पद भोगता है। इस प्रकार तुम्हें इंद्र का यह सारा आचरण बताया गया।

श्लोक 14 (padma.2.31.14)

भक्त्या तुष्यति गोविंदो भावध्यानेन सत्तम । सर्वं ददाति तुष्टात्मा भक्त्या संतोषितो हरिः

bhaktyā tuṣyati goviṁdo bhāvadhyānena sattama sarvaṁ dadāti tuṣṭātmā bhaktyā saṁtoṣito hariḥ

भक्ति से गोविंद प्रसन्न होते हैं, भाव और ध्यान से, हे सत्तम; प्रसन्न आत्मा हरि, भक्ति से संतुष्ट होकर सब कुछ देते हैं।

श्लोक 15 (padma.2.31.15)

तस्मादाराध्य गोविंदं सर्वदं सर्वसंभवम् । सर्वज्ञं सर्ववेत्तारं सर्वेषां पुरुषं वरम्

tasmādārādhya goviṁdaṁ sarvadaṁ sarvasaṁbhavam sarvajñaṁ sarvavettāraṁ sarveṣāṁ puruṣaṁ varam

इसलिए गोविंद की आराधना करो, जो सर्वदाता, सर्वस्रोत, सर्वज्ञ, सर्ववेत्ता, समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ हैं —

श्लोक 16 (padma.2.31.16)

तस्मात्प्राप्स्यसि सर्वं त्वं यद्यदिच्छसि नंदन

tasmātprāpsyasi sarvaṁ tvaṁ yadyadicchasi naṁdana

—उससे तुम सब कुछ प्राप्त कर लोगे, जो भी तुम चाहो, हे नंदन।

श्लोक 17 (padma.2.31.17)

सुखस्य दाता परमार्थदाता मोक्षस्य दाता जगतां हि नाथः । तस्मात्तमाराधय गच्छ पुत्र संप्राप्स्यसे इंद्रसमं हि पुत्रम्

sukhasya dātā paramārthadātā mokṣasya dātā jagatāṁ hi nāthaḥ tasmāttamārādhaya gaccha putra saṁprāpsyase iṁdrasamaṁ hi putram

सुख के दाता, परमार्थ के दाता, मोक्ष के दाता, जगत के स्वामी — इसलिए उनकी आराधना करो; जाओ, हे पुत्र, तुम्हें इंद्र के समान पुत्र अवश्य प्राप्त होगा।'

श्लोक 18 (padma.2.31.18)

आकर्ण्य वाक्यं परमार्थयुक्तमुक्तं महात्मा ऋषिणा हि तेन । संगृह्य तत्त्वं वचनस्य तस्य प्रणम्य तं शाश्वतमभ्ययात्सः

ākarṇya vākyaṁ paramārthayuktamuktaṁ mahātmā ṛṣiṇā hi tena saṁgṛhya tattvaṁ vacanasya tasya praṇamya taṁ śāśvatamabhyayātsaḥ

उस महात्मा ऋषि द्वारा कहे गए इस परमार्थयुक्त वचन को सुनकर, उसके वचन के तत्त्व को ग्रहण कर, उसे प्रणाम कर वह उस शाश्वत परमेश्वर के पास गया।

श्लोक 19 (padma.2.31.19)

आमंत्र्य चांगः पितरं महात्मा ब्रह्मात्मजं ब्रह्मसमानमेव । संप्राप्तवान्मेरुगिरेस्तु शृंगं तं कांचनै रत्नमयैः समेतम्

āmaṁtrya cāṁgaḥ pitaraṁ mahātmā brahmātmajaṁ brahmasamānameva saṁprāptavānmerugirestu śṛṁgaṁ taṁ kāṁcanai ratnamayaiḥ sametam

पिता से विदा लेकर वह महात्मा अंग, ब्रह्मा के पुत्र के वंश, ब्रह्मा के समान ही, मेरु पर्वत के उस स्वर्ण और रत्नों से युक्त शिखर पर पहुँचा।

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