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भूमि खण्ड · अध्याय 35

रंभा द्वारा सुनीथा को अंग के वरदान की कथा

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

श्लोक 1 (padma.2.35.1)

रंभोवाच- ब्रह्मा अव्यक्तसंभूतस्तस्माज्जज्ञे प्रजापतिः । अत्रिर्नाम स धर्मात्मा तस्य पुत्रो महामनाः

raṁbhovāca- brahmā avyaktasaṁbhūtastasmājjajñe prajāpatiḥ atrirnāma sa dharmātmā tasya putro mahāmanāḥ

रंभा ने कहा - अव्यक्त से उत्पन्न ब्रह्मा से प्रजापति अत्रि नाम के धर्मात्मा उत्पन्न हुए; उन्हीं का यह महामना पुत्र है।

श्लोक 2 (padma.2.35.2)

अंगो नाम अयं भद्रे नंदनं वनमागतः । इंद्रस्य संपदं दृष्ट्वा लीलातेजसमुत्तमाम्

aṁgo nāma ayaṁ bhadre naṁdanaṁ vanamāgataḥ iṁdrasya saṁpadaṁ dṛṣṭvā līlātejasamuttamām

हे भद्रे, इसका नाम अंग है, यह नंदन वन में आया है; इंद्र की उत्तम संपदा और लीला-तेज को देखकर,

श्लोक 3 (padma.2.35.3)

कृता स्पृहा अनेनापि इंद्रस्य सदृशे पदे । ईदृशो हि यदा पुत्रो मम स्याद्धर्मसंयुतः

kṛtā spṛhā anenāpi iṁdrasya sadṛśe pade īdṛśo hi yadā putro mama syāddharmasaṁyutaḥ

इसने भी इंद्र के समान पद की अभिलाषा की - 'यदि मुझे भी ऐसा ही धर्मयुक्त पुत्र प्राप्त हो,

श्लोक 4 (padma.2.35.4)

सुश्रेयो मे भवेज्जन्म यशः कीर्ति समन्वितम् । आराधितो हृषीकेशस्तपोभिर्नियमैस्तथा

suśreyo me bhavejjanma yaśaḥ kīrti samanvitam ārādhito hṛṣīkeśastapobhirniyamaistathā

तो मेरा जन्म सुंदर और यश-कीर्ति से युक्त हो जाएगा।' इस प्रकार तप और नियमों से हृषीकेश की आराधना करके,

श्लोक 5 (padma.2.35.5)

सुप्रसन्ने हृषीकेशे वरं याचितवानयम् । इंद्रस्य सदृशं पुत्रं विष्णुतेजः पराक्रमम्

suprasanne hṛṣīkeśe varaṁ yācitavānayam iṁdrasya sadṛśaṁ putraṁ viṣṇutejaḥ parākramam

हृषीकेश के सुप्रसन्न होने पर इसने वर माँगा - 'मुझे इंद्र के समान, विष्णु के तेज और पराक्रम से युक्त पुत्र दीजिए,

श्लोक 6 (padma.2.35.6)

वैष्णवं सर्वपापघ्नं देहि मे मधुसूदन । दत्तवान्स तदा पुत्रमीदृशं सर्वधारकम्

vaiṣṇavaṁ sarvapāpaghnaṁ dehi me madhusūdana dattavānsa tadā putramīdṛśaṁ sarvadhārakam

विष्णुभक्त, समस्त पापों का नाशक, हे मधुसूदन।' तब उन्होंने इसे ऐसा ही, सबका आधार बनने वाला पुत्र देने का वचन दिया।

श्लोक 7 (padma.2.35.7)

तदाप्रभृति विप्रेंद्रः पुण्यां कन्यां प्रपश्यति । यथा त्वं चारुसर्वांगी तथायं परिपश्यति

tadāprabhṛti vipreṁdraḥ puṇyāṁ kanyāṁ prapaśyati yathā tvaṁ cārusarvāṁgī tathāyaṁ paripaśyati

तभी से यह श्रेष्ठ ब्राह्मण एक पुण्यवती कन्या की खोज में है; जैसे तुम सर्वांगसुंदरी हो, वैसी ही यह खोज रहा है।

श्लोक 8 (padma.2.35.8)

एनं गच्छ वरारोहे अस्मात्पुत्रो भविष्यति । पुण्यात्मा पुण्यधर्मज्ञो विष्णुतेजः पराक्रमः

enaṁ gaccha varārohe asmātputro bhaviṣyati puṇyātmā puṇyadharmajño viṣṇutejaḥ parākramaḥ

हे वरारोहे, तुम इसके पास जाओ, इससे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा - पुण्यात्मा, पुण्य-धर्म का ज्ञाता, विष्णु के तेज और पराक्रम से युक्त।

श्लोक 9 (padma.2.35.9)

एतत्ते सर्वमाख्यातं तथाहं पृच्छिता त्वया । अयं भर्ता भवत्यर्हो भवेदेव न संशयः

etatte sarvamākhyātaṁ tathāhaṁ pṛcchitā tvayā ayaṁ bhartā bhavatyarho bhavedeva na saṁśayaḥ

यह सब मैंने तुम्हें बता दिया, जैसा तुमने मुझसे पूछा था; यह पुरुष तुम्हारे योग्य पति होगा, यह निश्चय ही होगा, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 10 (padma.2.35.10)

सुशंखस्यापि यः शापो वृथा सोऽपि भविष्यति । अस्माज्जाते महाभागे पुत्रे धर्मप्रचारिणि

suśaṁkhasyāpi yaḥ śāpo vṛthā so'pi bhaviṣyati asmājjāte mahābhāge putre dharmapracāriṇi

सुशंख का वह शाप भी व्यर्थ हो जाएगा; हे महाभागे, जब इससे धर्म का प्रचार करने वाला पुत्र उत्पन्न होगा,

श्लोक 11 (padma.2.35.11)

भविष्यसि सुखी भद्रे सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । सुक्षेत्रे कृषिकारस्तु बीजं वपति तत्परः

bhaviṣyasi sukhī bhadre satyaṁ satyaṁ vadāmyaham sukṣetre kṛṣikārastu bījaṁ vapati tatparaḥ

तुम सुखी हो जाओगी, हे भद्रे, मैं तुमसे सत्य ही सत्य कहती हूँ। जिस प्रकार अच्छे खेत में तत्पर कृषक बीज बोता है,

श्लोक 12 (padma.2.35.12)

स तथा भुंजते देवि यथा बीजं तथा फलम् । अन्यथा नैव जायेत तत्सर्वं सदृशं भवेत्

sa tathā bhuṁjate devi yathā bījaṁ tathā phalam anyathā naiva jāyeta tatsarvaṁ sadṛśaṁ bhavet

वह उसी बीज के अनुसार वैसा ही फल भोगता है, हे देवी; अन्यथा कभी नहीं होता, फल सदैव बीज के अनुरूप ही होता है।

श्लोक 13 (padma.2.35.13)

अयमेष महाभागस्तपस्वी पुण्यवीर्यवान् । अस्य वीर्यात्समुत्पन्नो अस्यैवगुणसंपदा

ayameṣa mahābhāgastapasvī puṇyavīryavān asya vīryātsamutpanno asyaivaguṇasaṁpadā

यह वही महाभाग्यशाली तपस्वी है, पुण्य-तेज से युक्त; इसी के वीर्य से, इसी के गुणों की संपत्ति से उत्पन्न होगा -

श्लोक 14 (padma.2.35.14)

युक्तः पुत्रो महातेजाःसर्वदेहभृतां वरः । भविष्यति महाभाग्यो युक्तात्मा योगतत्ववित्

yuktaḥ putro mahātejāḥsarvadehabhṛtāṁ varaḥ bhaviṣyati mahābhāgyo yuktātmā yogatatvavit

- ऐसा महातेजस्वी, समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ पुत्र; वह महाभाग्यशाली, संयतात्मा और योग-तत्त्व का ज्ञाता होगा।

श्लोक 15 (padma.2.35.15)

एवं हि वाक्यं तु निशम्य बाला रंभाप्रियोक्तं शिवदायकं तत् । विचिंत्य बुद्ध्येह सुनीथया तदा तत्त्वार्थमेतत्परिसत्यमेव हि

evaṁ hi vākyaṁ tu niśamya bālā raṁbhāpriyoktaṁ śivadāyakaṁ tat viciṁtya buddhyeha sunīthayā tadā tattvārthametatparisatyameva hi

इस प्रकार अपनी प्रिय सखी रंभा द्वारा कहे गए इस कल्याणकारी वचन को सुनकर, बाला सुनीथा ने अपनी बुद्धि से इस पर विचार किया और इसे पूर्णतः सत्य ही पाया।

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