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भूमि खण्ड · अध्याय 76

इंद्र और यम द्वारा ययाति को स्वर्ग लाने का उपाय

अध्याय 75अध्याय-सूचीअध्याय 77

श्लोक 1 (padma.2.76.1)

सुकर्मोवाच- सौरिर्दूतैस्तथा सर्वैः सह स्वर्गं जगाम सः । द्रष्टुं तत्र सहस्राक्षं देववृंदैः समावृतम्

sukarmovāca- saurirdūtaistathā sarvaiḥ saha svargaṁ jagāma saḥ draṣṭuṁ tatra sahasrākṣaṁ devavṛṁdaiḥ samāvṛtam

सुकर्मा ने कहा - यमराज अपने सभी दूतों के साथ स्वर्ग गए, देवताओं के समूह से घिरे हुए सहस्राक्ष इंद्र के दर्शन के लिए।

श्लोक 2 (padma.2.76.2)

धर्मराजं समायांतं ददर्श सुरराट्तदा । समुत्थाय त्वरायुक्तो दत्वा चार्घमनुत्तमम्

dharmarājaṁ samāyāṁtaṁ dadarśa surarāṭtadā samutthāya tvarāyukto datvā cārghamanuttamam

देवराज ने धर्मराज को आते देखा; तुरंत उठकर, उत्तम अर्घ्य देकर -

श्लोक 3 (padma.2.76.3)

पप्रच्छागमनं तस्य कथयस्व ममाग्रतः । समाकर्ण्य महद्वाक्यं देवराजस्य भाषितम्

papracchāgamanaṁ tasya kathayasva mamāgrataḥ samākarṇya mahadvākyaṁ devarājasya bhāṣitam

उनके आगमन का कारण पूछा - 'मुझे बताइए।' देवराज के इस महान वचन को सुनकर -

श्लोक 4 (padma.2.76.4)

धर्मराजोऽब्रवीत्सर्वं ययातेश्चरितं महत् । धर्मराज उवाच- श्रूयतां देवदेवेश यस्मादागमनं मम

dharmarājo'bravītsarvaṁ yayāteścaritaṁ mahat dharmarāja uvāca- śrūyatāṁ devadeveśa yasmādāgamanaṁ mama

धर्मराज ने ययाति का सारा महान चरित्र कह सुनाया। धर्मराज ने कहा - हे देवाधिदेव! सुनिए, मैं जिस कारण से आया हूँ।

श्लोक 5 (padma.2.76.5)

कथयाम्यहमत्रापि येनाहमागतस्तव । नहुषस्यात्मजेनापि वैष्णवेन महात्मना

kathayāmyahamatrāpi yenāhamāgatastava nahuṣasyātmajenāpi vaiṣṇavena mahātmanā

मैं यहाँ भी वही कारण बताता हूँ जिससे मैं आपके पास आया हूँ - नहुष के महात्मा पुत्र, उस वैष्णव के कारण -

श्लोक 6 (padma.2.76.6)

वैष्णवाश्च कृता मर्त्या ये वसंति महीतले । वैकुंठस्य समं रूपं मर्त्यलोकस्य वै कृतम्

vaiṣṇavāśca kṛtā martyā ye vasaṁti mahītale vaikuṁṭhasya samaṁ rūpaṁ martyalokasya vai kṛtam

पृथ्वीतल पर रहने वाले मनुष्य वैष्णव बना दिए गए हैं; मर्त्यलोक को वैकुंठ के समान रूप दे दिया गया है।

श्लोक 7 (padma.2.76.7)

अमरा मानवा जाता जरारोगविवर्जिताः । पापमेव न कुर्वंति असत्यं न वदंति ते

amarā mānavā jātā jarārogavivarjitāḥ pāpameva na kurvaṁti asatyaṁ na vadaṁti te

मनुष्य मानो अमर हो गए हैं, वृद्धावस्था और रोग से रहित; वे पाप बिल्कुल नहीं करते और असत्य नहीं बोलते।

श्लोक 8 (padma.2.76.8)

कामक्रोधविहीनास्ते लोभमोहविवर्जिताः । दानशीला महात्मानः सर्वे धर्मपरायणाः

kāmakrodhavihīnāste lobhamohavivarjitāḥ dānaśīlā mahātmānaḥ sarve dharmaparāyaṇāḥ

वे काम-क्रोध से रहित, लोभ-मोह से मुक्त, दानशील, महात्मा और सब धर्मपरायण हैं।

श्लोक 9 (padma.2.76.9)

सर्वधर्मैः समर्चंति नारायणमनामयम् । तेन वैष्णवधर्मेण मानवा जगतीतले

sarvadharmaiḥ samarcaṁti nārāyaṇamanāmayam tena vaiṣṇavadharmeṇa mānavā jagatītale

वे सब धर्मों से निरामय नारायण की अर्चना करते हैं; उसी वैष्णव धर्म से पृथ्वीतल के मनुष्य -

श्लोक 10 (padma.2.76.10)

निरामया वीतशोकाः सर्वे च स्थिरयौवनाः । दूर्वा वटा यथा देव विस्तारं यांति भूतले

nirāmayā vītaśokāḥ sarve ca sthirayauvanāḥ dūrvā vaṭā yathā deva vistāraṁ yāṁti bhūtale

रोगरहित, शोकरहित और सब स्थिर यौवन वाले हो गए हैं; हे देव! जैसे दूब और वट की जड़ें पृथ्वी पर फैल जाती हैं -

श्लोक 11 (padma.2.76.11)

तथा ते विस्तरं प्राप्ताः पुत्रपौत्रैः प्रपौत्रकैः । तेषां पुत्रैः प्रपौत्रैश्च वंशाद्वंशांतरं गताः

tathā te vistaraṁ prāptāḥ putrapautraiḥ prapautrakaiḥ teṣāṁ putraiḥ prapautraiśca vaṁśādvaṁśāṁtaraṁ gatāḥ

वैसे ही वे पुत्र, पौत्र और प्रपौत्रों से विस्तार को प्राप्त हुए हैं; उनके पुत्रों और प्रपौत्रों से वंश से वंशांतर तक फैल गए हैं।

श्लोक 12 (padma.2.76.12)

एवं हि वैष्णवः सर्वो जरामृत्युविवर्जितः । मर्त्यलोकः कृतस्तेन नहुषस्यात्मजेन वै

evaṁ hi vaiṣṇavaḥ sarvo jarāmṛtyuvivarjitaḥ martyalokaḥ kṛtastena nahuṣasyātmajena vai

इस प्रकार समूचा मर्त्यलोक नहुष के उस पुत्र के द्वारा वृद्धावस्था और मृत्यु से रहित बना दिया गया है।

श्लोक 13 (padma.2.76.13)

पदभ्रष्टोस्मि संजातो व्यापारेण विवर्जितः । एतत्सर्वं समाख्यातं मम कर्मविनाशनम्

padabhraṣṭosmi saṁjāto vyāpāreṇa vivarjitaḥ etatsarvaṁ samākhyātaṁ mama karmavināśanam

मैं अपने पद से च्युत हो गया हूँ, अपने कार्य से रहित हो गया हूँ; यह सब मैंने कह दिया - मेरे कर्म का यह विनाश है।

श्लोक 14 (padma.2.76.14)

एवं ज्ञात्वा सहस्राक्ष लोकस्यास्य हितं कुरु । एतत्ते सर्वमाख्यातं यथापृष्टोस्मि वै त्वया

evaṁ jñātvā sahasrākṣa lokasyāsya hitaṁ kuru etatte sarvamākhyātaṁ yathāpṛṣṭosmi vai tvayā

यह जानकर, हे सहस्राक्ष! इस लोक का हित कीजिए। आपने जैसा पूछा था, वह सब मैंने आपको बता दिया।

श्लोक 15 (padma.2.76.15)

एतस्मात्कारणादिंद्र आगतस्तव सन्निधौ । इंद्र उवाच- पूर्वमेव मया दूत आगमाय महात्मनः

etasmātkāraṇādiṁdra āgatastava sannidhau iṁdra uvāca- pūrvameva mayā dūta āgamāya mahātmanaḥ

इसी कारण, हे इंद्र, मैं आपके समीप आया हूँ। इंद्र ने कहा - हे धर्मराज! पहले ही मैंने उस महात्मा को बुलाने के लिए एक दूत -

श्लोक 16 (padma.2.76.16)

प्रेषितो धर्मराजेंद्र दूतेनास्यापि भाषितम् । नाहं स्वर्गसुखस्यार्थी नागमिष्ये दिवं पुनः

preṣito dharmarājeṁdra dūtenāsyāpi bhāṣitam nāhaṁ svargasukhasyārthī nāgamiṣye divaṁ punaḥ

भेजा था, और उस दूत ने जो कहा वह यह था - 'मैं स्वर्ग-सुख का इच्छुक नहीं हूँ, मैं पुनः स्वर्ग नहीं जाऊँगा।'

श्लोक 17 (padma.2.76.17)

स्वर्गरूपं करिष्यामि सर्वं तद्भूमिमंडलम् । इत्याचचक्षे भूपालः प्रजापाल्यं करोति सः

svargarūpaṁ kariṣyāmi sarvaṁ tadbhūmimaṁḍalam ityācacakṣe bhūpālaḥ prajāpālyaṁ karoti saḥ

'मैं इस समूचे भूमंडल को ही स्वर्ग का रूप बना दूँगा' - ऐसा वह राजा कहता है, और वह प्रजा का पालन भी करता है।

श्लोक 18 (padma.2.76.18)

तस्य धर्मप्रभावेण भीतस्तिष्ठामि सर्वदा । धर्म उवाच- येनकेनाप्युपायेन तमानय सुभूपतिम्

tasya dharmaprabhāveṇa bhītastiṣṭhāmi sarvadā dharma uvāca- yenakenāpyupāyena tamānaya subhūpatim

उसके धर्म-प्रभाव से मैं सदा भयभीत रहता हूँ। धर्म ने कहा - जिस किसी भी उपाय से उस श्रेष्ठ राजा को यहाँ ले आइए -

श्लोक 19 (padma.2.76.19)

देवराज महाभाग यदीच्छसि मम प्रियम् । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य धर्मस्यापि सुराधिपः

devarāja mahābhāga yadīcchasi mama priyam ityākarṇya vacastasya dharmasyāpi surādhipaḥ

हे महाभाग देवराज! यदि आप मेरा प्रिय चाहते हैं। धर्म के इस वचन को सुनकर वह देवताओं का अधिपति -

श्लोक 20 (padma.2.76.20)

चिंतयामास मेधावी सर्वतत्वेन भूपते । कामदेवं समाहूय गंधर्वांश्च पुरंदरः

ciṁtayāmāsa medhāvī sarvatatvena bhūpate kāmadevaṁ samāhūya gaṁdharvāṁśca puraṁdaraḥ

हे राजन्! उस बुद्धिमान पुरंदर ने पूर्ण रूप से विचार किया; उसने कामदेव और गंधर्वों को बुलवाया।

श्लोक 21 (padma.2.76.21)

मकरंदं रतिं देव आनिनाय महामनाः । तथा कुरुत वै यूयं यथाऽगच्छति भूपतिः

makaraṁdaṁ ratiṁ deva ānināya mahāmanāḥ tathā kuruta vai yūyaṁ yathā'gacchati bhūpatiḥ

उस महामनस्वी देव ने मकरंद और रति को भी बुलाया - 'तुम सब ऐसा करो जिससे वह राजा यहाँ आ जाए -'

श्लोक 22 (padma.2.76.22)

यूयं गच्छन्तु भूर्लोकं मयादिष्टा न संशयः । काम उवाच- युवयोस्तु प्रियं पुण्यं करिष्यामि न संशयः

yūyaṁ gacchantu bhūrlokaṁ mayādiṣṭā na saṁśayaḥ kāma uvāca- yuvayostu priyaṁ puṇyaṁ kariṣyāmi na saṁśayaḥ

'तुम सब मर्त्यलोक जाओ, मैंने यह आज्ञा दी है, इसमें संशय नहीं।' काम ने कहा - मैं निश्चय ही आप दोनों का प्रिय और कल्याण करूँगा -

श्लोक 23 (padma.2.76.23)

राजानं पश्य मां चैव स्थितं चैव समा युधि । तथेत्युक्त्वा गताः सर्वे यत्र राजा स नाहुषिः

rājānaṁ paśya māṁ caiva sthitaṁ caiva samā yudhi tathetyuktvā gatāḥ sarve yatra rājā sa nāhuṣiḥ

'आप मुझे भी देखिए, मैं इस कार्य में राजा के समान ही खड़ा हूँ।' 'ऐसा ही हो' कहकर वे सब वहाँ गए जहाँ नहुषपुत्र राजा था।

श्लोक 24 (padma.2.76.24)

नटरूपेण ते सर्वे कामाद्याः कर्मणा द्विज । आशीर्भिरभिनंद्यैव ते च ऊचुः सुनाटकम्

naṭarūpeṇa te sarve kāmādyāḥ karmaṇā dvija āśīrbhirabhinaṁdyaiva te ca ūcuḥ sunāṭakam

हे विप्र! अभिनेताओं का रूप धारण कर काम आदि सबने अपनी कला से, आशीर्वाद देकर राजा का अभिनंदन करते हुए एक सुंदर नाटक का आयोजन किया।

श्लोक 25 (padma.2.76.25)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ययातिः पृथिवीपतिः । सभां चकार मेधावी देवरूपां सुपंडितैः

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā yayātiḥ pṛthivīpatiḥ sabhāṁ cakāra medhāvī devarūpāṁ supaṁḍitaiḥ

उनकी बात सुनकर बुद्धिमान राजा ययाति ने विद्वानों के साथ एक देवोपम सभा तैयार करवाई।

श्लोक 26 (padma.2.76.26)

समायातः स्वयं भूपो ज्ञानविज्ञानकोविदः । तेषां तु नाटकं राजा पश्यमानः स नाहुषिः

samāyātaḥ svayaṁ bhūpo jñānavijñānakovidaḥ teṣāṁ tu nāṭakaṁ rājā paśyamānaḥ sa nāhuṣiḥ

ज्ञान-विज्ञान में निपुण वह राजा स्वयं वहाँ आया; उनके नाटक को देखते हुए नहुषपुत्र राजा ने -

श्लोक 27 (padma.2.76.27)

चरितं वामनस्यापि उत्पत्तिं विप्ररूपिणः । रूपेणाप्रतिमा लोके सुस्वरं गीतमुत्तमम्

caritaṁ vāmanasyāpi utpattiṁ viprarūpiṇaḥ rūpeṇāpratimā loke susvaraṁ gītamuttamam

वामन के चरित्र को, ब्राह्मण-रूप में उनके जन्म को देखा; और संसार में अनुपम रूप वाला एक अत्यंत मधुर, उत्तम गीत -

श्लोक 28 (padma.2.76.28)

गायमाना जरा राजन्नार्यारूपेण वै तदा । तस्या गीतविलासेन हास्येन ललितेन च

gāyamānā jarā rājannāryārūpeṇa vai tadā tasyā gītavilāsena hāsyena lalitena ca

हे राजन्! उस समय स्त्री-रूप धारण किए हुए जरा (वृद्धावस्था) द्वारा गाया गया; उसके गीत-विलास, हास्य और सौंदर्य से -

श्लोक 29 (padma.2.76.29)

मधुरालापतस्तस्य कंदर्पस्य च मायया । मोहितस्तेन भावेन दिव्येन चरितेन च

madhurālāpatastasya kaṁdarpasya ca māyayā mohitastena bhāvena divyena caritena ca

उसकी मधुर वाणी से और कंदर्प (काम) की माया से, उस दिव्य भाव और आचरण से राजा मोहित हो गया।

श्लोक 30 (padma.2.76.30)

बलेश्चैव यथारूपं विंध्यावल्या यथा पुरा । वामनस्य यथारूपं चक्रे मारोथ तादृशम्

baleścaiva yathārūpaṁ viṁdhyāvalyā yathā purā vāmanasya yathārūpaṁ cakre mārotha tādṛśam

जैसे पहले बलि विंध्यावली के रूप से मोहित हुआ था, वैसे ही मार (काम) ने वामन के समान एक रूप रचा।

श्लोक 31 (padma.2.76.31)

सूत्रधारः स्वयं कामो वसंतः पारिपार्श्वकः । नटीवेषधरा जाता सा रतिर्हृष्टवल्लभा

sūtradhāraḥ svayaṁ kāmo vasaṁtaḥ pāripārśvakaḥ naṭīveṣadharā jātā sā ratirhṛṣṭavallabhā

काम स्वयं सूत्रधार बना, वसंत उसका सहचर बना; प्रसन्न रति ने अभिनेत्री का वेश धारण कर उसकी प्रिया का रूप लिया।

श्लोक 32 (padma.2.76.32)

नेपथ्यांतश्चरी राजन्सा तस्मिन्नृत्यकर्मणि । मकरंदो महाप्राज्ञः क्षोभयामास भूपतिम्

nepathyāṁtaścarī rājansā tasminnṛtyakarmaṇi makaraṁdo mahāprājñaḥ kṣobhayāmāsa bhūpatim

हे राजन्! वह उस नृत्य-कर्म में पर्दे के पीछे विचरण करती थी; महाप्राज्ञ मकरंद ने राजा के मन को क्षुब्ध कर दिया।

श्लोक 33 (padma.2.76.33)

यथायथा पश्यति नृत्यमुत्तमं गीतं समाकर्णति स क्षितीशः । तथातथा मोहितवान्स भूपतिं नटीप्रणीतेन महानुभावः

yathāyathā paśyati nṛtyamuttamaṁ gītaṁ samākarṇati sa kṣitīśaḥ tathātathā mohitavānsa bhūpatiṁ naṭīpraṇītena mahānubhāvaḥ

जैसे-जैसे वह राजा उत्तम नृत्य को देखता और गीत को सुनता, वैसे-वैसे वह महानुभाव अभिनेत्री द्वारा प्रस्तुत उस कला से मोहित होता गया।

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