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भूमि खण्ड · अध्याय 54

इंद्र-काम की दूसरी परीक्षा

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (padma.2.54.1)

विष्णुरुवाच- एवमुक्ता गता दूती तया सुकलया तदा । समासेन सुसंप्रोक्तमवधार्य पुरंदरः

viṣṇuruvāca- evamuktā gatā dūtī tayā sukalayā tadā samāsena susaṁproktamavadhārya puraṁdaraḥ

विष्णु ने कहा — इस प्रकार संबोधित होकर, सुकल द्वारा विदा की गई वह दूती चली गई; और पुरंदर (इंद्र) ने संक्षेप में कहे गए उस सब को भलीभाँति समझकर —

श्लोक 2 (padma.2.54.2)

तदर्थं भाषितं तस्याः सत्यधर्मसमन्वितम् । आलोच्य साहसं धैर्यं ज्ञानमेव पुरंदरः

tadarthaṁ bhāṣitaṁ tasyāḥ satyadharmasamanvitam ālocya sāhasaṁ dhairyaṁ jñānameva puraṁdaraḥ

—उसके सत्य-धर्म से युक्त वचनों के अर्थ पर विचार कर, पुरंदर ने उसके साहस, धैर्य और ज्ञान पर मनन किया।

श्लोक 3 (padma.2.54.3)

ईदृशं हि वदेत्का हि नारी भूत्वा महीतले । योगरूपं सुसंशिष्टं न्यायोदैः क्षालितं वचः

īdṛśaṁ hi vadetkā hi nārī bhūtvā mahītale yogarūpaṁ susaṁśiṣṭaṁ nyāyodaiḥ kṣālitaṁ vacaḥ

'इस पृथ्वी पर भला कौन-सी स्त्री ऐसे वचन बोल सकती है — योग-रूप से सुसंबद्ध, न्याय के जल से धुले हुए वचन?'

श्लोक 4 (padma.2.54.4)

पवित्रेयं महाभागा सत्यरूपा न संशयः । त्रैलोक्यस्य समस्तस्य धुरं धर्तुं भवेत्क्षमा

pavitreyaṁ mahābhāgā satyarūpā na saṁśayaḥ trailokyasya samastasya dhuraṁ dhartuṁ bhavetkṣamā

'यह महाभागा पवित्र है, सत्यरूपा है, इसमें संदेह नहीं; यह समस्त त्रैलोक्य का भार वहन करने में भी समर्थ है।'

श्लोक 5 (padma.2.54.5)

एतदर्थं विचार्यैव जिष्णुः कंदर्पमब्रवीत् । त्वया सह गमिष्यामि द्रष्टुं तां कृकलप्रियाम्

etadarthaṁ vicāryaiva jiṣṇuḥ kaṁdarpamabravīt tvayā saha gamiṣyāmi draṣṭuṁ tāṁ kṛkalapriyām

यह विचार कर जिष्णु (इंद्र) ने कंदर्प से कहा — 'मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा, कृकल की उस प्रिया को स्वयं देखने के लिए।'

श्लोक 6 (padma.2.54.6)

प्रत्युवाच सहस्राक्षं मन्मथो बलदर्पितः । गम्यतां तत्र देवेश यत्रास्ते सा पतिव्रता

pratyuvāca sahasrākṣaṁ manmatho baladarpitaḥ gamyatāṁ tatra deveśa yatrāste sā pativratā

अपने बल पर गर्वित मन्मथ ने सहस्राक्ष को उत्तर दिया — 'हे देवेश! चलिए वहाँ, जहाँ वह पतिव्रता रहती है।'

श्लोक 7 (padma.2.54.7)

मानं वीर्यं बलं धैर्यं तस्याः सत्यं पतिव्रतम् । गत्वाहं नाशयिष्यामि कियन्मात्रा सुरेश्वर

mānaṁ vīryaṁ balaṁ dhairyaṁ tasyāḥ satyaṁ pativratam gatvāhaṁ nāśayiṣyāmi kiyanmātrā sureśvara

'—उसका मान, वीर्य, बल, धैर्य, सत्य और पातिव्रत्य — वहाँ जाकर मैं इन सबको नष्ट कर दूँगा। हे सुरेश्वर! वह भला कितनी बड़ी बात है?'

श्लोक 8 (padma.2.54.8)

समाकर्ण्य सहस्राक्षो वचनं मन्मथस्य च । भो भोनंग शृणुष्व त्वमधिकं भाषितं मुधा

samākarṇya sahasrākṣo vacanaṁ manmathasya ca bho bhonaṁga śṛṇuṣva tvamadhikaṁ bhāṣitaṁ mudhā

मन्मथ के वचन सुनकर सहस्राक्ष ने कहा — 'अरे अनंग! सुनो, तुम अत्यधिक व्यर्थ ही बोल रहे हो।'

श्लोक 9 (padma.2.54.9)

सुदृढा सत्यवीर्येण सुस्थिरा धर्मकर्मभिः । सुकलेयमजेया वै तत्र ते पौरुषं नहि

sudṛḍhā satyavīryeṇa susthirā dharmakarmabhiḥ sukaleyamajeyā vai tatra te pauruṣaṁ nahi

'यह सुकल सत्य-वीर्य से अत्यंत सुदृढ़ है, धर्म-कर्मों से अत्यंत स्थिर है; यह निश्चय ही अजेय है — वहाँ तुम्हारा पौरुष कुछ नहीं कर पाएगा।'

श्लोक 10 (padma.2.54.10)

इत्याकर्ण्य ततः क्रुद्धो मन्मथस्त्विन्द्रमब्रवीत् । ऋषीणां देवतानां च बलं मया प्रणाशितम्

ityākarṇya tataḥ kruddho manmathastvindramabravīt ṛṣīṇāṁ devatānāṁ ca balaṁ mayā praṇāśitam

यह सुनकर क्रुद्ध होकर मन्मथ ने इंद्र से कहा — 'ऋषियों और देवताओं का बल भी मेरे द्वारा नष्ट किया गया है।'

श्लोक 11 (padma.2.54.11)

अस्या बलं कियन्मात्रं भवता मम कथ्यते । पश्यतस्तव देवेश नाशयिष्यामि तां स्त्रियम्

asyā balaṁ kiyanmātraṁ bhavatā mama kathyate paśyatastava deveśa nāśayiṣyāmi tāṁ striyam

'फिर भला इसका बल कितना बड़ा है, कि आप मुझसे इसकी बात कर रहे हैं? हे देवेश! आपके देखते-देखते ही मैं उस स्त्री को नष्ट कर दूँगा।'

श्लोक 12 (padma.2.54.12)

नवनीतं यथा चाग्नेस्तेजो दृष्ट्वा द्रवं व्रजेत् । तथेमां द्रावयिष्यामि स्वेन रूपेण तेजसा

navanītaṁ yathā cāgnestejo dṛṣṭvā dravaṁ vrajet tathemāṁ drāvayiṣyāmi svena rūpeṇa tejasā

'जैसे मक्खन अग्नि के तेज को देखकर पिघल जाता है, वैसे ही मैं इसे अपने रूप और तेज से पिघला दूँगा।'

श्लोक 13 (padma.2.54.13)

गच्छ तत्र महत्कार्यमुपस्थं सांप्रतं ध्रुवम् । कस्मात्कुत्ससि मे तेजस्त्रैलोक्यस्य विनाशनम्

gaccha tatra mahatkāryamupasthaṁ sāṁprataṁ dhruvam kasmātkutsasi me tejastrailokyasya vināśanam

'चलिए वहाँ, यह महान कार्य अभी हमारे सामने निश्चित रूप से खड़ा है। आप मेरे उस तेज की निंदा क्यों कर रहे हैं जो त्रैलोक्य का विनाश करने वाला है?'

श्लोक 14 (padma.2.54.14)

विष्णुरुवाच- आकर्ण्य वाक्यं तु मनोभवस्य एतामसाध्यां तव कामजाने । धैर्यं समुद्यम्य च पुण्यदेहां पुण्येन पुण्यां बहुपुण्यचाराम्

viṣṇuruvāca- ākarṇya vākyaṁ tu manobhavasya etāmasādhyāṁ tava kāmajāne dhairyaṁ samudyamya ca puṇyadehāṁ puṇyena puṇyāṁ bahupuṇyacārām

विष्णु ने कहा — मनोभव के वचन सुनकर इंद्र ने सोचा — 'हे कामदेव! मैं जानता हूँ, यह तुम्हारे वश में आने वाली नहीं है — यह पुण्य-देहा, पुण्य से पुण्या, अत्यंत पुण्याचारिणी है, जिसने अपने धैर्य को दृढ़ता से धारण किया है —'

श्लोक 15 (padma.2.54.15)

पश्यामि ते पौरुषमुग्रवीर्यमितो हि गत्वा तु धनुष्मता वै । तेनापि सार्धं प्रजगाम भूयो रत्या च दूत्या च पतिव्रतां ताम्

paśyāmi te pauruṣamugravīryamito hi gatvā tu dhanuṣmatā vai tenāpi sārdhaṁ prajagāma bhūyo ratyā ca dūtyā ca pativratāṁ tām

'—फिर भी मैं तुम्हारा पराक्रम, तुम्हारा उग्र वीर्य देखना चाहता हूँ।' यह कहकर वे वहाँ से उस धनुर्धर के साथ, रति और दूती सहित, पुनः उस पतिव्रता के पास गए।

श्लोक 16 (padma.2.54.16)

एकां सुपुण्यां स्वगृहस्थितां तां ध्यानेन पत्युश्चरणे नियुक्ताम् । यथा सुयोगी प्रविधाय चित्तं विकल्पहीनं न च कल्पयेत

ekāṁ supuṇyāṁ svagṛhasthitāṁ tāṁ dhyānena patyuścaraṇe niyuktām yathā suyogī pravidhāya cittaṁ vikalpahīnaṁ na ca kalpayeta

उन्होंने उसे अपने ही घर में अकेली पाया, अपने पति के चरणों के ध्यान में लीन, ठीक वैसे ही जैसे कोई सच्चे योगी अपने चित्त को स्थिर कर किसी प्रकार की चंचलता की कल्पना तक नहीं करते।

श्लोक 17 (padma.2.54.17)

अत्यद्भुतं रूपमनंततेजोयुतं चकाराथ सतीप्रमोहम् । नीलांचितं भोगयुतं महात्मा झषध्वजश्चैव पुरंदरश्च

atyadbhutaṁ rūpamanaṁtatejoyutaṁ cakārātha satīpramoham nīlāṁcitaṁ bhogayutaṁ mahātmā jhaṣadhvajaścaiva puraṁdaraśca

तब वह महात्मा झषध्वज (कामदेव) पुरंदर के साथ मिलकर एक अत्यंत अद्भुत, अनंत तेज से युक्त, नीलवर्ण, भोग-सम्पन्न रूप धारण कर सती को मोहित करने का प्रयत्न करने लगा।

श्लोक 18 (padma.2.54.18)

दृष्ट्वा सुलीलं पुरुषं महांतं चरंतमेवं परिकामभावम् । जाया हि वैश्यस्य महात्मनस्तु मेने न सा रूपयुतं गुणज्ञम्

dṛṣṭvā sulīlaṁ puruṣaṁ mahāṁtaṁ caraṁtamevaṁ parikāmabhāvam jāyā hi vaiśyasya mahātmanastu mene na sā rūpayutaṁ guṇajñam

उस सुंदर, महान पुरुष को इस प्रकार काम-भाव से विचरण करते देखकर, उस महात्मा वैश्य की पत्नी ने उसे रूप या गुण से युक्त मानने योग्य भी नहीं समझा।

श्लोक 19 (padma.2.54.19)

अंभो यथा पद्मदले गतं वै प्रयाति मुक्ताफलकस्य कीर्तिम् । तद्वत्स्वभावः परिसत्ययुक्तो जज्ञे च तस्यास्तु पतिव्रतायाः

aṁbho yathā padmadale gataṁ vai prayāti muktāphalakasya kīrtim tadvatsvabhāvaḥ parisatyayukto jajñe ca tasyāstu pativratāyāḥ

जैसे कमल के पत्ते पर पड़ा हुआ जलबिंदु मोती की-सी शोभा पा लेता है, वैसे ही उस पतिव्रता का सत्य से परिपूर्ण स्वभाव प्रकट हुआ।

श्लोक 20 (padma.2.54.20)

अनेन दूती परिप्रेषिता पुरा यामां युवत्या ह गुणज्ञमेनम् । लीलास्वरूपं बहुधात्मभावं ममैष सर्वं परिदर्शयेच्च

anena dūtī paripreṣitā purā yāmāṁ yuvatyā ha guṇajñamenam līlāsvarūpaṁ bahudhātmabhāvaṁ mamaiṣa sarvaṁ paridarśayecca

उसने सोचा — 'इसी ने पहले भी एक दूती भेजी थी, उस युवती (मुझ) के पास; अब यह स्वयं अपने विविध लीला-रूप और अनेक भाव मेरे सामने प्रदर्शित कर रहा है।'

श्लोक 21 (padma.2.54.21)

ममैव कालं प्रबलं विचिंत्यागतो हि मे कांतगुणैश्च सत्खलः । रत्यासमेतस्तु कथं च जीवेत्सत्याश्मभारेण प्रमर्दितश्च

mamaiva kālaṁ prabalaṁ viciṁtyāgato hi me kāṁtaguṇaiśca satkhalaḥ ratyāsametastu kathaṁ ca jīvetsatyāśmabhāreṇa pramarditaśca

'शायद यह सोचकर कि मेरा समय अब प्रबल हो गया है, यह चतुर छली अपने मनोहर गुणों सहित आया है। किंतु रति के साथ रहते हुए भी, यह मेरे सत्य के पत्थर-से भार तले दबकर भला कैसे जीवित रह सकेगा?'

श्लोक 22 (padma.2.54.22)

ममापि भावं परिगृह्य कांतो जीवेत्कियान्वापि सुबुद्धियुक्तः । शून्यो हि कायो मम चास्ति सद्यश्चेष्टाविहीनो मृतकल्प एव

mamāpi bhāvaṁ parigṛhya kāṁto jīvetkiyānvāpi subuddhiyuktaḥ śūnyo hi kāyo mama cāsti sadyaśceṣṭāvihīno mṛtakalpa eva

'यदि यह मेरा भाव भी समझ ले, तो भला यह सुबुद्धि प्रियतम कितने समय जीवित रह सकेगा? मेरी यह देह तो अभी शून्य ही है, चेष्टा से रहित, मानो मृतकल्प ही है।'

श्लोक 23 (padma.2.54.23)

कायस्य ग्रामस्य प्रजाः प्रनष्टाः सुविक्रियाख्यं परिगृह्य कर्म । ममाधिकेनापि समं सुकांतं स ऊर्द्ध्वशोभामनयच्च कामः

kāyasya grāmasya prajāḥ pranaṣṭāḥ suvikriyākhyaṁ parigṛhya karma mamādhikenāpi samaṁ sukāṁtaṁ sa ūrddhvaśobhāmanayacca kāmaḥ

'मेरी इस शरीर-रूपी बस्ती की प्रजा तो इस विक्षोभ नामक कार्य में लगकर नष्ट हो चुकी है। और यह काम अपनी उत्कृष्ट, ऊँची शोभा लिए हुए उपस्थित हुआ है।'

श्लोक 24 (padma.2.54.24)

यदामृतो बलवान्हर्षयुक्तः स्वयंदृशा वै परिनृत्यमानः । तथा अनेनापि प्रभाषयेद्भुतं यो मां हि वाञ्छत्यपि भोक्तुकामः

yadāmṛto balavānharṣayuktaḥ svayaṁdṛśā vai parinṛtyamānaḥ tathā anenāpi prabhāṣayedbhutaṁ yo māṁ hi vāñchatyapi bhoktukāmaḥ

'जैसे कोई मृतक भी बल और हर्ष से युक्त होकर स्वयं की दृष्टि में नाचता प्रतीत हो, वैसे ही यह भी अद्भुत ढंग से बोल रहा है, जो मुझे भोगने की कामना और इच्छा रखता है।'

श्लोक 25 (padma.2.54.25)

एवं विचार्यैव तदा महासती सत्याख्यरज्ज्वा दृढबद्धचेतना । गृहं स्वकीयं प्रविवेश सा तदा तत्तस्यभावं नियमेन वेत्तुम्

evaṁ vicāryaiva tadā mahāsatī satyākhyarajjvā dṛḍhabaddhacetanā gṛhaṁ svakīyaṁ praviveśa sā tadā tattasyabhāvaṁ niyamena vettum

इस प्रकार विचार कर वह महासती, सत्य नामक रज्जु से दृढ़तापूर्वक बँधे हुए चित्त वाली, तब अपने ही घर में प्रविष्ट हुई, यह जानने के लिए कि उसका भाव नियमपूर्वक क्या है।

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