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भूमि खण्ड · अध्याय 71

मातलि द्वारा देवलोकों का वर्णन

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72

श्लोक 1 (padma.2.71.1)

ययातिरुवाच- यत्त्वया सर्वमाख्यातं धर्माधर्ममनुत्तमम् । शृण्वतोऽथ मम श्रद्धा पुनरेव प्रवर्तते

yayātiruvāca- yattvayā sarvamākhyātaṁ dharmādharmamanuttamam śṛṇvato'tha mama śraddhā punareva pravartate

ययाति ने कहा - आपने मुझे धर्म और अधर्म के विषय में जो कुछ भी अनुपम कहा, उसे सुनकर मेरी श्रद्धा पुनः जाग्रत हो उठी है।

श्लोक 2 (padma.2.71.2)

देवानां लोकसंस्थानां वद संख्याः प्रकीर्तिताः । यस्य पुण्यप्रसंगेन येन प्राप्तं च मातले

devānāṁ lokasaṁsthānāṁ vada saṁkhyāḥ prakīrtitāḥ yasya puṇyaprasaṁgena yena prāptaṁ ca mātale

हे मातले! देवताओं के लोकों की जो संख्याएँ बताई गई हैं, वे मुझे बताइए - किसके पुण्य-प्रभाव से और किसके द्वारा वह प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (padma.2.71.3)

मातलिरुवाच- योगयुक्तं प्रवक्ष्यामि तपसा यदुपार्जितम् । देवानां लोकसंस्थानं सुखभोगप्रदायकम्

mātaliruvāca- yogayuktaṁ pravakṣyāmi tapasā yadupārjitam devānāṁ lokasaṁsthānaṁ sukhabhogapradāyakam

मातलि ने कहा - मैं योगयुक्त होकर वह बताऊँगा जो तप से अर्जित किया जाता है - देवताओं के उन लोकों की व्यवस्था, जो सुखभोग प्रदान करने वाली है।

श्लोक 4 (padma.2.71.4)

धर्मभावं प्रवक्ष्यामि आयासैरर्जितं पृथक् । उपरिष्टाच्च लोकानां स्वरूपं चाप्यनुक्रमात्

dharmabhāvaṁ pravakṣyāmi āyāsairarjitaṁ pṛthak upariṣṭācca lokānāṁ svarūpaṁ cāpyanukramāt

मैं क्रमशः उस पुण्यभाव को बताऊँगा जो परिश्रम से अर्जित होता है, और ऊपर के लोकों का स्वरूप भी क्रमानुसार कहूँगा।

श्लोक 5 (padma.2.71.5)

तत्राष्टगुणमैश्वर्यं पार्थिवं पिशिताशिनाम् । तस्मात्सद्यो गतानां च नराणां तत्समं स्मृतम्

tatrāṣṭaguṇamaiśvaryaṁ pārthivaṁ piśitāśinām tasmātsadyo gatānāṁ ca narāṇāṁ tatsamaṁ smṛtam

वहाँ मांसाहारी प्राणियों का पार्थिव ऐश्वर्य आठ गुना है; और जो मनुष्य अकस्मात् मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका ऐश्वर्य भी उसके समान माना गया है।

श्लोक 6 (padma.2.71.6)

रक्षसां षोडशगुणं पार्थिवानां च तद्विधम् । एवं निरवशेषं च यच्छेषं कुलतेजसाम्

rakṣasāṁ ṣoḍaśaguṇaṁ pārthivānāṁ ca tadvidham evaṁ niravaśeṣaṁ ca yaccheṣaṁ kulatejasām

राक्षसों का ऐश्वर्य सोलह गुना है, तथा उसी प्रकार के पार्थिव प्राणियों का भी वैसा ही है; इस प्रकार जो कुछ शेष रहता है, वह उनके कुल के तेज का है।

श्लोक 7 (padma.2.71.7)

गंधर्वाणां च वायव्यं याक्षं च सकलं स्मृतम् । पांचभौतिकमिंद्रस्य चत्वारिंशद्गुणं महत्

gaṁdharvāṇāṁ ca vāyavyaṁ yākṣaṁ ca sakalaṁ smṛtam pāṁcabhautikamiṁdrasya catvāriṁśadguṇaṁ mahat

गंधर्वों का ऐश्वर्य वायव्य प्रकार का और यक्षों का समूचा ऐश्वर्य माना गया है; इंद्र का ऐश्वर्य पांचभौतिक और चालीस गुना महान है।

श्लोक 8 (padma.2.71.8)

सोमस्य मानसं दिव्यं विश्वेशं पांचभौतिकम् । सौम्यं प्रजापतीशानामहंकारगुणाधिकम्

somasya mānasaṁ divyaṁ viśveśaṁ pāṁcabhautikam saumyaṁ prajāpatīśānāmahaṁkāraguṇādhikam

सोम का ऐश्वर्य मानसिक, दिव्य, विश्वेश्वर-रूप और पांचभौतिक है; प्रजापतियों का सौम्य ऐश्वर्य अहंकार-तत्त्व के गुण से भी अधिक है।

श्लोक 9 (padma.2.71.9)

चतुष्षष्टिगुणं ब्राह्मं बौधमैश्वर्यमुत्तमम् । विष्णोः प्राधानिकं तंत्रमैश्वर्यं ब्रह्मणः पदम्

catuṣṣaṣṭiguṇaṁ brāhmaṁ baudhamaiśvaryamuttamam viṣṇoḥ prādhānikaṁ taṁtramaiśvaryaṁ brahmaṇaḥ padam

ब्रह्मा का बुद्धिमय ऐश्वर्य चौंसठ गुना और उत्तम है; विष्णु का ऐश्वर्य प्रधान-तत्त्व से संबंधित है, वही ब्रह्म का पद है।

श्लोक 10 (padma.2.71.10)

श्रीमच्छिवपुरे दिव्ये ऐश्वर्यं सर्वकामिकम् । अनंतगुणमैश्वर्यं शिवस्यात्मगुणं महत्

śrīmacchivapure divye aiśvaryaṁ sarvakāmikam anaṁtaguṇamaiśvaryaṁ śivasyātmaguṇaṁ mahat

श्रीमान् दिव्य शिवपुर में ऐश्वर्य समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है; शिव का ऐश्वर्य अनंत गुना है, जो उनका स्वाभाविक महान गुण है।

श्लोक 11 (padma.2.71.11)

आदिमध्यांतरहितं विशुद्धं तत्त्वलक्षणम् । सर्वावभासकं सूक्ष्ममनौपम्यं परात्परम्

ādimadhyāṁtarahitaṁ viśuddhaṁ tattvalakṣaṇam sarvāvabhāsakaṁ sūkṣmamanaupamyaṁ parātparam

वह आदि, मध्य और अंत से रहित, पूर्णतः विशुद्ध, तत्त्व का लक्षण है - सबको प्रकाशित करने वाला, सूक्ष्म, अनुपम और परम से भी परे है।

श्लोक 12 (padma.2.71.12)

सुसंपूर्णं जगद्वेषं पशुपाशाविमोक्षणम् । यो यत्स्थानमनुप्राप्तस्तस्य भोगस्तदात्मकः

susaṁpūrṇaṁ jagadveṣaṁ paśupāśāvimokṣaṇam yo yatsthānamanuprāptastasya bhogastadātmakaḥ

वह पूर्ण रूप से जगत में व्याप्त है और जीव को पाश से मुक्त करने वाला है; जो जिस स्थान को प्राप्त करता है, उसका भोग भी उसी के अनुरूप होता है।

श्लोक 13 (padma.2.71.13)

विमानं तत्समानं च भवेदीशप्रसादतः । नानारूपाणि ताराणां दृश्यंते कोटयस्त्विमा

vimānaṁ tatsamānaṁ ca bhavedīśaprasādataḥ nānārūpāṇi tārāṇāṁ dṛśyaṁte koṭayastvimā

ईश्वर की कृपा से उस स्थान के अनुरूप विमान प्राप्त होता है; और तारों के जो अनेक रूप दिखाई देते हैं, वे इन्हीं आत्माओं के करोड़ों रूप हैं।

श्लोक 14 (padma.2.71.14)

अष्टविंशतिरेवं ते संदीप्ताः सुकृतात्मनाम् । ये कुर्वंति नमस्कारमीश्वराय क्वचित्क्वचित्

aṣṭaviṁśatirevaṁ te saṁdīptāḥ sukṛtātmanām ye kurvaṁti namaskāramīśvarāya kvacitkvacit

इस प्रकार पुण्यात्माओं के लिए अट्ठाईस लोक देदीप्यमान हैं - उनके लिए जो कभी-कभी भी ईश्वर को नमस्कार करते हैं।

श्लोक 15 (padma.2.71.15)

संपर्कात्कौतुकाल्लोभात्तद्विमानं लभंति ते । नामसंकीर्तनाद्वापि प्रसंगेन शिवस्य यः

saṁparkātkautukāllobhāttadvimānaṁ labhaṁti te nāmasaṁkīrtanādvāpi prasaṁgena śivasya yaḥ

संपर्क से, कौतूहल से अथवा लोभ से भी वे उस विमान को प्राप्त कर लेते हैं; अथवा जो कभी प्रसंगवश भी शिव के नाम का संकीर्तन करता है -

श्लोक 16 (padma.2.71.16)

कुर्याद्वापि नमस्कारं न तस्य विलयो भवेत् । इत्येता गतयस्तत्र महत्यः शिवकर्मणि

kuryādvāpi namaskāraṁ na tasya vilayo bhavet ityetā gatayastatra mahatyaḥ śivakarmaṇi

अथवा जो एक बार भी प्रणाम कर ले, उसका कभी विनाश नहीं होता। ये सब शिव-कर्म से प्राप्त होने वाली महान गतियाँ हैं।

श्लोक 17 (padma.2.71.17)

कर्मणाभ्यंतरेणापि पुंसामीशानभावतः । प्रसंगेनापि ये कुर्युः शंकरस्मरणं नराः

karmaṇābhyaṁtareṇāpi puṁsāmīśānabhāvataḥ prasaṁgenāpi ye kuryuḥ śaṁkarasmaraṇaṁ narāḥ

भीतर से किए गए कर्म से भी, ईश्वर के प्रति भाव रखते हुए, जो मनुष्य प्रसंगवश भी शंकर का स्मरण कर लेते हैं -

श्लोक 18 (padma.2.71.18)

तैर्लभ्यं त्वतुलं सौख्यं किं पुनस्तत्परायणैः । विष्णुचिंतां प्रकुर्वंति ध्यानेन गतमानसाः

tairlabhyaṁ tvatulaṁ saukhyaṁ kiṁ punastatparāyaṇaiḥ viṣṇuciṁtāṁ prakurvaṁti dhyānena gatamānasāḥ

उनके द्वारा भी अतुलनीय सुख प्राप्त होता है, तो उन लोगों की तो बात ही क्या जो पूर्णतः उसी में तत्पर रहते हैं! जो लोग ध्यानलीन मन से विष्णु का चिंतन करते हैं -

श्लोक 19 (padma.2.71.19)

ते यांति परमं स्थानं तद्विष्णोः परमं पदम् । शैवं च वैष्णवं रूपमेकरूपं नरोत्तम

te yāṁti paramaṁ sthānaṁ tadviṣṇoḥ paramaṁ padam śaivaṁ ca vaiṣṇavaṁ rūpamekarūpaṁ narottama

वे विष्णु के उस परम पद, परम स्थान को प्राप्त करते हैं। हे नरोत्तम! शिव का रूप और विष्णु का रूप - दोनों एक ही रूप हैं।

श्लोक 20 (padma.2.71.20)

द्वयोश्च अंतरं नास्ति एकरूपमहात्मनोः । शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे

dvayośca aṁtaraṁ nāsti ekarūpamahātmanoḥ śivāya viṣṇurūpāya śivarūpāya viṣṇave

दोनों महात्माओं में कोई अंतर नहीं है, वे एकरूप हैं - विष्णु-रूप धारण करने वाले शिव को, और शिव-रूप धारण करने वाले विष्णु को नमस्कार है।

श्लोक 21 (padma.2.71.21)

शिवस्य हृदयं विष्णुर्विष्णोश्च हृदयं शिवः । एकमूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः

śivasya hṛdayaṁ viṣṇurviṣṇośca hṛdayaṁ śivaḥ ekamūrtistrayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ

विष्णु शिव का हृदय हैं, और शिव विष्णु का हृदय हैं; ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर - ये तीनों देवता एक ही मूर्ति हैं।

श्लोक 22 (padma.2.71.22)

त्रयाणामंतरं नास्ति गुणभेदाः प्रकीर्तिताः । शिवभक्तोसि राजेंद्र तथा भागवतोसि वै

trayāṇāmaṁtaraṁ nāsti guṇabhedāḥ prakīrtitāḥ śivabhaktosi rājeṁdra tathā bhāgavatosi vai

तीनों में कोई अंतर नहीं है, जो भेद बताए गए हैं वे केवल गुणों के कारण हैं। हे राजेंद्र! आप शिवभक्त भी हैं और साथ ही भागवत (विष्णुभक्त) भी हैं।

श्लोक 23 (padma.2.71.23)

तेन देवाः प्रसन्नास्ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । सुप्रीता वरदा राजन्कर्मणस्तव सुव्रत

tena devāḥ prasannāste brahmaviṣṇumaheśvarāḥ suprītā varadā rājankarmaṇastava suvrata

इसी कारण ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर - ये देवता आपसे प्रसन्न हैं; हे सुव्रत राजन्! वे आपके कर्मों से अत्यंत प्रसन्न होकर वरदान देने वाले हैं।

श्लोक 24 (padma.2.71.24)

इंद्रादेशात्समायातः सन्निधौ तव मानद । ऐंद्रमेनं पदं याहि पश्चाद्ब्राह्मं महेश्वरम्

iṁdrādeśātsamāyātaḥ sannidhau tava mānada aiṁdramenaṁ padaṁ yāhi paścādbrāhmaṁ maheśvaram

हे मानद! इंद्र की आज्ञा से मैं आपके समीप आया हूँ। अब आप पहले इस ऐंद्र पद को प्राप्त कीजिए, और उसके पश्चात् ब्राह्म और महेश्वर पद को -

श्लोक 25 (padma.2.71.25)

वैष्णवं च प्रयाहि त्वं दाहप्रलयवर्जितम् । अनेनापि विमानेन दिव्येन सर्वगामिना

vaiṣṇavaṁ ca prayāhi tvaṁ dāhapralayavarjitam anenāpi vimānena divyena sarvagāminā

और फिर उस वैष्णव पद को प्राप्त कीजिए, जो दाह और प्रलय से रहित है - इसी दिव्य, सर्वगामी विमान के द्वारा।

श्लोक 26 (padma.2.71.26)

दिव्यमूर्तिरतो भुंक्ष्व दिव्यभोगान्मनोरमान् । समारुह्य विमानं त्वं पुष्पकं सुखगामिनम्

divyamūrtirato bhuṁkṣva divyabhogānmanoramān samāruhya vimānaṁ tvaṁ puṣpakaṁ sukhagāminam

दिव्य शरीर धारण कर, इस सुखपूर्वक चलने वाले पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर, आप मनोरम दिव्य भोगों का उपभोग कीजिए।

श्लोक 27 (padma.2.71.27)

सुकर्मोवाच- एवमुक्त्वा द्विजश्रेष्ठ मौनवान्मातलिस्तदा । राजानं धर्मतत्त्वज्ञं ययातिं नहुषात्मजम्

sukarmovāca- evamuktvā dvijaśreṣṭha maunavānmātalistadā rājānaṁ dharmatattvajñaṁ yayātiṁ nahuṣātmajam

सुकर्मा ने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! ऐसा कहकर मातलि, धर्मतत्त्व के ज्ञाता, नहुषपुत्र राजा ययाति के समक्ष मौन हो गए।

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