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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 15

त्रिपुर-दहन और ज्वालेश्वर की उत्पत्ति

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

श्लोक 1 (padma.3.15.1)

नारद उवाच । यन्मां पृच्छसि कौंतेय तन्निबोध च तच्छृणु । एतस्मिन्नंतरे रुद्रो नर्मदातटमास्थितः

nārada uvāca yanmāṁ pṛcchasi kauṁteya tannibodha ca tacchṛṇu etasminnaṁtare rudro narmadātaṭamāsthitaḥ

नारद जी ने कहा — हे कौंतेय! तुम जो पूछते हो, उसे समझो और सुनो। इसी बीच रुद्र नर्मदा के तट पर,

श्लोक 2 (padma.3.15.2)

नाम्ना हरेश्वरं स्थानं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तस्मिन्स्थाने महादेवश्चिंतयंस्त्रैपुरं वधम्

nāmnā hareśvaraṁ sthānaṁ triṣu lokeṣu viśrutam tasminsthāne mahādevaściṁtayaṁstraipuraṁ vadham

हरेश्वर नामक स्थान पर, जो तीनों लोकों में विख्यात है, विराजमान थे; उस स्थान पर महादेव त्रिपुर के वध का चिंतन करते हुए,

श्लोक 3 (padma.3.15.3)

गां(गा?)डीवं मंदरं कृत्वा गुणं कृत्वा तु वासुकिम् । स्थानं कृत्वा तु वैशाखं विष्णुं कृत्वा शरोत्तमम्

gāṁ(gā?)ḍīvaṁ maṁdaraṁ kṛtvā guṇaṁ kṛtvā tu vāsukim sthānaṁ kṛtvā tu vaiśākhaṁ viṣṇuṁ kṛtvā śarottamam

मंदराचल को धनुष, वासुकि को प्रत्यंचा, वैशाख को अपनी स्थिति, और विष्णु को श्रेष्ठ बाण बनाकर,

श्लोक 4 (padma.3.15.4)

अग्रे चाग्निं प्रतिष्ठाप्य मुखे वायुः समर्पितः । हयाश्च चतुरो वेदाः सर्वदेवमयं रथम्

agre cāgniṁ pratiṣṭhāpya mukhe vāyuḥ samarpitaḥ hayāśca caturo vedāḥ sarvadevamayaṁ ratham

आगे अग्नि को स्थापित कर और मुख में वायु को समर्पित कर, चारों वेदों को घोड़े बनाकर, समस्त देवमय रथ रचकर,

श्लोक 5 (padma.3.15.5)

चक्रगौ चाश्विनौ देवावक्षं चक्रधरः स्वयम् । स्वयमिंद्रश्च चापांते बाणे वैश्रवणः स्थितः

cakragau cāśvinau devāvakṣaṁ cakradharaḥ svayam svayamiṁdraśca cāpāṁte bāṇe vaiśravaṇaḥ sthitaḥ

दोनों अश्विनी देवों को पहिए और स्वयं चक्रधारी को धुरी बनाकर; धनुष के छोर पर स्वयं इंद्र और बाण के अग्रभाग में वैश्रवण स्थित हुए,

श्लोक 6 (padma.3.15.6)

यमस्तु दक्षिणे हस्ते वामे कालस्तु दारुणः । चक्राणामारके न्यस्ता गंधर्वा लोकविश्रुताः

yamastu dakṣiṇe haste vāme kālastu dāruṇaḥ cakrāṇāmārake nyastā gaṁdharvā lokaviśrutāḥ

दाहिने हाथ में यम और बाएँ हाथ में भयंकर काल; पहियों की नाभि में लोकविख्यात गंधर्व स्थापित हुए,

श्लोक 7 (padma.3.15.7)

प्रजापती रथश्रेष्ठे ब्रह्मा चैव तु सारथिः । एवं कृत्वा तु देवेशः सर्वदेवमयं रथम्

prajāpatī rathaśreṣṭhe brahmā caiva tu sārathiḥ evaṁ kṛtvā tu deveśaḥ sarvadevamayaṁ ratham

श्रेष्ठ रथ पर प्रजापति, और स्वयं ब्रह्मा सारथी बने। इस प्रकार देवेश्वर ने समस्त देवमय रथ बनाकर,

श्लोक 8 (padma.3.15.8)

सोतिष्ठत्स्थाणुभूतो हि सहस्रं परिवत्सरान् । यदा त्रीणि समेतानि अंतरिक्षचराणि च

sotiṣṭhatsthāṇubhūto hi sahasraṁ parivatsarān yadā trīṇi sametāni aṁtarikṣacarāṇi ca

एक हजार वर्षों तक स्थाणु के समान स्थिर खड़े रहे। जब तीनों आकाशचारी नगर एक साथ आ मिले,

श्लोक 9 (padma.3.15.9)

त्रिपुराणि त्रिशल्येन तदा तानि बिभेद सः । शरः प्रचोदितस्तत्र रुद्रेण त्रिपुरं प्रति

tripurāṇi triśalyena tadā tāni bibheda saḥ śaraḥ pracoditastatra rudreṇa tripuraṁ prati

तब उन्होंने त्रिशूल के समान बाण से उन्हें बींध डाला। वहाँ रुद्र द्वारा त्रिपुर की ओर छोड़ा गया वह बाण,

श्लोक 10 (padma.3.15.10)

भ्रष्टतेजा स्त्रियो जाता बलं तेषां व्यशीर्यत । उत्पाताश्च पुरे तस्मिन्प्रादुर्भूता सहस्रशः

bhraṣṭatejā striyo jātā balaṁ teṣāṁ vyaśīryata utpātāśca pure tasminprādurbhūtā sahasraśaḥ

स्त्रियों का तेज हर गया और उनका बल छिन्न-भिन्न हो गया। उस नगर में सहस्रों उत्पात प्रकट होने लगे।

श्लोक 11 (padma.3.15.11)

त्रिपुरस्य विनाशाय कालरूपोभवत्तदा । अट्टहासं प्रमुंचंति रूपाः काष्ठमयास्तथा

tripurasya vināśāya kālarūpobhavattadā aṭṭahāsaṁ pramuṁcaṁti rūpāḥ kāṣṭhamayāstathā

त्रिपुर के विनाश के लिए वे तब काल-रूप हो गए। काठ की बनी मूर्तियाँ अट्टहास करने लगीं,

श्लोक 12 (padma.3.15.12)

निमेषोन्मेषणं चैव कुर्वंति चित्रकर्मणा । स्वप्ने पश्यंति चात्मानं रक्तांबरविभूषितम्

nimeṣonmeṣaṇaṁ caiva kurvaṁti citrakarmaṇā svapne paśyaṁti cātmānaṁ raktāṁbaravibhūṣitam

और विचित्र घटनाओं से उनकी आँखें खुलने-बंद होने लगीं। लोग स्वप्न में स्वयं को रक्त वस्त्र पहने देखने लगे,

श्लोक 13 (padma.3.15.13)

स्वप्ने पश्यंति ते चैवं विपरीतानि यानि तु । एतान्पश्यति उत्पातांस्तत्र स्थाने तु ये जनाः

svapne paśyaṁti te caivaṁ viparītāni yāni tu etānpaśyati utpātāṁstatra sthāne tu ye janāḥ

और स्वप्न में उन्हें विपरीत बातें दिखाई देने लगीं। उस नगर में जो लोग इन उत्पातों को देखते थे,

श्लोक 14 (padma.3.15.14)

तेषां बलं च बुद्धिश्च हरक्रोधेन नाशितम् । संवर्तको नाम वायुर्युगांतप्रतिमो महान्

teṣāṁ balaṁ ca buddhiśca harakrodhena nāśitam saṁvartako nāma vāyuryugāṁtapratimo mahān

उनका बल और बुद्धि हर के क्रोध से नष्ट हो गई। युगांत के समान संवर्तक नामक महान वायु,

श्लोक 15 (padma.3.15.15)

समीरितोनलश्रेष्ठ उत्तमांगेषु बाधते । ज्वलंति पादपास्तत्र पतंति शिखराणि च

samīritonalaśreṣṭha uttamāṁgeṣu bādhate jvalaṁti pādapāstatra pataṁti śikharāṇi ca

प्रचंड अग्नि के साथ चलकर उनके सिरों को पीड़ित करने लगी। वहाँ वृक्ष जल उठे और उनकी चोटियाँ गिरने लगीं,

श्लोक 16 (padma.3.15.16)

सर्वं तद्व्याकुलीभूतं हाहाकारमचेतनम् । भग्नोद्यानानि सर्वाणि क्षिप्रं तु प्रज्वलंति च

sarvaṁ tadvyākulībhūtaṁ hāhākāramacetanam bhagnodyānāni sarvāṇi kṣipraṁ tu prajvalaṁti ca

सब कुछ व्याकुल हो गया, हाहाकार से भर गया, चेतनाशून्य हो गया; सारे उद्यान नष्ट होकर शीघ्र ही जल उठे।

श्लोक 17 (padma.3.15.17)

तेनैव दीपितं सर्वं ज्वलते विशिखैः शिखैः । द्रुमा आरामगंडानि गृहाणि विविधानि च

tenaiva dīpitaṁ sarvaṁ jvalate viśikhaiḥ śikhaiḥ drumā ārāmagaṁḍāni gṛhāṇi vividhāni ca

उसी अग्नि से सब कुछ प्रज्वलित हो गया, ज्वालाओं की लपटों से जलने लगा — वृक्ष, उद्यानों के कोने और नाना प्रकार के घर।

श्लोक 18 (padma.3.15.18)

दशदिक्षु प्रवृत्तोयं समिद्धो हव्यवाहनः । ततः शिलाः प्रमुंचंति दिशो दश विभागशः

daśadikṣu pravṛttoyaṁ samiddho havyavāhanaḥ tataḥ śilāḥ pramuṁcaṁti diśo daśa vibhāgaśaḥ

यह प्रज्वलित हव्यवाहन (अग्नि) दसों दिशाओं में फैल गया; फिर दसों दिशाओं में विभागशः शिलाएँ गिरने लगीं,

श्लोक 19 (padma.3.15.19)

शिखासहस्रैरत्युग्रैः प्रज्वलंति हुताशनैः । सर्वं किंशुकसंप्रख्यं ज्वलितंदृश्यते पुरम्

śikhāsahasrairatyugraiḥ prajvalaṁti hutāśanaiḥ sarvaṁ kiṁśukasaṁprakhyaṁ jvalitaṁdṛśyate puram

सहस्रों अत्यंत उग्र ज्वालाओं से प्रज्वलित होकर, सारा नगर मानो किंशुक वृक्ष के समान जलता हुआ दिखाई देने लगा।

श्लोक 20 (padma.3.15.20)

गृहाद्गृहांतरे नैव गंतुं धूमैश्च शक्यते । हरकोपानलादग्धं क्रंदमानं सुदुःखितम्

gṛhādgṛhāṁtare naiva gaṁtuṁ dhūmaiśca śakyate harakopānalādagdhaṁ kraṁdamānaṁ suduḥkhitam

धुएँ के कारण एक घर से दूसरे घर जाना संभव नहीं रहा; हर के क्रोधाग्नि से दग्ध वह नगर करुण क्रंदन करता हुआ अत्यंत दुःखी हो गया।

श्लोक 21 (padma.3.15.21)

प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं पुरम् । प्रासादशिखराग्राणि विशीर्यंति सहस्रशः

pradīptaṁ sarvato dikṣu dahyate tripuraṁ puram prāsādaśikharāgrāṇi viśīryaṁti sahasraśaḥ

सब ओर से प्रज्वलित होकर त्रिपुर नगर जलने लगा। महलों के शिखरों के अग्रभाग सहस्रों की संख्या में टूटकर गिरने लगे,

श्लोक 22 (padma.3.15.22)

नानारत्नविचित्राणि विमानान्यप्यनेकधा । गृहाणि चैव रम्याणि दह्यंते दीप्तिवह्निना

nānāratnavicitrāṇi vimānānyapyanekadhā gṛhāṇi caiva ramyāṇi dahyaṁte dīptivahninā

नाना रत्नों से विचित्र विमान भी अनेक प्रकार से, और रमणीय घर भी, प्रज्वलित अग्नि से जलने लगे।

श्लोक 23 (padma.3.15.23)

बाधंते द्रुमखंडेषु जनस्थाने तथैव च । देवागारेषु सर्वेषु प्रज्वलंते ज्वलंत्यपि

bādhaṁte drumakhaṁḍeṣu janasthāne tathaiva ca devāgāreṣu sarveṣu prajvalaṁte jvalaṁtyapi

वृक्षों के झुरमुटों में और जनवासों में भी लोग पीड़ित होने लगे; सभी देवालयों में भी अग्नि प्रज्वलित होकर जलती रही,

श्लोक 24 (padma.3.15.24)

सीदंति चानलस्पृष्टाः क्रंदंति विविधै स्वरैः । गिरिकूटनिभास्तत्र दृश्यंतेंऽगारराशयः

sīdaṁti cānalaspṛṣṭāḥ kraṁdaṁti vividhai svaraiḥ girikūṭanibhāstatra dṛśyaṁteṁ'gārarāśayaḥ

अग्नि से स्पर्शित होकर लोग बैठ जाते, नाना स्वरों में क्रंदन करते; वहाँ पर्वत-शिखरों के समान अंगारों की राशियाँ दिखाई देने लगीं।

श्लोक 25 (padma.3.15.25)

स्तुवंति देवदेवेशं परित्रायस्व मां प्रभो । अन्योन्यं च परिष्वज्य हुताशनप्रपीडिताः

stuvaṁti devadeveśaṁ paritrāyasva māṁ prabho anyonyaṁ ca pariṣvajya hutāśanaprapīḍitāḥ

वे देवाधिदेव की स्तुति करने लगे — 'हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए' — एक-दूसरे को दृढ़ता से आलिंगन करके, अग्नि से पीड़ित होकर,

श्लोक 26 (padma.3.15.26)

दह्यंते दानवास्तत्र शतशोथ सहस्रशः । हंसकारंडवाकीर्णा नलिनी सह पंकजा

dahyaṁte dānavāstatra śataśotha sahasraśaḥ haṁsakāraṁḍavākīrṇā nalinī saha paṁkajā

वहाँ दानव सैकड़ों-हजारों की संख्या में जलने लगे। हंसों और कारंडवों से भरी हुई, कमलों से युक्त झीलें,

श्लोक 27 (padma.3.15.27)

दह्यंतेनलदग्धानि पुरोद्यानानि दीर्घिकाः । अम्लानैः पंकजैश्छन्ना विस्तीर्णा योजनैः शतैः

dahyaṁtenaladagdhāni purodyānāni dīrghikāḥ amlānaiḥ paṁkajaiśchannā vistīrṇā yojanaiḥ śataiḥ

अग्नि से दग्ध होकर जलने लगीं — नगर के उद्यान और वे लंबी झीलें, जो सैकड़ों योजन तक फैली, अकुम्हलाए कमलों से आच्छादित थीं,

श्लोक 28 (padma.3.15.28)

गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादारत्नभूषिताः । पतंत्यनलनिर्दग्धा निस्तोया जलदा इव

girikūṭanibhāstatra prāsādāratnabhūṣitāḥ pataṁtyanalanirdagdhā nistoyā jaladā iva

पर्वत-शिखरों के समान, रत्नजड़ित महलों से सुशोभित, अग्नि से जलकर गिरने लगीं, मानो जल-रहित बादल हों।

श्लोक 29 (padma.3.15.29)

सह स्त्रीबालवृद्धेषु गोषु पक्षिषु वाजिषु । निर्दयो दहते वह्निर्हरकोपेन प्रेरितः

saha strībālavṛddheṣu goṣu pakṣiṣu vājiṣu nirdayo dahate vahnirharakopena preritaḥ

स्त्री, बालक और वृद्धों सहित, गौओं, पक्षियों और घोड़ों सहित, हर के क्रोध से प्रेरित निर्दय अग्नि सबको भस्म करने लगी।

श्लोक 30 (padma.3.15.30)

सपत्नीकाश्चैव सुप्ताः संसुप्ता बहवो जनाः । पुत्रमालिंग्यते गाढं दह्यंते त्रिपुरारिणा

sapatnīkāścaiva suptāḥ saṁsuptā bahavo janāḥ putramāliṁgyate gāḍhaṁ dahyaṁte tripurāriṇā

अपनी-अपनी पत्नियों सहित सोए हुए बहुत-से लोग, पुत्र को गाढ़ आलिंगन में लिए हुए, त्रिपुरारि (शिव) की अग्नि से जल गए।

श्लोक 31 (padma.3.15.31)

अथ तस्मिन्पुरे दीप्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः । अग्निज्वालाहतास्तत्र पतंति धरणीतले

atha tasminpure dīpte striyaścāpsarasopamāḥ agnijvālāhatāstatra pataṁti dharaṇītale

फिर उस जलते हुए नगर में अप्सराओं के समान सुंदर स्त्रियाँ, अग्नि की ज्वालाओं से आहत होकर, पृथ्वी पर गिरने लगीं।

श्लोक 32 (padma.3.15.32)

काचिद्बाला विशालाक्षी मुक्तावलि विभूषिता । धूमेनाकुलिता सा तु प्रतिबुद्धा शिखार्द्दिता

kācidbālā viśālākṣī muktāvali vibhūṣitā dhūmenākulitā sā tu pratibuddhā śikhārdditā

कोई विशाल नेत्रों वाली, मुक्ता-माला से सुशोभित बालिका, धुएँ से व्याकुल होकर, ज्वाला से पीड़ित जागकर,

श्लोक 33 (padma.3.15.33)

सुतं संचिंत्यमाना सा पतिता धरणीतले । काचित्सुवर्णवर्णाभा नीलरत्नैर्विभूषिता

sutaṁ saṁciṁtyamānā sā patitā dharaṇītale kācitsuvarṇavarṇābhā nīlaratnairvibhūṣitā

अपने पुत्र का स्मरण करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ी। कोई सुवर्ण के समान वर्णवाली, नीलरत्नों से सुसज्जित,

श्लोक 34 (padma.3.15.34)

धूमेनाकुलिता सा तु पतिता धरणीतले । अन्या गृहीतहस्ता तु सखी दहति बालकैः

dhūmenākulitā sā tu patitā dharaṇītale anyā gṛhītahastā tu sakhī dahati bālakaiḥ

धुएँ से व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। किसी और का हाथ पकड़े हुए उसकी सखी अपने बालकों सहित जल रही थी।

श्लोक 35 (padma.3.15.35)

अनेन दिव्यरूपान्यादृष्टा मदविमोहिता । शिरसा प्रांजलिं कृत्वा विज्ञापयति पावकम्

anena divyarūpānyādṛṣṭā madavimohitā śirasā prāṁjaliṁ kṛtvā vijñāpayati pāvakam

इस प्रकार अनेक दिव्य दृश्य देखकर, मोहग्रस्त होकर, सिर पर हाथ जोड़कर, एक स्त्री ने अग्नि से निवेदन किया —

श्लोक 36 (padma.3.15.36)

यदि त्वमिच्छसे वैरं पुरुषेष्वपकारिषु । स्त्रियः किमपराध्यंते गृहपंजरकोकिलाः

yadi tvamicchase vairaṁ puruṣeṣvapakāriṣu striyaḥ kimaparādhyaṁte gṛhapaṁjarakokilāḥ

यदि तुम अपराधी पुरुषों से बैर रखते हो, तो स्त्रियों ने क्या अपराध किया है — हम तो केवल घर के पिंजरे की कोयलें हैं?

श्लोक 37 (padma.3.15.37)

पापनिर्दय निर्ल्लज्ज कस्ते कोपः स्त्रियोपरि । न दाक्षिण्यं न ते लज्जा न सत्यं शौचवर्जितः

pāpanirdaya nirllajja kaste kopaḥ striyopari na dākṣiṇyaṁ na te lajjā na satyaṁ śaucavarjitaḥ

हे पापी, निर्दय, निर्लज्ज! स्त्रियों पर तुम्हारा यह क्रोध किसलिए? तुझमें न शिष्टता है, न लज्जा, न सत्य — तू शुद्धिरहित है।

श्लोक 38 (padma.3.15.38)

अनेकरूपवर्णाढ्या उपलभ्या वदस्व ह । किं त्वया न श्रुतं लोके अवध्याः सर्वयोषितः

anekarūpavarṇāḍhyā upalabhyā vadasva ha kiṁ tvayā na śrutaṁ loke avadhyāḥ sarvayoṣitaḥ

अनेक रूप और वर्णों से युक्त हे अग्नि! बता, क्या तूने संसार में यह नहीं सुना कि सभी स्त्रियाँ अवध्य हैं?

श्लोक 39 (padma.3.15.39)

किं तु तुभ्यं गुणा ह्येते दहनस्त्र्यर्दनं प्रति । न कारुण्यं दया वापि दाक्षिण्यं वा स्त्रियोपरि

kiṁ tu tubhyaṁ guṇā hyete dahanastryardanaṁ prati na kāruṇyaṁ dayā vāpi dākṣiṇyaṁ vā striyopari

स्त्रियों को पीड़ा देने में तुम्हारे लिए क्या गुण है? स्त्रियों के प्रति न तेरे में करुणा है, न दया, न शिष्टता।

श्लोक 40 (padma.3.15.40)

दयां कुर्वंति म्लेच्छापि दहनं प्रेक्ष्य योषितः । म्लेच्छानामपि कष्टोसि दुर्निवार्यो ह्यचेतनः

dayāṁ kurvaṁti mlecchāpi dahanaṁ prekṣya yoṣitaḥ mlecchānāmapi kaṣṭosi durnivāryo hyacetanaḥ

म्लेच्छ भी स्त्रियों को जलते देखकर दया करते हैं; तू तो म्लेच्छों से भी बढ़कर निवारण न होने वाला और चेतनाहीन है।

श्लोक 41 (padma.3.15.41)

एते चैव गुणास्तुभ्यं दहनोत्सादनं प्रति । आसामपि दुराचार स्त्रीणां किं विनिपातसे

ete caiva guṇāstubhyaṁ dahanotsādanaṁ prati āsāmapi durācāra strīṇāṁ kiṁ vinipātase

अग्नि को शांत करने के लिए तेरे में तो ये ही गुण हैं! हे दुराचारी! इन निर्दोष स्त्रियों को भी क्यों गिरा रहा है?

श्लोक 42 (padma.3.15.42)

दुष्ट निर्घृण निर्लज्ज हुताश मंदभाग्यक । निराशस्त्वं दुराचार बालान्दहसि निर्दय

duṣṭa nirghṛṇa nirlajja hutāśa maṁdabhāgyaka nirāśastvaṁ durācāra bālāndahasi nirdaya

हे दुष्ट, निर्घृण, निर्लज्ज, हुताश, अभागे! हे दुराचारी और निराश! तू निर्दयता से बच्चों को जला रहा है!

श्लोक 43 (padma.3.15.43)

एवं प्रलपमानास्ता जल्पमाना बहुस्वरम् । अन्याः क्रोशंति संक्रुद्धा बालशोकेन मोहिताः

evaṁ pralapamānāstā jalpamānā bahusvaram anyāḥ krośaṁti saṁkruddhā bālaśokena mohitāḥ

इस प्रकार विलाप करती और अनेक स्वरों में बोलती हुई वे स्त्रियाँ, अन्य क्रोधित होकर पुत्र-शोक से मोहित हो चिल्लाने लगीं।

श्लोक 44 (padma.3.15.44)

दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः सर्वशत्रुवत् । पुष्करिण्यां जले ज्वाला कूपेष्वपि तथैव च

dahate nirdayo vahniḥ saṁkruddhaḥ sarvaśatruvat puṣkariṇyāṁ jale jvālā kūpeṣvapi tathaiva ca

समस्त शत्रु के समान क्रुद्ध निर्दय अग्नि जलाती रही; कमल-सरोवरों के जल में और कुओं में भी ज्वालाएँ दिखाई दीं।

श्लोक 45 (padma.3.15.45)

अस्मान्संदह्य म्लेच्छ त्वं कां गतिं प्रापयिष्यसि । एवं प्रलपतां तासां वह्निर्वचनमब्रवीत्

asmānsaṁdahya mleccha tvaṁ kāṁ gatiṁ prāpayiṣyasi evaṁ pralapatāṁ tāsāṁ vahnirvacanamabravīt

हे म्लेच्छ! हमें जलाकर तू हमें किस गति को पहुँचाएगा? इस प्रकार विलाप करती उन स्त्रियों को अग्नि ने यह वचन कहा —

श्लोक 46 (padma.3.15.46)

वैश्वानर उवाच । स्ववशो नैव युष्माकं विनाशं तु करोम्यहम् । अहमादेशकर्ता वै नाहं कर्त्तास्म्यनुग्रहम्

vaiśvānara uvāca svavaśo naiva yuṣmākaṁ vināśaṁ tu karomyaham ahamādeśakartā vai nāhaṁ karttāsmyanugraham

वैश्वानर (अग्नि) ने कहा — मैं तुम्हारे विनाश का स्वतंत्र कर्ता नहीं हूँ; मैं केवल आज्ञा का पालक हूँ, अनुग्रह करने वाला नहीं हूँ।

श्लोक 47 (padma.3.15.47)

अत्र क्रोधसमाविष्टो विचरामि यदृच्छया । ततो बाणो महातेजास्त्रिपुरं वीक्ष्य दीपितम्

atra krodhasamāviṣṭo vicarāmi yadṛcchayā tato bāṇo mahātejāstripuraṁ vīkṣya dīpitam

यहाँ क्रोध से आविष्ट होकर मैं स्वेच्छा से नहीं, आज्ञा से विचरण करता हूँ। तब महातेजस्वी बाण, त्रिपुर को जलता देखकर,

श्लोक 48 (padma.3.15.48)

आसनस्थोऽब्रवीदेवमहं देवैर्विनाशितः । अल्पसारैर्दुराचारैरीश्वरस्य निवेदितः

āsanastho'bravīdevamahaṁ devairvināśitaḥ alpasārairdurācārairīśvarasya niveditaḥ

आसन पर बैठे हुए बोला — मैं देवताओं द्वारा नष्ट किया गया, अल्पसार और दुराचारी लोगों द्वारा ईश्वर से मेरी शिकायत की गई।

श्लोक 49 (padma.3.15.49)

अपरीक्ष्य ह्यहं दग्धः शंकरेण महात्मना । नान्यः शत्रुस्तु मां हंतुं वर्ज्जयित्वा महेश्वरम्

aparīkṣya hyahaṁ dagdhaḥ śaṁkareṇa mahātmanā nānyaḥ śatrustu māṁ haṁtuṁ varjjayitvā maheśvaram

बिना जाँच किए ही महात्मा शंकर ने मुझे जला दिया। महेश्वर के अतिरिक्त मुझे मारने वाला अन्य कोई शत्रु नहीं है।

श्लोक 50 (padma.3.15.50)

उत्थितः शिरसा कृत्वा लिगं त्रिभुवनेश्वरम् । निर्गतः स पुरद्वारात्परित्यज्य सुहृत्स्वयम्

utthitaḥ śirasā kṛtvā ligaṁ tribhuvaneśvaram nirgataḥ sa puradvārātparityajya suhṛtsvayam

उठकर, त्रिभुवनेश्वर के लिंग को सिर पर धारण कर, वह अपने ही मित्रों को त्यागकर नगर-द्वार से बाहर निकल गया।

श्लोक 51 (padma.3.15.51)

रत्नानि सुविचित्राणि स्त्रियो नानाविधास्तथा । गृहीत्वा शिरसा लिंगं न्यस्तं नगरमंडले

ratnāni suvicitrāṇi striyo nānāvidhāstathā gṛhītvā śirasā liṁgaṁ nyastaṁ nagaramaṁḍale

विचित्र रत्न और नाना प्रकार की स्त्रियाँ लेकर, सिर पर लिंग धारण किए हुए, उसने उसे नगर के प्रांगण में स्थापित किया।

श्लोक 52 (padma.3.15.52)

स्तुवते देवदेवेशं त्रैलोक्याधिपतिं शिवम् । हर त्वयाहं निर्दग्धो यदि वध्योसि शंकर

stuvate devadeveśaṁ trailokyādhipatiṁ śivam hara tvayāhaṁ nirdagdho yadi vadhyosi śaṁkara

वह त्रैलोक्याधिपति शिव, देवाधिदेव की स्तुति करने लगा — हे हर! यदि मैं तुझसे जलाया गया हूँ, यदि मैं वध्य ही हूँ, हे शंकर,

श्लोक 53 (padma.3.15.53)

त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिंगं विनश्यतु । अर्चितं हि महादेव भक्त्या परमया सदा

tvatprasādānmahādeva mā me liṁgaṁ vinaśyatu arcitaṁ hi mahādeva bhaktyā paramayā sadā

तो भी हे महादेव! तेरी कृपा से मेरा लिंग नष्ट न हो। हे महादेव! मैंने सदा परम भक्ति से इसकी पूजा की है।

श्लोक 54 (padma.3.15.54)

त्वया यद्यपि वध्योहं मा मे लिंगं विनश्यतु । प्राप्यमेतन्महादेव त्वत्पादग्रहणं मम

tvayā yadyapi vadhyohaṁ mā me liṁgaṁ vinaśyatu prāpyametanmahādeva tvatpādagrahaṇaṁ mama

यद्यपि मैं तेरे द्वारा वध्य हूँ, फिर भी मेरा लिंग नष्ट न हो। हे महादेव! मुझे तो केवल तेरे चरणों की प्राप्ति ही अभीष्ट है।

श्लोक 55 (padma.3.15.55)

जन्मजन्म महादेव त्वत्पादनिरतो ह्यहम् । तोटकच्छंदसा देवं स्तुत्वा तु परमेश्वरम्

janmajanma mahādeva tvatpādanirato hyaham toṭakacchaṁdasā devaṁ stutvā tu parameśvaram

हे महादेव! जन्म-जन्म मैं तेरे चरणों में ही रत रहूँ। इस प्रकार तोटक छंद में परमेश्वर की स्तुति करके —

श्लोक 56 (padma.3.15.56)

ॐशिवशंकरसर्वकराय नमो भवभीममहेशशिवाय नमः । कुसुमायुध देहविनाशकर त्रिपुरांतकरांधक चूर्णकर

oṁśivaśaṁkarasarvakarāya namo bhavabhīmamaheśaśivāya namaḥ kusumāyudha dehavināśakara tripurāṁtakarāṁdhaka cūrṇakara

ॐ, शिव शंकर, समस्त कर्मों के कर्ता को नमस्कार; भयंकर, महेश शिव को नमस्कार। हे कामदेव को नष्ट करने वाले, शरीर के विनाशक, त्रिपुर के अंतकर्ता, अंधकासुर के चूर्ण करने वाले,

श्लोक 57 (padma.3.15.57)

प्रमदाप्रियकामविभक्त नमो हि नमः सुरसिद्धगणैर्नमितः । हयवानरसिंहगजेंद्रमुखैरति ह्रस्वसुदीर्घमुखैश्च गणैः

pramadāpriyakāmavibhakta namo hi namaḥ surasiddhagaṇairnamitaḥ hayavānarasiṁhagajeṁdramukhairati hrasvasudīrghamukhaiśca gaṇaiḥ

स्त्रियों के प्रिय कामनाओं के विधाता, तुझे नमस्कार, बार-बार नमस्कार — देवगणों और सिद्धगणों द्वारा नमित। अश्व, वानर, सिंह और गजेंद्र के मुखों वाले, अत्यंत छोटे और अत्यंत लंबे मुखों वाले गणों सहित,

श्लोक 58 (padma.3.15.58)

उपलब्धुमशक्यतरैरसुरैर्व्यथितो न शरीरशतैर्बहुभिः । प्रणतो भगवन्बहुभक्तिमता चलचंद्र कलाधर देव नमः

upalabdhumaśakyatarairasurairvyathito na śarīraśatairbahubhiḥ praṇato bhagavanbahubhaktimatā calacaṁdra kalādhara deva namaḥ

जिसे सैकड़ों शरीरों वाले असुर भी समझ नहीं पाए और पीड़ित हुए — हे भगवन! मैं अत्यंत भक्ति के साथ प्रणत हूँ; हे चंचल चंद्र-कला धारण करने वाले देव, तुझे नमस्कार।

श्लोक 59 (padma.3.15.59)

सहपुत्रकलत्रकलापधनैः सततं जय देहि अनुस्मरणम् । व्यथितोस्मि शरीरशतैर्बहुभिर्गमिताद्य महानरकस्य गतिः

sahaputrakalatrakalāpadhanaiḥ satataṁ jaya dehi anusmaraṇam vyathitosmi śarīraśatairbahubhirgamitādya mahānarakasya gatiḥ

पुत्र, पत्नी और समस्त धन-समूह सहित, मुझे सदा विजय और तेरा स्मरण प्रदान कर। मैं सैकड़ों शरीरों (जन्मों) से पीड़ित हूँ; आज मुझे महानरक के मार्ग पर भेज दिया गया है।

श्लोक 60 (padma.3.15.60)

न निवर्तति यन्ममपापगतिः शुचिकर्म्मविशुद्धमपि त्यजति । अनुकंपति दिग्भ्रमति भ्रमति भ्रम एष कुबुद्धि निवारयति

na nivartati yanmamapāpagatiḥ śucikarmmaviśuddhamapi tyajati anukaṁpati digbhramati bhramati bhrama eṣa kubuddhi nivārayati

मेरी पाप-गति नहीं लौटती; वह शुद्ध कर्म को भी, यद्यपि वह विशुद्ध है, त्याग देती है। कृपा कर — मैं दिशाओं में भ्रमित होकर भटक रहा हूँ; इस भ्रम को, इस कुबुद्धि को दूर कर।

श्लोक 61 (padma.3.15.61)

यः पठेत्तोटकं दिव्यं प्रयतः शुचिमानसः । बाणस्यैव यथारुद्रस्तस्यैव वरदो भवेत्

yaḥ paṭhettoṭakaṁ divyaṁ prayataḥ śucimānasaḥ bāṇasyaiva yathārudrastasyaiva varado bhavet

जो कोई संयमित और शुद्ध मन से इस दिव्य तोटक स्तोत्र का पाठ करता है, उसके लिए भी रुद्र, बाण की भाँति, वरदाता बनते हैं।

श्लोक 62 (padma.3.15.62)

इमं स्तवं महादिव्यं श्रुत्वा देवो महेश्वरः । प्रसन्नस्तु तदा तस्य स्वयं देवो महेश्वरः

imaṁ stavaṁ mahādivyaṁ śrutvā devo maheśvaraḥ prasannastu tadā tasya svayaṁ devo maheśvaraḥ

इस महादिव्य स्तोत्र को सुनकर देव महेश्वर स्वयं ही उस पर प्रसन्न हो गए।

श्लोक 63 (padma.3.15.63)

ईश्वर उवाच । न भेतव्यं त्वया वत्स सौवर्णे तिष्ठ दानव । पुत्रपौत्रसपत्नीनां भार्याभृत्यजनैः सह

īśvara uvāca na bhetavyaṁ tvayā vatsa sauvarṇe tiṣṭha dānava putrapautrasapatnīnāṁ bhāryābhṛtyajanaiḥ saha

ईश्वर ने कहा — हे वत्स! तुझे भय नहीं करना चाहिए; हे दानव, अपने स्वर्णिम नगर में पुत्र-पौत्रों, सपत्नियों, भार्याओं और सेवकों सहित निवास कर।

श्लोक 64 (padma.3.15.64)

अद्यप्रभृति बाण त्वमवध्यस्त्रिदशैरपि । भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन पांडव

adyaprabhṛti bāṇa tvamavadhyastridaśairapi bhūyastasya varo datto devadevena pāṁḍava

हे बाण! आज से तू तीसों देवताओं द्वारा भी अवध्य होगा। हे पांडव! देवाधिदेव द्वारा उसे फिर से यह वरदान दिया गया।

श्लोक 65 (padma.3.15.65)

अक्षयश्चाव्ययो लोके विचचार ह निर्भयः । ततो निवारयामास रुद्र सप्तशिखं तथा

akṣayaścāvyayo loke vicacāra ha nirbhayaḥ tato nivārayāmāsa rudra saptaśikhaṁ tathā

वह अक्षय और अविनाशी होकर संसार में निर्भय होकर विचरण करने लगा। फिर रुद्र ने सप्त-ज्वाला वाले [नगर] को भी रोक दिया,

श्लोक 66 (padma.3.15.66)

तृतीयं रक्षितं तस्य शंकरेण महात्मना । भ्रमते गगने नित्यं रुद्रतेजः प्रभावतः

tṛtīyaṁ rakṣitaṁ tasya śaṁkareṇa mahātmanā bhramate gagane nityaṁ rudratejaḥ prabhāvataḥ

और महात्मा शंकर द्वारा उसका तीसरा नगर सुरक्षित रखा गया। वह रुद्र के तेज के प्रभाव से आकाश में सदा विचरण करता है।

श्लोक 67 (padma.3.15.67)

एवं तु त्रिपुरं दग्धं शंकरेण महात्मना । ज्वालामालाप्रदीप्तं तु पतितं धरणीतले

evaṁ tu tripuraṁ dagdhaṁ śaṁkareṇa mahātmanā jvālāmālāpradīptaṁ tu patitaṁ dharaṇītale

इस प्रकार महात्मा शंकर द्वारा त्रिपुर जला दिया गया; ज्वालाओं की माला से प्रदीप्त होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 68 (padma.3.15.68)

एकं निपातितं तस्य श्रीशैले त्रिपुरांतके । द्वितीयं पातितं तत्र पर्वतेऽमरकंटके

ekaṁ nipātitaṁ tasya śrīśaile tripurāṁtake dvitīyaṁ pātitaṁ tatra parvate'marakaṁṭake

उसका एक भाग त्रिपुरांतक क्षेत्र श्रीशैल में गिरा; दूसरा भाग वहीं अमरकंटक पर्वत पर गिरा।

श्लोक 69 (padma.3.15.69)

दग्धे तु त्रिपुरे राजन्रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता । ज्वलंतं पातितं तत्र तेन ज्वालेश्वरः स्मृतः

dagdhe tu tripure rājanrudrakoṭiḥ pratiṣṭhitā jvalaṁtaṁ pātitaṁ tatra tena jvāleśvaraḥ smṛtaḥ

हे राजन! त्रिपुर के जल जाने पर वहाँ एक करोड़ रुद्र प्रतिष्ठित हो गए। वहाँ गिरे हुए उस प्रज्वलित भाग के कारण वह स्थान ज्वालेश्वर नाम से स्मरण किया गया।

श्लोक 70 (padma.3.15.70)

ऊर्ध्वेन प्रस्थिता तस्य दिव्या ज्वाला दिवं गता । हाहाकारस्तदा जातो सदेवासुरकिंनरान्

ūrdhvena prasthitā tasya divyā jvālā divaṁ gatā hāhākārastadā jāto sadevāsurakiṁnarān

उसकी दिव्य ज्वाला ऊपर की ओर उठकर स्वर्ग तक पहुँच गई; तब देव, असुर और किन्नरों सहित सर्वत्र हाहाकार मच गया।

श्लोक 71 (padma.3.15.71)

तं शरं स्तंभयेद्रुद्रो माहेश्वरपुरोत्तमे । एवं व्रजेत यस्तस्मिन्पर्वतेऽमरकंटके

taṁ śaraṁ staṁbhayedrudro māheśvarapurottame evaṁ vrajeta yastasminparvate'marakaṁṭake

रुद्र उस बाण को माहेश्वर के श्रेष्ठ नगर में ही रोक देंगे। इस प्रकार जो कोई अमरकंटक पर्वत पर उस स्थान को जाता है,

श्लोक 72 (padma.3.15.72)

चतुर्द्दशभुवनानि सुभुक्त्वा पांडुनंदन । वर्षकोटिसहस्रं तु त्रिंशत्कोट्यस्तथा पराः

caturddaśabhuvanāni subhuktvā pāṁḍunaṁdana varṣakoṭisahasraṁ tu triṁśatkoṭyastathā parāḥ

हे पांडुनंदन! वह चौदह भुवनों का पूर्ण भोग करके, एक हजार करोड़ वर्ष और उसके ऊपर तीस करोड़ वर्ष और भी,

श्लोक 73 (padma.3.15.73)

ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिकः । पृथिव्यामेकच्छत्रेण भुंक्ते नास्त्यत्र संशयः

tato mahītalaṁ prāpya rājā bhavati dhārmikaḥ pṛthivyāmekacchatreṇa bhuṁkte nāstyatra saṁśayaḥ

फिर पृथ्वी पर आकर धार्मिक राजा बनता है। वह एकच्छत्र होकर पृथ्वी पर राज्य करता है, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 74 (padma.3.15.74)

एष पुण्यो महाराज सर्वतोऽमरकंटकः । चंद्र सूर्योपरागेषु गच्छेद्योऽमरकंटकम्

eṣa puṇyo mahārāja sarvato'marakaṁṭakaḥ caṁdra sūryoparāgeṣu gacchedyo'marakaṁṭakam

हे महाराज! यह अमरकंटक सब प्रकार से पुण्यमय है। जो कोई चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय अमरकंटक जाता है,

श्लोक 75 (padma.3.15.75)

अश्वमेधाद्दशगुणं प्रवदंति मनीषिणः । स्वर्गलोकमवाप्नोति दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम्

aśvamedhāddaśaguṇaṁ pravadaṁti manīṣiṇaḥ svargalokamavāpnoti dṛṣṭvā tatra maheśvaram

विद्वान उसे अश्वमेध यज्ञ से दस गुना अधिक फल बताते हैं; वहाँ महेश्वर का दर्शन कर वह स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 76 (padma.3.15.76)

संनिहत्या गमिष्यंति राहुग्रस्ते दिवाकरे । तदेव निखिलं पुण्यं पर्वतेऽमरकंटके

saṁnihatyā gamiṣyaṁti rāhugraste divākare tadeva nikhilaṁ puṇyaṁ parvate'marakaṁṭake

सूर्य के राहु द्वारा ग्रस्त होने पर वहाँ एकत्र होने वाले [तीर्थयात्री] उसी पूर्ण पुण्य को प्राप्त करते हैं, जो सब कुछ अमरकंटक पर्वत में ही निहित है।

श्लोक 77 (padma.3.15.77)

पुंडरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः । तत्र ज्वालेश्वरो नाम पर्वतेऽमरकंटके

puṁḍarīkasya yajñasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ tatra jvāleśvaro nāma parvate'marakaṁṭake

मनुष्य पुंडरीक यज्ञ का फल प्राप्त करता है। वहाँ अमरकंटक पर्वत पर ज्वालेश्वर नामक तीर्थ है,

श्लोक 78 (padma.3.15.78)

तत्र स्नात्वा दिवं यांति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः । ज्वालेश्वरे महाराज यस्तु प्राणान्परित्यजेत्

tatra snātvā divaṁ yāṁti ye mṛtāste'punarbhavāḥ jvāleśvare mahārāja yastu prāṇānparityajet

वहाँ स्नान करके जो मर जाते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं और पुनर्जन्म नहीं लेते। हे महाराज! ज्वालेश्वर में जो कोई प्राण त्यागता है,

श्लोक 79 (padma.3.15.79)

चंद्र सूर्योपरागे तु भक्त्यापि शृणु तत्फलम् । अमरा नाम देवास्ते पर्वतेऽमरकंटके

caṁdra sūryoparāge tu bhaktyāpi śṛṇu tatphalam amarā nāma devāste parvate'marakaṁṭake

चंद्र या सूर्य ग्रहण के समय भक्तिपूर्वक ऐसा करने का फल सुनो — अमरकंटक पर्वत पर 'अमर' नामक देवगण,

श्लोक 80 (padma.3.15.80)

रुद्रलोकमवाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम् । अमरेश्वरस्य देवस्य पर्वतस्य तटे जले

rudralokamavāpnoti yāvadābhūtasaṁplavam amareśvarasya devasya parvatasya taṭe jale

वह प्रलय-काल तक रुद्रलोक को प्राप्त करता है। अमरेश्वर देव के तट पर, पर्वत के जल में,

श्लोक 81 (padma.3.15.81)

कोटिश ऋषिमुख्यास्ते तपस्तप्यंति सुव्रताः । समंताद्योजनं राजन्क्षेत्रं चामरकंटकम्

koṭiśa ṛṣimukhyāste tapastapyaṁti suvratāḥ samaṁtādyojanaṁ rājankṣetraṁ cāmarakaṁṭakam

करोड़ों श्रेष्ठ ऋषि, सुव्रत होकर, तप करते हैं। हे राजन! चारों ओर एक योजन तक अमरकंटक का क्षेत्र फैला है।

श्लोक 82 (padma.3.15.82)

अकामो वा सकामो वा नर्मदायां शुभे जले । स्नात्वा मुच्येत पापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति

akāmo vā sakāmo vā narmadāyāṁ śubhe jale snātvā mucyeta pāpebhyo rudralokaṁ sa gacchati

इच्छारहित हो या इच्छा सहित, नर्मदा के शुभ जल में स्नान करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है और रुद्रलोक को जाता है।

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