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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 13

नर्मदा की महिमा

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (padma.3.13.1)

युधिष्ठिर उवाच । वसिष्ठेन दिलीपाय कथितं तीर्थमुत्तमम् । नर्मदेति च विख्यातं पापपर्वतदारणम्

yudhiṣṭhira uvāca vasiṣṭhena dilīpāya kathitaṁ tīrthamuttamam narmadeti ca vikhyātaṁ pāpaparvatadāraṇam

युधिष्ठिर ने कहा — वसिष्ठ जी ने दिलीप को पापों के पर्वत को चीर डालने वाला, नर्मदा नाम से विख्यात, उत्तम तीर्थ बताया था।

श्लोक 2 (padma.3.13.2)

भूयश्च श्रोतुमिच्छामि तन्मे कथय नारद । नर्मदायाश्च माहात्म्यं वसिष्ठोक्तं द्विजोत्तम

bhūyaśca śrotumicchāmi tanme kathaya nārada narmadāyāśca māhātmyaṁ vasiṣṭhoktaṁ dvijottama

हे नारद! मैं और सुनना चाहता हूँ; हे द्विजोत्तम! वसिष्ठ द्वारा कही गई नर्मदा की महिमा मुझे कहिए।

श्लोक 3 (padma.3.13.3)

कथमेषा महापुण्या नदी सर्वत्र विश्रुता । नर्मदानाम विख्याता तन्मम ब्रूहिनारद

kathameṣā mahāpuṇyā nadī sarvatra viśrutā narmadānāma vikhyātā tanmama brūhinārada

यह अत्यंत पुण्यमयी नदी सर्वत्र किस प्रकार विख्यात हुई और नर्मदा नाम से प्रसिद्ध हुई — हे नारद! वह मुझे कहिए।

श्लोक 4 (padma.3.13.4)

नारद उवाच । नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी । तारयेत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च

nārada uvāca narmadā saritāṁ śreṣṭhā sarvapāpapraṇāśinī tārayetsarvabhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca

नारद जी ने कहा — नर्मदा नदियों में श्रेष्ठ है, समस्त पापों का नाश करने वाली है; वह स्थावर और जंगम सभी प्राणियों को तार देती है।

श्लोक 5 (padma.3.13.5)

नर्मदायास्तु माहात्म्यं वसिष्ठोक्तं मया श्रुतम् । तदेतद्धि महाराज सर्वं हि कथयामि ते

narmadāyāstu māhātmyaṁ vasiṣṭhoktaṁ mayā śrutam tadetaddhi mahārāja sarvaṁ hi kathayāmi te

वसिष्ठ द्वारा कही गई नर्मदा की महिमा मैंने सुनी है; हे महाराज! वह सब मैं आपको बताता हूँ।

श्लोक 6 (padma.3.13.6)

पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती । ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्म्मदा

puṇyā kanakhale gaṅgā kurukṣetre sarasvatī grāme vā yadi vāraṇye puṇyā sarvatra narmmadā

गंगा कनखल में पुण्यमयी है, सरस्वती कुरुक्षेत्र में; परंतु नर्मदा गाँव में हो या वन में, सर्वत्र ही पुण्यमयी है।

श्लोक 7 (padma.3.13.7)

त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम् । सद्यः पुनाति गांगेयं दर्शनादेव नार्मदम्

tribhiḥ sārasvataṁ toyaṁ saptāhena tu yāmunam sadyaḥ punāti gāṁgeyaṁ darśanādeva nārmadam

सरस्वती का जल तीन दिनों में, यमुना का सात दिनों में पवित्र करता है; गंगा तत्काल पवित्र करती है, परंतु नर्मदा तो दर्शन मात्र से ही पवित्र कर देती है।

श्लोक 8 (padma.3.13.8)

कलिंग देशे पश्चार्द्धे पर्वतेऽमरकंटके । पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा

kaliṁga deśe paścārddhe parvate'marakaṁṭake puṇyā ca triṣu lokeṣu ramaṇīyā manoramā

कलिंग देश के पश्चिमी भाग में, अमरकंटक पर्वत पर, वह तीनों लोकों में पुण्यमयी, रमणीय और मनोहर है,

श्लोक 9 (padma.3.13.9)

सदेवासुरगंधर्वा ऋषयश्च तपोधनाः । तपस्तप्त्वा महाराज सिद्धिं च परमां गताः

sadevāsuragaṁdharvā ṛṣayaśca tapodhanāḥ tapastaptvā mahārāja siddhiṁ ca paramāṁ gatāḥ

जहाँ देव, असुर, गंधर्व और तपोधन ऋषि, हे महाराज, तप करके परम सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 10 (padma.3.13.10)

तत्र स्नात्वा महाराज नियमस्थो जितेंद्रियः । उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्

tatra snātvā mahārāja niyamastho jiteṁdriyaḥ upoṣya rajanīmekāṁ kulānāṁ tārayecchatam

वहाँ स्नान करके, नियमपूर्वक जितेंद्रिय होकर, हे महाराज, एक रात्रि का उपवास करने से मनुष्य अपने सौ कुलों को तार देता है।

श्लोक 11 (padma.3.13.11)

जनेश्वरे नरः स्नात्वा पिंडं दत्वा यथाविधि । पितरस्तस्य तृप्यंति यावदाभूतसंप्लवम्

janeśvare naraḥ snātvā piṁḍaṁ datvā yathāvidhi pitarastasya tṛpyaṁti yāvadābhūtasaṁplavam

जनेश्वर तीर्थ में स्नान करके विधिपूर्वक पिंडदान करने वाले मनुष्य के पितर तब तक तृप्त रहते हैं जब तक प्रलय नहीं होता।

श्लोक 12 (padma.3.13.12)

पर्वतस्य समंतात्तु रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता । स्नानं यः कुरुते तत्र गंधमाल्यानुलेपनम्

parvatasya samaṁtāttu rudrakoṭiḥ pratiṣṭhitā snānaṁ yaḥ kurute tatra gaṁdhamālyānulepanam

उस पर्वत के चारों ओर एक करोड़ रुद्र प्रतिष्ठित हैं; जो वहाँ स्नान करके गंध, माला और अनुलेपन अर्पित करता है,

श्लोक 13 (padma.3.13.13)

प्रीता तस्य भवेत्सर्वा रुद्रकोटिर्न संशयः । पर्वते पश्चिमस्यांते स्वयं देवो महेश्वरः

prītā tasya bhavetsarvā rudrakoṭirna saṁśayaḥ parvate paścimasyāṁte svayaṁ devo maheśvaraḥ

उससे वे सभी करोड़ रुद्र प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। पर्वत के पश्चिमी छोर पर स्वयं महेश्वर देव विराजते हैं;

श्लोक 14 (padma.3.13.14)

तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा ब्रह्मचारी जितेंद्रियः । पितृकार्यं तु कुर्वीत विधिदृष्टेन कर्मणा

tatra snātvā śucirbhūtvā brahmacārī jiteṁdriyaḥ pitṛkāryaṁ tu kurvīta vidhidṛṣṭena karmaṇā

वहाँ स्नान करके, पवित्र होकर, ब्रह्मचारी और जितेंद्रिय होकर, विधिपूर्वक पितृकार्य करना चाहिए।

श्लोक 15 (padma.3.13.15)

तिलोदकेन तत्रैव तर्पयेत्पितृदेवताः । आसप्तमं कुलं तस्य स्वर्गे तिष्ठति पांडव

tilodakena tatraiva tarpayetpitṛdevatāḥ āsaptamaṁ kulaṁ tasya svarge tiṣṭhati pāṁḍava

वहीं तिल-जल से पितर-देवताओं का तर्पण करना चाहिए। हे पांडव! उसका कुल सातवीं पीढ़ी तक स्वर्ग में रहता है।

श्लोक 16 (padma.3.13.16)

षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते । अप्सरोगणसंकीर्णो दिव्यस्त्रीपरिवारितः

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate apsarogaṇasaṁkīrṇo divyastrīparivāritaḥ

वह साठ हजार वर्ष तक स्वर्गलोक में सम्मानित रहता है, अप्सराओं के समूहों से घिरा और दिव्य स्त्रियों से सेवित,

श्लोक 17 (padma.3.13.17)

दिव्यगंधानुलिप्तश्च दिव्यालंकारभूषितः । ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टो जायते विपुले कुले

divyagaṁdhānuliptaśca divyālaṁkārabhūṣitaḥ tataḥ svargātparibhraṣṭo jāyate vipule kule

दिव्य गंध से लिप्त और दिव्य आभूषणों से सुशोभित। फिर स्वर्ग से च्युत होकर वह एक विशाल कुल में जन्म लेता है,

श्लोक 18 (padma.3.13.18)

धनवान्दानशीलश्च धार्मिकश्चैव जायते । पुनः स्मरति तत्तीर्थं गमनं तत्र कुर्वते

dhanavāndānaśīlaśca dhārmikaścaiva jāyate punaḥ smarati tattīrthaṁ gamanaṁ tatra kurvate

धनवान, दानशील और धार्मिक होकर जन्म लेता है। वह पुनः उस तीर्थ का स्मरण करता है और वहाँ यात्रा करता है।

श्लोक 19 (padma.3.13.19)

तारयित्वा कुलशतं रुद्रलोकं स गच्छति । योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा

tārayitvā kulaśataṁ rudralokaṁ sa gacchati yojanānāṁ śataṁ sāgraṁ śrūyate sariduttamā

अपने सौ कुलों को तारकर वह रुद्रलोक को जाता है। यह श्रेष्ठ नदी सौ योजन से भी अधिक लंबी सुनी जाती है,

श्लोक 20 (padma.3.13.20)

विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमंतरम् । षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च

vistāreṇa tu rājendra yojanadvayamaṁtaram ṣaṣṭitīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭyastathaiva ca

और हे राजेंद्र! चौड़ाई में इसका विस्तार दो योजन है। साठ हजार तीर्थ, और इसी प्रकार साठ करोड़ [रुद्ररूप],

श्लोक 21 (padma.3.13.21)

पर्वतस्य समंतात्तु तिष्ठंत्यमरकंटके । ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेंद्रियः

parvatasya samaṁtāttu tiṣṭhaṁtyamarakaṁṭake brahmacārī śucirbhūtvā jitakrodho jiteṁdriyaḥ

अमरकंटक पर्वत के चारों ओर स्थित हैं। ब्रह्मचारी, पवित्र, क्रोधरहित और जितेंद्रिय होकर,

श्लोक 22 (padma.3.13.22)

सर्वहिंसानिवृत्तश्च सर्वभूतहिते रतः । एवं सर्वसमाचारः क्षेत्रपालान्परिव्रजेत्

sarvahiṁsānivṛttaśca sarvabhūtahite rataḥ evaṁ sarvasamācāraḥ kṣetrapālānparivrajet

सर्व हिंसा से विरत और सर्वभूत-हित में रत होकर — इस प्रकार सर्वथा सदाचारी होकर मनुष्य क्षेत्रपालों के तीर्थ में परिभ्रमण करे।

श्लोक 23 (padma.3.13.23)

तस्य पुण्यफलं राजन्शृणुष्वावहितो हि मे । शतं वर्षसहस्राणां स्वर्गे मोदेत पांडव

tasya puṇyaphalaṁ rājanśṛṇuṣvāvahito hi me śataṁ varṣasahasrāṇāṁ svarge modeta pāṁḍava

हे राजन! उसके पुण्य का फल ध्यानपूर्वक सुनो — हे पांडव! वह एक लाख वर्ष तक स्वर्ग में आनंद मनाता है,

श्लोक 24 (padma.3.13.24)

अप्सरोगणसंकीर्णे दिव्यस्त्रीपरिचारिते । दिव्यगंधानुलिप्तश्च दिव्यालंकारभूषितः

apsarogaṇasaṁkīrṇe divyastrīparicārite divyagaṁdhānuliptaśca divyālaṁkārabhūṣitaḥ

अप्सराओं के समूहों से भरे, दिव्य स्त्रियों से सेवित स्थान में, दिव्य गंध से लिप्त और दिव्य आभूषणों से सुशोभित होकर,

श्लोक 25 (padma.3.13.25)

क्रीडते देवलोके तु दैवतैः सह मोदते । ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान्

krīḍate devaloke tu daivataiḥ saha modate tataḥ svargātparibhraṣṭo rājā bhavati vīryavān

वह देवलोक में क्रीड़ा करता है और देवताओं के साथ आनंद मनाता है। फिर स्वर्ग से च्युत होकर वह पराक्रमी राजा बनता है।

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