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भूमि खण्ड · अध्याय 6

दिति का अपने मारे गए पुत्रों के लिए विलाप

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (padma.2.6.1)

सूत उवाच- कश्यपस्य च भार्यान्या दनुर्नाम तपस्विनी । पुत्रशोकेन संतप्ता संप्राप्ता दितिमंदिरम्

sūta uvāca- kaśyapasya ca bhāryānyā danurnāma tapasvinī putraśokena saṁtaptā saṁprāptā ditimaṁdiram

सूत जी ने कहा — कश्यप की एक अन्य पत्नी, तपस्विनी दनु नामक, पुत्रशोक से संतप्त होकर दिति के भवन में आई।

श्लोक 2 (padma.2.6.2)

रोदमाना प्रणम्यैव पादपद्मयुगं तदा । दुःखेन महता प्राप्ता दितिस्तां प्रत्यबोधयत्

rodamānā praṇamyaiva pādapadmayugaṁ tadā duḥkhena mahatā prāptā ditistāṁ pratyabodhayat

रोती हुई उसने उस समय दिति के चरण-कमल युगल को प्रणाम किया; अत्यंत दुःख से पीड़ित होकर आई उसे दिति ने समझाया —

श्लोक 3 (padma.2.6.3)

दितिरुवाच- तवैव हि महाभागे किमिदं रोदकारणम् । पुत्रिण्यश्चैकपुत्रेण लोके नार्यो भवंति वै

ditiruvāca- tavaiva hi mahābhāge kimidaṁ rodakāraṇam putriṇyaścaikaputreṇa loke nāryo bhavaṁti vai

दिति ने कहा — 'हे महाभागे! तुम्हें रोने का यह क्या कारण है? इस संसार में एक ही पुत्र से स्त्रियाँ पुत्रवती कहलाती हैं —

श्लोक 4 (padma.2.6.4)

भवती शतपुत्राणां गुणिनामपि भामिनि । माता त्वमसि कल्याणि शुंभादीनां महात्मनाम्

bhavatī śataputrāṇāṁ guṇināmapi bhāmini mātā tvamasi kalyāṇi śuṁbhādīnāṁ mahātmanām

—और आप तो सौ गुणवान पुत्रों की माता हैं, हे भामिनी! आप शुंभ आदि महात्माओं की माता हैं, हे कल्याणी!

श्लोक 5 (padma.2.6.5)

कस्माद्दुःखं त्वया प्राप्तमेतन्मे कारणं वद । हिरण्यकशिपू राजा हिरण्याक्षो महाबलः

kasmādduḥkhaṁ tvayā prāptametanme kāraṇaṁ vada hiraṇyakaśipū rājā hiraṇyākṣo mahābalaḥ

आपको यह दुःख किससे प्राप्त हुआ? इसका कारण बताइए। राजा हिरण्यकशिपु और महाबली हिरण्याक्ष —

श्लोक 6 (padma.2.6.6)

यस्याः पुत्रौ महात्मानौ महाबलपराक्रमौ । कस्माद्दुःखं महज्जातं तस्माच्चैव सखे वद

yasyāḥ putrau mahātmānau mahābalaparākramau kasmādduḥkhaṁ mahajjātaṁ tasmāccaiva sakhe vada

—जिनके ये दोनों पुत्र महात्मा, महाबली और पराक्रमी थे, उनसे यह महान दुःख कैसे उत्पन्न हुआ? हे सखी, बताइए —

श्लोक 7 (padma.2.6.7)

आख्याहि कारणं सर्वं यस्माद्रोदिषि सांप्रतम् । एवमाभाष्य तां देवीं विरराम मनस्विनी

ākhyāhi kāraṇaṁ sarvaṁ yasmādrodiṣi sāṁpratam evamābhāṣya tāṁ devīṁ virarāma manasvinī

—वह पूरा कारण बताइए जिससे आप अभी रो रही हैं।' उस देवी से इस प्रकार कहकर वह मनस्विनी चुप हो गई।

श्लोक 8 (padma.2.6.8)

दनुरुवाच- पश्य पश्य महाभागे सपत्न्याश्च मनोरथम् । परिपूर्णं कृतं तेन देवदेवेन चक्रिणा

danuruvāca- paśya paśya mahābhāge sapatnyāśca manoratham paripūrṇaṁ kṛtaṁ tena devadevena cakriṇā

दनु ने कहा — 'देखो, देखो, हे महाभागे! तुम्हारी सपत्नी की मनोकामना — उसे उस चक्रधारी देवदेव ने पूर्ण कर दिया है।

श्लोक 9 (padma.2.6.9)

यथापूर्वं वरो दत्तो ह्यदित्यै देवि विष्णुना । तथेदानीं च पुत्राय तस्या दत्तो वरो महान्

yathāpūrvaṁ varo datto hyadityai devi viṣṇunā tathedānīṁ ca putrāya tasyā datto varo mahān

जैसे पहले विष्णु द्वारा अदिति को वर दिया गया था, हे देवी, वैसे ही अब उसके पुत्र को भी एक महान वर दिया गया है।

श्लोक 10 (padma.2.6.10)

कश्यपाद्विश्रुतो जातस्त्रैलोक्यपालकः सुतः । इंद्रत्वं तस्य वै दत्तं तव पुत्राद्विहृत्य च

kaśyapādviśruto jātastrailokyapālakaḥ sutaḥ iṁdratvaṁ tasya vai dattaṁ tava putrādvihṛtya ca

कश्यप से उत्पन्न, विख्यात, त्रिभुवन का पालक पुत्र — उसे इंद्रत्व प्राप्त हुआ है, तुम्हारे पुत्र से छीनकर।

श्लोक 11 (padma.2.6.11)

मनोरथैस्तु संपूर्णा अदितिः सुखवर्द्धिनी । कनीयान्वसुदत्तश्च तस्याः पुत्रश्च संप्रति

manorathaistu saṁpūrṇā aditiḥ sukhavarddhinī kanīyānvasudattaśca tasyāḥ putraśca saṁprati

मनोरथों से पूर्ण, सुख-वर्धिनी अदिति — उसका सबसे छोटा पुत्र वसुदत्त अब —

श्लोक 12 (padma.2.6.12)

ऐंद्रं पदं सुदुष्प्राप्यं देवैः सार्द्धं भुनक्ति च । दितिरुवाच- कस्मात्पदात्परिभ्रष्टो मम पुत्रो महामतिः

aiṁdraṁ padaṁ suduṣprāpyaṁ devaiḥ sārddhaṁ bhunakti ca ditiruvāca- kasmātpadātparibhraṣṭo mama putro mahāmatiḥ

—देवताओं सहित उस अत्यंत दुष्प्राप्य इंद्रपद का भोग कर रहा है।' दिति ने कहा — 'मेरा महामति पुत्र किस पद से भ्रष्ट हुआ?

श्लोक 13 (padma.2.6.13)

अन्ये च दानवा दैत्यास्तेजोभ्रष्टाः कथं सखे । तस्य त्वं कारणं ब्रूहि विस्तरेण यशस्विनि

anye ca dānavā daityāstejobhraṣṭāḥ kathaṁ sakhe tasya tvaṁ kāraṇaṁ brūhi vistareṇa yaśasvini

और अन्य दानव-दैत्य किस प्रकार तेजहीन हुए, हे सखी? उसका कारण मुझे विस्तार से बताओ, हे यशस्विनी।'

श्लोक 14 (padma.2.6.14)

तामाभाष्य दितिर्वाक्यं विरराम सुदुःखिता । दनुरुवाच- देवाश्च दानवाः सर्वे सक्रोधाः संगरं गताः

tāmābhāṣya ditirvākyaṁ virarāma suduḥkhitā danuruvāca- devāśca dānavāḥ sarve sakrodhāḥ saṁgaraṁ gatāḥ

यह वचन कहकर दिति अत्यंत दुःखी होकर चुप हो गई। दनु ने कहा — 'देवता और सभी दानव क्रोध से भरकर युद्ध के लिए गए —

श्लोक 15 (padma.2.6.15)

तत्र युद्धं महज्जातं दैत्यसंक्षयकारकम् । देवैश्च विष्णुना युद्धे मम पुत्रा निपातिताः

tatra yuddhaṁ mahajjātaṁ daityasaṁkṣayakārakam devaiśca viṣṇunā yuddhe mama putrā nipātitāḥ

—वहाँ महान युद्ध हुआ, जो दैत्यों के संहार का कारण बना। देवताओं और विष्णु के साथ उस युद्ध में मेरे पुत्र मारे गए।

श्लोक 16 (padma.2.6.16)

तथैव तव पुत्रास्ते देवदेवेन चक्रिणा । वने गतान्यथा सिंहो द्रावयेत्स्वेन तेजसा

tathaiva tava putrāste devadevena cakriṇā vane gatānyathā siṁho drāvayetsvena tejasā

वैसे ही तुम्हारे पुत्र भी उस चक्रधारी देवदेव द्वारा मारे गए; जैसे वन में गए हुए पशुओं को सिंह अपने ही तेज से भगा देता है —

श्लोक 17 (padma.2.6.17)

तथा ते मामकाः पुत्रा निहताः शङ्खपाणिना । कालनेमिमुखं सैन्यं दुर्जयं ससुरासुरैः

tathā te māmakāḥ putrā nihatāḥ śaṁkhapāṇinā kālanemimukhaṁ sainyaṁ durjayaṁ sasurāsuraiḥ

—वैसे ही मेरे पुत्र भी उस शंखधारी द्वारा मारे गए। कालनेमि के नेतृत्व वाली सेना, जो देवों और असुरों के लिए भी दुर्जय थी —

श्लोक 18 (padma.2.6.18)

नाशितं मर्दितं सर्वं द्रावितं विकलीकृतम् । स्वैरर्चिभिर्यथा वह्निस्तृणानि ज्वालयेद्वने

nāśitaṁ marditaṁ sarvaṁ drāvitaṁ vikalīkṛtam svairarcibhiryathā vahnistṛṇāni jvālayedvane

—वह सब नष्ट, कुचली, भगाई और विकल कर दी गई; जैसे अग्नि अपनी ही लपटों से वन में तृणों को जला देती है —

श्लोक 19 (padma.2.6.19)

तथा दैत्यगणान्सर्वान्निर्दहत्येव केशवः । मम पुत्रा मृता देवि बहुशस्तव नंदनाः

tathā daityagaṇānsarvānnirdahatyeva keśavaḥ mama putrā mṛtā devi bahuśastava naṁdanāḥ

—वैसे ही केशव ने समस्त दैत्यगणों को भस्म कर दिया। मेरे पुत्र मर गए, हे देवी, और तुम्हारे पुत्र भी बहुत संख्या में मरे।

श्लोक 20 (padma.2.6.20)

वह्निं प्राप्य यथा सर्वे शलभा यांति संक्षयम् । तथा ते दानवाः सर्वे हरिं प्राप्य क्षयं गताः

vahniṁ prāpya yathā sarve śalabhā yāṁti saṁkṣayam tathā te dānavāḥ sarve hariṁ prāpya kṣayaṁ gatāḥ

जैसे सभी पतंगे अग्नि के पास जाकर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही वे सभी दानव हरि के पास जाकर नष्ट हो गए।'

श्लोक 21 (padma.2.6.21)

एवमेतं हि वृत्तांतं दितिः शुश्राव दारुणम् । दितिरुवाच- वज्रपातोपमं भद्रे वदस्येवं कथं मम

evametaṁ hi vṛttāṁtaṁ ditiḥ śuśrāva dāruṇam ditiruvāca- vajrapātopamaṁ bhadre vadasyevaṁ kathaṁ mama

इस प्रकार यह भयंकर वृत्तांत दिति ने सुना। दिति ने कहा — 'यह तो वज्रपात के समान है, हे भद्रे! तुम मुझसे ऐसा कैसे कह रही हो?'

श्लोक 22 (padma.2.6.22)

एवमाभाष्य तां देवी मूर्च्छिता निपपात ह । हा हा कष्टमिदं जातं बहुदुःखं प्रतापकम्

evamābhāṣya tāṁ devī mūrcchitā nipapāta ha hā hā kaṣṭamidaṁ jātaṁ bahuduḥkhaṁ pratāpakam

ऐसा कहकर वह देवी मूर्छित होकर गिर पड़ी — 'हाय, हाय! यह कैसा कष्ट आ गया, कितना बड़ा, जलाने वाला दुःख!'

श्लोक 23 (padma.2.6.23)

रुरोद करुणं साथ पुत्रशोकसुपीडिता । तां दृष्ट्वा स मुनिश्रेष्ठ उवाच वचनं शुभम्

ruroda karuṇaṁ sātha putraśokasupīḍitā tāṁ dṛṣṭvā sa muniśreṣṭha uvāca vacanaṁ śubham

वह पुत्रशोक से अत्यंत पीड़ित होकर करुणापूर्वक रोने लगी। उसे देखकर उस मुनिश्रेष्ठ ने यह शुभ वचन कहा —

श्लोक 24 (padma.2.6.24)

मा रोदिषि च भद्रं ते नैवं शोचंति त्वद्विधाः । सत्ववंतो महाभागे लोभमोहेन वर्जिताः

mā rodiṣi ca bhadraṁ te naivaṁ śocaṁti tvadvidhāḥ satvavaṁto mahābhāge lobhamohena varjitāḥ

'मत रोओ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारे जैसी सत्त्वयुक्त, लोभ-मोह से रहित महाभागाएँ इस प्रकार शोक नहीं करतीं।

श्लोक 25 (padma.2.6.25)

कस्य पुत्रा हि संसारे कस्य देवी सुबांधवाः । नास्तिकस्येह केनापि तत्सर्वं श्रूयतां प्रिये

kasya putrā hi saṁsāre kasya devī subāṁdhavāḥ nāstikasyeha kenāpi tatsarvaṁ śrūyatāṁ priye

संसार में सचमुच किसके पुत्र हैं, हे देवी, किसके सच्चे बांधव हैं? इस सत्य को न मानने वाले के लिए भी — यह सब सुनो, हे प्रिये।

श्लोक 26 (padma.2.6.26)

दक्षस्यापि सुता यूयं सुन्दर्यश्चैव मामकाः । भवतीनामहं भर्ता कामनापूरकः शुभे

dakṣasyāpi sutā yūyaṁ sundaryaścaiva māmakāḥ bhavatīnāmahaṁ bhartā kāmanāpūrakaḥ śubhe

तुम दोनों दक्ष की पुत्रियाँ हो, और मेरी सुंदर पत्नियाँ भी; मैं तुम्हारा पति हूँ, तुम्हारी कामनाओं को पूर्ण करने वाला, हे शुभे!

श्लोक 27 (padma.2.6.27)

योजकः पालकश्चैव रक्षकोस्मि वरानने । कस्माद्वैरं कृतं क्रूरैरसुरैरजितात्मभिः

yojakaḥ pālakaścaiva rakṣakosmi varānane kasmādvairaṁ kṛtaṁ krūrairasurairajitātmabhiḥ

मैं ही तुम्हें जोड़ने वाला, पालक और रक्षक हूँ, हे वरानने! फिर क्रूर, अजितात्मा असुरों ने यह वैर क्यों किया?

श्लोक 28 (padma.2.6.28)

तव पुत्रा महाभागे सत्यधर्मविवर्जिताः । तेन दोषेण ते सर्वे तव दोषेण वै शुभे

tava putrā mahābhāge satyadharmavivarjitāḥ tena doṣeṇa te sarve tava doṣeṇa vai śubhe

तुम्हारे पुत्र, हे महाभागे, सत्य और धर्म से रहित हो गए थे। उसी दोष से वे सब — तुम्हारे ही दोष से भी, हे शुभे —

श्लोक 29 (padma.2.6.29)

निहता वासुदेवेन दैवतैस्तु निपातिताः । तस्माच्छोको न कर्तव्यः सत्यमोक्षविनाशनः

nihatā vāsudevena daivataistu nipātitāḥ tasmācchoko na kartavyaḥ satyamokṣavināśanaḥ

—वासुदेव द्वारा मारे गए, देवताओं द्वारा गिराए गए। अतः शोक नहीं करना चाहिए; शोक तो सत्य और मोक्ष का विनाश करने वाला है।

श्लोक 30 (padma.2.6.30)

शोको हि नाशयेत्पुण्यं क्षयात्पुण्यस्य नश्यति । तस्माच्छोकं परित्यज विघ्नरूपं वरानने

śoko hi nāśayetpuṇyaṁ kṣayātpuṇyasya naśyati tasmācchokaṁ parityaja vighnarūpaṁ varānane

शोक पुण्य को नष्ट कर देता है; पुण्य के क्षय से व्यक्ति नष्ट हो जाता है। अतः यह विघ्नरूप शोक त्याग दो, हे वरानने!

श्लोक 31 (padma.2.6.31)

आत्मदोषप्रभावेण दानवा मरणं गताः । देवा निमित्तभूताश्च नाशिताः स्वेन कर्मणा

ātmadoṣaprabhāveṇa dānavā maraṇaṁ gatāḥ devā nimittabhūtāśca nāśitāḥ svena karmaṇā

अपने ही दोषों के प्रभाव से दानव मृत्यु को प्राप्त हुए; देवता तो केवल निमित्त बने, वे अपने ही कर्म से नष्ट हुए।

श्लोक 32 (padma.2.6.32)

एवं ज्ञात्वा महाभागे समागच्छ सुखं प्रति । एवमुक्त्वा महायोगी तां प्रियां दुःखभागिनीम्

evaṁ jñātvā mahābhāge samāgaccha sukhaṁ prati evamuktvā mahāyogī tāṁ priyāṁ duḥkhabhāginīm

यह जानकर, हे महाभागे! सुख की ओर लौट आओ।' ऐसा कहकर उस महायोगी ने अपनी दुःखभागिनी प्रिया को समझाया।

श्लोक 33 (padma.2.6.33)

विषादाच्च निवृत्तोसौ विरराम महामतिः

viṣādācca nivṛttosau virarāma mahāmatiḥ

वह विषाद से निवृत्त हो गई, और वह महामति ऋषि मौन हो गया।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7