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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 39

विविध तीर्थों की कथा — प्रयाग, गंगा-महिमा एवं दिलीप की तीर्थयात्रा

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

श्लोक 1 (padma.3.39.1)

नारद उवाच । अथ संध्यां समासाद्य स विद्यांतीर्थमुत्तमम् । उपस्पृश्य नरो विद्वान्भवेन्नास्त्यत्र संशयः ।

nārada uvāca atha saṁdhyāṁ samāsādya sa vidyāṁtīrthamuttamam upaspṛśya naro vidvānbhavennāstyatra saṁśayaḥ

नारद जी ने कहा — फिर संध्या को, उस उत्तम विद्यातीर्थ को प्राप्त कर, उसका स्पर्श करने से विद्वान् मनुष्य ज्ञानी हो जाता है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 2 (padma.3.39.2)

रामस्य च प्रसादेन तीर्थराजं कृतं पुरा । तल्लौहित्यं समासाद्य विंद्याद्बहुसुवर्णकम् ।

rāmasya ca prasādena tīrtharājaṁ kṛtaṁ purā tallauhityaṁ samāsādya viṁdyādbahusuvarṇakam

राम की कृपा से पूर्वकाल में इसे तीर्थराज बनाया गया था; उस लौहित्य को प्राप्त कर मनुष्य प्रचुर सुवर्ण-दान का फल पाता है।

श्लोक 3 (padma.3.39.3)

करतोयां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति शक्रलोकं च गच्छति ।

karatoyāṁ samāsādya trirātropoṣito naraḥ aśvamedhamavāpnoti śakralokaṁ ca gacchati

करतोया नदी को प्राप्त कर तीन रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और शक्रलोक को जाता है।

श्लोक 4 (padma.3.39.4)

गंगायास्त्वथ राजेंद्र सागरस्य च संगमे । अश्वमेधं दशगुणं प्रवदंति मनीषणः ।

gaṁgāyāstvatha rājeṁdra sāgarasya ca saṁgame aśvamedhaṁ daśaguṇaṁ pravadaṁti manīṣaṇaḥ

हे राजेंद्र! गंगा और सागर के संगम पर, विद्वज्जन अश्वमेध का दसगुना फल बताते हैं।

श्लोक 5 (padma.3.39.5)

गंगायास्तु परं द्वीपं प्राप्य यः स्नाति भारत । त्रिरात्रोपोषितो राजन्सर्वकाममवाप्नुयात् ।

gaṁgāyāstu paraṁ dvīpaṁ prāpya yaḥ snāti bhārata trirātropoṣito rājansarvakāmamavāpnuyāt

हे भारत! जो गंगा के पार वाले द्वीप को प्राप्त कर स्नान करता है, हे राजन्! वह तीन रात्रि उपवास करके सर्व कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 6 (padma.3.39.6)

ततो वैतरणीं गत्वा नदीं पापप्रमोचनीम् । विरजं तीर्थमासाद्य विराजति यथा शशी ।

tato vaitaraṇīṁ gatvā nadīṁ pāpapramocanīm virajaṁ tīrthamāsādya virājati yathā śaśī

तत्पश्चात् पापमोचिनी वैतरणी नदी को जाकर, तथा विरज तीर्थ को प्राप्त कर मनुष्य चंद्रमा के समान शोभित होता है।

श्लोक 7 (padma.3.39.7)

प्रभावे च कुलं पूत्वा सर्वपापं व्यपोहति । गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नरः ।

prabhāve ca kulaṁ pūtvā sarvapāpaṁ vyapohati gosahasraphalaṁ labdhvā punāti svakulaṁ naraḥ

उसके प्रभाव से कुल को पवित्र कर वह सर्वपाप को दूर कर देता है; सहस्र गौ का फल पाकर मनुष्य अपने कुल को पवित्र करता है।

श्लोक 8 (padma.3.39.8)

शोणस्य ज्योतिरथ्याश्च संगमे निवसञ्छुचिः । तर्पयित्वा पितॄन्देवानग्निष्टोमफलं लभेत् ।

śoṇasya jyotirathyāśca saṁgame nivasañchuciḥ tarpayitvā pitṝndevānagniṣṭomaphalaṁ labhet

शोण और ज्योतिरथ्या के संगम पर शुद्ध होकर निवास करते हुए, पितरों और देवताओं को तर्पण देकर मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है।

श्लोक 9 (padma.3.39.9)

शोणस्य नर्मदायाश्च प्रभवे कुरुपुंगव । वंशगुल्ममुपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् ।

śoṇasya narmadāyāśca prabhave kurupuṁgava vaṁśagulmamupaspṛśya vājimedhaphalaṁ labhet

हे कुरुपुंगव! शोण और नर्मदा के उद्गम-स्थान पर वंशगुल्म का स्पर्श करके मनुष्य वाजिमेध का फल पाता है।

श्लोक 10 (padma.3.39.10)

ऋषभं तीर्थमासाद्य कोशलायां नराधिप । वाजिमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ।

ṛṣabhaṁ tīrthamāsādya kośalāyāṁ narādhipa vājimedhamavāpnoti trirātropoṣito naraḥ

हे नराधिप! कोशला में ऋषभ तीर्थ को प्राप्त कर, तीन रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य वाजिमेध का फल पाता है।

श्लोक 11 (padma.3.39.11)

कोशलायां समासाद्य कालतीर्थमुपस्पृशेत् । वृषभैकादशगुणं लभते नात्र संशयः ।

kośalāyāṁ samāsādya kālatīrthamupaspṛśet vṛṣabhaikādaśaguṇaṁ labhate nātra saṁśayaḥ

कोशला में काल-तीर्थ का स्पर्श करना चाहिए; इससे वृषभ-दान के ग्यारह गुना फल की प्राप्ति होती है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 12 (padma.3.39.12)

पुष्पवत्यामुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । गोसहस्रफलं विंद्यात्कुलं चैव समुद्धरेत् ।

puṣpavatyāmupaspṛśya trirātropoṣito naraḥ gosahasraphalaṁ viṁdyātkulaṁ caiva samuddharet

पुष्पवती नदी का स्पर्श करके तीन रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य सहस्र गौ का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।

श्लोक 13 (padma.3.39.13)

ततो बदारिकातीर्थे स्नात्वा प्रयतमानसः । दीर्घायुष्यमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।

tato badārikātīrthe snātvā prayatamānasaḥ dīrghāyuṣyamavāpnoti svargalokaṁ ca gacchati

तत्पश्चात् संयमित चित्त होकर बदारिका-तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करता है और स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 14 (padma.3.39.14)

ततो महेंद्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् । रामतीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।

tato maheṁdramāsādya jāmadagnyaniṣevitam rāmatīrthe naraḥ snātvā vājimedhaphalaṁ labhet

तत्पश्चात् जमदग्निपुत्र (परशुराम) से सेवित महेंद्र पर्वत को प्राप्त कर, राम-तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य वाजिमेध का फल पाता है।

श्लोक 15 (padma.3.39.15)

मतंगस्य तु केदारं तत्रैव भरतर्षभ । तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ।

mataṁgasya tu kedāraṁ tatraiva bharatarṣabha tatra snātvā naro rājangosahasraphalaṁ labhet

हे भरतर्षभ! वहीं मतंग मुनि का केदार भी है; हे राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य सहस्र गौ का फल पाता है।

श्लोक 16 (padma.3.39.16)

श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत् । अश्वमेधमवाप्नोति परां सिद्धिं च गच्छति ।

śrīparvataṁ samāsādya nadītīramupaspṛśet aśvamedhamavāpnoti parāṁ siddhiṁ ca gacchati

श्रीपर्वत को प्राप्त कर नदी-तट का स्पर्श करना चाहिए; इससे अश्वमेध का फल मिलता है और परम सिद्धि की प्राप्ति होती है।

श्लोक 17 (padma.3.39.17)

श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः । न्यवसत्परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैर्वृतः ।

śrīparvate mahādevo devyā saha mahādyutiḥ nyavasatparamaprīto brahmā ca tridaśairvṛtaḥ

श्रीपर्वत पर महातेजस्वी महादेव देवी के साथ परम प्रसन्न होकर निवास करते थे, और ब्रह्मा भी तीसों देवताओं से घिरे वहाँ रहते थे।

श्लोक 18 (padma.3.39.18)

तत्र देवह्रदे स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः । अश्वमेधमवाप्नोति परां सिद्धिं च गच्छति ।

tatra devahrade snātvā śuciḥ prayatamānasaḥ aśvamedhamavāpnoti parāṁ siddhiṁ ca gacchati

वहाँ देवह्रद में शुद्ध और संयमित चित्त से स्नान करने पर मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और परम सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्लोक 19 (padma.3.39.19)

ऋषभं पर्वतं गत्वा भांडेषु सुरपूजितम् । वाजपेयमवाप्नोति नाकपृष्ठे च मोदते ।

ṛṣabhaṁ parvataṁ gatvā bhāṁḍeṣu surapūjitam vājapeyamavāpnoti nākapṛṣṭhe ca modate

देवगणों से पूजित भांडों में स्थित ऋषभ पर्वत को जाकर मनुष्य वाजपेय का फल पाता है और स्वर्ग के शिखर पर आनंदित होता है।

श्लोक 20 (padma.3.39.20)

ततो गच्छेत कावेरीं वृतामृप्सरसां गणैः । तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ।

tato gaccheta kāverīṁ vṛtāmṛpsarasāṁ gaṇaiḥ tatra snātvā naro rājangosahasraphalaṁ labhet

तत्पश्चात् अप्सराओं के समूहों से घिरी कावेरी नदी को जाना चाहिए; हे राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य सहस्र गौ का फल पाता है।

श्लोक 21 (padma.3.39.21)

तत्र तीर्थे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत् । तत्रोपस्पृश्य राजेंद्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

tatra tīrthe samudrasya kanyātīrthamupaspṛśet tatropaspṛśya rājeṁdra sarvapāpaiḥ pramucyate

समुद्र के उस तीर्थ में कन्यातीर्थ का स्पर्श करना चाहिए; हे राजेंद्र! वहाँ स्पर्श करने से मनुष्य सर्वपापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 22 (padma.3.39.22)

अथ गोकमर्णमासाद्य त्रिषुलोकेषु विश्रुतम् । समुद्रमध्ये राजेंद्र सर्वलोकनमस्कृतम् ।

atha gokamarṇamāsādya triṣulokeṣu viśrutam samudramadhye rājeṁdra sarvalokanamaskṛtam

फिर त्रैलोक्यविख्यात गोकर्ण को प्राप्त कर, हे राजेंद्र! जो समुद्र के मध्य समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत है —

श्लोक 23 (padma.3.39.23)

यत्र ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च तपोधनाः । भूतयक्षाः पिशाचाश्च किन्नराः समहोरगाः ।

yatra brahmādayo devā munayaśca tapodhanāḥ bhūtayakṣāḥ piśācāśca kinnarāḥ samahoragāḥ

जहाँ ब्रह्मा आदि देवगण, तपोधन मुनिगण, भूत, यक्ष, पिशाच, किन्नर और महानाग,

श्लोक 24 (padma.3.39.24)

सिद्धचारणगंधर्वा मानुषाः पन्नगास्तथा । सरितः सागराः शैला उपासंते उमापतिम् ।

siddhacāraṇagaṁdharvā mānuṣāḥ pannagāstathā saritaḥ sāgarāḥ śailā upāsaṁte umāpatim

सिद्ध, चारण, गंधर्व, मनुष्य तथा नागगण, नदियाँ, समुद्र और पर्वत — सभी उमापति की उपासना करते हैं।

श्लोक 25 (padma.3.39.25)

तत्रेशानं समभ्यर्च्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । दशाश्वमेधमाप्नोति गाणपत्यं च विंदति ।

tatreśānaṁ samabhyarcya trirātropoṣito naraḥ daśāśvamedhamāpnoti gāṇapatyaṁ ca viṁdati

वहाँ ईशान की पूजा करके तीन रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य दस अश्वमेध का फल पाता है और गाणपत्य पद प्राप्त करता है।

श्लोक 26 (padma.3.39.26)

उपोष्य द्वादशरात्रं कृतार्थो जायते नरः । तस्मिन्नेव तु गायत्र्याः स्थानं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।

upoṣya dvādaśarātraṁ kṛtārtho jāyate naraḥ tasminneva tu gāyatryāḥ sthānaṁ trailokyaviśrutam

बारह रात्रि उपवास करके मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। उसी स्थान में गायत्री का त्रैलोक्यविख्यात स्थान भी है।

श्लोक 27 (padma.3.39.27)

त्रिरात्रमुषितस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् । निदर्शनं च प्रत्यक्षं ब्राह्मणानां नराधिप ।

trirātramuṣitastatra gosahasraphalaṁ labhet nidarśanaṁ ca pratyakṣaṁ brāhmaṇānāṁ narādhipa

वहाँ तीन रात्रि निवास करने से सहस्र गौ का फल मिलता है; हे नराधिप! ब्राह्मणों के लिए वहाँ एक प्रत्यक्ष दृष्टांत भी है —

श्लोक 28 (padma.3.39.28)

गायत्रीं पठते यस्तु योनिसंकरजो द्विजः । गाथा वा गीतिका वाणी तस्य संपद्यते नृप ।

gāyatrīṁ paṭhate yastu yonisaṁkarajo dvijaḥ gāthā vā gītikā vāṇī tasya saṁpadyate nṛpa

जो वर्णसंकर से उत्पन्न द्विज भी वहाँ गायत्री का पाठ करे, हे राजन्! उसकी वाणी गाथा या गीत के समान मधुर हो जाती है।

श्लोक 29 (padma.3.39.29)

अब्राह्मणस्य पठतः सावित्री तूपनश्यति । संवर्तस्य तु विप्रर्षे वापीमासाद्य दुर्ल्लभाम् ।

abrāhmaṇasya paṭhataḥ sāvitrī tūpanaśyati saṁvartasya tu viprarṣe vāpīmāsādya durllabhām

परंतु अब्राह्मण के पाठ करने पर सावित्री मंत्र स्वयं नष्ट हो जाता है। और हे विप्रर्षे! संवर्त की दुर्लभ बावड़ी को प्राप्त कर —

श्लोक 30 (padma.3.39.30)

रूपस्य भागी भवति सुभगश्चाभिजायते । ततो वेणां समासाद्य तर्पयेत्पितृदेवताः ।

rūpasya bhāgī bhavati subhagaścābhijāyate tato veṇāṁ samāsādya tarpayetpitṛdevatāḥ

मनुष्य सौंदर्य का भागी होता है और सौभाग्यशाली जन्म पाता है। तत्पश्चात् वेणा नदी को प्राप्त कर पितृ-देवताओं का तर्पण करना चाहिए।

श्लोक 31 (padma.3.39.31)

मयूरहंससंयुक्तं विमानं लभते नरः । ततो गोदावरीं प्राप्य नित्यसिद्धनिषेविताम् ।

mayūrahaṁsasaṁyuktaṁ vimānaṁ labhate naraḥ tato godāvarīṁ prāpya nityasiddhaniṣevitām

मनुष्य मयूर और हंस से युक्त विमान प्राप्त करता है। फिर सिद्धों से सतत सेवित गोदावरी को प्राप्त कर —

श्लोक 32 (padma.3.39.32)

गवामयमवाप्नोति वायुलोकं च गच्छति । वेणायाः संगमे स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् ।

gavāmayamavāpnoti vāyulokaṁ ca gacchati veṇāyāḥ saṁgame snātvā vājapeyaphalaṁ labhet

गवामय यज्ञ का फल मिलता है और मनुष्य वायुलोक को जाता है। वेणा के संगम में स्नान करके वाजपेय का फल मिलता है।

श्लोक 33 (padma.3.39.33)

वरदासंगमं स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । ब्रह्मस्थूणां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।

varadāsaṁgamaṁ snātvā gosahasraphalaṁ labhet brahmasthūṇāṁ samāsādya trirātropoṣito naraḥ

वरदा के संगम में स्नान करके सहस्र गौ का फल मिलता है। ब्रह्मस्थूणा को प्राप्त कर तीन रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य —

श्लोक 34 (padma.3.39.34)

गोसहस्रफलं विंद्यात्स्वर्गलोकं च गच्छति । कुब्जावनं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।

gosahasraphalaṁ viṁdyātsvargalokaṁ ca gacchati kubjāvanaṁ samāsādya brahmacārī samāhitaḥ

सहस्र गौ का फल पाकर स्वर्गलोक को जाता है। संयमी ब्रह्मचारी कुब्जावन को प्राप्त कर —

श्लोक 35 (padma.3.39.35)

त्रिरात्रोपोषितः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । ततो देवह्रदे स्नात्वा कृष्णवेणा जलोद्भवे ।

trirātropoṣitaḥ snātvā gosahasraphalaṁ labhet tato devahrade snātvā kṛṣṇaveṇā jalodbhave

तीन रात्रि उपवास करके स्नान करने से सहस्र गौ का फल पाता है। फिर कृष्णवेणा से उत्पन्न देवह्रद में स्नान करके —

श्लोक 36 (padma.3.39.36)

ज्योतिर्मात्र ह्रदे चैव तथा कन्याश्रमे नृप । यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः ।

jyotirmātra hrade caiva tathā kanyāśrame nṛpa yatra kratuśatairiṣṭvā devarājo divaṁ gataḥ

और ज्योतिर्मात्र ह्रद में, तथा हे राजन्! कन्याश्रम में, जहाँ सैकड़ों यज्ञों से यजन करके देवराज इंद्र स्वर्ग को गए —

श्लोक 37 (padma.3.39.37)

अग्निष्टोमशतं विंद्याद्गमनादेव तत्र तु । सर्वदेवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।

agniṣṭomaśataṁ viṁdyādgamanādeva tatra tu sarvadevahrade snātvā gosahasraphalaṁ labhet

वहाँ जाने मात्र से मनुष्य सौ अग्निष्टोम यज्ञों का फल पाता है। सर्वदेवह्रद में स्नान करके सहस्र गौ का फल मिलता है।

श्लोक 38 (padma.3.39.38)

जातिमात्र ह्रदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः । शरभंगाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः ।

jātimātra hrade snātvā bhavejjātismaro naraḥ śarabhaṁgāśramaṁ gatvā śukasya ca mahātmanaḥ

जातिमात्र ह्रद में स्नान करके मनुष्य जातिस्मर (पूर्वजन्म का स्मरण करने वाला) बन जाता है। शरभंग तथा महात्मा शुक के आश्रम को जाकर —

श्लोक 39 (padma.3.39.39)

पितृदेवार्चनरतो गोसहस्रफलं लभेत् । दंडकारण्यमासाद्य महाराज उपस्पृशेत् ।

pitṛdevārcanarato gosahasraphalaṁ labhet daṁḍakāraṇyamāsādya mahārāja upaspṛśet

पितृ-देवताओं की पूजा में रत मनुष्य सहस्र गौ का फल पाता है। दंडकारण्य को प्राप्त कर, हे महाराज! उसका स्पर्श करना चाहिए।

श्लोक 40 (padma.3.39.40)

शरभंगाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः । न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति स्वकुलं नरः ।

śarabhaṁgāśramaṁ gatvā śukasya ca mahātmanaḥ na durgatimavāpnoti punāti svakulaṁ naraḥ

शरभंग तथा महात्मा शुक के आश्रम को जाकर मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता और अपने कुल को पवित्र करता है।

श्लोक 41 (padma.3.39.41)

ततः सूर्यारकं गच्छेज्जमदग्निनिषेवितम् । रामतीर्थं नरः स्नात्वा विंद्याद्बहुसुवर्णकम् ।

tataḥ sūryārakaṁ gacchejjamadagniniṣevitam rāmatīrthaṁ naraḥ snātvā viṁdyādbahusuvarṇakam

तत्पश्चात् जमदग्नि से सेवित सूर्यारक को जाना चाहिए; राम-तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य प्रचुर सुवर्ण-दान का फल पाता है।

श्लोक 42 (padma.3.39.42)

सप्तगोदावरीं स्नात्वा नियतो नियताशनः । महापुण्यमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ।

saptagodāvarīṁ snātvā niyato niyatāśanaḥ mahāpuṇyamavāpnoti devalokaṁ ca gacchati

सप्तगोदावरी में स्नान करके, संयमित और नियमित भोजन करने वाला मनुष्य महापुण्य पाता है और देवलोक को जाता है।

श्लोक 43 (padma.3.39.43)

ततो देवपथं गच्छेन्नियतो नियताशनः । देवसत्रस्य यत्पुण्यं तदवाप्नोति मानवः ।

tato devapathaṁ gacchenniyato niyatāśanaḥ devasatrasya yatpuṇyaṁ tadavāpnoti mānavaḥ

तत्पश्चात् संयमित और नियमित भोजन करते हुए देवपथ जाना चाहिए; वहाँ मनुष्य देवसत्र यज्ञ का पुण्य पाता है।

श्लोक 44 (padma.3.39.44)

तुंगकारण्यमासाद्य ब्रह्मचारी जितेंद्रियः । वेदानध्यापयत्तत्र मुनीन्सारस्वतः पुरा ।

tuṁgakāraṇyamāsādya brahmacārī jiteṁdriyaḥ vedānadhyāpayattatra munīnsārasvataḥ purā

जितेंद्रिय ब्रह्मचारी को तुंगकारण्य प्राप्त होता है, जहाँ पूर्वकाल में सारस्वत मुनि ने मुनियों को वेद पढ़ाए थे।

श्लोक 45 (padma.3.39.45)

तत्र वेदान्प्रणष्टांस्तु मुनेरांगिरसः सुतः । उपविष्टो महर्षीणामुत्तरीयेषु भारत ।

tatra vedānpraṇaṣṭāṁstu munerāṁgirasaḥ sutaḥ upaviṣṭo maharṣīṇāmuttarīyeṣu bhārata

हे भारत! जब वेद विस्मृत हो गए थे, तब अंगिरस मुनि के पुत्र (सारस्वत) महर्षियों के उत्तरीय वस्त्रों पर बैठकर —

श्लोक 46 (padma.3.39.46)

ॐकारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह । येन यत्पूर्वमभ्यस्तं तस्य तत्समुपस्थितम् ।

oṁkāreṇa yathānyāyaṁ samyaguccāritena ha yena yatpūrvamabhyastaṁ tasya tatsamupasthitam

यथान्याय भलीभाँति उच्चरित ॐकार के द्वारा, जिसने जो पहले अभ्यास किया था, उसे वह पुनः प्राप्त हो गया।

श्लोक 47 (padma.3.39.47)

ऋषयस्तत्र देवाश्च वरुणोऽग्निप्रजापतिः । हरिर्नारायणो देवो महादेवस्तथैव च ।

ṛṣayastatra devāśca varuṇo'gniprajāpatiḥ harirnārāyaṇo devo mahādevastathaiva ca

वहाँ ऋषिगण और देवगण थे — वरुण, अग्नि, प्रजापति, देव हरि नारायण, तथा महादेव भी।

श्लोक 48 (padma.3.39.48)

पितामहश्च भगवान्देवैस्सह महाद्युतिः । भृगुं नियोजयामास याजनार्थे महाद्युतिम् ।

pitāmahaśca bhagavāndevaissaha mahādyutiḥ bhṛguṁ niyojayāmāsa yājanārthe mahādyutim

और महातेजस्वी भगवान् पितामह देवताओं सहित वहाँ थे; उन्होंने महातेजस्वी भृगु को यज्ञ कराने के लिए नियुक्त किया।

श्लोक 49 (padma.3.39.49)

ततः स चक्रे भगवानृषीणां विधिवत्तदा । सर्वेषां पुनराधानं देवदृष्टेन कर्मणा ।

tataḥ sa cakre bhagavānṛṣīṇāṁ vidhivattadā sarveṣāṁ punarādhānaṁ devadṛṣṭena karmaṇā

तब उन भगवान् ने देवताओं द्वारा दृष्ट विधि से सभी ऋषियों के लिए विधिपूर्वक अग्नि की पुनर्स्थापना की।

श्लोक 50 (padma.3.39.50)

आज्यभागेन वै तत्र तर्पितास्तु यथाविधि । देवास्त्रिभुवनं याता ऋषयश्च यथासुखम् ।

ājyabhāgena vai tatra tarpitāstu yathāvidhi devāstribhuvanaṁ yātā ṛṣayaśca yathāsukham

वहाँ घृत के भाग से विधिपूर्वक तृप्त होकर देवगण तीनों लोकों को गए और ऋषिगण सुखपूर्वक अपने-अपने स्थान को गए।

श्लोक 51 (padma.3.39.51)

तदरण्यं प्रविष्टस्य तुंगकं राजसत्तम । पापं विनश्यते सद्यः स्त्रिया वै पुरुषस्य वा ।

tadaraṇyaṁ praviṣṭasya tuṁgakaṁ rājasattama pāpaṁ vinaśyate sadyaḥ striyā vai puruṣasya vā

हे राजसत्तम! उस तुंगक वन में प्रवेश करने वाले स्त्री या पुरुष का पाप तत्क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 52 (padma.3.39.52)

तत्र मासं वसेद्धीरो नियतो नियताशनः । ब्रह्मलोकं व्रजेद्राजन्पुनीते च कुलं पुनः ।

tatra māsaṁ vaseddhīro niyato niyatāśanaḥ brahmalokaṁ vrajedrājanpunīte ca kulaṁ punaḥ

वहाँ संयमित और नियमित भोजन करते हुए धीर पुरुष एक मास निवास करे तो, हे राजन्! वह ब्रह्मलोक को जाता है और अपने कुल को पुनः पवित्र करता है।

श्लोक 53 (padma.3.39.53)

मेधावनं समासाद्य पितृदेवांश्च तर्पयेत् । अग्निष्टोममवाप्नोति स्मृतिं मेधां च विंदति ।

medhāvanaṁ samāsādya pitṛdevāṁśca tarpayet agniṣṭomamavāpnoti smṛtiṁ medhāṁ ca viṁdati

मेधावन को प्राप्त कर पितृ-देवताओं को तर्पण देने से मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है तथा स्मृति और बुद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 54 (padma.3.39.54)

तत्र कालंजरं गत्वा गोसहस्रफलं लभेत् । आत्मानं साधयेत्तत्र गिरौ कालंजरे नृप ।

tatra kālaṁjaraṁ gatvā gosahasraphalaṁ labhet ātmānaṁ sādhayettatra girau kālaṁjare nṛpa

वहाँ कालंजर जाकर मनुष्य सहस्र गौ का फल पाता है; हे राजन्! उसे कालंजर पर्वत पर अपनी आत्मा को साधना चाहिए।

श्लोक 55 (padma.3.39.55)

स्वर्गलोके महीयेत नरो नास्त्यत्र संशयः । ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूटे विशांपते ।

svargaloke mahīyeta naro nāstyatra saṁśayaḥ tato girivaraśreṣṭhe citrakūṭe viśāṁpate

वह स्वर्गलोक में पूजित होता है, इसमें संदेह नहीं। हे विशांपते! तत्पश्चात् गिरिवरश्रेष्ठ चित्रकूट में —

श्लोक 56 (padma.3.39.56)

मंदाकिनीं समासाद्य नदीं पापविमोचनीम् । अत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः ।

maṁdākinīṁ samāsādya nadīṁ pāpavimocanīm atrābhiṣekaṁ kurvāṇaḥ pitṛdevārcane rataḥ

पापविमोचिनी मंदाकिनी नदी को प्राप्त कर वहाँ स्नान करते हुए तथा पितृ-देवताओं की पूजा में रत होकर —

श्लोक 57 (padma.3.39.57)

अश्वमेधमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् । ततो गच्छेत राजेंद्र गुहस्थानमनुत्तमम् ।

aśvamedhamavāpnoti gatiṁ ca paramāṁ vrajet tato gaccheta rājeṁdra guhasthānamanuttamam

मनुष्य अश्वमेध का फल पाता है और परम गति को प्राप्त होता है। हे राजेंद्र! तत्पश्चात् अनुपम गुहस्थान को जाना चाहिए।

श्लोक 58 (padma.3.39.58)

यत्र देवो महासेनो नित्यं सन्निहितो नृप । पुमांस्तत्र नरःश्रेष्ठ गमनादेव सिध्यति ।

yatra devo mahāseno nityaṁ sannihito nṛpa pumāṁstatra naraḥśreṣṭha gamanādeva sidhyati

हे राजन्! जहाँ देव महासेन सदा साक्षात् उपस्थित रहते हैं; हे नरश्रेष्ठ! वहाँ पुरुष जाने मात्र से सिद्ध हो जाता है।

श्लोक 59 (padma.3.39.59)

कोटितीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । प्रदक्षिणमुपावृत्य यशःस्थानं व्रजेन्नरः ।

koṭitīrthe naraḥ snātvā gosahasraphalaṁ labhet pradakṣiṇamupāvṛtya yaśaḥsthānaṁ vrajennaraḥ

कोटितीर्थ में स्नान करके मनुष्य सहस्र गौ का फल पाता है; प्रदक्षिणा करके मनुष्य को यशःस्थान जाना चाहिए।

श्लोक 60 (padma.3.39.60)

अभिगम्य महादेवं विराजति यथा शशी । तत्र कूपो महाराज विश्रुतो भरतर्षभ ।

abhigamya mahādevaṁ virājati yathā śaśī tatra kūpo mahārāja viśruto bharatarṣabha

वहाँ महादेव के समीप जाकर मनुष्य चंद्रमा के समान शोभित होता है; हे भरतर्षभ! हे महाराज! वहाँ एक विख्यात कुआँ है —

श्लोक 61 (padma.3.39.61)

समुद्रा यत्र चत्वारो निवसंति युधिष्ठिर । ततोपस्पृश्य राजेंद्र कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।

samudrā yatra catvāro nivasaṁti yudhiṣṭhira tatopaspṛśya rājeṁdra kṛtvā cāpi pradakṣiṇam

हे युधिष्ठिर! जहाँ चारों समुद्र साथ निवास करते हैं। हे राजेंद्र! वहाँ स्पर्श करके और प्रदक्षिणा करके —

श्लोक 62 (padma.3.39.62)

नियतात्मा नरः पूतो गच्छेत परमां गतिम् । ततो गच्छेत्कुरुश्रेष्ठ शृंगवेरपुरं महत् ।

niyatātmā naraḥ pūto gaccheta paramāṁ gatim tato gacchetkuruśreṣṭha śṛṁgaverapuraṁ mahat

संयमित आत्मा, पवित्र मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है। हे कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् महान् शृंगवेरपुर को जाना चाहिए,

श्लोक 63 (padma.3.39.63)

यत्र तीर्णो महाप्राज्ञो रामो दाशरथिः पुरा । गंगायां तु नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेंद्रियः ।

yatra tīrṇo mahāprājño rāmo dāśarathiḥ purā gaṁgāyāṁ tu naraḥ snātvā brahmacārī jiteṁdriyaḥ

जहाँ पूर्वकाल में महाप्राज्ञ दशरथनंदन राम ने नदी पार की थी। जितेंद्रिय ब्रह्मचारी मनुष्य वहाँ गंगा में स्नान करके —

श्लोक 64 (padma.3.39.64)

विधूतपाप्मा भवति वाजपेयं च विंदति । ततो मुंजवटं गछेत्स्थानं देवस्य धीमतः ।

vidhūtapāpmā bhavati vājapeyaṁ ca viṁdati tato muṁjavaṭaṁ gachetsthānaṁ devasya dhīmataḥ

पाप से मुक्त हो जाता है और वाजपेय का फल पाता है। फिर बुद्धिमान् देव के स्थान मुंजवट को जाना चाहिए।

श्लोक 65 (padma.3.39.65)

अभिगम्य महादेवमभ्यर्च्य च नराधिप । प्रदक्षिणमुपावृत्य गाणपत्यमवाप्नुयात् ।

abhigamya mahādevamabhyarcya ca narādhipa pradakṣiṇamupāvṛtya gāṇapatyamavāpnuyāt

हे नराधिप! वहाँ महादेव के समीप जाकर उनकी पूजा करके, प्रदक्षिणा करके मनुष्य गाणपत्य पद प्राप्त करता है।

श्लोक 66 (padma.3.39.66)

ततो गच्छेत राजेंद्र प्रयागमृषिसंस्तुतम् । यत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः ।

tato gaccheta rājeṁdra prayāgamṛṣisaṁstutam yatra brahmādayo devā diśaśca sadigīśvarāḥ

हे राजेंद्र! तत्पश्चात् ऋषियों द्वारा स्तुत प्रयाग को जाना चाहिए, जहाँ ब्रह्मा आदि देवगण, दिशाएँ अपने दिक्पालों सहित,

श्लोक 67 (padma.3.39.67)

लोकपालाश्च सिद्धाश्च निरताः पितरस्तथा । सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव च महर्षयः ।

lokapālāśca siddhāśca niratāḥ pitarastathā sanatkumārapramukhāstathaiva ca maharṣayaḥ

लोकपाल, सिद्धगण, तथा सतत निरत पितरगण, और सनत्कुमार आदि महर्षिगण भी —

श्लोक 68 (padma.3.39.68)

तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाः शुक्रधरास्तथा । सरितः सागराश्चैव गंधर्वाप्सरसस्तथा ।

tathā nāgāḥ suparṇāśca siddhāḥ śukradharāstathā saritaḥ sāgarāścaiva gaṁdharvāpsarasastathā

तथा नाग, सुपर्ण, शुद्ध तेजोमय सिद्ध, नदियाँ और समुद्र, तथा गंधर्व और अप्सराएँ भी —

श्लोक 69 (padma.3.39.69)

हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः । तत्र त्रीण्यपि कुंडानि तयोर्मध्येन जाह्नवी ।

hariśca bhagavānāste prajāpatipuraskṛtaḥ tatra trīṇyapi kuṁḍāni tayormadhyena jāhnavī

और भगवान् हरि स्वयं प्रजापति के सम्मुख सम्मानित होकर वहाँ विराजते हैं। वहाँ तीनों कुंड हैं, और उनके मध्य से जाह्नवी बहती है।

श्लोक 70 (padma.3.39.70)

प्रयागात्समतिक्रांता सर्वतीर्थपुरस्कृता । तपनस्य सुता तत्र त्रिषु लोकेषु विश्रुता ।

prayāgātsamatikrāṁtā sarvatīrthapuraskṛtā tapanasya sutā tatra triṣu lokeṣu viśrutā

प्रयाग से आगे बढ़कर, समस्त तीर्थों में सम्मानित — वहाँ सूर्यपुत्री (यमुना) भी है, जो त्रैलोक्यविख्यात है,

श्लोक 71 (padma.3.39.71)

यमुनागंगया सार्द्धं संगता लोकभाविनी । गंगायमुनयोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम् ।

yamunāgaṁgayā sārddhaṁ saṁgatā lokabhāvinī gaṁgāyamunayormadhye pṛthivyā jaghanaṁ smṛtam

जो गंगा के साथ मिलकर संसार को कल्याण देने वाली है। गंगा और यमुना के मध्य को पृथ्वी का जघन कहा गया है,

श्लोक 72 (padma.3.39.72)

प्रयागं जघनस्यांतमुपस्थमृषयो विदुः । प्रयागं सुप्रतिष्ठानं कंबलाश्वतरावुभौ ।

prayāgaṁ jaghanasyāṁtamupasthamṛṣayo viduḥ prayāgaṁ supratiṣṭhānaṁ kaṁbalāśvatarāvubhau

और प्रयाग को उस जघन का उपस्थ (केंद्र) ऋषिगण मानते हैं। प्रयाग सुप्रतिष्ठित है, कंबल और अश्वतर दोनों नागों से युक्त,

श्लोक 73 (padma.3.39.73)

तीर्थं भोगवती चैव वेदी प्रोक्ता प्रजापतेः । तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्त्तिमंतो युधिष्ठिर ।

tīrthaṁ bhogavatī caiva vedī proktā prajāpateḥ tatra vedāśca yajñāśca mūrttimaṁto yudhiṣṭhira

और वहाँ भोगवती तीर्थ भी है, जिसे प्रजापति की वेदी कहा गया है। हे युधिष्ठिर! वहाँ वेद और यज्ञ मूर्तिमान होकर —

श्लोक 74 (padma.3.39.74)

प्रजापतिमुपासंत ऋषयश्च महानघाः । यजंते क्रतुभिर्देवांस्तथा चक्रधरा नृप ।

prajāpatimupāsaṁta ṛṣayaśca mahānaghāḥ yajaṁte kratubhirdevāṁstathā cakradharā nṛpa

प्रजापति की उपासना करते हैं, और महान् निष्पाप ऋषिगण, तथा चक्रधारी विष्णु भी यज्ञों द्वारा देवताओं की पूजा करते हैं।

श्लोक 75 (padma.3.39.75)

ततः पुण्यतमं नास्ति त्रिषु लोकेषु भारत । प्रयागं सर्वतीर्थेभ्यः प्रभावेणाधिकं प्रभो ।

tataḥ puṇyatamaṁ nāsti triṣu lokeṣu bhārata prayāgaṁ sarvatīrthebhyaḥ prabhāveṇādhikaṁ prabho

हे भारत! त्रिलोक में इससे बढ़कर पवित्र स्थान नहीं है। हे प्रभो! प्रयाग अपने प्रभाव में सभी तीर्थों से अधिक है।

श्लोक 76 (padma.3.39.76)

श्रवणात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि । मूर्धका नमनाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

śravaṇāttasya tīrthasya nāmasaṁkīrtanādapi mūrdhakā namanādvāpi sarvapāpaiḥ pramucyate

उस तीर्थ का श्रवण मात्र से, अथवा नाम-संकीर्तन से, अथवा उसे सिर झुकाने मात्र से भी मनुष्य सर्वपापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 77 (padma.3.39.77)

तत्राभिषेकं यः कुर्यात्संगमे संशितव्रतः । पुण्यं सुमहदाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ।

tatrābhiṣekaṁ yaḥ kuryātsaṁgame saṁśitavrataḥ puṇyaṁ sumahadāpnoti rājasūyāśvamedhayoḥ

जो संशितव्रत होकर संगम पर स्नान करता है, वह राजसूय और अश्वमेध — दोनों का अत्यंत महान् पुण्य पाता है।

श्लोक 78 (padma.3.39.78)

एषा यजनभूमिर्हि देवानामपि तत्कथा । दत्तं तत्र स्वल्पमपि महद्भवति भारत ।

eṣā yajanabhūmirhi devānāmapi tatkathā dattaṁ tatra svalpamapi mahadbhavati bhārata

यह देवताओं की भी यज्ञभूमि है — ऐसा कहा जाता है। हे भारत! वहाँ थोड़ा भी दिया गया दान महान् बन जाता है।

श्लोक 79 (padma.3.39.79)

न देववचनात्तात न लोकवचनादपि । मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमरणं प्रति ।

na devavacanāttāta na lokavacanādapi matirutkramaṇīyā te prayāgamaraṇaṁ prati

हे तात! न देवताओं के कहने से, न लोक के कहने से भी, प्रयाग में मृत्यु के प्रति तुम्हारी बुद्धि को डिगना चाहिए।

श्लोक 80 (padma.3.39.80)

दशतीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथापराः । येषां सान्निध्यमत्रैव कीर्त्तितं कुरुनंदन ।

daśatīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭyastathāparāḥ yeṣāṁ sānnidhyamatraiva kīrttitaṁ kurunaṁdana

हे कुरुनंदन! दस हजार तीर्थ और साठ करोड़ अन्य तीर्थ भी वहाँ साक्षात् उपस्थित रहते हैं, ऐसा कहा जाता है।

श्लोक 81 (padma.3.39.81)

चतुर्विद्ये च यत्पुण्यं सत्यवादिषु चैव यत् । स्नातएवतदाप्नोतिगंगायामुनसंगमे ।

caturvidye ca yatpuṇyaṁ satyavādiṣu caiva yat snātaevatadāpnotigaṁgāyāmunasaṁgame

चारों विद्याओं में जो पुण्य है, और सत्यवादियों में जो पुण्य है — वह सब गंगा-यमुना के संगम में स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 82 (padma.3.39.82)

ततो भोगवती नाम वासुकेस्तीर्थमुत्तमम् । तत्राभिषेकं यः कुर्यात्सोऽश्वमेधमवाप्नुयात् ।

tato bhogavatī nāma vāsukestīrthamuttamam tatrābhiṣekaṁ yaḥ kuryātso'śvamedhamavāpnuyāt

तत्पश्चात् वासुकि का उत्तम तीर्थ भोगवती है; जो वहाँ स्नान करता है, वह अश्वमेध का फल पाता है।

श्लोक 83 (padma.3.39.83)

तत्र हंसप्रपतनं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । दशाश्वमेधिकं चैव गंगायां कुरुनंदन ।

tatra haṁsaprapatanaṁ tīrthaṁ trailokyaviśrutam daśāśvamedhikaṁ caiva gaṁgāyāṁ kurunaṁdana

हे कुरुनंदन! वहाँ त्रैलोक्यविख्यात हंसप्रपतन तीर्थ है, और गंगा में दशाश्वमेधिक तीर्थ भी है।

श्लोक 84 (padma.3.39.84)

कुरुक्षेत्रसमा गंगा यत्र तत्रावगाहिता । विशेषो वै कनखले प्रयागं परमं महत् ।

kurukṣetrasamā gaṁgā yatra tatrāvagāhitā viśeṣo vai kanakhale prayāgaṁ paramaṁ mahat

गंगा जहाँ भी स्नान की जाए, कुरुक्षेत्र के समान फलदायी है; उसकी विशेषता कनखल में है, और परम महान् है प्रयाग।

श्लोक 85 (padma.3.39.85)

यद्यकार्यशतं कृत्वा कृतं गंगावसेवनम् । सर्वं तत्तस्य गंगापो दहत्यग्निरिवेंधनम् ।

yadyakāryaśataṁ kṛtvā kṛtaṁ gaṁgāvasevanam sarvaṁ tattasya gaṁgāpo dahatyagniriveṁdhanam

यदि सौ अकार्य करके भी मनुष्य ने गंगा का सेवन किया हो, तो गंगाजल उन सभी को उसी प्रकार जला देता है जैसे अग्नि ईंधन को।

श्लोक 86 (padma.3.39.86)

सर्वं दहति गंगापस्तूलराशिमिवानलः । सर्वं कृतयुगे पुण्यं त्रेतायां पुष्करं स्मृतम् ।

sarvaṁ dahati gaṁgāpastūlarāśimivānalaḥ sarvaṁ kṛtayuge puṇyaṁ tretāyāṁ puṣkaraṁ smṛtam

गंगाजल सबको उसी प्रकार भस्म कर देता है जैसे अग्नि रुई के ढेर को। सारा पुण्य कृतयुग में था, त्रेता में पुष्कर उसका स्थान लेता है,

श्लोक 87 (padma.3.39.87)

द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं गंगा कलियुगे स्मृता । पुष्करे तु तपस्तप्येद्दानं दद्यान्महालये ।

dvāpare tu kurukṣetraṁ gaṁgā kaliyuge smṛtā puṣkare tu tapastapyeddānaṁ dadyānmahālaye

द्वापर में कुरुक्षेत्र, और कलियुग में गंगा को श्रेष्ठ माना गया है। पुष्कर में तप करना चाहिए, महालय में दान देना चाहिए।

श्लोक 88 (padma.3.39.88)

मलये त्वग्निमारोहेद्भृगुतुंगे त्वनाशनम् । पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गंगापो मध्यगेषु च ।

malaye tvagnimārohedbhṛgutuṁge tvanāśanam puṣkare tu kurukṣetre gaṁgāpo madhyageṣu ca

मलय में अग्नि में प्रवेश करना चाहिए, भृगुतुंग में अन्न-त्याग करना चाहिए। परंतु पुष्कर में, कुरुक्षेत्र में, और गंगा के जल के बीच में —

श्लोक 89 (padma.3.39.89)

सद्यस्तारयते जंतुः सप्तसप्तावरांस्तथा । पुनाति कीर्त्तिता पापं दृष्ट्वा पुण्यं प्रयच्छति ।

sadyastārayate jaṁtuḥ saptasaptāvarāṁstathā punāti kīrttitā pāpaṁ dṛṣṭvā puṇyaṁ prayacchati

प्राणी तत्काल तर जाता है, साथ ही अपने से पूर्व और पश्चात् की सात-सात पीढ़ियाँ भी तर जाती हैं। इसका नाम लेने मात्र से पाप शुद्ध होता है, दर्शन से पुण्य मिलता है,

श्लोक 90 (padma.3.39.90)

अवगाढा च पीत्वा च पुनात्यासप्तमं कुलम् । यावदस्थि मनुष्यस्य गंगायाः स्पृशते जलम् ।

avagāḍhā ca pītvā ca punātyāsaptamaṁ kulam yāvadasthi manuṣyasya gaṁgāyāḥ spṛśate jalam

और इसमें डूबकर तथा इसे पीकर मनुष्य सात पीढ़ियों के कुल को पवित्र करता है। जब तक मनुष्य की अस्थि गंगाजल का स्पर्श करती रहती है,

श्लोक 91 (padma.3.39.91)

तावत्स पुरुषो राजन्स्वर्गलोके महीयते । यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।

tāvatsa puruṣo rājansvargaloke mahīyate yathā puṇyāni tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca

तब तक, हे राजन्! वह पुरुष स्वर्गलोक में पूजित रहता है। जैसे पुण्यशाली तीर्थ हैं और पुण्यशाली आयतन हैं,

श्लोक 92 (padma.3.39.92)

उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवति परलोकभाक् । न गंगा सदृशं तीर्थं न देवः केशवात्परः ।

upāsya puṇyaṁ labdhvā ca bhavati paralokabhāk na gaṁgā sadṛśaṁ tīrthaṁ na devaḥ keśavātparaḥ

वैसे ही उनकी उपासना और पुण्य प्राप्त कर मनुष्य परलोक का भागी बनता है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है, केशव से बढ़कर कोई देवता नहीं है,

श्लोक 93 (padma.3.39.93)

ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः । यत्र गंगा महाराज स देशस्तत्र योजनम् ।

brāhmaṇebhyaḥ paraṁ nāsti evamāha pitāmahaḥ yatra gaṁgā mahārāja sa deśastatra yojanam

और ब्राह्मणों से बढ़कर कुछ नहीं है — ऐसा स्वयं पितामह ने कहा है। हे महाराज! जहाँ गंगा है, वहाँ एक योजन तक वह प्रदेश ही पवित्र है,

श्लोक 94 (padma.3.39.94)

सिद्धक्षेत्रं च विज्ञेयं गंगातीरसमाश्रितम् । इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनां मानसेषु च ।

siddhakṣetraṁ ca vijñeyaṁ gaṁgātīrasamāśritam idaṁ satyaṁ dvijātīnāṁ sādhūnāṁ mānaseṣu ca

और गंगातट के आश्रय में स्थित भूमि को सिद्धक्षेत्र जानना चाहिए। यह सत्य द्विजों और साधुओं के मन में सदा रहना चाहिए,

श्लोक 95 (padma.3.39.95)

मुक्तिं चैव जपेत्कर्णे शिष्टस्यानुगतस्य च । इदं धर्म्यमिदं मेध्यमिदं स्वर्ग्यमिदं सुखम् ।

muktiṁ caiva japetkarṇe śiṣṭasyānugatasya ca idaṁ dharmyamidaṁ medhyamidaṁ svargyamidaṁ sukham

और अनुशासित तथा अनुगत व्यक्ति के कान में मुक्ति का यह मंत्र फूँकना चाहिए — यह धर्ममय है, यह पवित्र है, यह स्वर्गदायी है, यह सुखदायी है।

श्लोक 96 (padma.3.39.96)

इदं पुण्यतमं रम्यं पावनं धर्ममुत्तमम् । महीशीर्षमिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् ।

idaṁ puṇyatamaṁ ramyaṁ pāvanaṁ dharmamuttamam mahīśīrṣamidaṁ guhyaṁ sarvapāpapramocanam

यह परम पुण्यमय, रमणीय, पावन और उत्तम धर्म है; यह पृथ्वी का गुह्य शिखर है, जो सर्वपापों से मुक्त कर देता है।

श्लोक 97 (padma.3.39.97)

अधीत्य द्विजमध्ये च निर्मलत्वमवाप्नुयात् । श्रीमत्स्वर्ग्यं महापुण्यं सपत्नशमनं शिवम् ।

adhītya dvijamadhye ca nirmalatvamavāpnuyāt śrīmatsvargyaṁ mahāpuṇyaṁ sapatnaśamanaṁ śivam

ब्राह्मणों के मध्य इसका अध्ययन कर मनुष्य निर्मलता प्राप्त करता है। यह श्रीयुक्त, स्वर्गदायी, महापुण्यमय, शत्रुनाशक और मंगलकारी है;

श्लोक 98 (padma.3.39.98)

मेधाजननमग्र्यं वै तीर्थवंशानुकीर्त्तनम् । अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात् ।

medhājananamagryaṁ vai tīrthavaṁśānukīrttanam aputro labhate putramadhano dhanamāpnuyāt

यह बुद्धि को जन्म देने वाला श्रेष्ठतम है, क्योंकि यह तीर्थों की वंशावली का कीर्तन है। जो निःसंतान है वह पुत्र पाता है, जो निर्धन है वह धन पाता है,

श्लोक 99 (padma.3.39.99)

महीं विजयते राजा वैश्यो धनमवाप्नुयात् । शूद्रो यातीप्सितान्कामान्ब्राह्मणः पारगः पठन् ।

mahīṁ vijayate rājā vaiśyo dhanamavāpnuyāt śūdro yātīpsitānkāmānbrāhmaṇaḥ pāragaḥ paṭhan

राजा पृथ्वी को जीतता है, वैश्य धन पाता है, शूद्र अभीष्ट कामनाएँ पाता है, और पाठ करने वाला ब्राह्मण विद्या के पार तक पहुँचता है।

श्लोक 100 (padma.3.39.100)

यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थपुण्यं सदा शुचि । जातिस्मरत्वमाप्नोति नाकपृष्ठे च मोदते ।

yaścedaṁ śṛṇuyānnityaṁ tīrthapuṇyaṁ sadā śuci jātismaratvamāpnoti nākapṛṣṭhe ca modate

जो इस तीर्थ-पुण्य को नित्य पवित्र होकर सुनता है, वह पूर्वजन्म का स्मरण प्राप्त करता है और स्वर्ग के शिखर पर आनंदित होता है।

श्लोक 101 (padma.3.39.101)

गम्यान्यपि च तीर्थानि कीर्तितान्यगमान्यपि । मनसाप्यभिगच्छेत सर्वतीर्थमनीषया ।

gamyānyapi ca tīrthāni kīrtitānyagamānyapi manasāpyabhigaccheta sarvatīrthamanīṣayā

जो तीर्थ जाए जा सकते हैं और जो कहे तो गए पर पहुँचे नहीं जा सकते — उन सबका मन से ही, समस्त तीर्थों को जानने की इच्छा से, अभिगमन करना चाहिए।

श्लोक 102 (padma.3.39.102)

एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः । ऋषिभिर्देवकल्पैश्च कृतानि सुकृतैषिभिः ।

etāni vasubhiḥ sādhyairādityairmarudaśvibhiḥ ṛṣibhirdevakalpaiśca kṛtāni sukṛtaiṣibhiḥ

इनका सेवन वसुओं, साध्यों, आदित्यों, मरुतों और अश्विनीकुमारों ने किया है, तथा देवतुल्य, सुकर्मों के इच्छुक ऋषियों ने भी किया है।

श्लोक 103 (padma.3.39.103)

एवं त्वमपि कौरव्य विधिनानेन सुव्रत । व्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्द्धते ।

evaṁ tvamapi kauravya vidhinānena suvrata vraja tīrthāni niyataḥ puṇyaṁ puṇyena varddhate

हे कौरव्य, सुव्रत! इसी प्रकार तुम भी इसी विधि से संयमपूर्वक तीर्थों में जाओ; पुण्य से पुण्य ही बढ़ता है।

श्लोक 104 (padma.3.39.104)

भावितैः करणैः पूर्वमास्तिक्याछ्रुतिदर्शनात् । प्राप्यंते तानि तीर्थानि सद्भिः शिष्टानुदर्शिभिः ।

bhāvitaiḥ karaṇaiḥ pūrvamāstikyāchrutidarśanāt prāpyaṁte tāni tīrthāni sadbhiḥ śiṣṭānudarśibhiḥ

पहले से भावित इंद्रियों वाले, आस्तिकता और श्रुति-दर्शन से युक्त, विशिष्टजनों के अनुसरण करने वाले साधुजनों द्वारा ही वे तीर्थ प्राप्त किए जाते हैं।

श्लोक 105 (padma.3.39.105)

नाकृतो नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः । स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः ।

nākṛto nākṛtātmā ca nāśucirna ca taskaraḥ snāti tīrtheṣu kauravya na ca vakramatirnaraḥ

हे कौरव्य! जो अकृत है, जिसकी आत्मा अपरिष्कृत है, जो अशुद्ध है, जो चोर है, अथवा जिसकी बुद्धि कुटिल है — ऐसा मनुष्य वास्तव में तीर्थों में स्नान नहीं करता।

श्लोक 106 (padma.3.39.106)

त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना । पितरस्तर्पितास्तात सर्वे च प्रपितामहाः । पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणास्तथा ।

tvayā tu samyagvṛttena nityaṁ dharmārthadarśinā pitarastarpitāstāta sarve ca prapitāmahāḥ pitāmahapurogāśca devāḥ sarṣigaṇāstathā

किंतु सम्यक् आचरण से, सदा धर्म और अर्थ को देखने वाले तुमने, हे तात! अपने सभी पितरों, प्रपितामहों, पितामह-प्रमुख देवताओं और ऋषिगणों को तृप्त कर दिया है।

श्लोक 107 (padma.3.39.107)

वसिष्ठ उवाच । त्वं च धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः । दिलीपकीर्तिं महतीं प्राप्स्यसे भुवि शाश्वतीम् ।

vasiṣṭha uvāca tvaṁ ca dharmeṇa dharmajña nityamevābhitoṣitāḥ dilīpakīrtiṁ mahatīṁ prāpsyase bhuvi śāśvatīm

वसिष्ठ जी ने कहा — हे धर्मज्ञ! तुमने धर्म से नित्य ही उन्हें संतुष्ट किया है; तुम पृथ्वी पर दिलीप के समान महान् और शाश्वत कीर्ति प्राप्त करोगे।

श्लोक 108 (padma.3.39.108)

नारद उवाच । एवमुक्त्वाभ्यनुज्ञाप्य वसिष्ठो भगवानृषिः । प्रीतः प्रीतेनमनसा तत्रैवांतरधीयत ।

nārada uvāca evamuktvābhyanujñāpya vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ prītaḥ prītenamanasā tatraivāṁtaradhīyata

नारद जी ने कहा — ऐसा कहकर और अनुमति देकर भगवान् ऋषि वसिष्ठ प्रसन्नचित्त होकर वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 109 (padma.3.39.109)

दिलीपः कुरुशार्दूल शास्त्रतत्त्वार्थदर्शनात् । वसिष्ठवचनाच्चैव पृथिवीमनुचक्रमे ।

dilīpaḥ kuruśārdūla śāstratattvārthadarśanāt vasiṣṭhavacanāccaiva pṛthivīmanucakrame

हे कुरुशार्दूल! दिलीप ने शास्त्रों के तत्त्वार्थ-दर्शन से तथा वसिष्ठ के वचन से पृथ्वी की परिक्रमा की।

श्लोक 110 (padma.3.39.110)

एवमेषा महाभाग प्रतिष्ठाने प्रतिष्ठिता । तीर्थयात्रा महापुण्या सर्वपापप्रमोचनी ।

evameṣā mahābhāga pratiṣṭhāne pratiṣṭhitā tīrthayātrā mahāpuṇyā sarvapāpapramocanī

हे महाभाग! इस प्रकार प्रतिष्ठान में स्थापित यह महापुण्यमयी, सर्वपापनाशिनी तीर्थयात्रा है।

श्लोक 111 (padma.3.39.111)

अनेन विधिना यस्तु पृथिवीं पर्यटिष्यति । अश्वमेधशतं साग्रं फलं प्रेत्यैष भोक्ष्यते ।

anena vidhinā yastu pṛthivīṁ paryaṭiṣyati aśvamedhaśataṁ sāgraṁ phalaṁ pretyaiṣa bhokṣyate

इस विधि से जो पृथ्वी की परिक्रमा करेगा, वह मृत्यु के पश्चात् सौ से भी अधिक अश्वमेध यज्ञों का फल भोगेगा।

श्लोक 112 (padma.3.39.112)

ततश्चाष्टगुणं पार्थ प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् । दिलीपः पार्थ नृपतिर्यथापूर्वमवाप्तवान् ।

tataścāṣṭaguṇaṁ pārtha prāpsyase dharmamuttamam dilīpaḥ pārtha nṛpatiryathāpūrvamavāptavān

हे पार्थ! तत्पश्चात् तुम राजा दिलीप द्वारा पूर्वकाल में पाए गए उत्तम धर्म से आठ गुना धर्म पाओगे।

श्लोक 113 (padma.3.39.113)

नेता च त्वमृषीन्यस्मात्तस्मात्तेष्टगुणं फलम् । रक्षोगणविकीर्णानि तीर्थान्येतानि भारत ।

netā ca tvamṛṣīnyasmāttasmātteṣṭaguṇaṁ phalam rakṣogaṇavikīrṇāni tīrthānyetāni bhārata

और चूँकि तुम ऋषियों के नेता बनोगे, इसीलिए तुम्हें आठ गुना फल मिलेगा। हे भारत! ये तीर्थ अभी राक्षसगणों से भरे पड़े हैं —

श्लोक 114 (padma.3.39.114)

न गतिर्विद्यतेऽन्यस्य त्वामृते कुरुनंदन । इदं देवर्षिचरितं सर्वतीर्थानुसंश्रितम् ।

na gatirvidyate'nyasya tvāmṛte kurunaṁdana idaṁ devarṣicaritaṁ sarvatīrthānusaṁśritam

हे कुरुनंदन! तुम्हारे अतिरिक्त उनके लिए कोई अन्य शरण नहीं है। यह देवर्षियों का यह चरित, समस्त तीर्थों के आश्रय से युक्त —

श्लोक 115 (padma.3.39.115)

यः पठेत्कल्यमुत्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते । ऋषिमुख्याः सदा यत्र वाल्मीकिस्त्वथ कश्यपः ।

yaḥ paṭhetkalyamutthāya sarvapāpaiḥ pramucyate ṛṣimukhyāḥ sadā yatra vālmīkistvatha kaśyapaḥ

जो इसे प्रातःकाल उठकर पढ़ता है, वह सर्वपापों से मुक्त हो जाता है। जहाँ वाल्मीकि, कश्यप जैसे श्रेष्ठ ऋषि सदा रहते हैं,

श्लोक 116 (padma.3.39.116)

आत्रेयस्त्वथ कौंडिन्यो विश्वामित्रोऽथ गौतमः । असितो देवलश्चैव मार्कंडेयोऽथ गालवः ।

ātreyastvatha kauṁḍinyo viśvāmitro'tha gautamaḥ asito devalaścaiva mārkaṁḍeyo'tha gālavaḥ

आत्रेय, कौंडिन्य, विश्वामित्र, गौतम, असित और देवल, मार्कंडेय और गालव,

श्लोक 117 (padma.3.39.117)

भरद्वाजस्य शिष्यश्च मुनिरुद्दालकस्तथा । शौनकः सह पुत्रेण व्यासश्च तपतां वरः ।

bharadvājasya śiṣyaśca muniruddālakastathā śaunakaḥ saha putreṇa vyāsaśca tapatāṁ varaḥ

भरद्वाज के शिष्य, मुनि उद्दालक, पुत्र सहित शौनक, तथा तपस्वियों में श्रेष्ठ व्यास,

श्लोक 118 (padma.3.39.118)

दुर्वासाश्च मुनिश्रेष्ठो जाबालिश्च महातपाः । एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्ष्यास्तपोधनाः ।

durvāsāśca muniśreṣṭho jābāliśca mahātapāḥ ete ṛṣivarāḥ sarve tvatpratīkṣyāstapodhanāḥ

मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा और महातपस्वी जाबालि — ये सभी तपोधन श्रेष्ठ ऋषि तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं।

श्लोक 119 (padma.3.39.119)

एभिः सह महाभाग तीर्थान्येतान्यनुव्रज । प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं यथा राजा महाभिषः ।

ebhiḥ saha mahābhāga tīrthānyetānyanuvraja prāpsyase mahatīṁ kīrtiṁ yathā rājā mahābhiṣaḥ

हे महाभाग! इनके साथ इन तीर्थों की यात्रा करो; तुम महाराज महाभिष के समान महान् कीर्ति प्राप्त करोगे,

श्लोक 120 (padma.3.39.120)

यथा ययातिर्धर्मात्मा यथा राजा पुरूरवाः । तथा त्वं कुरुशार्दूल स्वेन धर्मेण शोभसे ।

yathā yayātirdharmātmā yathā rājā purūravāḥ tathā tvaṁ kuruśārdūla svena dharmeṇa śobhase

जैसे धर्मात्मा ययाति और राजा पुरूरवा प्राप्त हुए थे; हे कुरुशार्दूल! उसी प्रकार तुम अपने धर्म से शोभित होगे।

श्लोक 121 (padma.3.39.121)

यथा भगीरथो राजा यथा रामश्च विश्रुतः । यथा वै वृत्रहा सर्वान्सपत्नानदहत् पुरा ।

yathā bhagīratho rājā yathā rāmaśca viśrutaḥ yathā vai vṛtrahā sarvānsapatnānadahat purā

जैसे राजा भगीरथ, जैसे विख्यात राम, तथा जैसे वृत्रघाती इंद्र ने पूर्वकाल में अपने सभी शत्रुओं को भस्म कर दिया था,

श्लोक 122 (padma.3.39.122)

त्रैलोक्यं पालयामास देवराट्विगतज्वरः । तथा शत्रुक्षयं कृत्वा त्वं प्रजाः पालयिष्यसि ।

trailokyaṁ pālayāmāsa devarāṭvigatajvaraḥ tathā śatrukṣayaṁ kṛtvā tvaṁ prajāḥ pālayiṣyasi

और चिंतारहित होकर देवराज ने त्रिलोक की रक्षा की, वैसे ही तुम भी शत्रुओं का नाश करके प्रजा का पालन करोगे।

श्लोक 123 (padma.3.39.123)

स्वधर्मेणार्जितामुर्वीं प्राप्य राजीवलोचन । ख्यातिं यास्यसि वीर्येण कार्त्तवीर्यार्जुनो यथा ।

svadharmeṇārjitāmurvīṁ prāpya rājīvalocana khyātiṁ yāsyasi vīryeṇa kārttavīryārjuno yathā

हे राजीवलोचन! अपने धर्म से अर्जित पृथ्वी को पाकर, तुम कार्तवीर्य अर्जुन के समान अपने पराक्रम से यश प्राप्त करोगे।

श्लोक 124 (padma.3.39.124)

सूत उवाच । एवमाभाष्य राजानं नारदो भगवानृषिः । अनुज्ञाप्य महाराजं तत्रैवांतरधीयत ।

sūta uvāca evamābhāṣya rājānaṁ nārado bhagavānṛṣiḥ anujñāpya mahārājaṁ tatraivāṁtaradhīyata

सूत जी ने कहा — इस प्रकार राजा से कहकर, भगवान् ऋषि नारद महाराज से अनुमति लेकर वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 125 (padma.3.39.125)

युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा ऋषिभिः सह सुव्रतः । जगामाखिलतीर्थानि सादरः पृथिवीपतिः ।

yudhiṣṭhiro'pi dharmātmā ṛṣibhiḥ saha suvrataḥ jagāmākhilatīrthāni sādaraḥ pṛthivīpatiḥ

धर्मात्मा, सुव्रत पृथ्वीपति युधिष्ठिर भी ऋषियों के साथ आदरपूर्वक समस्त तीर्थों में गए।

श्लोक 126 (padma.3.39.126)

मयोक्तामृषयः सर्वे तीर्थयात्राश्रयां कथाम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि स मुक्तः सर्वपातकैः ।

mayoktāmṛṣayaḥ sarve tīrthayātrāśrayāṁ kathām yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi sa muktaḥ sarvapātakaiḥ

हे ऋषिगण! मेरे द्वारा कही गई इस तीर्थयात्रा-आश्रित कथा को जो पढ़ता या सुनता है, वह समस्त पातकों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 127 (padma.3.39.127)

मयोक्तमखिलं तत्त्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छथ । ऋषीणां पुण्यकीर्तीनां नावक्तव्यं ममास्ति वै ।

mayoktamakhilaṁ tattvaṁ kiṁ bhūyaḥ śrotumicchatha ṛṣīṇāṁ puṇyakīrtīnāṁ nāvaktavyaṁ mamāsti vai

मैंने संपूर्ण तत्त्व कह दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो? पुण्यकीर्ति ऋषियों के लिए मुझसे कुछ भी अकथनीय नहीं है।

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