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भूमि खण्ड · अध्याय 74

समस्त पृथ्वी का विष्णु की ओर उन्मुख होना

अध्याय 73अध्याय-सूचीअध्याय 75

श्लोक 1 (padma.2.74.1)

सुकर्मोवाच- दूतास्तु ग्रामेषु वदंति सर्वे द्वीपेषु देशेष्वथ पत्तनेषु । लोकाः शृणुध्वं नृपतेस्तदाज्ञां सर्वप्रभावैर्हरिमर्चयंतु

sukarmovāca- dūtāstu grāmeṣu vadaṁti sarve dvīpeṣu deśeṣvatha pattaneṣu lokāḥ śṛṇudhvaṁ nṛpatestadājñāṁ sarvaprabhāvairharimarcayaṁtu

सुकर्मा ने कहा - दूतों ने सभी गाँवों में, द्वीपों में, देशों में और नगरों में जाकर कहा - हे लोगो! राजा की यह आज्ञा सुनो, सब प्रकार के प्रभाव से हरि की अर्चना करो।

श्लोक 2 (padma.2.74.2)

दानैश्च यज्ञैर्बहुभिस्तपोभिर्धर्माभिलाषैर्यजनैर्मनोभिः । ध्यायंतु लोका मधुसूदनं तु आदेशमेवं नृपतेस्तु तस्य

dānaiśca yajñairbahubhistapobhirdharmābhilāṣairyajanairmanobhiḥ dhyāyaṁtu lokā madhusūdanaṁ tu ādeśamevaṁ nṛpatestu tasya

दान से, अनेक यज्ञों से, तप से, धर्म की अभिलाषा से, पूजन से और मन से लोग मधुसूदन का ध्यान करें - राजा की यही आज्ञा थी।

श्लोक 3 (padma.2.74.3)

एवं सुघुष्टं सकलं तु पुण्यमाकर्ण्य तं भूमितलेषु लोकैः । तदाप्रभृत्येव यजंति विष्णुं ध्यायंति गायंति जपंति मर्त्याः

evaṁ sughuṣṭaṁ sakalaṁ tu puṇyamākarṇya taṁ bhūmitaleṣu lokaiḥ tadāprabhṛtyeva yajaṁti viṣṇuṁ dhyāyaṁti gāyaṁti japaṁti martyāḥ

इस प्रकार सर्वत्र गूँजते इस पवित्र आदेश को पृथ्वी पर लोगों ने सुना; और तभी से मनुष्य विष्णु की पूजा करने लगे, ध्यान करने लगे, गुणगान करने लगे और जप करने लगे।

श्लोक 4 (padma.2.74.4)

वेदप्रणीतैश्च सुसूक्तमंत्रैः स्तोत्रैः सुपुण्यैरमृतोपमानैः । श्रीकेशवं तद्गतमानसास्ते व्रतोपवासैर्नियमैश्च दानैः

vedapraṇītaiśca susūktamaṁtraiḥ stotraiḥ supuṇyairamṛtopamānaiḥ śrīkeśavaṁ tadgatamānasāste vratopavāsairniyamaiśca dānaiḥ

वेद-कथित सुंदर सूक्त-मंत्रों से, अमृत-तुल्य पवित्र स्तोत्रों से, मन को उन्हीं में लगाकर, व्रत, उपवास, नियम और दान के द्वारा वे श्रीकेशव की आराधना करने लगे।

श्लोक 5 (padma.2.74.5)

विहाय दोषान्निजकायचित्तवागुद्भवान्प्रेमरताः समस्ताः । लक्ष्मीनिवासं जगतां निवासं श्रीवासुदेवं परिपूजयंति

vihāya doṣānnijakāyacittavāgudbhavānpremaratāḥ samastāḥ lakṣmīnivāsaṁ jagatāṁ nivāsaṁ śrīvāsudevaṁ paripūjayaṁti

अपने शरीर, मन और वाणी से उत्पन्न दोषों को त्यागकर, सब प्रेमपरायण होकर, वे लक्ष्मी के निवास, जगत के निवास श्री वासुदेव की पूजा करने लगे।

श्लोक 6 (padma.2.74.6)

इत्याज्ञातस्य भूपस्य वर्तते क्षितिमंडले । वैष्णवेनापि भावेन जनाः सर्वे जयंति ते

ityājñātasya bhūpasya vartate kṣitimaṁḍale vaiṣṇavenāpi bhāvena janāḥ sarve jayaṁti te

इस प्रकार उस राजा की आज्ञा से पृथ्वीमंडल में वैष्णव भाव से ही सभी लोग विजयी हुए।

श्लोक 7 (padma.2.74.7)

नामभिः कर्मभिर्विष्णुं यजंते ज्ञानकोविदाः । तद्ध्यानास्तद्व्यवसिता विष्णुपूजापरायणाः

nāmabhiḥ karmabhirviṣṇuṁ yajaṁte jñānakovidāḥ taddhyānāstadvyavasitā viṣṇupūjāparāyaṇāḥ

ज्ञान में निपुण लोग नाम और कर्म से विष्णु का पूजन करते थे; वे उन्हीं का ध्यान करते, उन्हीं में स्थिर रहते, उन्हीं की पूजा में तत्पर रहते थे।

श्लोक 8 (padma.2.74.8)

यावद्भूमंडलं सर्वं यावत्तपति भास्करः । तावद्धि मानवा लोकाः सर्वे भागवता बभुः

yāvadbhūmaṁḍalaṁ sarvaṁ yāvattapati bhāskaraḥ tāvaddhi mānavā lokāḥ sarve bhāgavatā babhuḥ

जब तक यह समस्त पृथ्वीमंडल है, जब तक सूर्य तपता रहेगा, तब तक संसार के सभी मनुष्य भागवत (विष्णुभक्त) बने रहे।

श्लोक 9 (padma.2.74.9)

विष्णोर्ध्यानप्रभावेण पूजास्तोत्रेण नामतः । आधिव्याधिविहीनास्ते संजाता मानवास्तदा

viṣṇordhyānaprabhāveṇa pūjāstotreṇa nāmataḥ ādhivyādhivihīnāste saṁjātā mānavāstadā

विष्णु के ध्यान के प्रभाव से, पूजा-स्तोत्र और नाम-जप से, मनुष्य उस समय शारीरिक और मानसिक व्याधियों से रहित हो गए।

श्लोक 10 (padma.2.74.10)

वीतशोकाश्च पुण्याश्च सर्वे चैव तपोधनाः । संजाता वैष्णवा विप्र प्रसादात्तस्य चक्रिणः

vītaśokāśca puṇyāśca sarve caiva tapodhanāḥ saṁjātā vaiṣṇavā vipra prasādāttasya cakriṇaḥ

हे विप्र! शोकरहित, पुण्यवान और तपोधन होकर सब लोग उस चक्रधारी की कृपा से वैष्णव बन गए।

श्लोक 11 (padma.2.74.11)

आमयैश्च विहीनास्ते दोषैरोषैश्च वर्जिताः । सर्वैश्वर्यसमापन्नाः सर्वरोगविवर्जिताः

āmayaiśca vihīnāste doṣairoṣaiśca varjitāḥ sarvaiśvaryasamāpannāḥ sarvarogavivarjitāḥ

वे रोगों से रहित, दोष और क्रोध से मुक्त, समस्त ऐश्वर्य से संपन्न और समस्त रोगों से रहित हो गए।

श्लोक 12 (padma.2.74.12)

प्रसादात्तस्य देवस्य संजाता मानवास्तदा । अमराः निर्जराः सर्वे धनधान्यसमन्विताः

prasādāttasya devasya saṁjātā mānavāstadā amarāḥ nirjarāḥ sarve dhanadhānyasamanvitāḥ

उस देव की कृपा से मनुष्य उस समय मानो अमर और जरारहित हो गए, सभी धन-धान्य से संपन्न हो गए।

श्लोक 13 (padma.2.74.13)

मर्त्या विष्णुप्रसादेन पुत्रपौत्रैरलंकृताः । तेषामेव महाभाग गृहद्वारेषु नित्यदा

martyā viṣṇuprasādena putrapautrairalaṁkṛtāḥ teṣāmeva mahābhāga gṛhadvāreṣu nityadā

मनुष्य विष्णु की कृपा से पुत्र-पौत्रों से सुशोभित हो गए। हे महाभाग! उन्हीं के घरों के द्वारों पर सदा -

श्लोक 14 (padma.2.74.14)

कल्पद्रुमाः सुपुण्यास्ते सर्वकामफलप्रदाः । सर्वकामदुघा गावः सचिंतामणयस्तथा

kalpadrumāḥ supuṇyāste sarvakāmaphalapradāḥ sarvakāmadughā gāvaḥ saciṁtāmaṇayastathā

पुण्यमय कल्पवृक्ष खड़े रहते थे, जो सभी कामनाओं के फल देने वाले थे; सभी कामनाएँ पूर्ण करने वाली गौएँ और चिंतामणि भी वहाँ थीं।

श्लोक 15 (padma.2.74.15)

संति तेषां गृहे पुण्याः सर्वकामप्रदायकाः । अमरा मानवा जाताः पुत्रपौत्रैरलंकृताः

saṁti teṣāṁ gṛhe puṇyāḥ sarvakāmapradāyakāḥ amarā mānavā jātāḥ putrapautrairalaṁkṛtāḥ

उनके घरों में ये पुण्यमय, सर्वकामनापूरक वस्तुएँ विद्यमान थीं; मनुष्य मानो अमर होकर पुत्र-पौत्रों से सुशोभित हो गए।

श्लोक 16 (padma.2.74.16)

सर्वदोषविहीनास्ते विष्णोश्चैव प्रसादतः । सर्वसौभाग्यसंपन्नाः पुण्यमंगलसंयुताः

sarvadoṣavihīnāste viṣṇoścaiva prasādataḥ sarvasaubhāgyasaṁpannāḥ puṇyamaṁgalasaṁyutāḥ

विष्णु की कृपा से वे समस्त दोषों से रहित, समस्त सौभाग्य से संपन्न और पुण्य-मंगल से युक्त हो गए।

श्लोक 17 (padma.2.74.17)

सुपुण्या दानसंपन्ना ज्ञानध्यानपरायणाः । न दुर्भिक्षं न च व्याधिर्नाकालमरणं नृणाम्

supuṇyā dānasaṁpannā jñānadhyānaparāyaṇāḥ na durbhikṣaṁ na ca vyādhirnākālamaraṇaṁ nṛṇām

वे पुण्यवान, दानशील और ज्ञान-ध्यान में तत्पर हो गए; मनुष्यों में न दुर्भिक्ष हुआ, न व्याधि, न अकाल मृत्यु।

श्लोक 18 (padma.2.74.18)

तस्मिञ्शासति धर्मज्ञे ययातौ नृपतौ तदा । वैष्णवा मानवाः सर्वे विष्णुव्रतपरायणाः

tasmiñśāsati dharmajñe yayātau nṛpatau tadā vaiṣṇavā mānavāḥ sarve viṣṇuvrataparāyaṇāḥ

जब धर्मज्ञ राजा ययाति इस प्रकार राज्य करते थे, तब सभी मनुष्य वैष्णव होकर विष्णु के व्रत में तत्पर रहे।

श्लोक 19 (padma.2.74.19)

तद्ध्यानास्तद्गताः सर्वे संजाता भावतत्पराः । तेषां गृहाणि दिव्यानि पुण्यानि द्विजसत्तम

taddhyānāstadgatāḥ sarve saṁjātā bhāvatatparāḥ teṣāṁ gṛhāṇi divyāni puṇyāni dvijasattama

उन्हीं का ध्यान करते हुए, उन्हीं में लीन होकर, सभी भावपरायण हो गए। हे द्विजसत्तम! उनके घर दिव्य और पवित्र हो गए।

श्लोक 20 (padma.2.74.20)

पताकाभिः सुशुक्लाभिः शंखयुक्तानि तानि वै । गदांकितध्वजाभिश्च नित्यं चक्रांकितानि च

patākābhiḥ suśuklābhiḥ śaṁkhayuktāni tāni vai gadāṁkitadhvajābhiśca nityaṁ cakrāṁkitāni ca

वे घर शुभ्र श्वेत पताकाओं से, शंख-चिह्नित ध्वजाओं से, गदा-अंकित पताकाओं से और सदा चक्र-चिह्न से सुशोभित थे।

श्लोक 21 (padma.2.74.21)

पद्मांकितानि भासंते विमानप्रतिमानि च । गृहाणि भित्तिभागेषु चित्रितानि सुचित्रकैः

padmāṁkitāni bhāsaṁte vimānapratimāni ca gṛhāṇi bhittibhāgeṣu citritāni sucitrakaiḥ

वे पद्म-चिह्न से शोभित होकर मानो विमानों के समान प्रतीत होते थे; घरों की दीवारों के भाग सुंदर चित्रों से चित्रित थे।

श्लोक 22 (padma.2.74.22)

सर्वत्र गृहद्वारेषु पुण्यस्थानेषु सत्तमाः । वनानि संति दिव्यानि शाद्वलानि शुभानि च

sarvatra gṛhadvāreṣu puṇyasthāneṣu sattamāḥ vanāni saṁti divyāni śādvalāni śubhāni ca

हे श्रेष्ठ पुरुषो! सर्वत्र घरों के द्वारों पर, पुण्य स्थानों में दिव्य वन और शुभ हरियाली से भरे मैदान थे।

श्लोक 23 (padma.2.74.23)

तुलस्या च द्विजश्रेष्ठ तेषु केशवमंदिरैः । भासंते पुण्यदिव्यानि गृहाणि प्राणिनां सदा

tulasyā ca dvijaśreṣṭha teṣu keśavamaṁdiraiḥ bhāsaṁte puṇyadivyāni gṛhāṇi prāṇināṁ sadā

हे द्विजश्रेष्ठ! तुलसी के पौधों से और केशव के मंदिरों से युक्त वे पुण्यमय, दिव्य घर प्राणियों के लिए सदा शोभायमान रहते थे।

श्लोक 24 (padma.2.74.24)

सर्वत्र वैष्णवो भावो मंगलो बहु दृश्यते । शंखशब्दाश्च भूलोके मिथः स्फोटरवैः सखे

sarvatra vaiṣṇavo bhāvo maṁgalo bahu dṛśyate śaṁkhaśabdāśca bhūloke mithaḥ sphoṭaravaiḥ sakhe

सर्वत्र वैष्णव भाव और बहुत मंगल दिखाई देता था; हे सखे! पृथ्वी पर परस्पर फूटते शंख-शब्द -

श्लोक 25 (padma.2.74.25)

श्रूयंते तत्र विप्रेंद्र दोषपापविनाशकाः । शंखस्वस्तिकपद्मानि गृहद्वारेषु भित्तिषु

śrūyaṁte tatra vipreṁdra doṣapāpavināśakāḥ śaṁkhasvastikapadmāni gṛhadvāreṣu bhittiṣu

हे विप्रेंद्र! वहाँ सुनाई देते थे, जो दोष और पाप का नाश करने वाले थे; घरों के द्वारों की दीवारों पर शंख, स्वस्तिक और कमल -

श्लोक 26 (padma.2.74.26)

विष्णुभक्त्या च नारीभिर्लिखितानि द्विजोत्तम । गीतरागसुवर्णैश्च मूर्च्छना तानसुस्वरैः

viṣṇubhaktyā ca nārībhirlikhitāni dvijottama gītarāgasuvarṇaiśca mūrcchanā tānasusvaraiḥ

हे द्विजोत्तम! स्त्रियों द्वारा विष्णु-भक्ति से अंकित किए जाते थे; मधुर राग, स्वर और तान से युक्त गीतों के साथ -

श्लोक 27 (padma.2.74.27)

गायंति केशवं लोका विष्णुध्यानपरायणाः

gāyaṁti keśavaṁ lokā viṣṇudhyānaparāyaṇāḥ

लोग विष्णु-ध्यान में तत्पर होकर केशव का गुणगान करते थे।

श्लोक 28 (padma.2.74.28)

हरिं मुरारिं प्रवदंति केशवं प्रीत्या जितं माधवमेव चान्ये । श्रीनारसिंहं कमलेक्षणं तं गोविंदमेकं कमलापतिं च

hariṁ murāriṁ pravadaṁti keśavaṁ prītyā jitaṁ mādhavameva cānye śrīnārasiṁhaṁ kamalekṣaṇaṁ taṁ goviṁdamekaṁ kamalāpatiṁ ca

कोई उन्हें हरि, कोई मुरारि कहता, कोई प्रेमपूर्वक विजयी केशव या माधव कहता; कोई उन्हें श्री नृसिंह, कमलनयन, एकमात्र गोविंद, कमलापति कहकर पुकारता।

श्लोक 29 (padma.2.74.29)

कृष्णं शरण्यं शरणं जपंति रामं च जप्यैः परिपूजयंति । दंडप्रणामैः प्रणमंति विष्णुं तद्ध्यानयुक्ताः परवैष्णवास्ते

kṛṣṇaṁ śaraṇyaṁ śaraṇaṁ japaṁti rāmaṁ ca japyaiḥ paripūjayaṁti daṁḍapraṇāmaiḥ praṇamaṁti viṣṇuṁ taddhyānayuktāḥ paravaiṣṇavāste

वे 'कृष्ण शरण्य, शरण' कहकर जप करते, राम का नाम-जप कर पूजा करते; दंडवत प्रणाम से विष्णु को नमस्कार करते - ऐसे थे वे परम वैष्णव, उन्हीं के ध्यान में लीन।

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