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भूमि खण्ड · अध्याय 48

उग्रसेन-पद्मावती चरित

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

श्लोक 1 (padma.2.48.1)

ब्राह्मण्युवाच- माथुरे विषये रम्ये मथुरायां नृपोत्तमः । उग्रसेनेति विख्यातो यादवः परवीरहा

brāhmaṇyuvāca- māthure viṣaye ramye mathurāyāṁ nṛpottamaḥ ugraseneti vikhyāto yādavaḥ paravīrahā

ब्राह्मणी ने कहा — मथुरा नामक रमणीय प्रदेश में, मथुरा नगरी में, उग्रसेन नामक एक श्रेष्ठ यादव नरेश थे, जो शत्रु-वीरों का नाश करने वाले थे।

श्लोक 2 (padma.2.48.2)

सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञो वेदज्ञः श्रुतवान्बली । दाता भोक्ता गुणग्राही सद्गुणान्वेत्ति भूपतिः

sarvadharmārthatattvajño vedajñaḥ śrutavānbalī dātā bhoktā guṇagrāhī sadguṇānvetti bhūpatiḥ

वे धर्म और अर्थ के तत्त्वों के ज्ञाता, वेदज्ञ, विद्वान् और बलवान् थे; दानी, भोगी, गुणग्राही और सद्गुणों को पहचानने वाले भूपति थे।

श्लोक 3 (padma.2.48.3)

राज्यं चकार मेधावी प्रजा धर्मेण पालयेत् । एवं स च महातेजा उग्रसेनः प्रतापवान्

rājyaṁ cakāra medhāvī prajā dharmeṇa pālayet evaṁ sa ca mahātejā ugrasenaḥ pratāpavān

वह बुद्धिमान राजा राज्य करते हुए धर्म से प्रजा का पालन करता था; इस प्रकार वह महातेजस्वी, प्रतापी उग्रसेन था।

श्लोक 4 (padma.2.48.4)

वैदर्भे विषये पुण्ये सत्यकेतुः प्रतापवान् । तस्य कन्या महाभागा पद्माक्षी कमलानना

vaidarbhe viṣaye puṇye satyaketuḥ pratāpavān tasya kanyā mahābhāgā padmākṣī kamalānanā

पुण्यमय विदर्भ प्रदेश में प्रतापी राजा सत्यकेतु थे; उनकी पुत्री महाभागा, कमल के समान नेत्रों और मुख वाली थी।

श्लोक 5 (padma.2.48.5)

नाम्ना पद्मावती नाम सत्यधर्मपरायणा । सा तु स्त्रीणां गुणैर्युक्ता द्वितीयेव समुद्रजा

nāmnā padmāvatī nāma satyadharmaparāyaṇā sā tu strīṇāṁ guṇairyuktā dvitīyeva samudrajā

उसका नाम पद्मावती था, वह सत्य और धर्म में परायण थी; स्त्रियोचित गुणों से युक्त वह मानो दूसरी समुद्रजा (लक्ष्मी) थी।

श्लोक 6 (padma.2.48.6)

वैदर्भी शुशुभे राजन्स्वगुणैः सत्यकारणैः । माथुर उग्रसेनस्तु उपयेमे सुलोचनाम्

vaidarbhī śuśubhe rājansvaguṇaiḥ satyakāraṇaiḥ māthura ugrasenastu upayeme sulocanām

हे राजन्! वह वैदर्भी राजकुमारी अपने सत्यनिष्ठ गुणों से सुशोभित होती थी; मथुरा के उग्रसेन ने उस सुलोचना से विवाह किया।

श्लोक 7 (padma.2.48.7)

तया सह महाभाग सुखं रेमे प्रतापवान् । अतिप्रीतो गुणैस्तस्यास्तया सह सुखीभवेत्

tayā saha mahābhāga sukhaṁ reme pratāpavān atiprīto guṇaistasyāstayā saha sukhībhavet

हे महाभाग! उसके साथ वह प्रतापी राजा सुखपूर्वक रमण करता था; उसके गुणों से अत्यंत प्रसन्न होकर वह उसके साथ सुखी रहता था।

श्लोक 8 (padma.2.48.8)

तस्याः स्नेहेन प्रीत्या च संमुग्धो माथुरेश्वरः । पद्मावती महाभागा तस्य प्राणप्रियाभवत्

tasyāḥ snehena prītyā ca saṁmugdho māthureśvaraḥ padmāvatī mahābhāgā tasya prāṇapriyābhavat

मथुरेश्वर उसके स्नेह और प्रेम से पूर्णतः मुग्ध हो गए थे; और महाभागा पद्मावती उनके प्राणों के समान प्रिय हो गई थी।

श्लोक 9 (padma.2.48.9)

तया विना न बुभुजे तया सह प्रक्रीडयेत् । तया विना न सेवेत परमं सुखमेव सः

tayā vinā na bubhuje tayā saha prakrīḍayet tayā vinā na seveta paramaṁ sukhameva saḥ

वह उसके बिना भोजन नहीं करते थे; उसके साथ ही क्रीड़ा करते थे; उसके बिना वे परम सुख का भी सेवन नहीं करते थे।

श्लोक 10 (padma.2.48.10)

एवं प्रीतिकरौ जातौ परस्परमनुत्तमौ । स्नेहवंतौ द्विजश्रेष्ठ सुखसंप्रीतिदायकौ

evaṁ prītikarau jātau parasparamanuttamau snehavaṁtau dvijaśreṣṭha sukhasaṁprītidāyakau

हे द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार वे दोनों परस्पर अनुपम प्रेमी बन गए, स्नेहयुक्त, एक-दूसरे को सुख और प्रीति देने वाले।

श्लोक 11 (padma.2.48.11)

सत्यकेतुश्च राजेंद्रः सस्मार स पद्मावतीम् । स्वसुतां तां महाभागो माता तस्याः सुदुःखिता

satyaketuśca rājeṁdraḥ sasmāra sa padmāvatīm svasutāṁ tāṁ mahābhāgo mātā tasyāḥ suduḥkhitā

राजेंद्र सत्यकेतु को अपनी उस महाभागा पुत्री पद्मावती की याद आने लगी; और उसकी माता भी अत्यंत दुःखी हो उठी।

श्लोक 12 (padma.2.48.12)

स दूतान्प्रेषयामास वैदर्भो मथुरां प्रति । उग्रसेनं नृवीरेंद्रं सादरेण द्विजोत्तम

sa dūtānpreṣayāmāsa vaidarbho mathurāṁ prati ugrasenaṁ nṛvīreṁdraṁ sādareṇa dvijottama

हे द्विजोत्तम! विदर्भराज ने आदरपूर्वक मथुरा की ओर, नृवीरेंद्र उग्रसेन के पास दूत भेजे।

श्लोक 13 (padma.2.48.13)

उग्रसेनं महाराजं स दूतो वाक्यमब्रवीत् । विदर्भाधिपतिर्वीरो भक्त्या स्नेहेन नंदयन्

ugrasenaṁ mahārājaṁ sa dūto vākyamabravīt vidarbhādhipatirvīro bhaktyā snehena naṁdayan

उस दूत ने महाराज उग्रसेन से यह वचन कहा, भक्तिपूर्वक, वीर विदर्भाधिपति के स्नेह से उन्हें प्रसन्न करते हुए —

श्लोक 14 (padma.2.48.14)

आत्मनः कुशलं ब्रूते भवतां परिपृच्छति । सत्यकेतुर्महाराज त्वामेवं परिपृष्टवान्

ātmanaḥ kuśalaṁ brūte bhavatāṁ paripṛcchati satyaketurmahārāja tvāmevaṁ paripṛṣṭavān

'वे अपनी कुशलता कहलाते हैं और आपकी कुशलता पूछते हैं। हे महाराज! सत्यकेतु ने आपसे इस प्रकार पूछा है —'

श्लोक 15 (padma.2.48.15)

दर्शनाय प्रेषयस्व सुतां पद्मावतीं मम । यदि त्वं मन्यसे नाथ प्रीतिस्नेहं हितस्य च

darśanāya preṣayasva sutāṁ padmāvatīṁ mama yadi tvaṁ manyase nātha prītisnehaṁ hitasya ca

'—"मेरी पुत्री पद्मावती को दर्शन के लिए भेज दीजिए, यदि आप, हे नाथ! स्नेह-प्रेम तथा उसके हित को मानते हों।"'

श्लोक 16 (padma.2.48.16)

प्रेषयस्व महाभागां प्रियां प्रीतिकरां तव । औत्कण्ठ्येन महाराज स सोत्कंठेन वर्तते

preṣayasva mahābhāgāṁ priyāṁ prītikarāṁ tava autkaṇṭhyena mahārāja sa sotkaṁṭhena vartate

'"उस महाभागा, आपकी प्रिय और प्रीतिदायिनी को भेज दीजिए। हे महाराज! वे अत्यंत उत्कंठा से प्रतीक्षा कर रहे हैं।"'

श्लोक 17 (padma.2.48.17)

समाकर्ण्य ततो वाक्यमुग्रसेनो नृपोत्तमः । प्रीत्या स्नेहेन तस्यापि सत्यकेतोर्महात्मनः

samākarṇya tato vākyamugraseno nṛpottamaḥ prītyā snehena tasyāpi satyaketormahātmanaḥ

यह वचन सुनकर नृपोत्तम उग्रसेन ने, उस महात्मा सत्यकेतु के प्रति प्रेम और स्नेह से —

श्लोक 18 (padma.2.48.18)

दाक्षिण्येन च विप्रेंद्र प्रेषयामास भूपतिः । पद्मावतीं प्रियां भार्यामुग्रसेनः प्रतापवान्

dākṣiṇyena ca vipreṁdra preṣayāmāsa bhūpatiḥ padmāvatīṁ priyāṁ bhāryāmugrasenaḥ pratāpavān

—हे विप्रेंद्र! शिष्टाचारवश प्रतापी राजा उग्रसेन ने अपनी प्रिय पत्नी पद्मावती को भेज दिया।

श्लोक 19 (padma.2.48.19)

प्रेषितानेन राजेंद्र गता पद्मावती स्वकम् । पूर्वं गृहं सती सा तु महाहर्षेण संकुला

preṣitānena rājeṁdra gatā padmāvatī svakam pūrvaṁ gṛhaṁ satī sā tu mahāharṣeṇa saṁkulā

हे राजेंद्र! इस प्रकार भेजी गई वह सती पद्मावती अपने पूर्व घर को गई, अत्यंत हर्ष से भरी हुई।

श्लोक 20 (padma.2.48.20)

पितृपूर्वं कुटुंबं तु ददृशे चारुमंगला । पितुः पादौ ननामाथ शिरसा सत्यतत्परा

pitṛpūrvaṁ kuṭuṁbaṁ tu dadṛśe cārumaṁgalā pituḥ pādau nanāmātha śirasā satyatatparā

उस चारु-मंगला ने अपने पिता के पूर्व परिवार को देखा; और सत्यनिष्ठ वह अपने सिर से पिता के चरणों में झुक गई।

श्लोक 21 (padma.2.48.21)

आगतायां महाराजा पद्मावत्यां द्विजोत्तम । हर्षेण महताविष्टो विदर्भाधिपतिर्नृपः

āgatāyāṁ mahārājā padmāvatyāṁ dvijottama harṣeṇa mahatāviṣṭo vidarbhādhipatirnṛpaḥ

हे द्विजोत्तम! जब पद्मावती वहाँ आ पहुँची, तो वह विदर्भाधिपति महाराज अत्यंत हर्ष से भर उठे।

श्लोक 22 (padma.2.48.22)

वर्द्धिता दानमानैश्च वस्त्रालंकारभूषणैः । पद्मावती सुखेनापि पितुर्गेहे प्रवर्तते

varddhitā dānamānaiśca vastrālaṁkārabhūṣaṇaiḥ padmāvatī sukhenāpi piturgehe pravartate

उसे दान-सम्मान से, वस्त्रों-आभूषणों से सुशोभित किया गया; और पद्मावती अपने पिता के घर में सुखपूर्वक रहने लगी।

श्लोक 23 (padma.2.48.23)

सखीभिः सहिता सा तु निःशंका परिवर्तते । रमते सा तदा तत्र यथापूर्वं तथैव च

sakhībhiḥ sahitā sā tu niḥśaṁkā parivartate ramate sā tadā tatra yathāpūrvaṁ tathaiva ca

अपनी सखियों के साथ वह निःशंक होकर विचरण करती थी; और वहाँ पूर्व की भाँति ही आनंद मनाती थी।

श्लोक 24 (padma.2.48.24)

गृहे वने तडागेषु प्रासादे च तथैव सा । पुनर्बालेव भूता सा निर्लज्जा संप्रवर्तते

gṛhe vane taḍāgeṣu prāsāde ca tathaiva sā punarbāleva bhūtā sā nirlajjā saṁpravartate

घर में, वन में, तालाबों में और महल में भी, वह पुनः बालिका के समान निःसंकोच होकर विचरण करने लगी।

श्लोक 25 (padma.2.48.25)

निःशंका वर्तते विप्र सखीभिः सह सर्वदा । पतिव्रता महाभागा हर्षेण महतान्विता

niḥśaṁkā vartate vipra sakhībhiḥ saha sarvadā pativratā mahābhāgā harṣeṇa mahatānvitā

हे विप्र! वह पतिव्रता महाभागा सदा अपनी सखियों के साथ निःशंक होकर रहती थी, महान हर्ष से युक्त।

श्लोक 26 (padma.2.48.26)

सुखं तु पितृगेहस्य दुर्लभं श्वशुरे गृहे । एवं ज्ञात्वा तदा रेमे कदा ईदृग्भविष्यति

sukhaṁ tu pitṛgehasya durlabhaṁ śvaśure gṛhe evaṁ jñātvā tadā reme kadā īdṛgbhaviṣyati

'पिता के घर का सुख ससुराल में दुर्लभ है' — यह जानकर वह वहाँ आनंद मनाती रही, यह सोचकर कि 'ऐसे दिन फिर कब आएँगे?'

श्लोक 27 (padma.2.48.27)

अनेन मोहभावेन क्रीडालुब्धा वरानना । सखीभिः सहिता नित्यं वनेषूपवने तदा

anena mohabhāvena krīḍālubdhā varānanā sakhībhiḥ sahitā nityaṁ vaneṣūpavane tadā

इसी मोह-भाव के कारण वह वरानना क्रीड़ा में लीन होकर, अपनी सखियों के साथ नित्य वनों और उपवनों में विचरण करने लगी।

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