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भूमि खण्ड · अध्याय 37

आगंतुक का उपदेश तथा वेन का पतन

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38

श्लोक 1 (padma.2.37.1)

ऋषय ऊचुः- एवं वेनस्य चैवासीत्सृष्टिरेव महात्मनः । धर्माचारं परित्यज्य कथं पापमतिर्भवेत्

ṛṣaya ūcuḥ- evaṁ venasya caivāsītsṛṣṭireva mahātmanaḥ dharmācāraṁ parityajya kathaṁ pāpamatirbhavet

ऋषियों ने कहा - इस प्रकार उस महात्मा वेन का यह पतन कैसे हुआ? धर्माचार को त्यागकर वह पापी बुद्धि वाला कैसे हो गया?

श्लोक 2 (padma.2.37.2)

सूत उवाच- ज्ञानविज्ञानसंपन्ना मुनयस्तत्त्ववेदिनः । शुभाशुभं वदंत्येवं तन्न स्यादिह चान्यथा

sūta uvāca- jñānavijñānasaṁpannā munayastattvavedinaḥ śubhāśubhaṁ vadaṁtyevaṁ tanna syādiha cānyathā

सूत जी ने कहा - ज्ञान-विज्ञान से संपन्न, तत्त्व के ज्ञाता मुनि ही शुभ और अशुभ का निर्णय करते हैं; यहाँ इसमें अन्यथा कुछ नहीं होता।

श्लोक 3 (padma.2.37.3)

तप्यमानेन तेनापि सुशंखेन महात्मना । दत्तः शापः कथं विप्रा न यथावच्च जायते

tapyamānena tenāpi suśaṁkhena mahātmanā dattaḥ śāpaḥ kathaṁ viprā na yathāvacca jāyate

उस तपस्या करते हुए महात्मा सुशंख द्वारा भी दिया गया वह शाप, हे विप्रो, कैसे यथावत् नहीं हुआ [अर्थात् उसका फल कैसे प्रकट हुआ]?

श्लोक 4 (padma.2.37.4)

वेनस्य पातकाचारं सर्वमेव वदाम्यहम् । तस्मिञ्छासति धर्मज्ञे प्रजापाले महात्मनि

venasya pātakācāraṁ sarvameva vadāmyaham tasmiñchāsati dharmajñe prajāpāle mahātmani

मैं वेन का समस्त पापाचरण तुम्हें सुनाता हूँ; जब वह धर्मज्ञ, महात्मा प्रजापालक राज्य कर रहा था,

श्लोक 5 (padma.2.37.5)

पुरुषः कश्चिदायातश्छद्म लिंगधरस्तदा । नग्नरूपो महाकायः शिरोमुंडो महाप्रभः

puruṣaḥ kaścidāyātaśchadma liṁgadharastadā nagnarūpo mahākāyaḥ śiromuṁḍo mahāprabhaḥ

तभी छद्म-वेष धारण किए हुए एक पुरुष वहाँ आया - नग्न रूप वाला, विशालकाय, मुंडित सिर वाला, महातेजस्वी,

श्लोक 6 (padma.2.37.6)

मार्जनीं शिखिपत्राणां कक्षायां स हि धारयन् । गृहीतं पानपात्रं तु नालिकेरमयं करे

mārjanīṁ śikhipatrāṇāṁ kakṣāyāṁ sa hi dhārayan gṛhītaṁ pānapātraṁ tu nālikeramayaṁ kare

अपनी काँख में मयूर-पंखों की झाड़ू धारण किए हुए, हाथ में नारियल का बना हुआ पानपात्र लिए हुए,

श्लोक 7 (padma.2.37.7)

पठमानो ह्यसच्छास्त्रं वेदधर्मविदूषकम् । यत्र वेनो महाराजस्तत्रायातस्त्वरान्वितः

paṭhamāno hyasacchāstraṁ vedadharmavidūṣakam yatra veno mahārājastatrāyātastvarānvitaḥ

वेद और धर्म का उपहास करने वाले असत् शास्त्र का पाठ करता हुआ, जहाँ महाराज वेन थे, वहाँ शीघ्रता से आ पहुँचा।

श्लोक 8 (padma.2.37.8)

सभायां तस्य वेनस्य प्रविवेश स पापवान् । तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं वेनः प्रश्नं तदाकरोत्

sabhāyāṁ tasya venasya praviveśa sa pāpavān taṁ dṛṣṭvā samanuprāptaṁ venaḥ praśnaṁ tadākarot

वह पापी वेन की उस सभा में प्रविष्ट हुआ; वहाँ आए हुए उसे देखकर वेन ने तब यह प्रश्न किया -

श्लोक 9 (padma.2.37.9)

भवान्को हि समायात ईदृग्रूपधरो मम । सभायां वर्तमानस्य पुरः कस्मात्समागतः

bhavānko hi samāyāta īdṛgrūpadharo mama sabhāyāṁ vartamānasya puraḥ kasmātsamāgataḥ

'आप कौन हैं, जो इस प्रकार का रूप धारण किए हुए मेरे पास आए हैं? इस सभा में मेरे समक्ष कहाँ से आए हैं?

श्लोक 10 (padma.2.37.10)

को वेषः किं नु ते नाम को धर्मः कर्म ते वद । को वेदस्ते क आचारः किं तपः का प्रभावना

ko veṣaḥ kiṁ nu te nāma ko dharmaḥ karma te vada ko vedaste ka ācāraḥ kiṁ tapaḥ kā prabhāvanā

आपका वेश क्या है? आपका नाम क्या है? आपका धर्म क्या है, अपना कर्म बताइए। आपका वेद क्या है, आचार क्या है, तप क्या है, प्रभाव क्या है?

श्लोक 11 (padma.2.37.11)

किं ज्ञानं कः प्रभावस्ते किं सत्यं धर्मलक्षणम् । तत्त्वं सर्वं समाचक्ष्व ममाग्रे सत्यमेव च

kiṁ jñānaṁ kaḥ prabhāvaste kiṁ satyaṁ dharmalakṣaṇam tattvaṁ sarvaṁ samācakṣva mamāgre satyameva ca

आपका ज्ञान क्या है, आपका प्रभाव क्या है? सत्य क्या है, धर्म का लक्षण क्या है? यह सब तत्त्व मेरे समक्ष स्पष्ट रूप से बताइए, और केवल सत्य ही बताइए।'

श्लोक 12 (padma.2.37.12)

श्रुत्वा वेनस्य तद्वाक्यं पापो वाक्यमुदाहरत् । पातक उवाच- करोष्येवं वृथा राज्यं महामूढो न संशयः

śrutvā venasya tadvākyaṁ pāpo vākyamudāharat pātaka uvāca- karoṣyevaṁ vṛthā rājyaṁ mahāmūḍho na saṁśayaḥ

वेन के इस वचन को सुनकर उस पापी ने यह वचन कहा। पापी ने कहा - 'तुम व्यर्थ ही राज्य करते हो, महामूढ़, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 13 (padma.2.37.13)

अहं धर्मस्य सर्वस्वमहं पूज्यतमोसुरैः । अहं ज्ञानमहं सत्यमहं धाता सनातनः

ahaṁ dharmasya sarvasvamahaṁ pūjyatamosuraiḥ ahaṁ jñānamahaṁ satyamahaṁ dhātā sanātanaḥ

मैं ही धर्म का सर्वस्व हूँ, मैं ही असुरों द्वारा भी सबसे अधिक पूजनीय हूँ; मैं ही ज्ञान हूँ, मैं ही सत्य हूँ, मैं ही सनातन विधाता हूँ।

श्लोक 14 (padma.2.37.14)

अहं धर्मं अहं मोक्षः सर्वदेवमयो ह्यहम् । ब्रह्मदेहात्समुद्भूतः सत्यसंधोऽस्मि नान्यथा

ahaṁ dharmaṁ ahaṁ mokṣaḥ sarvadevamayo hyaham brahmadehātsamudbhūtaḥ satyasaṁdho'smi nānyathā

मैं ही धर्म हूँ, मैं ही मोक्ष हूँ, मैं ही समस्त देवमय हूँ; ब्रह्मा के शरीर से उत्पन्न, मैं सत्यनिष्ठ हूँ, अन्यथा नहीं।

श्लोक 15 (padma.2.37.15)

जिनरूपं विजानीहि सत्यधर्मकलेवरम् । मामेव हि प्रधावंति योगिनो ज्ञानतत्पराः

jinarūpaṁ vijānīhi satyadharmakalevaram māmeva hi pradhāvaṁti yogino jñānatatparāḥ

मुझे जिन (विजेता तपस्वी) का रूप जानो, सत्यधर्म का साक्षात् कलेवर; ज्ञान में तत्पर योगीजन मेरी ओर ही दौड़े आते हैं।'

श्लोक 16 (padma.2.37.16)

वेन उवाच- तवैव कीदृशं कर्म किं ते दर्शनमेव च । किमाचारो वदस्वैहि इत्युक्तं तेन भूभुजा

vena uvāca- tavaiva kīdṛśaṁ karma kiṁ te darśanameva ca kimācāro vadasvaihi ityuktaṁ tena bhūbhujā

वेन ने कहा - 'आपका कर्म कैसा है और आपका दर्शन क्या है? आचार क्या है, यह मुझे बताइए' - उस राजा ने ऐसा कहा।

श्लोक 17 (padma.2.37.17)

पातक उवाच- अर्हंतो देवता यत्र निर्ग्रंथो दृश्यते गुरुः । दया चैव परो धर्मस्तत्र मोक्षः प्रदृश्यते

pātaka uvāca- arhaṁto devatā yatra nirgraṁtho dṛśyate guruḥ dayā caiva paro dharmastatra mokṣaḥ pradṛśyate

पापी ने कहा - 'जहाँ अर्हंत ही देवता हैं, जहाँ निर्ग्रंथ गुरु के रूप में दिखाई देते हैं, और दया ही परम धर्म है, वहीं मोक्ष प्रकट होता है।

श्लोक 18 (padma.2.37.18)

दर्शनेस्मिन्न संदेह आचारान्प्रवदाम्यहम् । यजनं याजनं नास्ति वेदाध्ययनमेव च

darśanesminna saṁdeha ācārānpravadāmyaham yajanaṁ yājanaṁ nāsti vedādhyayanameva ca

इस दर्शन में कोई संदेह नहीं है; मैं तुम्हें आचार बताता हूँ - इसमें न यजन है, न याजन है, और न ही वेदाध्ययन है।

श्लोक 19 (padma.2.37.19)

नास्ति संध्या तपो दानं स्वधास्वाहाविवर्जितम् । हव्यकव्यादिकं नास्ति नैव यज्ञादिका क्रिया

nāsti saṁdhyā tapo dānaṁ svadhāsvāhāvivarjitam havyakavyādikaṁ nāsti naiva yajñādikā kriyā

संध्या नहीं है, तप नहीं है, दान नहीं है, स्वधा और स्वाहा से रहित है; हव्य-कव्य आदि कुछ नहीं है, न ही यज्ञ आदि कोई क्रिया है।

श्लोक 20 (padma.2.37.20)

पितॄणां तर्पणं नास्ति नातिथिर्वैश्वदेविकम् । क्षपणस्य वरा पूजा अर्हतो ध्यानमुत्तमम्

pitṝṇāṁ tarpaṇaṁ nāsti nātithirvaiśvadevikam kṣapaṇasya varā pūjā arhato dhyānamuttamam

पितरों का तर्पण नहीं है, न अतिथि-सत्कार है, न वैश्वदेव है; क्षपणक (दिगंबर तपस्वी) की श्रेष्ठ पूजा और अर्हंत का उत्तम ध्यान ही सब कुछ है।

श्लोक 21 (padma.2.37.21)

अयं धर्मसमाचारो जैनमार्गे प्रदृश्यते । एतत्ते सर्वमाख्यातं निजधर्मस्यलक्षणम्

ayaṁ dharmasamācāro jainamārge pradṛśyate etatte sarvamākhyātaṁ nijadharmasyalakṣaṇam

यही धर्माचार जैन मार्ग में देखा जाता है; यह सब मैंने तुम्हें बता दिया, यही मेरे धर्म का लक्षण है।'

श्लोक 22 (padma.2.37.22)

वेन उवाच- वेदप्रोक्तो यथा धर्मो यत्र यज्ञादिकाः क्रियाः । पितॄणां तर्पणं श्राद्धं वैश्वदेवं न दृश्यते

vena uvāca- vedaprokto yathā dharmo yatra yajñādikāḥ kriyāḥ pitṝṇāṁ tarpaṇaṁ śrāddhaṁ vaiśvadevaṁ na dṛśyate

वेन ने कहा - 'जैसा वेदों में कहा गया धर्म है, जिसमें यज्ञ आदि क्रियाएँ हैं, पितरों का तर्पण, श्राद्ध और वैश्वदेव - वे तो [आपके पथ में] नहीं दिखाई देते,

श्लोक 23 (padma.2.37.23)

न दानं तप एवास्ति क्वास्ते धर्मस्य लक्षणम् । वद सत्यं ममाग्रे तु दयाधर्मं च कीदृशम्

na dānaṁ tapa evāsti kvāste dharmasya lakṣaṇam vada satyaṁ mamāgre tu dayādharmaṁ ca kīdṛśam

न दान है, न तप ही है; तब धर्म का लक्षण कहाँ ठहरता है? मेरे समक्ष सत्य बताइए, और यह भी कि दया-धर्म कैसा है?

श्लोक 24 (padma.2.37.24)

पातक उवाच- पंचतत्त्वप्रवृद्धोयं प्राणिनां काय एव च । आत्मा वायुस्वरूपोयं तेषां नास्ति प्रसंगता

pātaka uvāca- paṁcatattvapravṛddhoyaṁ prāṇināṁ kāya eva ca ātmā vāyusvarūpoyaṁ teṣāṁ nāsti prasaṁgatā

पापी ने कहा - 'प्राणियों का यह शरीर पंचतत्त्वों से ही बना और बढ़ा है; इसमें आत्मा वायु-स्वरूप है, इन [तत्त्वों] का इससे कोई स्थायी संबंध नहीं है।

श्लोक 25 (padma.2.37.25)

यथा जलेषु भूतानामपिसंगमवेहि तत् । जायते बुद्बुदाकारं तद्वद्भूतसमागमः

yathā jaleṣu bhūtānāmapisaṁgamavehi tat jāyate budbudākāraṁ tadvadbhūtasamāgamaḥ

जिस प्रकार जल में प्राणियों [तत्त्वों] का संगम होता है, वैसा ही जानो; बुलबुले का आकार बनता है, वैसे ही तत्त्वों का यह संगम होता है।

श्लोक 26 (padma.2.37.26)

पृथ्वीभावो रजःस्थस्तु चापस्तत्रैव संस्थिताः । ज्योतिस्तत्र प्रदृश्येत सुवायुर्वर्तते त्रिषु

pṛthvībhāvo rajaḥsthastu cāpastatraiva saṁsthitāḥ jyotistatra pradṛśyeta suvāyurvartate triṣu

पृथ्वी-तत्त्व रज में स्थित रहता है, वहीं जल भी स्थित रहता है; वहाँ प्रकाश (अग्नि) प्रकट होता है, और इन तीनों में शुभ वायु विद्यमान रहती है।

श्लोक 27 (padma.2.37.27)

आकाशमावृणोत्पश्चाद्बुद्बुदत्वं प्रजायते । अप्सुमध्ये प्रभात्येव सुतेजो वर्तुलं वरम्

ākāśamāvṛṇotpaścādbudbudatvaṁ prajāyate apsumadhye prabhātyeva sutejo vartulaṁ varam

फिर आकाश उसे आवृत्त कर लेता है, और तब बुलबुले का रूप उत्पन्न होता है; जल के बीच में ही एक सुंदर, गोल, तेजस्वी रूप चमकता है।

श्लोक 28 (padma.2.37.28)

क्षणमात्रं प्रदृश्येत क्षणान्नैव च दृश्यते । तद्वद्भूतसमायोगः सर्वत्र परिदृश्यते

kṣaṇamātraṁ pradṛśyeta kṣaṇānnaiva ca dṛśyate tadvadbhūtasamāyogaḥ sarvatra paridṛśyate

वह क्षणमात्र दिखाई देता है और क्षण भर में ही दिखना बंद हो जाता है; उसी प्रकार तत्त्वों का यह संयोग सर्वत्र देखा जाता है।

श्लोक 29 (padma.2.37.29)

अंतकाले प्रयात्यात्मा पंच पंचसु यांति ते । मोहमुग्धास्ततो मर्त्या वर्तंते च परस्परम्

aṁtakāle prayātyātmā paṁca paṁcasu yāṁti te mohamugdhāstato martyā vartaṁte ca parasparam

अंतकाल में आत्मा चली जाती है, और वे पाँचों तत्त्व अपने-अपने पाँच स्रोतों में लीन हो जाते हैं; तब मोह से मूढ़ हुए मनुष्य आपस में यह करते हैं -

श्लोक 30 (padma.2.37.30)

श्राद्धं कुर्वंति मोहेन क्षयाहे पितृतर्पणम् । क्वास्ते मृतः समश्नाति कीदृशोऽसौ नृपोत्तम

śrāddhaṁ kurvaṁti mohena kṣayāhe pitṛtarpaṇam kvāste mṛtaḥ samaśnāti kīdṛśo'sau nṛpottama

वे मोहवश श्राद्ध करते हैं, मृत्यु-तिथि पर पितरों का तर्पण करते हैं। मरा हुआ व्यक्ति कहाँ रहकर भोजन करता है? हे नृपश्रेष्ठ, यह कैसा है?

श्लोक 31 (padma.2.37.31)

किं ज्ञानं कीदृशं कायं केन दृष्टं वदस्व नः । मिष्टान्नं भोजयित्वा च तृप्ता यांति च ब्राह्मणाः

kiṁ jñānaṁ kīdṛśaṁ kāyaṁ kena dṛṣṭaṁ vadasva naḥ miṣṭānnaṁ bhojayitvā ca tṛptā yāṁti ca brāhmaṇāḥ

यह किसका ज्ञान है, कैसा शरीर है, किसने देखा है, यह हमें बताइए। मीठा अन्न खिलाकर तृप्त हुए ब्राह्मण चले जाते हैं -

श्लोक 32 (padma.2.37.32)

कस्य श्राद्धं प्रदीयेत सा तु श्रद्धा निरर्थिका । अन्यदेवं प्रवक्ष्यामि वेदानां कर्म दारुणम्

kasya śrāddhaṁ pradīyeta sā tu śraddhā nirarthikā anyadevaṁ pravakṣyāmi vedānāṁ karma dāruṇam

तब किसे श्राद्ध दिया जाता है? वह श्रद्धा ही निरर्थक है। अब मैं तुम्हें और भी बताता हूँ - वेदों का यह कठोर कर्म -

श्लोक 33 (padma.2.37.33)

यदातिथिर्गृहे याति महोक्षं पचते द्विजः । अजं वा राजराजेंद्र अतिथिं परिभोजयेत्

yadātithirgṛhe yāti mahokṣaṁ pacate dvijaḥ ajaṁ vā rājarājeṁdra atithiṁ paribhojayet

जब घर में अतिथि आता है, तो द्विज एक बड़े बैल को पकाता है; या हे राजराजेंद्र, वह बकरे को अतिथि को खिलाता है।

श्लोक 34 (padma.2.37.34)

अश्वमेधमखे अश्वं गोमेधे वृषमेव च । नरमेधे नरं राजन्वाजपेये तथा ह्यजान्

aśvamedhamakhe aśvaṁ gomedhe vṛṣameva ca naramedhe naraṁ rājanvājapeye tathā hyajān

अश्वमेध यज्ञ में घोड़े को, गोमेध में बैल को, नरमेध में मनुष्य को, हे राजन, और वाजपेय में बकरों को [बलि किया जाता है]।

श्लोक 35 (padma.2.37.35)

राजसूये महाराज प्राणिनां घातनं बहु । पुंडरीके गजं हन्याद्गजमेधेऽथ कुंजरम्

rājasūye mahārāja prāṇināṁ ghātanaṁ bahu puṁḍarīke gajaṁ hanyādgajamedhe'tha kuṁjaram

राजसूय में, हे महाराज, अनेक प्राणियों का वध होता है; पुंडरीक में हाथी का वध किया जाता है, और गजमेध में भी हाथी का।

श्लोक 36 (padma.2.37.36)

सौत्रामण्यां पशुं मेध्यं मेषमेव प्रदृश्यते । नानारूपेषु सर्वेषु श्रूयतां नृपनंदन

sautrāmaṇyāṁ paśuṁ medhyaṁ meṣameva pradṛśyate nānārūpeṣu sarveṣu śrūyatāṁ nṛpanaṁdana

सौत्रामणी में मेध्य पशु के रूप में मेढ़े की बलि दिखाई देती है। इन नाना रूपों में, हे राजपुत्र, सुनो -

श्लोक 37 (padma.2.37.37)

नानाजातिविशेषाणां पशूनां घातनं स्मृतम् । यच्चापि दीयते दानं किं तद्दानस्य लक्षणम्

nānājātiviśeṣāṇāṁ paśūnāṁ ghātanaṁ smṛtam yaccāpi dīyate dānaṁ kiṁ taddānasya lakṣaṇam

अनेक जातियों के पशुओं का वध ही स्मृत है। और जो दान दिया जाता है, उस दान का लक्षण भी क्या है?

श्लोक 38 (padma.2.37.38)

ज्ञेयं तदन्नमुच्छिष्टं क्रियते भूरिभोजनम् । अत्यंतदोषहीनांस्तान्हिंसंति यन्महामखे

jñeyaṁ tadannamucchiṣṭaṁ kriyate bhūribhojanam atyaṁtadoṣahīnāṁstānhiṁsaṁti yanmahāmakhe

वह तो उच्छिष्ट अन्न ही जानना चाहिए, बड़ा भोज कर लिया जाता है; उस महायज्ञ में अत्यंत निर्दोष प्राणियों की ही हिंसा की जाती है।

श्लोक 39 (padma.2.37.39)

तत्र किं दृश्यते धर्मः किं फलं तत्र भूपते । पशूनां मारणं यत्र निर्दिष्टं वेदपंडितैः

tatra kiṁ dṛśyate dharmaḥ kiṁ phalaṁ tatra bhūpate paśūnāṁ māraṇaṁ yatra nirdiṣṭaṁ vedapaṁḍitaiḥ

तब वहाँ धर्म कहाँ दिखाई देता है, और उसका फल क्या है, हे भूपते, जहाँ वेदपंडितों द्वारा ही पशुओं का वध निर्दिष्ट किया गया है?

श्लोक 40 (padma.2.37.40)

तस्माद्विनष्टधर्मं च न पुण्यं मोक्षदायकम् । दयां विना हि यो धर्मः स धर्मो विफलायते

tasmādvinaṣṭadharmaṁ ca na puṇyaṁ mokṣadāyakam dayāṁ vinā hi yo dharmaḥ sa dharmo viphalāyate

इसलिए वह धर्म नष्ट हो चुका है, वह मोक्ष देने वाला पुण्य नहीं है; दया के बिना जो भी धर्म है, वह धर्म निष्फल हो जाता है।

श्लोक 41 (padma.2.37.41)

जीवानां पालनं यत्र तत्र धर्मो न संशयः । स्वाहाकारः स्वधाकारस्तपः सत्यं नृपोत्तम

jīvānāṁ pālanaṁ yatra tatra dharmo na saṁśayaḥ svāhākāraḥ svadhākārastapaḥ satyaṁ nṛpottama

जहाँ प्राणियों का पालन होता है, वहीं धर्म है, इसमें संदेह नहीं। स्वाहाकार, स्वधाकार, तप और सत्य, हे नृपोत्तम -

श्लोक 42 (padma.2.37.42)

दयाहीनं चापलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि । एते वेदा न वेदाः स्युर्दया यत्र न विद्यते

dayāhīnaṁ cāpalaṁ syānnāsti dharmastu tatra hi ete vedā na vedāḥ syurdayā yatra na vidyate

- ये दया के बिना केवल चंचलता ही रह जाते हैं, उनमें धर्म कुछ भी नहीं है। ये वेद, वेद नहीं हैं जहाँ दया विद्यमान नहीं है।

श्लोक 43 (padma.2.37.43)

दयादानपरो नित्यं जीवमेव प्ररक्षयेत् । चांडालोऽप्यथ शूद्रो वा स वै ब्राह्मण उच्यते

dayādānaparo nityaṁ jīvameva prarakṣayet cāṁḍālo'pyatha śūdro vā sa vai brāhmaṇa ucyate

जो सदैव दया और दान में तत्पर रहकर प्राणिमात्र की रक्षा करता है, वह चांडाल हो या शूद्र, वह सच्चा ब्राह्मण ही कहा जाता है।

श्लोक 44 (padma.2.37.44)

ब्राह्मणो निर्दयो यो वै पशुघातपरायणः । स वै सुनिर्दयः पापी कठिनः क्रूरचेतनः

brāhmaṇo nirdayo yo vai paśughātaparāyaṇaḥ sa vai sunirdayaḥ pāpī kaṭhinaḥ krūracetanaḥ

जो ब्राह्मण दयाहीन होकर पशु-वध में तत्पर रहता है, वह अत्यंत निर्दयी, पापी, कठोर और क्रूर-हृदय ही है।

श्लोक 45 (padma.2.37.45)

वंचकैः कथितो वेदो यो वेदो ज्ञानवर्जितः । यत्र ज्ञानं भवेन्नित्यं तत्र वेदः प्रतिष्ठति

vaṁcakaiḥ kathito vedo yo vedo jñānavarjitaḥ yatra jñānaṁ bhavennityaṁ tatra vedaḥ pratiṣṭhati

धूर्तों द्वारा कहा गया वेद ही ज्ञानरहित वेद है; जहाँ सदैव ज्ञान रहता है, वहीं वेद प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 46 (padma.2.37.46)

दयाहीनेषु वेदेषु विप्रेषु च महामते । नास्ति सत्यं क्रिया तत्र वेदविप्रेषु वै तदा

dayāhīneṣu vedeṣu vipreṣu ca mahāmate nāsti satyaṁ kriyā tatra vedavipreṣu vai tadā

दया से रहित वेदों में और उन ब्राह्मणों में भी, हे महामते, कोई सत्य नहीं है, कोई सच्ची क्रिया नहीं है - ऐसे वेद-ब्राह्मणों में।

श्लोक 47 (padma.2.37.47)

वेदा न वेदा राजेंद्र ब्राह्मणाः सत्यवर्जिताः । दानस्यापि फलं नास्ति तस्माद्दानं न दीयते

vedā na vedā rājeṁdra brāhmaṇāḥ satyavarjitāḥ dānasyāpi phalaṁ nāsti tasmāddānaṁ na dīyate

ये वेद, वेद नहीं हैं, हे राजेंद्र, और वे ब्राह्मण सत्य से रहित हैं; दान का भी कोई फल नहीं है, इसलिए [सच्चा] दान वहाँ नहीं दिया जाता।

श्लोक 48 (padma.2.37.48)

यथा श्राद्धस्य वै चिह्नं तथा दानस्य लक्षणम् । जिनस्यापि च यद्धर्मं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्

yathā śrāddhasya vai cihnaṁ tathā dānasya lakṣaṇam jinasyāpi ca yaddharmaṁ bhuktimuktipradāyakam

जैसा श्राद्ध का लक्षण है, वैसा ही दान का भी लक्षण है। और जिन (जैन धर्म) का जो धर्म है, जो भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है -

श्लोक 49 (padma.2.37.49)

तवाग्रेऽहं प्रवक्ष्यामि बहुपुण्यप्रदायकम् । आदौ दया प्रकर्तव्या शांतभूतेन चेतसा

tavāgre'haṁ pravakṣyāmi bahupuṇyapradāyakam ādau dayā prakartavyā śāṁtabhūtena cetasā

- वह मैं तुम्हारे समक्ष कहूँगा, जो अत्यंत पुण्य देने वाला है। सबसे पहले शांत चित्त से दया का ही आचरण करना चाहिए।

श्लोक 50 (padma.2.37.50)

आराधयेद्धृदा देवं जिनं येन चराचरम् । मनसा शुद्धभावेन जिनमेकं प्रपूजयेत्

ārādhayeddhṛdā devaṁ jinaṁ yena carācaram manasā śuddhabhāvena jinamekaṁ prapūjayet

हृदय से उस देव जिन की आराधना करनी चाहिए, जिनके द्वारा यह समस्त चराचर व्याप्त है; शुद्ध भाव से मन में केवल जिन की ही पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 51 (padma.2.37.51)

नमस्कारः प्रकर्तव्यस्तस्य देवस्य नान्यथा । मातापित्रोस्तु वै पादौ कदा नैव प्रवंदयेत्

namaskāraḥ prakartavyastasya devasya nānyathā mātāpitrostu vai pādau kadā naiva pravaṁdayet

उसी देव को ही नमस्कार करना चाहिए, अन्य किसी को नहीं। माता-पिता के चरणों में भी कभी प्रणाम नहीं करना चाहिए -

श्लोक 52 (padma.2.37.52)

अन्येषामपि का वार्ता श्रूयतां राजसत्तम । वेन उवाच- एते विप्राश्च आचार्या गंगाद्याः सरितस्तथा

anyeṣāmapi kā vārtā śrūyatāṁ rājasattama vena uvāca- ete viprāśca ācāryā gaṁgādyāḥ saritastathā

- फिर अन्य किसी की तो बात ही क्या है, हे राजसत्तम, यह सुनो।' वेन ने कहा - 'ये ब्राह्मण, आचार्यगण और गंगा आदि नदियाँ भी -

श्लोक 53 (padma.2.37.53)

वदंति पुण्यतीर्थानि बहुपुण्यप्रदानि च । तत्किं वदस्व सत्यं मे यदि धर्ममिहेच्छसि

vadaṁti puṇyatīrthāni bahupuṇyapradāni ca tatkiṁ vadasva satyaṁ me yadi dharmamihecchasi

ये सब पुण्यतीर्थों को बहुत पुण्य देने वाला कहते हैं। यदि आप यहाँ धर्म की इच्छा रखते हैं तो मुझे सत्य बताइए, वह कैसा है?'

श्लोक 54 (padma.2.37.54)

पातक उवाच- आकाशाद्वै महाराज मेघा वर्षंति वै जलम् । भूमौ हि पर्वतेष्वेवं सर्वत्र पतिते जलम्

pātaka uvāca- ākāśādvai mahārāja meghā varṣaṁti vai jalam bhūmau hi parvateṣvevaṁ sarvatra patite jalam

पापी ने कहा - 'आकाश से ही, हे महाराज, मेघ जल बरसाते हैं; पृथ्वी पर और पर्वतों पर भी वैसे ही सर्वत्र जल गिरता है।

श्लोक 55 (padma.2.37.55)

स आप्लाव्य ततस्तिष्ठेद्दयां सर्वत्र भावयेत् । नद्यः पापप्रवाहास्तु तासु तीर्थं श्रुतं कथम्

sa āplāvya tatastiṣṭheddayāṁ sarvatra bhāvayet nadyaḥ pāpapravāhāstu tāsu tīrthaṁ śrutaṁ katham

वह भरकर वहीं ठहर जाता है, [उसके प्रति] सर्वत्र दया का भाव रखना चाहिए; नदियाँ तो पाप की धाराएँ हैं, फिर उनमें तीर्थ कैसे कहा गया?

श्लोक 56 (padma.2.37.56)

जलाशया महाराज तडागाः सागरास्तथा । पृथिव्याधारकाश्चैव गिरयो अश्मराशयः

jalāśayā mahārāja taḍāgāḥ sāgarāstathā pṛthivyādhārakāścaiva girayo aśmarāśayaḥ

जलाशय, हे महाराज, तालाब और समुद्र भी, पृथ्वी पर स्थित पर्वत और पत्थरों के ढेर -

श्लोक 57 (padma.2.37.57)

नास्त्येतेषु च वै तीर्थं जलैर्जलदमुत्तमम् । स्नाने यदा महत्पुण्यं कस्मान्मत्स्येषु वै नहि

nāstyeteṣu ca vai tīrthaṁ jalairjaladamuttamam snāne yadā mahatpuṇyaṁ kasmānmatsyeṣu vai nahi

- इनमें कहीं भी कोई तीर्थ नहीं है; जलों में मेघ का जल ही सर्वश्रेष्ठ होता है। जब स्नान में इतना बड़ा पुण्य है, तो मछलियों में वह क्यों नहीं है?

श्लोक 58 (padma.2.37.58)

दृष्टा स्नानेन वै सिद्धिर्मीनाः शुद्ध्यंति नान्यथा । यत्र जिनस्तत्र तीर्थं तत्र धर्मः सनातनः

dṛṣṭā snānena vai siddhirmīnāḥ śuddhyaṁti nānyathā yatra jinastatra tīrthaṁ tatra dharmaḥ sanātanaḥ

स्नान से सिद्धि कभी नहीं देखी गई है, न ही मछलियाँ उससे शुद्ध होती हैं, और न ही अन्यथा। जहाँ जिन हैं, वहीं तीर्थ है, वहीं सनातन धर्म है।

श्लोक 59 (padma.2.37.59)

तपोदानादिकं सर्वं पुण्यं तत्र प्रतिष्ठितम्

tapodānādikaṁ sarvaṁ puṇyaṁ tatra pratiṣṭhitam

तप, दान आदि समस्त पुण्य वहीं प्रतिष्ठित है।

श्लोक 60 (padma.2.37.60)

एको जिनः सर्वमयो नृपेंद्र नास्त्येव धर्मं परमं हि तीर्थम् । अयं तु लाभः परमस्तु तस्माद्ध्य्यास्व नित्यं सुसुखो भविष्यसि

eko jinaḥ sarvamayo nṛpeṁdra nāstyeva dharmaṁ paramaṁ hi tīrtham ayaṁ tu lābhaḥ paramastu tasmāddhyyāsva nityaṁ susukho bhaviṣyasi

एक जिन ही सर्वव्यापी हैं, हे नृपेंद्र, इनसे बढ़कर न कोई परम धर्म है, न परम तीर्थ है। यही परम लाभ है, इसलिए तुम सदैव इसी का ध्यान करो, तुम सदा सुखी रहोगे।'

श्लोक 61 (padma.2.37.61)

विनिंद्य धर्मं सकलं सवेदं दानं सपुण्यं परयज्ञरूपम् । पापस्वभावैर्बहुबोधितो नृपस्त्वंगस्य पुत्रो भुवि तेन पापिना

viniṁdya dharmaṁ sakalaṁ savedaṁ dānaṁ sapuṇyaṁ parayajñarūpam pāpasvabhāvairbahubodhito nṛpastvaṁgasya putro bhuvi tena pāpinā

इस प्रकार वेद सहित समस्त धर्म की, दान और पुण्य की तथा उत्तम यज्ञ-रूप की निंदा करते हुए, उस पापी द्वारा बार-बार समझाए गए अंग के उस पुत्र राजा को, उस पापी ने इस पृथ्वी पर पापमय बना दिया।

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