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भूमि खण्ड · अध्याय 55

काम की सेना का प्रस्थान

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

श्लोक 1 (padma.2.55.1)

विष्णुरुवाच- भावं विदित्वा सुरराट्च तस्याः प्रोवाच कामं पुरतः स्थितं सः । न चास्ति शक्या स्मर ते जयाय सत्यात्मकध्यान सुदंशिता सती

viṣṇuruvāca- bhāvaṁ viditvā surarāṭca tasyāḥ provāca kāmaṁ purataḥ sthitaṁ saḥ na cāsti śakyā smara te jayāya satyātmakadhyāna sudaṁśitā satī

विष्णु ने कहा — उसके भाव को जानकर देवराज ने अपने सामने खड़े कामदेव से कहा — 'हे स्मर! वह तुमसे जीती नहीं जा सकती; वह सती सत्यमय ध्यान से पूर्णतः सुसज्जित है।'

श्लोक 2 (padma.2.55.2)

धर्माख्य चापं स्वकरे गृहीत्वा ज्ञानाभिधानं वरमेव बाणम् । योद्धुं रणे संप्रति संस्थिता सती वीरो यथा दर्पितवीर्यभावः

dharmākhya cāpaṁ svakare gṛhītvā jñānābhidhānaṁ varameva bāṇam yoddhuṁ raṇe saṁprati saṁsthitā satī vīro yathā darpitavīryabhāvaḥ

'हाथ में धर्म नामक धनुष और ज्ञान नामक श्रेष्ठ बाण लेकर, वह सती अब युद्ध के लिए इस प्रकार खड़ी है जैसे कोई गर्वित वीर्यशाली वीर।'

श्लोक 3 (padma.2.55.3)

जिगीषयेयं पुरुषार्थमेव त्वमात्मनः कुरुषे पौरुषं तु । त्वामद्य जेतुं समरे समर्था यद्भाव्यमेवं तदिहैव चिंत्यम्

jigīṣayeyaṁ puruṣārthameva tvamātmanaḥ kuruṣe pauruṣaṁ tu tvāmadya jetuṁ samare samarthā yadbhāvyamevaṁ tadihaiva ciṁtyam

'तुम केवल अपना ही पुरुषार्थ दिखाना चाहते हो, अपने ही पौरुष का प्रदर्शन करना चाहते हो। आज वह तुम्हें युद्ध में जीतने में समर्थ है — जो होनहार है, उस पर यहीं विचार कर लो।'

श्लोक 4 (padma.2.55.4)

दग्धोसि पूर्वं त्वमिहैव शंभुना महात्मना तेन समं विरोधम् । कृत्वा फलं तस्य विकर्मणश्च जातोस्यनंगः स्मर सत्यमेव

dagdhosi pūrvaṁ tvamihaiva śaṁbhunā mahātmanā tena samaṁ virodham kṛtvā phalaṁ tasya vikarmaṇaśca jātosyanaṁgaḥ smara satyameva

'तुम पहले ही यहीं, उस महात्मा शंभु से विरोध कर, उनके द्वारा जला दिए गए थे; और उस दुष्कर्म के फलस्वरूप तुम अनंग हो गए, हे स्मर! यह सत्य ही है।'

श्लोक 5 (padma.2.55.5)

यथा त्वया कर्म कृतं पुरा स्मर फलं तु प्राप्तं तु तथैव तीव्रम् । सुकुत्सितां योनिमवाप्स्यसि ध्रुवं साध्व्यानया सार्धमिहैव कथ्यसे

yathā tvayā karma kṛtaṁ purā smara phalaṁ tu prāptaṁ tu tathaiva tīvram sukutsitāṁ yonimavāpsyasi dhruvaṁ sādhvyānayā sārdhamihaiva kathyase

'हे स्मर! जैसा कर्म तुमने पहले किया, वैसा ही तीव्र फल तुम्हें मिला। इस साध्वी के साथ विरोध करने पर तुम्हें निश्चय ही अत्यंत निकृष्ट योनि प्राप्त होगी — यह मैं यहीं तुमसे कहता हूँ।'

श्लोक 6 (padma.2.55.6)

ये ज्ञानवंतः पुरुषा जगत्त्रये वैरं प्रकुर्वन्ति महात्मभिः समम् । भुंजन्ति ते दुष्कृतमेवतत्फलं दुःखान्वितं रूपविनाशनं च

ye jñānavaṁtaḥ puruṣā jagattraye vairaṁ prakurvanti mahātmabhiḥ samam bhuṁjanti te duṣkṛtamevatatphalaṁ duḥkhānvitaṁ rūpavināśanaṁ ca

'जो ज्ञानवान् पुरुष भी तीनों लोकों में महात्माओं से वैर करते हैं, वे उसी दुष्कर्म का फल भोगते हैं — दुःख से युक्त और अपने रूप का विनाश।'

श्लोक 7 (padma.2.55.7)

व्याघुष्य आवां तु व्रजाव काम एनां परित्यज्य सतीं प्रयुज्य । सत्याः प्रसंगेन पुरा मया तु लब्धं फलं पापमयं त्वसह्यम्

vyāghuṣya āvāṁ tu vrajāva kāma enāṁ parityajya satīṁ prayujya satyāḥ prasaṁgena purā mayā tu labdhaṁ phalaṁ pāpamayaṁ tvasahyam

'इसलिए हे काम! हम इसकी घोषणा कर, इस सती को छोड़कर लौट चलें। मुझे भी पूर्वकाल में एक सत्यवादिनी स्त्री के प्रसंग से पापमय, असह्य फल प्राप्त हुआ था।'

श्लोक 8 (padma.2.55.8)

त्वमेव जानासि चरित्रमेतच्छप्तोस्मि तेनापि च गौतमेन । जातश्च मेषवृषणः सदा ह्यहं भवान्गतो मां तु विहाय तत्र

tvameva jānāsi caritrametacchaptosmi tenāpi ca gautamena jātaśca meṣavṛṣaṇaḥ sadā hyahaṁ bhavāngato māṁ tu vihāya tatra

'तुम स्वयं इस चरित्र को जानते हो — मैं उन्हीं गौतम द्वारा शापित हुआ, और मैं सदा के लिए मेष के वृषण वाला बन गया; तुम तो तब मुझे वहीं छोड़कर चले गए थे।'

श्लोक 9 (padma.2.55.9)

तेजः प्रभावो ह्यतुलः सतीनां धाता समर्थः सहितुं न सूर्यः । सुकुत्सितं रूपमिदं तु रक्षेत्पुरानुसूया मुनिना हि शप्तम्

tejaḥ prabhāvo hyatulaḥ satīnāṁ dhātā samarthaḥ sahituṁ na sūryaḥ sukutsitaṁ rūpamidaṁ tu rakṣetpurānusūyā muninā hi śaptam

'सतियों का तेज-प्रभाव सचमुच अतुल्य है — उसे विधाता भी, सूर्य भी सहन करने में समर्थ नहीं। इस अत्यंत निकृष्ट रूप की रक्षा भी अनुसूया ने की थी, जब वह किसी मुनि द्वारा शापित हो गए थे।'

श्लोक 10 (padma.2.55.10)

निरुध्य सूर्यं परिवेगवंतमुद्यंतमेवं प्रभया सुदीप्तम् । भर्तुश्च मृत्युं परिबाधमानं मांडव्यशापस्य च कौंडिनस्य

nirudhya sūryaṁ parivegavaṁtamudyaṁtamevaṁ prabhayā sudīptam bhartuśca mṛtyuṁ paribādhamānaṁ māṁḍavyaśāpasya ca kauṁḍinasya

'उसने अत्यंत वेगवान्, अपनी प्रभा से देदीप्यमान उदय होते सूर्य को भी रोक दिया था, और माण्डव्य तथा कौंडिन्य के शाप के बाद अपने पति की मृत्यु को भी रोक दिया था।'

श्लोक 11 (padma.2.55.11)

अत्रेः प्रिया सत्यपतिव्रता तया स्वपुत्रतां देवत्रयं हि नीतम् । न किं पुरा मन्मथ ते श्रुतं सदा संस्कारयुक्ताः प्रभवंति सत्यः

atreḥ priyā satyapativratā tayā svaputratāṁ devatrayaṁ hi nītam na kiṁ purā manmatha te śrutaṁ sadā saṁskārayuktāḥ prabhavaṁti satyaḥ

'अत्रि की प्रिया, सत्य-पतिव्रता ने त्रिदेवों को स्वयं अपने पुत्र के रूप में जन्म दिलाया। हे मन्मथ! क्या तुमने यह पहले नहीं सुना? सत्यनिष्ठ स्त्रियाँ सदा ऐसे संस्कारों से युक्त होकर महान सामर्थ्य रखती हैं।'

श्लोक 12 (padma.2.55.12)

सावित्रीनाम्नी द्युमत्सेनपुत्री नीतं प्रियं सा पुनरानिनाय । यमादिहैवाश्वपतेः सुपुत्रं सती त्वमेवं परिसंश्रुतं च

sāvitrīnāmnī dyumatsenaputrī nītaṁ priyaṁ sā punarānināya yamādihaivāśvapateḥ suputraṁ satī tvamevaṁ parisaṁśrutaṁ ca

'द्युमत्सेन-पुत्री सावित्री ने, यम द्वारा हर लिए गए अपने प्रियतम को वापस ला दिया; वह अश्वपति की सती पुत्री — यह तो तुमने सुना ही होगा।'

श्लोक 13 (padma.2.55.13)

अग्नेः शिखां कः परिसंस्पृशेद्वै तरेद्धिकः सागरमेव मूढः । गले तु बद्धासु शिलां भुजाभ्यां को वा सतीं वश्यति वीतरागाम्

agneḥ śikhāṁ kaḥ parisaṁspṛśedvai tareddhikaḥ sāgarameva mūḍhaḥ gale tu baddhāsu śilāṁ bhujābhyāṁ ko vā satīṁ vaśyati vītarāgām

'भला अग्नि की शिखा को कौन छू सकता है? कौन मूर्ख गले में शिला बाँधकर भुजाओं से सागर तैरने का प्रयास करेगा? वैसे ही वीतराग सती को भला कौन वश में कर सकता है?'

श्लोक 14 (padma.2.55.14)

उक्ते तु वाक्ये बहुनीतियुक्ते इंद्रेण कामस्य सुशिक्षणार्थम् । आकर्ण्य वाक्यं मकरध्वजस्तु उवाच देवेंद्रमथैनमेव

ukte tu vākye bahunītiyukte iṁdreṇa kāmasya suśikṣaṇārtham ākarṇya vākyaṁ makaradhvajastu uvāca deveṁdramathainameva

इंद्र द्वारा कामदेव को उचित शिक्षा देने के लिए कहे गए इन नीतियुक्त वचनों को सुनकर, मकरध्वज ने उन देवेंद्र से यह कहा —

श्लोक 15 (padma.2.55.15)

काम उवाच- तवातिदेशादहमागतो वै धैर्यं सुहृत्त्वं पुरुषार्थमेव । त्यक्त्वा तदर्थं परिभाषसे मां निःसत्वरूपं बहुभीतियुक्तम्

kāma uvāca- tavātideśādahamāgato vai dhairyaṁ suhṛttvaṁ puruṣārthameva tyaktvā tadarthaṁ paribhāṣase māṁ niḥsatvarūpaṁ bahubhītiyuktam

काम ने कहा — 'आपकी ही प्रेरणा से मैं यहाँ आया, अपने धैर्य, मित्रता और पुरुषार्थ को त्यागकर आपके लिए ही; और अब आप मुझे इस प्रकार बल-रहित, अत्यंत भयभीत बताते हैं।'

श्लोक 16 (padma.2.55.16)

व्याबुद्धि यास्यामि यदा सुरेशस्याल्लोकमध्ये मम कीर्तिनाशः । ऊढिंकरोमानविहीन एव सर्वे वदिष्यंत्यनया जितं माम्

vyābuddhi yāsyāmi yadā sureśasyāllokamadhye mama kīrtināśaḥ ūḍhiṁkaromānavihīna eva sarve vadiṣyaṁtyanayā jitaṁ mām

'हे सुरेश! यदि मैं अब मन बदलकर लौट जाऊँ, तो संसार में मेरी कीर्ति नष्ट हो जाएगी; मैं मान-रहित हो जाऊँगा, और सभी कहेंगे कि मैं इस स्त्री से पराजित हो गया।'

श्लोक 17 (padma.2.55.17)

ये वै जिता देवगणाश्च दानवाः पूर्वं मुनींद्रास्तपसः प्रयुक्ताः । हास्यं करिष्यंति ममापि सद्यो नार्या जितो मन्मथ एष भीमः

ye vai jitā devagaṇāśca dānavāḥ pūrvaṁ munīṁdrāstapasaḥ prayuktāḥ hāsyaṁ kariṣyaṁti mamāpi sadyo nāryā jito manmatha eṣa bhīmaḥ

'जिन देवगणों, दानवों और तप में लगे मुनीन्द्रों को मैंने पहले जीता था, वे सभी तुरंत मेरा उपहास करेंगे — "यह भयंकर मन्मथ भी एक स्त्री से पराजित हो गया!"'

श्लोक 18 (padma.2.55.18)

तस्मात्प्रयास्यामि त्वयैव सार्धमस्या बलं मानमतः सुरेश । तेजश्च धैर्यं परिणाशयिष्ये कस्माद्भवानत्र बिभेति शक्र

tasmātprayāsyāmi tvayaiva sārdhamasyā balaṁ mānamataḥ sureśa tejaśca dhairyaṁ pariṇāśayiṣye kasmādbhavānatra bibheti śakra

'इसलिए हे सुरेश! मैं आपके ही साथ जाऊँगा; मैं इसके बल, मान, तेज और धैर्य को नष्ट कर दूँगा। हे शक्र! आप इसमें क्यों इतना भयभीत हैं?'

श्लोक 19 (padma.2.55.19)

संबोध्य चैवं स सुराधिनाथं चापं गृहीतं सशरं सुपुष्पम् । उवाच क्रीडां पुरतः स्थितां तां विधाय मायां भवती प्रयातु

saṁbodhya caivaṁ sa surādhināthaṁ cāpaṁ gṛhītaṁ saśaraṁ supuṣpam uvāca krīḍāṁ purataḥ sthitāṁ tāṁ vidhāya māyāṁ bhavatī prayātu

देवाधिपति को इस प्रकार संबोधित कर, अपना पुष्प-धनुष और बाण उठाकर, उसने अपने सामने खड़ी क्रीड़ा से कहा — 'अपनी माया रचकर तुम आगे बढ़ो।'

श्लोक 20 (padma.2.55.20)

वैश्यस्य भार्यां सुकलां सुपुण्यां सत्येस्थितां धर्मविदां गुणज्ञाम् । इतो हि गत्वा कुरु कार्यमुक्तं साहाय्यरूपं च प्रिये सखे शृणु

vaiśyasya bhāryāṁ sukalāṁ supuṇyāṁ satyesthitāṁ dharmavidāṁ guṇajñām ito hi gatvā kuru kāryamuktaṁ sāhāyyarūpaṁ ca priye sakhe śṛṇu

'उस महापुण्य सुकल के पास, जो उस वैश्य की पत्नी है, सत्य में स्थित, धर्मज्ञा और गुणज्ञा है — वहाँ जाकर तुम बताए हुए कार्य को पूरा करो और सहायता दो, हे प्रिय सखे! सुनो।'

श्लोक 21 (padma.2.55.21)

क्रीडां समाभाष्य ततो मनोभवस्त्वंते स्थितां प्रीतिमथाह्वयत्पुनः । कार्यं भवत्या ममकार्यमुत्तममे तां सुस्नेहैः परिभावयत्वम्

krīḍāṁ samābhāṣya tato manobhavastvaṁte sthitāṁ prītimathāhvayatpunaḥ kāryaṁ bhavatyā mamakāryamuttamame tāṁ susnehaiḥ paribhāvayatvam

क्रीडा से इस प्रकार कहकर मनोभव ने फिर पास खड़ी प्रीति को भी बुलाया — 'मेरा यह उत्तम कार्य अब तुम्हारा है; तुम्हें उसे अत्यंत स्नेहपूर्वक जीतना है।'

श्लोक 22 (padma.2.55.22)

इंद्रं हि दृष्ट्वा सुकला यथा भवेत्स्नेहानुगा चारुविलोचनेयम् । तैस्तैः प्रभावैर्गुणवाक्ययुक्तैर्नयस्व वश्यं च प्रिये सखे शृणु

iṁdraṁ hi dṛṣṭvā sukalā yathā bhavetsnehānugā cāruvilocaneyam taistaiḥ prabhāvairguṇavākyayuktairnayasva vaśyaṁ ca priye sakhe śṛṇu

'ताकि यह चारुनयना सुकल इंद्र को देखकर स्नेहासक्त हो जाए — तुम अपने विविध प्रभावों और गुणयुक्त वचनों से उसे वश में ला दो; हे प्रिय सखे! सुनो।'

श्लोक 23 (padma.2.55.23)

भो भोः सखे साधय गच्छ शीघ्रं मायामयं नंदनरूपयुक्तम् । पुष्पोपयुक्तं च फलप्रधानं घुष्टं रुतैः कोकिलषट्पदानाम्

bho bhoḥ sakhe sādhaya gaccha śīghraṁ māyāmayaṁ naṁdanarūpayuktam puṣpopayuktaṁ ca phalapradhānaṁ ghuṣṭaṁ rutaiḥ kokilaṣaṭpadānām

'हे सखे! शीघ्र जाओ और इसे सिद्ध करो — मायामय नंदनवन के समान एक स्थान रचो, पुष्पों और उत्तम फलों से युक्त, कोयलों और भ्रमरों की गुंजार से गूँजता हुआ।'

श्लोक 24 (padma.2.55.24)

आहूय वीरं मकरंदमेव रसायनं स्वादुगुणैरुपेतम् । सहानिलाद्यैर्निजकर्मयुक्तैः संप्रेषयित्वा पुनरेव कामम्

āhūya vīraṁ makaraṁdameva rasāyanaṁ svāduguṇairupetam sahānilādyairnijakarmayuktaiḥ saṁpreṣayitvā punareva kāmam

'उस वीर मकरंद को भी बुलाओ, जो स्वादु गुणों से युक्त रसायन ही है; और वायु आदि अपने-अपने कार्य में लगे सहायकों सहित उन्हें पुनः कामदेव की सेवा में भेज दो।'

श्लोक 25 (padma.2.55.25)

एवं समादिश्य महत्ससैन्यं त्रैलोक्यसंमोहकरं तु कामः । चक्रे प्रयाणं सुरराजसार्धं संमोहनायैव महासतीं ताम्

evaṁ samādiśya mahatsasainyaṁ trailokyasaṁmohakaraṁ tu kāmaḥ cakre prayāṇaṁ surarājasārdhaṁ saṁmohanāyaiva mahāsatīṁ tām

इस प्रकार आदेश देकर, त्रैलोक्य को मोहित करने वाली अपनी विशाल सेना के साथ काम ने देवराज के साथ प्रस्थान किया, केवल उस महासती को मोहित करने के लिए।

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