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भूमि खण्ड · अध्याय 84

माता-पिता की सेवा का माहात्म्य

अध्याय 83अध्याय-सूचीअध्याय 85

श्लोक 1 (padma.2.84.1)

सुकर्मोवाच- एतत्ते सर्वमाख्यातं चरित्रं पापनाशनम् । पुत्राणां तारकं दिव्यं बहुपुण्यप्रदायकम्

sukarmovāca- etatte sarvamākhyātaṁ caritraṁ pāpanāśanam putrāṇāṁ tārakaṁ divyaṁ bahupuṇyapradāyakam

सुकर्मा ने कहा - मैंने आपको यह सारा चरित्र बताया, जो पापों का नाश करने वाला, पुत्रों का उद्धार करने वाला, दिव्य और अत्यंत पुण्यदायक है।

श्लोक 2 (padma.2.84.2)

प्रत्यक्षं दृश्यते लोके ययातिचरितं श्रुतम् । पूरुणाप्तं महद्राज्यं दुर्गतिं गतवांस्तुरुः

pratyakṣaṁ dṛśyate loke yayāticaritaṁ śrutam pūruṇāptaṁ mahadrājyaṁ durgatiṁ gatavāṁsturuḥ

सुना गया यह ययाति-चरित्र संसार में साक्षात् देखा जाता है - पूरु ने महान राज्य प्राप्त किया, तुरु दुर्गति को प्राप्त हुआ -

श्लोक 3 (padma.2.84.3)

पितृप्रसादात्कोपाच्च यथा जातं तथा पुनः । पुत्राणां तारकं पुण्यं यशस्यं धनधान्यदम्

pitṛprasādātkopācca yathā jātaṁ tathā punaḥ putrāṇāṁ tārakaṁ puṇyaṁ yaśasyaṁ dhanadhānyadam

पिता की कृपा से और उनके क्रोध से जैसा हुआ वैसा ही फिर होता है - यह पुत्रों का उद्धार करने वाला, यशदायक और धन-धान्य देने वाला पुण्य है।

श्लोक 4 (padma.2.84.4)

शापयुक्ताविमौ चोभौ तुरुश्च यदुरेव च । पितृमातृसमं नास्ति अभीष्टफलदायकम्

śāpayuktāvimau cobhau turuśca yadureva ca pitṛmātṛsamaṁ nāsti abhīṣṭaphaladāyakam

तुरु और यदु - ये दोनों ही शाप से युक्त हुए। माता-पिता के समान इच्छित फल देने वाला और कुछ नहीं है।

श्लोक 5 (padma.2.84.5)

साभिलाषेण भावेन पिता पुत्रं समाह्वयेत् । माता च पुत्रपुत्रेति तस्य पुण्यफलं शृणु

sābhilāṣeṇa bhāvena pitā putraṁ samāhvayet mātā ca putraputreti tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

जब पिता प्रेमपूर्ण भाव से पुत्र को पुकारता है, और माता 'पुत्र, पुत्र' कहती है - उसका पुण्य-फल सुनो।

श्लोक 6 (padma.2.84.6)

समाहूतो यथा पुत्रः प्रयाति मातरं प्रति । यो याति हर्षसंयुक्तो गंगास्नानफलं लभेत्

samāhūto yathā putraḥ prayāti mātaraṁ prati yo yāti harṣasaṁyukto gaṁgāsnānaphalaṁ labhet

जैसे पुकारे जाने पर पुत्र माता के पास जाता है, जो हर्षपूर्वक जाता है, उसे गंगा-स्नान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (padma.2.84.7)

पादप्रक्षालनं यस्तु कुरुते च महायशाः । सर्वतीर्थफलं भुंक्ते प्रसादात्तु तयोः सुतः

pādaprakṣālanaṁ yastu kurute ca mahāyaśāḥ sarvatīrthaphalaṁ bhuṁkte prasādāttu tayoḥ sutaḥ

जो अत्यंत यशस्वी पुत्र उनके चरण धोता है, वह उन दोनों की कृपा से सभी तीर्थों के फल का भोग करता है।

श्लोक 8 (padma.2.84.8)

अंगसंवाहनाच्चान्यदश्वमेधफलं लभेत् । भोजनाच्छादनस्नानैर्गुरुं यः पोषयेत्सुतः

aṁgasaṁvāhanāccānyadaśvamedhaphalaṁ labhet bhojanācchādanasnānairguruṁ yaḥ poṣayetsutaḥ

अंगों की सेवा-मालिश से वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है; जो पुत्र भोजन, वस्त्र और स्नान से अपने गुरुजन (माता-पिता) का पोषण करता है -

श्लोक 9 (padma.2.84.9)

पृथ्वीदानसमं पुण्यं तत्पुत्रे हि प्रजायते । सर्वतीर्थमयी गंगा तथा माता न संशयः

pṛthvīdānasamaṁ puṇyaṁ tatputre hi prajāyate sarvatīrthamayī gaṁgā tathā mātā na saṁśayaḥ

उस पुत्र को पृथ्वी-दान के समान पुण्य प्राप्त होता है; माता निःसंदेह सभी तीर्थों से युक्त गंगा के समान है।

श्लोक 10 (padma.2.84.10)

बहुपुण्यमयः सिंधुर्यथा लोके प्रतिष्ठितः । अस्मिल्लोँके पिता तद्वत्पुराणकवयो विदुः

bahupuṇyamayaḥ siṁdhuryathā loke pratiṣṭhitaḥ asmillom̐ke pitā tadvatpurāṇakavayo viduḥ

जैसे अत्यंत पुण्यमय समुद्र संसार में प्रतिष्ठित है, वैसे ही इस लोक में पिता है, ऐसा पुराणों के कवियों ने जाना है।

श्लोक 11 (padma.2.84.11)

सुकर्मोवाच- भ्रंशते क्रोशते यस्तु पितरं मातरं पुनः । स पुत्रो नरकं याति रौरवाख्यं न संशयः

sukarmovāca- bhraṁśate krośate yastu pitaraṁ mātaraṁ punaḥ sa putro narakaṁ yāti rauravākhyaṁ na saṁśayaḥ

सुकर्मा ने कहा - जो पुत्र फिर से अपने पिता या माता को कोसता या डाँटता है, वह पुत्र निःसंदेह रौरव नामक नरक को प्राप्त होता है।

श्लोक 12 (padma.2.84.12)

मातरं पितरं वृद्धौ गृहस्थो यो न पोषयेत् । स पुत्रो नरकं याति वेदनां प्राप्नुयाद्ध्रुवम्

mātaraṁ pitaraṁ vṛddhau gṛhastho yo na poṣayet sa putro narakaṁ yāti vedanāṁ prāpnuyāddhruvam

जो गृहस्थ पुत्र वृद्धावस्था में अपनी माता-पिता का पोषण नहीं करता, वह पुत्र नरक जाता है और निश्चय ही यातना प्राप्त करता है।

श्लोक 13 (padma.2.84.13)

कुत्सते पापकर्ता यो गुरुं पुत्रः सुदुर्मतिः । निष्कृतिर्नैव दृष्टा वै पुराणैः कविभिः कदा

kutsate pāpakartā yo guruṁ putraḥ sudurmatiḥ niṣkṛtirnaiva dṛṣṭā vai purāṇaiḥ kavibhiḥ kadā

जो अत्यंत दुर्बुद्धि पापी पुत्र अपने गुरुजन की निंदा करता है - पुराण-कवियों ने इसका कोई प्रायश्चित कभी नहीं देखा।

श्लोक 14 (padma.2.84.14)

एवंज्ञात्वाह्यहंविप्रपूजयामिदिनेदिने । मातरं पितरं नित्यं भक्त्या नमितकंधरः

evaṁjñātvāhyahaṁviprapūjayāmidinedine mātaraṁ pitaraṁ nityaṁ bhaktyā namitakaṁdharaḥ

हे विप्र! यह जानकर मैं प्रतिदिन भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर सदा अपने माता-पिता की पूजा करता हूँ।

श्लोक 15 (padma.2.84.15)

कृत्याकृत्यं वदेच्चैव समाहूय गुरुर्मम । तत्करोम्यविचारेण शक्त्या स्वस्य च पिप्पल

kṛtyākṛtyaṁ vadeccaiva samāhūya gururmama tatkaromyavicāreṇa śaktyā svasya ca pippala

हे पिप्पल! मेरे गुरु मुझे बुलाकर जो भी उचित-अनुचित कहते हैं, वह मैं बिना विचार किए, अपनी शक्तिभर करता हूँ।

श्लोक 16 (padma.2.84.16)

तेन मे परमं ज्ञानं संजातं गतिदायकम् । एतयोश्च प्रसादेन संसारे परिवर्तते

tena me paramaṁ jñānaṁ saṁjātaṁ gatidāyakam etayośca prasādena saṁsāre parivartate

उसी से मुझमें परम ज्ञान उत्पन्न हुआ है, जो परम गति देने वाला है। उन दोनों की कृपा से ही मैं संसार में विचरण करता हूँ।

श्लोक 17 (padma.2.84.17)

यच्चकिंचित्प्रकुर्वंति मानवा भुवि संस्थिताः । गृहस्थस्तदहं जाने यच्च स्वर्गे प्रवर्तते

yaccakiṁcitprakurvaṁti mānavā bhuvi saṁsthitāḥ gṛhasthastadahaṁ jāne yacca svarge pravartate

पृथ्वी पर रहने वाले गृहस्थ मनुष्य जो कुछ भी करते हैं, मैं उसे जानता हूँ; और स्वर्ग में जो कुछ भी होता है -

श्लोक 18 (padma.2.84.18)

नागानां च इहस्थोपि चारं जानामि पिप्पल । एतयोश्च प्रसादाच्च त्रैलोक्यं मम वश्यताम्

nāgānāṁ ca ihasthopi cāraṁ jānāmi pippala etayośca prasādācca trailokyaṁ mama vaśyatām

हे पिप्पल! यहीं रहते हुए भी मैं नागों की गति को जानता हूँ। उन दोनों की कृपा से ही त्रिलोक -

श्लोक 19 (padma.2.84.19)

गतं विद्याधरश्रेष्ठ भवानर्चतु माधवम् । विष्णुरुवाच- एवं संचोदितस्तेन पिप्पलो हि स्वकर्मणा

gataṁ vidyādharaśreṣṭha bhavānarcatu mādhavam viṣṇuruvāca- evaṁ saṁcoditastena pippalo hi svakarmaṇā

हे विद्याधरश्रेष्ठ! मेरे वश में आ गया है। आप माधव की आराधना कीजिए। विष्णु ने कहा - इस प्रकार अपने ही कर्म से प्रेरित होकर -

श्लोक 20 (padma.2.84.20)

आनम्य तं द्विजश्रेष्ठं लज्जितोऽपि दिवं ययौ । सुकर्मासोऽपि धर्मात्मा गुरुं शुश्रूषते नृप

ānamya taṁ dvijaśreṣṭhaṁ lajjito'pi divaṁ yayau sukarmāso'pi dharmātmā guruṁ śuśrūṣate nṛpa

पिप्पल ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रणाम किया, और लज्जित होते हुए भी स्वर्ग को गया; और वह धर्मात्मा सुकर्मा भी, हे राजन्! अपने गुरु की सेवा करता रहा।

श्लोक 21 (padma.2.84.21)

एतत्ते सर्वमाख्यातं पितृतीर्थानुगं मया । अन्यत्किं ते प्रवक्ष्यामि वद वेन महामते

etatte sarvamākhyātaṁ pitṛtīrthānugaṁ mayā anyatkiṁ te pravakṣyāmi vada vena mahāmate

पितृ-तीर्थ के अनुसार यह सब मैंने आपको बता दिया। अब मैं आपको और क्या बताऊँ? हे महामते वेन! बताइए।

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