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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 31

देवदूत का उपदेश और विकुंडल के भ्राता की मुक्ति

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (padma.3.31.1)

नारद उवाच । ततो हृष्टमनाः सोऽथ दूतं पप्रच्छ तं पथि । संदेहं हृदि कृत्वा तु विस्मयं परमं गतः । विचारयन्हृदि स्वर्गः कस्य हेतोः फलं मम

nārada uvāca tato hṛṣṭamanāḥ so'tha dūtaṁ papraccha taṁ pathi saṁdehaṁ hṛdi kṛtvā tu vismayaṁ paramaṁ gataḥ vicārayanhṛdi svargaḥ kasya hetoḥ phalaṁ mama

नारद जी ने कहा — तब हर्षित मन वाले उस विकुंडल ने मार्ग में ही उस दूत से पूछा, हृदय में संशय उत्पन्न कर वह परम आश्चर्य को प्राप्त हुआ, मन ही मन विचार करते हुए — "किस कारण से मुझे स्वर्ग-रूपी फल प्राप्त हुआ?"

श्लोक 2 (padma.3.31.2)

विकुंडल उवाच । हे दूतवर पृच्छामि संशयं त्वामहं परम् । आवां जातौ कुले तुल्ये तुल्यं कर्म तथा कृतम्

vikuṁḍala uvāca he dūtavara pṛcchāmi saṁśayaṁ tvāmahaṁ param āvāṁ jātau kule tulye tulyaṁ karma tathā kṛtam

विकुंडल ने कहा — हे श्रेष्ठ दूत! मैं आपसे अपना परम संशय पूछता हूँ। हम दोनों समान कुल में उत्पन्न हुए और समान कर्म ही किए।

श्लोक 3 (padma.3.31.3)

दुर्मृत्युरपि तुल्योभूत्तुल्यो दृष्टो यमस्तथा । कथं स नरके क्षिप्तस्तुल्यकर्म्मा ममाग्रजः

durmṛtyurapi tulyobhūttulyo dṛṣṭo yamastathā kathaṁ sa narake kṣiptastulyakarmmā mamāgrajaḥ

हमारी दुर्मृत्यु भी समान हुई और यम ने भी हम दोनों को समान दृष्टि से देखा। फिर समान कर्म करने वाला मेरा बड़ा भाई नरक में कैसे डाल दिया गया?

श्लोक 4 (padma.3.31.4)

ममाभवत्कथं नाकमिति मे छिंधि संशयम् । देवदूत न पश्यामि मम स्वर्गस्य कारणम्

mamābhavatkathaṁ nākamiti me chiṁdhi saṁśayam devadūta na paśyāmi mama svargasya kāraṇam

मुझे स्वर्ग कैसे प्राप्त हुआ? मेरे इस संशय को दूर कीजिए। हे देवदूत! मुझे अपने स्वर्ग-प्राप्ति का कोई कारण दिखाई नहीं देता।

श्लोक 5 (padma.3.31.5)

देवदूत उवाच । माता पिता सुतो जाया स्वसा भ्राता विकुंडल । जन्महेतोरियं संज्ञा जंतोः कर्म्मोपभुक्तये

devadūta uvāca mātā pitā suto jāyā svasā bhrātā vikuṁḍala janmahetoriyaṁ saṁjñā jaṁtoḥ karmmopabhuktaye

देवदूत ने कहा — हे विकुंडल! माता, पिता, पुत्र, पत्नी, बहन, भाई — ये सब तो जन्म के कारण दी गई संज्ञाएँ मात्र हैं, प्राणी अपने ही कर्मों का फल भोगने के लिए इन संबंधों में आता है।

श्लोक 6 (padma.3.31.6)

एकस्मिन्पादपे यद्वच्छकुनानां समागमः । यद्यत्समीहितं कर्म कुरुते पूर्वभावितः

ekasminpādape yadvacchakunānāṁ samāgamaḥ yadyatsamīhitaṁ karma kurute pūrvabhāvitaḥ

जैसे पक्षी संयोगवश एक ही वृक्ष पर आ मिलते हैं, वैसे ही प्राणी अपने पूर्वजन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर जो-जो कर्म करना चाहता है, वही करता है।

श्लोक 7 (padma.3.31.7)

तस्य तस्य फलं भुंक्ते कर्म्मणः पुरुषः सदा । सत्यं वदामि ते प्रीत्या नरैः कर्म्म शुभाशुभम्

tasya tasya phalaṁ bhuṁkte karmmaṇaḥ puruṣaḥ sadā satyaṁ vadāmi te prītyā naraiḥ karmma śubhāśubham

मनुष्य सदैव अपने प्रत्येक कर्म का फल स्वयं ही भोगता है। मैं तुम्हें प्रेमपूर्वक सत्य कहता हूँ — शुभ और अशुभ कर्म मनुष्यों के अपने ही होते हैं।

श्लोक 8 (padma.3.31.8)

स्वकृतं भुज्यते वैश्य कालेकाले पुनःपुनः । एकः करोति कर्माणि एकस्तत्फलमश्नुते

svakṛtaṁ bhujyate vaiśya kālekāle punaḥpunaḥ ekaḥ karoti karmāṇi ekastatphalamaśnute

हे वैश्य! अपने किए हुए कर्मों को समय-समय पर बार-बार भोगना पड़ता है। कर्म एक ही व्यक्ति करता है, और उसका फल भी वही अकेला भोगता है।

श्लोक 9 (padma.3.31.9)

अन्यो न लिप्यते वैश्य कर्मणान्यस्य कुत्रचित् । अपतन्नरके पापैस्तवभ्राता सुदारुणैः । त्वं च धर्मेण धर्मज्ञ स्वर्गं प्राप्नोषि शाश्वतम्

anyo na lipyate vaiśya karmaṇānyasya kutracit apatannarake pāpaistavabhrātā sudāruṇaiḥ tvaṁ ca dharmeṇa dharmajña svargaṁ prāpnoṣi śāśvatam

हे वैश्य! दूसरे के कर्म से कोई अन्य कहीं भी लिप्त नहीं होता। तुम्हारा भाई अपने ही अत्यंत भयंकर पापों के कारण नरक में गिरा, और तुम, हे धर्मज्ञ! अपने ही धर्माचरण से शाश्वत स्वर्ग को प्राप्त हुए हो।

श्लोक 10 (padma.3.31.10)

विकुंडल उवाच । आबाल्यान्मम पापेषु न पुण्येषु रतं मनः । अस्मिञ्जन्मनि हे दूत दुष्कृतं हि कृतं मया

vikuṁḍala uvāca ābālyānmama pāpeṣu na puṇyeṣu rataṁ manaḥ asmiñjanmani he dūta duṣkṛtaṁ hi kṛtaṁ mayā

विकुंडल ने कहा — बचपन से ही मेरा मन पापों में ही रमा रहा, पुण्यों में कभी नहीं। हे दूत! इस जन्म में मैंने केवल दुष्कर्म ही किए हैं।

श्लोक 11 (padma.3.31.11)

देवदूत न जानामि सुकृतं कर्म चात्मनः । यदि जानासि मत्पुण्यं तन्मे त्वं कृपया वद

devadūta na jānāmi sukṛtaṁ karma cātmanaḥ yadi jānāsi matpuṇyaṁ tanme tvaṁ kṛpayā vada

हे देवदूत! मुझे अपने किसी सुकृत कर्म का ज्ञान नहीं है। यदि आप मेरा कोई पुण्य जानते हैं, तो कृपा करके मुझे बताइए।

श्लोक 12 (padma.3.31.12)

देवदूत उवाच । शृणु वैश्य प्रवक्ष्यामि यत्त्वया पुण्यमर्जितम् । जानामि तदहं सर्वं न त्वं वेत्सि सुनिश्चितम्

devadūta uvāca śṛṇu vaiśya pravakṣyāmi yattvayā puṇyamarjitam jānāmi tadahaṁ sarvaṁ na tvaṁ vetsi suniścitam

देवदूत ने कहा — हे वैश्य! सुनो, मैं बताता हूँ कि तुमने कौन-सा पुण्य अर्जित किया था। मैं वह सब जानता हूँ, तुम निश्चय ही नहीं जानते।

श्लोक 13 (padma.3.31.13)

हरिमित्रसुतो विप्रः सुमित्रो वेदपारगः । आसीत्तस्याश्रमः पुण्यो यमुना दक्षिणेतटे

harimitrasuto vipraḥ sumitro vedapāragaḥ āsīttasyāśramaḥ puṇyo yamunā dakṣiṇetaṭe

हरिमित्र का पुत्र सुमित्र नामक एक ब्राह्मण था, जो वेदों का पारगामी विद्वान था। यमुना के दक्षिणी तट पर उसका पवित्र आश्रम था।

श्लोक 14 (padma.3.31.14)

तेन सख्यं वने तस्मिंस्तव जातं विशांवर । तत्संगेन त्वया स्नातं माघमासद्वयं तथा

tena sakhyaṁ vane tasmiṁstava jātaṁ viśāṁvara tatsaṁgena tvayā snātaṁ māghamāsadvayaṁ tathā

हे विशांवर! उस वन में उसके साथ तुम्हारी मित्रता हुई थी। उसी संगति के कारण तुमने वहाँ माघ मास के दो महीने स्नान किया था।

श्लोक 15 (padma.3.31.15)

कालिंदी पुण्यपानीये सर्वपापहरे वरे । तत्तीर्थे लोकविख्याते नाम्ना पापप्रणाशने

kāliṁdī puṇyapānīye sarvapāpahare vare tattīrthe lokavikhyāte nāmnā pāpapraṇāśane

कालिंदी के उस पवित्र, सर्वपापहारी जल में, संसार में विख्यात उस तीर्थ में, जिसका नाम ही 'पापप्रणाशन' है —

श्लोक 16 (padma.3.31.16)

एकेन सर्वपापेभ्यो विमुक्तस्त्वं विशांपते । द्वितीयमाघपुण्येन प्राप्तः स्वर्गस्त्वयानघ

ekena sarvapāpebhyo vimuktastvaṁ viśāṁpate dvitīyamāghapuṇyena prāptaḥ svargastvayānagha

हे विशांपते! उस पहले महीने से ही तुम सब पापों से मुक्त हो गए थे, और हे निष्पाप! दूसरे माघ मास के पुण्य से ही तुमने स्वर्ग प्राप्त किया।

श्लोक 17 (padma.3.31.17)

त्वं तत्पुण्यप्रभावेण मोदस्व सततं दिवि । नरकेषु तव भ्राता महतीं पापयातनाम्

tvaṁ tatpuṇyaprabhāveṇa modasva satataṁ divi narakeṣu tava bhrātā mahatīṁ pāpayātanām

उसी पुण्य के प्रभाव से तुम स्वर्ग में सदैव आनंदित रहो। परंतु तुम्हारा भाई नरकों में अपने पापों की भीषण यातना भोग रहा है —

श्लोक 18 (padma.3.31.18)

छिद्यमानोऽसिपत्रैश्च भिद्यमानस्तु मुद्गरैः । चूर्ण्यमानः शिलापृष्ठे तप्तांगारेषु भर्जितः

chidyamāno'sipatraiśca bhidyamānastu mudgaraiḥ cūrṇyamānaḥ śilāpṛṣṭhe taptāṁgāreṣu bharjitaḥ

वह तलवार जैसी धार वाले पत्तों से काटा जा रहा है, मुद्गरों से पीटा जा रहा है, शिला पर पीसा जा रहा है और धधकते अंगारों पर भूना जा रहा है।

श्लोक 19 (padma.3.31.19)

इति दूतवचः श्रुत्वा भ्रातृदुःखेन दुःखितः । पुलकांकित सर्वांगो दीनोऽसौ विनयान्वितः

iti dūtavacaḥ śrutvā bhrātṛduḥkhena duḥkhitaḥ pulakāṁkita sarvāṁgo dīno'sau vinayānvitaḥ

दूत के इन वचनों को सुनकर, भाई के दुःख से दुःखी हुए, समस्त शरीर पर रोमांच से भरे उस दीन विकुंडल ने विनयपूर्वक —

श्लोक 20 (padma.3.31.20)

उवाच तं देवदूतं मधुरं निपुणं वचः । मैत्री सप्तपदी साधो सतां भवति सत्फला

uvāca taṁ devadūtaṁ madhuraṁ nipuṇaṁ vacaḥ maitrī saptapadī sādho satāṁ bhavati satphalā

— उस देवदूत से मधुर और कुशल वचन कहे — "हे साधु! सज्जनों की मात्र सात कदम की मैत्री भी सच्चा फल देने वाली होती है।"

श्लोक 21 (padma.3.31.21)

मित्रभावं विचिंत्य त्वं मामुपाकर्तुमर्हसि । ततो हि श्रोतुमिच्छामि सर्वज्ञस्त्वं मतो मम

mitrabhāvaṁ viciṁtya tvaṁ māmupākartumarhasi tato hi śrotumicchāmi sarvajñastvaṁ mato mama

हमारी मित्रता का विचार करके तुम्हें मेरी सहायता करनी चाहिए। अतः अब मैं सुनना चाहता हूँ — मैं तुम्हें सर्वज्ञ मानता हूँ।

श्लोक 22 (padma.3.31.22)

यमलोकं न पश्यंति कर्मणा केन मानवाः । गच्छंति निरयं येन तन्मे त्वं कृपया वद

yamalokaṁ na paśyaṁti karmaṇā kena mānavāḥ gacchaṁti nirayaṁ yena tanme tvaṁ kṛpayā vada

किन कर्मों से मनुष्य यमलोक को नहीं देखते और किनसे नरक जाते हैं — कृपया मुझे यह बताइए।

श्लोक 23 (padma.3.31.23)

देवदूत उवाच । सम्यक्पृष्टं त्वया वैश्य नष्टपापोऽसि सांप्रतम् । विशुद्धे हृदये पुंसां बुद्धिः श्रेयसि जायते

devadūta uvāca samyakpṛṣṭaṁ tvayā vaiśya naṣṭapāpo'si sāṁpratam viśuddhe hṛdaye puṁsāṁ buddhiḥ śreyasi jāyate

देवदूत ने कहा — हे वैश्य! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है, अब तुम पापरहित हो चुके हो। जब मनुष्य का हृदय शुद्ध हो जाता है, तभी उसकी बुद्धि कल्याण की ओर उन्मुख होती है।

श्लोक 24 (padma.3.31.24)

यद्यप्यवसरोनास्ति मम सेवापरस्य वै । तथापि च तव स्नेहात्प्रवक्ष्यामि यथामति

yadyapyavasaronāsti mama sevāparasya vai tathāpi ca tava snehātpravakṣyāmi yathāmati

यद्यपि मुझे अपनी सेवा में लगे रहने के कारण अवकाश नहीं है, फिर भी तुम्हारे स्नेहवश मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हें बताऊँगा।

श्लोक 25 (padma.3.31.25)

कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा । परपीडां न कुर्वंति न ते यांति यमालयम्

karmaṇā manasā vācā sarvāvasthāsu sarvadā parapīḍāṁ na kurvaṁti na te yāṁti yamālayam

जो लोग कर्म, मन और वचन से, सभी अवस्थाओं में सदैव दूसरों को पीड़ा नहीं पहुँचाते, वे यमलोक को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 26 (padma.3.31.26)

न वेदैर्न च दानैश्च न तपोभिर्न चाध्वरैः । कथंचित्स्वर्गतिं यांति पुरुषाः प्राणिहिंसकाः

na vedairna ca dānaiśca na tapobhirna cādhvaraiḥ kathaṁcitsvargatiṁ yāṁti puruṣāḥ prāṇihiṁsakāḥ

वेदों से, दान से, तप से अथवा यज्ञों से — किसी भी प्रकार प्राणियों की हिंसा करने वाले पुरुष स्वर्गगति को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 27 (padma.3.31.27)

अहिंसा परमो धर्मो ह्यहिंसैव परं तपः । अहिंसा परमं दानमित्याहुर्मुनयः सदा

ahiṁsā paramo dharmo hyahiṁsaiva paraṁ tapaḥ ahiṁsā paramaṁ dānamityāhurmunayaḥ sadā

अहिंसा ही परम धर्म है, अहिंसा ही परम तप है। अहिंसा ही परम दान है — ऐसा मुनियों ने सदा कहा है।

श्लोक 28 (padma.3.31.28)

मशकान्सरीसृपान्दंशान्यूकाद्यान्मानवांस्तथा । आत्मौपम्येन पश्यंति मानवा ये दयालवः

maśakānsarīsṛpāndaṁśānyūkādyānmānavāṁstathā ātmaupamyena paśyaṁti mānavā ye dayālavaḥ

जो दयालु मनुष्य मच्छर, रेंगने वाले जीव, डंक मारने वाले कीड़े, जूँ आदि तथा मनुष्यों को भी अपने समान ही देखते हैं —

श्लोक 29 (padma.3.31.29)

तप्तांगारमयस्कीलं मादंप्रेतरंगिणीम् । दुर्गतिं नैव गच्छंति कृतांतस्य च ते नराः

taptāṁgāramayaskīlaṁ mādaṁpretaraṁgiṇīm durgatiṁ naiva gacchaṁti kṛtāṁtasya ca te narāḥ

— वे मनुष्य कभी भी तप्त अंगारों वाली, लोहे की कीलों वाली, मादक प्रेतरंगिणी नामक अथवा यमराज की भयानक दुर्गति को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 30 (padma.3.31.30)

भूतानि येऽत्र हिंसंति जलस्थलचराणि च । जीवनार्थं च ते यांति कालसूत्रं च दुर्गतिम्

bhūtāni ye'tra hiṁsaṁti jalasthalacarāṇi ca jīvanārthaṁ ca te yāṁti kālasūtraṁ ca durgatim

जो लोग अपनी आजीविका के लिए जल और थल में विचरने वाले प्राणियों की हिंसा करते हैं, वे कालसूत्र नामक नरक तथा अन्य दुर्गतियों को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 31 (padma.3.31.31)

श्वमांसभोजनास्तत्र पूयशोणितपायिनः । मज्जंतश्च वसापंके दष्टाः कीटैरधोमुखैः

śvamāṁsabhojanāstatra pūyaśoṇitapāyinaḥ majjaṁtaśca vasāpaṁke daṣṭāḥ kīṭairadhomukhaiḥ

वहाँ उन्हें कुत्ते का मांस खिलाया जाता है, पीब और रक्त पिलाया जाता है, वसा के दलदल में डुबोया जाता है और सिर नीचे लटकाकर कीड़ों से डँसवाया जाता है।

श्लोक 32 (padma.3.31.32)

परस्परं च खादंतो ध्वांते चान्योन्य घातिनः । वसंति कल्पानेकांस्ते रुदंतो दारुणं रवम्

parasparaṁ ca khādaṁto dhvāṁte cānyonya ghātinaḥ vasaṁti kalpānekāṁste rudaṁto dāruṇaṁ ravam

वे परस्पर एक-दूसरे को खाते हुए, अंधकार में एक-दूसरे का वध करते हुए, अनेक कल्पों तक भयानक चीत्कार करते हुए वहाँ निवास करते हैं।

श्लोक 33 (padma.3.31.33)

कृमियोनि शतं गत्वा स्थावराः स्युश्चिरं तु ते । ततोच्छंति ते क्रूरास्तिर्यग्योनि शतेषु च

kṛmiyoni śataṁ gatvā sthāvarāḥ syuściraṁ tu te tatocchaṁti te krūrāstiryagyoni śateṣu ca

सौ बार कृमि-योनि में जन्म लेकर वे दीर्घकाल तक स्थावर (वृक्षादि) योनि में रहते हैं, फिर वे क्रूर जीव सैकड़ों तिर्यक् योनियों में उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 34 (padma.3.31.34)

पश्चाद्भवंति जातांधाः काणाः कुब्जाश्च पंगवः । दरिद्राश्चांगहीनाश्च मानुषाः प्राणिहिंसकाः

paścādbhavaṁti jātāṁdhāḥ kāṇāḥ kubjāśca paṁgavaḥ daridrāścāṁgahīnāśca mānuṣāḥ prāṇihiṁsakāḥ

उसके पश्चात् वे प्राणि-हिंसक मनुष्य जन्मांध, काने, कुबड़े, लंगड़े, दरिद्र तथा अंगहीन होकर उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 35 (padma.3.31.35)

तस्माद्वैश्य परत्रेह कर्मणा मनसा गिरा । लोकद्वयसुखप्रेप्सुर्धर्मज्ञो न तदाचरेत्

tasmādvaiśya paratreha karmaṇā manasā girā lokadvayasukhaprepsurdharmajño na tadācaret

इसलिए, हे वैश्य! जो धर्मज्ञ मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों में सुख चाहता है, उसे कर्म, मन और वचन से ऐसा आचरण कभी नहीं करना चाहिए।

श्लोक 36 (padma.3.31.36)

लोकद्वयेन विंदंति सुखानि प्राणिहिंसकाः । येन हिंसन्ति भूतानि न ते बिभ्यति कुत्रचित्

lokadvayena viṁdaṁti sukhāni prāṇihiṁsakāḥ yena hiṁsanti bhūtāni na te bibhyati kutracit

प्राणियों की हिंसा करने वाले न तो इस लोक में और न परलोक में सुख पाते हैं; किंतु जो किसी भी प्राणी को पीड़ा नहीं पहुँचाते, वे कहीं भी भयभीत नहीं होते।

श्लोक 37 (padma.3.31.37)

प्रविशंति यथा नद्यः समुद्रमृजुवक्रगाः । सर्वे धर्मा अहिंसायां प्रविशंति तथा दृढम्

praviśaṁti yathā nadyaḥ samudramṛjuvakragāḥ sarve dharmā ahiṁsāyāṁ praviśaṁti tathā dṛḍham

जैसे टेढ़ी और सीधी बहने वाली सभी नदियाँ समुद्र में जा मिलती हैं, वैसे ही सभी धर्म दृढ़तापूर्वक अहिंसा में ही समाहित हो जाते हैं।

श्लोक 38 (padma.3.31.38)

स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । अभयं येन भूतेभ्यो दत्तमत्र विंशांवर

sa snātaḥ sarvatīrtheṣu sarvayajñeṣu dīkṣitaḥ abhayaṁ yena bhūtebhyo dattamatra viṁśāṁvara

हे विशांवर! जिसने इस लोक में समस्त प्राणियों को अभय-दान दिया है, वह मानो समस्त तीर्थों में स्नान कर चुका और समस्त यज्ञों में दीक्षित हो चुका।

श्लोक 39 (padma.3.31.39)

ये नियोगांश्च शास्त्रोक्तान्धर्माधर्म विमिश्रितान् । पालयंतीह ये वैश्य न ते यांति यमालयम्

ye niyogāṁśca śāstroktāndharmādharma vimiśritān pālayaṁtīha ye vaiśya na te yāṁti yamālayam

हे वैश्य! जो लोग शास्त्रोक्त नियमों का, धर्म और अधर्म के मिश्रण को पहचानते हुए, यहाँ पालन करते हैं, वे यमलोक को नहीं जाते।

श्लोक 40 (padma.3.31.40)

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा । स्वधर्मनिरताः सर्वे नाकपृष्ठे वसंति ते

brahmacārī gṛhasthaśca vānaprastho yatistathā svadharmaniratāḥ sarve nākapṛṣṭhe vasaṁti te

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी — अपने-अपने धर्म में तत्पर रहने वाले ये सभी स्वर्ग के शिखर पर निवास करते हैं।

श्लोक 41 (padma.3.31.41)

यथोक्तचारिणः सर्वे वर्णाश्रमसमन्विताः । नरा जितेंद्रिया यांति ब्रह्मलोकं तु शाश्वतम्

yathoktacāriṇaḥ sarve varṇāśramasamanvitāḥ narā jiteṁdriyā yāṁti brahmalokaṁ tu śāśvatam

वर्ण और आश्रम के अनुसार यथोक्त आचरण करने वाले, इंद्रियों को जीतने वाले सभी मनुष्य शाश्वत ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 42 (padma.3.31.42)

इष्टापूर्तरता ये च पंचयज्ञरताश्च ये । दयान्विताश्च ये नित्यं नेक्षंते ते यमालयम्

iṣṭāpūrtaratā ye ca paṁcayajñaratāśca ye dayānvitāśca ye nityaṁ nekṣaṁte te yamālayam

जो इष्ट और पूर्त कर्मों में रत हैं, जो पंचयज्ञों में तत्पर हैं तथा जो सदैव दया से युक्त रहते हैं, वे यमलोक को कभी नहीं देखते।

श्लोक 43 (padma.3.31.43)

इंद्रियार्थनिवृत्ता ये समर्था वेदवादिनः । अग्निपूजारता नित्यं ते विप्राः स्वर्गगामिनः

iṁdriyārthanivṛttā ye samarthā vedavādinaḥ agnipūjāratā nityaṁ te viprāḥ svargagāminaḥ

जो इंद्रिय-विषयों से निवृत्त हैं, वेद के समर्थ व्याख्याता हैं तथा जो सदैव अग्नि-पूजा में रत रहते हैं, वे ब्राह्मण स्वर्गगामी होते हैं।

श्लोक 44 (padma.3.31.44)

अदीनवदनाः शूराः शत्रुभिः परिवेष्टिताः । आहवेषु विपन्ना ये तेषां मार्गो दिवाकरः

adīnavadanāḥ śūrāḥ śatrubhiḥ pariveṣṭitāḥ āhaveṣu vipannā ye teṣāṁ mārgo divākaraḥ

जो शूरवीर शत्रुओं से घिरे रहकर भी उदास मुख नहीं होते और युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हैं, उनके लिए सूर्य ही मार्ग बन जाता है।

श्लोक 45 (padma.3.31.45)

अनाथ स्त्री द्विजार्थे च शरणागतपालने । प्राणांस्त्यजंति ये वैश्य न च्यवंति दिवस्तु ते

anātha strī dvijārthe ca śaraṇāgatapālane prāṇāṁstyajaṁti ye vaiśya na cyavaṁti divastu te

हे वैश्य! जो अनाथ स्त्री के लिए, ब्राह्मण के लिए अथवा शरणागत की रक्षा में अपने प्राण त्याग देते हैं, वे स्वर्ग से कभी च्युत नहीं होते।

श्लोक 46 (padma.3.31.46)

पंग्वंधबालवृद्धांश्च रोग्यनाथदरिद्रितान् । ये पुष्णंति सदा वैश्य ते मोदंति सदा दिवि

paṁgvaṁdhabālavṛddhāṁśca rogyanāthadaridritān ye puṣṇaṁti sadā vaiśya te modaṁti sadā divi

हे वैश्य! जो सदैव लंगड़ों, अंधों, बालकों, वृद्धों, रोगियों, अनाथों और दरिद्रों का पालन-पोषण करते हैं, वे सदैव स्वर्ग में आनंदित रहते हैं।

श्लोक 47 (padma.3.31.47)

गां दृष्ट्वा पंकनिर्मग्नां रोगमग्नं द्विजं तथा । उद्धरंति नरा ये च तेषां लोकोऽश्वमेधिनाम्

gāṁ dṛṣṭvā paṁkanirmagnāṁ rogamagnaṁ dvijaṁ tathā uddharaṁti narā ye ca teṣāṁ loko'śvamedhinām

जो मनुष्य कीचड़ में फँसी गाय को अथवा रोग से ग्रस्त ब्राह्मण को देखकर उसका उद्धार करते हैं, उन्हें अश्वमेध-यज्ञ करने वालों का लोक प्राप्त होता है।

श्लोक 48 (padma.3.31.48)

गोग्रासं ये प्रयच्छंति ये शुश्रूषंति गाः सदा । येनारोहंति गोपृष्ठे ते स्वर्लोकनिवासिनः

gogrāsaṁ ye prayacchaṁti ye śuśrūṣaṁti gāḥ sadā yenārohaṁti gopṛṣṭhe te svarlokanivāsinaḥ

जो गायों को घास का ग्रास देते हैं, जो सदैव गायों की सेवा करते हैं तथा जिनके सहारे प्राणी गौ की पीठ पर चढ़ते हैं, वे स्वर्गलोक के निवासी होते हैं।

श्लोक 49 (padma.3.31.49)

गर्तमात्रं तु ये चक्रुर्यत्र गौरतृषा भवेत् । यमलोकमदृष्ट्वैव ते यांति स्वर्गतिं नराः

gartamātraṁ tu ye cakruryatra gauratṛṣā bhavet yamalokamadṛṣṭvaiva te yāṁti svargatiṁ narāḥ

जिन्होंने ऐसे स्थान पर एक छोटा-सा गड्ढा भी खोद दिया, जहाँ गाय प्यासी न रहे, वे मनुष्य यमलोक को देखे बिना ही स्वर्गगति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 50 (padma.3.31.50)

अग्निपूजा देवपूजा गुरुपूजा रताश्च ये । द्विजपूजा रता नित्यं ते विप्राः स्वर्गगामिनः

agnipūjā devapūjā gurupūjā ratāśca ye dvijapūjā ratā nityaṁ te viprāḥ svargagāminaḥ

जो अग्नि-पूजा, देव-पूजा, गुरु-पूजा में रत हैं तथा जो सदैव द्विज-पूजा में तत्पर रहते हैं, वे ब्राह्मण स्वर्गगामी होते हैं।

श्लोक 51 (padma.3.31.51)

वापीकूपतडागादौ धर्मस्यांतो न विद्यते । पिबंति स्वेच्छया यत्र जलस्थल चरास्तदा

vāpīkūpataḍāgādau dharmasyāṁto na vidyate pibaṁti svecchayā yatra jalasthala carāstadā

बावली, कुआँ, तालाब आदि बनवाने में धर्म की कोई सीमा नहीं है, जहाँ जल और थल में विचरने वाले प्राणी अपनी इच्छा से जल पी सकें।

श्लोक 52 (padma.3.31.52)

नित्यं दानपरः सोऽत्र कथ्यते विबुधैरपि । यथायथा च पानीयं पिबंति प्राणिनो भृशम्

nityaṁ dānaparaḥ so'tra kathyate vibudhairapi yathāyathā ca pānīyaṁ pibaṁti prāṇino bhṛśam

विद्वज्जन भी उसे सदा दानपरायण कहते हैं; क्योंकि जिस-जिस मात्रा में प्राणी उस जल को निरंतर पीते रहते हैं —

श्लोक 53 (padma.3.31.53)

तथातथाऽक्षयः स्वर्गो धर्मबुद्ध्या विशां वर । प्राणिनां जीवनं वारि प्राणा वारिणि संस्थिताः

tathātathā'kṣayaḥ svargo dharmabuddhyā viśāṁ vara prāṇināṁ jīvanaṁ vāri prāṇā vāriṇi saṁsthitāḥ

— हे विशां वर! उतना ही उस धर्मबुद्धि दाता को अक्षय स्वर्ग प्राप्त होता है; क्योंकि जल ही प्राणियों का जीवन है, और उनके प्राण जल में ही टिके रहते हैं।

श्लोक 54 (padma.3.31.54)

नित्यस्नानेन पूयंते येऽपि पातकिनो नराः । प्रातःस्नानं हरेद्वैश्य बाह्माभ्यंतरजं मलम्

nityasnānena pūyaṁte ye'pi pātakino narāḥ prātaḥsnānaṁ haredvaiśya bāhmābhyaṁtarajaṁ malam

नित्य स्नान करने से पापी मनुष्य भी शुद्ध हो जाते हैं। हे वैश्य! प्रातःकाल का स्नान बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार की मलिनता को दूर करता है।

श्लोक 55 (padma.3.31.55)

प्रातःस्नानेन निष्पापो नरो न निरयं व्रजेत् । स्नानं विना तु यो भुंक्ते मलाशी स सदा नरः

prātaḥsnānena niṣpāpo naro na nirayaṁ vrajet snānaṁ vinā tu yo bhuṁkte malāśī sa sadā naraḥ

प्रातःस्नान से मनुष्य निष्पाप होकर नरक को नहीं जाता; परंतु जो बिना स्नान किए भोजन करता है, वह सदा मल खाने वाला ही माना जाता है।

श्लोक 56 (padma.3.31.56)

अस्नायी यो नरस्तस्य विमुखा पितृदेवताः । स्नानहीनो नरः पापः स्नानहीनो नरोऽशुचिः

asnāyī yo narastasya vimukhā pitṛdevatāḥ snānahīno naraḥ pāpaḥ snānahīno naro'śuciḥ

जो मनुष्य स्नान नहीं करता, उससे पितर और देवता विमुख हो जाते हैं। स्नानरहित मनुष्य पापी है, स्नानरहित मनुष्य अशुद्ध है।

श्लोक 57 (padma.3.31.57)

अस्नायी नरकं भुंक्ते पुंस्कीटादिषु जायते । ये पुनः स्रोतसि स्नानमाचरंतीह पर्वणि

asnāyī narakaṁ bhuṁkte puṁskīṭādiṣu jāyate ye punaḥ srotasi snānamācaraṁtīha parvaṇi

बिना स्नान करने वाला नरक भोगता है और कृमि आदि योनियों में जन्म लेता है। किंतु जो लोग पर्व के अवसर पर नदी में स्नान करते हैं —

श्लोक 58 (padma.3.31.58)

ते नैव नरकं यांति न जायंते कुयोनिषु । दुःस्वप्ना दुष्टचिंताश्च वंध्या भवंति सर्वदा

te naiva narakaṁ yāṁti na jāyaṁte kuyoniṣu duḥsvapnā duṣṭaciṁtāśca vaṁdhyā bhavaṁti sarvadā

— वे न नरक जाते हैं और न निकृष्ट योनियों में जन्म लेते हैं; इसके विपरीत, जो ऐसा नहीं करते उन्हें सदैव दुःस्वप्न, दुष्ट विचार और वंध्यत्व प्राप्त होते हैं।

श्लोक 59 (padma.3.31.59)

प्रातःस्नानेन शुद्धानां पुरुषाणां विशांवर । तिलांश्च तिलपात्रांश्च तिलप्रस्थं यथाविधि

prātaḥsnānena śuddhānāṁ puruṣāṇāṁ viśāṁvara tilāṁśca tilapātrāṁśca tilaprasthaṁ yathāvidhi

हे विशांवर! प्रातःस्नान से शुद्ध हुए पुरुषों के लिए, विधिपूर्वक तिल, तिल के पात्र तथा तिल की प्रस्थ-मात्रा —

श्लोक 60 (padma.3.31.60)

दत्त्वा प्रेतपतेर्भूमौ न व्रजंति नराः क्वचित् । पृथिवीं कांचनं गां च दत्वा दानानि षोडश

dattvā pretapaterbhūmau na vrajaṁti narāḥ kvacit pṛthivīṁ kāṁcanaṁ gāṁ ca datvā dānāni ṣoḍaśa

— देकर पृथ्वी पर वे मनुष्य कहीं भी प्रेतपति (यम) के निकट नहीं जाते। पृथ्वी, स्वर्ण, गौ तथा सोलह महादानों को देकर —

श्लोक 61 (padma.3.31.61)

गत्वा न विनिवर्तंते स्वर्गलोकाद्विकुंडल । पुण्यासु तिथिषु प्राज्ञो व्यतीपाते च संक्रमे

gatvā na vinivartaṁte svargalokādvikuṁḍala puṇyāsu tithiṣu prājño vyatīpāte ca saṁkrame

— हे विकुंडल! स्वर्गलोक में जाकर वे फिर वहाँ से लौटते नहीं। बुद्धिमान पुरुष पुण्य तिथियों में, व्यतीपात में तथा संक्रांति के अवसर पर —

श्लोक 62 (padma.3.31.62)

स्नात्वा दत्त्वा च यत्किंचिन्नैव मज्जति दुर्गतौ । नैवाक्रामंति दातारो दारुणं रौरवं पथम् । इहलोके न जायंते कुले धनविवर्जिते

snātvā dattvā ca yatkiṁcinnaiva majjati durgatau naivākrāmaṁti dātāro dāruṇaṁ rauravaṁ patham ihaloke na jāyaṁte kule dhanavivarjite

— स्नान करके और जो कुछ भी दान देकर, वह कभी दुर्गति में नहीं डूबता। ऐसे दाता कभी भी भयंकर रौरव नरक के मार्ग पर नहीं जाते; और न ही इस लोक में धनहीन कुल में जन्म लेते हैं।

श्लोक 63 (padma.3.31.63)

सत्यवादी सदा मौनी प्रियवादी च यो नरः । अक्रोधनः समाचारो नातिवाद्यनसूयकः

satyavādī sadā maunī priyavādī ca yo naraḥ akrodhanaḥ samācāro nātivādyanasūyakaḥ

जो मनुष्य सत्यवादी, सदा मौन-प्रिय, प्रियभाषी, क्रोधरहित, सदाचारी, अनावश्यक वाद-विवाद न करने वाला तथा ईर्ष्यारहित है —

श्लोक 64 (padma.3.31.64)

सदा दाक्षिण्यसंपन्नः सदा भूतदयान्वितः । गोप्ता च परमर्माणां वक्ता परगुणस्य च

sadā dākṣiṇyasaṁpannaḥ sadā bhūtadayānvitaḥ goptā ca paramarmāṇāṁ vaktā paraguṇasya ca

— जो सदैव सौजन्य से युक्त है, सदैव प्राणियों पर दया रखता है, दूसरों के गोपनीय दोषों का रक्षक है और दूसरों के गुणों का ही वर्णन करता है —

श्लोक 65 (padma.3.31.65)

परस्वं तृणमात्रं च मनसापि न यो हरेत् । न पश्यंति विशांश्रेष्ठ ह्येते नरकयातनाम्

parasvaṁ tṛṇamātraṁ ca manasāpi na yo haret na paśyaṁti viśāṁśreṣṭha hyete narakayātanām

— तथा जो मन से भी दूसरे की तृणमात्र वस्तु का भी हरण नहीं करता — हे विशांश्रेष्ठ! ऐसे लोग नरक की यातना कभी नहीं देखते।

श्लोक 66 (padma.3.31.66)

परापवादी पाखंडः पापेभ्योऽपि मतोऽधिकः । पच्यते नरके तावद्यावदाभूतसंप्लवम्

parāpavādī pākhaṁḍaḥ pāpebhyo'pi mato'dhikaḥ pacyate narake tāvadyāvadābhūtasaṁplavam

दूसरों की निंदा करने वाला और पाखंडी व्यक्ति पापियों से भी अधिक निंदनीय माना गया है; वह प्रलय-काल तक नरक में पकता रहता है।

श्लोक 67 (padma.3.31.67)

वक्ता परुषवाक्यानां मंतव्यो नरकागतः । संदेहो न विशांश्रेष्ठ पुनर्याति च दुर्गतिम्

vaktā paruṣavākyānāṁ maṁtavyo narakāgataḥ saṁdeho na viśāṁśreṣṭha punaryāti ca durgatim

कठोर वचन बोलने वाले को नरक से आया हुआ ही समझना चाहिए; हे विशांश्रेष्ठ! इसमें कोई संदेह नहीं कि वह फिर दुर्गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 68 (padma.3.31.68)

न तीर्थैर्न तपोभिश्च कृतघ्नस्यास्ति निष्कृतिः । सहते यातनां घोरां स नरो नरके चिरम्

na tīrthairna tapobhiśca kṛtaghnasyāsti niṣkṛtiḥ sahate yātanāṁ ghorāṁ sa naro narake ciram

कृतघ्न व्यक्ति के लिए न तो तीर्थों से और न तपों से कोई प्रायश्चित है। वह मनुष्य नरक में दीर्घकाल तक भयंकर यातना सहता है।

श्लोक 69 (padma.3.31.69)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि तेषु मज्जति यो नरः । जितेंद्रियो जिताहारो न स याति यमालयम्

pṛthivyāṁ yāni tīrthāni teṣu majjati yo naraḥ jiteṁdriyo jitāhāro na sa yāti yamālayam

पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, उनमें स्नान करने वाला, इंद्रियों को जीतने वाला तथा आहार को संयमित रखने वाला मनुष्य यमलोक को नहीं जाता।

श्लोक 70 (padma.3.31.70)

न तीर्थे पातकं कुर्यान्न च तीर्थोपजीवनम् । तीर्थे प्रतिग्रहस्त्याज्यस्त्याज्यो धर्मस्य विक्रयः

na tīrthe pātakaṁ kuryānna ca tīrthopajīvanam tīrthe pratigrahastyājyastyājyo dharmasya vikrayaḥ

तीर्थ में पाप नहीं करना चाहिए और न ही तीर्थ को अपनी आजीविका का साधन बनाना चाहिए। तीर्थ में दान ग्रहण करना त्याज्य है, और धर्म का विक्रय भी त्याज्य है।

श्लोक 71 (padma.3.31.71)

दुर्जरं पातकं तीर्थे दुर्जरश्च प्रतिग्रहः । तीर्थे च दुर्जरं सर्वमेतत्किन्नरकं व्रजेत्

durjaraṁ pātakaṁ tīrthe durjaraśca pratigrahaḥ tīrthe ca durjaraṁ sarvametatkinnarakaṁ vrajet

तीर्थ में किया गया पाप दुर्जर (जिसका फल भोगे बिना छूटना कठिन) है, और वहाँ लिया गया प्रतिग्रह भी दुर्जर है; तीर्थ में यह सब कुछ ही दुर्जर है — तो ऐसा व्यक्ति नरक क्यों न जाए?

श्लोक 72 (padma.3.31.72)

सकृद्गंगांभसि स्नातः पूतो गांगेयवारिणा । न नरो नरकं याति अपि पातकराशिकृत्

sakṛdgaṁgāṁbhasi snātaḥ pūto gāṁgeyavāriṇā na naro narakaṁ yāti api pātakarāśikṛt

जो एक बार भी गंगाजल में स्नान कर लेता है, वह गंगाजल से पवित्र होकर, चाहे उसने पापों का पहाड़ ही क्यों न किया हो, नरक को नहीं जाता।

श्लोक 73 (padma.3.31.73)

व्रतदानतपो यज्ञाः पवित्राणीतराणि च । गंगाबिंद्वभिषिक्तस्य न समा इति नः श्रुतम्

vratadānatapo yajñāḥ pavitrāṇītarāṇi ca gaṁgābiṁdvabhiṣiktasya na samā iti naḥ śrutam

हमने सुना है कि व्रत, दान, तप, यज्ञ तथा अन्य पवित्र कर्म भी गंगाजल की एक बूँद से अभिषिक्त होने के तुल्य नहीं हैं।

श्लोक 74 (padma.3.31.74)

अन्यतीर्थसमां गंगां यो ब्रवीति नराधमः । स याति नरकं वैश्य दारुणं रौरवं महत्

anyatīrthasamāṁ gaṁgāṁ yo bravīti narādhamaḥ sa yāti narakaṁ vaiśya dāruṇaṁ rauravaṁ mahat

जो अधम मनुष्य गंगा को किसी अन्य तीर्थ के समान बताता है, हे वैश्य! वह भयंकर महारौरव नरक को जाता है।

श्लोक 75 (padma.3.31.75)

धर्मद्रवं ह्यपां बीजं वैकुंठचरणच्युतम् । धृतं मूर्ध्नि महेशेन यद्गांगममलं जलम्

dharmadravaṁ hyapāṁ bījaṁ vaikuṁṭhacaraṇacyutam dhṛtaṁ mūrdhni maheśena yadgāṁgamamalaṁ jalam

वह निर्मल गंगाजल धर्म का द्रव है, समस्त जल का बीज है, वैकुंठ (विष्णु) के चरणों से च्युत हुआ है, तथा महेश (शिव) ने भी उसे अपने मस्तक पर धारण किया है।

श्लोक 76 (padma.3.31.76)

तद्ब्रह्मैव न संदेहो निर्गुणं प्रकृतेः परम् । तेन किं समतां गच्छेदपि ब्रह्मांडगोचरे

tadbrahmaiva na saṁdeho nirguṇaṁ prakṛteḥ param tena kiṁ samatāṁ gacchedapi brahmāṁḍagocare

वह निःसंदेह ब्रह्म ही है — निर्गुण, प्रकृति से परे। फिर संपूर्ण ब्रह्मांड में उसकी समानता किससे हो सकती है?

श्लोक 77 (padma.3.31.77)

गंगागंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि । नरो न नरकं याति किं तया सदृशं भवेत् । नान्येन दह्यते सद्यः क्रिया नरकदायिनी

gaṁgāgaṁgeti yo brūyādyojanānāṁ śatairapi naro na narakaṁ yāti kiṁ tayā sadṛśaṁ bhavet nānyena dahyate sadyaḥ kriyā narakadāyinī

जो मनुष्य सैकड़ों योजन दूर से भी 'गंगा, गंगा' कहता है, वह नरक को नहीं जाता — उसके समान और क्या हो सकता है? इसके अतिरिक्त और किसी उपाय से नरक देने वाले कर्म तत्काल भस्म नहीं होते।

श्लोक 78 (padma.3.31.78)

गंगांभसि प्रयत्नेन स्नातव्यं तेन मानवैः । प्रतिगृह निवृत्तो यः प्रतिग्रहक्षमोऽपि सन् । स द्विजो द्योतते वैश्य तारारूपश्चिरं दिवि

gaṁgāṁbhasi prayatnena snātavyaṁ tena mānavaiḥ pratigṛha nivṛtto yaḥ pratigrahakṣamo'pi san sa dvijo dyotate vaiśya tārārūpaściraṁ divi

अतः मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक गंगाजल में स्नान करना चाहिए। जो द्विज दान लेने में समर्थ होते हुए भी प्रतिग्रह से निवृत्त रहता है, हे वैश्य! वह तारे के रूप में स्वर्ग में दीर्घकाल तक चमकता है।

श्लोक 79 (padma.3.31.79)

गामुद्धरंति ये पंकाद्ये रक्षंति च रोगिणः । म्रियंते गोगृहे ये च तेषां नभसि तारकाः । यमलोकं न पश्यंति प्राणायामपरायणाः

gāmuddharaṁti ye paṁkādye rakṣaṁti ca rogiṇaḥ mriyaṁte gogṛhe ye ca teṣāṁ nabhasi tārakāḥ yamalokaṁ na paśyaṁti prāṇāyāmaparāyaṇāḥ

जो गाय को कीचड़ से निकालते हैं, रोगियों की रक्षा करते हैं तथा जो गौशाला में देह त्यागते हैं, उनके लिए आकाश में तारे होते हैं। प्राणायाम में तत्पर रहने वाले यमलोक को कभी नहीं देखते।

श्लोक 80 (padma.3.31.80)

अपि दुष्कृतकर्माणस्तैरेव हतकिल्बिषाः । दिवसे दिवसे वैश्य प्राणायामास्तु षोडश । अपि ब्रह्महणं साक्षात्पुनंत्यहरहः कृताः

api duṣkṛtakarmāṇastaireva hatakilbiṣāḥ divase divase vaiśya prāṇāyāmāstu ṣoḍaśa api brahmahaṇaṁ sākṣātpunaṁtyaharahaḥ kṛtāḥ

दुष्कर्म करने वाले भी इसी साधन से पापमुक्त हो जाते हैं। हे वैश्य! प्रतिदिन किए गए सोलह प्राणायाम साक्षात् ब्रह्महत्या करने वाले को भी दिन-प्रतिदिन शुद्ध कर देते हैं।

श्लोक 81 (padma.3.31.81)

तपांसि यानि तप्यंते व्रतानि नियमाश्च ये । गोसहस्रप्रदानं च प्राणायामस्तु तत्समः

tapāṁsi yāni tapyaṁte vratāni niyamāśca ye gosahasrapradānaṁ ca prāṇāyāmastu tatsamaḥ

जितने भी तप किए जाते हैं, जितने व्रत और नियम पाले जाते हैं तथा सहस्र गौओं का दान — प्राणायाम इन सबके तुल्य है।

श्लोक 82 (padma.3.31.82)

अब्बिंदुं यः कुशाग्रेण मासेमासे नरः पिबेत् । संवत्सरशतं साग्रं प्राणायामस्तु तत्समः

abbiṁduṁ yaḥ kuśāgreṇa māsemāse naraḥ pibet saṁvatsaraśataṁ sāgraṁ prāṇāyāmastu tatsamaḥ

जो मनुष्य कुश की नोक पर आई हुई जल की एक बूँद प्रत्येक मास में पीता है, सौ से भी अधिक वर्षों तक — प्राणायाम उसके भी तुल्य है।

श्लोक 83 (padma.3.31.83)

पातकं तु महद्यच्च तथा क्षुद्रोपपातकम् । प्राणायामैः क्षणात्सर्वं भस्मसात्कुरुते नरः

pātakaṁ tu mahadyacca tathā kṣudropapātakam prāṇāyāmaiḥ kṣaṇātsarvaṁ bhasmasātkurute naraḥ

जो भी महापातक है और जो भी क्षुद्र उपपातक है — प्राणायाम से मनुष्य उन सबको क्षणभर में भस्म कर देता है।

श्लोक 84 (padma.3.31.84)

मातृवत्परदारान्ये मन्यंते वै नरोत्तमाः । न ते यांति नरश्रेष्ठ कदाचिद्यम यातनाम्

mātṛvatparadārānye manyaṁte vai narottamāḥ na te yāṁti naraśreṣṭha kadācidyama yātanām

जो श्रेष्ठ मनुष्य पराई स्त्रियों को माता के समान मानते हैं, हे नरश्रेष्ठ! वे कभी भी यम की यातना को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 85 (padma.3.31.85)

मनसापि परेषां यः कलत्राणि न सेवते । सह लोकद्वये नास्ति तेन वैश्य धरा धृता

manasāpi pareṣāṁ yaḥ kalatrāṇi na sevate saha lokadvaye nāsti tena vaiśya dharā dhṛtā

जो मन से भी दूसरों की पत्नियों की कामना नहीं करता, हे वैश्य! वास्तव में उसी के द्वारा यह पृथ्वी दोनों लोकों सहित धारण की जाती है।

श्लोक 86 (padma.3.31.86)

तस्माद्धर्म्मान्वितैस्त्याज्यं परदारोपसेवनम् । नयंति परदारास्तु नरकानेकविंशतिम्

tasmāddharmmānvitaistyājyaṁ paradāropasevanam nayaṁti paradārāstu narakānekaviṁśatim

अतः धर्मपरायण पुरुषों को परस्त्री-सेवन का त्याग कर देना चाहिए; क्योंकि परस्त्री-गमन मनुष्य को इक्कीस नरकों में ले जाता है।

श्लोक 87 (padma.3.31.87)

लोभो न जायते येषां परदारेषु मानसे । ते यांति देवलोकं तु न यमं वैश्यसत्तम

lobho na jāyate yeṣāṁ paradāreṣu mānase te yāṁti devalokaṁ tu na yamaṁ vaiśyasattama

हे वैश्यसत्तम! जिनके मन में पराई स्त्रियों के प्रति कोई लोभ उत्पन्न नहीं होता, वे देवलोक को जाते हैं, यम को नहीं।

श्लोक 88 (padma.3.31.88)

शश्वत्क्रोधनिदानेषु यः क्रोधेन न जीयते । जितस्वर्गः स मंतव्यः पुरुषोऽक्रोधनो भुवि

śaśvatkrodhanidāneṣu yaḥ krodhena na jīyate jitasvargaḥ sa maṁtavyaḥ puruṣo'krodhano bhuvi

जो निरंतर क्रोध के कारण उपस्थित रहने पर भी क्रोध से पराजित नहीं होता, उस क्रोधरहित पुरुष को पृथ्वी पर ही मानो स्वर्ग-विजयी समझना चाहिए।

श्लोक 89 (padma.3.31.89)

मातरं पितरं पुत्र आराधयति देववत् । अप्राप्ते वार्द्धके काले न याति च यमालयम्

mātaraṁ pitaraṁ putra ārādhayati devavat aprāpte vārddhake kāle na yāti ca yamālayam

जो पुत्र अपने माता-पिता की देववत् आराधना करता है, वह वृद्धावस्था प्राप्त होने से पूर्व मृत्यु हो जाने पर भी यमलोक को नहीं जाता।

श्लोक 90 (padma.3.31.90)

पितुश्चाधिकभावेन येऽर्चयंति गुरुं नराः । भवंत्यतिथयो लोके ब्रह्मणस्ते विशांवर

pituścādhikabhāvena ye'rcayaṁti guruṁ narāḥ bhavaṁtyatithayo loke brahmaṇaste viśāṁvara

हे विशांवर! जो मनुष्य अपने गुरु का पिता से भी अधिक भाव से सम्मान करते हैं, वे उस लोक में ब्रह्मा के अतिथि बनते हैं।

श्लोक 91 (padma.3.31.91)

इह चैव स्त्रियो धन्याः शीलस्य परिरक्षणात् । शीलभंगे च नारीणां यमलोकः सुदारुणः

iha caiva striyo dhanyāḥ śīlasya parirakṣaṇāt śīlabhaṁge ca nārīṇāṁ yamalokaḥ sudāruṇaḥ

इस लोक में स्त्रियाँ अपने शील की रक्षा करने से ही धन्य कहलाती हैं; और शील भंग हो जाने पर स्त्रियों के लिए यमलोक अत्यंत भयंकर होता है।

श्लोक 92 (padma.3.31.92)

शीलं रक्ष्यं सदा स्त्रीभिर्दुष्टसंगविवर्जनात् । शीलेन हि परः स्वर्गः स्त्रीणां वैश्य न संशयः

śīlaṁ rakṣyaṁ sadā strībhirduṣṭasaṁgavivarjanāt śīlena hi paraḥ svargaḥ strīṇāṁ vaiśya na saṁśayaḥ

स्त्रियों को दुष्ट संगति से बचकर सदैव अपने शील की रक्षा करनी चाहिए। हे वैश्य! शील से ही स्त्रियों को परम स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 93 (padma.3.31.93)

शूद्रस्य पाकयज्ञेन निषिद्धाचरणेन च । दुर्गतिर्विहिता वैश्य तस्य सा नारकी गतिः

śūdrasya pākayajñena niṣiddhācaraṇena ca durgatirvihitā vaiśya tasya sā nārakī gatiḥ

हे वैश्य! शूद्र के लिए पाक-यज्ञ करने तथा निषिद्ध आचरण करने से जो दुर्गति विहित है, वह नारकीय गति ही है।

श्लोक 94 (padma.3.31.94)

विचारयंति ये शास्त्रं वेदाभ्यासरताश्च ये । पुराणं संहितां ये च श्रावयंति पठंति च

vicārayaṁti ye śāstraṁ vedābhyāsaratāśca ye purāṇaṁ saṁhitāṁ ye ca śrāvayaṁti paṭhaṁti ca

जो शास्त्रों का चिंतन करते हैं, जो वेद के अभ्यास में रत रहते हैं तथा जो पुराण और संहिता का श्रवण-पठन कराते हैं —

श्लोक 95 (padma.3.31.95)

व्याकुर्वंति स्मृतिर्ये च ये धर्मप्रतिबोधकाः । वेदांतेषु निषण्णा ये तैरियं जगती धृता

vyākurvaṁti smṛtirye ca ye dharmapratibodhakāḥ vedāṁteṣu niṣaṇṇā ye tairiyaṁ jagatī dhṛtā

— जो स्मृतियों की व्याख्या करते हैं, जो धर्म का बोध कराते हैं तथा जो वेदांत में निष्ठ हैं — उन्हीं के द्वारा यह संसार धारण किया गया है।

श्लोक 96 (padma.3.31.96)

तत्तदभ्यासमाहात्म्यैः सर्वे ते हतकिल्बिषाः । गच्छंति ब्रह्मणो लोकं यत्र मोहो न विद्यते

tattadabhyāsamāhātmyaiḥ sarve te hatakilbiṣāḥ gacchaṁti brahmaṇo lokaṁ yatra moho na vidyate

उन-उन साधनाओं की महिमा से वे सभी पापरहित होकर उस ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ मोह का लेशमात्र भी नहीं है।

श्लोक 97 (padma.3.31.97)

ज्ञानमज्ञाय यो दद्याद्वेदशास्त्रसमुद्भवम् । अपि वेदास्तमर्चंति भवबंधविदारणम्

jñānamajñāya yo dadyādvedaśāstrasamudbhavam api vedāstamarcaṁti bhavabaṁdhavidāraṇam

जो अज्ञानी को वेद-शास्त्रों से उत्पन्न, संसार-बंधन को काट डालने वाला ज्ञान प्रदान करता है, उसकी पूजा तो वेद भी करते हैं।

श्लोक 98 (padma.3.31.98)

श्रूयतामद्भुतं ह्येतद्रहस्यं वैश्यसत्तम । सम्मतं धर्मराजस्य सर्वलोकामृतप्रदम्

śrūyatāmadbhutaṁ hyetadrahasyaṁ vaiśyasattama sammataṁ dharmarājasya sarvalokāmṛtapradam

हे वैश्यसत्तम! अब यह अद्भुत रहस्य सुनो, जो स्वयं धर्मराज को भी सम्मत है और समस्त लोकों को अमृत प्रदान करने वाला है।

श्लोक 99 (padma.3.31.99)

न यमं यमलोकं च न भूतान्घोरदर्शनान् । पश्यंति वैष्णवा नूनं सत्यं सत्यं मयोदितम्

na yamaṁ yamalokaṁ ca na bhūtānghoradarśanān paśyaṁti vaiṣṇavā nūnaṁ satyaṁ satyaṁ mayoditam

वैष्णव निश्चय ही न यम को देखते हैं, न यमलोक को, और न ही उसके भयंकर रूप वाले भूत-गणों को — यह मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ।

श्लोक 100 (padma.3.31.100)

प्राहास्मान्यमुना भ्राता सदैव हि पुनःपुनः । भवद्भिर्वैष्णवास्त्याज्या न ते स्युर्ममगोचराः

prāhāsmānyamunā bhrātā sadaiva hi punaḥpunaḥ bhavadbhirvaiṣṇavāstyājyā na te syurmamagocarāḥ

यमुना के भ्राता (यमराज) ने हमें सदैव बार-बार यही कहा है — "तुम्हें वैष्णवों को सदैव त्याज्य ही मानना चाहिए; वे कभी मेरी दृष्टि में नहीं आने चाहिए।"

श्लोक 101 (padma.3.31.101)

स्मरंति ये सकृद्भूताः प्रसंगेनापि केशवम् । ते विध्वस्ताखिलाघौघा यांति विष्णोः परं पदम्

smaraṁti ye sakṛdbhūtāḥ prasaṁgenāpi keśavam te vidhvastākhilāghaughā yāṁti viṣṇoḥ paraṁ padam

जो लोग प्रसंगवश भी एक बार केशव का स्मरण कर लेते हैं, उनके समस्त पाप-समूह नष्ट होकर वे विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 102 (padma.3.31.102)

दुराचारो दुष्कृतोऽपि सदाचाररतोऽपि यः । भवद्भिः स सदा त्याज्यो विष्णुं च भजते नरः

durācāro duṣkṛto'pi sadācārarato'pi yaḥ bhavadbhiḥ sa sadā tyājyo viṣṇuṁ ca bhajate naraḥ

चाहे वह मनुष्य दुराचारी और दुष्कर्मी हो अथवा सदाचार में रत हो, जो विष्णु का भजन करता है, वह तुम्हारे द्वारा (यमदूतों द्वारा) सदा त्याज्य ही है।

श्लोक 103 (padma.3.31.103)

वैष्णवो यद्गृहे भुंक्ते येषां वैष्णवसंगतिः । तेऽपि वः परिवार्याः स्युस्तत्संगहतकिल्बिषाः

vaiṣṇavo yadgṛhe bhuṁkte yeṣāṁ vaiṣṇavasaṁgatiḥ te'pi vaḥ parivāryāḥ syustatsaṁgahatakilbiṣāḥ

जिसके घर में कोई वैष्णव भोजन करता है और जिन्हें वैष्णवों की संगति प्राप्त है, वे भी तुम्हारे द्वारा त्याज्य ही समझे जाएँ, क्योंकि उस संगति से ही उनके पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 104 (padma.3.31.104)

इत्थं वैश्यानुशास्त्यस्मान्देवो दंडधरः सदा । अतो नो वैष्णवा यांति राजधानीं यमस्य तु

itthaṁ vaiśyānuśāstyasmāndevo daṁḍadharaḥ sadā ato no vaiṣṇavā yāṁti rājadhānīṁ yamasya tu

हे वैश्य! इस प्रकार दंडधर देव (यमराज) स्वयं सदैव हमें यही आदेश देते हैं; अतः वैष्णव कभी यमराज की राजधानी में नहीं जाते।

श्लोक 105 (padma.3.31.105)

विष्णुभक्तिं विना नॄणां पापिष्ठानां विशां वर । उपायो नास्ति नास्त्यन्यः संतर्तुं नरकांबुधिम्

viṣṇubhaktiṁ vinā nṝṇāṁ pāpiṣṭhānāṁ viśāṁ vara upāyo nāsti nāstyanyaḥ saṁtartuṁ narakāṁbudhim

हे विशां वर! अत्यंत पापी मनुष्यों के लिए नरक-सागर से पार होने का विष्णु-भक्ति के अतिरिक्त और कोई भी उपाय नहीं है।

श्लोक 106 (padma.3.31.106)

श्वपाकमपि नेक्षेत लोकेष्टं वैश्य वैष्णवम् । वैष्णवो वर्णबाह्योऽपि पुनाति भुवनत्रयम्

śvapākamapi nekṣeta lokeṣṭaṁ vaiśya vaiṣṇavam vaiṣṇavo varṇabāhyo'pi punāti bhuvanatrayam

हे वैश्य! लोक-प्रिय वैष्णव को कभी श्वपच (चांडाल) के समान नहीं देखना चाहिए; वैष्णव, चाहे वर्ण-बाह्य ही क्यों न हो, तीनों लोकों को पवित्र कर देता है।

श्लोक 107 (padma.3.31.107)

एतावता लमघनिर्हरणाय पुंसां संकीर्तनं भगवतो गुणकर्मनाम्नाम् । विक्रुश्य पुत्र मघवान्यदजामिलोऽपि नारायणेति म्रियमाण इयाय मुक्तिम्

etāvatā lamaghanirharaṇāya puṁsāṁ saṁkīrtanaṁ bhagavato guṇakarmanāmnām vikruśya putra maghavānyadajāmilo'pi nārāyaṇeti mriyamāṇa iyāya muktim

इतने मात्र से ही — भगवान के गुण, कर्म और नामों का संकीर्तन — मनुष्यों के पापों को दूर करने के लिए पर्याप्त है; क्योंकि मरणासन्न अजामिल ने भी अपने पुत्र को 'नारायण' कहकर पुकारा, तो वह भी मुक्ति को प्राप्त हुआ।

श्लोक 108 (padma.3.31.108)

नरके तु चिरं मग्नाः पूर्वे ये च कुलद्वये । तदैव यांति ते स्वर्गं यदार्चंति मुदा हरिम्

narake tu ciraṁ magnāḥ pūrve ye ca kuladvaye tadaiva yāṁti te svargaṁ yadārcaṁti mudā harim

दोनों कुलों के जो पूर्वज दीर्घकाल से नरक में डूबे रहते हैं, वे उसी क्षण स्वर्ग को प्राप्त हो जाते हैं जब उनका वंशज आनंदपूर्वक हरि की आराधना करता है।

श्लोक 109 (padma.3.31.109)

विष्णुभक्तस्य ये दासा वैष्णवान्न भुजश्च ये । ते तु क्रतुभुजां वैश्य गतिं यांति निराकुलाः

viṣṇubhaktasya ye dāsā vaiṣṇavānna bhujaśca ye te tu kratubhujāṁ vaiśya gatiṁ yāṁti nirākulāḥ

विष्णुभक्त की जो सेवा करते हैं और जो वैष्णवों को भोजन कराते हैं, हे वैश्य! वे निराकुल भाव से यज्ञभोक्ताओं की गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 110 (padma.3.31.110)

प्रार्थर्यद्वैष्णवस्यान्नं प्रयत्नेन विचक्षणः । सर्वपापविशुद्ध्यर्थं तदभावे जलं पिबेत्

prārtharyadvaiṣṇavasyānnaṁ prayatnena vicakṣaṇaḥ sarvapāpaviśuddhyarthaṁ tadabhāve jalaṁ pibet

बुद्धिमान पुरुष को समस्त पापों की शुद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक वैष्णव के अन्न (उच्छिष्ट) की प्रार्थना करनी चाहिए; उसके अभाव में वैष्णव का जल ही पी लेना चाहिए।

श्लोक 111 (padma.3.31.111)

गोविंदेति जपन्मंत्रं कुत्रचिन्म्रियते यदि । स नरो न यमं पश्येत्तं च नेक्षामहे वयम्

goviṁdeti japanmaṁtraṁ kutracinmriyate yadi sa naro na yamaṁ paśyettaṁ ca nekṣāmahe vayam

यदि कोई मनुष्य 'गोविंद' मंत्र का जप करते हुए कहीं भी मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो वह यम को कभी नहीं देखता — हम स्वयं भी उसकी ओर देखने में समर्थ नहीं होते।

श्लोक 112 (padma.3.31.112)

सांगं समुद्रं सध्यानं सऋषिः छंददैवतम् । दीक्षयाविधिवन्मंत्रं जपेद्वै द्वादशाक्षरम्

sāṁgaṁ samudraṁ sadhyānaṁ saṛṣiḥ chaṁdadaivatam dīkṣayāvidhivanmaṁtraṁ japedvai dvādaśākṣaram

जो दीक्षा प्राप्त कर, विधिपूर्वक अंग, ध्यान, ऋषि, छंद और देवता सहित द्वादशाक्षर मंत्र का जप करता है —

श्लोक 113 (padma.3.31.113)

अष्टाक्षरं च मंत्रेशं ये जपंति नरोत्तमाः । तान्दृष्ट्वा ब्रह्महा शुद्ध्यद्भ्राजते विष्णुवत्स्वयम्

aṣṭākṣaraṁ ca maṁtreśaṁ ye japaṁti narottamāḥ tāndṛṣṭvā brahmahā śuddhyadbhrājate viṣṇuvatsvayam

— तथा जो श्रेष्ठ पुरुष अष्टाक्षर मंत्रराज का जप करते हैं, उन्हें देखकर ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध होकर स्वयं विष्णु के समान देदीप्यमान हो जाता है।

श्लोक 114 (padma.3.31.114)

शंखिनश्चक्रिणो भूत्वा ब्रह्माभ्यंतरगामिनः । वसंति वैष्णवे लोके विष्णुरूपेण ते नराः

śaṁkhinaścakriṇo bhūtvā brahmābhyaṁtaragāminaḥ vasaṁti vaiṣṇave loke viṣṇurūpeṇa te narāḥ

शंख और चक्र धारण करने वाले, ब्रह्मलोक के भीतर तक विचरने वाले वे मनुष्य वैष्णव लोक में विष्णु के ही रूप में निवास करते हैं।

श्लोक 115 (padma.3.31.115)

हृदि सूर्ये जले वाथ प्रतिमा स्थंडिलेपि च । समभ्यर्च्य हरिं यांति नरास्तद्वैष्णवं पदम्

hṛdi sūrye jale vātha pratimā sthaṁḍilepi ca samabhyarcya hariṁ yāṁti narāstadvaiṣṇavaṁ padam

हृदय में, सूर्य में, जल में, प्रतिमा में अथवा स्थंडिल (वेदी) में भी हरि की भलीभाँति पूजा करके मनुष्य उस वैष्णव पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 116 (padma.3.31.116)

अथवा सर्वदा पूज्यो वासुदेवो मुमुक्षुभिः । शालग्रामे मणौ चक्रे वज्रकीटविनिर्मिते

athavā sarvadā pūjyo vāsudevo mumukṣubhiḥ śālagrāme maṇau cakre vajrakīṭavinirmite

अथवा मुमुक्षुजनों द्वारा सदैव पूज्य वासुदेव की आराधना शालग्राम में, मणि में अथवा वज्रकीट द्वारा निर्मित चक्र में की जाती है।

श्लोक 117 (padma.3.31.117)

अधिष्ठानं हि तद्विष्णोः सर्वपापप्रणाशनम् । सर्वपुण्यप्रदं वैश्य सर्वेषामपि मुक्तिदम्

adhiṣṭhānaṁ hi tadviṣṇoḥ sarvapāpapraṇāśanam sarvapuṇyapradaṁ vaiśya sarveṣāmapi muktidam

वह वास्तव में विष्णु का ही अधिष्ठान है, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है; हे वैश्य! वह समस्त पुण्य प्रदान करने वाला तथा सबको मुक्ति देने वाला है।

श्लोक 118 (padma.3.31.118)

यः पूजयेद्धरिं चक्रे शालग्रामशिलोद्भवे । राजसूयसहस्रेण तेनेष्टं प्रतिवासरे

yaḥ pūjayeddhariṁ cakre śālagrāmaśilodbhave rājasūyasahasreṇa teneṣṭaṁ prativāsare

जो शालग्राम शिला से उत्पन्न चक्र में हरि की पूजा करता है, उसने मानो प्रतिदिन ही सहस्र राजसूय यज्ञों का यजन कर लिया।

श्लोक 119 (padma.3.31.119)

सदामनंति वेदांता ब्रह्मनिर्वाणमच्युतम् । तत्प्रसादो भवेन्नॄणां शालग्रामशिलार्चनात्

sadāmanaṁti vedāṁtā brahmanirvāṇamacyutam tatprasādo bhavennṝṇāṁ śālagrāmaśilārcanāt

वेदांत सदैव जिसे अच्युत ब्रह्मनिर्वाण कहकर वर्णित करता है, उसी की कृपा मनुष्यों को शालग्राम-शिला की पूजा से प्राप्त होती है।

श्लोक 120 (padma.3.31.120)

महाकाष्ठस्थितो वह्निर्मखस्थाने प्रकाशते । यथा तथा हरिर्व्यापी शालग्रामे प्रकाशते

mahākāṣṭhasthito vahnirmakhasthāne prakāśate yathā tathā harirvyāpī śālagrāme prakāśate

जैसे विशाल काष्ठ में स्थित अग्नि यज्ञ-स्थान में ही प्रकट होती है, वैसे ही सर्वव्यापी हरि शालग्राम में प्रकट होते हैं।

श्लोक 121 (padma.3.31.121)

अपि पापसमाचाराः कर्म्मण्यनधिकारिणः । शालग्रामार्चका वैश्य नैव यांति यमालयम्

api pāpasamācārāḥ karmmaṇyanadhikāriṇaḥ śālagrāmārcakā vaiśya naiva yāṁti yamālayam

हे वैश्य! चाहे पापाचारी और वैदिक कर्मों के अनधिकारी ही क्यों न हों, शालग्राम के पूजक कभी यमलोक को नहीं जाते।

श्लोक 122 (padma.3.31.122)

न तथा रमते लक्ष्म्यां न तथा स्वपुरे हरिः । शालग्रामशिलाचक्रे यथा स रमते सदा

na tathā ramate lakṣmyāṁ na tathā svapure hariḥ śālagrāmaśilācakre yathā sa ramate sadā

हरि जितना लक्ष्मी में रमण नहीं करते, जितना अपनी पुरी (वैकुंठ) में भी नहीं रमते, उतना वे सदैव शालग्राम-शिला के चक्र में रमण करते हैं।

श्लोक 123 (padma.3.31.123)

अग्निहोत्रं कृतं तेन दत्ता पृथ्वी ससागरा । येनार्चितो हरिश्चक्रे शालग्रामशिलोद्भवे

agnihotraṁ kṛtaṁ tena dattā pṛthvī sasāgarā yenārcito hariścakre śālagrāmaśilodbhave

जिसने शालग्राम-शिला से उत्पन्न चक्र में हरि की पूजा की है, मानो उसने अग्निहोत्र भी कर लिया और सागर सहित समस्त पृथ्वी का दान भी दे दिया।

श्लोक 124 (padma.3.31.124)

शिला द्वादश भो वैश्य शालग्रामशिलोद्भवाः । विधिवत्पूजिता येन तस्य पुण्यं वदामि ते

śilā dvādaśa bho vaiśya śālagrāmaśilodbhavāḥ vidhivatpūjitā yena tasya puṇyaṁ vadāmi te

हे वैश्य! शालग्राम-शिला की बारह प्रकार की शिलाएँ हैं; जिसने उन्हें विधिपूर्वक पूजा है, उसका पुण्य मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 125 (padma.3.31.125)

कोटिद्वादशलिंगैस्तु पूजितैः स्वर्णपंकजैः । यत्स्याद्द्वादशकालेषु दिनेनैकेन तद्भवेत्

koṭidvādaśaliṁgaistu pūjitaiḥ svarṇapaṁkajaiḥ yatsyāddvādaśakāleṣu dinenaikena tadbhavet

बारह कोटि लिंगों की स्वर्ण-कमलों से बारह कालों में पूजा करने पर जो पुण्य होता है, वही पुण्य एक ही दिन में शालग्राम-पूजा से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 126 (padma.3.31.126)

यः पुनः पूजयेद्भक्त्या शालग्रामशिला शतम् । उषित्वा स हरेर्लोके चक्रवर्त्तीह जायते

yaḥ punaḥ pūjayedbhaktyā śālagrāmaśilā śatam uṣitvā sa harerloke cakravarttīha jāyate

जो भक्तिपूर्वक सौ शालग्राम-शिलाओं की पूजा करता है, वह हरि के लोक में निवास कर पुनः इस लोक में चक्रवर्ती सम्राट के रूप में जन्म लेता है।

श्लोक 127 (padma.3.31.127)

कामैः क्रोधैः प्रलोभैश्च व्याप्तो यत्र नराधमः । सोऽपि याति हरेर्लोकं शालग्रामशिलार्चनात्

kāmaiḥ krodhaiḥ pralobhaiśca vyāpto yatra narādhamaḥ so'pi yāti harerlokaṁ śālagrāmaśilārcanāt

काम, क्रोध और लोभ से आक्रांत नीच से नीच मनुष्य भी शालग्राम-शिला की पूजा से हरि के लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 128 (padma.3.31.128)

यः पूजयेच्च गोविंदं शालग्रामे मुदा नरः । आभूतसंप्लवं यावन्न स प्रच्यवते दिवः

yaḥ pūjayecca goviṁdaṁ śālagrāme mudā naraḥ ābhūtasaṁplavaṁ yāvanna sa pracyavate divaḥ

जो मनुष्य आनंदपूर्वक शालग्राम में गोविंद की पूजा करता है, वह प्रलयकाल तक स्वर्ग से कभी च्युत नहीं होता।

श्लोक 129 (padma.3.31.129)

विना तीर्थैर्विना दानैर्विना यज्ञैर्विना मतिम् । मुक्तिं यांति नरा वैश्य शालग्रामशिलार्चनात्

vinā tīrthairvinā dānairvinā yajñairvinā matim muktiṁ yāṁti narā vaiśya śālagrāmaśilārcanāt

हे वैश्य! न तीर्थों से, न दानों से, न यज्ञों से और न ही तात्त्विक बुद्धि से — मनुष्य केवल शालग्राम-शिला की पूजा से ही मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 130 (padma.3.31.130)

नरकं गर्भवासं च तिर्यक्त्वं कृमियोनिताम् । न याति वैश्य पापोऽपि शालग्रामशिलार्चकः

narakaṁ garbhavāsaṁ ca tiryaktvaṁ kṛmiyonitām na yāti vaiśya pāpo'pi śālagrāmaśilārcakaḥ

हे वैश्य! शालग्राम-शिला का पूजक पापी होते हुए भी नरक, गर्भवास, तिर्यक्-योनि अथवा कृमि-योनि को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 131 (padma.3.31.131)

दीक्षाविधान मंत्रज्ञो यश्चक्रे बलिमाहरेत् । गंगा गोदावरी रेवा नद्यो मुक्तिप्रदाश्च याः

dīkṣāvidhāna maṁtrajño yaścakre balimāharet gaṁgā godāvarī revā nadyo muktipradāśca yāḥ

जो दीक्षा-विधि और मंत्र का ज्ञाता होकर चक्र में बलि अर्पित करता है, वह महान पुण्य प्राप्त करता है। गंगा, गोदावरी, रेवा (नर्मदा) तथा जो भी अन्य मुक्तिदायिनी नदियाँ हैं —

श्लोक 132 (padma.3.31.132)

निवसंति हिताः सर्वाः शालग्रामशिला जले । नैवेद्यैर्विविधैः पुष्पैर्धूपदीपैर्विलेपनैः

nivasaṁti hitāḥ sarvāḥ śālagrāmaśilā jale naivedyairvividhaiḥ puṣpairdhūpadīpairvilepanaiḥ

— वे सभी शालग्राम-शिला के जल में हितकारी भाव से निवास करती हैं। विविध नैवेद्य, पुष्प, धूप, दीप और चंदन-लेपन से —

श्लोक 133 (padma.3.31.133)

गीतवादित्रस्तोत्राद्यैः शालग्रामशिलार्चनम् । कुरुते मानवो यस्तु कलौ भक्तिपरायणः

gītavāditrastotrādyaiḥ śālagrāmaśilārcanam kurute mānavo yastu kalau bhaktiparāyaṇaḥ

— तथा गीत, वाद्य और स्तोत्र आदि से जो मनुष्य कलियुग में भक्तिपरायण होकर शालग्राम-शिला की पूजा करता है —

श्लोक 134 (padma.3.31.134)

कल्पकोटिसहस्राणि रमते सन्निधौ हरेः । लिंगैस्तु कोटिभिर्दृष्टैर्यत्फलं पूजितैस्तु तैः

kalpakoṭisahasrāṇi ramate sannidhau hareḥ liṁgaistu koṭibhirdṛṣṭairyatphalaṁ pūjitaistu taiḥ

— वह हजारों करोड़ कल्पों तक हरि के समीप निवास करता है। करोड़ों लिंगों को देखकर तथा उनकी पूजा करके जो फल मिलता है —

श्लोक 135 (padma.3.31.135)

शालग्रामशिलायास्तु ह्येकेनाह्ना हि तत्फलम् । सकृदभ्यर्चिते लिंगे शालग्रामशिलोद्भवे

śālagrāmaśilāyāstu hyekenāhnā hi tatphalam sakṛdabhyarcite liṁge śālagrāmaśilodbhave

— वही फल शालग्राम-शिला की पूजा से केवल एक ही दिन में मिल जाता है; शालग्राम-शिला में उत्पन्न लिंग की एक बार पूजा करने मात्र से —

श्लोक 136 (padma.3.31.136)

मुक्तिं प्रयांति मनुजा नूनं सांख्येन वर्जिताः । शालग्रामशिलारूपी यत्र तिष्ठति केशवः

muktiṁ prayāṁti manujā nūnaṁ sāṁkhyena varjitāḥ śālagrāmaśilārūpī yatra tiṣṭhati keśavaḥ

— मनुष्य निश्चय ही सांख्य-ज्ञान के बिना भी मुक्ति को प्राप्त हो जाते हैं। जहाँ केशव शालग्राम-शिला के रूप में विराजमान रहते हैं —

श्लोक 137 (padma.3.31.137)

तत्र देवाः सुरा यक्षा भुवनानि चतुर्दश । शालग्रामशिलायां तु यः श्राद्धं कुरुते नरः

tatra devāḥ surā yakṣā bhuvanāni caturdaśa śālagrāmaśilāyāṁ tu yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ

— वहाँ देवगण, सुरगण, यक्षगण तथा चौदहों भुवन निवास करते हैं। जो मनुष्य शालग्राम-शिला के समक्ष श्राद्ध करता है —

श्लोक 138 (padma.3.31.138)

पितरस्तस्य तिष्ठंति तृप्ताः कल्पशतं दिवि । ये पिबंति नरा नित्यं शालग्रामशिलाजलम्

pitarastasya tiṣṭhaṁti tṛptāḥ kalpaśataṁ divi ye pibaṁti narā nityaṁ śālagrāmaśilājalam

— उसके पितर सौ कल्पों तक तृप्त होकर स्वर्ग में निवास करते हैं। जो मनुष्य नित्य शालग्राम-शिला का जल पीते हैं —

श्लोक 139 (padma.3.31.139)

पंचगव्यसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् । कोटितीर्थसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम्

paṁcagavyasahasraistu sevitaiḥ kiṁ prayojanam koṭitīrthasahasraistu sevitaiḥ kiṁ prayojanam

— उन्हें हजारों पंचगव्य सेवन करने से क्या प्रयोजन? उन्हें हजारों करोड़ तीर्थों के सेवन से भी क्या प्रयोजन?

श्लोक 140 (padma.3.31.140)

तोयं यदि पिबेत्पुण्यं शालग्रामशिलांगजम् । शालग्राम शिला यत्र तत्तीर्थं योजनत्रयम्

toyaṁ yadi pibetpuṇyaṁ śālagrāmaśilāṁgajam śālagrāma śilā yatra tattīrthaṁ yojanatrayam

— यदि वह शालग्राम-शिला के अंग से उत्पन्न पवित्र जल पी ले तो पर्याप्त है। जहाँ शालग्राम-शिला होती है, वह स्थान तीन योजन तक तीर्थ माना जाता है।

श्लोक 141 (padma.3.31.141)

तत्र दानं च होमं च सर्वं कोटिगुणं भवेत् । शालग्रामशिला तोयं यः पिबेद्बिंदुना समम्

tatra dānaṁ ca homaṁ ca sarvaṁ koṭiguṇaṁ bhavet śālagrāmaśilā toyaṁ yaḥ pibedbiṁdunā samam

वहाँ किया गया दान और हवन सब करोड़ गुना फलदायी होता है। जो शालग्राम-शिला के जल की एक बूँद के बराबर भी पी लेता है —

श्लोक 142 (padma.3.31.142)

मातृस्तन्यं पुनर्नैव स पिबेद्विष्णुभाङ्नरः । शालग्राम समीपे तु क्रोशमात्रं समंततः

mātṛstanyaṁ punarnaiva sa pibedviṣṇubhāṅnaraḥ śālagrāma samīpe tu krośamātraṁ samaṁtataḥ

— विष्णु का भागी बना वह मनुष्य फिर कभी माता का स्तन्य-पान नहीं करता (अर्थात् पुनः गर्भ में जन्म नहीं लेता)। शालग्राम के समीप चारों ओर एक क्रोश तक —

श्लोक 143 (padma.3.31.143)

कीटकोपि मृतो याति वैकुंठं भवनं परम् । शालग्रामशिलाचक्रं यो दद्याद्दानमुत्तमम्

kīṭakopi mṛto yāti vaikuṁṭhaṁ bhavanaṁ param śālagrāmaśilācakraṁ yo dadyāddānamuttamam

— वहाँ मरने वाला कीड़ा भी उस परम भवन वैकुंठ को प्राप्त होता है। जो शालग्राम-शिला और चक्र का उत्तम दान करता है —

श्लोक 144 (padma.3.31.144)

भूचक्रं तेन दत्तं स्यात्सशैलवनकाननम् । शालग्रामशिलाया यो मूल्यमुत्पादयेन्नरः

bhūcakraṁ tena dattaṁ syātsaśailavanakānanam śālagrāmaśilāyā yo mūlyamutpādayennaraḥ

— उसके द्वारा मानो पर्वत, वन और कानन सहित समस्त भूचक्र का ही दान कर दिया गया समझना चाहिए। किंतु जो मनुष्य शालग्राम-शिला का मूल्य निर्धारित करता है —

श्लोक 145 (padma.3.31.145)

विक्रेता चानुमंता यः परीक्षासु च मोदते । ते सर्वे नरकं यांति यावदाभूतसंप्लवम्

vikretā cānumaṁtā yaḥ parīkṣāsu ca modate te sarve narakaṁ yāṁti yāvadābhūtasaṁplavam

— उसका विक्रेता, उसकी अनुमति देने वाला तथा उसकी परख में आनंद लेने वाला — ये सभी प्रलयकाल तक नरक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 146 (padma.3.31.146)

ततः संवर्जयेद्वैश्य चक्रस्य क्रयविक्रयम् । बहुनोक्तेन किं वैश्य कर्तव्यं पापभीरुणा

tataḥ saṁvarjayedvaiśya cakrasya krayavikrayam bahunoktena kiṁ vaiśya kartavyaṁ pāpabhīruṇā

अतः हे वैश्य! चक्र के क्रय-विक्रय का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। हे वैश्य! अधिक कहने से क्या लाभ — पाप से डरने वाले को यही करना चाहिए।

श्लोक 147 (padma.3.31.147)

स्मरणं वासुदेवस्य सर्वपापहरं हरेः । तपस्तप्त्वा नरो घोरमरण्ये नियतेंद्रियः

smaraṇaṁ vāsudevasya sarvapāpaharaṁ hareḥ tapastaptvā naro ghoramaraṇye niyateṁdriyaḥ

वासुदेव हरि का स्मरण मात्र समस्त पापों को हर लेता है। वन में इंद्रियों को संयमित रखकर घोर तप करने वाला मनुष्य भी —

श्लोक 148 (padma.3.31.148)

यत्फलं समवाप्नोति तन्नत्वा गरुडध्वजम् । कृत्वापि बहुशः पापं नरो मोहसमन्वितः

yatphalaṁ samavāpnoti tannatvā garuḍadhvajam kṛtvāpi bahuśaḥ pāpaṁ naro mohasamanvitaḥ

— जो फल प्राप्त करता है, वही फल गरुड़ध्वज (विष्णु) को प्रणाम करने मात्र से प्राप्त हो जाता है। मोहग्रस्त होकर बार-बार पाप करने वाला मनुष्य भी —

श्लोक 149 (padma.3.31.149)

न याति नरकं गत्वा सर्वपापहरं हरिम् । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च

na yāti narakaṁ gatvā sarvapāpaharaṁ harim pṛthivyāṁ yāni tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca

— यदि उसने सर्वपापहारी हरि की शरण ले ली हो, तो वह नरक को नहीं जाता। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ और पुण्य-स्थान हैं —

श्लोक 150 (padma.3.31.150)

तानि सर्वाण्यवाप्नोति विष्णोर्नामानुकीर्तनात् । देवं शार्ङ्गधरं विष्णुं ये प्रपन्नाः परायणाः

tāni sarvāṇyavāpnoti viṣṇornāmānukīrtanāt devaṁ śārṅgadharaṁ viṣṇuṁ ye prapannāḥ parāyaṇāḥ

— वे सभी विष्णु के नाम-कीर्तन मात्र से प्राप्त हो जाते हैं। जो लोग शार्ङ्गधारी भगवान विष्णु की शरण में जाकर उन्हीं में परायण हो गए हैं —

श्लोक 151 (padma.3.31.151)

न तेषां यमसालोक्यं न ते स्युर्नरकौकसः । वैष्णवः पुरुषो वैश्य शिवनिंदां करोति यः

na teṣāṁ yamasālokyaṁ na te syurnarakaukasaḥ vaiṣṇavaḥ puruṣo vaiśya śivaniṁdāṁ karoti yaḥ

— उन्हें न तो यमलोक में निवास करना पड़ता है और न ही वे नरकवासी होते हैं। किंतु हे वैश्य! जो वैष्णव पुरुष शिव की निंदा करता है —

श्लोक 152 (padma.3.31.152)

न विंदेद्वैष्णवं लोकं स याति नरकं महत् । उपोष्यैकादशीमेकां प्रसंगेनापि मानवः

na viṁdedvaiṣṇavaṁ lokaṁ sa yāti narakaṁ mahat upoṣyaikādaśīmekāṁ prasaṁgenāpi mānavaḥ

— वह वैष्णव-लोक को प्राप्त नहीं करता, बल्कि महानरक को जाता है। जो मनुष्य प्रसंगवश भी एक बार एकादशी का व्रत रखता है —

श्लोक 153 (padma.3.31.153)

न याति यातनां यामीमिति लोमशतः श्रुतम् । नेदृशं पावनं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते

na yāti yātanāṁ yāmīmiti lomaśataḥ śrutam nedṛśaṁ pāvanaṁ kiṁcittriṣu lokeṣu vidyate

— वह यम की यातना को कभी प्राप्त नहीं होता, ऐसा लोमश ऋषि से सुना गया है। तीनों लोकों में इसके समान पवित्र और कुछ भी नहीं है।

श्लोक 154 (padma.3.31.154)

उभयं पद्मनाभस्य दिनं पातकनाशनम् । तावत्पापानि देहेऽस्मिन्वसंतीह विशांवर

ubhayaṁ padmanābhasya dinaṁ pātakanāśanam tāvatpāpāni dehe'sminvasaṁtīha viśāṁvara

दोनों पक्षों की एकादशी पद्मनाभ के पापनाशक दिन हैं। हे विशांवर! इस देह में पाप तभी तक निवास करते हैं —

श्लोक 155 (padma.3.31.155)

यावन्नोपवसेज्जंतुः पद्मनाभदिनं शुभम् । अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च

yāvannopavasejjaṁtuḥ padmanābhadinaṁ śubham aśvamedhasahasrāṇi rājasūyaśatāni ca

— जब तक प्राणी पद्मनाभ के शुभ दिन का व्रत नहीं रखता। सहस्र अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञ —

श्लोक 156 (padma.3.31.156)

एकादश्युपवासस्य कलां नार्हंति षोडशीम् । एकादशेंद्रियैः पापं यत्कृतं वैश्य मानवैः

ekādaśyupavāsasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm ekādaśeṁdriyaiḥ pāpaṁ yatkṛtaṁ vaiśya mānavaiḥ

— एकादशी के व्रत के सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं हैं। हे वैश्य! मनुष्यों के ग्यारह इंद्रियों द्वारा जो भी पाप किया जाता है —

श्लोक 157 (padma.3.31.157)

एकादश्युपवासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत् । एकादशीसमं किंचित्पुण्यं लोके न विद्यते

ekādaśyupavāsena tatsarvaṁ vilayaṁ vrajet ekādaśīsamaṁ kiṁcitpuṇyaṁ loke na vidyate

— वह सब एकादशी के व्रत से नष्ट हो जाता है। संसार में एकादशी के समान कोई पुण्य नहीं है।

श्लोक 158 (padma.3.31.158)

व्याजेनापि कृता यैस्तु वशं यांति न भास्करेः । स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा शरीरारोग्यदायिनी

vyājenāpi kṛtā yaistu vaśaṁ yāṁti na bhāskareḥ svargamokṣapradā hyeṣā śarīrārogyadāyinī

जिन्होंने इसे केवल बहाने से भी किया हो, वे भी यम (भास्कर-पुत्र) के वश में नहीं आते। यह व्रत स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाला तथा शरीर को आरोग्य देने वाला है।

श्लोक 159 (padma.3.31.159)

सुकलत्रप्रदा ह्येषा जीवत्पुत्रप्रदायिनी । न गंगा न गया वैश्य न काशी न च पुष्करम्

sukalatrapradā hyeṣā jīvatputrapradāyinī na gaṁgā na gayā vaiśya na kāśī na ca puṣkaram

यह व्रत उत्तम पत्नी प्रदान करने वाला तथा दीर्घायु पुत्र देने वाला है। हे वैश्य! न गंगा, न गया, न काशी और न ही पुष्कर —

श्लोक 160 (padma.3.31.160)

न चापि वैष्णवं क्षेत्रं तुल्यं हरिदिनेन तु । यमुना चन्द्रभागा न तुल्या हरिदिनेन तु

na cāpi vaiṣṇavaṁ kṣetraṁ tulyaṁ haridinena tu yamunā candrabhāgā na tulyā haridinena tu

— और न ही कोई वैष्णव क्षेत्र हरि-दिन (एकादशी) के समान है। यमुना और चंद्रभागा नदी भी हरि-दिन के समान नहीं हैं।

श्लोक 161 (padma.3.31.161)

अनायासेन येनात्र प्राप्यते वैष्णवं पदम् । रात्रौ जागरणं कृत्वा समुपोष्य हरेर्दिने

anāyāsena yenātra prāpyate vaiṣṇavaṁ padam rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā samupoṣya harerdine

जिससे बिना किसी कठिनाई के यहीं वैष्णव पद प्राप्त हो जाता है — हरि के दिन व्रत रखकर तथा रात्रि में जागरण करके —

श्लोक 162 (padma.3.31.162)

दश वै पैतृके पक्षे मातृके दश पूर्वजाः । प्रियाया दश ये वैश्य तानुद्धरति निश्चितम्

daśa vai paitṛke pakṣe mātṛke daśa pūrvajāḥ priyāyā daśa ye vaiśya tānuddharati niścitam

— पितृ-पक्ष के दस पूर्वज, मातृ-पक्ष के दस पूर्वज तथा हे वैश्य! प्रिया (पत्नी) के पक्ष के दस पूर्वज — इन सबका वह निश्चय ही उद्धार कर देता है।

श्लोक 163 (padma.3.31.163)

द्वंद्वसंग परित्यक्ता नागारि कृतकेतनाः । स्रग्विणः पीतवसनाः प्रयांति हरिमंदिरम्

dvaṁdvasaṁga parityaktā nāgāri kṛtaketanāḥ sragviṇaḥ pītavasanāḥ prayāṁti harimaṁdiram

द्वंद्वों के बंधन से मुक्त होकर, गरुड़ (नागों के शत्रु) की ध्वजा पर आरूढ़ होकर, माला और पीत वस्त्र धारण किए हुए वे हरि के मंदिर को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 164 (padma.3.31.164)

बालत्वे यौवने वापि वार्द्धके वा विशांवर । उपोष्यैकादशीं नूनं नैति पापोऽतिदुर्गतिम्

bālatve yauvane vāpi vārddhake vā viśāṁvara upoṣyaikādaśīṁ nūnaṁ naiti pāpo'tidurgatim

हे विशांवर! बचपन में, यौवन में अथवा वृद्धावस्था में — जो एकादशी का व्रत रखता है, वह पापी होते हुए भी निश्चय ही अत्यंत दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 165 (padma.3.31.165)

उपोष्येह त्रिरात्राणि कृत्वा वा तीर्थमज्जनम् । दत्वा हेमतिलान्गाश्च स्वर्गं यांतीह मानवाः

upoṣyeha trirātrāṇi kṛtvā vā tīrthamajjanam datvā hematilāngāśca svargaṁ yāṁtīha mānavāḥ

तीन रात्रि व्रत रखकर, अथवा तीर्थ-स्नान करके, तथा स्वर्ण, तिल और गौओं का दान देकर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 166 (padma.3.31.166)

तीर्थे स्नांति न ये वैश्य न दत्तं कांचनं च यैः । नैव तप्तं तपः किंचित्ते स्युः सर्वत्र दुःखिताः

tīrthe snāṁti na ye vaiśya na dattaṁ kāṁcanaṁ ca yaiḥ naiva taptaṁ tapaḥ kiṁcitte syuḥ sarvatra duḥkhitāḥ

हे वैश्य! जो तीर्थ में स्नान नहीं करते, जो स्वर्ण दान नहीं करते तथा जो कुछ भी तप नहीं करते, वे सर्वत्र दुःखी रहते हैं।

श्लोक 167 (padma.3.31.167)

संक्षिप्य कथितं धर्म्मं नरकस्य निरूपणम् । अद्रोहः सर्वभूतेषु वाङ्मनः काय कर्मभिः

saṁkṣipya kathitaṁ dharmmaṁ narakasya nirūpaṇam adrohaḥ sarvabhūteṣu vāṅmanaḥ kāya karmabhiḥ

मैंने तुम्हें संक्षेप में धर्म और नरक का वर्णन बता दिया। वाणी, मन, शरीर और कर्म से समस्त प्राणियों के प्रति द्रोहरहित होना —

श्लोक 168 (padma.3.31.168)

इंद्रियाणां निरोधश्च दानं च हरिसेवनम् । वर्णाश्रमक्रियाणां च पालनं विधितः सदा

iṁdriyāṇāṁ nirodhaśca dānaṁ ca harisevanam varṇāśramakriyāṇāṁ ca pālanaṁ vidhitaḥ sadā

— इंद्रियों का निग्रह, दान, हरि की सेवा तथा वर्ण और आश्रम के कर्तव्यों का सदैव विधिपूर्वक पालन —

श्लोक 169 (padma.3.31.169)

स्वर्गार्थी सर्वदा वैश्य तपोदानं न कीर्तयेत् । यथाशक्ति तथा दद्यादात्मनो हितकाम्यया

svargārthī sarvadā vaiśya tapodānaṁ na kīrtayet yathāśakti tathā dadyādātmano hitakāmyayā

— यही संपूर्ण धर्म है। हे वैश्य! स्वर्ग की कामना करने वाले को अपने तप और दान का बखान कभी नहीं करना चाहिए; उसे अपने कल्याण की कामना से यथाशक्ति दान देना चाहिए।

श्लोक 170 (padma.3.31.170)

उपानद्वस्त्रमन्नानि पत्रं मूलं फलं जलम् । अवंध्यं दिवसं कार्य्यं दरिद्रेणापि वैश्यक

upānadvastramannāni patraṁ mūlaṁ phalaṁ jalam avaṁdhyaṁ divasaṁ kāryyaṁ daridreṇāpi vaiśyaka

जूते, वस्त्र, अन्न, पत्र, मूल, फल अथवा जल — हे वैश्य! निर्धन व्यक्ति को भी किसी दिन को दान के बिना व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।

श्लोक 171 (padma.3.31.171)

इहलोके परे चैव न दत्तं नोपतिष्ठते । दातारो नैव पश्यंति तां तां वै यमयातनाम्

ihaloke pare caiva na dattaṁ nopatiṣṭhate dātāro naiva paśyaṁti tāṁ tāṁ vai yamayātanām

जो दान नहीं दिया गया, वह न इस लोक में और न परलोक में काम आता है। दाता लोग यम की उन-उन यातनाओं को कभी नहीं देखते।

श्लोक 172 (padma.3.31.172)

दीर्घायुषो धनाढ्याश्च भवंतीह पुनःपुनः । किमत्र बहुनोक्तेन यांत्यधर्मेण दुर्गतिम्

dīrghāyuṣo dhanāḍhyāśca bhavaṁtīha punaḥpunaḥ kimatra bahunoktena yāṁtyadharmeṇa durgatim

वे इस लोक में बार-बार दीर्घायु और धनवान होते हैं। अधिक कहने से क्या लाभ — अधर्म से मनुष्य दुर्गति को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 173 (padma.3.31.173)

आरोहंति दिवं धर्म्मे नराः सर्वत्र सर्वदा

ārohaṁti divaṁ dharmme narāḥ sarvatra sarvadā

धर्म के द्वारा मनुष्य सर्वत्र और सदैव स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 174 (padma.3.31.174)

तेन बालत्वमारभ्य कर्तव्यो धर्मसंग्रहः । इति ते कथितं सर्वं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

tena bālatvamārabhya kartavyo dharmasaṁgrahaḥ iti te kathitaṁ sarvaṁ kimanyacchrotumicchasi

अतः बाल्यावस्था से ही धर्म का संग्रह करना चाहिए। इस प्रकार मैंने तुम्हें सब कुछ बता दिया; अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 175 (padma.3.31.175)

विकुंडल उवाच । श्रुत्वा त्वद्वचनं सौम्य प्रसन्नं चित्तमेव मे । गंगोदं पापहं सद्यः पापहारि सतां वचः

vikuṁḍala uvāca śrutvā tvadvacanaṁ saumya prasannaṁ cittameva me gaṁgodaṁ pāpahaṁ sadyaḥ pāpahāri satāṁ vacaḥ

विकुंडल ने कहा — हे सौम्य! तुम्हारे वचन सुनकर मेरा चित्त सर्वथा प्रसन्न हो गया है। जैसे गंगाजल तत्काल पाप हरने वाला है, वैसे ही सज्जनों का वचन भी पापहारी होता है।

श्लोक 176 (padma.3.31.176)

उपकर्तुं प्रियं वक्तुं गुणो नैसर्गिकः सताम् । शीतांशुः क्रियते केन शीतलोऽमृतमंडलः

upakartuṁ priyaṁ vaktuṁ guṇo naisargikaḥ satām śītāṁśuḥ kriyate kena śītalo'mṛtamaṁḍalaḥ

दूसरों की सहायता करना और प्रिय वचन बोलना सज्जनों का सहज गुण है। शीतल अमृतमंडल चंद्रमा को शीतल बनाने वाला भला और कौन है?

श्लोक 177 (padma.3.31.177)

देवदूत ततो ब्रूहि कारुण्यान्मम पृच्छतः । नरकान्निष्कृतिः सद्यो भ्रातुर्मे जायते कथम्

devadūta tato brūhi kāruṇyānmama pṛcchataḥ narakānniṣkṛtiḥ sadyo bhrāturme jāyate katham

हे देवदूत! अतः अब तुम कृपापूर्वक मुझे बताओ, जो मैं पूछ रहा हूँ — मेरे भाई की नरक से शीघ्र मुक्ति कैसे हो सकती है?

श्लोक 178 (padma.3.31.178)

इति तस्य वचः श्रुत्वा देवदूतो जगाद ह । ध्यानं दृष्ट्वा क्षणं ध्यात्वा तन्मैत्री रज्जुबन्धनः

iti tasya vacaḥ śrutvā devadūto jagāda ha dhyānaṁ dṛṣṭvā kṣaṇaṁ dhyātvā tanmaitrī rajjubandhanaḥ

उसके ऐसे वचन सुनकर देवदूत ने यह कहा। ध्यानपूर्वक क्षणभर विचार करके — वह मैत्री का बंधन मानो एक रस्सी के समान था —

श्लोक 179 (padma.3.31.179)

यत्ते वैश्याष्टमे पुण्यं त्वया जन्मनि संचितम् । तद्भ्रात्रे दीयतां सर्वं स्वर्गं तस्य यदीच्छसि

yatte vaiśyāṣṭame puṇyaṁ tvayā janmani saṁcitam tadbhrātre dīyatāṁ sarvaṁ svargaṁ tasya yadīcchasi

— उसने कहा — "हे वैश्य! अपने आठवें पूर्वजन्म में तुमने जो पुण्य संचित किया था, वह सब अपने भाई को दे दो, यदि तुम उसके लिए स्वर्ग चाहते हो।"

श्लोक 180 (padma.3.31.180)

विकुंडल उवाच । किं तत्पुण्यं कथं जातं किं जन्म च पुरातनम् । तत्सर्वं कथ्यतां दूत ततो दास्यामि सत्वरम्

vikuṁḍala uvāca kiṁ tatpuṇyaṁ kathaṁ jātaṁ kiṁ janma ca purātanam tatsarvaṁ kathyatāṁ dūta tato dāsyāmi satvaram

विकुंडल ने कहा — वह पुण्य क्या है, कैसे उत्पन्न हुआ तथा वह प्राचीन जन्म क्या था? हे दूत! यह सब मुझे बताओ, तब मैं तुरंत उसे दे दूँगा।

श्लोक 181 (padma.3.31.181)

देवदूत उवाच । शृणु वैश्य प्रवक्ष्यामि तत्पुण्यं च सहेतुकम् । पुरा मधुवने पुण्ये ऋषिरासीच्च शाकुनिः

devadūta uvāca śṛṇu vaiśya pravakṣyāmi tatpuṇyaṁ ca sahetukam purā madhuvane puṇye ṛṣirāsīcca śākuniḥ

देवदूत ने कहा — हे वैश्य! सुनो, मैं तुम्हें वह पुण्य उसके कारण सहित बताता हूँ। प्राचीन काल में पवित्र मधुवन में शाकुनि नामक एक ऋषि रहते थे।

श्लोक 182 (padma.3.31.182)

तपोऽध्ययन संपन्नस्तेजसां ब्रह्मणा समः । जज्ञिरे तस्य रेवत्यां नव पुत्रा ग्रहा इव

tapo'dhyayana saṁpannastejasāṁ brahmaṇā samaḥ jajñire tasya revatyāṁ nava putrā grahā iva

तप और अध्ययन से संपन्न, तेज में ब्रह्मा के समान वे ऋषि थे। उनकी पत्नी रेवती से नौ ग्रहों के समान नौ पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 183 (padma.3.31.183)

ध्रुवः शीलो बुधस्तारो ज्योतिष्मानुत पंचमः । अग्निहोत्ररता ह्येते गृहधर्मेषु रेमिरे

dhruvaḥ śīlo budhastāro jyotiṣmānuta paṁcamaḥ agnihotraratā hyete gṛhadharmeṣu remire

ध्रुव, शील, बुध, तार तथा पाँचवें ज्योतिष्मान — ये सभी अग्निहोत्र में रत रहकर गृहस्थ-धर्म में रमे रहे।

श्लोक 184 (padma.3.31.184)

निर्मोहो जितकामश्च ध्यानकोशो गुणाधिकः । एते गृहविरक्ताश्च चत्वारो द्विजसूनवः

nirmoho jitakāmaśca dhyānakośo guṇādhikaḥ ete gṛhaviraktāśca catvāro dvijasūnavaḥ

निर्मोह, जितकाम, ध्यानकोश तथा गुणाधिक — ये चार ब्राह्मण-पुत्र गृहस्थ-जीवन से विरक्त थे।

श्लोक 185 (padma.3.31.185)

चतुर्थाश्रममापन्नाः सर्वकामविनिस्पृहाः । ग्रामैकवासिनः सर्वे निःसंगा निष्परिग्रहाः

caturthāśramamāpannāḥ sarvakāmavinispṛhāḥ grāmaikavāsinaḥ sarve niḥsaṁgā niṣparigrahāḥ

वे चतुर्थ आश्रम (संन्यास) में प्रविष्ट हो चुके थे, समस्त कामनाओं से रहित, एक ही ग्राम में स्थायी रूप से न रहने वाले, निःसंग तथा निष्परिग्रह थे।

श्लोक 186 (padma.3.31.186)

निराशा निष्प्रयत्नाश्च सम लोष्टाश्मकांचनाः । येनकेनचिदाच्छन्ना येनकेनचिदाशिताः

nirāśā niṣprayatnāśca sama loṣṭāśmakāṁcanāḥ yenakenacidācchannā yenakenacidāśitāḥ

वे निराश (कामनारहित), प्रयत्नरहित, ढेले, पत्थर और सोने को समान दृष्टि से देखने वाले थे — जो कुछ भी मिल जाए उसी से शरीर ढक लेते और जो कुछ भी मिल जाए वही खा लेते थे।

श्लोक 187 (padma.3.31.187)

सायंग्रहास्तथा नित्यं विष्णुध्यानपरायणाः । जितनिद्रा जिताहारा वातशीतसहिष्णवः

sāyaṁgrahāstathā nityaṁ viṣṇudhyānaparāyaṇāḥ jitanidrā jitāhārā vātaśītasahiṣṇavaḥ

संध्या समय ही भिक्षा ग्रहण करने वाले, सदैव विष्णु के ध्यान में तत्पर, निद्रा और आहार को जीतने वाले, वायु और शीत को सहन करने वाले —

श्लोक 188 (padma.3.31.188)

पश्यंतो विष्णुरूपेण जगत्सर्वं चराचरम् । चरंति लीलया पृथ्वद्यंतेऽन्योन्यं मौनमास्थिताः

paśyaṁto viṣṇurūpeṇa jagatsarvaṁ carācaram caraṁti līlayā pṛthvadyaṁte'nyonyaṁ maunamāsthitāḥ

— संपूर्ण चराचर जगत को विष्णु के ही रूप में देखते हुए, वे लीलापूर्वक पृथ्वी पर विचरण करते और परस्पर मिलने पर भी मौन धारण किए रहते थे।

श्लोक 189 (padma.3.31.189)

न कुर्वंति क्रियां कांचिदर्थमात्रं हि योगिनः । दृष्टज्ञाना असंदेहाश्चिद्विकार विशारदाः

na kurvaṁti kriyāṁ kāṁcidarthamātraṁ hi yoginaḥ dṛṣṭajñānā asaṁdehāścidvikāra viśāradāḥ

ऐसे योगी केवल स्वार्थ के लिए कोई कर्म नहीं करते; उनका ज्ञान साक्षात्कार से प्राप्त, संदेहरहित तथा चित्त के विकारों में निपुण होता है।

श्लोक 190 (padma.3.31.190)

एवं ते तव विप्रस्य पूर्वमष्टमजन्मनि । तिष्ठतो मध्यदेशेषु पुत्रदारकुटुंबिनः

evaṁ te tava viprasya pūrvamaṣṭamajanmani tiṣṭhato madhyadeśeṣu putradārakuṭuṁbinaḥ

इस प्रकार वे चारों संन्यासी पुत्र विचरण करते हुए, और तुम — वही ब्राह्मण अपने पूर्व आठवें जन्म में — मध्यदेश में पुत्र, पत्नी और परिवार सहित रहते हुए —

श्लोक 191 (padma.3.31.191)

गेहं तावकमाजग्मुर्मध्याह्ने क्षुत्पिपासिताः । वैश्वदेवांतरे काले त्वया दृष्टा गृहांगणे

gehaṁ tāvakamājagmurmadhyāhne kṣutpipāsitāḥ vaiśvadevāṁtare kāle tvayā dṛṣṭā gṛhāṁgaṇe

— वे मध्याह्न के समय भूख-प्यास से पीड़ित होकर तुम्हारे घर आए। वैश्वदेव के अनंतर उस समय तुमने उन्हें अपने घर के आंगन में देखा।

श्लोक 192 (padma.3.31.192)

सगद्गदं साश्रुनेत्रं सहर्षं च ससंभ्रमम् । दंडवत्प्रणिपातेन बहुमानपुरःसरम्

sagadgadaṁ sāśrunetraṁ saharṣaṁ ca sasaṁbhramam daṁḍavatpraṇipātena bahumānapuraḥsaram

गद्गद कंठ से, अश्रुपूरित नेत्रों से, हर्ष और उतावलेपन के साथ, दंडवत् प्रणाम करते हुए, अत्यंत सम्मानपूर्वक —

श्लोक 193 (padma.3.31.193)

प्रणम्य चरणौ मूर्ध्ना कृत्वा पाणियुगाञ्जलिम् । तदाभिनन्दिताः सर्वे तया सूनृतया गिरा

praṇamya caraṇau mūrdhnā kṛtvā pāṇiyugāñjalim tadābhinanditāḥ sarve tayā sūnṛtayā girā

— उनके चरणों में मस्तक झुकाकर, दोनों हाथ जोड़कर — तब तुमने इस प्रकार मधुर वाणी से उन सबका अभिनंदन किया।

श्लोक 194 (padma.3.31.194)

अद्य मे सफलं जन्म जीवितं सफलं तथा । अद्य विष्णुः प्रसन्नो मे सनाथोऽद्यास्मि पावनः

adya me saphalaṁ janma jīvitaṁ saphalaṁ tathā adya viṣṇuḥ prasanno me sanātho'dyāsmi pāvanaḥ

"आज मेरा जन्म सफल हुआ और मेरा जीवन भी सफल हुआ। आज विष्णु मुझ पर प्रसन्न हुए हैं, आज मैं सनाथ हुआ हूँ, आज मैं पवित्र हुआ हूँ।"

श्लोक 195 (padma.3.31.195)

धन्योऽस्म्यद्य गृहं धन्यं धन्या अद्य कुटुंबिनः । ममाद्य पितरो धन्या धन्या गावः श्रुतं धनम्

dhanyo'smyadya gṛhaṁ dhanyaṁ dhanyā adya kuṭuṁbinaḥ mamādya pitaro dhanyā dhanyā gāvaḥ śrutaṁ dhanam

"आज मैं धन्य हूँ, मेरा घर धन्य है, आज मेरे परिजन धन्य हैं। आज मेरे पितर धन्य हैं, मेरी गौएँ धन्य हैं तथा मेरा शास्त्रज्ञान और धन भी धन्य है।"

श्लोक 196 (padma.3.31.196)

यद्दृष्टौ भवतां पादौ तापत्रयहरौ मया । भवतां दर्शनं यस्माद्धन्यस्यैव हरेरिव

yaddṛṣṭau bhavatāṁ pādau tāpatrayaharau mayā bhavatāṁ darśanaṁ yasmāddhanyasyaiva hareriva

"क्योंकि आज मैंने आप लोगों के, त्रिविध तापों को हरने वाले चरणों का दर्शन किया है; आप लोगों का दर्शन तो साक्षात् हरि के दर्शन के समान ही धन्यकारी है।"

श्लोक 197 (padma.3.31.197)

एवं संपूज्य कृत्वा तु पादप्रक्षालनं तथा । धृतं मूर्ध्नि विशांश्रेष्ठ श्रद्धया परया तदा

evaṁ saṁpūjya kṛtvā tu pādaprakṣālanaṁ tathā dhṛtaṁ mūrdhni viśāṁśreṣṭha śraddhayā parayā tadā

इस प्रकार सत्कार करके तथा उनके चरण पखारकर, हे विशांश्रेष्ठ! तब तुमने परम श्रद्धा से उस चरणामृत को अपने मस्तक पर धारण किया।

श्लोक 198 (padma.3.31.198)

यत्र पादोदकं वैश्य श्रद्धया शिरसा धृतम् । गंधपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपैर्भावपुरःसरम्

yatra pādodakaṁ vaiśya śraddhayā śirasā dhṛtam gaṁdhapuṣpākṣatairdhūpairdīpairbhāvapuraḥsaram

हे वैश्य! जहाँ चरणामृत को श्रद्धापूर्वक मस्तक पर धारण किया गया — वहाँ चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप और दीप से, भावपूर्वक —

श्लोक 199 (padma.3.31.199)

संपूज्य सुंदरान्नेन भोजिता यतयस्तथा । तृप्ताः परमहंसास्ते विश्रांता मंदिरे निशि

saṁpūjya suṁdarānnena bhojitā yatayastathā tṛptāḥ paramahaṁsāste viśrāṁtā maṁdire niśi

— उनकी पूजा करके तथा उत्तम भोजन कराकर, वे परमहंस संन्यासी तृप्त होकर उस रात तुम्हारे घर में विश्राम करने लगे —

श्लोक 200 (padma.3.31.200)

ध्यायंतश्च परं ब्रह्म यज्ज्योतिर्ज्योतिषां मतम् । तेषामातिथ्यजं पुण्यं जातं यत्ते विशांवर

dhyāyaṁtaśca paraṁ brahma yajjyotirjyotiṣāṁ matam teṣāmātithyajaṁ puṇyaṁ jātaṁ yatte viśāṁvara

— तथा उस परब्रह्म का ध्यान करते रहे, जो समस्त ज्योतियों की ज्योति मानी जाती है। हे विशांवर! उनके प्रति तुम्हारे उस आतिथ्य से जो पुण्य उत्पन्न हुआ —

श्लोक 201 (padma.3.31.201)

न तद्वक्त्रसहस्रेण वक्तुं शक्नोम्यहं खलु । भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां मतिजीविनः

na tadvaktrasahasreṇa vaktuṁ śaknomyahaṁ khalu bhūtānāṁ prāṇinaḥ śreṣṭhāḥ prāṇināṁ matijīvinaḥ

— उसका वर्णन मैं सहस्र मुखों से भी नहीं कर सकता। समस्त प्राणियों में जीव श्रेष्ठ हैं, जीवों में भी बुद्धिजीवी श्रेष्ठ हैं —

श्लोक 202 (padma.3.31.202)

मतिमत्सु सुराः श्रेष्ठा नरेषु ब्रह्मजातयः । ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः

matimatsu surāḥ śreṣṭhā nareṣu brahmajātayaḥ brāhmaṇeṣu ca vidvāṁso vidvatsu kṛtabuddhayaḥ

— बुद्धिमानों में देवता श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में ब्राह्मण-कुल में जन्मे लोग श्रेष्ठ हैं, ब्राह्मणों में विद्वान श्रेष्ठ हैं तथा विद्वानों में कृतबुद्धि (आत्मसाक्षात्कारी) श्रेष्ठ हैं —

श्लोक 203 (padma.3.31.203)

कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः । अतएव सुपूज्यास्ते तस्माच्छ्रेष्ठा जगत्त्रये

kṛtabuddhiṣu kartāraḥ kartṛṣu brahmavedinaḥ ataeva supūjyāste tasmācchreṣṭhā jagattraye

— कृतबुद्धि जनों में कर्मशील (सत्कर्म करने वाले) श्रेष्ठ हैं और कर्मशीलों में भी ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ हैं। इसीलिए वे परम पूजनीय हैं और इसी कारण तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ हैं।

श्लोक 204 (padma.3.31.204)

तत्संगतिर्विशांश्रेष्ठ महापातकनाशिनी । विश्रांता गृहिणो गेहे संतुष्टा ब्रह्मवेदिनः

tatsaṁgatirviśāṁśreṣṭha mahāpātakanāśinī viśrāṁtā gṛhiṇo gehe saṁtuṣṭā brahmavedinaḥ

हे विशांश्रेष्ठ! ऐसे ब्रह्मवेत्ताओं की संगति महापातकों का भी नाश करने वाली है। जब ब्रह्मवेत्ता किसी गृहस्थ के घर में संतुष्ट होकर विश्राम करते हैं —

श्लोक 205 (padma.3.31.205)

आजन्मसंचितं पापं नाशयंतीक्षणेन वै । संचितं यद्गृहस्थस्य पापमामरणांतिकम्

ājanmasaṁcitaṁ pāpaṁ nāśayaṁtīkṣaṇena vai saṁcitaṁ yadgṛhasthasya pāpamāmaraṇāṁtikam

— वे एक ही क्षण में उस गृहस्थ के जन्म-भर के संचित पापों को नष्ट कर देते हैं। गृहस्थ का जो भी पाप मृत्यु-पर्यंत संचित हुआ हो —

श्लोक 206 (padma.3.31.206)

विनिर्दहति तत्सर्वमेकरात्रोषितो यतिः । स्वभ्रात्रे देहि तत्पुण्यं नरकाद्येन मुच्यते

vinirdahati tatsarvamekarātroṣito yatiḥ svabhrātre dehi tatpuṇyaṁ narakādyena mucyate

— उसे एक ही रात्रि वहाँ ठहरा हुआ संन्यासी सर्वथा भस्म कर देता है। यह पुण्य अपने भाई को दे दो, जिससे वह नरक से मुक्त हो जाए।

श्लोक 207 (padma.3.31.207)

इति दूतवचः श्रुत्वा ददौ पुण्यं स सत्वरम् । हृष्टेन चेतसा भ्राता निरयात्सोऽपि निर्गतः

iti dūtavacaḥ śrutvā dadau puṇyaṁ sa satvaram hṛṣṭena cetasā bhrātā nirayātso'pi nirgataḥ

दूत के इन वचनों को सुनकर उसने तुरंत ही अपना वह पुण्य दे दिया, और हर्षित हृदय से उसका भाई भी नरक से मुक्त हो गया।

श्लोक 208 (padma.3.31.208)

देवैस्तु पुष्पवर्षेण पूजितौ च दिवंगतौ । ताभ्यां संपूजितः सम्यग्गतो दूतो यथागतः

devaistu puṣpavarṣeṇa pūjitau ca divaṁgatau tābhyāṁ saṁpūjitaḥ samyaggato dūto yathāgataḥ

देवताओं ने पुष्पवर्षा करके स्वर्ग की ओर जाते हुए उन दोनों भाइयों का सम्मान किया; और उन दोनों के द्वारा सम्यक् रूप से सम्मानित होकर वह दूत भी जैसे आया था वैसे ही लौट गया।

श्लोक 209 (padma.3.31.209)

अखिलभुवनबोधं देवदूतस्यवाक्यं निगमवचनतुल्यं वैश्यपुत्रो निशम्य । स्वकृतसुकृतदानाद्भ्रातरं तारयित्वा सुरपतिवरलोकं तेन सार्द्धं जगाम

akhilabhuvanabodhaṁ devadūtasyavākyaṁ nigamavacanatulyaṁ vaiśyaputro niśamya svakṛtasukṛtadānādbhrātaraṁ tārayitvā surapativaralokaṁ tena sārddhaṁ jagāma

संपूर्ण विश्व को बोध कराने वाले, वेदवाक्य के समान देवदूत के उन वचनों को सुनकर, उस वैश्यपुत्र ने अपने अर्जित सुकृत के दान से अपने भाई का उद्धार करके, उसी के साथ इंद्र के श्रेष्ठ लोक को प्राप्त किया।

श्लोक 210 (padma.3.31.210)

इतिहासमिमं राजन्यः पठेच्छृणुयादपि । स गोसहस्रदानस्य विशोको लभते फलम्

itihāsamimaṁ rājanyaḥ paṭhecchṛṇuyādapi sa gosahasradānasya viśoko labhate phalam

हे राजन्! जो कोई इस इतिहास को पढ़ता है अथवा सुनता भी है, वह शोकरहित होकर सहस्र गौओं के दान का फल प्राप्त करता है।

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