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भूमि खण्ड · अध्याय 86

चित्रा के दो कर्म और कुंजल का ध्यान-उपदेश

अध्याय 85अध्याय-सूचीअध्याय 87

श्लोक 1 (padma.2.86.1)

कुंजल उवाच- तस्यास्तु चेष्टितं वत्स दिव्या देव्या वदाम्यहम् । पूर्वजन्मकृतं सर्वं तन्मे निगदतः शृणु

kuṁjala uvāca- tasyāstu ceṣṭitaṁ vatsa divyā devyā vadāmyaham pūrvajanmakṛtaṁ sarvaṁ tanme nigadataḥ śṛṇu

कुंजल ने कहा - हे वत्स! मैं तुम्हें उस दिव्य देवी के पूर्वकर्म का सारा वृत्तांत बताता हूँ; मेरे कहने पर पूर्वजन्म में किए गए सब कुछ सुनो।

श्लोक 2 (padma.2.86.2)

अस्ति वाराणसी पुण्या नगरी पापनाशिनी । तस्यामास्ते महाप्राज्ञः सुवीरो नाम नामतः

asti vārāṇasī puṇyā nagarī pāpanāśinī tasyāmāste mahāprājñaḥ suvīro nāma nāmataḥ

वाराणसी नाम की पवित्र, पापनाशिनी नगरी है; वहाँ सुवीर नाम का एक महाबुद्धिमान पुरुष रहता था।

श्लोक 3 (padma.2.86.3)

वैश्यजात्यां समुत्पन्नो धनधान्यसमाकुलः । तस्य भार्या महाप्राज्ञ चित्रा नाम सुविश्रुता

vaiśyajātyāṁ samutpanno dhanadhānyasamākulaḥ tasya bhāryā mahāprājña citrā nāma suviśrutā

वैश्य जाति में उत्पन्न, धन-धान्य से परिपूर्ण; हे महाप्राज्ञ! उसकी पत्नी का नाम चित्रा था, जो सुविख्यात थी।

श्लोक 4 (padma.2.86.4)

कुलाचारं परित्यज्य अनाचारेण वर्तते । न मन्यते हि भर्तारं स्वैरवृत्त्या प्रवर्तते

kulācāraṁ parityajya anācāreṇa vartate na manyate hi bhartāraṁ svairavṛttyā pravartate

वह अपने कुल के आचार को त्यागकर अनाचार से रहती थी; अपने पति को नहीं मानती थी, स्वेच्छाचार से चलती थी।

श्लोक 5 (padma.2.86.5)

धर्मपुण्यविहीना तु पापमेव समाचरेत् । भर्तारं कुत्सते नित्यं नित्यं च कलहप्रिया

dharmapuṇyavihīnā tu pāpameva samācaret bhartāraṁ kutsate nityaṁ nityaṁ ca kalahapriyā

धर्म और पुण्य से रहित होकर वह केवल पाप ही करती थी; सदा अपने पति को कोसती और सदा कलह-प्रिय रहती थी।

श्लोक 6 (padma.2.86.6)

नित्यं परगृहे वासो भ्रमते सा गृहे गृहे । परच्छिद्रं समापश्येत्सदा दुष्टा च प्राणिषु

nityaṁ paragṛhe vāso bhramate sā gṛhe gṛhe paracchidraṁ samāpaśyetsadā duṣṭā ca prāṇiṣu

वह सदा दूसरों के घर में रहती, घर-घर घूमती फिरती थी; सदा दूसरों के छिद्र (दोष) ढूँढ़ती, प्राणियों के प्रति सदा दुष्ट रहती थी।

श्लोक 7 (padma.2.86.7)

साधुनिंदापरा दुष्टा सदा हास्यकरा च सा । अनाचारां महापापां ज्ञात्वा वीरेण निंदिता

sādhuniṁdāparā duṣṭā sadā hāsyakarā ca sā anācārāṁ mahāpāpāṁ jñātvā vīreṇa niṁditā

वह सज्जनों की निंदा में लगी, दुष्ट, सदा उपहास करने वाली थी; उसे अनाचारी और महापापी जानकर उस वीर (पति) ने उसकी निंदा की।

श्लोक 8 (padma.2.86.8)

स तां त्यक्त्वा महाप्राज्ञ उपयेमे महामतिः । अन्य वैश्यस्य वै कन्यां तया सह प्रवर्तते

sa tāṁ tyaktvā mahāprājña upayeme mahāmatiḥ anya vaiśyasya vai kanyāṁ tayā saha pravartate

हे महाप्राज्ञ! उसे त्यागकर उस बुद्धिमान पुरुष ने किसी अन्य वैश्य की कन्या से विवाह किया, और उसके साथ रहने लगा।

श्लोक 9 (padma.2.86.9)

धर्माचारेण पुण्यात्मा सत्यधर्ममतिः सदा । निरस्ता तेन सा चित्रा प्रचंडा भ्रमते महीम्

dharmācāreṇa puṇyātmā satyadharmamatiḥ sadā nirastā tena sā citrā pracaṁḍā bhramate mahīm

धर्माचार से युक्त, पुण्यात्मा, सदा सत्य-धर्म में बुद्धि रखने वाले उस पति द्वारा त्यागी गई वह प्रचंड चित्रा पृथ्वी पर भटकने लगी।

श्लोक 10 (padma.2.86.10)

दुष्टानां संगतिं प्राप्ता नराणां पापिनां सदा । दूतीकर्म चकाराथ सा तेषां पापनिश्चया

duṣṭānāṁ saṁgatiṁ prāptā narāṇāṁ pāpināṁ sadā dūtīkarma cakārātha sā teṣāṁ pāpaniścayā

दुष्ट और पापी मनुष्यों की संगति पाकर वह सदा उनके साथ रहने लगी, और अपने पापपूर्ण निश्चय से दूती का काम करने लगी।

श्लोक 11 (padma.2.86.11)

गृहभंगं चकाराथ साधूनां पापकारिणी । साध्वीं नारीं समाहूय पापवाक्यैः सुलोभयेत्

gṛhabhaṁgaṁ cakārātha sādhūnāṁ pāpakāriṇī sādhvīṁ nārīṁ samāhūya pāpavākyaiḥ sulobhayet

वह पापकारिणी सज्जनों के घर तोड़ने लगी; किसी सती स्त्री को बुलाकर पापपूर्ण वचनों से उसे लोभित करती थी।

श्लोक 12 (padma.2.86.12)

धर्मभंगं चकाराथ वाक्यैः प्रत्ययकारकैः । साधूनां सा स्त्रियं चित्रा अन्यस्मै प्रतिपादयेत्

dharmabhaṁgaṁ cakārātha vākyaiḥ pratyayakārakaiḥ sādhūnāṁ sā striyaṁ citrā anyasmai pratipādayet

वह विश्वासजनक वचनों से धर्म को भंग करती थी; वह चित्रा सज्जनों की पत्नियों को दूसरों को सौंप देती थी।

श्लोक 13 (padma.2.86.13)

एवं गृहशतं भग्नं चित्रया पापनिश्चयात् । संग्रामं सा महादुष्टाऽकारयत्पतिपुत्रकैः

evaṁ gṛhaśataṁ bhagnaṁ citrayā pāpaniścayāt saṁgrāmaṁ sā mahāduṣṭā'kārayatpatiputrakaiḥ

इस प्रकार चित्रा के पापपूर्ण निश्चय से सौ घर टूट गए; उस अत्यंत दुष्टा ने पतियों और पुत्रों के बीच संग्राम भी करवाया।

श्लोक 14 (padma.2.86.14)

मनांसि चालयेत्पापा पुरुषाणां स्त्रियः प्रति । अकारयच्च संग्रामं यमग्रामविवर्धनम्

manāṁsi cālayetpāpā puruṣāṇāṁ striyaḥ prati akārayacca saṁgrāmaṁ yamagrāmavivardhanam

वह पापिनी पुरुषों के मन को स्त्रियों की ओर डुलाती थी, और यमलोक की संख्या बढ़ाने वाला संग्राम करवाती थी।

श्लोक 15 (padma.2.86.15)

एवं गृहशतं भंक्त्वा पश्चात्सा निधनं गता। शासिता यमराजेन बहुदंडैः सुनंदन

evaṁ gṛhaśataṁ bhaṁktvā paścātsā nidhanaṁ gatā śāsitā yamarājena bahudaṁḍaiḥ sunaṁdana

इस प्रकार सौ घर तोड़कर वह बाद में मृत्यु को प्राप्त हुई; हे सुनंदन! यमराज ने उसे अनेक भयंकर दंडों से दंडित किया।

श्लोक 16 (padma.2.86.16)

अभोजयत्सुनरकान्रौरवांस्तरणेः सुतः । पाचिता रौरवे चित्रा चित्राः पीडाः प्रदर्शिताः

abhojayatsunarakānrauravāṁstaraṇeḥ sutaḥ pācitā raurave citrā citrāḥ pīḍāḥ pradarśitāḥ

सूर्य-पुत्र (यम) ने उसे रौरव आदि भयंकर नरकों में भेजा; चित्रा को रौरव में पकाया गया, उसे विविध यातनाएँ दिखाई गईं।

श्लोक 17 (padma.2.86.17)

यादृशं क्रियते कर्म तादृशं परिभुज्यते । तया गृहशतं भग्नं चित्रया पापनिश्चयात्

yādṛśaṁ kriyate karma tādṛśaṁ paribhujyate tayā gṛhaśataṁ bhagnaṁ citrayā pāpaniścayāt

जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही भोगा जाता है; उसने पापपूर्ण निश्चय से सौ घर तोड़े थे।

श्लोक 18 (padma.2.86.18)

तत्तत्कर्मविपाकोऽयं तया भुक्तो द्विजोत्तम । यस्माद्गृहशतं भग्नं तस्माद्दुःखं प्रभुंजति

tattatkarmavipāko'yaṁ tayā bhukto dvijottama yasmādgṛhaśataṁ bhagnaṁ tasmādduḥkhaṁ prabhuṁjati

हे द्विजोत्तम! उसी कर्म का यह फल उसने भोगा; चूँकि सौ घर टूटे थे, इसलिए वह दुःख भोगती है।

श्लोक 19 (padma.2.86.19)

विवाहसमये प्राप्ते दैवं च पाकतां गतम् । प्राप्ते विवाहसमये भर्ता मृत्युं प्रयाति च

vivāhasamaye prāpte daivaṁ ca pākatāṁ gatam prāpte vivāhasamaye bhartā mṛtyuṁ prayāti ca

विवाह का समय आते ही भाग्य पककर फल देने लगता है; विवाह का समय आते ही पति मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 20 (padma.2.86.20)

यथा गृहशतं भग्नं तथा वरशतं मृतम् । स्वयंवरे तदा वत्स विवाहे चैकविंशतिः

yathā gṛhaśataṁ bhagnaṁ tathā varaśataṁ mṛtam svayaṁvare tadā vatsa vivāhe caikaviṁśatiḥ

जैसे सौ घर टूटे थे, वैसे ही सौ वर मर गए; हे वत्स! और उसके बाद स्वयंवर के विवाह में इक्कीस और।

श्लोक 21 (padma.2.86.21)

दिव्या देव्या मया ख्यातं यथा मे पृच्छितं त्वया । एतत्ते सर्वमाख्यातं तस्याः पूर्वविचेष्टितम्

divyā devyā mayā khyātaṁ yathā me pṛcchitaṁ tvayā etatte sarvamākhyātaṁ tasyāḥ pūrvaviceṣṭitam

जैसा तुमने मुझसे पूछा, वैसा ही मैंने तुम्हें दिव्य देवी के विषय में बताया है; उसका सारा पूर्व-आचरण मैंने तुम्हें कह सुनाया।

श्लोक 22 (padma.2.86.22)

उज्ज्वल उवाच- दिव्या देव्यास्त्वया ख्यातं यत्पूर्वं पूर्वचेष्टितम् । तथा पापं कृतं घोरं गृहभंगाख्यमेव च

ujjvala uvāca- divyā devyāstvayā khyātaṁ yatpūrvaṁ pūrvaceṣṭitam tathā pāpaṁ kṛtaṁ ghoraṁ gṛhabhaṁgākhyameva ca

उज्ज्वल ने कहा - आपने मुझे दिव्य देवी का पूर्व-आचरण बताया, और वह भयंकर पाप भी जो उसने किया था - घर तोड़ने का पाप।

श्लोक 23 (padma.2.86.23)

प्लक्षद्वीपस्य भूपस्य दिवोदासस्य वै सुता । केन पुण्यप्रभावेण तया प्राप्तं महाकुलम्

plakṣadvīpasya bhūpasya divodāsasya vai sutā kena puṇyaprabhāveṇa tayā prāptaṁ mahākulam

परंतु प्लक्षद्वीप के राजा दिवोदास की वह पुत्री - किस पुण्य के प्रभाव से उसने इतने महान कुल को प्राप्त किया?

श्लोक 24 (padma.2.86.24)

एतन्मे संशयं तात तदेतत्प्रब्रवीतु मे । एवं पापसमाचारा कथं जाता नृपात्मजा

etanme saṁśayaṁ tāta tadetatprabravītu me evaṁ pāpasamācārā kathaṁ jātā nṛpātmajā

हे पिता! यह मेरा संशय है, यह मुझे बताइए। इतने पापपूर्ण आचरण वाली स्त्री राजपुत्री कैसे बनी?

श्लोक 25 (padma.2.86.25)

कुंजल उवाच- चित्रायाश्चेष्टितं पुण्यं तत्सर्वं प्रवदाम्यहम् । श्रूयतामुज्ज्वल सुत चित्रया यत्कृतं पुरा

kuṁjala uvāca- citrāyāśceṣṭitaṁ puṇyaṁ tatsarvaṁ pravadāmyaham śrūyatāmujjvala suta citrayā yatkṛtaṁ purā

कुंजल ने कहा - मैं तुम्हें चित्रा का पुण्यकर्म भी पूरा बताता हूँ; हे पुत्र उज्ज्वल! सुनो, चित्रा ने पहले क्या किया था।

श्लोक 26 (padma.2.86.26)

भ्रममाणो महाप्राज्ञः कश्चित्सिद्धः समागतः । कुचैलो वस्त्रहीनश्च संन्यासी स च दंडधृक्

bhramamāṇo mahāprājñaḥ kaścitsiddhaḥ samāgataḥ kucailo vastrahīnaśca saṁnyāsī sa ca daṁḍadhṛk

एक भ्रमणशील महाबुद्धिमान सिद्ध वहाँ आया - मैले वस्त्रों वाला, वस्त्रहीन, दंड धारण करने वाला संन्यासी,

श्लोक 27 (padma.2.86.27)

कौपीनेन समायुक्तः पाणिपात्रो दिगंबरः । गृहद्वारं समाश्रित्य चित्रायाः परिसंश्रितः

kaupīnena samāyuktaḥ pāṇipātro digaṁbaraḥ gṛhadvāraṁ samāśritya citrāyāḥ parisaṁśritaḥ

केवल कौपीन धारण किए, हाथ को ही पात्र बनाए, दिगंबर, चित्रा के घर के द्वार के पास आश्रय लेकर बैठा -

श्लोक 28 (padma.2.86.28)

स मौनी सर्वमुंडस्तु विजितात्मा जितेंद्रियः । निराहारो जिताहारः सर्वतत्त्वार्थदर्शकः

sa maunī sarvamuṁḍastu vijitātmā jiteṁdriyaḥ nirāhāro jitāhāraḥ sarvatattvārthadarśakaḥ

मौनी, सिर पूरा मुँडा हुआ, विजितात्मा, जितेंद्रिय, निराहार, आहार को जीत चुका, समस्त तत्त्वों का दर्शक।

श्लोक 29 (padma.2.86.29)

दूराध्वानपरिश्रांत आतपाकुलमानसः । श्रमेण खिद्यमानश्च तृषाक्रांतः सुपुत्रक

dūrādhvānapariśrāṁta ātapākulamānasaḥ śrameṇa khidyamānaśca tṛṣākrāṁtaḥ suputraka

लंबी यात्रा से थका हुआ, धूप से व्याकुल मन वाला, श्रम से खिन्न और प्यास से पीड़ित, हे सुपुत्र! -

श्लोक 30 (padma.2.86.30)

चित्रा द्वारं समाश्रित्य च्छायामाश्रित्य संस्थितः । तया दृष्टो महात्मा स चित्रया श्रमपीडितः

citrā dvāraṁ samāśritya cchāyāmāśritya saṁsthitaḥ tayā dṛṣṭo mahātmā sa citrayā śramapīḍitaḥ

चित्रा द्वार के पास, छाया का आश्रय लेकर बैठी हुई थी, उसने श्रम से पीड़ित उस महात्मा को देखा।

श्लोक 31 (padma.2.86.31)

सेवां चक्रे च चित्रा सा तस्यैव सुमहात्मनः । पादप्रक्षालनं कृत्वा दत्वा आसनमुत्तमम्

sevāṁ cakre ca citrā sā tasyaiva sumahātmanaḥ pādaprakṣālanaṁ kṛtvā datvā āsanamuttamam

चित्रा ने उस महात्मा की सेवा की; उसके चरण धोकर, उसे उत्तम आसन देकर -

श्लोक 32 (padma.2.86.32)

आस्यतामासने तात सुखेनापि सुकोमले । क्षुधापनोदनार्थं हि भुज्यतामन्नमुत्तमम्

āsyatāmāsane tāta sukhenāpi sukomale kṣudhāpanodanārthaṁ hi bhujyatāmannamuttamam

'हे तात! इस सुकोमल आसन पर सुखपूर्वक बैठिए; और भूख मिटाने के लिए यह उत्तम अन्न ग्रहण कीजिए।'

श्लोक 33 (padma.2.86.33)

स्वेच्छया परितुष्टश्च शीतलं सलिलं पिब । एवमुक्त्वा तथा कृत्वा देववत्पूज्य तं सुत

svecchayā parituṣṭaśca śītalaṁ salilaṁ piba evamuktvā tathā kṛtvā devavatpūjya taṁ suta

'यह शीतल जल इच्छानुसार संतुष्ट होकर पीजिए।' ऐसा कहकर, वैसा करके, उसे देवता के समान पूजते हुए, हे पुत्र! -

श्लोक 34 (padma.2.86.34)

अंगसंवाहनं कृत्वा नाशितश्रम एव च । तयोक्तो हि महात्मा स भुक्त्वा पीत्वा द्विजोत्तम

aṁgasaṁvāhanaṁ kṛtvā nāśitaśrama eva ca tayokto hi mahātmā sa bhuktvā pītvā dvijottama

उसके अंगों की मालिश कर उसका श्रम दूर किया; उसके द्वारा कहे जाने पर वह महात्मा भोजन और जल ग्रहण कर, हे द्विजोत्तम! -

श्लोक 35 (padma.2.86.35)

एवं संतोषितः सिद्धस्तया तत्त्वार्थदर्शकः । संतुष्टः सर्वधर्मात्मा किंचित्कालं स्थिरोभवत्

evaṁ saṁtoṣitaḥ siddhastayā tattvārthadarśakaḥ saṁtuṣṭaḥ sarvadharmātmā kiṁcitkālaṁ sthirobhavat

इस प्रकार उससे संतुष्ट हुआ वह सिद्ध, समस्त तत्त्वों का दर्शक, संतुष्ट और सर्वधर्मात्मा होकर कुछ समय वहाँ स्थिर रहा।

श्लोक 36 (padma.2.86.36)

स्वेच्छया स गतो विप्रो महायोगी यथागतम् । गते तस्मिन्महाभागे सिद्धे चैव महात्मनि

svecchayā sa gato vipro mahāyogī yathāgatam gate tasminmahābhāge siddhe caiva mahātmani

वह महायोगी ब्राह्मण अपनी इच्छा से जैसे आया था वैसे ही चला गया। उस महाभाग्यशाली, महात्मा सिद्ध के चले जाने पर -

श्लोक 37 (padma.2.86.37)

सा चित्रा मरणं प्राप्ता स्वकर्मवशमागता । शासिता धर्मराजेन महादंडैः सुदुःखदैः

sā citrā maraṇaṁ prāptā svakarmavaśamāgatā śāsitā dharmarājena mahādaṁḍaiḥ suduḥkhadaiḥ

वह चित्रा भी अपने कर्म के वशीभूत होकर मृत्यु को प्राप्त हुई; उसे धर्मराज ने अत्यंत दुःखदायी महादंडों से दंडित किया।

श्लोक 38 (padma.2.86.38)

सा चित्रा नरकं प्राप्ता वेदना व्रातदायकम् । भुंक्ते दुःखं महाराज सा वै युगसहस्रकम्

sā citrā narakaṁ prāptā vedanā vrātadāyakam bhuṁkte duḥkhaṁ mahārāja sā vai yugasahasrakam

वह चित्रा नरक को प्राप्त हुई, जहाँ अनेक यातनाएँ हैं; हे महाराज! उसने वह दुःख एक सहस्र युगों तक भोगा।

श्लोक 39 (padma.2.86.39)

भोगांते तु पुनर्जन्म संप्राप्तं मानुषस्य च । पूर्वं संपूजितः सिद्धस्तया पुण्यवतां वरः

bhogāṁte tu punarjanma saṁprāptaṁ mānuṣasya ca pūrvaṁ saṁpūjitaḥ siddhastayā puṇyavatāṁ varaḥ

उस भोग के अंत में उसे पुनः मनुष्य-जन्म प्राप्त हुआ; चूँकि उसने पहले उस सिद्ध का सम्मान किया था, जो पुण्यवानों में श्रेष्ठ थे -

श्लोक 40 (padma.2.86.40)

तस्य कर्मविपाकोयं प्राप्ता पुण्यवतां कुले । क्षत्रियाणां महाराज्ञो दिवोदासस्य वै गृहे

tasya karmavipākoyaṁ prāptā puṇyavatāṁ kule kṣatriyāṇāṁ mahārājño divodāsasya vai gṛhe

उसी कर्म के फल से वह पुण्यवानों के कुल में, क्षत्रियों के महाराज दिवोदास के घर में जन्मी।

श्लोक 41 (padma.2.86.41)

दिव्यादेवी च तन्नाम जातं तस्या नरोत्तम । सा हि दत्तवती चान्नं पानं पुण्यं महात्मने

divyādevī ca tannāma jātaṁ tasyā narottama sā hi dattavatī cānnaṁ pānaṁ puṇyaṁ mahātmane

हे नरोत्तम! उसका नाम दिव्यादेवी हुआ। चूँकि उसने उस महात्मा को पुण्यमय अन्न और जल दिया था -

श्लोक 42 (padma.2.86.42)

तस्य दानस्य सा भुंक्ते महत्पुण्यफलोदयम् । पिबते शीतलं तोयं मिष्टान्नं च भुनक्ति वै

tasya dānasya sā bhuṁkte mahatpuṇyaphalodayam pibate śītalaṁ toyaṁ miṣṭānnaṁ ca bhunakti vai

वह उसी दान के महान पुण्य-फल का भोग करती है; वह शीतल जल पीती है और मिष्ट अन्न का भोग करती है।

श्लोक 43 (padma.2.86.43)

दिव्यान्भोगान्प्रभुंजाना वर्तते पितृमंदिरे । सिद्धस्यास्य प्रभावाच्च राजकन्या व्यजायत

divyānbhogānprabhuṁjānā vartate pitṛmaṁdire siddhasyāsya prabhāvācca rājakanyā vyajāyata

दिव्य भोगों का उपभोग करती हुई वह अपने पिता के महल में रहती है; उस सिद्ध के प्रभाव से ही वह राजकन्या के रूप में जन्मी।

श्लोक 44 (padma.2.86.44)

पापकर्मप्रभावाच्च गृहभंगान्महीपते । विधवात्वं भुंजते सा दिव्यादेवी सुपुत्रक

pāpakarmaprabhāvācca gṛhabhaṁgānmahīpate vidhavātvaṁ bhuṁjate sā divyādevī suputraka

परंतु, हे महीपते! घर तोड़ने के पापकर्म के प्रभाव से, हे सुपुत्र! वह दिव्यादेवी विधवापन भोगती है।

श्लोक 45 (padma.2.86.45)

एतत्ते सर्वमाख्यातं दिव्यादेव्या विचेष्टितम् । अन्यत्किन्ते प्रवक्ष्यामि यत्त्वं पृच्छसि मामिह

etatte sarvamākhyātaṁ divyādevyā viceṣṭitam anyatkinte pravakṣyāmi yattvaṁ pṛcchasi māmiha

यह मैंने तुम्हें दिव्यादेवी का सारा आचरण बताया। अब तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, वह और क्या बताऊँ?

श्लोक 46 (padma.2.86.46)

उज्ज्वल उवाच- कथं सा मुच्यते शोकान्महादुःखाद्वदस्व मे । सास्याच्च कीदृशी बाला महादुःखेन पीडिता

ujjvala uvāca- kathaṁ sā mucyate śokānmahāduḥkhādvadasva me sāsyācca kīdṛśī bālā mahāduḥkhena pīḍitā

उज्ज्वल ने कहा - मुझे बताइए कि वह इस शोक और महादुःख से कैसे मुक्त होगी। वह कैसी बाला है, इतने महादुःख से पीड़ित?

श्लोक 47 (padma.2.86.47)

तत्सुखं कीदृशं तस्माद्विपाकश्च भविष्यति । एतन्मे संशयं तात सांप्रतं छेत्तुमर्हसि

tatsukhaṁ kīdṛśaṁ tasmādvipākaśca bhaviṣyati etanme saṁśayaṁ tāta sāṁprataṁ chettumarhasi

उसका सुख कैसा होगा, और उसका परिणाम क्या होगा? हे पिता! यह मेरा संशय अभी दूर कीजिए।

श्लोक 48 (padma.2.86.48)

कथं सा लभते मोक्षं तंचोपायं वदस्व मे । एकाकिनी महाभागा महारण्ये प्ररोदिति

kathaṁ sā labhate mokṣaṁ taṁcopāyaṁ vadasva me ekākinī mahābhāgā mahāraṇye praroditi

वह मोक्ष कैसे प्राप्त करेगी, और उसका उपाय क्या है, यह मुझे बताइए। वह महाभाग्यशालिनी अकेली महावन में रो रही है।

श्लोक 49 (padma.2.86.49)

विष्णुरुवाच- पुत्रवाक्यं महच्छ्रुत्वा क्षणमेकं विचिंत्य सः । प्रत्युवाच महाप्राज्ञः कुंजलः पुत्रकं प्रति

viṣṇuruvāca- putravākyaṁ mahacchrutvā kṣaṇamekaṁ viciṁtya saḥ pratyuvāca mahāprājñaḥ kuṁjalaḥ putrakaṁ prati

विष्णु ने कहा - पुत्र के इस महत्त्वपूर्ण वचन को सुनकर, क्षणभर विचार कर, महाबुद्धिमान कुंजल ने अपने पुत्र से कहा -

श्लोक 50 (padma.2.86.50)

शृणु वत्स महाभाग सत्यमेतद्वदाम्यहम् । पापयोनिं तु संप्राप्य पूर्वकर्मसमुद्भवाम्

śṛṇu vatsa mahābhāga satyametadvadāmyaham pāpayoniṁ tu saṁprāpya pūrvakarmasamudbhavām

'हे वत्स! हे महाभाग! सुनो, मैं तुम्हें यह सत्य बताता हूँ। पूर्वकर्म से उत्पन्न पापयोनि को प्राप्त कर -'

श्लोक 51 (padma.2.86.51)

तिर्यक्त्वेन च मे ज्ञानं नष्टं संप्रति पुत्रक । अस्य वृक्षस्य संगाच्च प्रयतस्य महात्मनः

tiryaktvena ca me jñānaṁ naṣṭaṁ saṁprati putraka asya vṛkṣasya saṁgācca prayatasya mahātmanaḥ

'हे पुत्रक! तिर्यक् (पशु-पक्षी) योनि में होने से मेरा ज्ञान भी अब नष्ट हो गया है। इस संयमी महात्मा के वृक्ष के संग से -'

श्लोक 52 (padma.2.86.52)

रेवायाश्च प्रसादेन विष्णोश्चैव प्रसादतः । येन सा लभते ज्ञानं मोक्षस्थानं निवर्तते

revāyāśca prasādena viṣṇoścaiva prasādataḥ yena sā labhate jñānaṁ mokṣasthānaṁ nivartate

'और रेवा (नर्मदा) की कृपा से तथा विष्णु की कृपा से ही वह ज्ञान प्राप्त होता है और बंधन की अवस्था से मुक्ति मिलती है -'

श्लोक 53 (padma.2.86.53)

उपदेशं प्रवक्ष्यामि मोक्षमार्गमनुत्तमम् । यास्यते कल्मषान्मुक्ता यथा हेम हुताशनात्

upadeśaṁ pravakṣyāmi mokṣamārgamanuttamam yāsyate kalmaṣānmuktā yathā hema hutāśanāt

'मैं अब वह उपदेश, वह अनुपम मोक्ष-मार्ग बताऊँगा, जिससे वह मल से मुक्त हो जाएगी, जैसे सोना अग्नि से -'

श्लोक 54 (padma.2.86.54)

शुद्धं च जायते वत्स संगाद्वह्नेः स्वरूपवत् । हरेर्ध्यानान्महाप्राज्ञ शीघ्रं तस्य महात्मनः

śuddhaṁ ca jāyate vatsa saṁgādvahneḥ svarūpavat harerdhyānānmahāprājña śīghraṁ tasya mahātmanaḥ

'हे वत्स! अग्नि के संग से जैसे शुद्ध हो जाता है, वैसे ही हरि के ध्यान से, हे महाप्राज्ञ! उस महात्मा की कृपा से शीघ्र ही शुद्ध हो जाती है -'

श्लोक 55 (padma.2.86.55)

जपहोमव्रतात्पापं नाशं याति हि पापिनाम् । मदं त्यजेद्यथा नागो भयात्सिंहस्य सर्वदा

japahomavratātpāpaṁ nāśaṁ yāti hi pāpinām madaṁ tyajedyathā nāgo bhayātsiṁhasya sarvadā

'जप, हवन और व्रत से पापियों का पाप नष्ट हो जाता है; जैसे सर्प सिंह के भय से सदा अपना मद त्याग देता है -'

श्लोक 56 (padma.2.86.56)

नामोच्चारेण कृष्णस्य तत्प्रयाति हि किल्बिषम् । तेजसा वैनतेयस्य विषहीना इवोरगाः

nāmoccāreṇa kṛṣṇasya tatprayāti hi kilbiṣam tejasā vainateyasya viṣahīnā ivoragāḥ

'वैसे ही कृष्ण के नाम-उच्चारण से पाप निश्चय ही चला जाता है; जैसे विषरहित सर्प गरुड़ के तेज से भाग जाते हैं -'

श्लोक 57 (padma.2.86.57)

ब्रह्महत्यादिकाः पापाः प्रलयं यांति नान्यथा । नामोच्चारेण तस्यापि चक्रपाणेः प्रयांति ते

brahmahatyādikāḥ pāpāḥ pralayaṁ yāṁti nānyathā nāmoccāreṇa tasyāpi cakrapāṇeḥ prayāṁti te

'ब्रह्महत्या आदि पाप भी नाश को प्राप्त होते हैं, अन्यथा नहीं, केवल चक्रपाणि के नाम के उच्चारण से ही वे नष्ट होते हैं।'

श्लोक 58 (padma.2.86.58)

यदा नामशतं पुण्यमघराशिविनाशनम् । सा जपेत स्थिरा भूत्वा कामक्रोधविवर्जिता

yadā nāmaśataṁ puṇyamagharāśivināśanam sā japeta sthirā bhūtvā kāmakrodhavivarjitā

'जब वह पापों के समूह का नाश करने वाले पुण्यमय सौ नामों का जप करे, स्थिर होकर, काम-क्रोध से रहित होकर -'

श्लोक 59 (padma.2.86.59)

सर्वेंद्रियाणि संयम्य आत्मज्ञानेन गोपयेत् । तस्य ध्यानप्रविष्टा सा एकभूता समाहिता

sarveṁdriyāṇi saṁyamya ātmajñānena gopayet tasya dhyānapraviṣṭā sā ekabhūtā samāhitā

'सभी इंद्रियों को संयमित कर, आत्मज्ञान से अपनी रक्षा करते हुए, उन्हीं के ध्यान में लीन, एकाग्र और समाहित होकर -'

श्लोक 60 (padma.2.86.60)

सा जपेत्परमं ज्ञानं तदा मोक्षं प्रयाति च । तन्मनास्तत्पदे लीना योगयुक्ता यदा भवेत्

sā japetparamaṁ jñānaṁ tadā mokṣaṁ prayāti ca tanmanāstatpade līnā yogayuktā yadā bhavet

'वह उस परम ज्ञान का जप करे, तब वह मोक्ष को प्राप्त होगी - जब उसका मन उसी पद में लीन होकर योगयुक्त हो जाए।'

श्लोक 61 (padma.2.86.61)

उज्ज्वल उवाच- वद तात परं ज्ञानं परमं मम सांप्रतम् । पश्चाद्ध्यान व्रतं पुण्यं नाम्नां शतमिहैव च

ujjvala uvāca- vada tāta paraṁ jñānaṁ paramaṁ mama sāṁpratam paścāddhyāna vrataṁ puṇyaṁ nāmnāṁ śatamihaiva ca

उज्ज्वल ने कहा - हे पिता! मुझे अभी वह परम ज्ञान बताइए, जो मेरे मन में सर्वप्रथम है; और उसके पश्चात् ध्यान का पुण्यमय व्रत तथा यहीं वे सौ नाम भी बताइए।

श्लोक 62 (padma.2.86.62)

कुंजल उवाच- परं ज्ञानं प्रवक्ष्यामि यन्न दृष्टं तु केनचित् । श्रूयतां पुत्र कैवल्यं केवलं मलवर्जितम्

kuṁjala uvāca- paraṁ jñānaṁ pravakṣyāmi yanna dṛṣṭaṁ tu kenacit śrūyatāṁ putra kaivalyaṁ kevalaṁ malavarjitam

कुंजल ने कहा - मैं वह परम ज्ञान बताऊँगा, जो किसी ने अभी तक नहीं देखा; हे पुत्र! सुनो, कैवल्य - जो केवल है और मल से रहित है।

श्लोक 63 (padma.2.86.63)

सूत उवाच- यथा दीपो निवातस्थो निश्चलो वायुवर्जितः। प्रज्वलन्नाशयेत्सर्वमंधकारं महामते

sūta uvāca- yathā dīpo nivātastho niścalo vāyuvarjitaḥ prajvalannāśayetsarvamaṁdhakāraṁ mahāmate

सूत ने कहा - जैसे वायुरहित स्थान में स्थित, निश्चल दीपक, वायु से रहित होकर, प्रज्वलित होकर सारे अंधकार का नाश कर देता है, हे महामते! -

श्लोक 64 (padma.2.86.64)

तद्वद्दोषविहीनात्मा भवत्येव निराश्रयः । निराशो निर्मलो वत्स न मित्रं न रिपुः कदा

tadvaddoṣavihīnātmā bhavatyeva nirāśrayaḥ nirāśo nirmalo vatsa na mitraṁ na ripuḥ kadā

वैसे ही दोषरहित आत्मा निराश्रय हो जाती है। हे वत्स! आशारहित, निर्मल - उसका न कोई मित्र होता है, न कभी शत्रु।

श्लोक 65 (padma.2.86.65)

न शोको न च हर्षश्च न लोभो न च मत्सरः । एको विषादहर्षैश्च सुखदुःखैर्विमुच्यते

na śoko na ca harṣaśca na lobho na ca matsaraḥ eko viṣādaharṣaiśca sukhaduḥkhairvimucyate

न शोक, न हर्ष, न लोभ, न मत्सर; वह अकेली ही विषाद-हर्ष और सुख-दुःख से मुक्त हो जाती है।

श्लोक 66 (padma.2.86.66)

विषयैश्चापि सर्वैश्च इंद्रियाणि स संहरेत् । तदा स केवलो जातः केवलत्वं प्रजायते

viṣayaiścāpi sarvaiśca iṁdriyāṇi sa saṁharet tadā sa kevalo jātaḥ kevalatvaṁ prajāyate

सभी विषयों से इंद्रियों को पूर्णतः समेट ले; तब वह 'केवल' हो जाती है, और कैवल्य-भाव उत्पन्न होता है।

श्लोक 67 (padma.2.86.67)

अग्निकर्मप्रसंगेन दीपस्तैलं प्रशोषयेत् । वर्त्याधारेण राजेंद्र निःसंगो वायुवर्जितः

agnikarmaprasaṁgena dīpastailaṁ praśoṣayet vartyādhāreṇa rājeṁdra niḥsaṁgo vāyuvarjitaḥ

अग्नि-कर्म के संयोग से दीपक तेल को सोख लेता है; हे राजेंद्र! बत्ती के सहारे, वायु-रहित होकर, असंग होकर -

श्लोक 68 (padma.2.86.68)

कज्जलं वमते पश्चात्तैलस्यापि महामते । कृष्णासौ दृश्यते रेखा दीपस्याग्रे महामते

kajjalaṁ vamate paścāttailasyāpi mahāmate kṛṣṇāsau dṛśyate rekhā dīpasyāgre mahāmate

हे महामते! वह बाद में तेल से ही कज्जल (कालिख) उगलता है; दीपक के अग्रभाग में एक काली रेखा दिखाई देती है, हे महामते! -

श्लोक 69 (padma.2.86.69)

स्वयमाकृष्यते तैलं तेजसा निर्मलो भवेत् । कायवर्तिस्थितस्तद्वत्कर्मतैलं प्रशोषयेत्

svayamākṛṣyate tailaṁ tejasā nirmalo bhavet kāyavartisthitastadvatkarmatailaṁ praśoṣayet

तेल स्वयं खिंच जाता है और वह अपने ही तेज से निर्मल हो जाता है; उसी प्रकार शरीर की बत्ती में स्थित होकर वह कर्म-रूपी तेल को सोख लेता है -

श्लोक 70 (padma.2.86.70)

विषयान्कज्जलीकृत्य प्रत्यक्षं संप्रदर्शयेत् । जनयेन्निर्मलोभूत्वा स्वयमेव प्रकाशयेत्

viṣayānkajjalīkṛtya pratyakṣaṁ saṁpradarśayet janayennirmalobhūtvā svayameva prakāśayet

विषयों को कज्जल बनाकर प्रत्यक्ष दिखा देता है; निर्मल होकर वह स्वयं ही उत्पन्न होता है और स्वयं ही प्रकाशित होता है।

श्लोक 71 (padma.2.86.71)

क्रोधादिभिः क्लेशसंज्ञैर्वायुभिः परिवर्जितः । निःस्पृहो निश्चलो भूत्वा तेजसा स्वयमुज्ज्वलेत्

krodhādibhiḥ kleśasaṁjñairvāyubhiḥ parivarjitaḥ niḥspṛho niścalo bhūtvā tejasā svayamujjvalet

क्रोध आदि क्लेश-रूपी वायुओं से रहित होकर, निःस्पृह और निश्चल होकर, वह अपने तेज से स्वयं ही प्रज्वलित हो उठता है।

श्लोक 72 (padma.2.86.72)

त्रैलोक्यं पश्यते सर्वं स्वस्थानस्थः स्वतेजसा । केवलज्ञानरूपोऽयं मया ते परिकीर्तितः

trailokyaṁ paśyate sarvaṁ svasthānasthaḥ svatejasā kevalajñānarūpo'yaṁ mayā te parikīrtitaḥ

वह अपने ही स्थान में स्थित होकर अपने तेज से समस्त त्रिलोक को देखता है। यह केवल-ज्ञान का रूप है, जो मैंने तुम्हें बताया है।

श्लोक 73 (padma.2.86.73)

ध्यानं तस्य प्रवक्ष्यामि द्विविधं तस्य चक्रिणः । केवलज्ञानरूपेण दृश्यते ज्ञानचक्षुषा

dhyānaṁ tasya pravakṣyāmi dvividhaṁ tasya cakriṇaḥ kevalajñānarūpeṇa dṛśyate jñānacakṣuṣā

अब मैं तुम्हें उस चक्रधारी के ध्यान के बारे में बताऊँगा, जो दो प्रकार का है। पहला केवल-ज्ञान के रूप में ज्ञान-चक्षु से देखा जाता है -

श्लोक 74 (padma.2.86.74)

योगयुक्ता महात्मानः परमार्थपरायणाः । यं पश्यंति विनिद्रास्तु यत्तपः सर्वदर्शकम्

yogayuktā mahātmānaḥ paramārthaparāyaṇāḥ yaṁ paśyaṁti vinidrāstu yattapaḥ sarvadarśakam

योगयुक्त, परमार्थ में लीन महात्मा ही, सदा जाग्रत रहकर, जिसे देखते हैं, जिसका तप सब कुछ देखने वाला है,

श्लोक 75 (padma.2.86.75)

हस्तपादविहीनं च सर्वत्र परिगच्छति । सर्वं गृह्णाति त्रैलोक्यं स्थावरं जंगमं सुत

hastapādavihīnaṁ ca sarvatra parigacchati sarvaṁ gṛhṇāti trailokyaṁ sthāvaraṁ jaṁgamaṁ suta

हाथ-पैर से रहित होते हुए भी वह सर्वत्र गति करता है; हे पुत्र! वह चराचर समस्त त्रिलोक को ग्रहण करता है,

श्लोक 76 (padma.2.86.76)

नासामुखविहीनस्तु घ्राति जक्षिति पुत्रक । अकर्णः शृणुते सर्वं सर्वसाक्षी जगत्पतिः

nāsāmukhavihīnastu ghrāti jakṣiti putraka akarṇaḥ śṛṇute sarvaṁ sarvasākṣī jagatpatiḥ

नासिका और मुख से रहित होते हुए भी वह सूँघता और खाता है, हे पुत्रक! कान से रहित होते हुए भी वह सब कुछ सुनता है, सबका साक्षी, जगत्पति।

श्लोक 77 (padma.2.86.77)

अरूपो रूपसंबद्धः पंचवर्गवशंगतः । सर्वलोकस्य यः प्राणः पूजितः स चराचरैः

arūpo rūpasaṁbaddhaḥ paṁcavargavaśaṁgataḥ sarvalokasya yaḥ prāṇaḥ pūjitaḥ sa carācaraiḥ

रूपरहित होते हुए भी वह रूप से जुड़ा है, पाँचों इंद्रियों के अधीन प्रतीत होता है; वह समस्त लोक का प्राण है, चराचर द्वारा पूजित है,

श्लोक 78 (padma.2.86.78)

अजिह्वो वदते सर्वं वेदशास्त्रानुगं सुत । अत्वचः स्पर्शनं चापि सर्वेषामेव जायते

ajihvo vadate sarvaṁ vedaśāstrānugaṁ suta atvacaḥ sparśanaṁ cāpi sarveṣāmeva jāyate

जिह्वारहित होते हुए भी वह वेद-शास्त्रों के अनुरूप सब कुछ बोलता है, हे पुत्र! त्वचारहित होते हुए भी सबको स्पर्श का बोध उसी से होता है।

श्लोक 79 (padma.2.86.79)

सदानंदो विरक्तात्मा एकरूपो निराश्रयः । निर्जरो निर्ममो न्यायी सगुणो निर्ममोमलः

sadānaṁdo viraktātmā ekarūpo nirāśrayaḥ nirjaro nirmamo nyāyī saguṇo nirmamomalaḥ

सदा आनंदमय, विरक्त आत्मा, एकरूप, निराश्रय, अजर, ममतारहित, न्यायी, गुणसंपन्न, ममता और मल से रहित -

श्लोक 80 (padma.2.86.80)

अवश्यः सर्ववश्यात्मा सर्वदः सर्ववित्तमः । तस्य धाता न चैवास्ति स वै सर्वमयो विभुः

avaśyaḥ sarvavaśyātmā sarvadaḥ sarvavittamaḥ tasya dhātā na caivāsti sa vai sarvamayo vibhuḥ

वह किसी के वश में नहीं है, फिर भी सबका नियंत्रक है; सबका दाता, सबका ज्ञाता है; उसका कोई कर्ता नहीं है, वह स्वयं सर्वमय, सर्वव्यापी है।

श्लोक 81 (padma.2.86.81)

एवं सर्वमयं ध्यानं पश्यते यो महात्मनः । स याति परमं स्थानममूर्तममृतोपमम्

evaṁ sarvamayaṁ dhyānaṁ paśyate yo mahātmanaḥ sa yāti paramaṁ sthānamamūrtamamṛtopamam

जो इस प्रकार उस महात्मा के सर्वमय ध्यान को देखता है, वह उस परम, अमूर्त, अमृत-तुल्य स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 82 (padma.2.86.82)

द्वितीयं तु प्रवक्ष्यामि अस्य ध्यानं महात्मनः । मूर्ताकारं तु साकारं निराकारं निरामयम्

dvitīyaṁ tu pravakṣyāmi asya dhyānaṁ mahātmanaḥ mūrtākāraṁ tu sākāraṁ nirākāraṁ nirāmayam

अब मैं उस महात्मा के दूसरे ध्यान के बारे में बताऊँगा - जो मूर्त, साकार होते हुए भी निराकार और निरामय है।

श्लोक 83 (padma.2.86.83)

ब्रह्माण्डं सर्वमतुलं वासितं यस्य वासना । स तस्माद्वासुदेवेति उच्यते मम नंदन

brahmāṇḍaṁ sarvamatulaṁ vāsitaṁ yasya vāsanā sa tasmādvāsudeveti ucyate mama naṁdana

जिसकी इच्छा से समस्त अनुपम ब्रह्मांड बसाया गया है, हे नंदन! इसीलिए उसे वासुदेव कहा जाता है।

श्लोक 84 (padma.2.86.84)

वर्षमाणस्य मेघस्य यद्वर्णं तस्य तद्भवेत् । सूर्यतेजःप्रतीकाशं चतुर्बाहुं सुरेश्वरम्

varṣamāṇasya meghasya yadvarṇaṁ tasya tadbhavet sūryatejaḥpratīkāśaṁ caturbāhuṁ sureśvaram

वर्षा करते हुए मेघ का जो रंग होता है, वही उसका रंग है; सूर्य के तेज के समान प्रतीत होने वाला, चतुर्भुज, देवताओं का ईश्वर।

श्लोक 85 (padma.2.86.85)

दक्षिणे शोभते शंखो हेमरत्नविभूषितः । सूर्यबिंबसमाकारं चक्रं पद्मप्रतिष्ठितम्

dakṣiṇe śobhate śaṁkho hemaratnavibhūṣitaḥ sūryabiṁbasamākāraṁ cakraṁ padmapratiṣṭhitam

उसके दाहिने ओर स्वर्ण-रत्नों से सुशोभित शंख शोभित है; सूर्य-बिंब के समान चक्र कमल पर प्रतिष्ठित है।

श्लोक 86 (padma.2.86.86)

कौमोदकी गदा तस्य महासुरविनाशिनी । वामे च शोभते वत्स हस्ते तस्य महात्मनः

kaumodakī gadā tasya mahāsuravināśinī vāme ca śobhate vatsa haste tasya mahātmanaḥ

हे वत्स! उस महात्मा के बाएँ हाथ में महासुरों का विनाश करने वाली कौमोदकी गदा शोभित है।

श्लोक 87 (padma.2.86.87)

महापद्मं सुगंधाढ्यं तस्य दक्षिणहस्तगम् । शोभमानः सदैवास्ते सायुधः कमलाप्रियः

mahāpadmaṁ sugaṁdhāḍhyaṁ tasya dakṣiṇahastagam śobhamānaḥ sadaivāste sāyudhaḥ kamalāpriyaḥ

सुगंध से भरा एक महान कमल सदा उसके दाहिने हाथ में शोभित रहता है; इस प्रकार शस्त्रों से सुसज्जित, वह कमला (लक्ष्मी) का प्रिय सदा शोभित रहता है।

श्लोक 88 (padma.2.86.88)

कंबुग्रीवं वृत्तमास्यं पद्मपत्रनिभेक्षणम् । राजमानं हृषीकेशं दशनै रत्नसन्निभैः

kaṁbugrīvaṁ vṛttamāsyaṁ padmapatranibhekṣaṇam rājamānaṁ hṛṣīkeśaṁ daśanai ratnasannibhaiḥ

शंख के समान गर्दन, गोल मुख, कमल-पत्र जैसे नेत्र वाले, रत्नों के समान दाँतों से सुशोभित हृषीकेश,

श्लोक 89 (padma.2.86.89)

गुडाकेशाः सन्ति यस्य अधरो विद्रुमाकृतिः । शोभते पुंडरीकाक्षः किरीटेनापि पुत्रक

guḍākeśāḥ santi yasya adharo vidrumākṛtiḥ śobhate puṁḍarīkākṣaḥ kirīṭenāpi putraka

घुँघराले बालों वाले, प्रवाल के समान अधरोष्ठ वाले - हे पुत्र! वह पुंडरीकाक्ष अपने मुकुट से भी शोभित है।

श्लोक 90 (padma.2.86.90)

विशालेनापि रूपेण केशवस्तु सुवर्चसा । कौस्तुभेनांकितेनैव राजमानो जनार्दनः

viśālenāpi rūpeṇa keśavastu suvarcasā kaustubhenāṁkitenaiva rājamāno janārdanaḥ

विशाल और तेजस्वी रूप वाले केशव, कौस्तुभ मणि से चिह्नित होकर जनार्दन के रूप में शोभित होते हैं।

श्लोक 91 (padma.2.86.91)

सूर्यतेजः प्रतीकाश कुंडलाभ्यां प्रभाति च । श्रीवत्सांकेन पुण्येन सर्वदा राजते हरिः

sūryatejaḥ pratīkāśa kuṁḍalābhyāṁ prabhāti ca śrīvatsāṁkena puṇyena sarvadā rājate hariḥ

दोनों कुंडलों से सूर्य के तेज के समान प्रकाशित होते हैं; पुण्यमय श्रीवत्स-चिह्न से हरि सदा सुशोभित रहते हैं।

श्लोक 92 (padma.2.86.92)

केयूरकंकणैर्हारैर्मौक्तिकैरृक्षसन्निभैः । वपुषा भ्राजमानस्तु विजयो जयतां वरः

keyūrakaṁkaṇairhārairmauktikairṛkṣasannibhaiḥ vapuṣā bhrājamānastu vijayo jayatāṁ varaḥ

तारों के समान मोतियों के हार, बाजूबंद और कंकणों से शरीर में देदीप्यमान - विजयी, विजेताओं में श्रेष्ठ,

श्लोक 93 (padma.2.86.93)

भ्राजते सोपि गोविंदो हेमवर्णेन वाससा । मुद्रिकारत्नयुक्ताभिरंगुलीभिर्विराजते

bhrājate sopi goviṁdo hemavarṇena vāsasā mudrikāratnayuktābhiraṁgulībhirvirājate

वह गोविंद भी स्वर्ण-वर्ण के वस्त्रों से देदीप्यमान होते हैं; रत्न-जड़ित अंगूठियों से युक्त उँगलियों से सुशोभित होते हैं।

श्लोक 94 (padma.2.86.94)

सर्वायुधैः सुसंपूर्णैर्दिव्यैराभरणैर्हरिः । वैनतेयसमारूढो लोककर्ता जगत्पतिः

sarvāyudhaiḥ susaṁpūrṇairdivyairābharaṇairhariḥ vainateyasamārūḍho lokakartā jagatpatiḥ

समस्त शस्त्रों और दिव्य आभूषणों से संपूर्ण हरि, गरुड़ पर आरूढ़, लोक के कर्ता, जगत्पति -

श्लोक 95 (padma.2.86.95)

एवंतं ध्यायते नित्यमनन्यमनसा नरः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति

evaṁtaṁ dhyāyate nityamananyamanasā naraḥ mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati

जो मनुष्य अनन्य मन से नित्य इस प्रकार उनका ध्यान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 96 (padma.2.86.96)

एतत्ते सर्वमाख्यातं ध्यानमेव जगत्पतेः । व्रतं चैव प्रवक्ष्यामि सर्वपापनिवारणम्

etatte sarvamākhyātaṁ dhyānameva jagatpateḥ vrataṁ caiva pravakṣyāmi sarvapāpanivāraṇam

यह मैंने तुम्हें जगत्पति के ध्यान के बारे में सब कुछ बता दिया। अब मैं तुम्हें वह व्रत बताऊँगा, जो समस्त पापों का निवारण करता है।

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