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भूमि खण्ड · अध्याय 36

अंग-सुनीथा विवाह तथा वेन का जन्म एवं राज्याभिषेक

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

श्लोक 1 (padma.2.36.1)

सुनीथोवाच- सत्यमुक्तं त्वया भद्रे एवमेतत्करोम्यहम् । अनया विद्यया विप्रं मोहयिष्यामि नान्यथा

sunīthovāca- satyamuktaṁ tvayā bhadre evametatkaromyaham anayā vidyayā vipraṁ mohayiṣyāmi nānyathā

सुनीथा ने कहा - तुमने सत्य कहा है, हे भद्रे, मैं ऐसा ही करूँगी; इसी विद्या से मैं उस विप्र को मोहित करूँगी, अन्यथा नहीं।

श्लोक 2 (padma.2.36.2)

साहाय्यं देहि मे पुण्यं येन गच्छामि सांप्रतम् । एवमुक्ता तया रंभा तामुवाच मनस्विनीम्

sāhāyyaṁ dehi me puṇyaṁ yena gacchāmi sāṁpratam evamuktā tayā raṁbhā tāmuvāca manasvinīm

मुझे पवित्र सहायता दो, जिससे मैं अभी उसके पास जाऊँ। इस प्रकार कहे जाने पर रंभा ने उस दृढ़-मनस्का से कहा -

श्लोक 3 (padma.2.36.3)

कीदृग्ददामि साहाय्यं तत्त्वं कथय भामिनि । दूतत्वं गच्छ मे भद्रे एतं प्रति सुसांप्रतम्

kīdṛgdadāmi sāhāyyaṁ tattvaṁ kathaya bhāmini dūtatvaṁ gaccha me bhadre etaṁ prati susāṁpratam

मैं कैसी सहायता दूँ, यह सत्य मुझे बताओ, हे भामिनी। मेरी दूती बनकर उसके पास सुव्यवस्थित रूप से जाओ, हे भद्रे।

श्लोक 4 (padma.2.36.4)

एवमुक्तं तया तां तु रंभां प्रति सुलोचनाम् । एवमेव प्रतिज्ञातं रंभया देवयोषिता

evamuktaṁ tayā tāṁ tu raṁbhāṁ prati sulocanām evameva pratijñātaṁ raṁbhayā devayoṣitā

इस प्रकार उस सुलोचना ने रंभा से यह कहा; और उस देवयोषा रंभा ने भी वैसी ही प्रतिज्ञा कर ली।

श्लोक 5 (padma.2.36.5)

करिष्ये तव साहाय्यमादेशो मम दीयताम् । सद्भावेन विशालाक्षी रूपयौवनशालिनी

kariṣye tava sāhāyyamādeśo mama dīyatām sadbhāvena viśālākṣī rūpayauvanaśālinī

'मैं तुम्हारी सहायता करूँगी, मुझे आदेश दो।' सच्चे मन से वह विशाल-नयना, रूप-यौवन से सुशोभित,

श्लोक 6 (padma.2.36.6)

मायया दिव्यरूपा सा संबभूव वरानना । रूपेणाप्रतिमालोके मोहयंती जगत्त्रयम्

māyayā divyarūpā sā saṁbabhūva varānanā rūpeṇāpratimāloke mohayaṁtī jagattrayam

माया से दिव्य रूप धारण कर वह वरानना, संसार में रूप में अद्वितीय होकर तीनों लोकों को मोहित करने लगी।

श्लोक 7 (padma.2.36.7)

मेरोश्चैव महापुण्ये शिखरे चारुकंदरे । नानाधातुसमाकीर्णे नानारत्नोपशोभिते

meroścaiva mahāpuṇye śikhare cārukaṁdare nānādhātusamākīrṇe nānāratnopaśobhite

मेरु के अत्यंत पवित्र शिखर पर, एक सुंदर कंदरा में, जो अनेक धातुओं से व्याप्त और अनेक रत्नों से सुशोभित थी,

श्लोक 8 (padma.2.36.8)

देववृक्षैः समाकीर्णे बहुपुष्पोपशोभिते । देववृंदसमाकीर्णे गंधर्वाप्सरसेविते

devavṛkṣaiḥ samākīrṇe bahupuṣpopaśobhite devavṛṁdasamākīrṇe gaṁdharvāpsarasevite

दिव्य वृक्षों से भरी, अनेक पुष्पों से सुशोभित, देवताओं के समूहों से व्याप्त, गंधर्वों और अप्सराओं से सेवित,

श्लोक 9 (padma.2.36.9)

मनोहरे सुरम्ये च शीतच्छायासमाकुले । चंदनानामशोकानां तरूणां चारुहासिनी

manohare suramye ca śītacchāyāsamākule caṁdanānāmaśokānāṁ tarūṇāṁ cāruhāsinī

मनोहर, अत्यंत रमणीय, शीतल छाया से भरी उस कंदरा में, चंदन और अशोक वृक्षों के बीच मधुर मुस्कान बिखेरती हुई,

श्लोक 10 (padma.2.36.10)

दोलायां सा समारूढा सर्वशृङ्गारशोभिता । कौशेयेन सुनीलेन राजमाना वरानना

dolāyāṁ sā samārūḍhā sarvaśṛṁgāraśobhitā kauśeyena sunīlena rājamānā varānanā

वह हिंडोले पर बैठ गई, समस्त शृंगार से सुशोभित; अत्यंत नीले रेशमी वस्त्र में वह वरानना दमक रही थी,

श्लोक 11 (padma.2.36.11)

बंधूकपुष्पवर्णेन कंचुकेन द्विजोत्तम । सर्वांगसुंदरी बाला वीणातालकराविला

baṁdhūkapuṣpavarṇena kaṁcukena dvijottama sarvāṁgasuṁdarī bālā vīṇātālakarāvilā

बंधूक पुष्प के रंग की चोली पहने हुए, हे द्विजोत्तम; सर्वांगसुंदरी वह बाला वीणा और ताल की ध्वनि से मुखरित,

श्लोक 12 (padma.2.36.12)

गायमाना वरं गीतं सुस्वरं विश्वमोहनम् । ताभिः परिवृता बाला सखीभिः सुमनोहरा

gāyamānā varaṁ gītaṁ susvaraṁ viśvamohanam tābhiḥ parivṛtā bālā sakhībhiḥ sumanoharā

उत्तम, मधुर, संसार को मोहित करने वाला गीत गाती हुई; उन सखियों से घिरी वह अत्यंत मनोहर बाला -

श्लोक 13 (padma.2.36.13)

अंगस्तु कंदरे पुण्ये एकांते ध्यानमास्थितः । कामक्रोधविहीनस्तु ध्यायमानो जनार्दनम्

aṁgastu kaṁdare puṇye ekāṁte dhyānamāsthitaḥ kāmakrodhavihīnastu dhyāyamāno janārdanam

इधर अंग उस पवित्र कंदरा में एकांत में ध्यानस्थ थे, काम-क्रोध से रहित, जनार्दन का ध्यान करते हुए।

श्लोक 14 (padma.2.36.14)

स श्रुत्वा सुस्वरं गीतं मधुरं सुमनोहरम् । तालमानक्रियोपेतं सर्वसत्वविकर्षणम्

sa śrutvā susvaraṁ gītaṁ madhuraṁ sumanoharam tālamānakriyopetaṁ sarvasatvavikarṣaṇam

वह ताल और लय से युक्त, समस्त प्राणियों को खींच लेने वाला वह मधुर, अत्यंत मनोहर गीत सुनकर,

श्लोक 15 (padma.2.36.15)

ध्यानाच्चचाल तेजस्वी मायागीतेन मोहितः । समुत्थायासनात्तूर्णं वीक्षमाणो मुहुर्मुहुः

dhyānāccacāla tejasvī māyāgītena mohitaḥ samutthāyāsanāttūrṇaṁ vīkṣamāṇo muhurmuhuḥ

वह तेजस्वी अपने ध्यान से विचलित हो गया, उस मायावी गीत से मोहित होकर; तुरंत आसन से उठकर बार-बार इधर-उधर देखता हुआ,

श्लोक 16 (padma.2.36.16)

जगाम तत्र वेगेन मायाचलितमानसः । दोलासंस्थां विलोक्यैव वीणादंडकराविलाम्

jagāma tatra vegena māyācalitamānasaḥ dolāsaṁsthāṁ vilokyaiva vīṇādaṁḍakarāvilām

वह उस माया से चलायमान मन के साथ वेगपूर्वक वहाँ गया; और हिंडोले पर बैठी, वीणा-दंड पर हाथ चलाती हुई उसे देखकर,

श्लोक 17 (padma.2.36.17)

हसमानां सुगायंतीं पूर्णचंद्रनिभाननाम् । मोहितस्तेन गीतेन रूपेणापि महायशाः

hasamānāṁ sugāyaṁtīṁ pūrṇacaṁdranibhānanām mohitastena gītena rūpeṇāpi mahāyaśāḥ

हँसती हुई, सुंदर गाती हुई, पूर्ण चंद्रमा के समान मुख वाली उसे देखकर, वह यशस्वी उस गीत और उस रूप दोनों से ही मोहित हो गया।

श्लोक 18 (padma.2.36.18)

तस्या लावण्यभावेन मन्मथस्य शराहतः । आकुलव्याकुलज्ञान ऋषिपुत्रो द्विजोत्तमः

tasyā lāvaṇyabhāvena manmathasya śarāhataḥ ākulavyākulajñāna ṛṣiputro dvijottamaḥ

उसके सौंदर्य के भाव से कामदेव के बाणों से बिंधा हुआ, व्याकुल चित्त वाला वह ऋषिपुत्र, वह द्विजोत्तम -

श्लोक 19 (padma.2.36.19)

प्रलपत्यतिमोहेन जृंभते च पुनः पुनः । स्वेदः कंपोथ संतापस्तस्याजायत तत्क्षणात्

pralapatyatimohena jṛṁbhate ca punaḥ punaḥ svedaḥ kaṁpotha saṁtāpastasyājāyata tatkṣaṇāt

अत्यंत मोह से बड़बड़ाने लगा और बार-बार जँभाई लेने लगा; उसी क्षण उसमें पसीना, कंपन और संताप उत्पन्न हो गए।

श्लोक 20 (padma.2.36.20)

मुह्यन्निव महामोहैर्ग्लानश्चलितमानसः । वेपमानस्ततस्त्वंगो दूयमानः समागतः

muhyanniva mahāmohairglānaścalitamānasaḥ vepamānastatastvaṁgo dūyamānaḥ samāgataḥ

मानो महामोह से मूर्च्छित, ग्लानि से भरा, चलायमान मन वाला वह अंग तब काँपता हुआ, व्याकुल होकर वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 21 (padma.2.36.21)

तामालोक्य विशालाक्षीं मृत्युकन्यां यशस्विनीम् । अथोवाच महात्मा स सुनीथां चारुहासिनीम्

tāmālokya viśālākṣīṁ mṛtyukanyāṁ yaśasvinīm athovāca mahātmā sa sunīthāṁ cāruhāsinīm

उस विशाल नयनों वाली, यशस्विनी मृत्यु-कन्या को देखकर, उस महात्मा ने उस मधुर-हास्य वाली सुनीथा से यह कहा -

श्लोक 22 (padma.2.36.22)

का त्वं कस्य वरारोहे सखीभिः परिवारिता । केन कार्येण संप्राप्ता केन त्वं प्रेषिता वनम्

kā tvaṁ kasya varārohe sakhībhiḥ parivāritā kena kāryeṇa saṁprāptā kena tvaṁ preṣitā vanam

'तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो, हे वरारोहे, जो सखियों से घिरी हो? किस कार्य से और किसके भेजने पर तुम इस वन में आई हो?

श्लोक 23 (padma.2.36.23)

तवांगं सुंदरं सर्वमत्र भाति महावने । समाचक्ष्व ममाद्यैव प्रसादसुमुखी भव

tavāṁgaṁ suṁdaraṁ sarvamatra bhāti mahāvane samācakṣva mamādyaiva prasādasumukhī bhava

तुम्हारा यह सर्वांग-सौंदर्य इस विशाल वन में दमक रहा है; मुझे अभी सच बताओ और मुझ पर प्रसन्न मुख से कृपा करो।'

श्लोक 24 (padma.2.36.24)

मायामोहेन संमुग्धस्तस्याः कर्म न विंदति । मार्गणैर्मन्मथस्यापि परिविद्धो महामुनिः

māyāmohena saṁmugdhastasyāḥ karma na viṁdati mārgaṇairmanmathasyāpi parividdho mahāmuniḥ

माया के मोह से मुग्ध वह उसके कर्म को समझ नहीं पा रहा था; कामदेव के बाणों से भी विद्ध वह महामुनि -

श्लोक 25 (padma.2.36.25)

एवंविधं महद्वाक्यं समाकर्ण्य महामतेः । नोवाच किंचित्सा विप्रं समालोक्य सखीमुखम्

evaṁvidhaṁ mahadvākyaṁ samākarṇya mahāmateḥ novāca kiṁcitsā vipraṁ samālokya sakhīmukham

इस प्रकार उस महामति के महान् वचन को सुनकर, उस विप्र की ओर देखते हुए भी वह कुछ न बोली, केवल अपनी सखी के मुख की ओर देखने लगी।

श्लोक 26 (padma.2.36.26)

रंभां च प्रेरयामास सुनीथा संज्ञया सखीम् । समुवाच ततो रंभा सादरं तं द्विजं प्रति

raṁbhāṁ ca prerayāmāsa sunīthā saṁjñayā sakhīm samuvāca tato raṁbhā sādaraṁ taṁ dvijaṁ prati

सुनीथा ने संकेत से अपनी सखी रंभा को प्रेरित किया; तब रंभा ने आदरपूर्वक उस द्विज से यह कहा -

श्लोक 27 (padma.2.36.27)

इयं कन्या महाभागा मृत्योश्चापि महात्मनः । सुनीथाख्या प्रसिद्धेयं सर्वलक्षणसंपदा

iyaṁ kanyā mahābhāgā mṛtyoścāpi mahātmanaḥ sunīthākhyā prasiddheyaṁ sarvalakṣaṇasaṁpadā

'यह कन्या महात्मा मृत्यु की ही महाभागा पुत्री है; समस्त शुभ लक्षणों से युक्त, सुनीथा नाम से प्रसिद्ध यह कन्या -

श्लोक 28 (padma.2.36.28)

पतिमन्विच्छती बाला धर्मवंतं तपोनिधिम् । शांतं दांतं महाप्राज्ञं वेदविद्याविशारदम्

patimanvicchatī bālā dharmavaṁtaṁ taponidhim śāṁtaṁ dāṁtaṁ mahāprājñaṁ vedavidyāviśāradam

धर्मवान, तपस्या के भंडार, शांत, संयमी, महाप्राज्ञ और वेद-विद्या में निपुण पति की खोज में है।'

श्लोक 29 (padma.2.36.29)

एवंविधं महद्वाक्यं समाकर्ण्य महामुनिः । तामुवाच ततस्त्वंगो रंभामप्सरसां वराम्

evaṁvidhaṁ mahadvākyaṁ samākarṇya mahāmuniḥ tāmuvāca tatastvaṁgo raṁbhāmapsarasāṁ varām

इस प्रकार उस महान् वचन को सुनकर, वह महामुनि अंग तब अप्सराओं में श्रेष्ठ रंभा से यह बोला -

श्लोक 30 (padma.2.36.30)

मया चाराधितो विष्णुः सर्वविश्वमयो हरिः । तेन दत्तो वरो मह्यं पुत्राख्यः सर्वसिद्धिदः

mayā cārādhito viṣṇuḥ sarvaviśvamayo hariḥ tena datto varo mahyaṁ putrākhyaḥ sarvasiddhidaḥ

'मेरे द्वारा समस्त विश्वमय हरि विष्णु की आराधना की गई थी; उन्होंने ही मुझे पुत्र नामक, सर्वसिद्धिदायक वर दिया है।

श्लोक 31 (padma.2.36.31)

तन्निमित्तमहं भद्रे सुतार्थं नित्यमेव च । कस्यचित्पुण्यवीर्यस्य कन्यामेकां प्रचिंतये

tannimittamahaṁ bhadre sutārthaṁ nityameva ca kasyacitpuṇyavīryasya kanyāmekāṁ praciṁtaye

इसी कारण, हे भद्रे, मैं सदैव पुत्र के लिए किसी पुण्यशाली, पराक्रमी की एक कन्या के विषय में सोचता रहता हूँ।

श्लोक 32 (padma.2.36.32)

सदैवाहं न पश्यामि सुभार्यां सत्यमीदृशीम् । इयं धर्मस्य वै कन्या धर्माचारा वरानना

sadaivāhaṁ na paśyāmi subhāryāṁ satyamīdṛśīm iyaṁ dharmasya vai kanyā dharmācārā varānanā

परंतु मुझे कभी ऐसी सच्ची सुभार्या नहीं दिखाई पड़ी; यह निश्चय ही धर्मपरायणा, धर्माचारवती, वरानना कन्या है।

श्लोक 33 (padma.2.36.33)

मामेवं हि भजत्वेषा यदि कान्तमिहेच्छति । यं यमिच्छेदियं बाला तं ददामि न संशयः

māmevaṁ hi bhajatveṣā yadi kāntamihecchati yaṁ yamicchediyaṁ bālā taṁ dadāmi na saṁśayaḥ

यदि यह किसी प्रियतम की कामना करती है तो मुझे ही स्वीकार करे; यह बाला जिसे भी चाहेगी, उसे मैं दे दूँगा, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 34 (padma.2.36.34)

अदेयं देयमित्याह अस्याः संगमकारणात् । एकमेवं त्वया देयं श्रूयतां द्विजसत्तम

adeyaṁ deyamityāha asyāḥ saṁgamakāraṇāt ekamevaṁ tvayā deyaṁ śrūyatāṁ dvijasattama

इसके संगम के लिए तो जो अदेय भी है, वह भी देय कहा गया है; इतना ही तुम्हें देना है, हे द्विजसत्तम, यह सुन लो।'

श्लोक 35 (padma.2.36.35)

रंभोवाच- विप्रेंद्र त्वं शृणुष्वेह प्रतिज्ञां वच्मि सांप्रतम् । एषा नैव त्वया त्याज्या धर्मपत्नी तवैव हि

raṁbhovāca- vipreṁdra tvaṁ śṛṇuṣveha pratijñāṁ vacmi sāṁpratam eṣā naiva tvayā tyājyā dharmapatnī tavaiva hi

रंभा ने कहा - हे विप्रेंद्र, अब सुनो, मैं यहाँ अभी एक प्रतिज्ञा कहती हूँ - यह तुम्हारी धर्मपत्नी है, इसे तुम कभी नहीं त्यागोगे।

श्लोक 36 (padma.2.36.36)

अस्या दोषो गुणो नैव ग्राह्य एव त्वया कदा । इत्यर्थे प्रत्ययं विप्र प्रत्यक्षं परिदर्शय

asyā doṣo guṇo naiva grāhya eva tvayā kadā ityarthe pratyayaṁ vipra pratyakṣaṁ paridarśaya

इसमें दोष या गुण जो भी हो, वह तुम्हें कभी नहीं देखना है; इसी की पुष्टि के लिए, हे विप्र, मुझे प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाओ।

श्लोक 37 (padma.2.36.37)

स्वहस्तं देहि विप्रेंद्र सत्यप्रत्ययकारकम् । एवमस्तु मया दत्तो ह्यस्या हस्तो न संशयः

svahastaṁ dehi vipreṁdra satyapratyayakārakam evamastu mayā datto hyasyā hasto na saṁśayaḥ

अपना हाथ दो, हे विप्रेंद्र, जो सत्य की पुष्टि करने वाला हो।' 'ऐसा ही हो' - इस प्रकार मेरे द्वारा इसका हाथ दे दिया गया, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 38 (padma.2.36.38)

सूत उवाच- एवं संबधिकं कृत्वा सत्यप्रत्ययकारकम् । गांधर्वेण विवाहेन सुनीथामुपयेमिवान्

sūta uvāca- evaṁ saṁbadhikaṁ kṛtvā satyapratyayakārakam gāṁdharveṇa vivāhena sunīthāmupayemivān

सूत जी ने कहा - इस प्रकार सत्य की पुष्टि करने वाला यह संबंध स्थापित करके, गांधर्व विवाह-विधि से उसने सुनीथा को पत्नी रूप में ग्रहण किया।

श्लोक 39 (padma.2.36.39)

तस्मै दत्वा सुनीथां तां रंभा हृष्टेन चेतसा । सा तां चामंत्रयित्वा वै गता गेहं स्वकं पुनः

tasmai datvā sunīthāṁ tāṁ raṁbhā hṛṣṭena cetasā sā tāṁ cāmaṁtrayitvā vai gatā gehaṁ svakaṁ punaḥ

उसे उसके हाथों सौंपकर, प्रसन्न मन से रंभा उससे विदा लेकर पुनः अपने घर लौट गई।

श्लोक 40 (padma.2.36.40)

प्रहृष्टचेतसः सख्यः स्वस्थानं परिजग्मिरे । गतासु तासु सर्वासु सखीषु द्विजसत्तमः

prahṛṣṭacetasaḥ sakhyaḥ svasthānaṁ parijagmire gatāsu tāsu sarvāsu sakhīṣu dvijasattamaḥ

उन सभी सखियों का चित्त भी हर्ष से भरा हुआ था और वे अपने-अपने स्थान को लौट गईं। जब वे सारी सखियाँ चली गईं, तब उस श्रेष्ठ द्विज ने -

श्लोक 41 (padma.2.36.41)

रेमे त्वंगस्तया सार्धं प्रियया भार्यया सह । तस्यामुत्पाद्य तनयं सर्वलक्षणसंयुतम्

reme tvaṁgastayā sārdhaṁ priyayā bhāryayā saha tasyāmutpādya tanayaṁ sarvalakṣaṇasaṁyutam

अपनी प्रिय पत्नी सुनीथा के साथ आनंद-विहार किया; और उससे समस्त शुभ लक्षणों से युक्त एक पुत्र को जन्म देकर,

श्लोक 42 (padma.2.36.42)

चकार नाम तस्यैव वेनाख्यं तनयस्य हि । ववृधे स महातेजाः सुनीथातनयस्तदा

cakāra nāma tasyaiva venākhyaṁ tanayasya hi vavṛdhe sa mahātejāḥ sunīthātanayastadā

उस पुत्र का नाम वेन रख दिया। सुनीथा का वह महातेजस्वी पुत्र तब बड़ा होने लगा।

श्लोक 43 (padma.2.36.43)

वेदशास्त्रमधीत्यैव धनुर्वेदं गुणान्वितम् । सर्वासामपि मेधावी विद्यानां पारमेयिवान्

vedaśāstramadhītyaiva dhanurvedaṁ guṇānvitam sarvāsāmapi medhāvī vidyānāṁ pārameyivān

वेद-शास्त्रों और गुणों से युक्त धनुर्वेद का अध्ययन करके, वह मेधावी समस्त विद्याओं की पराकाष्ठा को प्राप्त हुआ।

श्लोक 44 (padma.2.36.44)

अंगस्य तनयो वेनः शिष्टाचारेण वर्तते । स वेनो ब्राह्मणश्रेष्ठः क्षत्त्राचारपरोऽभवत्

aṁgasya tanayo venaḥ śiṣṭācāreṇa vartate sa veno brāhmaṇaśreṣṭhaḥ kṣattrācāraparo'bhavat

अंग का पुत्र वेन शिष्टाचार के अनुसार आचरण करता था; वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वेन क्षत्रिय-आचार का पालन करने वाला बन गया।

श्लोक 45 (padma.2.36.45)

दिवि चेंद्रो यथा भाति सर्वतेजःसमन्वितः । भात्येवं तु महाप्राज्ञः स्वबलेन पराक्रमैः

divi ceṁdro yathā bhāti sarvatejaḥsamanvitaḥ bhātyevaṁ tu mahāprājñaḥ svabalena parākramaiḥ

जैसे इंद्र स्वर्ग में समस्त तेज से युक्त होकर सुशोभित होते हैं, वैसे ही वह महाप्राज्ञ अपने बल और पराक्रम से सुशोभित होता था।

श्लोक 46 (padma.2.36.46)

चाक्षुषस्यांतरे प्राप्ते वैवस्वतसमागते । प्रजापालं विना लोके प्रजाः सीदंति सर्वदा

cākṣuṣasyāṁtare prāpte vaivasvatasamāgate prajāpālaṁ vinā loke prajāḥ sīdaṁti sarvadā

चाक्षुष मन्वंतर के बीत जाने पर, वैवस्वत मन्वंतर के आगमन पर, प्रजापालक के बिना संसार में प्रजा सदैव पीड़ित रहती है।

श्लोक 47 (padma.2.36.47)

ऋषयो धर्मतत्त्वज्ञाः प्रजाहेतोस्तपोधनाः । व्यचिंतयन्महीपालं धर्मज्ञं सत्यपंडितम्

ṛṣayo dharmatattvajñāḥ prajāhetostapodhanāḥ vyaciṁtayanmahīpālaṁ dharmajñaṁ satyapaṁḍitam

धर्म-तत्त्व के ज्ञाता, तपोधन ऋषियों ने प्रजा के हित के लिए धर्मज्ञ, सत्य में निपुण एक भूपाल के विषय में विचार किया।

श्लोक 48 (padma.2.36.48)

तं वेनमेव ददृशुः संपन्नं लक्षणैर्युतम् । प्राजापत्ये पदे पुण्ये अभ्यषिंचन्द्विजोत्तमाः

taṁ venameva dadṛśuḥ saṁpannaṁ lakṣaṇairyutam prājāpatye pade puṇye abhyaṣiṁcandvijottamāḥ

उन्हें [शुभ] लक्षणों से युक्त वही वेन दिखाई दिया; उन श्रेष्ठ द्विजों ने उसे पुण्यमय प्रजापति-पद पर अभिषिक्त कर दिया।

श्लोक 49 (padma.2.36.49)

अभिषिक्ते महाभागे त्वंगपुत्रे तदा नृपे । ते प्रजापतयः सर्वे जग्मुश्चैव तपोवनम्

abhiṣikte mahābhāge tvaṁgaputre tadā nṛpe te prajāpatayaḥ sarve jagmuścaiva tapovanam

अंग के उस महाभाग्यशाली पुत्र, उस राजा के अभिषिक्त होने पर, वे समस्त प्रजापति (ऋषि) तपोवन को चले गए।

श्लोक 50 (padma.2.36.50)

गतेषु तेषु सर्वेषु वेनो राज्यमकारयत् । सूत उवाच- सा सुनीथा सुतं दृष्ट्वा सर्वराज्यप्रसाधकम्

gateṣu teṣu sarveṣu veno rājyamakārayat sūta uvāca- sā sunīthā sutaṁ dṛṣṭvā sarvarājyaprasādhakam

उन सबके चले जाने पर वेन ने राज्य करना आरंभ किया। सूत जी ने कहा - समस्त राज्य को संभालते हुए अपने पुत्र को देखकर सुनीथा -

श्लोक 51 (padma.2.36.51)

विशंकते प्रभावेण शापात्तस्य महात्मनः । मम पुत्रो महाभागो धर्मत्राता भविष्यति

viśaṁkate prabhāveṇa śāpāttasya mahātmanaḥ mama putro mahābhāgo dharmatrātā bhaviṣyati

उस महात्मा के शाप के प्रभाव से आशंकित रहती थी - 'मेरा महाभाग्यशाली पुत्र धर्म का रक्षक ही बने,'

श्लोक 52 (padma.2.36.52)

इत्येवं चिंतयेन्नित्यं पूर्वपापाद्विशंकिता । धर्मांगानि सुपुण्यानि सुताग्रे परिदर्शयेत्

ityevaṁ ciṁtayennityaṁ pūrvapāpādviśaṁkitā dharmāṁgāni supuṇyāni sutāgre paridarśayet

इस प्रकार वह पूर्व पाप से आशंकित होकर सदैव यही सोचती रहती थी; वह अपने पुत्र के समक्ष धर्म के पुण्यमय अंगों को बार-बार प्रकट करती रहती।

श्लोक 53 (padma.2.36.53)

सत्यभावादि कान्पुण्यान्गुणान्सा वै प्रकाशयेत् । इत्युवाच सुतं सा हि अहं धर्मसुता सुत

satyabhāvādi kānpuṇyānguṇānsā vai prakāśayet ityuvāca sutaṁ sā hi ahaṁ dharmasutā suta

वह सत्य-भाव आदि जो भी पुण्यमय गुण थे, उन्हें उसके सामने प्रकट करती रहती थी; उसने अपने पुत्र से यह कहा - 'मैं धर्म की ही पुत्री हूँ, हे पुत्र,

श्लोक 54 (padma.2.36.54)

पिता ते धर्मतत्त्वज्ञस्तस्माद्धर्मं समाचर । इत्येवं बोधयेन्नित्यं पुत्रं वेनं तदा सती

pitā te dharmatattvajñastasmāddharmaṁ samācara ityevaṁ bodhayennityaṁ putraṁ venaṁ tadā satī

तुम्हारे पिता भी धर्म-तत्त्व के ज्ञाता हैं, इसलिए तुम धर्म का ही आचरण करो।' इस प्रकार वह सती नित्य अपने पुत्र वेन को समझाती रहती थी।

श्लोक 55 (padma.2.36.55)

मातापित्रोस्तयोर्वाक्यं प्रजायुक्तं प्रपालयेत् । एवं वेनः प्रजापालः संजातःक्षितिमंडले

mātāpitrostayorvākyaṁ prajāyuktaṁ prapālayet evaṁ venaḥ prajāpālaḥ saṁjātaḥkṣitimaṁḍale

[वह कहती] - माता और पिता दोनों के वचन का, प्रजा के हित से युक्त होकर, पालन करना चाहिए। इस प्रकार वेन पृथ्वी-मंडल का प्रजापालक बन गया।

श्लोक 56 (padma.2.36.56)

सुखेन जीवते लोकःप्रजाधर्मेणरंजिताः । एवं राज्यप्रभावं तु वेनस्यापि महात्मनः

sukhena jīvate lokaḥprajādharmeṇaraṁjitāḥ evaṁ rājyaprabhāvaṁ tu venasyāpi mahātmanaḥ

प्रजा-धर्म से रंजित प्रजा सुखपूर्वक जीवन बिताने लगी; इस प्रकार महात्मा वेन के राज्य का यह प्रभाव था -

श्लोक 57 (padma.2.36.57)

धर्मभावाः प्रवर्तंते तस्मिञ्छासति पार्थिवे

dharmabhāvāḥ pravartaṁte tasmiñchāsati pārthive

जब तक वह राजा शासन करता रहा, तब तक धर्म के भाव ही सर्वत्र प्रवर्तित होते रहे।

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