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भूमि खण्ड · अध्याय 93

विज्वल का आनंदवन-दर्शन

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94

श्लोक 1 (padma.2.93.1)

कुंजल उवाच- किं विज्वल त्वया दृष्टमपूर्वं भ्रमता महीम् । आश्चर्येण समायुक्तं तन्मे कथय सुव्रत

kuṁjala uvāca- kiṁ vijvala tvayā dṛṣṭamapūrvaṁ bhramatā mahīm āścaryeṇa samāyuktaṁ tanme kathaya suvrata

कुंजल ने कहा - हे विज्वल! पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए तुमने क्या अपूर्व देखा? हे सुव्रत! जो कुछ आश्चर्यजनक हो, वह मुझे बताओ।

श्लोक 2 (padma.2.93.2)

इतः प्रयासि कं देशमाहारार्थं तु सोद्यमी । यद्य दृष्टं त्वया चित्रं समाख्याहि सुतोत्तम

itaḥ prayāsi kaṁ deśamāhārārthaṁ tu sodyamī yadya dṛṣṭaṁ tvayā citraṁ samākhyāhi sutottama

तुम यहाँ से भोजन के लिए किस देश में जाते हो, उद्यमपूर्वक? यदि तुमने कोई अद्भुत दृश्य देखा हो, हे श्रेष्ठ पुत्र! वह बताओ।

श्लोक 3 (padma.2.93.3)

विज्वल उवाच- अस्ति मेरुगिरेः पृष्ठे आनंदं नाम काननम् । दिव्यवृक्षैः समाकीर्णंफ लपुष्पमयैः सदा

vijvala uvāca- asti merugireḥ pṛṣṭhe ānaṁdaṁ nāma kānanam divyavṛkṣaiḥ samākīrṇaṁpha lapuṣpamayaiḥ sadā

विज्वल ने कहा - मेरु पर्वत की चोटी पर आनंद नाम का एक वन है, जो सदा फल-फूलों से युक्त दिव्य वृक्षों से भरा है,

श्लोक 4 (padma.2.93.4)

देववृंदैः समाकीर्णं मुनिसिद्धसमन्वितम् । अप्सरोभिः सुरूपाभिर्गंधर्वैः किन्नरोरगैः

devavṛṁdaiḥ samākīrṇaṁ munisiddhasamanvitam apsarobhiḥ surūpābhirgaṁdharvaiḥ kinnaroragaiḥ

देव-समूहों से भरा, मुनियों और सिद्धों से युक्त, सुंदर अप्सराओं, गंधर्वों, किन्नरों और सर्पों से युक्त,

श्लोक 5 (padma.2.93.5)

वापीकूपतडागैश्च नदीप्रस्रवणैस्तथा । आनंदकाननं पुण्यं दिव्यभावैः प्रभासते

vāpīkūpataḍāgaiśca nadīprasravaṇaistathā ānaṁdakānanaṁ puṇyaṁ divyabhāvaiḥ prabhāsate

बावड़ियों, कुओं और तालाबों से, तथा नदियों और झरनों से भी - वह पुण्य आनंदवन दिव्य भावों से प्रकाशित होता है।

श्लोक 6 (padma.2.93.6)

विमानैः कोटिसंख्याभिर्हंसकुंदेंदुसन्निभैः । गीतकोलाहलैः रम्यैर्मेघध्वनिनिनादितम्

vimānaiḥ koṭisaṁkhyābhirhaṁsakuṁdeṁdusannibhaiḥ gītakolāhalaiḥ ramyairmeghadhvaninināditam

करोड़ों की संख्या में विमानों से, हंस-कुंद-चंद्रमा के समान, गीत के मधुर कोलाहल से युक्त, मेघ-ध्वनि से गूँजता हुआ,

श्लोक 7 (padma.2.93.7)

षट्पदानां निनादेन सर्वत्र मधुरायते । चंदनैश्चूतवृक्षैश्च चंपकैः पुष्पितैर्वृतम्

ṣaṭpadānāṁ ninādena sarvatra madhurāyate caṁdanaiścūtavṛkṣaiśca caṁpakaiḥ puṣpitairvṛtam

भ्रमरों की गुंजार से सर्वत्र मधुर हो रहा, चंदन, आम्र और खिले हुए चंपक वृक्षों से घिरा हुआ -

श्लोक 8 (padma.2.93.8)

नानावृक्षैः प्रभात्येवमानंदवनमुत्तमम् । नानापक्षिनिनादेन बहुकोलाहलान्वितम्

nānāvṛkṣaiḥ prabhātyevamānaṁdavanamuttamam nānāpakṣininādena bahukolāhalānvitam

नाना वृक्षों से इस प्रकार वह उत्तम आनंदवन शोभित होता है, अनेक पक्षियों की ध्वनि से भरा, बहुत कोलाहल से युक्त।

श्लोक 9 (padma.2.93.9)

एवमानंदनं दृष्टं मया तत्र सुशोभनम् । विमलं च सरस्तात शोभते सागरोपमम्

evamānaṁdanaṁ dṛṣṭaṁ mayā tatra suśobhanam vimalaṁ ca sarastāta śobhate sāgaropamam

हे पिता! ऐसा वह सुंदर आनंदमय स्थान मैंने वहाँ देखा। और वहाँ एक निर्मल सरोवर समुद्र के समान शोभित होता है,

श्लोक 10 (padma.2.93.10)

संपूर्णं पुण्यतोयेन पद्मसौगंधिकैः शुभैः । जलजैस्तु समाकीर्णं हंसकारंडवान्वितम्

saṁpūrṇaṁ puṇyatoyena padmasaugaṁdhikaiḥ śubhaiḥ jalajaistu samākīrṇaṁ haṁsakāraṁḍavānvitam

पवित्र जल से पूर्ण, शुभ कमल-सुगंध से युक्त, जल-वनस्पतियों से भरा, हंस-कारंडवों से युक्त।

श्लोक 11 (padma.2.93.11)

एवमासीत्सरस्तस्य सुमध्ये काननस्य हि । देवगंधर्वसंबाधैर्मुनिवृंदैरलंकृतम्

evamāsītsarastasya sumadhye kānanasya hi devagaṁdharvasaṁbādhairmunivṛṁdairalaṁkṛtam

वह सरोवर उस वन के ठीक मध्य में था, देव-गंधर्वों से घिरा, मुनि-समूहों से सुशोभित,

श्लोक 12 (padma.2.93.12)

किंनरोरगगंधर्वैश्चारणैश्च सुशोभते । तत्राश्चर्यं मया दृष्टं वक्तुं तात न शक्यते

kiṁnaroragagaṁdharvaiścāraṇaiśca suśobhate tatrāścaryaṁ mayā dṛṣṭaṁ vaktuṁ tāta na śakyate

किन्नरों, सर्पों, गंधर्वों और चारणों से शोभायमान। हे पिता! वहाँ मैंने एक ऐसा आश्चर्य देखा जो कहा नहीं जा सकता।

श्लोक 13 (padma.2.93.13)

विमानेनापि दिव्येन कलशैरुपशोभते । छत्रदंडपताकाभीराजमानेन सत्तम

vimānenāpi divyena kalaśairupaśobhate chatradaṁḍapatākābhīrājamānena sattama

वह एक दिव्य विमान से भी शोभित था, कलशों से अलंकृत, छत्र-दंड-पताका से देदीप्यमान, हे सत्तम!

श्लोक 14 (padma.2.93.14)

सर्वभोगाविलेनापि गीयमानेथ किन्नरैः । गंधर्वैरप्सरोभिश्च शोभमानोथ सुव्रत

sarvabhogāvilenāpi gīyamānetha kinnaraiḥ gaṁdharvairapsarobhiśca śobhamānotha suvrata

समस्त भोगों से युक्त, किन्नरों द्वारा गाया जाता हुआ, गंधर्वों और अप्सराओं से सुशोभित, हे सुव्रत!

श्लोक 15 (padma.2.93.15)

स्तूयमानो महासिद्धऋषिभिस्तत्त्ववेदिभिः । रूपेणाप्रतिमो लोके न दृष्टस्तादृशः क्वचित्

stūyamāno mahāsiddhaṛṣibhistattvavedibhiḥ rūpeṇāpratimo loke na dṛṣṭastādṛśaḥ kvacit

महासिद्धों और तत्त्ववेत्ता ऋषियों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ - संसार में अनुपम रूप वाला, ऐसा कहीं कभी नहीं देखा गया।

श्लोक 16 (padma.2.93.16)

सर्वाभरणशोभांगो दिव्यमालाविशोभितः । महारत्नकृतामाला यस्योरसि विराजते

sarvābharaṇaśobhāṁgo divyamālāviśobhitaḥ mahāratnakṛtāmālā yasyorasi virājate

समस्त आभूषणों से सुशोभित शरीर वाला, दिव्य मालाओं से सुशोभित, महारत्नों से बनी माला जिसके वक्षस्थल पर सुशोभित थी -

श्लोक 17 (padma.2.93.17)

तत्समीपे स्थिता चैका नारी दृष्टा वरानना । हेमहारैश्च मुक्तानां वलयैः कंकणैर्युता

tatsamīpe sthitā caikā nārī dṛṣṭā varānanā hemahāraiśca muktānāṁ valayaiḥ kaṁkaṇairyutā

उसके समीप एक सुंदरी स्त्री खड़ी दिखाई दी, सोने के मोती-हारों, कंगनों और कंकणों से युक्त,

श्लोक 18 (padma.2.93.18)

दिव्यवस्त्रैश्च गंधैश्च चंदनैश्चारुलेपनैः । स्तूयमानो गीयमानः पुरुषस्तत्र चागतः

divyavastraiśca gaṁdhaiśca caṁdanaiścārulepanaiḥ stūyamāno gīyamānaḥ puruṣastatra cāgataḥ

दिव्य वस्त्रों, सुगंधों, चंदन और सुंदर लेपों से युक्त - वह पुरुष स्तुति और गान करते हुए वहाँ आया,

श्लोक 19 (padma.2.93.19)

रतिरूपा वरारोहा पीनश्रोणिपयोधरा । सर्वाभरणशोभांगी तादृशी रूपसंपदा

ratirūpā varārohā pīnaśroṇipayodharā sarvābharaṇaśobhāṁgī tādṛśī rūpasaṁpadā

रति के समान रूपवती, स्थूल नितंब और वक्षस्थल वाली, समस्त आभूषणों से सुशोभित शरीर वाली, ऐसे रूप-वैभव से युक्त।

श्लोक 20 (padma.2.93.20)

द्वावेतौ तौ मया दृष्टौ विमानेनापि चागतौ । रूपलावण्यमाधुर्यौ सर्वशोभासमाविलौ

dvāvetau tau mayā dṛṣṭau vimānenāpi cāgatau rūpalāvaṇyamādhuryau sarvaśobhāsamāvilau

मैंने उन दोनों को विमान से आते हुए भी देखा, रूप, लावण्य और माधुर्य से युक्त, समस्त शोभा से परिपूर्ण।

श्लोक 21 (padma.2.93.21)

समुत्तीर्णौ विमानात्तावागतौ सरसोन्तिके । स्नातौ तात महात्मानौ स्त्रीपुंसौ कमलेक्षणौ

samuttīrṇau vimānāttāvāgatau sarasontike snātau tāta mahātmānau strīpuṁsau kamalekṣaṇau

विमान से उतरकर वे दोनों सरोवर के समीप आए; हे पिता! वे दोनों महात्मा, स्त्री-पुरुष, कमल-नेत्र, स्नान करने लगे।

श्लोक 22 (padma.2.93.22)

प्रगृह्य तौ महाशस्त्रौ दंपती तु परस्परम् । तादृशौ च शवौ तत्र पतितौ सरसस्तटे

pragṛhya tau mahāśastrau daṁpatī tu parasparam tādṛśau ca śavau tatra patitau sarasastaṭe

महाशस्त्र उठाकर वह दंपती एक-दूसरे की ओर बढ़े - और वहाँ सरोवर के तट पर उन्हीं के समान दो शव पड़े हुए थे।

श्लोक 23 (padma.2.93.23)

प्रभासे ते तदा तौ तु स्त्रीपुंसौ कमलेक्षणौ । रूपेणापि महाभाग तादृशावेव तौ शवौ

prabhāse te tadā tau tu strīpuṁsau kamalekṣaṇau rūpeṇāpi mahābhāga tādṛśāveva tau śavau

तब वे दोनों, स्त्री-पुरुष, कमल-नेत्र शोभित हो रहे थे; और हे महाभाग! वे दोनों शव भी ठीक वैसे ही रूप के थे।

श्लोक 24 (padma.2.93.24)

देवरूपोपमस्तात यथा पुंसस्तथा शवः । यथारूपं हि तस्यापि तादृशस्तत्र दृश्यते

devarūpopamastāta yathā puṁsastathā śavaḥ yathārūpaṁ hi tasyāpi tādṛśastatra dṛśyate

हे पिता! वह शव उस पुरुष के समान, देवतुल्य रूप वाला था; और उसका रूप भी वहाँ ठीक वैसा ही दिखाई दे रहा था।

श्लोक 25 (padma.2.93.25)

यथारूपं तु भार्यायास्तथा शवो द्वितीयकः । स्त्रीशवस्य तु यन्मांसं शस्त्रेणोत्कृत्य सा ततः

yathārūpaṁ tu bhāryāyāstathā śavo dvitīyakaḥ strīśavasya tu yanmāṁsaṁ śastreṇotkṛtya sā tataḥ

और दूसरा शव उसकी पत्नी के ही रूप में था। शस्त्र से स्त्री के शव का मांस काटकर वह तब -

श्लोक 26 (padma.2.93.26)

भक्षते तस्य मांसानि रक्ताप्लुतानि तानि तु । पुरुषो भक्षते तद्वच्छवमांसं समातुरः

bhakṣate tasya māṁsāni raktāplutāni tāni tu puruṣo bhakṣate tadvacchavamāṁsaṁ samāturaḥ

उसके रक्त से सने मांस को खाने लगी; और वह पुरुष भी उसी प्रकार व्याकुल होकर शव का मांस खाने लगा।

श्लोक 27 (padma.2.93.27)

क्षुधया पीड्यमानौ तौ भक्षेते पिशितं तयोः । यावत्तृप्तिं समायातौ तावन्मांसं प्रभक्षितम्

kṣudhayā pīḍyamānau tau bhakṣete piśitaṁ tayoḥ yāvattṛptiṁ samāyātau tāvanmāṁsaṁ prabhakṣitam

भूख से पीड़ित वे दोनों उस मांस को खाते रहे; जब तक तृप्ति नहीं हुई, तब तक उतना मांस खाया गया।

श्लोक 28 (padma.2.93.28)

सरस्यथ जलं पीत्वा संजातौ सुखितौ पितः । कियत्कालं स्थितौ तत्र विमानेन गतौ पुनः

sarasyatha jalaṁ pītvā saṁjātau sukhitau pitaḥ kiyatkālaṁ sthitau tatra vimānena gatau punaḥ

हे पिता! फिर सरोवर का जल पीकर वे दोनों संतुष्ट हो गए; कुछ काल वहाँ रहकर वे फिर विमान से चले गए।

श्लोक 29 (padma.2.93.29)

अन्ये द्वे तु स्त्रियौ तात मया दृष्टे च तत्र वै । रूपसौभाग्यसंपन्ने ते स्त्रियौ चारुलक्षणे

anye dve tu striyau tāta mayā dṛṣṭe ca tatra vai rūpasaubhāgyasaṁpanne te striyau cārulakṣaṇe

हे पिता! मैंने वहाँ दो अन्य स्त्रियाँ भी देखीं - रूप और सौभाग्य से संपन्न, सुंदर लक्षणों वाली वे दो स्त्रियाँ।

श्लोक 30 (padma.2.93.30)

ताभ्यां प्रभक्षितं मांसं यदा तात महावने । प्रहसेते तदा ते द्वे हास्यैरट्टाट्टकैःपुनः

tābhyāṁ prabhakṣitaṁ māṁsaṁ yadā tāta mahāvane prahasete tadā te dve hāsyairaṭṭāṭṭakaiḥpunaḥ

हे पिता! जब उन दोनों ने उस महावन में वह मांस खाया, तब वे दोनों पुनः भयंकर, कर्कश अट्टहास से हँस पड़ीं,

श्लोक 31 (padma.2.93.31)

भक्षते च स्वमांसानि तावेतौ परिनित्यशः । कृत्वा स्नानादिकं मांसं पश्यतो मम तत्र हि

bhakṣate ca svamāṁsāni tāvetau parinityaśaḥ kṛtvā snānādikaṁ māṁsaṁ paśyato mama tatra hi

और निरंतर अपना ही मांस खाती रहीं। स्नान आदि करके, मेरे देखते-देखते वहाँ -

श्लोक 32 (padma.2.93.32)

अन्ये स्त्रियौ महाभाग रौद्रा कारसमन्विते । दंष्ट्राकरालवदने तत्रैवाति विभीषणे

anye striyau mahābhāga raudrā kārasamanvite daṁṣṭrākarālavadane tatraivāti vibhīṣaṇe

हे महाभाग! अन्य दो स्त्रियाँ, अत्यंत भयंकर रूप वाली, दाढ़ों से विकराल मुख वाली, अत्यंत डरावनी -

श्लोक 33 (padma.2.93.33)

ऊचतुस्तौ तदा ते तु देहिदेहीति वै पुनः । एवं दृष्टं मया तात वसता वनसंनिधौ

ūcatustau tadā te tu dehidehīti vai punaḥ evaṁ dṛṣṭaṁ mayā tāta vasatā vanasaṁnidhau

वहीं तब उन दोनों ने बार-बार कहा - 'दे दो, दे दो!' हे पिता! इस प्रकार मैंने उस वन के समीप रहते हुए यह देखा।

श्लोक 34 (padma.2.93.34)

नित्यमुत्कीर्य भक्ष्येते तौ द्वौ तु मांसमेव च । जायेते च सुसंपूर्णौ कायौ च शवयोः पुनः

nityamutkīrya bhakṣyete tau dvau tu māṁsameva ca jāyete ca susaṁpūrṇau kāyau ca śavayoḥ punaḥ

वे दोनों निरंतर उसी मांस को काटकर खाती रहीं; और उन दोनों शवों के शरीर फिर से पूर्ण हो जाते थे।

श्लोक 35 (padma.2.93.35)

नित्यमुत्तीर्य तावेवं ते चाप्यन्ये च वै पितः । कुर्वंति सदृशीं चेष्टां पूर्वोक्तां मम पश्यतः

nityamuttīrya tāvevaṁ te cāpyanye ca vai pitaḥ kurvaṁti sadṛśīṁ ceṣṭāṁ pūrvoktāṁ mama paśyataḥ

हे पिता! इस प्रकार निरंतर उठकर वे और वे अन्य भी, मेरे देखते-देखते, पूर्वोक्त जैसी ही चेष्टा करते रहे।

श्लोक 36 (padma.2.93.36)

एतदाश्चर्य संजातं दृष्टं तात मया तदा । भवता पृच्छितं तात दृष्टमाश्चर्यमेव च

etadāścarya saṁjātaṁ dṛṣṭaṁ tāta mayā tadā bhavatā pṛcchitaṁ tāta dṛṣṭamāścaryameva ca

यह आश्चर्य वहाँ उत्पन्न हुआ और मैंने उसे देखा, हे पिता। आपने पूछा, हे पिता, और मैंने वह आश्चर्य बता दिया जो मैंने देखा।

श्लोक 37 (padma.2.93.37)

मया ख्यातं तवाग्रे वै सर्वसंदेहकारणम् । कथयस्व प्रसादाच्च प्रीयमाणेन चेतसा

mayā khyātaṁ tavāgre vai sarvasaṁdehakāraṇam kathayasva prasādācca prīyamāṇena cetasā

मैंने आपके समक्ष इस समस्त संशय का कारण बता दिया है; कृपापूर्वक, प्रसन्न मन से मुझे बताइए।

श्लोक 38 (padma.2.93.38)

विमानेनागतो योसौ स्त्रिया सार्द्धं द्विजोत्तम । दिव्यरूपधरो यस्तु स कस्तु कमलेक्षणः

vimānenāgato yosau striyā sārddhaṁ dvijottama divyarūpadharo yastu sa kastu kamalekṣaṇaḥ

हे द्विजोत्तम! जो स्त्री के साथ विमान से आया, वह दिव्यरूपधारी, कमल-नेत्र पुरुष कौन है?

श्लोक 39 (padma.2.93.39)

का च नारी महाभाग महामांसं प्रभक्षति । स कश्चाप्यागतस्तात सा चैवाभ्येत्य भक्षति

kā ca nārī mahābhāga mahāmāṁsaṁ prabhakṣati sa kaścāpyāgatastāta sā caivābhyetya bhakṣati

और हे महाभाग! वह स्त्री कौन है जो इतना मांस खाती है? हे पिता! वह कौन आया, और वह कौन है जो आकर खाती है?

श्लोक 40 (padma.2.93.40)

प्रहसेते तदा ते द्वे स्त्रियौ तात वदस्व नः । ऊचतुस्तौ तथा चान्ये देहिदेहीति वा पुनः

prahasete tadā te dve striyau tāta vadasva naḥ ūcatustau tathā cānye dehidehīti vā punaḥ

वे दोनों स्त्रियाँ तब क्यों हँसती हैं, हे पिता! हमें बताइए। और वे अन्य दो बार-बार 'दे दो, दे दो' क्यों कहती हैं?

श्लोक 41 (padma.2.93.41)

तेद्वेत्वं मे समाचक्ष्व महाभीषणके स्त्रियौ । एतन्मे संशयं तात छेत्तुमर्हसि सुव्रत

tedvetvaṁ me samācakṣva mahābhīṣaṇake striyau etanme saṁśayaṁ tāta chettumarhasi suvrata

मुझे उन दोनों अत्यंत भयंकर स्त्रियों के विषय में बताइए। हे पिता! यह मेरा संशय है, हे सुव्रत! आपको इसे दूर करना चाहिए।

श्लोक 42 (padma.2.93.42)

एवमुक्त्वा महाराज विरराम स चांडजः । एवं पृष्टस्तृतीयेन विज्वलेनात्मजेन सः

evamuktvā mahārāja virarāma sa cāṁḍajaḥ evaṁ pṛṣṭastṛtīyena vijvalenātmajena saḥ

हे महाराज! इतना कहकर वह पक्षी चुप हो गया। अपने तीसरे पुत्र विज्वल द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उसने -

श्लोक 43 (padma.2.93.43)

प्रोवाच सर्वं वृत्तांतं च्यवनस्यापि शृण्वतः

provāca sarvaṁ vṛttāṁtaṁ cyavanasyāpi śṛṇvataḥ

च्यवन को भी सुनाते हुए सारा वृत्तांत कह सुनाया।

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