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भूमि खण्ड · अध्याय 32

मेरु पर्वत का वर्णन तथा अंग द्वारा वासुदेव की स्तुति

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

श्लोक 1 (padma.2.32.1)

सूत उवाच- नानारत्नैः सुदीप्तांगो हाटकेनापि सर्वतः । राजमानो गिरिश्रेष्ठो यथा सूर्यः स्वरश्मिभिः

sūta uvāca- nānāratnaiḥ sudīptāṁgo hāṭakenāpi sarvataḥ rājamāno giriśreṣṭho yathā sūryaḥ svaraśmibhiḥ

सूत जी ने कहा - विविध रत्नों और सर्वत्र स्वर्ण से देदीप्यमान वह पर्वतश्रेष्ठ (मेरु) अपनी किरणों से सूर्य के समान शोभायमान होता है।

श्लोक 2 (padma.2.32.2)

छायामशोकां संप्राप्य शीतलां सुखदायिनीम् । ध्यायंति योगिनः सर्वे उपविष्टा दृढासने

chāyāmaśokāṁ saṁprāpya śītalāṁ sukhadāyinīm dhyāyaṁti yoginaḥ sarve upaviṣṭā dṛḍhāsane

वहाँ शीतल, सुखदायी अशोक-छाया को पाकर सभी योगीजन दृढ़ आसन पर बैठकर ध्यान करते हैं।

श्लोक 3 (padma.2.32.3)

क्वचित्तपंति मुनयः क्वचिद्गायंति किन्नराः । संतुष्टा ऋषिगंधर्वा वीणातालकराविलाः

kvacittapaṁti munayaḥ kvacidgāyaṁti kinnarāḥ saṁtuṣṭā ṛṣigaṁdharvā vīṇātālakarāvilāḥ

कहीं मुनि तप करते हैं, कहीं किन्नर गाते हैं; वीणा और ताल की ध्वनि से मुखरित ऋषि और गंधर्व संतुष्ट रहते हैं।

श्लोक 4 (padma.2.32.4)

तालमानलये लीनाः स्वरैः सप्तभिरन्वितैः । मूर्च्छनारत्निसंयुक्तैर्व्यक्तं गीतं मनोहरम्

tālamānalaye līnāḥ svaraiḥ saptabhiranvitaiḥ mūrcchanāratnisaṁyuktairvyaktaṁ gītaṁ manoharam

ताल और लय में लीन, सातों स्वरों से युक्त, मूर्च्छना और लयबद्ध वाद्यों से संयुक्त मनोहर गीत वहाँ प्रकट होता रहता है।

श्लोक 5 (padma.2.32.5)

तस्मिन्वै पर्वतश्रेष्ठे चंदनच्छायसंश्रिताः । गंधर्वा गीततत्वज्ञा गीतं गायंति तत्पराः

tasminvai parvataśreṣṭhe caṁdanacchāyasaṁśritāḥ gaṁdharvā gītatatvajñā gītaṁ gāyaṁti tatparāḥ

उस पर्वतश्रेष्ठ पर चंदन-वृक्षों की छाया में स्थित, गीत के तत्त्व को जानने वाले गंधर्व तन्मय होकर गाते हैं।

श्लोक 6 (padma.2.32.6)

नृत्यंति योषितस्तत्र देवानां पर्वत्तोत्तमे । पापहा पुण्यदो दिव्यः सुश्रेयसां प्रदायकः

nṛtyaṁti yoṣitastatra devānāṁ parvattottame pāpahā puṇyado divyaḥ suśreyasāṁ pradāyakaḥ

देवताओं के उस श्रेष्ठ पर्वत पर स्त्रियाँ नृत्य करती हैं; वह पर्वत पाप का नाश करने वाला, पुण्य देने वाला, दिव्य और कल्याणकारी वस्तुओं का दाता है।

श्लोक 7 (padma.2.32.7)

वेदध्वनिः समधुरः श्रूयते पर्वतोत्तमे । चंदनाशोकपुन्नागैः शालैस्तालैस्तमालकैः

vedadhvaniḥ samadhuraḥ śrūyate parvatottame caṁdanāśokapunnāgaiḥ śālaistālaistamālakaiḥ

उस पर्वतश्रेष्ठ पर अत्यंत मधुर वेदध्वनि सुनाई देती है, जो चंदन, अशोक, पुन्नाग, शाल, ताल और तमाल वृक्षों से घिरा है।

श्लोक 8 (padma.2.32.8)

वटैस्तु मेघसंकाशै राजते पर्वतोत्तमः । संतानकैः कल्पवृक्षै रंभापादपसंकुलैः

vaṭaistu meghasaṁkāśai rājate parvatottamaḥ saṁtānakaiḥ kalpavṛkṣai raṁbhāpādapasaṁkulaiḥ

मेघ के समान वटवृक्षों से युक्त वह पर्वतश्रेष्ठ शोभित होता है, कल्पवृक्षों, संतानक वृक्षों और केले के वृक्षों के समूहों से भरा हुआ।

श्लोक 9 (padma.2.32.9)

नगेंद्रो भाति सर्वत्र नाकवृक्षैः सुपुष्पितैः । नानाधातुसमाकीर्णो नानारत्नचयो गिरिः

nageṁdro bhāti sarvatra nākavṛkṣaiḥ supuṣpitaiḥ nānādhātusamākīrṇo nānāratnacayo giriḥ

वह नगेंद्र सर्वत्र सुपुष्पित स्वर्ग-वृक्षों से सुशोभित होता है; अनेक धातुओं से व्याप्त और अनेक रत्नों की राशि से युक्त वह पर्वत है।

श्लोक 10 (padma.2.32.10)

नानाकौतुकसंयुक्तो नानामंगलसंयुतः । वेदवृंदैः सुसंजुष्टो ह्यप्सरोगणसंकुलः

nānākautukasaṁyukto nānāmaṁgalasaṁyutaḥ vedavṛṁdaiḥ susaṁjuṣṭo hyapsarogaṇasaṁkulaḥ

वह अनेक कौतुकों से युक्त और अनेक मंगलों से संपन्न है; वेदपाठियों के समूहों से सुसेवित और अप्सराओं के समूहों से व्याप्त है।

श्लोक 11 (padma.2.32.11)

ऋषिभिर्मुनिभिः सिद्धैर्गंधर्वैःपरिभातिसः । गजैश्चाचलसंकाशैः सिंहनादैर्विराजते

ṛṣibhirmunibhiḥ siddhairgaṁdharvaiḥparibhātisaḥ gajaiścācalasaṁkāśaiḥ siṁhanādairvirājate

ऋषियों, मुनियों, सिद्धों और गंधर्वों से वह सब ओर से शोभित होता है; पर्वत के समान विशाल गजों और सिंहनादों से वह सुशोभित है।

श्लोक 12 (padma.2.32.12)

शरभैर्मत्तशार्दूलैर्मृगधूर्तैरलंकृतः । वापीकूपतडागैश्च संपूर्णैर्विमलोदकैः

śarabhairmattaśārdūlairmṛgadhūrtairalaṁkṛtaḥ vāpīkūpataḍāgaiśca saṁpūrṇairvimalodakaiḥ

शरभों, मत्त शार्दूलों और चतुर मृगों से अलंकृत है; वह निर्मल जल से परिपूर्ण बावड़ियों, कुओं और तालाबों से युक्त है।

श्लोक 13 (padma.2.32.13)

हंसकारंडवाकीर्णैः सर्वत्र परिशोभते । कनकोत्पलैश्च श्वेतैश्च रक्तोत्पलैर्विराजते

haṁsakāraṁḍavākīrṇaiḥ sarvatra pariśobhate kanakotpalaiśca śvetaiśca raktotpalairvirājate

हंसों और कारंडव पक्षियों से व्याप्त वह सर्वत्र सुशोभित है; स्वर्ण-कमलों और श्वेत तथा रक्त कमलों से वह शोभा पाता है।

श्लोक 14 (padma.2.32.14)

नदीस्रवणसंघातैर्विमलैश्चोदकैस्तथा । शालतालैश्च रूपैश्च सगजैः स्फाटिकैस्तथा

nadīsravaṇasaṁghātairvimalaiścodakaistathā śālatālaiśca rūpaiśca sagajaiḥ sphāṭikaistathā

नदियों की निर्मल जलधाराओं के समूहों से युक्त है; शाल और ताल वृक्षों की शोभा से, गजों और स्फटिक-शिलाओं से भी युक्त है।

श्लोक 15 (padma.2.32.15)

विस्तीर्णैः कांचनैर्दिव्यैः सूर्यवह्निसमप्रभैः । शिलातलैश्च संपूर्णः शैलराजो विराजते

vistīrṇaiḥ kāṁcanairdivyaiḥ sūryavahnisamaprabhaiḥ śilātalaiśca saṁpūrṇaḥ śailarājo virājate

स्वर्ण के समान विस्तृत, दिव्य, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी शिलातलों से परिपूर्ण वह पर्वतराज सुशोभित होता है।

श्लोक 16 (padma.2.32.16)

विमानैर्देवतानां च प्रासादैः पर्वतोत्तमैः । हंसचंद्रप्रतीकाशैर्हेमदंडैरलंकृतः

vimānairdevatānāṁ ca prāsādaiḥ parvatottamaiḥ haṁsacaṁdrapratīkāśairhemadaṁḍairalaṁkṛtaḥ

देवताओं के विमानों और उस पर्वतश्रेष्ठ के प्रासादों से युक्त है; हंस और चंद्रमा के समान स्वर्ण-दंडों से वह अलंकृत है।

श्लोक 17 (padma.2.32.17)

कलशैश्चामरैर्युक्तैः प्रासादैः परिशोभितः । नानागुणप्रमुदित देववृंदैश्च शोभितः

kalaśaiścāmarairyuktaiḥ prāsādaiḥ pariśobhitaḥ nānāguṇapramudita devavṛṁdaiśca śobhitaḥ

चामरयुक्त कलशों और प्रासादों से वह सुशोभित है; अनेक गुणों से प्रमुदित देवताओं के समूहों से भी वह शोभित है।

श्लोक 18 (padma.2.32.18)

देववृंदैरनेकैश्च गंधर्वैश्चारणैस्तथा । सर्वत्र राजते पुण्यो मेरुर्गिरिवरोत्तमः

devavṛṁdairanekaiśca gaṁdharvaiścāraṇaistathā sarvatra rājate puṇyo merurgirivarottamaḥ

अनेक देवताओं के समूहों से, गंधर्वों से और चारणों से भी वह पवित्र मेरु पर्वतोत्तम सर्वत्र सुशोभित होता है।

श्लोक 19 (padma.2.32.19)

तस्माद्गंगामहापुण्या पुण्यतोया महानदी । प्रसूता पुण्यतीर्थाढ्या हंसपद्मैः समाकुला

tasmādgaṁgāmahāpuṇyā puṇyatoyā mahānadī prasūtā puṇyatīrthāḍhyā haṁsapadmaiḥ samākulā

उससे अत्यंत पवित्र गंगा नाम की महानदी उत्पन्न हुई, जो पुण्यतीर्थों से समृद्ध और हंस-कमलों से व्याप्त है।

श्लोक 20 (padma.2.32.20)

मुनिभिः सेव्यमाना सा ऋषिसंघैर्महानदी । एवंगुणं गिरिश्रेष्ठं पुण्यकौतुकमंगलम्

munibhiḥ sevyamānā sā ṛṣisaṁghairmahānadī evaṁguṇaṁ giriśreṣṭhaṁ puṇyakautukamaṁgalam

मुनियों द्वारा सेवित वह महानदी ऋषि-समूहों से भी सेवित है; इस प्रकार पुण्यमय, कौतुकपूर्ण और मंगलमय गुणों वाले उस पर्वतश्रेष्ठ में—

श्लोक 21 (padma.2.32.21)

अंगश्चात्रिसुतः पुण्यः प्रविवेश महामुनिः । गंगातीरे सुपुण्ये च एकांते चारुकंदरे

aṁgaścātrisutaḥ puṇyaḥ praviveśa mahāmuniḥ gaṁgātīre supuṇye ca ekāṁte cārukaṁdare

अत्रि के पुत्र, महामुनि पुण्यात्मा अंग ने गंगा के अत्यंत पवित्र तट पर, एकांत के सुंदर कंदरा में प्रवेश किया।

श्लोक 22 (padma.2.32.22)

तत्रोपविश्य मेधावी कामक्रोधविवर्जितः । सर्वेंद्रियाणि संयम्य हृषीकेशं मनोगतम्

tatropaviśya medhāvī kāmakrodhavivarjitaḥ sarveṁdriyāṇi saṁyamya hṛṣīkeśaṁ manogatam

वहाँ बैठकर मेधावी अंग काम-क्रोध से रहित होकर, समस्त इंद्रियों को संयमित कर, हृषीकेश को अपने मन में स्थापित किया।

श्लोक 23 (padma.2.32.23)

ध्यायमानः स धर्मात्मा कृष्णं क्लेशापहं प्रभुम् । आसने शयने याने ध्याने च मधुसूदनम्

dhyāyamānaḥ sa dharmātmā kṛṣṇaṁ kleśāpahaṁ prabhum āsane śayane yāne dhyāne ca madhusūdanam

वह धर्मात्मा, क्लेशनाशक प्रभु कृष्ण का ध्यान करता हुआ, बैठते, सोते और चलते हुए भी, ध्यान में सदैव मधुसूदन का ही चिंतन करता रहा।

श्लोक 24 (padma.2.32.24)

नित्यं पश्यति युक्तात्मा योगयुक्तो जितेंद्रियः । चराचरेषु जीवेषु तेषु पश्यति केशवम्

nityaṁ paśyati yuktātmā yogayukto jiteṁdriyaḥ carācareṣu jīveṣu teṣu paśyati keśavam

योगयुक्त और जितेंद्रिय वह सदैव उन्हें ही देखता रहा; समस्त चराचर प्राणियों में वह केशव को ही देखता था।

श्लोक 25 (padma.2.32.25)

आर्द्रेषु चैव शुष्केषु सर्वेष्वन्येषु स द्विजः । एवं वर्षशतं जातं तप्यमानस्य तस्य च

ārdreṣu caiva śuṣkeṣu sarveṣvanyeṣu sa dvijaḥ evaṁ varṣaśataṁ jātaṁ tapyamānasya tasya ca

गीले और सूखे, तथा अन्य सभी वस्तुओं में भी वह द्विज उन्हीं को देखता था; इस प्रकार तप करते हुए उसका सौ वर्ष बीत गया।

श्लोक 26 (padma.2.32.26)

समालोक्य जगन्नाथश्चक्रपाणिर्द्विजोत्तमम् । बहुविघ्नान्सुघोरांश्च दर्शयत्येव नित्यशः

samālokya jagannāthaścakrapāṇirdvijottamam bahuvighnānsughorāṁśca darśayatyeva nityaśaḥ

चक्रपाणि जगन्नाथ ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को देखकर, उसकी परीक्षा के लिए, निरंतर अनेक घोर विघ्न दिखाए।

श्लोक 27 (padma.2.32.27)

तेजसा तस्य देवस्य नृसिंहस्य महात्मनः । निरातंकः स धर्मात्मा दहत्यग्निरिवेंधनम्

tejasā tasya devasya nṛsiṁhasya mahātmanaḥ nirātaṁkaḥ sa dharmātmā dahatyagniriveṁdhanam

उस महात्मा नृसिंहदेव के तेज से वह धर्मात्मा, निर्भय होकर, ईंधन को जलाती अग्नि की भाँति उन विघ्नों को भस्म कर देता था।

श्लोक 28 (padma.2.32.28)

नियमैः संयमैश्चान्यैरुपवासैर्द्विजोत्तमः । क्षीयमाणस्तु संजातो दीप्यमानः स्वतेजसा

niyamaiḥ saṁyamaiścānyairupavāsairdvijottamaḥ kṣīyamāṇastu saṁjāto dīpyamānaḥ svatejasā

नियमों, संयमों और उपवासों से युक्त वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, देह से क्षीण होते हुए भी, अपने ही तेज से दीप्तिमान हो उठा।

श्लोक 29 (padma.2.32.29)

सूर्यपावकसंकाशस्त्वंग एवं प्रदृश्यते । एवं तपःसु निरतं ध्यायमानं जनार्दनम्

sūryapāvakasaṁkāśastvaṁga evaṁ pradṛśyate evaṁ tapaḥsu nirataṁ dhyāyamānaṁ janārdanam

इस प्रकार अंग सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी दिखाई देने लगा; इस भाँति तप में लीन, जनार्दन का ध्यान करते हुए उसे देखकर—

श्लोक 30 (padma.2.32.30)

आविर्भूयाब्रवीद्देवो वरं वरय मानद । तं च दृष्ट्वा हृषीकेशमंगः परम निर्वृतः

āvirbhūyābravīddevo varaṁ varaya mānada taṁ ca dṛṣṭvā hṛṣīkeśamaṁgaḥ parama nirvṛtaḥ

देव ने प्रकट होकर कहा - 'हे मानद, वर माँगो।' हृषीकेश को देखकर अंग परम प्रसन्न हो उठा,

श्लोक 31 (padma.2.32.31)

तुष्टाव प्रणतो भूत्वा वासुदेवं प्रसन्नधीः

tuṣṭāva praṇato bhūtvā vāsudevaṁ prasannadhīḥ

और झुककर, प्रसन्न मन से, वासुदेव की स्तुति करने लगा।

श्लोक 32 (padma.2.32.32)

अंग उवाच- त्वं गतिः सर्वभूतानां भूतभावन पावन । भूतात्मा सर्वभूतेश नमस्तुभ्यं गुणात्मने

aṁga uvāca- tvaṁ gatiḥ sarvabhūtānāṁ bhūtabhāvana pāvana bhūtātmā sarvabhūteśa namastubhyaṁ guṇātmane

अंग ने कहा - हे भूतों की उत्पत्ति और पवित्रता करने वाले, आप समस्त प्राणियों की गति हैं; हे भूतात्मा, समस्त भूतों के स्वामी, गुणों के आत्मा, आपको नमस्कार है।

श्लोक 33 (padma.2.32.33)

गुणरूपाय गुह्याय गुणातीताय ते नमः । गुणाय गुणकर्त्रे च गुणाढ्याय गुणात्मने

guṇarūpāya guhyāya guṇātītāya te namaḥ guṇāya guṇakartre ca guṇāḍhyāya guṇātmane

गुण-रूप, गुह्य, गुणातीत आपको नमस्कार है; गुण-स्वरूप, गुणों के कर्ता, गुणों से समृद्ध, गुणों के आत्मा को नमस्कार है।

श्लोक 34 (padma.2.32.34)

भवाय भवकर्त्रे च भक्तानां भवहारिणे । भवोद्भवाय गुह्याय नमो भवविनाशिने

bhavāya bhavakartre ca bhaktānāṁ bhavahāriṇe bhavodbhavāya guhyāya namo bhavavināśine

भव और भव के कर्ता को, भक्तों के भव को हरने वाले को नमस्कार है; भव के उद्भव-स्थान, गुह्य को, भव के विनाशक को नमस्कार है।

श्लोक 35 (padma.2.32.35)

यज्ञाय यज्ञरूपाय यज्ञेशाय नमोनमः । यज्ञकर्मप्रसंगाय नमः शंखधराय च

yajñāya yajñarūpāya yajñeśāya namonamaḥ yajñakarmaprasaṁgāya namaḥ śaṁkhadharāya ca

यज्ञ को, यज्ञरूप को, यज्ञ के स्वामी को बार-बार नमस्कार है; यज्ञ-कर्म में तत्पर आपको, शंखधारी को नमस्कार है।

श्लोक 36 (padma.2.32.36)

नमोनमो हिरण्याय नमो रथांगधारिणे । सत्याय सत्यभावाय सर्वसत्यमयाय च

namonamo hiraṇyāya namo rathāṁgadhāriṇe satyāya satyabhāvāya sarvasatyamayāya ca

स्वर्ण-स्वरूप को बार-बार नमस्कार है, चक्रधारी को नमस्कार है; सत्य को, सत्य-भाव को, सर्वथा सत्यमय आपको नमस्कार है।

श्लोक 37 (padma.2.32.37)

धर्माय धर्मकर्त्रे च सर्वकर्त्रे च ते नमः । धर्मांगाय सुवीराय धर्माधाराय ते नमः

dharmāya dharmakartre ca sarvakartre ca te namaḥ dharmāṁgāya suvīrāya dharmādhārāya te namaḥ

धर्म को, धर्म के कर्ता को और सबके कर्ता को नमस्कार है; धर्म के अंगस्वरूप, महावीर, धर्म के आधार को नमस्कार है।

श्लोक 38 (padma.2.32.38)

नमः पुण्याय पुत्राय ह्यपुत्राय महात्मने । मायामोहविनाशाय सर्वमायाकराय ते

namaḥ puṇyāya putrāya hyaputrāya mahātmane māyāmohavināśāya sarvamāyākarāya te

पुण्यस्वरूप, पुत्ररूप और पुत्रहीन महात्मा को नमस्कार है; माया के मोह का नाश करने वाले, समस्त माया के कर्ता आपको नमस्कार है।

श्लोक 39 (padma.2.32.39)

मायाधराय मूर्ताय त्वमूर्ताय नमोनमः । सर्वमूर्तिधरायैव शंकराय नमोनमः

māyādharāya mūrtāya tvamūrtāya namonamaḥ sarvamūrtidharāyaiva śaṁkarāya namonamaḥ

माया के धारक, मूर्त और अमूर्त आपको बार-बार नमस्कार है; समस्त मूर्तियों को धारण करने वाले शंकर को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 40 (padma.2.32.40)

ब्रह्मणे ब्रह्मरूपाय परब्रह्मस्वरूपिणे । नमस्ते सर्वधाम्ने च नमो धामधराय च

brahmaṇe brahmarūpāya parabrahmasvarūpiṇe namaste sarvadhāmne ca namo dhāmadharāya ca

ब्रह्म को, ब्रह्मरूप को, परब्रह्म-स्वरूप को नमस्कार है; समस्त धामों के आश्रय आपको नमस्कार है, और धाम के धारक को नमस्कार है।

श्लोक 41 (padma.2.32.41)

श्रीमते श्रीनिवासाय श्रीधराय नमोनमः । क्षीरसागरवासाय चामृताय च ते नमः

śrīmate śrīnivāsāya śrīdharāya namonamaḥ kṣīrasāgaravāsāya cāmṛtāya ca te namaḥ

श्रीमान, श्रीनिवास, श्रीधर को बार-बार नमस्कार है; क्षीरसागर में निवास करने वाले, अमृतस्वरूप आपको नमस्कार है।

श्लोक 42 (padma.2.32.42)

महौषधाय घोराय महाप्रज्ञापराय च । अक्रूराय प्रमेध्याय मेध्यानां पतये नमः

mahauṣadhāya ghorāya mahāprajñāparāya ca akrūrāya pramedhyāya medhyānāṁ pataye namaḥ

महौषधि, घोर, महाप्रज्ञामय आपको नमस्कार है; अक्रूर, पवित्र, पवित्रों के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 43 (padma.2.32.43)

अनंताय ह्यशेषाय चानघाय नमोनमः । आकाशस्य प्रकाशाय पक्षिरूपाय ते नमः

anaṁtāya hyaśeṣāya cānaghāya namonamaḥ ākāśasya prakāśāya pakṣirūpāya te namaḥ

अनंत, समग्र, निष्पाप आपको बार-बार नमस्कार है; आकाश के प्रकाश-स्वरूप, पक्षिरूप आपको नमस्कार है।

श्लोक 44 (padma.2.32.44)

हुताय हुतभोक्त्रे च हवीरूपाय ते नमः । बुद्धाय बुधरूपाय सदाबुद्धाय ते नमः

hutāya hutabhoktre ca havīrūpāya te namaḥ buddhāya budharūpāya sadābuddhāya te namaḥ

हुत को, हुत के भोक्ता को, हवि-स्वरूप आपको नमस्कार है; बुद्ध को, बुद्धिरूप को, नित्य-बुद्ध आपको नमस्कार है।

श्लोक 45 (padma.2.32.45)

नमो हव्यायकव्याय स्वधाकाराय ते नमः । स्वाहाकाराय शुद्धाय ह्यव्यक्ताय महात्मने

namo havyāyakavyāya svadhākārāya te namaḥ svāhākārāya śuddhāya hyavyaktāya mahātmane

हव्य और कव्य को, स्वधाकार-स्वरूप आपको नमस्कार है; स्वाहाकार-स्वरूप, शुद्ध, अव्यक्त महात्मा को नमस्कार है।

श्लोक 46 (padma.2.32.46)

व्यासाय वासवायैव वसुरूपाय ते नमः । वासुदेवाय विश्वाय वह्निरूपाय ते नमः । हरये केवलायैव वामनाय नमोनमः

vyāsāya vāsavāyaiva vasurūpāya te namaḥ vāsudevāya viśvāya vahnirūpāya te namaḥ haraye kevalāyaiva vāmanāya namonamaḥ

व्यास को, वासव को, वसुरूप आपको नमस्कार है; वासुदेव को, विश्वस्वरूप, वह्निरूप आपको नमस्कार है; अद्वितीय हरि को, वामन को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 47 (padma.2.32.47)

नमो नृसिंहदेवाय सत्वपालाय ते नमः

namo nṛsiṁhadevāya satvapālāya te namaḥ

नृसिंहदेव को, सत्त्व के रक्षक आपको नमस्कार है।

श्लोक 48 (padma.2.32.48)

नमो गोविंदगोपाय नम एकाक्षराय च । नमः सर्वाक्षरायैव हंसरूपाय ते नमः

namo goviṁdagopāya nama ekākṣarāya ca namaḥ sarvākṣarāyaiva haṁsarūpāya te namaḥ

गोविंद और गोप को नमस्कार है, एकाक्षर को नमस्कार है; समस्त अक्षरों को, हंसरूप आपको नमस्कार है।

श्लोक 49 (padma.2.32.49)

त्रितत्त्वाय नमस्तुभ्यं पंचतत्त्वाय ते नमः । पंचविंशतितत्त्वाय तत्त्वाधाराय वै नमः

tritattvāya namastubhyaṁ paṁcatattvāya te namaḥ paṁcaviṁśatitattvāya tattvādhārāya vai namaḥ

त्रितत्त्व को, पंचतत्त्व को नमस्कार है; पच्चीस तत्त्वों को, तत्त्वों के आधार को नमस्कार है।

श्लोक 50 (padma.2.32.50)

कृष्णाय कृष्णरूपाय लक्ष्मीनाथाय ते नमः । नमः पद्मपलाशाय आनंदाय पराय च

kṛṣṇāya kṛṣṇarūpāya lakṣmīnāthāya te namaḥ namaḥ padmapalāśāya ānaṁdāya parāya ca

कृष्ण को, कृष्णरूप को, लक्ष्मीनाथ को नमस्कार है; पद्मपलाश-नयन को, आनंद-स्वरूप, परम आपको नमस्कार है।

श्लोक 51 (padma.2.32.51)

नमो विश्वंभरायैव पापनाशाय वै नमः । नमः पुण्यसुपुण्याय सत्यधर्माय ते नमः

namo viśvaṁbharāyaiva pāpanāśāya vai namaḥ namaḥ puṇyasupuṇyāya satyadharmāya te namaḥ

विश्व के पालक आपको नमस्कार है, पाप के नाशक को नमस्कार है; पुण्य और परम पवित्र को, सत्यधर्म को नमस्कार है।

श्लोक 52 (padma.2.32.52)

नमोनमः शाश्वतअव्ययाय नमोनमः संघ नभोमयाय । श्रीपद्मनाभाय महेश्वराय नमामि ते केशवपादपद्मम्

namonamaḥ śāśvataavyayāya namonamaḥ saṁgha nabhomayāya śrīpadmanābhāya maheśvarāya namāmi te keśavapādapadmam

शाश्वत और अव्यय को बार-बार नमस्कार है, आकाशमय समूह को बार-बार नमस्कार है; श्री पद्मनाभ, महेश्वर, आपके केशव-चरणकमलों को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 53 (padma.2.32.53)

आनंदकंद कमलाप्रिय वासुदेव सर्वेश ईश मधुसूदन देहि दास्यम् । पादौ नमामि तव केशव जन्मजन्म कृपां कुरुष्व मम शांतिद शंखपाणे

ānaṁdakaṁda kamalāpriya vāsudeva sarveśa īśa madhusūdana dehi dāsyam pādau namāmi tava keśava janmajanma kṛpāṁ kuruṣva mama śāṁtida śaṁkhapāṇe

आनंद के कंद, लक्ष्मीप्रिय, हे वासुदेव, हे सर्वेश्वर, हे मधुसूदन, मुझे अपनी दासता प्रदान कीजिए; हे केशव, जन्म-जन्म आपके चरणों को नमस्कार करता हूँ, हे शंखपाणि, मुझ पर कृपा कीजिए, शांति दीजिए।

श्लोक 54 (padma.2.32.54)

संसारदारुणहुताशनतापदग्धं पुत्रादिबंधुमरणैर्बहुशोकतापैः । ज्ञानांबुदेन मम प्लावय पद्मनाभ दीनस्य मच्छरणरूपभवस्व नाथ

saṁsāradāruṇahutāśanatāpadagdhaṁ putrādibaṁdhumaraṇairbahuśokatāpaiḥ jñānāṁbudena mama plāvaya padmanābha dīnasya maccharaṇarūpabhavasva nātha

संसार की भीषण अग्नि से संतप्त, पुत्रादि बंधुओं की मृत्यु के अनेक शोकों से जले हुए मुझ दीन को, हे पद्मनाभ, ज्ञान के मेघ से सींच दीजिए और मेरे शरण-स्वरूप बन जाइए, हे नाथ।

श्लोक 55 (padma.2.32.55)

एवं स्तोत्रं समाकर्ण्य त्वंगस्यापि महात्मनः । दर्शयित्वा स्वकं रूपं घनश्यामं महौजसम्

evaṁ stotraṁ samākarṇya tvaṁgasyāpi mahātmanaḥ darśayitvā svakaṁ rūpaṁ ghanaśyāmaṁ mahaujasam

इस प्रकार महात्मा अंग की स्तुति सुनकर, अपना घनश्याम, महातेजस्वी रूप प्रकट कर—

श्लोक 56 (padma.2.32.56)

शंखचक्रगदापाणिं पद्महस्तं महाप्रभुम् । वैनतेयसमारूढमात्मरूपं प्रदर्शितम्

śaṁkhacakragadāpāṇiṁ padmahastaṁ mahāprabhum vainateyasamārūḍhamātmarūpaṁ pradarśitam

शंख-चक्र-गदा धारण किए हुए, हाथ में कमल लिए हुए, गरुड़ पर आरूढ़ महाप्रभु ने अपना वह रूप दिखाया।

श्लोक 57 (padma.2.32.57)

सर्वाभरणशोभांगं हारकंकणकुंडलैः । राजमानं परं दिव्यं निर्मलं वनमालया

sarvābharaṇaśobhāṁgaṁ hārakaṁkaṇakuṁḍalaiḥ rājamānaṁ paraṁ divyaṁ nirmalaṁ vanamālayā

हार, कंकण और कुंडलों से समस्त अंगों में शोभित, परम दिव्य, निर्मल, वनमाला से सुशोभित—

श्लोक 58 (padma.2.32.58)

अंगस्याग्रे हृषीकेशः शोभमान महत्प्रभः । श्रीवत्सांकेन पुण्येन कौस्तुभेन जनार्दनः

aṁgasyāgre hṛṣīkeśaḥ śobhamāna mahatprabhaḥ śrīvatsāṁkena puṇyena kaustubhena janārdanaḥ

अंग के सामने वे हृषीकेश, महातेजस्वी, पुण्यमय श्रीवत्स-चिह्न और कौस्तुभमणि से सुशोभित जनार्दन,

श्लोक 59 (padma.2.32.59)

दर्शयित्वा स्वकं देहं सर्वदेवमयो हरिः । स उवाच महात्मानं तमंगमृषिसत्तमम्

darśayitvā svakaṁ dehaṁ sarvadevamayo hariḥ sa uvāca mahātmānaṁ tamaṁgamṛṣisattamam

अपना स्वरूप दिखाते हुए, समस्त देवमय हरि, उस महात्मा ऋषिश्रेष्ठ अंग से बोले-

श्लोक 60 (padma.2.32.60)

भो भो विप्र महाभाग श्रूयतां वचनं शुभम् । मेघगंभीरघोषेण समाभाष्य द्विजोत्तमम्

bho bho vipra mahābhāga śrūyatāṁ vacanaṁ śubham meghagaṁbhīraghoṣeṇa samābhāṣya dvijottamam

'हे महाभाग विप्र, मेरा शुभ वचन सुनो' - इस प्रकार मेघगंभीर स्वर से उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को संबोधित करते हुए,

श्लोक 61 (padma.2.32.61)

तपसानेन तुष्टोस्मि वरं वरय शोभनम् । तुष्यमाणं हृषीकेशं तं दृष्ट्वा कमलापतिम्

tapasānena tuṣṭosmi varaṁ varaya śobhanam tuṣyamāṇaṁ hṛṣīkeśaṁ taṁ dṛṣṭvā kamalāpatim

'इस तप से मैं संतुष्ट हूँ, उत्तम वर माँगो।' हृषीकेश को इस प्रकार प्रसन्न देखकर, उस लक्ष्मीपति को देखकर,

श्लोक 62 (padma.2.32.62)

दीप्यमानं विराजंतं विश्वरूपं जनेश्वरम् । पादांबुजद्वयं तस्य प्रणम्य च पुनःपुनः

dīpyamānaṁ virājaṁtaṁ viśvarūpaṁ janeśvaram pādāṁbujadvayaṁ tasya praṇamya ca punaḥpunaḥ

दीप्तिमान, विश्वरूप, प्राणियों के स्वामी उन्हें देखकर, उनके दोनों चरण-कमलों को बार-बार प्रणाम करके,

श्लोक 63 (padma.2.32.63)

हर्षेण महताविष्टस्तमुवाच जनार्दनम् । दासोहं तव देवेश शंखचक्रगदाधर

harṣeṇa mahatāviṣṭastamuvāca janārdanam dāsohaṁ tava deveśa śaṁkhacakragadādhara

अत्यंत हर्ष से भरकर उसने जनार्दन से कहा - 'हे देवेश, शंखचक्रगदाधर, मैं आपका दास हूँ।

श्लोक 64 (padma.2.32.64)

वरं मे दातुकामोसि देहि त्वं वंशजं सुतम् । दिवि शक्रो यथाऽभाति सर्वतेजः समन्वितः

varaṁ me dātukāmosi dehi tvaṁ vaṁśajaṁ sutam divi śakro yathā'bhāti sarvatejaḥ samanvitaḥ

आप मुझे वर देने को उद्यत हैं तो अपने वंश का पुत्र दीजिए, जैसे इंद्र स्वर्ग में समस्त तेज से युक्त होकर सुशोभित होते हैं,

श्लोक 65 (padma.2.32.65)

तादृशं देहि मे पुत्रं सर्वलोकस्य रक्षकम् । सर्वदेवप्रियं देव ब्रह्मण्यं धर्मपंडितम्

tādṛśaṁ dehi me putraṁ sarvalokasya rakṣakam sarvadevapriyaṁ deva brahmaṇyaṁ dharmapaṁḍitam

वैसा ही पुत्र मुझे दीजिए, हे देव, जो समस्त लोकों का रक्षक हो, समस्त देवताओं का प्रिय हो, ब्राह्मणों में निष्ठावान हो और धर्म में निपुण हो।

श्लोक 66 (padma.2.32.66)

दातारं ज्ञानसंपन्नं धर्मतेजः समन्वितम् । त्रैलोक्यरक्षकं कृष्ण सत्यधर्मानुपालकम्

dātāraṁ jñānasaṁpannaṁ dharmatejaḥ samanvitam trailokyarakṣakaṁ kṛṣṇa satyadharmānupālakam

दानी, ज्ञान से संपन्न, धर्म के तेज से युक्त हो; हे कृष्ण, तीनों लोकों का रक्षक हो, सत्यधर्म का पालक हो।

श्लोक 67 (padma.2.32.67)

यज्वनामुत्तमं चैकं शूरं त्रैलोक्यभूषणम् । ब्रह्मण्यं वेदविद्वांसं सत्यसंधं जितेंद्रियम्

yajvanāmuttamaṁ caikaṁ śūraṁ trailokyabhūṣaṇam brahmaṇyaṁ vedavidvāṁsaṁ satyasaṁdhaṁ jiteṁdriyam

यज्ञ करने वालों में सर्वश्रेष्ठ, अद्वितीय, शूरवीर, तीनों लोकों का भूषण हो; ब्राह्मणों का हितकारी, वेदों का ज्ञाता, सत्यप्रतिज्ञ, जितेंद्रिय हो।

श्लोक 68 (padma.2.32.68)

अजितं सर्वजेतारं विष्णुं तेजःसमप्रभम् । वैष्णवं पुण्यकर्तारं पुण्यजं पुण्यलक्षणम्

ajitaṁ sarvajetāraṁ viṣṇuṁ tejaḥsamaprabham vaiṣṇavaṁ puṇyakartāraṁ puṇyajaṁ puṇyalakṣaṇam

अजेय, सबका विजेता, विष्णु के समान तेजस्वी हो; वैष्णव, पुण्यकर्मी, पुण्य से उत्पन्न और पुण्य-लक्षणों वाला हो।

श्लोक 69 (padma.2.32.69)

शांतं तु तपसोपेतं सर्वशास्त्रविशारदम् । वेदज्ञं योगिनां श्रेष्ठं भवतो गुणसंनिभम्

śāṁtaṁ tu tapasopetaṁ sarvaśāstraviśāradam vedajñaṁ yogināṁ śreṣṭhaṁ bhavato guṇasaṁnibham

शांत, फिर भी तपस्या से युक्त, समस्त शास्त्रों में निपुण हो; वेदों का ज्ञाता, योगियों में श्रेष्ठ, आपके ही गुणों के समान हो।

श्लोक 70 (padma.2.32.70)

ईदृशं देहि मे पुत्रं दातुकामो यदा वरम् । श्रीवासुदेव उवाच- एभिर्गुणैः समोपेतस्तव पुत्रो भविष्यति

īdṛśaṁ dehi me putraṁ dātukāmo yadā varam śrīvāsudeva uvāca- ebhirguṇaiḥ samopetastava putro bhaviṣyati

मुझे ऐसा ही पुत्र दीजिए' - जब वह ऐसा वर देना चाहता था, तब श्रीवासुदेव बोले - 'इन्हीं गुणों से युक्त तुम्हारा पुत्र होगा।

श्लोक 71 (padma.2.32.71)

अत्रिवंशस्य वै धर्ता विश्वस्यास्य महामते । तेजसा यशसा पुण्यैः पितरं चोद्धरिष्यति

atrivaṁśasya vai dhartā viśvasyāsya mahāmate tejasā yaśasā puṇyaiḥ pitaraṁ coddhariṣyati

वह अत्रि के वंश का धारक होगा, हे महामते, इस समस्त विश्व का भी; तेज से, यश से और पुण्यों से वह अपने पिता का उद्धार करेगा।

श्लोक 72 (padma.2.32.72)

उद्धरिष्यति यः सत्यैः पितरं च पितामहम् । भवान्यास्यति मे स्थानं तद्विष्णोः परमं पदम्

uddhariṣyati yaḥ satyaiḥ pitaraṁ ca pitāmaham bhavānyāsyati me sthānaṁ tadviṣṇoḥ paramaṁ padam

जो सत्य-कर्मों से पिता और पितामह दोनों का उद्धार करेगा; तुम मेरे उस स्थान को प्राप्त करोगे, जो विष्णु का परम पद है।'

श्लोक 73 (padma.2.32.73)

इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तमंगं प्रति स द्विज । कस्यचित्पुण्यवीर्यस्य पुण्यां कन्यां विवाहय

ityuktvā devadeveśastamaṁgaṁ prati sa dvija kasyacitpuṇyavīryasya puṇyāṁ kanyāṁ vivāhaya

यह कहकर देवाधिदेव ने उस अंग से, हे द्विज, यह भी कहा - 'किसी पुण्यशाली वीर की पवित्र कन्या से विवाह करो,

श्लोक 74 (padma.2.32.74)

तस्यामुत्पादय सुतं शुभं पुण्यावह प्रियम् । स भविष्यति धर्मात्मा मत्प्रसादान्महामते

tasyāmutpādaya sutaṁ śubhaṁ puṇyāvaha priyam sa bhaviṣyati dharmātmā matprasādānmahāmate

उससे शुभ, पुण्यदायक, प्रिय पुत्र उत्पन्न करो; वह मेरी कृपा से धर्मात्मा होगा, हे महामते,

श्लोक 75 (padma.2.32.75)

सर्वज्ञः सर्ववेत्ता च यादृशो वांछितस्त्वया । एवं वरं ततो दत्वा अंतर्धानं गतो हरिः

sarvajñaḥ sarvavettā ca yādṛśo vāṁchitastvayā evaṁ varaṁ tato datvā aṁtardhānaṁ gato hariḥ

सर्वज्ञ, सर्ववेत्ता, वैसा ही जैसा तुमने चाहा है।' इस प्रकार वर देकर हरि वहाँ से अंतर्धान हो गए।

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