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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 10

नारद, युधिष्ठिर और राजा दिलीप की कथा का प्रारंभ

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (padma.3.10.1)

ऋषय ऊचुः । पृथिव्या हि परीमाणं संस्थानं सरितस्तथा । त्वत्तः श्रुत्वा महाभाग अमृतं पीतमेव च

ṛṣaya ūcuḥ pṛthivyā hi parīmāṇaṁ saṁsthānaṁ saritastathā tvattaḥ śrutvā mahābhāga amṛtaṁ pītameva ca

ऋषियों ने कहा — हे महाभाग्यशाली! आपसे पृथ्वी का प्रमाण, उसकी संरचना और नदियों का वर्णन सुनकर मानो अमृत ही पी लिया।

श्लोक 2 (padma.3.10.2)

तत्र भूमौ च तीर्थानि पावनानीति नः श्रुतम् । आचक्ष्व तानि सर्वाणि यथाफलकराणि च । सविशेषं महाप्राज्ञ श्रोतुमिच्छामहे तव

tatra bhūmau ca tīrthāni pāvanānīti naḥ śrutam ācakṣva tāni sarvāṇi yathāphalakarāṇi ca saviśeṣaṁ mahāprājña śrotumicchāmahe tava

हमने सुना है कि पृथ्वी पर पवित्र करने वाले तीर्थ हैं। हे महाप्राज्ञ! वे सब हमें कहिए, और वे किस प्रकार फल देते हैं यह भी कहिए — हम आपसे विशेष रूप से यह सुनना चाहते हैं।

श्लोक 3 (padma.3.10.3)

सूत उवाच । धन्यं पुण्यं महाख्यानं पृष्टमेव तपोधनाः । यथामति प्रवक्ष्यामि यथायोगं यथाश्रुतम्

sūta uvāca dhanyaṁ puṇyaṁ mahākhyānaṁ pṛṣṭameva tapodhanāḥ yathāmati pravakṣyāmi yathāyogaṁ yathāśrutam

सूत जी ने कहा — हे तपोधनो! आपने एक धन्य, पुण्यमय महान आख्यान पूछा है; मैं अपनी बुद्धि के अनुसार, यथोचित रूप से, जैसा सुना है वैसा ही कहूँगा।

श्लोक 4 (padma.3.10.4)

पुरातनं प्रवक्ष्यामि देवर्षेर्नारदस्य हि । युधिष्ठिरेण संवादं शृणु तद्द्विजसत्तमाः

purātanaṁ pravakṣyāmi devarṣernāradasya hi yudhiṣṭhireṇa saṁvādaṁ śṛṇu taddvijasattamāḥ

मैं देवर्षि नारद और युधिष्ठिर के बीच हुए एक प्राचीन संवाद का वर्णन करूँगा; हे द्विजश्रेष्ठो! उसे सुनिए।

श्लोक 5 (padma.3.10.5)

हृतराज्याः पांडुपुत्रा वने तस्मिन्महारथाः । न्यवसंति महाभागा द्रौपद्या सह पांडवाः

hṛtarājyāḥ pāṁḍuputrā vane tasminmahārathāḥ nyavasaṁti mahābhāgā draupadyā saha pāṁḍavāḥ

राज्य से वंचित पांडुपुत्र महारथी, हे महाभाग्यशालियो, द्रौपदी सहित उस वन में निवास कर रहे थे।

श्लोक 6 (padma.3.10.6)

अथापश्यन्महात्मानं देवर्षिं तत्र नारदम् । दीप्यमानं श्रिया ब्राह्म्या दीप्ताग्निसमतेजसम्

athāpaśyanmahātmānaṁ devarṣiṁ tatra nāradam dīpyamānaṁ śriyā brāhmyā dīptāgnisamatejasam

तभी उन्होंने वहाँ महात्मा देवर्षि नारद को देखा, जो ब्राह्मी शोभा से देदीप्यमान थे, प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी।

श्लोक 7 (padma.3.10.7)

स तैः परिवृतः श्रीमान्भ्रातृभिः कुरुनंदनः । दिवि भाति हि दीप्तौजा देवैरिव शतक्रतुः

sa taiḥ parivṛtaḥ śrīmānbhrātṛbhiḥ kurunaṁdanaḥ divi bhāti hi dīptaujā devairiva śatakratuḥ

अपने भाइयों से घिरे हुए वे श्रीसंपन्न कुरुनंदन (युधिष्ठिर) उतने ही तेज से देवताओं के बीच शतक्रतु (इंद्र) के समान शोभायमान हुए।

श्लोक 8 (padma.3.10.8)

यथा च देवान्सावित्री याज्ञसेनी तथा पतीन् । न जहौ धर्मतः पार्थान्मेरुमर्कप्रभा यथा

yathā ca devānsāvitrī yājñasenī tathā patīn na jahau dharmataḥ pārthānmerumarkaprabhā yathā

जैसे सावित्री ने देवताओं को नहीं त्यागा, वैसे ही याज्ञसेनी (द्रौपदी) ने धर्मानुसार पार्थों को नहीं त्यागा — जैसे सूर्य की प्रभा मेरु पर्वत को नहीं छोड़ती।

श्लोक 9 (padma.3.10.9)

प्रतिगृह्य ततः पूजां नारदो भगवानृषिः । आश्वासयद्धर्म्मपुत्रं युक्तरूपप्रियेण च

pratigṛhya tataḥ pūjāṁ nārado bhagavānṛṣiḥ āśvāsayaddharmmaputraṁ yuktarūpapriyeṇa ca

तब उनकी पूजा ग्रहण करके भगवान नारद ऋषि ने उचित और प्रिय वचनों से धर्मपुत्र को सांत्वना दी,

श्लोक 10 (padma.3.10.10)

उवाच च महात्मानं धर्म्मराजं युधिष्ठिरम् । ब्रूहि धर्म्मभृतां श्रेष्ठ किं प्रार्थ्यं हि ददामि ते

uvāca ca mahātmānaṁ dharmmarājaṁ yudhiṣṭhiram brūhi dharmmabhṛtāṁ śreṣṭha kiṁ prārthyaṁ hi dadāmi te

और महात्मा धर्मराज युधिष्ठिर से कहा — हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! कहिए, आप जो कुछ माँगेंगे, मैं वह आपको दूँगा।

श्लोक 11 (padma.3.10.11)

अथ धर्मसुतो राजा प्रणम्य भ्रातृभिः सह । उवाच प्रांजलिर्वाक्यं नारदं देवसंमितम्

atha dharmasuto rājā praṇamya bhrātṛbhiḥ saha uvāca prāṁjalirvākyaṁ nāradaṁ devasaṁmitam

तब धर्मपुत्र राजा ने अपने भाइयों सहित प्रणाम करके, हाथ जोड़कर, देवतुल्य नारद से यह वचन कहा —

श्लोक 12 (padma.3.10.12)

त्वयि तुष्टे महाभाग सर्वलोकाभिपूजिते । कृतमित्येव मन्ये हि प्रसादात्तव सुव्रत

tvayi tuṣṭe mahābhāga sarvalokābhipūjite kṛtamityeva manye hi prasādāttava suvrata

हे महाभाग्यशाली, समस्त लोकों द्वारा पूजित! आपके प्रसन्न होने पर, हे सुव्रत, मैं आपकी कृपा से अपना कार्य पहले ही सिद्ध हुआ मानता हूँ।

श्लोक 13 (padma.3.10.13)

यदि त्वहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ । संदेहं मे मुनिश्रेष्ठ हृत्स्थं त्वं छेत्तुमर्हसि

yadi tvahamanugrāhyo bhrātṛbhiḥ sahito'nagha saṁdehaṁ me muniśreṣṭha hṛtsthaṁ tvaṁ chettumarhasi

हे निष्पाप! यदि मैं अपने भाइयों सहित आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो हे मुनिश्रेष्ठ, मेरे हृदय में स्थित संशय को आप दूर कीजिए।

श्लोक 14 (padma.3.10.14)

प्रदक्षिणां यः कुरुते पृथिवीं तीर्थतत्परः । किं फलं तस्य कार्त्स्न्येन तद्ब्रह्मन्वक्तुमर्हसि

pradakṣiṇāṁ yaḥ kurute pṛthivīṁ tīrthatatparaḥ kiṁ phalaṁ tasya kārtsnyena tadbrahmanvaktumarhasi

जो तीर्थ में तत्पर होकर पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता है, उसका पूर्ण फल क्या है — हे ब्रह्मन! वह मुझे कहिए।

श्लोक 15 (padma.3.10.15)

नारद उवाच । शृणु राजन्नवहितो दिलीपेन यथा पुरा । वसिष्ठस्य सकाशाद्वै सर्वमेतदुपश्रुतम्

nārada uvāca śṛṇu rājannavahito dilīpena yathā purā vasiṣṭhasya sakāśādvai sarvametadupaśrutam

नारद जी ने कहा — हे राजन! ध्यानपूर्वक सुनिए, जैसे यह सब पहले दिलीप ने वसिष्ठ जी से सुना था, वैसे ही मैंने भी यह सब सुना है।

श्लोक 16 (padma.3.10.16)

पुरा भागीरथीतीरे दिलीपो राजसत्तमः । धर्म्यं व्रतं समास्थाय न्यवसन्मुनिवत्तदा

purā bhāgīrathītīre dilīpo rājasattamaḥ dharmyaṁ vrataṁ samāsthāya nyavasanmunivattadā

पूर्वकाल में भागीरथी के तट पर श्रेष्ठ राजा दिलीप, धार्मिक व्रत धारण करके, मुनि के समान वहाँ निवास करते थे।

श्लोक 17 (padma.3.10.17)

शुभेदेशे महाराजपुण्ये देवर्षिपूजिते । गंगाद्वारे महातेजा देवगंधर्वसेविते

śubhedeśe mahārājapuṇye devarṣipūjite gaṁgādvāre mahātejā devagaṁdharvasevite

हे महाराज! उस शुभ, पुण्यमय, देवर्षियों द्वारा पूजित स्थान — गंगाद्वार में, जो देवगंधर्वों से सेवित और अत्यंत तेजस्वी है,

श्लोक 18 (padma.3.10.18)

स पितॄंस्तर्पयामास देवांश्च परमद्युतिः । ऋषींश्च तर्पयामास विधिदृष्टेन कर्मणा

sa pitṝṁstarpayāmāsa devāṁśca paramadyutiḥ ṛṣīṁśca tarpayāmāsa vidhidṛṣṭena karmaṇā

वे परमतेजस्वी राजा पितरों और देवताओं का तर्पण करते थे; और विधिपूर्वक कर्म से ऋषियों का भी तर्पण करते थे।

श्लोक 19 (padma.3.10.19)

कस्यचित्त्वथ कालस्य जपन्नेव महामनाः । ददर्श भूतसंकाशं वसिष्ठमृषिमुत्तमम्

kasyacittvatha kālasya japanneva mahāmanāḥ dadarśa bhūtasaṁkāśaṁ vasiṣṭhamṛṣimuttamam

कुछ काल पश्चात, जप में लीन उन महामना ने भूत (ब्रह्म-तेज) के समान वसिष्ठ मुनि को देखा।

श्लोक 20 (padma.3.10.20)

पुरोहितं स तं दृष्ट्वा दीप्यमानमिव श्रिया । प्रहर्षमतुलं लेभे विस्मयं परमं ययौ

purohitaṁ sa taṁ dṛṣṭvā dīpyamānamiva śriyā praharṣamatulaṁ lebhe vismayaṁ paramaṁ yayau

अपने पुरोहित को, मानो शोभा से देदीप्यमान, देखकर उन्हें अतुलनीय हर्ष हुआ और वे परम विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 21 (padma.3.10.21)

उपस्थितं महाराज पूजयामास भारत । स हि धर्म्मभृतां श्रेष्ठो विधिदृष्टेन कर्मणा

upasthitaṁ mahārāja pūjayāmāsa bhārata sa hi dharmmabhṛtāṁ śreṣṭho vidhidṛṣṭena karmaṇā

हे महाराज भरतवंशी! उपस्थित हुए उन धर्मधारियों में श्रेष्ठ की उन्होंने विधिपूर्वक कर्म से पूजा की।

श्लोक 22 (padma.3.10.22)

शिरसा चार्घ्यमादाय शुचिः प्रयतमानसः । नामसंकीर्त्तयामास तस्मिन्ब्रह्मर्षिसत्तमे

śirasā cārghyamādāya śuciḥ prayatamānasaḥ nāmasaṁkīrttayāmāsa tasminbrahmarṣisattame

सिर पर अर्घ्य लेकर, पवित्र और संयत मन से, उन्होंने उस श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि के समक्ष अपना नाम बताया —

श्लोक 23 (padma.3.10.23)

दिलीपोऽहं तु भद्रं ते दासोस्मि तव सुव्रत । तव संदर्शनादेव मुक्तोहं सर्वकिल्बिषैः

dilīpo'haṁ tu bhadraṁ te dāsosmi tava suvrata tava saṁdarśanādeva muktohaṁ sarvakilbiṣaiḥ

मैं दिलीप हूँ; आपका कल्याण हो; हे सुव्रत, मैं आपका दास हूँ। आपके दर्शन मात्र से ही मैं सब पापों से मुक्त हो गया।

श्लोक 24 (padma.3.10.24)

एवमुक्त्वा महाराज दिलीपो द्विपदां वरः । वाग्यतः प्रांजलिर्भूत्वा तूष्णीमासीद्युधिष्ठिर

evamuktvā mahārāja dilīpo dvipadāṁ varaḥ vāgyataḥ prāṁjalirbhūtvā tūṣṇīmāsīdyudhiṣṭhira

हे महाराज युधिष्ठिर! ऐसा कहकर पुरुषों में श्रेष्ठ दिलीप वाणी को संयत रखकर, हाथ जोड़े हुए मौन खड़े रहे।

श्लोक 25 (padma.3.10.25)

तं दृष्ट्वा नियमेनाथ स्वाध्यायेन च कर्षितम् । दिलीपं नृपतिश्रेष्ठं मुनिः प्रीतमनाभवत्

taṁ dṛṣṭvā niyamenātha svādhyāyena ca karṣitam dilīpaṁ nṛpatiśreṣṭhaṁ muniḥ prītamanābhavat

नियम और स्वाध्याय से कृश हुए श्रेष्ठ राजा दिलीप को देखकर मुनि वसिष्ठ का मन प्रसन्न हो गया।

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