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भूमि खण्ड · अध्याय 64

मातलि का आवाहन और जरा-अग्नि

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65

श्लोक 1 (padma.2.64.1)

। पिप्पलउवाच- पितुःप्रसादभावाद्वै यदुना सुखमुत्तमम् । कथं प्राप्तं सुभुक्तं च तन्मे विस्तरतो वद

pippalauvāca- pituḥprasādabhāvādvai yadunā sukhamuttamam kathaṁ prāptaṁ subhuktaṁ ca tanme vistarato vada

पिप्पल ने कहा — 'यदु ने पिता की कृपा से वह उत्तम सुख कैसे प्राप्त किया और भोगा? मुझे यह विस्तार से बताइए।'

श्लोक 2 (padma.2.64.2)

कस्मात्पापप्रभावं च रुरुर्भुंक्ते द्विजोत्तम । सकलं विस्तरेणापि वद मे कुंडलात्मज

kasmātpāpaprabhāvaṁ ca rururbhuṁkte dvijottama sakalaṁ vistareṇāpi vada me kuṁḍalātmaja

'और हे द्विजोत्तम! रुरु पाप का फल क्यों भोगता है? हे कुंडलात्मज! यह सब भी मुझे विस्तार से बताइए।'

श्लोक 3 (padma.2.64.3)

सुकर्मोवाच- श्रूयतामभिधास्यामि चरित्रं पापनाशनम् । नहुषस्य सुपुण्यस्य ययातेश्च महात्मनः

sukarmovāca- śrūyatāmabhidhāsyāmi caritraṁ pāpanāśanam nahuṣasya supuṇyasya yayāteśca mahātmanaḥ

सुकर्मा ने कहा — 'सुनो, मैं परम पुण्यशाली नहुष तथा महात्मा ययाति का पाप-नाशक चरित्र सुनाता हूँ।'

श्लोक 4 (padma.2.64.4)

सोमवंशात्प्रभूतो हि नहुषो मेदिनीपतिः । दानधर्माननेकांश्च चका रह्यतुलानपि

somavaṁśātprabhūto hi nahuṣo medinīpatiḥ dānadharmānanekāṁśca cakā rahyatulānapi

चंद्रवंश में उत्पन्न पृथ्वीपति नहुष ने अनेक अतुलनीय दान-धर्म के कार्य किए।

श्लोक 5 (padma.2.64.5)

मखानामश्वमेधानामियाज शतमुत्तमम् । वाजपेयशतं चापि अन्यान्यज्ञाननेकधा

makhānāmaśvamedhānāmiyāja śatamuttamam vājapeyaśataṁ cāpi anyānyajñānanekadhā

उसने सौ उत्तम अश्वमेध यज्ञ किए, सौ वाजपेय यज्ञ भी, तथा अनेक अन्य यज्ञ भी किए।

श्लोक 6 (padma.2.64.6)

आत्मनः पुण्यभावेन इंद्रलोकमवाप सः । पुत्रं धर्मगुणोपेतं प्रजापालं चकार सः

ātmanaḥ puṇyabhāvena iṁdralokamavāpa saḥ putraṁ dharmaguṇopetaṁ prajāpālaṁ cakāra saḥ

अपने ही पुण्य-भाव से वह इंद्रलोक को प्राप्त हुआ; और उसने धर्म-गुण से युक्त अपने पुत्र को प्रजापालक बना दिया।

श्लोक 7 (padma.2.64.7)

ययातिं सत्यसंपन्नं धर्मवीर्यं महामतिम् । एंद्रं पदं गतो राजा तस्य पुत्रः पदे स्वके

yayātiṁ satyasaṁpannaṁ dharmavīryaṁ mahāmatim eṁdraṁ padaṁ gato rājā tasya putraḥ pade svake

—सत्यसंपन्न, धर्मवीर्य, महामति ययाति को; जब राजा इंद्रपद को प्राप्त हुआ, तब उसका पुत्र अपने ही पद पर रहा।

श्लोक 8 (padma.2.64.8)

ययातिः सत्यसंपन्नः प्रजा धर्मेण पालयेत् । स्वयमेव प्रपश्येत्स प्रजाकर्माणि तान्यपि

yayātiḥ satyasaṁpannaḥ prajā dharmeṇa pālayet svayameva prapaśyetsa prajākarmāṇi tānyapi

सत्यसंपन्न ययाति धर्म से प्रजा का पालन करता था; वह स्वयं ही प्रजा के कार्यों को देखता था।

श्लोक 9 (padma.2.64.9)

याजयामास धर्मज्ञः श्रुत्वा धर्ममनुत्तमम् । यज्ञतीर्थादिकं सर्वं दानपुण्यं चकार सः

yājayāmāsa dharmajñaḥ śrutvā dharmamanuttamam yajñatīrthādikaṁ sarvaṁ dānapuṇyaṁ cakāra saḥ

उस धर्मज्ञ ने अनुपम धर्म को सुनकर यज्ञ करवाए; उसने यज्ञ-तीर्थ आदि समस्त दान-पुण्य किए।

श्लोक 10 (padma.2.64.10)

राज्यं चकार मेधावी सत्यधर्मेण वै तदा । यावदशीतिसहस्राणि वर्षाणां नृपनंदनः

rājyaṁ cakāra medhāvī satyadharmeṇa vai tadā yāvadaśītisahasrāṇi varṣāṇāṁ nṛpanaṁdanaḥ

उस मेधावी नृपनंदन ने अस्सी हजार वर्षों तक सत्य-धर्म से राज्य किया।

श्लोक 11 (padma.2.64.11)

तावत्कालं गतं तस्य ययातेस्तु महात्मनः । तस्य पुत्राश्च चत्वारस्तद्वीर्यबलविक्रमाः

tāvatkālaṁ gataṁ tasya yayātestu mahātmanaḥ tasya putrāśca catvārastadvīryabalavikramāḥ

उस महात्मा ययाति का इतना समय बीत गया; उसके चार पुत्र थे, उसी के समान वीर्य-बल-विक्रम वाले।

श्लोक 12 (padma.2.64.12)

तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः । तस्यासीज्ज्येष्ठपुत्रस्तु रुरुर्नाम महाबलः

teṣāṁ nāmāni vakṣyāmi śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ tasyāsījjyeṣṭhaputrastu rururnāma mahābalaḥ

मैं उनके नाम बताता हूँ — एकाग्रचित्त होकर सुनो। उसका ज्येष्ठ पुत्र महाबली रुरु नामक था।

श्लोक 13 (padma.2.64.13)

पुरुर्नाम द्वितीयोऽभूत्कुरुश्चान्यस्तृतीयकः । यदुर्नाम स धर्मात्मा चतुर्थो नृपतेः सुतः

pururnāma dvitīyo'bhūtkuruścānyastṛtīyakaḥ yadurnāma sa dharmātmā caturtho nṛpateḥ sutaḥ

दूसरा पुरु नामक था, तीसरा अन्य कुरु था; और राजा का चौथा पुत्र वह धर्मात्मा यदु नामक था।

श्लोक 14 (padma.2.64.14)

एवं चत्वारः पुत्राश्च ययातेस्तु महात्मनः । तेजसा पौरुषेणापि पितृतुल्यपराक्रमाः

evaṁ catvāraḥ putrāśca yayātestu mahātmanaḥ tejasā pauruṣeṇāpi pitṛtulyaparākramāḥ

इस प्रकार महात्मा ययाति के चार पुत्र थे, तेज और पौरुष में भी पिता के समान पराक्रमी।

श्लोक 15 (padma.2.64.15)

एवं राज्यं कृतं तेन धर्मेणापि ययातिना । तस्य कीर्तिर्यशो भावस्त्रैलोक्ये प्रचुरोभवत्

evaṁ rājyaṁ kṛtaṁ tena dharmeṇāpi yayātinā tasya kīrtiryaśo bhāvastrailokye pracurobhavat

इस प्रकार ययाति द्वारा धर्मपूर्वक राज्य किया गया; उसकी कीर्ति, यश और महिमा त्रैलोक्य में व्यापक हो गई।

श्लोक 16 (padma.2.64.16)

विष्णुरुवाच- एकदा तु द्विजश्रेष्ठो नारदो ब्रह्मनंदनः । एंद्रं लोकं गतो राजन्द्रष्टुं चैव पुरंदरम्

viṣṇuruvāca- ekadā tu dvijaśreṣṭho nārado brahmanaṁdanaḥ eṁdraṁ lokaṁ gato rājandraṣṭuṁ caiva puraṁdaram

विष्णु ने कहा — एक बार वह द्विजश्रेष्ठ नारद, ब्रह्मा के पुत्र, हे राजन्! इंद्रलोक गए, पुरंदर को देखने के लिए।

श्लोक 17 (padma.2.64.17)

सहस्राक्षस्ततोपश्यद्धुताशनसमप्रभम् । देवो विप्रं समायांतं सर्वज्ञं ज्ञानपंडितम्

sahasrākṣastatopaśyaddhutāśanasamaprabham devo vipraṁ samāyāṁtaṁ sarvajñaṁ jñānapaṁḍitam

तब सहस्राक्ष देव ने अग्नि के समान तेजस्वी, सर्वज्ञ, ज्ञान-पंडित उस विप्र को आते देखा।

श्लोक 18 (padma.2.64.18)

पूजितं मधुपर्काद्यैर्भक्त्या नमितकंधरः । निवेश्य चासने पुण्ये पप्रच्छ मुनिपुंगवम्

pūjitaṁ madhuparkādyairbhaktyā namitakaṁdharaḥ niveśya cāsane puṇye papraccha munipuṁgavam

उसने भक्तिपूर्वक गर्दन झुकाकर मधुपर्क आदि से उसका सम्मान किया; और पवित्र आसन पर बिठाकर उस मुनिश्रेष्ठ से पूछा —

श्लोक 19 (padma.2.64.19)

इंद्र उवाच- कस्मादागमनं तेद्य किमर्थमिह चागतः । किं ते हि सुप्रियं विप्र करोम्यद्य महामुने

iṁdra uvāca- kasmādāgamanaṁ tedya kimarthamiha cāgataḥ kiṁ te hi supriyaṁ vipra karomyadya mahāmune

इंद्र ने कहा — 'आज आपका आगमन क्यों हुआ? आप यहाँ किसलिए आए हैं? हे विप्र! हे महामुने! आज मैं आपके लिए क्या प्रिय कार्य करूँ?'

श्लोक 20 (padma.2.64.20)

नारद उवाच- देवराज कृतं सर्वं भक्त्या यच्च प्रभाषितम् । संतुष्टोस्मि महाप्राज्ञ प्रश्नोत्तरं वदाम्यहम्

nārada uvāca- devarāja kṛtaṁ sarvaṁ bhaktyā yacca prabhāṣitam saṁtuṣṭosmi mahāprājña praśnottaraṁ vadāmyaham

नारद ने कहा — 'हे देवराज! आपने भक्तिपूर्वक जो कुछ किया और कहा, उससे मैं संतुष्ट हूँ, हे महाप्राज्ञ! अब मैं आपके प्रश्न का उत्तर देता हूँ।'

श्लोक 21 (padma.2.64.21)

महीलोकात्सुसंप्राप्तः सांप्रतं तव मंदिरम् । त्वामन्वेष्टुं समायातो दृष्ट्वा नाहुषमेव च

mahīlokātsusaṁprāptaḥ sāṁprataṁ tava maṁdiram tvāmanveṣṭuṁ samāyāto dṛṣṭvā nāhuṣameva ca

'मैं अभी पृथ्वीलोक से आपके इस मंदिर में आया हूँ; मैं आपको खोजने आया हूँ, और नहुष-पुत्र को भी देखकर आया हूँ।'

श्लोक 22 (padma.2.64.22)

इंद्र उवाच- सत्यधर्मेण को राजा प्रजाः पालयते सदा । सर्वधर्मसमायुक्तः श्रुतवाञ्ज्ञानवान्गुणी

iṁdra uvāca- satyadharmeṇa ko rājā prajāḥ pālayate sadā sarvadharmasamāyuktaḥ śrutavāñjñānavānguṇī

इंद्र ने कहा — 'कौन राजा सदा सत्य-धर्म से प्रजा का पालन करता है, जो समस्त धर्मों से युक्त, विद्वान्, ज्ञानी और गुणवान् हो?'

श्लोक 23 (padma.2.64.23)

पृथिव्यामस्ति को राजा वेदज्ञो ब्राह्मणप्रियः । ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो यज्वा दाता सुभक्तिमान्

pṛthivyāmasti ko rājā vedajño brāhmaṇapriyaḥ brahmaṇyo vedavicchūro yajvā dātā subhaktimān

'पृथ्वी पर कौन राजा वेदज्ञ, ब्राह्मण-प्रिय, ब्रह्मण्य, वेदविद्, शूर, यज्ञकर्ता, दानी और सुभक्तिमान् है?'

श्लोक 24 (padma.2.64.24)

नारद उवाच- एभिर्गुणैस्तु संयुक्तो नहुषस्यात्मजो बली । यस्य सत्येन वीर्येण सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः

nārada uvāca- ebhirguṇaistu saṁyukto nahuṣasyātmajo balī yasya satyena vīryeṇa sarve lokāḥ pratiṣṭhitāḥ

नारद ने कहा — 'इन सभी गुणों से युक्त नहुष का बलवान् पुत्र है, जिसके सत्य और वीर्य से सभी लोक प्रतिष्ठित हैं।'

श्लोक 25 (padma.2.64.25)

भवादृशो हि भूर्लोके ययातिर्नहुषात्मजः । भवान्स्वर्गे स चैवास्ति भूतले भूतिवर्धनः

bhavādṛśo hi bhūrloke yayātirnahuṣātmajaḥ bhavānsvarge sa caivāsti bhūtale bhūtivardhanaḥ

'नहुष का पुत्र ययाति भूलोक में आपके ही समान है; जैसे आप स्वर्ग में हैं, वैसे ही वह भूतल पर वैभव बढ़ाने वाला है।'

श्लोक 26 (padma.2.64.26)

पितुः श्रेष्ठो महाराज ह्यश्वमेधशतं तथा । वाजपेयशतं चक्रे ययातिः पृथिवीपतिः

pituḥ śreṣṭho mahārāja hyaśvamedhaśataṁ tathā vājapeyaśataṁ cakre yayātiḥ pṛthivīpatiḥ

'हे महाराज! अपने पिता से भी श्रेष्ठ, उस पृथ्वीपति ययाति ने सौ अश्वमेध तथा सौ वाजपेय यज्ञ किए।'

श्लोक 27 (padma.2.64.27)

दत्तान्यनेकरूपाणि दानानि तेन भक्तितः । गवां लक्षसहस्राणि गवां कोटिशतानि च

dattānyanekarūpāṇi dānāni tena bhaktitaḥ gavāṁ lakṣasahasrāṇi gavāṁ koṭiśatāni ca

'उसने भक्तिपूर्वक अनेक प्रकार के दान दिए — लाखों-हजारों गौएँ, और सौ करोड़ गौएँ भी।'

श्लोक 28 (padma.2.64.28)

कोटिहोमांश्चकाराथ लक्षहोमांस्तथैव च । भूमिदानादि दानानि ब्राह्मणेभ्योददाच्च यः

koṭihomāṁścakārātha lakṣahomāṁstathaiva ca bhūmidānādi dānāni brāhmaṇebhyodadācca yaḥ

'उसने करोड़ों होम किए, और लाखों होम भी; और उसने ब्राह्मणों को भूमि-दान आदि दान दिए।'

श्लोक 29 (padma.2.64.29)

सर्वं येन स्वरूपं हि धर्मस्य परिपालितम् । एवं गुणैः समायुक्तो ययातिर्नहुषात्मजः

sarvaṁ yena svarūpaṁ hi dharmasya paripālitam evaṁ guṇaiḥ samāyukto yayātirnahuṣātmajaḥ

'जिसके द्वारा धर्म का संपूर्ण स्वरूप पूर्णतः पालित किया गया है। इस प्रकार नहुष-पुत्र ययाति इन सभी गुणों से युक्त है।'

श्लोक 30 (padma.2.64.30)

वर्षाणां तु सहस्राणि अशीतिर्नृपसत्तमः । राज्यं चकार सत्येन यथा दिवि भवानिह

varṣāṇāṁ tu sahasrāṇi aśītirnṛpasattamaḥ rājyaṁ cakāra satyena yathā divi bhavāniha

'अस्सी हजार वर्षों तक उस नृपसत्तम ने सत्य से राज्य किया, जैसे आप यहाँ स्वर्ग में करते हैं।'

श्लोक 31 (padma.2.64.31)

सुकर्मोवाच- एवमाकर्ण्य देवेंद्रो नारदात्स मुनीश्वरात् । समालोच्य स मेधावी संभीतो धर्मपालनात्

sukarmovāca- evamākarṇya deveṁdro nāradātsa munīśvarāt samālocya sa medhāvī saṁbhīto dharmapālanāt

सुकर्मा ने कहा — मुनीश्वर नारद से यह सुनकर, वह देवेंद्र, वह मेधावी, इस पर विचार कर, धर्म-पालन के कारण भयभीत हो उठा —

श्लोक 32 (padma.2.64.32)

शतयज्ञप्रभावेण नहुषो हि पुरा मम । एंद्रं पदं गतो वीरो देवराजोभवत्पुरा

śatayajñaprabhāveṇa nahuṣo hi purā mama eṁdraṁ padaṁ gato vīro devarājobhavatpurā

—(सोचने लगा) — 'पूर्वकाल में सौ यज्ञों के प्रभाव से नहुष स्वयं मेरे इस पद को प्राप्त हुआ था, और वह वीर पहले देवराज बन गया था।'

श्लोक 33 (padma.2.64.33)

शची बुद्धिप्रभावेण पदभ्रष्टो व्यजायत । तादृशोयं महाराजः पितुस्तुल्यपराक्रमः

śacī buddhiprabhāveṇa padabhraṣṭo vyajāyata tādṛśoyaṁ mahārājaḥ pitustulyaparākramaḥ

'शची की बुद्धि के प्रभाव से वह अपने पद से भ्रष्ट हो गया था। यह महाराज (ययाति) भी अपने पिता के समान ही पराक्रमी है।'

श्लोक 34 (padma.2.64.34)

प्राप्स्यते नात्र संदेहः पदमैंद्रं न संशयः । येन केनाप्युपायेन तं भूपं दिवमानये

prāpsyate nātra saṁdehaḥ padamaiṁdraṁ na saṁśayaḥ yena kenāpyupāyena taṁ bhūpaṁ divamānaye

'वह निःसंदेह इंद्रपद प्राप्त कर लेगा, इसमें संदेह नहीं। किसी न किसी उपाय से उस राजा को स्वर्ग में ले आना चाहिए।'

श्लोक 35 (padma.2.64.35)

इत्येवं चिंतयामास तस्माद्भीतः सुरेश्वरः । भूपालस्य नृपश्रेष्ठ ययातेः सुमहद्भयात्

ityevaṁ ciṁtayāmāsa tasmādbhītaḥ sureśvaraḥ bhūpālasya nṛpaśreṣṭha yayāteḥ sumahadbhayāt

इस प्रकार विचार करते हुए, हे नृपश्रेष्ठ! उस राजा ययाति के अत्यंत महान भय से भयभीत होकर वह सुरेश्वर —

श्लोक 36 (padma.2.64.36)

तमानेतुं ततो दूतं प्रेषयामास देवराट् । नहुषस्य विमानं तु सर्वकामसमन्वितम्

tamānetuṁ tato dūtaṁ preṣayāmāsa devarāṭ nahuṣasya vimānaṁ tu sarvakāmasamanvitam

—तब देवराज ने उसे लाने के लिए एक दूत भेजा, नहुष के उस विमान में, जो सभी कामनाओं से युक्त था।

श्लोक 37 (padma.2.64.37)

सारथिं मातलिं नाम विमानेन समन्वितम् । गतो हि मातलिस्तत्र यत्रास्ते नहुषात्मजः

sārathiṁ mātaliṁ nāma vimānena samanvitam gato hi mātalistatra yatrāste nahuṣātmajaḥ

—सारथी मातलि नामक को उस विमान सहित भेजा; मातलि वहाँ गया जहाँ नहुष-पुत्र रहता था।

श्लोक 38 (padma.2.64.38)

प्रहितः सुरराजेन समानेतुं महामतिम् । सभायां वर्त्तमानस्तु यथा इंद्र प्रःशोभते

prahitaḥ surarājena samānetuṁ mahāmatim sabhāyāṁ varttamānastu yathā iṁdra praḥśobhate

देवराज द्वारा उस महामति को लाने के लिए भेजा गया — जैसे इंद्र अपनी सभा में सुशोभित होते हैं —

श्लोक 39 (padma.2.64.39)

तथा ययातिर्धर्मात्मा स्वसभायां विराजते । तमुवाच महात्मानं राजानं सत्यभूषणम्

tathā yayātirdharmātmā svasabhāyāṁ virājate tamuvāca mahātmānaṁ rājānaṁ satyabhūṣaṇam

—वैसे ही धर्मात्मा ययाति अपनी सभा में सुशोभित होते थे। उस मातलि ने सत्य से विभूषित उस महात्मा राजा से कहा —

श्लोक 40 (padma.2.64.40)

सारथिर्देवराजस्य शृणु राजन्वचो मम । प्रहितो देवराजेन सकाशं तव सांप्रतम्

sārathirdevarājasya śṛṇu rājanvaco mama prahito devarājena sakāśaṁ tava sāṁpratam

'—"मैं देवराज का सारथी हूँ; हे राजन्! मेरे वचन सुनिए। मुझे देवराज ने अभी आपके पास भेजा है।"'

श्लोक 41 (padma.2.64.41)

यद्ब्रूते देवराजस्तु तत्सर्वं सुमनाः कुरु । आगंतव्यं त्वया देव एंद्रं लोकं हि नान्यथा

yadbrūte devarājastu tatsarvaṁ sumanāḥ kuru āgaṁtavyaṁ tvayā deva eṁdraṁ lokaṁ hi nānyathā

'—"देवराज जो कुछ कहते हैं, वह सब सहर्ष कीजिए। हे देव! आपको इंद्रलोक अवश्य ही आना चाहिए, अन्यथा नहीं।"'

श्लोक 42 (padma.2.64.42)

पुत्रे राज्यं विसृज्यैव कृत्वा चांतेष्टिमुत्तमाम् । इलो राजा महातेजा वसते नहुषात्मज

putre rājyaṁ visṛjyaiva kṛtvā cāṁteṣṭimuttamām ilo rājā mahātejā vasate nahuṣātmaja

'—"पुत्र को राज्य सौंपकर, तथा उत्तम अंत्येष्टि करके — हे नहुष-पुत्र! वहाँ महातेजस्वी राजा इल निवास करता है।"'

श्लोक 43 (padma.2.64.43)

पुरूरवा महावीर्यो विप्रचित्तिर्महामनाः । शिबिर्वसति तत्रैव मनुरिक्ष्वाकु भूपतिः

purūravā mahāvīryo vipracittirmahāmanāḥ śibirvasati tatraiva manurikṣvāku bhūpatiḥ

'—"महावीर्यशाली पुरूरवा, महामना विप्रचित्ति, वहीं शिबि निवास करते हैं, मनु और भूपति इक्ष्वाकु भी —"'

श्लोक 44 (padma.2.64.44)

सगरो नाम मेधावी नहुषश्च पिता तव । ऋतवीर्यः कृतज्ञश्च शंतनुश्च महामनाः

sagaro nāma medhāvī nahuṣaśca pitā tava ṛtavīryaḥ kṛtajñaśca śaṁtanuśca mahāmanāḥ

'—"मेधावी सगर, और आपके पिता नहुष, ऋतवीर्य, कृतज्ञ, और महामना शंतनु —"'

श्लोक 45 (padma.2.64.45)

भरतो युवनाश्वश्च कार्तवीर्यो नरेश्वरः । यज्ञानाहृत्य बहुधा मोदंते दिवि भूभृतः

bharato yuvanāśvaśca kārtavīryo nareśvaraḥ yajñānāhṛtya bahudhā modaṁte divi bhūbhṛtaḥ

'—"भरत, युवनाश्व, और नरेश्वर कार्तवीर्य — ये सभी भूपति, अनेक यज्ञ करके स्वर्ग में आनंद मना रहे हैं।"'

श्लोक 46 (padma.2.64.46)

अन्ये चैव तु राजानो यज्ञकर्मसु तत्पराः । सर्वे ते दिवि चेंद्रेण मोदंते स्वेन कर्मणा

anye caiva tu rājāno yajñakarmasu tatparāḥ sarve te divi ceṁdreṇa modaṁte svena karmaṇā

'—"और यज्ञ-कर्मों में तत्पर अन्य राजा भी — वे सभी अपने ही कर्मों से स्वर्ग में इंद्र के साथ आनंद मना रहे हैं।"'

श्लोक 47 (padma.2.64.47)

त्वं पुनः सर्वधर्मज्ञः सर्वधर्मेषु संस्थितः । शक्रेण सह मोदस्व स्वर्गलोके महीपते

tvaṁ punaḥ sarvadharmajñaḥ sarvadharmeṣu saṁsthitaḥ śakreṇa saha modasva svargaloke mahīpate

'—"आप तो सर्वधर्मज्ञ हैं, समस्त धर्मों में स्थित हैं; हे महीपते! स्वर्गलोक में शक्र के साथ आनंद कीजिए।"'

श्लोक 48 (padma.2.64.48)

ययातिरुवाच- किं मया तत्कृतं कर्म येन मय्यर्थिता तव । इंद्रस्य देवराजस्य तत्सर्वं मे वदस्व च

yayātiruvāca- kiṁ mayā tatkṛtaṁ karma yena mayyarthitā tava iṁdrasya devarājasya tatsarvaṁ me vadasva ca

ययाति ने कहा — 'मैंने ऐसा कौन-सा कर्म किया है, जिससे देवराज इंद्र का यह अनुरोध मुझ तक पहुँचा है? मुझे यह सब बताओ।'

श्लोक 49 (padma.2.64.49)

मातलिरुवाच- यदशीतिसहस्राणि वर्षाणां हि त्वया नृप । दानपुण्यादिकं कर्म यज्ञैस्तु परिसाधितम्

mātaliruvāca- yadaśītisahasrāṇi varṣāṇāṁ hi tvayā nṛpa dānapuṇyādikaṁ karma yajñaistu parisādhitam

मातलि ने कहा — 'हे राजन्! अस्सी हजार वर्षों में आपने यज्ञों के द्वारा जो दान-पुण्य आदि कर्म पूरे किए हैं —'

श्लोक 50 (padma.2.64.50)

दिवं गच्छ महाराज कर्मणा स्वेन भूपते । सखित्वं देवराजेन कुरु गच्छ सुरालयम्

divaṁ gaccha mahārāja karmaṇā svena bhūpate sakhitvaṁ devarājena kuru gaccha surālayam

'—उसी अपने कर्म से, हे महाराज! स्वर्ग को जाइए; देवराज के साथ मित्रता कीजिए — देवलोक को चलिए।'

श्लोक 51 (padma.2.64.51)

पंचात्मकं शरीरं च भूमौ त्यज महामते । दिव्यरूपं समास्थाय भुंक्ष्व भोगान्मनोनुगान्

paṁcātmakaṁ śarīraṁ ca bhūmau tyaja mahāmate divyarūpaṁ samāsthāya bhuṁkṣva bhogānmanonugān

'हे महामते! अपने पंचभूतात्मक शरीर को इसी पृथ्वी पर त्याग दीजिए; दिव्य रूप धारण कर मनोनुकूल भोगों का उपभोग कीजिए।'

श्लोक 52 (padma.2.64.52)

यथायथा कृता भूमौ यज्ञा दानं तपश्च ते । तथातथा स्वर्गभोगाः प्रार्थयंते नरेश्वर

yathāyathā kṛtā bhūmau yajñā dānaṁ tapaśca te tathātathā svargabhogāḥ prārthayaṁte nareśvara

'हे नरेश्वर! जैसे-जैसे आपने पृथ्वी पर यज्ञ, दान और तप किए हैं, वैसे-वैसे ही स्वर्ग के भोग आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।'

श्लोक 53 (padma.2.64.53)

ययातिरुवाच- येन कायेन सिध्येत सुकृतं दुष्कृतं भुवि । मातले तत्कथं त्यक्त्वा गच्छेल्लोकमुपार्जितम्

yayātiruvāca- yena kāyena sidhyeta sukṛtaṁ duṣkṛtaṁ bhuvi mātale tatkathaṁ tyaktvā gacchellokamupārjitam

ययाति ने कहा — 'हे मातले! जिस शरीर से इस पृथ्वी पर पुण्य-पाप सिद्ध होते हैं, उसे त्यागकर मनुष्य अपने अर्जित लोक को कैसे जाता है?'

श्लोक 54 (padma.2.64.54)

मातलिरुवाच- यत्रैवोपार्जितं कायं पंचात्मकमिदं नृप । तत्तत्रैव परित्यज्य दिव्येनैव व्रजंति तम्

mātaliruvāca- yatraivopārjitaṁ kāyaṁ paṁcātmakamidaṁ nṛpa tattatraiva parityajya divyenaiva vrajaṁti tam

मातलि ने कहा — 'हे राजन्! जहाँ यह पंचभूतात्मक शरीर अर्जित हुआ है, वहीं उसे त्यागकर वे केवल दिव्य शरीर से ही जाते हैं।'

श्लोक 55 (padma.2.64.55)

इतरे मानवाः सर्वे पापपुण्यप्रसाधकाः । तेऽपि कायं परित्यज्य अधऊर्ध्वं व्रजंति वै

itare mānavāḥ sarve pāpapuṇyaprasādhakāḥ te'pi kāyaṁ parityajya adhaūrdhvaṁ vrajaṁti vai

'अन्य सभी मनुष्य, जो पाप-पुण्य सिद्ध करते हैं, वे भी शरीर त्यागकर नीचे या ऊपर ही जाते हैं।'

श्लोक 56 (padma.2.64.56)

ययातिरुवाच- पंचात्मकेन कायेन सुकृतं दुष्कृतं नराः । उत्पाद्यैव प्रयांत्येव अधऊर्ध्वं तु मातले

yayātiruvāca- paṁcātmakena kāyena sukṛtaṁ duṣkṛtaṁ narāḥ utpādyaiva prayāṁtyeva adhaūrdhvaṁ tu mātale

ययाति ने कहा — 'हे मातले! मनुष्य पंचभूतात्मक शरीर से पुण्य-पाप उत्पन्न कर, ऊपर या नीचे चले जाते हैं —'

श्लोक 57 (padma.2.64.57)

को विशेषो हि धर्मज्ञ भूमौ कायं परित्यजेत् । पापपुण्यप्रभावाद्वै कायस्य पतनं भवेत्

ko viśeṣo hi dharmajña bhūmau kāyaṁ parityajet pāpapuṇyaprabhāvādvai kāyasya patanaṁ bhavet

'—किंतु हे धर्मज्ञ! भला क्या अंतर है? शरीर तो पृथ्वी पर ही त्यागा जाता है; पाप-पुण्य के प्रभाव से ही शरीर का पतन होता है।'

श्लोक 58 (padma.2.64.58)

दृष्टांतो दृश्यते सूत प्रत्यक्षं मर्त्यमंडले । विशेषं नैव पश्यामि पापपुण्यस्य चाधिकम्

dṛṣṭāṁto dṛśyate sūta pratyakṣaṁ martyamaṁḍale viśeṣaṁ naiva paśyāmi pāpapuṇyasya cādhikam

'हे सूत! यह दृष्टांत मर्त्यलोक में प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है; मुझे इसमें पाप या अधिक पुण्य का कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई देता।'

श्लोक 59 (padma.2.64.59)

सत्यधर्मादिकं कर्म येन कायेन मानवः । समर्जयति वै मर्त्यस्तं कस्माद्विप्रसर्जयेत्

satyadharmādikaṁ karma yena kāyena mānavaḥ samarjayati vai martyastaṁ kasmādviprasarjayet

'जिस शरीर से मनुष्य सत्य-धर्म आदि कर्म अर्जित करता है, उसे भला क्यों छोड़ना पड़े?'

श्लोक 60 (padma.2.64.60)

आत्मा कायश्च द्वावेतौ मित्ररूपावुभावपि । कायं मित्रं परित्यज्य आत्मा याति सुनिश्चितः

ātmā kāyaśca dvāvetau mitrarūpāvubhāvapi kāyaṁ mitraṁ parityajya ātmā yāti suniścitaḥ

'आत्मा और शरीर — ये दोनों मानो परस्पर मित्र-रूप हैं; फिर भी आत्मा अपने मित्र शरीर को त्यागकर निश्चित रूप से चली जाती है।'

श्लोक 61 (padma.2.64.61)

मातलिरुवाच- सत्यमुक्तं त्वया राजन्कायं त्यक्त्वा प्रयाति सः । संबंधो नास्ति तेनापि समं कायेन चात्मनः

mātaliruvāca- satyamuktaṁ tvayā rājankāyaṁ tyaktvā prayāti saḥ saṁbaṁdho nāsti tenāpi samaṁ kāyena cātmanaḥ

मातलि ने कहा — 'हे राजन्! आपने सत्य कहा — आत्मा शरीर त्यागकर चली जाती है; आत्मा का शरीर के साथ वास्तव में कोई संबंध ही नहीं है।'

श्लोक 62 (padma.2.64.62)

यस्मात्पंचत्वरूपोऽयं संधिजर्जरितः सदा । जरया पीड्यमानस्तु व्याधिभिर्दूषितः सदा

yasmātpaṁcatvarūpo'yaṁ saṁdhijarjaritaḥ sadā jarayā pīḍyamānastu vyādhibhirdūṣitaḥ sadā

'क्योंकि यह पंचतत्त्व-रूप शरीर सदा संधियों में जीर्ण होता रहता है, सदा जरा से पीड़ित तथा रोगों से दूषित रहता है।'

श्लोक 63 (padma.2.64.63)

जरादोषैः प्रभग्नोऽसौ अत्र स्थातुं स नेच्छति । आकुलव्याकुलो भूत्वा जीवस्त्यक्त्वा प्रयाति सः

jarādoṣaiḥ prabhagno'sau atra sthātuṁ sa necchati ākulavyākulo bhūtvā jīvastyaktvā prayāti saḥ

'जरा के दोषों से जर्जर होकर वह यहाँ रहना नहीं चाहता; अत्यंत व्याकुल होकर जीव उसे त्यागकर चला जाता है।'

श्लोक 64 (padma.2.64.64)

सत्येन धर्मपुण्यैश्च दानैर्नियमसंयमैः । अश्वमेधादिभिर्यज्ञैस्तीर्थैः संयमनैस्तथा

satyena dharmapuṇyaiśca dānairniyamasaṁyamaiḥ aśvamedhādibhiryajñaistīrthaiḥ saṁyamanaistathā

'सत्य से, धर्म-पुण्य से, दान से, नियम-संयम से, अश्वमेध आदि यज्ञों से, तीर्थों और संयम से भी —'

श्लोक 65 (padma.2.64.65)

सुपुण्यैः सुकृतैश्चान्यैर्जरा नैव प्रधार्यते । पातकैश्च महाराज द्रवते कायमेव सा

supuṇyaiḥ sukṛtaiścānyairjarā naiva pradhāryate pātakaiśca mahārāja dravate kāyameva sā

'—इन तथा अन्य पुण्य-सुकृतों से भी जरा को रोका नहीं जा सकता। और हे महाराज! पापों से तो वह शरीर स्वयं ही गल जाता है।'

श्लोक 66 (padma.2.64.66)

ययातिरुवाच- कस्माज्जरा समुत्पन्ना कस्मात्कायं प्रपीडयेत् । मम विस्तरतस्त्वं च वक्तुमर्हसि सत्तम

yayātiruvāca- kasmājjarā samutpannā kasmātkāyaṁ prapīḍayet mama vistaratastvaṁ ca vaktumarhasi sattama

ययाति ने कहा — 'जरा किससे उत्पन्न होती है? वह शरीर को क्यों पीड़ित करती है? हे सत्तम! आपको मुझे यह विस्तार से बताना चाहिए।'

श्लोक 67 (padma.2.64.67)

मातलिरुवाच- हंत ते वर्णयिष्यामि जरायाः परिकारणम् । यस्माच्चेयं समुद्भूता कायमध्ये नृपोत्तम

mātaliruvāca- haṁta te varṇayiṣyāmi jarāyāḥ parikāraṇam yasmācceyaṁ samudbhūtā kāyamadhye nṛpottama

मातलि ने कहा — 'अच्छा, हे नृपोत्तम! मैं आपको जरा का वास्तविक कारण बताता हूँ — वह शरीर के भीतर किससे उत्पन्न होती है।'

श्लोक 68 (padma.2.64.68)

पंचभूतात्मकः कायो विषयैः पंचभिः श्रितः । यदात्मा त्यजते राजन्स कायः परिधक्ष्यते

paṁcabhūtātmakaḥ kāyo viṣayaiḥ paṁcabhiḥ śritaḥ yadātmā tyajate rājansa kāyaḥ paridhakṣyate

'पंचभूतात्मक शरीर पाँचों विषयों से युक्त रहता है। हे राजन्! जब आत्मा उसे त्याग देती है, तब वह शरीर अग्नि से दग्ध हो जाता है।'

श्लोक 69 (padma.2.64.69)

वह्निना दीप्यमानस्तु सरसो ज्वलते नृप । तस्माद्विजायते धूमो धूमान्मेघाश्च जज्ञिरे

vahninā dīpyamānastu saraso jvalate nṛpa tasmādvijāyate dhūmo dhūmānmeghāśca jajñire

'हे राजन्! अग्नि से प्रज्वलित होता हुआ वह सरस अवस्था में जलता है; उससे धुआँ उत्पन्न होता है, और धुएँ से बादल उत्पन्न होते हैं।'

श्लोक 70 (padma.2.64.70)

मेघादापः प्रवर्तंते अद्भ्यः पृथ्वी प्रकल्पते । जलमायाति साध्वी सा यथा नारी रजस्वला

meghādāpaḥ pravartaṁte adbhyaḥ pṛthvī prakalpate jalamāyāti sādhvī sā yathā nārī rajasvalā

'बादलों से जल उत्पन्न होता है, जल से पृथ्वी बनती है। वह साध्वी जल इस प्रकार आती है जैसे कोई स्त्री ऋतुमती होती है।'

श्लोक 71 (padma.2.64.71)

तस्मात्प्रजायते गंधो गंधाद्रसो नृपोत्तम । रसात्प्रभवते चान्नमन्नाच्छुक्रं न संशयः

tasmātprajāyate gaṁdho gaṁdhādraso nṛpottama rasātprabhavate cānnamannācchukraṁ na saṁśayaḥ

'उससे गंध उत्पन्न होती है, हे नृपोत्तम! गंध से रस उत्पन्न होता है; रस से अन्न उत्पन्न होता है, और अन्न से वीर्य, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 72 (padma.2.64.72)

शुक्राद्धि जायते कायः कुरूपः काय एव च । यथा पृथ्वी सृजेद्गंधान्रसैश्चरति भूतले

śukrāddhi jāyate kāyaḥ kurūpaḥ kāya eva ca yathā pṛthvī sṛjedgaṁdhānrasaiścarati bhūtale

'वीर्य से ही शरीर उत्पन्न होता है — कुरूप, यही शरीर। जैसे पृथ्वी गंधों को उत्पन्न करती है और अपने रसों से इस भूतल पर विचरण करती है —'

श्लोक 73 (padma.2.64.73)

तथा कायश्चरेन्नित्यं रसाधारो हि सर्वशः । गंधश्च जायते तस्माद्गंधाद्रसो भवेत्पुनः

tathā kāyaścarennityaṁ rasādhāro hi sarvaśaḥ gaṁdhaśca jāyate tasmādgaṁdhādraso bhavetpunaḥ

'—वैसे ही शरीर भी सदा रस के आधार पर सर्वथा गतिमान रहता है; उससे गंध उत्पन्न होती है, और गंध से पुनः रस बनता है।'

श्लोक 74 (padma.2.64.74)

तस्माज्जज्ञे महावह्निर्दृष्टांतं पश्य भूपते । यथा काष्ठाद्भवेद्वह्निः पुनः काष्ठं प्रकाशयेत्

tasmājjajñe mahāvahnirdṛṣṭāṁtaṁ paśya bhūpate yathā kāṣṭhādbhavedvahniḥ punaḥ kāṣṭhaṁ prakāśayet

'उससे महान अग्नि उत्पन्न होती है — हे भूपते! दृष्टांत देखिए: जैसे काष्ठ से अग्नि उत्पन्न होती है, और वही अग्नि पुनः काष्ठ को प्रकाशित करती है —'

श्लोक 75 (padma.2.64.75)

कायमध्ये रसादग्निस्तद्वदेव प्रजायते । तत्र संचरते नित्यं कायं पुष्णाति भूपते

kāyamadhye rasādagnistadvadeva prajāyate tatra saṁcarate nityaṁ kāyaṁ puṣṇāti bhūpate

'—वैसे ही शरीर के भीतर रस से अग्नि उत्पन्न होती है; हे भूपते! वह वहीं सदा संचरित होकर शरीर का पोषण करती है।'

श्लोक 76 (padma.2.64.76)

यावद्रसस्य चाधिक्यं तावज्जीवः प्रशांतिमान् । चरित्वा तादृशं वह्निः क्षुधारूपेण वर्तते

yāvadrasasya cādhikyaṁ tāvajjīvaḥ praśāṁtimān caritvā tādṛśaṁ vahniḥ kṣudhārūpeṇa vartate

'जब तक रस की प्रचुरता रहती है, तब तक जीव शांत रहता है; किंतु उस रस को भोगकर वही अग्नि क्षुधा के रूप में प्रकट होती है।'

श्लोक 77 (padma.2.64.77)

अन्नमिच्छत्यसौ तीव्रः पयसा च समन्वितम् । प्रदानं लभते चान्नमुदकं चापि भूपते

annamicchatyasau tīvraḥ payasā ca samanvitam pradānaṁ labhate cānnamudakaṁ cāpi bhūpate

'वह तीव्र अग्नि तब जल-मिश्रित अन्न की इच्छा करती है; और हे भूपते! उसे दिया गया अन्न और जल प्राप्त होता है।'

श्लोक 78 (padma.2.64.78)

शोणितं चरते वह्निस्तद्वद्वीर्यं न संशयः । यक्ष्मरोगो भवेत्तस्मात्सर्वकायप्रणाशकः

śoṇitaṁ carate vahnistadvadvīryaṁ na saṁśayaḥ yakṣmarogo bhavettasmātsarvakāyapraṇāśakaḥ

'वह अग्नि रक्त में तथा वीर्य में भी संचरित होती है, इसमें संदेह नहीं; इसी से क्षय रोग उत्पन्न होता है, जो समस्त शरीर का नाश करने वाला है।'

श्लोक 79 (padma.2.64.79)

रसाधिक्यं भवेद्राजन्नथ वह्निः प्रशाम्यति । रसेन पीड्यमानस्तु ज्वररूपोभिजायते

rasādhikyaṁ bhavedrājannatha vahniḥ praśāmyati rasena pīḍyamānastu jvararūpobhijāyate

'हे राजन्! जब रस की अधिकता होती है, तब अग्नि शांत हो जाती है; किंतु उसी रस से पीड़ित होकर वह ज्वर के रूप में प्रकट होती है।'

श्लोक 80 (padma.2.64.80)

ग्रीवा पृष्ठं कटिं पायुं सर्वास्वेव तु संधिषु । आरुध्य तिष्ठते वह्निः काये वह्निः प्रवर्तते

grīvā pṛṣṭhaṁ kaṭiṁ pāyuṁ sarvāsveva tu saṁdhiṣu ārudhya tiṣṭhate vahniḥ kāye vahniḥ pravartate

'वह अग्नि गर्दन, पीठ, कमर, गुदा तथा सभी संधियों में जाकर रुक जाती है; इस प्रकार वह अग्नि शरीर में संचरित होती रहती है।'

श्लोक 81 (padma.2.64.81)

तस्याऽधिक्यं चरेन्नित्यं कायं पुष्णाति सर्वतः । रसस्तु बंधमायाति बलरूपो भवेत्तदा

tasyā'dhikyaṁ carennityaṁ kāyaṁ puṣṇāti sarvataḥ rasastu baṁdhamāyāti balarūpo bhavettadā

'उसकी अधिकता सदा संचरित होकर शरीर को सर्वत्र पुष्ट करती है; और रस स्वयं बद्ध होकर तब बल का रूप धारण कर लेता है।'

श्लोक 82 (padma.2.64.82)

अतिरिक्तो बलेनैव वीर्यान्मर्माणि चालयेत् । तेनैव जायते कामः शल्यरूपो भवेन्नृप

atirikto balenaiva vīryānmarmāṇi cālayet tenaiva jāyate kāmaḥ śalyarūpo bhavennṛpa

'वह अतिरिक्त बल अपने वीर्य से शरीर के मर्मस्थलों को कंपित कर देता है; और उसी से काम उत्पन्न होता है, हे राजन्! जो शल्य (काँटे) के रूप में होता है।'

श्लोक 83 (padma.2.64.83)

सकामाग्निः समाख्यातो बलनाशकरो नृप । मैथुनस्य प्रसंगेन विनाशत्वं कलेवरे

sakāmāgniḥ samākhyāto balanāśakaro nṛpa maithunasya prasaṁgena vināśatvaṁ kalevare

'हे राजन्! इसी को कामाग्नि कहा गया है, जो बल का नाश करने वाली है; मैथुन के प्रसंग से शरीर का विनाश होता है।'

श्लोक 84 (padma.2.64.84)

नारीं च संश्रयेत्प्राणी पीडितः कामवह्निना । मैथुनस्य प्रसंगेन मूर्छितः कामकर्शितः

nārīṁ ca saṁśrayetprāṇī pīḍitaḥ kāmavahninā maithunasya prasaṁgena mūrchitaḥ kāmakarśitaḥ

'काम की अग्नि से पीड़ित प्राणी स्त्री का आश्रय लेता है; मैथुन के प्रसंग से, काम से क्षीण होकर वह मूर्छित हो जाता है।'

श्लोक 85 (padma.2.64.85)

तेजोहीनो भवेत्कायो बलहानिश्च जायते । बलहीनो यदा स्याद्वै दुर्बलो वह्निनेरितः

tejohīno bhavetkāyo balahāniśca jāyate balahīno yadā syādvai durbalo vahnineritaḥ

'शरीर तेजहीन हो जाता है, और बल की हानि होती है; और जब वह इस प्रकार निर्बल हो जाता है, उस अग्नि से प्रेरित होकर —'

श्लोक 86 (padma.2.64.86)

स वह्निः प्रचरेत्काये शोणितं शुक्रमेव च । शुक्रशोणितयोर्नाशाच्छून्यदेहोभिजायते

sa vahniḥ pracaretkāye śoṇitaṁ śukrameva ca śukraśoṇitayornāśācchūnyadehobhijāyate

'—वह अग्नि शरीर में, रक्त और वीर्य दोनों में संचरित होती है; और वीर्य-रक्त के नाश से देह शून्य हो जाती है।'

श्लोक 87 (padma.2.64.87)

अतीव जायते वायुः प्रचंडो दारुणाकृतिः । विवर्णो दुःखसंतप्तः शून्यबुद्धिस्ततो भवेत्

atīva jāyate vāyuḥ pracaṁḍo dāruṇākṛtiḥ vivarṇo duḥkhasaṁtaptaḥ śūnyabuddhistato bhavet

'तब अत्यंत प्रचंड, भयंकर रूप वाली वायु उत्पन्न होती है; मनुष्य विवर्ण, दुःख-संतप्त हो जाता है, और उसकी बुद्धि शून्य हो जाती है।'

श्लोक 88 (padma.2.64.88)

दृष्टा श्रुता तु या नारी तच्चित्तो भ्रमते सदा । तृप्तिर्न जायते काये लोलुपे चित्तवर्त्मनि

dṛṣṭā śrutā tu yā nārī taccitto bhramate sadā tṛptirna jāyate kāye lolupe cittavartmani

'उसका चित्त उस स्त्री की ओर सदा भटकता रहता है जिसे उसने देखा या सुना है; उस लोलुप, चित्त के मार्ग में भटकते शरीर में कोई तृप्ति नहीं होती।'

श्लोक 89 (padma.2.64.89)

विरूपश्च सुरूपश्च ध्यानान्मध्ये प्रजायते । बलहीनो यदा कामी मांसशोणितसंक्षयात्

virūpaśca surūpaśca dhyānānmadhye prajāyate balahīno yadā kāmī māṁsaśoṇitasaṁkṣayāt

'ऐसे ध्यान के बीच रूपवान और कुरूप दोनों समान रूप से प्रकट होते हैं; जब कामी पुरुष मांस-रक्त के क्षय से निर्बल हो जाता है —'

श्लोक 90 (padma.2.64.90)

पलितं जायते काये नाशिते कामवह्निना । तस्मात्संजायते कामी वृद्धो भूत्वा दिनेदिने

palitaṁ jāyate kāye nāśite kāmavahninā tasmātsaṁjāyate kāmī vṛddho bhūtvā dinedine

'—तब काम की अग्नि से नष्ट होते हुए शरीर में सफेद बाल उत्पन्न होते हैं; और इस प्रकार कामी पुरुष प्रतिदिन वृद्ध होता जाता है।'

श्लोक 91 (padma.2.64.91)

सुरते चिंतते नारीं यथा वार्द्धुषिको नरः । तथातथा भवेद्धानिस्तेजसोऽस्य नरेश्वर

surate ciṁtate nārīṁ yathā vārddhuṣiko naraḥ tathātathā bhaveddhānistejaso'sya nareśvara

'हे नरेश्वर! जैसे सूदखोर मनुष्य ब्याज का सदा चिंतन करता है, वैसे ही जितना अधिक मनुष्य स्त्री-संभोग का चिंतन करता है, उतनी ही उसके तेज की हानि होती जाती है।'

श्लोक 92 (padma.2.64.92)

तस्मात्प्रजायते कायो नाशरूपं समृच्छति । अग्निः प्रजायते भूयो जरारूपो न संशयः

tasmātprajāyate kāyo nāśarūpaṁ samṛcchati agniḥ prajāyate bhūyo jarārūpo na saṁśayaḥ

'इससे शरीर विनाश की अवस्था को प्राप्त होता है; और वही अग्नि पुनः जरा के रूप में प्रकट होती है, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 93 (padma.2.64.93)

प्राणिनां क्षयरूपेण ज्वरो भवति दारुणः । स्थावरा जंगमाः सर्वे ज्वरेण परिपीडिताः

prāṇināṁ kṣayarūpeṇa jvaro bhavati dāruṇaḥ sthāvarā jaṁgamāḥ sarve jvareṇa paripīḍitāḥ

'प्राणियों में क्षय के रूप में एक भयंकर ज्वर उत्पन्न होता है; समस्त स्थावर-जंगम प्राणी उस ज्वर से पीड़ित होते हैं।'

श्लोक 94 (padma.2.64.94)

नाशमायांति ते सर्वे बहुपीडा प्रपीडिताः । एतत्ते सर्वमाख्यातमन्यत्किं ते वदाम्यहम्

nāśamāyāṁti te sarve bahupīḍā prapīḍitāḥ etatte sarvamākhyātamanyatkiṁ te vadāmyaham

'वे सभी अनेक पीड़ाओं से पीड़ित होकर नाश को प्राप्त होते हैं। यह सब तुम्हें बता दिया गया — अब और क्या बताऊँ?'

श्लोक 95 (padma.2.64.95)

एवमुक्तो महाराजो मातलिं वाक्यमब्रवीत्

evamukto mahārājo mātaliṁ vākyamabravīt

इस प्रकार कहे जाने पर, उस महाराज ने मातलि से यह वचन कहा।

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