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भूमि खण्ड · अध्याय 38

ऋषियों का शाप, निषाद तथा पृथु का जन्म एवं वेन की मुक्ति

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (padma.2.38.1)

सूत उवाच- एवं संबोधितो वेनः पापभावं गतः किल । पुरुषेण तेन जैनेन महापापेन मोहितः

sūta uvāca- evaṁ saṁbodhito venaḥ pāpabhāvaṁ gataḥ kila puruṣeṇa tena jainena mahāpāpena mohitaḥ

सूत जी ने कहा - इस प्रकार उपदेश दिए जाने पर वेन उस जैन पुरुष के महापाप से मोहित होकर वस्तुतः पापभाव को प्राप्त हो गया।

श्लोक 2 (padma.2.38.2)

नमस्कृत्य ततः पादौ तस्यैव च दुरात्मनः । वेदधर्मं परित्यज्य सत्यधर्मादिकां क्रियाम्

namaskṛtya tataḥ pādau tasyaiva ca durātmanaḥ vedadharmaṁ parityajya satyadharmādikāṁ kriyām

उस दुरात्मा के ही चरणों में प्रणाम करके, उसने वेद-धर्म को त्यागकर सत्य-धर्म आदि की समस्त क्रियाओं को भी त्याग दिया।

श्लोक 3 (padma.2.38.3)

सुयज्ञानां निवृत्तिः स्याद्वेदानां हितथैव च । पुण्यशास्त्रमयो धर्मस्तदा नैव प्रवर्तितः

suyajñānāṁ nivṛttiḥ syādvedānāṁ hitathaiva ca puṇyaśāstramayo dharmastadā naiva pravartitaḥ

उत्तम यज्ञों की समाप्ति हो गई, और वेदों की भी वैसे ही; पुण्यशास्त्रमय धर्म तब कहीं भी प्रचलित नहीं रहा।

श्लोक 4 (padma.2.38.4)

सर्वपापमयो लोकः संजातस्तस्य शासनात् । नैव यागाश्च वेदाश्च धर्मशास्त्रार्थमुत्तमम्

sarvapāpamayo lokaḥ saṁjātastasya śāsanāt naiva yāgāśca vedāśca dharmaśāstrārthamuttamam

उसके शासन से समस्त लोक पूर्णतः पापमय हो गया; न यज्ञ रहे, न वेद रहे, न धर्मशास्त्र का उत्तम अर्थ रहा,

श्लोक 5 (padma.2.38.5)

न दानाध्ययनं विप्रास्तस्मिञ्छासति पार्थिवे । एवं धर्मप्रलोपोभून्महत्पापं प्रवर्तितम्

na dānādhyayanaṁ viprāstasmiñchāsati pārthive evaṁ dharmapralopobhūnmahatpāpaṁ pravartitam

न दान रहा, न अध्ययन, हे विप्रो, जब तक वह राजा शासन करता रहा; इस प्रकार धर्म का यह लोप हुआ और महापाप प्रचलित हो गया।

श्लोक 6 (padma.2.38.6)

अंगेन वार्यमाणस्तु अन्यथा कुरुते भृशम् । न ननाम पितुः पादौ मातुश्चैव दुरात्मवान्

aṁgena vāryamāṇastu anyathā kurute bhṛśam na nanāma pituḥ pādau mātuścaiva durātmavān

अंग द्वारा रोके जाने पर भी वह और भी अधिक विपरीत आचरण करता था; उस दुरात्मा ने पिता और माता, दोनों के चरणों में कभी प्रणाम नहीं किया।

श्लोक 7 (padma.2.38.7)

सनकस्यापि विप्रस्य अहमेकः प्रतापवान् । पित्रा निवार्यमाणश्च मात्रा चैव दुरात्मवान्

sanakasyāpi viprasya ahamekaḥ pratāpavān pitrā nivāryamāṇaśca mātrā caiva durātmavān

'सनक जैसे विप्र से भी बढ़कर, मैं अकेला ही प्रतापी हूँ' - पिता और माता दोनों द्वारा रोके जाने पर भी वह दुरात्मा -

श्लोक 8 (padma.2.38.8)

न करोति शुभं पुण्यं तीर्थदानादिकं कदा । आत्मभावानुरूपं च बहुकालं महायशाः

na karoti śubhaṁ puṇyaṁ tīrthadānādikaṁ kadā ātmabhāvānurūpaṁ ca bahukālaṁ mahāyaśāḥ

कभी कोई शुभ पुण्य, तीर्थ या दान नहीं करता था; अपने ही अहंकार के अनुरूप वह महायशस्वी दीर्घकाल तक ऐसा ही करता रहा।

श्लोक 9 (padma.2.38.9)

पुनः सर्वैर्विचार्यैवं कस्मात्पापी व्यजायत । अंगप्रजापतेः पुत्रो वंशलाञ्छनमागतः

punaḥ sarvairvicāryaivaṁ kasmātpāpī vyajāyata aṁgaprajāpateḥ putro vaṁśalāñchanamāgataḥ

तब सबने मिलकर पुनः यह विचार किया - 'यह पापी कैसे उत्पन्न हुआ? प्रजापति अंग का यह पुत्र अपने ही वंश पर कलंक बनकर आया है।'

श्लोक 10 (padma.2.38.10)

पुनः पप्रच्छ धर्मात्मा सुतां मृत्योर्महात्मनः । कस्य दोषात्समुत्पन्नो वद सत्यं मम प्रिये

punaḥ papraccha dharmātmā sutāṁ mṛtyormahātmanaḥ kasya doṣātsamutpanno vada satyaṁ mama priye

तब धर्मात्मा ने पुनः महात्मा मृत्यु की उस पुत्री से पूछा - 'यह किसके दोष से उत्पन्न हुआ है? हे प्रिये, मुझे सत्य बताओ।'

श्लोक 11 (padma.2.38.11)

सुनीथोवाच- पूर्वमेव स्ववृत्तांतमात्मपुण्यं च नंदिनी । समाचष्ट च अंगाय मम दोषान्महामते

sunīthovāca- pūrvameva svavṛttāṁtamātmapuṇyaṁ ca naṁdinī samācaṣṭa ca aṁgāya mama doṣānmahāmate

सुनीथा ने कहा - हे पुत्र, पहले ही मैंने अंग को अपना समस्त वृत्तांत और अपना पुण्य-अपुण्य, अपने ही दोष, हे महामते, बता दिया था।

श्लोक 12 (padma.2.38.12)

बाल्ये कृतं मया पापं सुशंखस्य महात्मनः । तपसि संस्थितस्यापि नान्यत्किंचित्कृतं मया

bālye kṛtaṁ mayā pāpaṁ suśaṁkhasya mahātmanaḥ tapasi saṁsthitasyāpi nānyatkiṁcitkṛtaṁ mayā

बचपन में तप में स्थित उस महात्मा सुशंख के प्रति मैंने ही एक पाप किया था; उसके अतिरिक्त मैंने और कुछ नहीं किया।

श्लोक 13 (padma.2.38.13)

शप्ताहं कुप्यता तेन दुष्टा ते संततिर्भवेत् । इति जाने महाभाग तेनायं दुष्टतां गतः

śaptāhaṁ kupyatā tena duṣṭā te saṁtatirbhavet iti jāne mahābhāga tenāyaṁ duṣṭatāṁ gataḥ

क्रोधित होकर उसने मुझे शाप दिया - 'तेरी संतान दुष्ट हो जाएगी।' इसीलिए, हे महाभाग, मैं जानती हूँ कि यह उसी कारण दुष्टता को प्राप्त हुआ है।

श्लोक 14 (padma.2.38.14)

समाकर्ण्य महातेजास्तया सह वनं ययौ । गते तस्मिन्महाभागे सभार्ये च वने तदा

samākarṇya mahātejāstayā saha vanaṁ yayau gate tasminmahābhāge sabhārye ca vane tadā

यह सुनकर वह महातेजस्वी उसके साथ ही वन को चला गया। जब वह महाभाग्यशाली अपनी पत्नी सहित वन को चला गया,

श्लोक 15 (padma.2.38.15)

सप्तैते ऋषयस्तत्र वेनपार्श्वं गतास्तथा । समाहूय ततः प्रोचुरंगस्य तनयं प्रति

saptaite ṛṣayastatra venapārśvaṁ gatāstathā samāhūya tataḥ procuraṁgasya tanayaṁ prati

तब वे सातों ऋषि वेन के पास गए; उन्होंने उसे बुलाकर अंग के उस पुत्र से यह कहा -

श्लोक 16 (padma.2.38.16)

ऋषय ऊचुः- मा वेन साहसं कार्षीःप्रजापालो भवानिह । त्वया सर्वमिदं लोकं त्रैलोक्यं सचराचरम्

ṛṣaya ūcuḥ- mā vena sāhasaṁ kārṣīḥprajāpālo bhavāniha tvayā sarvamidaṁ lokaṁ trailokyaṁ sacarācaram

ऋषियों ने कहा - 'हे वेन, तुम कोई साहसिक कार्य मत करो; तुम यहाँ प्रजा के पालक हो। तुम्हीं पर यह समस्त लोक, चराचर सहित तीनों लोक -

श्लोक 17 (padma.2.38.17)

धर्मे चैव महाभाग सकलं हि प्रतिष्ठितम् । पापकर्मपरित्यज्य पुण्यं कर्म समाचर

dharme caiva mahābhāga sakalaṁ hi pratiṣṭhitam pāpakarmaparityajya puṇyaṁ karma samācara

- हे महाभाग, धर्म में ही पूर्णतः प्रतिष्ठित है। पापकर्म को त्यागकर पुण्यमय कर्म का ही आचरण करो।'

श्लोक 18 (padma.2.38.18)

एवमुक्तेषु तेष्वेव प्रहसन्वाक्यमब्रवीत् । वेन उवाच- अहमेव परो धर्मोऽहमेवार्हः सनातनः

evamukteṣu teṣveva prahasanvākyamabravīt vena uvāca- ahameva paro dharmo'hamevārhaḥ sanātanaḥ

इस प्रकार कहे जाने पर वह हँसते हुए यह वचन बोला। वेन ने कहा - 'मैं ही परम धर्म हूँ, मैं ही सनातन पूज्य हूँ।

श्लोक 19 (padma.2.38.19)

अहं धाता अहं गोप्ता अहं वेदार्थ एव च । अहं धर्मो महापुण्यो जैनधर्मः सनातनः

ahaṁ dhātā ahaṁ goptā ahaṁ vedārtha eva ca ahaṁ dharmo mahāpuṇyo jainadharmaḥ sanātanaḥ

मैं ही विधाता हूँ, मैं ही रक्षक हूँ, मैं ही वेदों का अर्थ हूँ; मैं ही महापुण्यमय धर्म हूँ, मैं ही सनातन जैनधर्म हूँ।

श्लोक 20 (padma.2.38.20)

मामेव कर्मणा विप्रा भजध्वं धर्मरूपिणम् । ऋषय उचुः- ब्राह्मणाः क्षत्त्रिया वैश्यास्त्रयोवर्णा द्विजातयः

māmeva karmaṇā viprā bhajadhvaṁ dharmarūpiṇam ṛṣaya ucuḥ- brāhmaṇāḥ kṣattriyā vaiśyāstrayovarṇā dvijātayaḥ

मुझे ही अपने कर्मों से भजो, हे विप्रो, मुझे ही जो धर्म का साक्षात् रूप हूँ।' ऋषियों ने कहा - 'ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - ये तीन द्विजाति वर्ण -

श्लोक 21 (padma.2.38.21)

सर्वेषामेव वर्णानां श्रुतिरेषा सनातनी । वेदाचारेण वर्तंते तेन जीवंति जंतवः

sarveṣāmeva varṇānāṁ śrutireṣā sanātanī vedācāreṇa vartaṁte tena jīvaṁti jaṁtavaḥ

- इन समस्त वर्णों के लिए यही सनातन श्रुति है; वेदाचार से ही सब चलते हैं, इसी से प्राणी जीवित रहते हैं।

श्लोक 22 (padma.2.38.22)

ब्रह्मवंशात्समुद्भूतो भवान्ब्राह्मण एव च । पश्चाद्राजा पृथिव्याश्च संजातः कृतविक्रमः

brahmavaṁśātsamudbhūto bhavānbrāhmaṇa eva ca paścādrājā pṛthivyāśca saṁjātaḥ kṛtavikramaḥ

आप ब्रह्मा के वंश से उत्पन्न, स्वयं ब्राह्मण ही हैं; बाद में पराक्रम करके पृथ्वी के राजा बने हैं।

श्लोक 23 (padma.2.38.23)

राजपुण्येन राजेंद्र सुखं जीवंति वै द्विजाः । राज्ञः पापेन नश्यंति तस्मात्पुण्यं समाचर

rājapuṇyena rājeṁdra sukhaṁ jīvaṁti vai dvijāḥ rājñaḥ pāpena naśyaṁti tasmātpuṇyaṁ samācara

राजा के पुण्य से ही, हे राजेंद्र, द्विजगण सुखपूर्वक जीते हैं; राजा के पाप से वे नष्ट हो जाते हैं, इसलिए पुण्य का ही आचरण करो।

श्लोक 24 (padma.2.38.24)

समादृतस्त्वया धर्मः कृतश्चापि नराधिप । त्रेतायुगस्य कर्मापि द्वापरस्य तथा नहि

samādṛtastvayā dharmaḥ kṛtaścāpi narādhipa tretāyugasya karmāpi dvāparasya tathā nahi

आपने धर्म का ही आदर किया है और उसी का आचरण भी किया है, त्रेतायुग के कर्म के समान - द्वापर के समान तो नहीं।

श्लोक 25 (padma.2.38.25)

कलेश्चैव प्रवेशं तु वर्त्तयिष्यंति मानवाः । जैनधर्मं समाश्रित्य सर्वे पापप्रमोहिताः

kaleścaiva praveśaṁ tu varttayiṣyaṁti mānavāḥ jainadharmaṁ samāśritya sarve pāpapramohitāḥ

मनुष्य कलियुग का प्रवेश भी कराएँगे; जैन धर्म का आश्रय लेकर सभी पाप से मोहित हो जाएँगे।

श्लोक 26 (padma.2.38.26)

वेदाचारं परित्यज्य पापं यास्यंति मानवाः । पापस्य मूलमेवं वै जैनधर्मं न संशयः

vedācāraṁ parityajya pāpaṁ yāsyaṁti mānavāḥ pāpasya mūlamevaṁ vai jainadharmaṁ na saṁśayaḥ

वेदाचार को त्यागकर मनुष्य पाप की ओर चले जाएँगे; इसमें संदेह नहीं कि जैन धर्म ही पाप का मूल है।

श्लोक 27 (padma.2.38.27)

अनेन मुग्धा राजेंद्र महामोहेन पातिताः । मानवाः पापसंघातास्तेषां नाशाय नान्यथा

anena mugdhā rājeṁdra mahāmohena pātitāḥ mānavāḥ pāpasaṁghātāsteṣāṁ nāśāya nānyathā

हे राजेंद्र, इससे मोहित होकर, इस महामोह से गिराए गए मनुष्य पाप के समूह बन जाएँगे; उनके विनाश के लिए ही -

श्लोक 28 (padma.2.38.28)

भविष्यत्येव गोविंदः सर्वपापापहारकः । स्वेच्छारूपं समासाद्य संहरिष्यति पातकात्

bhaviṣyatyeva goviṁdaḥ sarvapāpāpahārakaḥ svecchārūpaṁ samāsādya saṁhariṣyati pātakāt

- गोविंद ही, समस्त पाप का नाश करने वाले, स्वयं अवतरित होंगे; अपनी इच्छा से रूप धारण कर वे उस पाप का संहार करेंगे।

श्लोक 29 (padma.2.38.29)

पापेषु संगतेष्वेवं म्लेच्छनाशाय वै पुनः । कल्किरेव स्वयं देवो भविष्यति न संशयः

pāpeṣu saṁgateṣvevaṁ mlecchanāśāya vai punaḥ kalkireva svayaṁ devo bhaviṣyati na saṁśayaḥ

पाप के इस प्रकार एकत्र होने पर, म्लेच्छों के विनाश के लिए फिर से, स्वयं कल्कि देव ही अवतरित होंगे, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 30 (padma.2.38.30)

व्यवहारं कलेश्चैव त्यज पुण्यं समाश्रय । वर्तयस्व हि सत्येन प्रजापालो भवस्व हि

vyavahāraṁ kaleścaiva tyaja puṇyaṁ samāśraya vartayasva hi satyena prajāpālo bhavasva hi

कलियुग के आचरण को त्याग दो और पुण्य का आश्रय लो; सत्य का पालन करो और प्रजा के पालक ही बने रहो।'

श्लोक 31 (padma.2.38.31)

वेन उवाच- अहं ज्ञानवतां श्रेष्ठः सर्वं ज्ञातं मया इह । योऽन्यथा वर्तते चैव स दंड्यो भवति ध्रुवम्

vena uvāca- ahaṁ jñānavatāṁ śreṣṭhaḥ sarvaṁ jñātaṁ mayā iha yo'nyathā vartate caiva sa daṁḍyo bhavati dhruvam

वेन ने कहा - 'मैं ही ज्ञानवानों में श्रेष्ठ हूँ, मैंने यहाँ सब कुछ जान लिया है। जो कोई अन्यथा आचरण करता है, वह अवश्य ही दंड का भागी होगा।'

श्लोक 32 (padma.2.38.32)

अत्यर्थं भाषमाणं तं राजानं पापचेतनम् । कुपितास्ते महात्मानः सर्वे वै ब्रह्मणः सुताः

atyarthaṁ bhāṣamāṇaṁ taṁ rājānaṁ pāpacetanam kupitāste mahātmānaḥ sarve vai brahmaṇaḥ sutāḥ

पापचित्त उस राजा को इस प्रकार अत्यंत [अहंकारपूर्ण] बोलते देखकर, ब्रह्मा के वे सभी महात्मा पुत्र क्रोधित हो उठे।

श्लोक 33 (padma.2.38.33)

कुपितेष्वेव विप्रेषु वेनो राजा महात्मसु । ब्रह्मशापभयात्तेषां वल्मीकं प्रविवेश ह

kupiteṣveva vipreṣu veno rājā mahātmasu brahmaśāpabhayātteṣāṁ valmīkaṁ praviveśa ha

उन महात्मा विप्रों के क्रोधित हो जाने पर, राजा वेन ब्रह्मशाप के भय से एक वल्मीक (दीमक के टीले) में जा घुसा।

श्लोक 34 (padma.2.38.34)

अथ ते मुनयः क्रुद्धा वेनं पश्यंति सर्वतः । ज्ञात्वा प्रनष्टं भूपं तं वल्मीकस्थं सुसांप्रतम्

atha te munayaḥ kruddhā venaṁ paśyaṁti sarvataḥ jñātvā pranaṣṭaṁ bhūpaṁ taṁ valmīkasthaṁ susāṁpratam

तब वे क्रुद्ध मुनि सब ओर वेन को खोजने लगे; उस लुप्त हुए राजा को उसी क्षण उस वल्मीक में स्थित जानकर,

श्लोक 35 (padma.2.38.35)

बलादानिन्युस्तं विप्राः क्रूरं तं पापचेतनम् । दृष्ट्वा च पापकर्माणं मुनयः सुसमाहिताः

balādāninyustaṁ viprāḥ krūraṁ taṁ pāpacetanam dṛṣṭvā ca pāpakarmāṇaṁ munayaḥ susamāhitāḥ

उन विप्रों ने उस क्रूर, पापचित्त राजा को बलपूर्वक बाहर निकाला। उस पापकर्मा को देखकर, वे सुसमाहित मुनि -

श्लोक 36 (padma.2.38.36)

सव्यं पाणिं ममंथुस्ते भूपस्य जातमन्यवः । तस्माज्जातो महाह्रस्वो नीलवर्णो भयंकरः

savyaṁ pāṇiṁ mamaṁthuste bhūpasya jātamanyavaḥ tasmājjāto mahāhrasvo nīlavarṇo bhayaṁkaraḥ

- क्रोधित होकर उन्होंने उस राजा के बाएँ हाथ का मंथन किया। उससे एक अत्यंत नाटा, नीले वर्ण का, भयंकर पुरुष उत्पन्न हुआ,

श्लोक 37 (padma.2.38.37)

बर्बरो रक्तनेत्रस्तु बाणपाणिर्धनुर्द्धरः । सर्वेषामेव पापानां निषादानां बभूव ह

barbaro raktanetrastu bāṇapāṇirdhanurddharaḥ sarveṣāmeva pāpānāṁ niṣādānāṁ babhūva ha

बर्बर, लाल नेत्रों वाला, हाथ में बाण और धनुष धारण किए हुए - वह समस्त पापी निषादों का -

श्लोक 38 (padma.2.38.38)

धाता पालयिता राजा म्लेच्छानां तु विशेषतः । तं दृष्ट्वा पापकर्माणमृषयस्तु महामते

dhātā pālayitā rājā mlecchānāṁ tu viśeṣataḥ taṁ dṛṣṭvā pāpakarmāṇamṛṣayastu mahāmate

- उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता और विशेष रूप से म्लेच्छों का राजा बना। उस पापकर्मा को देखकर, हे महामते, उन ऋषियों ने -

श्लोक 39 (padma.2.38.39)

ममंथुर्दक्षिणं पाणिं वेनस्यापि महात्मनः । तस्माज्जातो महात्मा स येन दुग्धा वसुंधरा

mamaṁthurdakṣiṇaṁ pāṇiṁ venasyāpi mahātmanaḥ tasmājjāto mahātmā sa yena dugdhā vasuṁdharā

- उस महात्मा वेन के दाहिने हाथ का भी मंथन किया। उससे वह महात्मा उत्पन्न हुआ जिसने पृथ्वी का दोहन किया -

श्लोक 40 (padma.2.38.40)

पृथुर्नाम महाप्राज्ञो राजराजो महाबलः । तस्य पुण्यप्रसादाच्च वेनो धर्मार्थकोविदः

pṛthurnāma mahāprājño rājarājo mahābalaḥ tasya puṇyaprasādācca veno dharmārthakovidaḥ

- वह महाप्राज्ञ, महाबली राजाओं का राजा, पृथु नाम से विख्यात हुआ। उसी के पुण्य-प्रसाद से, धर्म और अर्थ में निपुण वेन,

श्लोक 41 (padma.2.38.41)

चक्रवर्तिपदं भुक्त्वा प्रसादात्तस्य चक्रिणः । जगाम वैष्णवं लोकं तद्विष्णोः परमं पदम्

cakravartipadaṁ bhuktvā prasādāttasya cakriṇaḥ jagāma vaiṣṇavaṁ lokaṁ tadviṣṇoḥ paramaṁ padam

उस चक्रवर्ती [पृथु] की ही कृपा से चक्रवर्ती-पद को भोगकर, वैष्णव लोक को, विष्णु के उसी परम पद को प्राप्त हुआ।

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