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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 19

शुक्लतीर्थ की उत्पत्ति: मार्कंडेय को शिव का उपदेश

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (padma.3.19.1)

नारद उवाच । भार्गवेशं ततो गच्छेद्भक्त्या यत्र च विष्णुना । हुंकारितास्तु देवेन दानवाः प्रलयं गताः

nārada uvāca bhārgaveśaṁ tato gacchedbhaktyā yatra ca viṣṇunā huṁkāritāstu devena dānavāḥ pralayaṁ gatāḥ

नारद जी ने कहा — फिर भार्गवेश को जाए, जहाँ भक्तिपूर्वक विष्णु द्वारा ललकारे गए दानव विनाश को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 2 (padma.3.19.2)

तत्र स्नात्वा तु राजेंद्र सर्वपापैः प्रमुच्यते । शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिं शृणु त्वं पांडुनंदन

tatra snātvā tu rājeṁdra sarvapāpaiḥ pramucyate śuklatīrthasya cotpattiṁ śṛṇu tvaṁ pāṁḍunaṁdana

वहाँ स्नान करके, हे राजेंद्र! मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। हे पांडुनंदन! अब शुक्लतीर्थ की उत्पत्ति सुनो।

श्लोक 3 (padma.3.19.3)

हिमवच्छिखरे रम्ये नानाधातुविचित्रिते । तरुणादित्यसंकाशे तप्तकांचनसंनिभे

himavacchikhare ramye nānādhātuvicitrite taruṇādityasaṁkāśe taptakāṁcanasaṁnibhe

हिमालय के एक रमणीय शिखर पर, जो नाना धातुओं से विचित्र है, उगते सूर्य के समान, तपे हुए स्वर्ण के समान,

श्लोक 4 (padma.3.19.4)

वज्रस्फटिकसोपाने चित्रपट्टशिलातले । जांबूनदमये दिव्ये नाना पद्मोपशोभिते

vajrasphaṭikasopāne citrapaṭṭaśilātale jāṁbūnadamaye divye nānā padmopaśobhite

हीरे और स्फटिक की सीढ़ियों वाले, विचित्र पट्ट-शिलाओं के तल वाले, जाम्बूनद-स्वर्ण से बने, दिव्य, नाना कमलों से सुशोभित उस स्थान पर,

श्लोक 5 (padma.3.19.5)

तत्रासीनं महादेवं सर्वज्ञं प्रभुमव्ययम् । लोकानुग्राहकं शांतं गणवृंदैः समावृतम्

tatrāsīnaṁ mahādevaṁ sarvajñaṁ prabhumavyayam lokānugrāhakaṁ śāṁtaṁ gaṇavṛṁdaiḥ samāvṛtam

वहाँ बैठे हुए सर्वज्ञ, अव्यय प्रभु, लोकों पर अनुग्रह करने वाले, शांत महादेव को, गणों के समूहों से घिरे हुए,

श्लोक 6 (padma.3.19.6)

स्कंदनंदिमहाकालैर्वीरभद्र गणादिभिः । उमया सहितं देवं मार्कंडः परिपृच्छति

skaṁdanaṁdimahākālairvīrabhadra gaṇādibhiḥ umayā sahitaṁ devaṁ mārkaṁḍaḥ paripṛcchati

स्कंद, नंदी, महाकाल, वीरभद्र आदि गणों सहित, उमा सहित उन देव से मार्कंडेय ने पूछा —

श्लोक 7 (padma.3.19.7)

देवदेव महादेव इन्द्र कामादि संस्तुत । संसारभवभीतोहं सुखोपायं ब्रवीहि मे

devadeva mahādeva indra kāmādi saṁstuta saṁsārabhavabhītohaṁ sukhopāyaṁ bravīhi me

हे देवाधिदेव महादेव! इंद्र, काम आदि द्वारा स्तुत! मैं संसार-भव से भयभीत हूँ; मुझे सुख का उपाय बताइए।

श्लोक 8 (padma.3.19.8)

भगवन्भूतभव्येश सर्वपापप्रणाशनम् । तीर्थानां परमं तीर्थं तद्वदस्व महेश्वर

bhagavanbhūtabhavyeśa sarvapāpapraṇāśanam tīrthānāṁ paramaṁ tīrthaṁ tadvadasva maheśvara

हे भगवन, भूत-भव्य के स्वामी! समस्त पापों का नाश करने वाला, तीर्थों में परम तीर्थ — वह मुझे बताइए, हे महेश्वर!

श्लोक 9 (padma.3.19.9)

ईश्वर उवाच । शृणुविप्र महाभाग सर्वशास्त्रविशारद । स्नानादि कुरु गच्छ त्वं ऋषिसंघैस्समावृतः

īśvara uvāca śṛṇuvipra mahābhāga sarvaśāstraviśārada snānādi kuru gaccha tvaṁ ṛṣisaṁghaissamāvṛtaḥ

ईश्वर ने कहा — हे विप्र, हे महाभाग्यशाली, हे समस्त शास्त्रों में निपुण! सुनो — तुम स्नान आदि करके, ऋषि-समूहों से घिरे हुए जाओ,

श्लोक 10 (padma.3.19.10)

मन्वत्रि याज्ञवल्क्याश्च काश्यपश्चैव अंगिराः । यमापस्तंब संवर्ताः कात्यायनबृहस्पती

manvatri yājñavalkyāśca kāśyapaścaiva aṁgirāḥ yamāpastaṁba saṁvartāḥ kātyāyanabṛhaspatī

मनु, अत्रि, याज्ञवल्क्य, काश्यप, अंगिरा, यम, आपस्तंब, संवर्त, कात्यायन और बृहस्पति,

श्लोक 11 (padma.3.19.11)

नारदो गौतमश्चैव पृच्छंति धर्मकांक्षिणः । गंगाकनखले पुण्या प्रयागं पुष्करं गया

nārado gautamaścaiva pṛcchaṁti dharmakāṁkṣiṇaḥ gaṁgākanakhale puṇyā prayāgaṁ puṣkaraṁ gayā

और नारद तथा गौतम भी, धर्म की कामना करते हुए, पूछते हैं — गंगा कनखल में पुण्यमयी है, तथा प्रयाग, पुष्कर, गया,

श्लोक 12 (padma.3.19.12)

कुरुक्षेत्रं तु पुण्यं च राहुग्रस्ते दिवाकरे । दिवा वा यदि वा रात्रौ शुक्लतीर्थं महाफलम्

kurukṣetraṁ tu puṇyaṁ ca rāhugraste divākare divā vā yadi vā rātrau śuklatīrthaṁ mahāphalam

और पुण्यमय कुरुक्षेत्र भी; परंतु सूर्य के राहु द्वारा ग्रस्त होने पर, चाहे दिन में हो या रात्रि में, शुक्लतीर्थ महाफलदायी है।

श्लोक 13 (padma.3.19.13)

दर्शनात्स्पर्शनाच्चैव स्नानाद्ध्यानात्तपोर्जनात् । होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थफलं महत्

darśanātsparśanāccaiva snānāddhyānāttaporjanāt homāccaivopavāsācca śuklatīrthaphalaṁ mahat

दर्शन से, स्पर्श से, स्नान से, ध्यान से, तप से, हवन से और उपवास से भी — शुक्लतीर्थ का फल महान है।

श्लोक 14 (padma.3.19.14)

शुक्लतीर्थं महापुण्यं नद्यां तु संव्यवस्थितम् । चाणिक्योनाम राजर्षिः सिद्धिं तत्र समागतः

śuklatīrthaṁ mahāpuṇyaṁ nadyāṁ tu saṁvyavasthitam cāṇikyonāma rājarṣiḥ siddhiṁ tatra samāgataḥ

अत्यंत पुण्यमय शुक्लतीर्थ एक नदी पर स्थित है; चाणिक्य नामक राजर्षि ने वहाँ सिद्धि प्राप्त की थी।

श्लोक 15 (padma.3.19.15)

एतत्क्षेत्रं समुत्पन्नं योजनावृत्तिसंस्थितम् । शुक्लतीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्

etatkṣetraṁ samutpannaṁ yojanāvṛttisaṁsthitam śuklatīrthaṁ mahāpuṇyaṁ sarvapāpapraṇāśanam

यह क्षेत्र एक योजन तक विस्तृत होकर उत्पन्न हुआ है; अत्यंत पुण्यमय शुक्लतीर्थ समस्त पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 16 (padma.3.19.16)

पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति । अहमत्र ऋषिश्रेष्ठ तिष्ठामि ह्युमया सह

pādapāgreṇa dṛṣṭena brahmahatyāṁ vyapohati ahamatra ṛṣiśreṣṭha tiṣṭhāmi hyumayā saha

वहाँ के वृक्षों के अग्रभाग को देखने मात्र से मनुष्य ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है। हे मुनिश्रेष्ठ! मैं वहाँ उमा सहित निवास करता हूँ।

श्लोक 17 (padma.3.19.17)

वैशाखे विमले मासि कृष्णपक्षे चतुर्दशी । कैलासाच्चापि निर्गत्य तत्र संनिहितो ह्यहम्

vaiśākhe vimale māsi kṛṣṇapakṣe caturdaśī kailāsāccāpi nirgatya tatra saṁnihito hyaham

पवित्र वैशाख मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को, कैलास से निकलकर भी मैं वहाँ उपस्थित रहता हूँ।

श्लोक 18 (padma.3.19.18)

देवकिन्नरगंधर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा । गणाश्चाप्सरसो नागाः सर्वे देवाः समागताः

devakinnaragaṁdharvāḥ siddhavidyādharāstathā gaṇāścāpsaraso nāgāḥ sarve devāḥ samāgatāḥ

देव, किन्नर, गंधर्व, सिद्ध और विद्याधर भी, गण, अप्सराएँ और नाग — सभी देवगण वहाँ एकत्रित होते हैं,

श्लोक 19 (padma.3.19.19)

गगनस्थास्तु तिष्ठंति विमानैः सर्वकामकैः । शुक्लतीर्थे तु राजेंद्र आगता धर्मकांक्षिणः

gaganasthāstu tiṣṭhaṁti vimānaiḥ sarvakāmakaiḥ śuklatīrthe tu rājeṁdra āgatā dharmakāṁkṣiṇaḥ

और आकाश में सर्वकामनापूर्ण विमानों में स्थित रहते हैं। हे राजेंद्र! शुक्लतीर्थ में धर्मार्थी लोग आते हैं,

श्लोक 20 (padma.3.19.20)

रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा । आजन्मसंचितं पापं शुक्लतीर्थे व्यपोहति

rajakena yathā vastraṁ śuklaṁ bhavati vāriṇā ājanmasaṁcitaṁ pāpaṁ śuklatīrthe vyapohati

जैसे धोबी द्वारा जल से वस्त्र श्वेत हो जाता है, वैसे ही जन्म से संचित पाप शुक्लतीर्थ में दूर हो जाता है।

श्लोक 21 (padma.3.19.21)

स्नानं दानं महापुण्यं मार्कंड ऋषिसत्तम । शुक्लतीर्थात्परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति

snānaṁ dānaṁ mahāpuṇyaṁ mārkaṁḍa ṛṣisattama śuklatīrthātparaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

हे मुनिसत्तम मार्कंडेय! वहाँ स्नान और दान अत्यंत पुण्यमय है; शुक्लतीर्थ से बढ़कर कोई तीर्थ न हुआ है, न होगा।

श्लोक 22 (padma.3.19.22)

पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः । अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति

pūrve vayasi karmāṇi kṛtvā pāpāni mānavaḥ ahorātropavāsena śuklatīrthe vyapohati

पूर्व अवस्था में पाप-कर्म करने वाला मनुष्य भी शुक्लतीर्थ में एक दिन-रात के उपवास से उन्हें दूर कर देता है।

श्लोक 23 (padma.3.19.23)

तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैर्दानेन वा पुनः । देवदानेन या पुष्टिर्न सा क्रतुशतैरपि

tapasā brahmacaryeṇa yajñairdānena vā punaḥ devadānena yā puṣṭirna sā kratuśatairapi

तप से, ब्रह्मचर्य से, यज्ञों से या दान से भी जो तृप्ति मिलती है, देवताओं को अर्पण से मिलने वाली तृप्ति सैकड़ों यज्ञों से भी नहीं मिलती।

श्लोक 24 (padma.3.19.24)

कार्तिकस्य च मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी । घृतेन स्नापयेद्देवमुपोष्य परमेश्वरम्

kārtikasya ca māsasya kṛṣṇapakṣe caturdaśī ghṛtena snāpayeddevamupoṣya parameśvaram

कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को उपवास करके परमेश्वर को घी से स्नान कराना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.3.19.25)

एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेच्चैश्वरात्पदात् । शुक्लतीर्थं परं तीर्थमृषिसिद्धनिषेवितम्

ekaviṁśatkulopeto na cyaveccaiśvarātpadāt śuklatīrthaṁ paraṁ tīrthamṛṣisiddhaniṣevitam

इक्कीस पीढ़ियों सहित भी वह ऐश्वर्य-पद से च्युत नहीं होता। शुक्लतीर्थ परम तीर्थ है, ऋषियों और सिद्धों द्वारा सेवित।

श्लोक 26 (padma.3.19.26)

तत्र स्नात्वा ततो राजन्पुनर्जन्म न विद्यते । स्नात्वा वै शुक्लतीर्थेपि अर्चयेद्वृषभध्वजम्

tatra snātvā tato rājanpunarjanma na vidyate snātvā vai śuklatīrthepi arcayedvṛṣabhadhvajam

वहाँ स्नान करके, हे राजन! फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता। शुक्लतीर्थ में स्नान करके वृषभध्वज (शिव) की पूजा भी करनी चाहिए।

श्लोक 27 (padma.3.19.27)

जागरं कारयेत्तत्र नृत्यगीतादिमंगलैः । प्रभाते शुक्लतीर्थे तु स्नानं वै देवतार्चनम्

jāgaraṁ kārayettatra nṛtyagītādimaṁgalaiḥ prabhāte śuklatīrthe tu snānaṁ vai devatārcanam

वहाँ नृत्य-गीत आदि मंगल कार्यों से रात्रि-जागरण करना चाहिए। प्रातःकाल शुक्लतीर्थ में स्नान और देव-पूजन करके,

श्लोक 28 (padma.3.19.28)

आचार्यं भोजयेत्पश्चाच्छिवव्रतपरः शुचिः । भोजनं च यथाशक्त्या वित्तशाठ्यं न कारयेत्

ācāryaṁ bhojayetpaścācchivavrataparaḥ śuciḥ bhojanaṁ ca yathāśaktyā vittaśāṭhyaṁ na kārayet

फिर शिव-व्रत में तत्पर, पवित्र होकर आचार्य को भोजन कराए, और शक्ति के अनुसार भोजन दे, धन में कंजूसी न करे।

श्लोक 29 (padma.3.19.29)

प्रदक्षिणं ततः कृत्वा शनैर्देवांतिकं व्रजेत् । एवं वै कुरुते यस्तु तस्य पुण्यफलं शृणु

pradakṣiṇaṁ tataḥ kṛtvā śanairdevāṁtikaṁ vrajet evaṁ vai kurute yastu tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

फिर प्रदक्षिणा करके धीरे-धीरे देव के समीप जाए। जो कोई ऐसा करता है, उसके पुण्य का फल सुनो —

श्लोक 30 (padma.3.19.30)

दिव्ययानसमारूढस्तूयमानोऽप्सरोगणैः । शिवतुल्यबलोपेतस्तिष्ठत्याभूतसंप्लवम्

divyayānasamārūḍhastūyamāno'psarogaṇaiḥ śivatulyabalopetastiṣṭhatyābhūtasaṁplavam

दिव्य यान पर बैठा हुआ, अप्सराओं के समूहों द्वारा स्तुत, शिव के समान बल से युक्त होकर वह प्रलयकाल तक स्थिर रहता है।

श्लोक 31 (padma.3.19.31)

शुक्लतीर्थे तु या नारी ददाति कनकं शुभम् । घृतेन स्नापयेद्देवं कुमारं चाभिपूजयेत्

śuklatīrthe tu yā nārī dadāti kanakaṁ śubham ghṛtena snāpayeddevaṁ kumāraṁ cābhipūjayet

शुक्लतीर्थ में जो स्त्री शुभ सुवर्ण दान देती है, घी से देव को स्नान कराती है और कुमार (स्कंद) की पूजा करती है,

श्लोक 32 (padma.3.19.32)

एवं या कुरुते भक्त्या तस्याः पुण्यफलं शृणु । मोदते देवलोकस्था यावदिंद्राश्चतुर्दश

evaṁ yā kurute bhaktyā tasyāḥ puṇyaphalaṁ śṛṇu modate devalokasthā yāvadiṁdrāścaturdaśa

जो स्त्री भक्तिपूर्वक ऐसा करती है, उसके पुण्य का फल सुनो — वह चौदह इंद्रों के काल तक देवलोक में रहकर आनंद मनाती है।

श्लोक 33 (padma.3.19.33)

अयने वा चतुर्दश्यां संक्रांतौ विषुवे तथा । स्नात्वा तु सोपवासः स निर्जितात्मा समाहितः

ayane vā caturdaśyāṁ saṁkrāṁtau viṣuve tathā snātvā tu sopavāsaḥ sa nirjitātmā samāhitaḥ

अयन के समय, या चतुर्दशी को, संक्रांति में, या विषुव में — स्नान करके, उपवास करके, आत्मसंयमी और शांतचित्त होकर,

श्लोक 34 (padma.3.19.34)

दानं दद्याद्यथाशक्त्या प्रीयेतां हरिशंकरौ । शुक्लतीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्

dānaṁ dadyādyathāśaktyā prīyetāṁ hariśaṁkarau śuklatīrthaprabhāveṇa sarvaṁ bhavati cākṣayam

शक्ति के अनुसार दान दे, जिससे हरि और शंकर प्रसन्न हों; शुक्लतीर्थ के प्रभाव से सब कुछ अक्षय हो जाता है।

श्लोक 35 (padma.3.19.35)

अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवंतमथापि वा । उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु

anāthaṁ durgataṁ vipraṁ nāthavaṁtamathāpi vā udvāhayati yastīrthe tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

जो कोई अनाथ, दुर्गत ब्राह्मण का, अथवा नाथ वाले का भी, इस तीर्थ में विवाह कराता है, उसके पुण्य का फल सुनो —

श्लोक 36 (padma.3.19.36)

यावत्तद्रोमसंख्या तु तत्प्रसूतिकुलेषु च । तावद्वर्षसहस्राणि शिवलोके महीयते

yāvattadromasaṁkhyā tu tatprasūtikuleṣu ca tāvadvarṣasahasrāṇi śivaloke mahīyate

जितने रोम होते हैं और उनकी संतति के कुल में जितने होते हैं, उतने ही हजार वर्षों तक वह शिवलोक में सम्मानित रहता है।

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