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भूमि खण्ड · अध्याय 83

ययाति का स्वर्गारोहण

अध्याय 82अध्याय-सूचीअध्याय 84

श्लोक 1 (padma.2.83.1)

सुकर्मोवाच- समाहूय प्रजाः सर्वा द्वीपानां वसुधाधिपः । हर्षेण महताविष्ट इदं वचनमब्रवीत्

sukarmovāca- samāhūya prajāḥ sarvā dvīpānāṁ vasudhādhipaḥ harṣeṇa mahatāviṣṭa idaṁ vacanamabravīt

सुकर्मा ने कहा - द्वीपों की सभी प्रजाओं को बुलाकर, अत्यंत हर्ष से भरे हुए पृथ्वीपति ने यह वचन कहा।

श्लोक 2 (padma.2.83.2)

इंद्रलोकं ब्रह्मलोकं रुद्रलोकमतः परम् । वैष्णवं सर्वपापघ्नं प्राणिनां गतिदायकम्

iṁdralokaṁ brahmalokaṁ rudralokamataḥ param vaiṣṇavaṁ sarvapāpaghnaṁ prāṇināṁ gatidāyakam

'मैं इंद्रलोक, ब्रह्मलोक, और उसके आगे रुद्रलोक, तथा समस्त पापों का नाश करने वाला, प्राणियों को परम गति देने वाला वैष्णव लोक -'

श्लोक 3 (padma.2.83.3)

व्रजाम्यहं न संदेहो ह्यनया सह सत्तमाः । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः सशूद्रा श्च प्रजा मम

vrajāmyahaṁ na saṁdeho hyanayā saha sattamāḥ brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ saśūdrā śca prajā mama

'इसके साथ ही निःसंदेह जा रहा हूँ, हे श्रेष्ठजनो! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र - मेरी सारी प्रजा -'

श्लोक 4 (padma.2.83.4)

सुखेनापि सकुटुंबैः स्थातव्यं तु महीतले । पूरुरेष महाभागो भवतां पालकस्त्विह

sukhenāpi sakuṭuṁbaiḥ sthātavyaṁ tu mahītale pūrureṣa mahābhāgo bhavatāṁ pālakastviha

'सुखपूर्वक अपने-अपने परिवारों सहित इस पृथ्वी पर रहें। यह महाभाग्यशाली पूरु ही यहाँ तुम्हारा पालक होगा।'

श्लोक 5 (padma.2.83.5)

स्थापितोस्ति मया लोका राजा धीरः सदंडकः । एवमुक्तास्तु ताः सर्वाः प्रजा राजानमब्रुवन्

sthāpitosti mayā lokā rājā dhīraḥ sadaṁḍakaḥ evamuktāstu tāḥ sarvāḥ prajā rājānamabruvan

'मैंने इन लोकों पर धीर और दंडधारी राजा को स्थापित कर दिया है।' राजा के ऐसा कहने पर उन सभी प्रजाओं ने राजा से कहा -

श्लोक 6 (padma.2.83.6)

श्रूयते सर्ववेदेषु पुराणेषु नृपोत्तम । धर्म एवं यतो लोके न दृष्टः केन वै पुरा

śrūyate sarvavedeṣu purāṇeṣu nṛpottama dharma evaṁ yato loke na dṛṣṭaḥ kena vai purā

'हे नृपोत्तम! सभी वेदों और पुराणों में सुना जाता है कि ऐसा धर्म संसार में पहले किसी ने कभी नहीं देखा।'

श्लोक 7 (padma.2.83.7)

दृष्टोस्माभिरसौ धर्मो दशांगः सत्यवल्लभः । सोमवंशसमुत्पन्नो नहुषस्य महागृहे

dṛṣṭosmābhirasau dharmo daśāṁgaḥ satyavallabhaḥ somavaṁśasamutpanno nahuṣasya mahāgṛhe

'हमने इस दस-अंगों वाले, सत्य को प्रिय मानने वाले धर्म को साक्षात् देखा है, जो सोमवंश में, नहुष के महान घर में उत्पन्न हुआ।'

श्लोक 8 (padma.2.83.8)

हस्तपादमुखैर्युक्तः सर्वाचारप्रचारकः । ज्ञानविज्ञानसंपन्नः पुण्यानां च महानिधिः

hastapādamukhairyuktaḥ sarvācārapracārakaḥ jñānavijñānasaṁpannaḥ puṇyānāṁ ca mahānidhiḥ

'हाथ, पैर और मुख से युक्त, समस्त सदाचार का प्रचारक, ज्ञान-विज्ञान से संपन्न और पुण्यों का महान भंडार -'

श्लोक 9 (padma.2.83.9)

गुणानां हि महाराज आकरः सत्यपंडितः । कुर्वंति च महाधर्मं सत्यवंतो महौजसः

guṇānāṁ hi mahārāja ākaraḥ satyapaṁḍitaḥ kurvaṁti ca mahādharmaṁ satyavaṁto mahaujasaḥ

'हे महाराज! गुणों की खान, सत्य के पंडित। सत्यवान, महातेजस्वी लोग ही महाधर्म का आचरण करते हैं।'

श्लोक 10 (padma.2.83.10)

तं धर्मं दृष्टवंतः स्म भवंतं कामरूपिणम् । भवंतं कामकर्तारमीदृशं सत्यवादिनम्

taṁ dharmaṁ dṛṣṭavaṁtaḥ sma bhavaṁtaṁ kāmarūpiṇam bhavaṁtaṁ kāmakartāramīdṛśaṁ satyavādinam

'हमने वह धर्म आपमें साक्षात् देखा है, जो इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, इच्छित कार्य करने वाले, ऐसे सत्यवादी हैं।'

श्लोक 11 (padma.2.83.11)

कर्मणा त्रिविधेनापि वयं त्यक्तुं न शक्नुमः । यत्र त्वं तत्र गच्छामः सुसुखं पुण्यमेव च

karmaṇā trividhenāpi vayaṁ tyaktuṁ na śaknumaḥ yatra tvaṁ tatra gacchāmaḥ susukhaṁ puṇyameva ca

'हम मन, वचन और कर्म से भी आपका त्याग नहीं कर सकते। आप जहाँ भी जाएँगे, वहीं हम भी सुख और पुण्य के साथ जाएँगे।'

श्लोक 12 (padma.2.83.12)

नरकेपि भवान्यत्र वयं तत्र न संशयः । किं दारैर्धनभोगैश्च किं जीवैर्जीवितेन च

narakepi bhavānyatra vayaṁ tatra na saṁśayaḥ kiṁ dārairdhanabhogaiśca kiṁ jīvairjīvitena ca

'हे महाराज! आप यदि नरक में भी हों, तो निःसंदेह हम वहीं जाएँगे। स्त्री, धन-भोग और जीवन का क्या प्रयोजन -'

श्लोक 13 (padma.2.83.13)

त्वां विनासुमहाराज तेन नास्त्यत्र कारणम् । त्वयैव सह राजेंद्र वयं यास्याम नान्यथा

tvāṁ vināsumahārāja tena nāstyatra kāraṇam tvayaiva saha rājeṁdra vayaṁ yāsyāma nānyathā

'हे महाराज! आपके बिना क्या करेंगे, इसमें कोई कारण नहीं है। हे राजेंद्र! हम आपके साथ ही जाएँगे, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 14 (padma.2.83.14)

एवं श्रुत्वा वचस्तासां प्रजानां पृथिवीपतिः । हर्षेण महताविष्टः प्रजावाक्यमुवाच ह

evaṁ śrutvā vacastāsāṁ prajānāṁ pṛthivīpatiḥ harṣeṇa mahatāviṣṭaḥ prajāvākyamuvāca ha

अपनी प्रजाओं के ये वचन सुनकर पृथ्वीपति ने अत्यंत हर्ष से भरकर प्रजा से यह वचन कहा।

श्लोक 15 (padma.2.83.15)

आगच्छंतु मया सार्द्धं सर्वे लोकाः सुपुण्यकाः । नृपो रथं समारुह्य तया वै कामकन्यया

āgacchaṁtu mayā sārddhaṁ sarve lokāḥ supuṇyakāḥ nṛpo rathaṁ samāruhya tayā vai kāmakanyayā

'सभी पुण्यवान लोग मेरे साथ आएँ।' राजा उस काम-कन्या के साथ रथ पर आरूढ़ होकर -

श्लोक 16 (padma.2.83.16)

रथेन हंसवर्णेन चंद्रबिंबानुकारिणा । चामरैर्व्यजनैश्चापि वीज्यमानो गतव्यथः

rathena haṁsavarṇena caṁdrabiṁbānukāriṇā cāmarairvyajanaiścāpi vījyamāno gatavyathaḥ

हंस के रंग वाले, चंद्रमा के बिंब के समान रथ पर, चँवरों और पंखों से वीजित होकर, दुःखरहित -

श्लोक 17 (padma.2.83.17)

केतुना तेन पुण्येन शुभ्रेणापि महीयसा । शोभमानो यथा देवो देवराजः पुरंदरः

ketunā tena puṇyena śubhreṇāpi mahīyasā śobhamāno yathā devo devarājaḥ puraṁdaraḥ

उस पवित्र, श्वेत और विशाल पताका से सुशोभित, मानो देवराज पुरंदर के समान चमकते हुए -

श्लोक 18 (padma.2.83.18)

ऋषिभिः स्तूयमानस्तु बंदिभिश्चारणैस्तथा । प्रजाभिः स्तूयमानश्च ययातिर्नहुषात्मजः

ṛṣibhiḥ stūyamānastu baṁdibhiścāraṇaistathā prajābhiḥ stūyamānaśca yayātirnahuṣātmajaḥ

ऋषियों द्वारा स्तुति किए जाते, बंदियों और चारणों द्वारा भी, तथा प्रजा द्वारा भी स्तुति किए जाते हुए नहुषपुत्र ययाति -

श्लोक 19 (padma.2.83.19)

प्रजाः सर्वास्ततो यानैः समायाता नरेश्वरम् । गजैरश्वै रथैश्चान्यैः प्रस्थिताश्च दिवं प्रति

prajāḥ sarvāstato yānaiḥ samāyātā nareśvaram gajairaśvai rathaiścānyaiḥ prasthitāśca divaṁ prati

तब सभी प्रजाएँ अपने-अपने वाहनों से उस नरेश्वर के पास आ गईं; हाथियों, घोड़ों, रथों और अन्य वाहनों से आकाश की ओर चल पड़ीं।

श्लोक 20 (padma.2.83.20)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये पृथग्जनाः । सर्वे च वैष्णवा लोका विष्णुध्यानपरायणाः

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścānye pṛthagjanāḥ sarve ca vaiṣṇavā lokā viṣṇudhyānaparāyaṇāḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य साधारण जन - ये सभी वैष्णव लोग विष्णु-ध्यान में परायण होकर,

श्लोक 21 (padma.2.83.21)

तेषां तु केतवः शुक्ला हेमदंडैरलंकृताः । शंखचक्रांकिताः सर्वे सदंडाः सपताकिनः

teṣāṁ tu ketavaḥ śuklā hemadaṁḍairalaṁkṛtāḥ śaṁkhacakrāṁkitāḥ sarve sadaṁḍāḥ sapatākinaḥ

उनकी श्वेत पताकाएँ स्वर्ण-दंडों से अलंकृत, सभी शंख-चक्र-चिह्नित, दंडों और पताकाओं सहित थीं।

श्लोक 22 (padma.2.83.22)

प्रजावृंदेषु भासंते पताका मारुतेरिताः । दिव्यमालाधरास्सर्वे शोभितास्तुलसीदलैः

prajāvṛṁdeṣu bhāsaṁte patākā māruteritāḥ divyamālādharāssarve śobhitāstulasīdalaiḥ

प्रजा के समूहों में वायु से हिलती हुई वे पताकाएँ चमक रही थीं; सभी दिव्य मालाएँ धारण किए, तुलसी-दलों से सुशोभित थे।

श्लोक 23 (padma.2.83.23)

दिव्यचंदनदिग्धांगा दिव्यगंधानुलेपनाः । दिव्यवस्त्रकृता शोभा दिव्याभरणभूषिताः

divyacaṁdanadigdhāṁgā divyagaṁdhānulepanāḥ divyavastrakṛtā śobhā divyābharaṇabhūṣitāḥ

दिव्य चंदन से लिपे अंगों वाले, दिव्य सुगंध से अनुलेपित, दिव्य वस्त्रों से सुशोभित, दिव्य आभूषणों से भूषित -

श्लोक 24 (padma.2.83.24)

सर्वे लोकाः सुरूपास्ते राजानमुपजग्मिरे । प्रजाशतसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च

sarve lokāḥ surūpāste rājānamupajagmire prajāśatasahasrāṇi lakṣakoṭiśatāni ca

वे सभी सुंदर लोग राजा के पास आ पहुँचे; लाखों-करोड़ों-अरबों की संख्या में प्रजाएँ आईं।

श्लोक 25 (padma.2.83.25)

अर्वखर्वसहस्राणि ते जनाः प्रतिजग्मिरे । ते तु राज्ञा समं सर्वे वैष्णवाः पुण्यकारिणः

arvakharvasahasrāṇi te janāḥ pratijagmire te tu rājñā samaṁ sarve vaiṣṇavāḥ puṇyakāriṇaḥ

असंख्य लोग आगे बढ़े; वे सभी राजा के साथ ही, पुण्यकर्म करने वाले वैष्णव थे,

श्लोक 26 (padma.2.83.26)

विष्णुध्यानपराः सर्वे जपदानपरायणाः । सुकर्मोवाच- एवं ते प्रस्थिताः सर्वे हर्षेण महतान्विताः

viṣṇudhyānaparāḥ sarve japadānaparāyaṇāḥ sukarmovāca- evaṁ te prasthitāḥ sarve harṣeṇa mahatānvitāḥ

सभी विष्णु-ध्यान में परायण, जप और दान में तत्पर। सुकर्मा ने कहा - इस प्रकार वे सब अत्यंत हर्ष से युक्त होकर चल पड़े -

श्लोक 27 (padma.2.83.27)

पूरुं पुत्रं महाराज स्वराज्ये परिषिच्य तम् । ऐंद्रं लोकं जगामाथ ययातिः पृथिवीपतिः

pūruṁ putraṁ mahārāja svarājye pariṣicya tam aiṁdraṁ lokaṁ jagāmātha yayātiḥ pṛthivīpatiḥ

हे महाराज! अपने पुत्र पूरु का अपने राज्य में अभिषेक करके, पृथ्वीपति ययाति तब इंद्रलोक गए।

श्लोक 28 (padma.2.83.28)

तेजसा तस्य पुण्येन धर्मेण तपसा तदा । ते जनाः प्रस्थिताः सर्वे वैष्णवं लोकमुत्तमम्

tejasā tasya puṇyena dharmeṇa tapasā tadā te janāḥ prasthitāḥ sarve vaiṣṇavaṁ lokamuttamam

उनके तेज, पुण्य, धर्म और तप के प्रभाव से, वे सभी लोग तब उत्तम वैष्णव लोक की ओर चल पड़े।

श्लोक 29 (padma.2.83.29)

ततो देवाः सगंधर्वाः किन्नराश्चारणास्तथा । सहिता देवराजेन आगताः संमुखं तदा

tato devāḥ sagaṁdharvāḥ kinnarāścāraṇāstathā sahitā devarājena āgatāḥ saṁmukhaṁ tadā

तब देवगण, गंधर्वों, किन्नरों और चारणों के साथ, देवराज सहित, उनके स्वागत के लिए सामने आए -

श्लोक 30 (padma.2.83.30)

तस्यैवापि नृपेंद्रस्य पूजयंतो नृपोत्तम । इंद्र उवाच- स्वागतं ते महाराज मम गेहं समाविश

tasyaivāpi nṛpeṁdrasya pūjayaṁto nṛpottama iṁdra uvāca- svāgataṁ te mahārāja mama gehaṁ samāviśa

हे नृपोत्तम! उन्होंने उस राजेंद्र का सम्मान करते हुए स्वागत किया। इंद्र ने कहा - हे महाराज! आपका स्वागत है, मेरे घर में प्रवेश कीजिए।

श्लोक 31 (padma.2.83.31)

अत्र भोगान्प्रभुंक्ष्व त्वं दिव्यान्कामान्मनोऽनुगान् । राजोवाच- सहस्राक्ष महाप्राज्ञ तव पादांबुजद्वयम्

atra bhogānprabhuṁkṣva tvaṁ divyānkāmānmano'nugān rājovāca- sahasrākṣa mahāprājña tava pādāṁbujadvayam

'यहाँ मन के अनुकूल दिव्य भोगों का उपभोग कीजिए।' राजा ने कहा - हे सहस्राक्ष महाप्राज्ञ! आपके दोनों चरण-कमलों को -

श्लोक 32 (padma.2.83.32)

नमस्करोम्यहं देव ब्रह्मलोकं व्रजाम्यहम् । देवैः संस्तूयमानश्च ब्रह्मलोकं जगाम ह

namaskaromyahaṁ deva brahmalokaṁ vrajāmyaham devaiḥ saṁstūyamānaśca brahmalokaṁ jagāma ha

हे देव! मैं नमस्कार करता हूँ, अब ब्रह्मलोक जाता हूँ। देवताओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए वे ब्रह्मलोक गए।

श्लोक 33 (padma.2.83.33)

पद्मयोनिर्महातेजाः सार्धं मुनिवरैस्तदा । आतिथ्यं च चकारास्य पाद्यार्घादि सुविष्टरैः

padmayonirmahātejāḥ sārdhaṁ munivaraistadā ātithyaṁ ca cakārāsya pādyārghādi suviṣṭaraiḥ

तब कमल से उत्पन्न, महातेजस्वी ब्रह्मा ने श्रेष्ठ मुनियों के साथ -

श्लोक 34 (padma.2.83.34)

उवाच विष्णुलोकं हि प्रयाहि त्वं स्वकर्मणा । एवमाभाषिते धात्रा जगाम शिवमंदिरम्

uvāca viṣṇulokaṁ hi prayāhi tvaṁ svakarmaṇā evamābhāṣite dhātrā jagāma śivamaṁdiram

पाद्य, अर्घ्य आदि से उत्तम आतिथ्य-सत्कार किया; और कहा - 'अब अपने पुण्य-कर्म से विष्णुलोक जाओ।'

श्लोक 35 (padma.2.83.35)

चक्रे आतिथ्यपूजां च उमया सह शंकरः । तस्यै वापि नृपेंद्रस्य राजानमिदमब्रवीत्

cakre ātithyapūjāṁ ca umayā saha śaṁkaraḥ tasyai vāpi nṛpeṁdrasya rājānamidamabravīt

विधाता के इस प्रकार कहने पर वे शिव के मंदिर गए। शंकर ने उमा के साथ उनका आतिथ्य-सत्कार किया।

श्लोक 36 (padma.2.83.36)

कृष्णभक्तोसि राजेंद्र ममापि सुप्रियो भवान् । ततो ययाते राजेंद्र वस त्वं मम मंदिरम्

kṛṣṇabhaktosi rājeṁdra mamāpi supriyo bhavān tato yayāte rājeṁdra vasa tvaṁ mama maṁdiram

उस राजेंद्र से उन्होंने यह कहा - 'हे राजेंद्र! तुम कृष्ण के भक्त हो, तुम मुझे भी अत्यंत प्रिय हो।'

श्लोक 37 (padma.2.83.37)

सर्वान्भोगान्प्रभुंक्ष्व त्वं दुःखप्राप्यान्हि मानुषैः । अंतरं नास्ति राजेंद्र मम विष्णोर्न संशयः

sarvānbhogānprabhuṁkṣva tvaṁ duḥkhaprāpyānhi mānuṣaiḥ aṁtaraṁ nāsti rājeṁdra mama viṣṇorna saṁśayaḥ

'इसलिए, हे ययाति! हे राजेंद्र! तुम मेरे मंदिर में निवास करो। मनुष्यों के लिए दुर्लभ सभी भोगों का यहाँ उपभोग करो।'

श्लोक 38 (padma.2.83.38)

योसौ विष्णुस्वरूपेण स वै रुद्रो न संशयः । यो रुद्रो विद्यते राजन्स च विष्णुः सनातनः

yosau viṣṇusvarūpeṇa sa vai rudro na saṁśayaḥ yo rudro vidyate rājansa ca viṣṇuḥ sanātanaḥ

'हे राजेंद्र! मुझमें और विष्णु में कोई अंतर नहीं है, इसमें संशय नहीं। जो विष्णु-स्वरूप है, वही निश्चय ही रुद्र है -'

श्लोक 39 (padma.2.83.39)

उभयोरंतरं नास्ति तस्माच्चैव वदाम्यहम् । विष्णुभक्तस्य पुण्यस्य स्थानमेव ददाम्यहम्

ubhayoraṁtaraṁ nāsti tasmāccaiva vadāmyaham viṣṇubhaktasya puṇyasya sthānameva dadāmyaham

'और, हे राजन्! जो रुद्र है, वही सनातन विष्णु है। दोनों में कोई अंतर नहीं है, इसीलिए मैं कहता हूँ -'

श्लोक 40 (padma.2.83.40)

तस्मादत्र महाराज स्थातव्यं हि त्वयानघ । एवमुक्तः शिवेनापि ययातिर्हरिवल्लभः

tasmādatra mahārāja sthātavyaṁ hi tvayānagha evamuktaḥ śivenāpi yayātirharivallabhaḥ

'मैं यहाँ विष्णुभक्त के पुण्य का स्थान ही तुम्हें देता हूँ। इसलिए, हे महाराज! हे निष्पाप! तुम्हें यहीं निवास करना चाहिए।'

श्लोक 41 (padma.2.83.41)

भक्त्या प्रणम्य देवेशं शंकरं नतकंधरः । एतत्सर्वं महादेव त्वयोक्तमिह सांप्रतम्

bhaktyā praṇamya deveśaṁ śaṁkaraṁ natakaṁdharaḥ etatsarvaṁ mahādeva tvayoktamiha sāṁpratam

शिव द्वारा ऐसा कहे जाने पर हरि के प्रिय ययाति ने भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर देवेश शंकर को प्रणाम किया -

श्लोक 42 (padma.2.83.42)

युवयोरंतरं नास्ति एका मूर्तिर्द्विधाभवत् । वैष्णवं गंतुमिच्छामि पादौ तव नमाम्यहम्

yuvayoraṁtaraṁ nāsti ekā mūrtirdvidhābhavat vaiṣṇavaṁ gaṁtumicchāmi pādau tava namāmyaham

'हे महादेव! आपने अभी यह सब कह दिया। आप दोनों में कोई अंतर नहीं है, एक ही मूर्ति दो रूपों में हो गई है। मैं वैष्णव लोक जाना चाहता हूँ, आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ।'

श्लोक 43 (padma.2.83.43)

एवमस्तु महाराज गच्छ लोकं तु वैष्णवम् । समादिष्टः शिवेनापि प्रतस्थे वसुधाधिपः

evamastu mahārāja gaccha lokaṁ tu vaiṣṇavam samādiṣṭaḥ śivenāpi pratasthe vasudhādhipaḥ

'ऐसा ही हो, हे महाराज! वैष्णव लोक को जाओ।' शिव द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर पृथ्वीपति चल पड़े।

श्लोक 44 (padma.2.83.44)

पृथ्वीशस्तैर्महापुण्यैर्वैष्णवैर्विष्णुवल्लभैः । नृत्यमानैस्ततस्तैस्तु पुरतस्तस्य भूपतेः

pṛthvīśastairmahāpuṇyairvaiṣṇavairviṣṇuvallabhaiḥ nṛtyamānaistatastaistu puratastasya bhūpateḥ

उन अत्यंत पुण्यवान, विष्णु के प्रिय वैष्णवों के, उस पृथ्वीपति के आगे नृत्य करते हुए -

श्लोक 45 (padma.2.83.45)

शंखशब्दैः सुपापघ्नैः सिंहनादैः सुपुष्कलैः । जगाम निःस्वनै राजा पूज्यमानः सुचारणैः

śaṁkhaśabdaiḥ supāpaghnaiḥ siṁhanādaiḥ supuṣkalaiḥ jagāma niḥsvanai rājā pūjyamānaḥ sucāraṇaiḥ

पापनाशक शंख-ध्वनियों से, प्रचुर सिंह-गर्जनाओं से, गूँजते हुए स्वरों से, सुंदर चारणों द्वारा पूजित होते हुए राजा चले -

श्लोक 46 (padma.2.83.46)

सुस्वरैर्गीयमानस्तु पाठकैः शास्त्रकोविदैः । गायंति पुरतस्तस्य गंधर्वा गीततत्पराः

susvarairgīyamānastu pāṭhakaiḥ śāstrakovidaiḥ gāyaṁti puratastasya gaṁdharvā gītatatparāḥ

शास्त्रों में निपुण पाठकों द्वारा मधुर स्वरों में गाए जाते हुए; उनके आगे गायन में तत्पर गंधर्व गाते थे।

श्लोक 47 (padma.2.83.47)

ऋषिभिः स्तूयमानश्च देववृंदैः समन्वितैः । अप्सरोभिः सुरूपाभिः सेव्यमानः स नाहुषिः

ṛṣibhiḥ stūyamānaśca devavṛṁdaiḥ samanvitaiḥ apsarobhiḥ surūpābhiḥ sevyamānaḥ sa nāhuṣiḥ

ऋषियों द्वारा स्तुति किए जाते, देव-समूहों के साथ, सुंदर अप्सराओं द्वारा सेवित - वह नहुषपुत्र,

श्लोक 48 (padma.2.83.48)

गंधर्वैः किन्नरैः सिद्धैश्चारणैः पुण्यमंगलैः । साध्यैर्विद्याधरै राजा मरुद्भिर्वसुभिस्तथा

gaṁdharvaiḥ kinnaraiḥ siddhaiścāraṇaiḥ puṇyamaṁgalaiḥ sādhyairvidyādharai rājā marudbhirvasubhistathā

गंधर्वों, किन्नरों, सिद्धों और पुण्य-मंगल चारणों द्वारा, साध्यों, विद्याधरों, मरुतों और वसुओं द्वारा भी,

श्लोक 49 (padma.2.83.49)

रुद्रैश्चादित्यवर्गैश्च लोकपालैर्दिगीश्वरैः । स्तूयमानो महाराजस्त्रैलोक्येन समंततः

rudraiścādityavargaiśca lokapālairdigīśvaraiḥ stūyamāno mahārājastrailokyena samaṁtataḥ

रुद्रों, आदित्य-गणों, लोकपालों और दिशाओं के स्वामियों द्वारा - वह महाराज त्रिलोक द्वारा सब ओर से स्तुति किया जाता हुआ,

श्लोक 50 (padma.2.83.50)

ददृशे वैष्णवं लोकमनौपम्यमनामयम् । विमानैः कांचनै राजन्सर्वशोभासमाविलैः

dadṛśe vaiṣṇavaṁ lokamanaupamyamanāmayam vimānaiḥ kāṁcanai rājansarvaśobhāsamāvilaiḥ

उसने अनुपम और निर्दोष वैष्णव लोक को देखा - स्वर्ण के विमानों से, हे राजन्! सर्वशोभा से युक्त,

श्लोक 51 (padma.2.83.51)

हंसकुंदेंदुधवलैर्विमानैरुपशोभितैः । प्रासादैः शतभौमैश्च मेरुमंदरसंनिभैः

haṁsakuṁdeṁdudhavalairvimānairupaśobhitaiḥ prāsādaiḥ śatabhaumaiśca merumaṁdarasaṁnibhaiḥ

हंस, कुंद और चंद्रमा के समान श्वेत विमानों से सुशोभित, सौ मंजिलों वाले प्रासादों से, मेरु और मंदार के समान,

श्लोक 52 (padma.2.83.52)

शिखरैरुल्लिखद्भिश्च स्वर्व्योमहाटकान्वितैः । जाज्वल्यमानैः कलशैः शोभते सुपुरोत्तमम्

śikharairullikhadbhiśca svarvyomahāṭakānvitaiḥ jājvalyamānaiḥ kalaśaiḥ śobhate supurottamam

आकाश को छूते शिखरों से, स्वर्ण-नभ से युक्त, प्रज्वलित कलशों से सुशोभित - वह श्रेष्ठ नगर शोभित हो रहा था।

श्लोक 53 (padma.2.83.53)

तारागणैर्यथाकाशं तेजः श्रिया प्रकाशते । प्रज्वलत्तेजोज्वालाभिर्लोचनैरिव लोकते

tārāgaṇairyathākāśaṁ tejaḥ śriyā prakāśate prajvalattejojvālābhirlocanairiva lokate

जैसे आकाश तारों के समूह से तेज और शोभा से प्रकाशित होता है, वैसे ही यह प्रज्वलित तेज की ज्वालाओं से मानो नेत्रों से देख रहा था।

श्लोक 54 (padma.2.83.54)

नानारत्नैर्हरेर्लोकः प्रहसद्दशनैरिव । समाह्वयति तान्पुण्यान्वैष्णवान्विष्णुवल्लभान्

nānāratnairharerlokaḥ prahasaddaśanairiva samāhvayati tānpuṇyānvaiṣṇavānviṣṇuvallabhān

अनेक रत्नों से सुशोभित हरि का यह लोक मानो हँसते हुए दाँतों से उन पुण्यवान, विष्णु-प्रिय वैष्णवों को बुला रहा था।

श्लोक 55 (padma.2.83.55)

ध्वज व्याजेन राजेंद्र चलिताग्रैः सुपल्लवैः । श्वसनांदोलितैस्तैश्च ध्वजाग्रैश्च मनोहरैः

dhvaja vyājena rājeṁdra calitāgraiḥ supallavaiḥ śvasanāṁdolitaistaiśca dhvajāgraiśca manoharaiḥ

हे राजेंद्र! ध्वजाओं के बहाने, हिलती हुई अग्रभागों और सुंदर पल्लवों से, वायु से आंदोलित उन मनोहर ध्वजाग्रों से -

श्लोक 56 (padma.2.83.56)

हेमदंडैश्च घंटाभिः सर्वत्रसमलंकृतम् । सूर्यतेजः प्रकाशैश्च गोपुराट्टालकैस्ततः

hemadaṁḍaiśca ghaṁṭābhiḥ sarvatrasamalaṁkṛtam sūryatejaḥ prakāśaiśca gopurāṭṭālakaistataḥ

स्वर्ण-दंडों और घंटियों से सर्वत्र अलंकृत, सूर्य के तेज के समान प्रकाशित गोपुरों और अट्टालिकाओं से,

श्लोक 57 (padma.2.83.57)

गवाक्षैर्जालमालैश्च वातायनमनोहरैः । प्रतोलीनां प्रकाशैश्च प्राकारैर्हेमरूपकैः

gavākṣairjālamālaiśca vātāyanamanoharaiḥ pratolīnāṁ prakāśaiśca prākārairhemarūpakaiḥ

झरोखों, जालीदार मालाओं और मनोहर वातायनों से, प्रकाशमान गलियों से, स्वर्णरूप प्राचीरों से,

श्लोक 58 (padma.2.83.58)

तोरणैः सुपताकाभिर्नानाशब्दैः सुमंगलैः । कलशाग्रैश्चक्रबिंबै रविबिंबसमप्रभैः

toraṇaiḥ supatākābhirnānāśabdaiḥ sumaṁgalaiḥ kalaśāgraiścakrabiṁbai ravibiṁbasamaprabhaiḥ

तोरणों और सुंदर पताकाओं से, नाना मंगल ध्वनियों से, कलशों के अग्रभागों और सूर्य-बिंब के समान चमकते चक्र-बिंबों से,

श्लोक 59 (padma.2.83.59)

सुभोगैः शतकक्षैश्च निर्जलांबुदसन्निभैः । दंडच्छत्रसमाकीर्णैः कलशैरुपशोभितैः

subhogaiḥ śatakakṣaiśca nirjalāṁbudasannibhaiḥ daṁḍacchatrasamākīrṇaiḥ kalaśairupaśobhitaiḥ

सौ कक्षों वाले, वर्षा-रहित मेघों के समान सुंदर भवनों से, दंड और छत्रों से भरे, कलशों से सुशोभित,

श्लोक 60 (padma.2.83.60)

प्रावृट्कालांबुदाकारैर्मदिरैरुपशोभितैः । कलशैः शोभमानैस्तैर्ऋक्षैर्द्यौरिव भूतलम्

prāvṛṭkālāṁbudākārairmadirairupaśobhitaiḥ kalaśaiḥ śobhamānaistairṛkṣairdyauriva bhūtalam

वर्षाकाल के मेघों के समान कलशों से सुशोभित, चमकते हुए तारों की भाँति - मानो भूतल पर आकाश उतर आया हो,

श्लोक 61 (padma.2.83.61)

दंडजालपताकाभिर्ऋक्षजालसमप्रभैः । तादृशैः स्फाटिकाकारैः कांतिशंखेंदुसन्निभैः

daṁḍajālapatākābhirṛkṣajālasamaprabhaiḥ tādṛśaiḥ sphāṭikākāraiḥ kāṁtiśaṁkheṁdusannibhaiḥ

तारों के समूह के समान चमकते दंड-जाल और पताकाओं से, स्फटिक के समान, शंख और चंद्रमा की कांति वाले,

श्लोक 62 (padma.2.83.62)

हेमप्रासादसंबाधैर्नानाधातुमयैस्ततः । विमानैरर्बुदसंख्यैः शतकोटिसहस्रकैः

hemaprāsādasaṁbādhairnānādhātumayaistataḥ vimānairarbudasaṁkhyaiḥ śatakoṭisahasrakaiḥ

स्वर्ण-प्रासादों से भरे, नाना धातुओं से बने, करोड़ों-अरबों की संख्या में विमानों से युक्त,

श्लोक 63 (padma.2.83.63)

सर्वभोगयुतैश्चैव शोभते हरिपत्तनम् । यैः समाराधितो देवः शंखचक्रगदाधरः

sarvabhogayutaiścaiva śobhate haripattanam yaiḥ samārādhito devaḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

सभी भोगों से युक्त - इस प्रकार हरि का यह नगर शोभित हो रहा था, जहाँ शंख-चक्र-गदाधारी देव की आराधना होती है।

श्लोक 64 (padma.2.83.64)

ते प्रसादात्तस्य तेषु निवसंति गृहेषु च । सर्वपुण्येषु दिव्येषु भोगाढ्येषु च मानवाः

te prasādāttasya teṣu nivasaṁti gṛheṣu ca sarvapuṇyeṣu divyeṣu bhogāḍhyeṣu ca mānavāḥ

उनकी कृपा से उन घरों में, उन सभी पुण्यमय, दिव्य और भोग-संपन्न घरों में मनुष्य निवास करते हैं -

श्लोक 65 (padma.2.83.65)

वैष्णवाः पुण्यकर्माणो निर्धूताशेषकल्मषाः । एवंविधैर्गृहैः पुण्यैः शोभितं विष्णुमंदिरम्

vaiṣṇavāḥ puṇyakarmāṇo nirdhūtāśeṣakalmaṣāḥ evaṁvidhairgṛhaiḥ puṇyaiḥ śobhitaṁ viṣṇumaṁdiram

पुण्यकर्मी वैष्णव, समस्त पाप से रहित। इस प्रकार के पुण्यमय घरों से विष्णु का यह नगर सुशोभित था,

श्लोक 66 (padma.2.83.66)

नानावृक्षैः समाकीर्णं वनैश्चंदनशोभितैः । सर्वकामफलै राजन्सर्वत्र समलंकृतम्

nānāvṛkṣaiḥ samākīrṇaṁ vanaiścaṁdanaśobhitaiḥ sarvakāmaphalai rājansarvatra samalaṁkṛtam

नाना वृक्षों से भरा, चंदन से सुशोभित वनों वाला; हे राजन्! सभी कामनाओं के फल देने वाले वृक्षों से सर्वत्र अलंकृत,

श्लोक 67 (padma.2.83.67)

वापीकुंडतडागैश्च सारसैरुपशोभितैः । हंसकारंडवाकीर्णैः कल्हारैरुपशोभितैः

vāpīkuṁḍataḍāgaiśca sārasairupaśobhitaiḥ haṁsakāraṁḍavākīrṇaiḥ kalhārairupaśobhitaiḥ

सारसों से सुशोभित बावड़ियों, कुंडों और तालाबों से, हंसों और कारंडवों से भरे, कल्हार पुष्पों से सुशोभित,

श्लोक 68 (padma.2.83.68)

शतपत्रैर्महापद्मैः पद्मोत्पलविराजितैः । कनकोत्पलवर्णैश्च सरोभिश्च विराजते

śatapatrairmahāpadmaiḥ padmotpalavirājitaiḥ kanakotpalavarṇaiśca sarobhiśca virājate

शतदल महापद्मों से, कमल और उत्पल से सुशोभित, स्वर्ण-कमल के रंग वाले सरोवरों से सुशोभित -

श्लोक 69 (padma.2.83.69)

वैकुंठं सर्वशोभाढ्यं देवोद्यानैरलंकृतम् । दिव्यशोभासमाकीर्णं वैष्णवैरुपशोभितम्

vaikuṁṭhaṁ sarvaśobhāḍhyaṁ devodyānairalaṁkṛtam divyaśobhāsamākīrṇaṁ vaiṣṇavairupaśobhitam

वह वैकुंठ सर्वशोभा से युक्त, देवोद्यानों से अलंकृत, दिव्य शोभा से भरा और वैष्णवों से सुशोभित था।

श्लोक 70 (padma.2.83.70)

वैकुंठं ददृशे राजा मोक्षस्थानमनुत्तमम् । देववृंदैः समाकीर्णं ययातिर्नहुषात्मजः

vaikuṁṭhaṁ dadṛśe rājā mokṣasthānamanuttamam devavṛṁdaiḥ samākīrṇaṁ yayātirnahuṣātmajaḥ

राजा ने उस वैकुंठ को देखा - मोक्ष का वह श्रेष्ठ स्थान, देव-समूहों से भरा हुआ। नहुषपुत्र ययाति ने -

श्लोक 71 (padma.2.83.71)

प्रविवेश पुरं रम्यं सर्वदाहविवर्जितम् । ददृशे सर्वक्लेशघ्नं नारायणमनामयम्

praviveśa puraṁ ramyaṁ sarvadāhavivarjitam dadṛśe sarvakleśaghnaṁ nārāyaṇamanāmayam

उस रमणीय, समस्त दाह से रहित नगर में प्रवेश किया; और समस्त क्लेशों को नष्ट करने वाले, निरामय नारायण को देखा,

श्लोक 72 (padma.2.83.72)

विमानैरुपशोभंतं सर्वाभरणशालिनम् । पीतवासं जगन्नाथं श्रीवत्सांकं महाद्युतिम्

vimānairupaśobhaṁtaṁ sarvābharaṇaśālinam pītavāsaṁ jagannāthaṁ śrīvatsāṁkaṁ mahādyutim

विमानों से सुशोभित, सर्वाभूषणों से शोभायमान, पीत वस्त्र धारण करने वाले, श्रीवत्स-चिह्न से युक्त, महातेजस्वी जगन्नाथ को,

श्लोक 73 (padma.2.83.73)

वैनतेयसमारूढं श्रियायुक्तं परात्परम् । सर्वेषां देवलोकानां यो गतिः परमेश्वरः

vainateyasamārūḍhaṁ śriyāyuktaṁ parātparam sarveṣāṁ devalokānāṁ yo gatiḥ parameśvaraḥ

गरुड़ पर आरूढ़, श्री से युक्त, परात्पर, जो सभी देवलोकों की परम गति और परमेश्वर हैं,

श्लोक 74 (padma.2.83.74)

परमानंदरूपेण कैवल्येन विराजते । सेव्यमानं महालोकैः सुपुण्यैर्वैष्णवैर्हरिम्

paramānaṁdarūpeṇa kaivalyena virājate sevyamānaṁ mahālokaiḥ supuṇyairvaiṣṇavairharim

परमानंद-रूप में, कैवल्य से सुशोभित, महान पुण्यशाली लोकों और वैष्णवों द्वारा सेवित उस हरि को,

श्लोक 75 (padma.2.83.75)

देववृंदैः समाकीर्णं गंधर्वगणसेवितम् । अप्सरोभिर्महात्मानं दुःखक्लेशापहं हरिम्

devavṛṁdaiḥ samākīrṇaṁ gaṁdharvagaṇasevitam apsarobhirmahātmānaṁ duḥkhakleśāpahaṁ harim

देव-समूहों से घिरे, गंधर्व-गणों द्वारा सेवित, अप्सराओं द्वारा सेवित, दुःख और क्लेश को दूर करने वाले उस महात्मा हरि को -

श्लोक 76 (padma.2.83.76)

नारायणं ननामाथ स्वपत्न्या सह भूपतिः । प्रणेमुर्मानवाः सर्वे वैष्णवा मधुसूदनम्

nārāyaṇaṁ nanāmātha svapatnyā saha bhūpatiḥ praṇemurmānavāḥ sarve vaiṣṇavā madhusūdanam

राजा ने अपनी पत्नी सहित नारायण को नमस्कार किया; सभी वैष्णव मनुष्यों ने मधुसूदन को प्रणाम किया।

श्लोक 77 (padma.2.83.77)

गता ये वैष्णवाः सर्वे सह राज्ञा महामते । पादांबुजद्वयं तस्य नेमुर्भक्त्या महामते

gatā ye vaiṣṇavāḥ sarve saha rājñā mahāmate pādāṁbujadvayaṁ tasya nemurbhaktyā mahāmate

हे महामते! राजा के साथ गए वे सभी वैष्णव भी भक्तिपूर्वक उनके दोनों चरण-कमलों को नमन करते थे।

श्लोक 78 (padma.2.83.78)

प्रणमंतं महात्मानं राजानं दीप्ततेजसम् । तमुवाच हृषीकेशस्तुष्टोऽहं तव सुव्रत

praṇamaṁtaṁ mahātmānaṁ rājānaṁ dīptatejasam tamuvāca hṛṣīkeśastuṣṭo'haṁ tava suvrata

प्रणाम करते हुए उस दीप्ततेजस्वी महात्मा राजा से हृषीकेश ने कहा - 'हे सुव्रत! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।'

श्लोक 79 (padma.2.83.79)

वरं वरय राजेंद्र यत्ते मनसि वर्तते । तत्ते ददाम्यसंदेहं मद्भक्तोसि महामते

varaṁ varaya rājeṁdra yatte manasi vartate tatte dadāmyasaṁdehaṁ madbhaktosi mahāmate

'हे राजेंद्र! जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो। हे महामते! मैं तुम्हें वह अवश्य दूँगा, तुम मेरे भक्त हो।'

श्लोक 80 (padma.2.83.80)

राजोवाच यदि त्वं देवदेवेश तुष्टोसि मधुसूदन । दासत्वं देहि सततमात्मनश्च जगत्पते

rājovāca yadi tvaṁ devadeveśa tuṣṭosi madhusūdana dāsatvaṁ dehi satatamātmanaśca jagatpate

राजा ने कहा - हे देवाधिदेव मधुसूदन! यदि आप प्रसन्न हैं, तो हे जगत्पते! मुझे सदा अपना दास्य प्रदान कीजिए।

श्लोक 81 (padma.2.83.81)

विष्णुरुवाच- एवमस्तु महाभाग मम भक्तो न संशयः । लोके मम महाराज स्थातव्यमनया सह

viṣṇuruvāca- evamastu mahābhāga mama bhakto na saṁśayaḥ loke mama mahārāja sthātavyamanayā saha

विष्णु ने कहा - हे महाभाग! ऐसा ही हो, तुम निश्चय ही मेरे भक्त हो। हे महाराज! मेरे इस लोक में तुम्हें इसके साथ ही निवास करना चाहिए।

श्लोक 82 (padma.2.83.82)

एवमुक्तो महाराजो ययातिः पृथिवीपतिः । प्रसादात्तस्य देवस्य विष्णुलोकं प्रसाधितम्

evamukto mahārājo yayātiḥ pṛthivīpatiḥ prasādāttasya devasya viṣṇulokaṁ prasādhitam

ऐसा कहे जाने पर महाराज ययाति ने उस देव की कृपा से सिद्ध विष्णुलोक को प्राप्त किया।

श्लोक 83 (padma.2.83.83)

निवसत्येष भूपालो वैष्णवं लोकमुत्तमम्

nivasatyeṣa bhūpālo vaiṣṇavaṁ lokamuttamam

यह राजा उसी उत्तम वैष्णव लोक में निवास करता है।

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