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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 41

प्रयाग के रक्षक एवं महिमा

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42

श्लोक 1 (padma.3.41.1)

युधिष्ठिर उवाच । भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पुराकल्पे यथास्थितम् । कथं प्रयागगमनं नराणां तत्र कीदृशम् ।

yudhiṣṭhira uvāca bhagavañchrotumicchāmi purākalpe yathāsthitam kathaṁ prayāgagamanaṁ narāṇāṁ tatra kīdṛśam

युधिष्ठिर ने कहा — हे भगवन्! मैं सुनना चाहता हूँ कि प्राचीन काल में यह कैसी स्थिति थी। मनुष्यों का प्रयाग-गमन कैसे होता है, और वह स्थान कैसा है?

श्लोक 2 (padma.3.41.2)

मृतानां का गतिस्तत्र स्नातानां चैव किं फलम् । ये वसंति प्रयागे तु ब्रूहि तेषां च किं फलम् । एतन्मे सर्वमाख्याहि परं कौतूहलं हि मे ।

mṛtānāṁ kā gatistatra snātānāṁ caiva kiṁ phalam ye vasaṁti prayāge tu brūhi teṣāṁ ca kiṁ phalam etanme sarvamākhyāhi paraṁ kautūhalaṁ hi me

वहाँ मरने वालों की क्या गति है, और स्नान करने वालों का क्या फल है? जो प्रयाग में निवास करते हैं, उनका भी फल मुझे बताइए। यह सब मुझसे कहिए, क्योंकि मुझे इसकी अत्यंत जिज्ञासा है।

श्लोक 3 (padma.3.41.3)

मार्कंडेय उवाच । कथयिष्यामि ते वत्स नाथेष्टं यच्च यत्फलम् । पुरा ऋषीणां विप्राणां कथ्यमानं मया श्रुतम् ।

mārkaṁḍeya uvāca kathayiṣyāmi te vatsa nātheṣṭaṁ yacca yatphalam purā ṛṣīṇāṁ viprāṇāṁ kathyamānaṁ mayā śrutam

मार्कंडेय जी ने कहा — हे वत्स! मैं तुम्हें उस (क्षेत्र के स्वामी) का अभीष्ट और उसका फल बताऊँगा, जो मैंने पूर्वकाल में ऋषियों और ब्राह्मणों के मुख से सुना था।

श्लोक 4 (padma.3.41.4)

आप्रयागात्प्रतिष्ठानाद्धर्मकी वासुकी ह्रदात् । कंबलाश्वतरौ नागौ नागाश्च बहुमूलिकाः ।

āprayāgātpratiṣṭhānāddharmakī vāsukī hradāt kaṁbalāśvatarau nāgau nāgāśca bahumūlikāḥ

प्रतिष्ठान से लेकर प्रयाग तक, धर्मकी और वासुकी के ह्रद से, कंबल और अश्वतर नामक दोनों नागों से, तथा बहुमूलिक के नागों से घिरा —

श्लोक 5 (padma.3.41.5)

एतत्प्रजापतिक्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । अत्र स्नात्वा दिवं यांति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ।

etatprajāpatikṣetraṁ triṣu lokeṣu viśrutam atra snātvā divaṁ yāṁti ye mṛtāste'punarbhavāḥ

यह त्रैलोक्यविख्यात प्रजापति का क्षेत्र है; यहाँ स्नान करके मरने वाले स्वर्ग को जाते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 6 (padma.3.41.6)

तत्र ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वंति संगताः । अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापप्रणाशनाः ।

tatra brahmādayo devā rakṣāṁ kurvaṁti saṁgatāḥ anye ca bahavastīrthāḥ sarvapāpapraṇāśanāḥ

वहाँ ब्रह्मा आदि देवगण मिलकर रक्षा करते हैं; और भी अनेक तीर्थ हैं, जो सर्वपापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 7 (padma.3.41.7)

न शक्याः कथितुं राजन्बहुवर्षशतैरपि । संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्य च कीर्त्तनम् ।

na śakyāḥ kathituṁ rājanbahuvarṣaśatairapi saṁkṣepeṇa pravakṣyāmi prayāgasya ca kīrttanam

हे राजन्! इन्हें सैकड़ों वर्षों में भी कहा नहीं जा सकता; मैं संक्षेप में प्रयाग का कीर्तन करूँगा।

श्लोक 8 (padma.3.41.8)

षष्टिर्धनुः सहस्राणि परिरक्षंति जाह्नवीम् । यमुनां रक्षति सदा सविता सप्तवाहनः ।

ṣaṣṭirdhanuḥ sahasrāṇi parirakṣaṁti jāhnavīm yamunāṁ rakṣati sadā savitā saptavāhanaḥ

साठ हजार धनुष (की भूमि) जाह्नवी की सब ओर से रक्षा करती है; यमुना की रक्षा सदा सात घोड़ों वाले सूर्यदेव करते हैं।

श्लोक 9 (padma.3.41.9)

प्रयागं तु विशेषेण स्वयं रक्षति वासवः । मंडलं रक्षति हरिर्देवैः सह सुसंमतम् ।

prayāgaṁ tu viśeṣeṇa svayaṁ rakṣati vāsavaḥ maṁḍalaṁ rakṣati harirdevaiḥ saha susaṁmatam

और प्रयाग की विशेष रूप से स्वयं वासव (इंद्र) रक्षा करते हैं; उसके मंडल की रक्षा देवताओं सहित सम्मानित हरि करते हैं।

श्लोक 10 (padma.3.41.10)

तं वटं रक्षते नित्यं शूलपाणिर्महेश्वरः । स्थानं रक्षति वै देवः सर्वपापहरं शुभम् ।

taṁ vaṭaṁ rakṣate nityaṁ śūlapāṇirmaheśvaraḥ sthānaṁ rakṣati vai devaḥ sarvapāpaharaṁ śubham

उस वटवृक्ष की रक्षा सदा त्रिशूलधारी महेश्वर करते हैं; उस सर्वपापहारी शुभ स्थान की रक्षा स्वयं देव करते हैं।

श्लोक 11 (padma.3.41.11)

अधर्मेण वृतो लोके नैव गच्छति तत्पदम् । स्वल्पमल्पतरं पापं यदा तस्य नराधिप ।

adharmeṇa vṛto loke naiva gacchati tatpadam svalpamalpataraṁ pāpaṁ yadā tasya narādhipa

अधर्म से घिरा हुआ मनुष्य उस पद को कभी प्राप्त नहीं करता। हे नराधिप! परंतु जब उसका पाप स्वल्प हो, अथवा उससे भी न्यून हो,

श्लोक 12 (padma.3.41.12)

प्रयागस्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम् । दर्शनात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि ।

prayāgasmaramāṇasya sarvamāyāti saṁkṣayam darśanāttasya tīrthasya nāmasaṁkīrtanādapi

तो केवल प्रयाग का स्मरण करने से ही उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है। उस तीर्थ के दर्शन से, अथवा उसके नाम-संकीर्तन से भी,

श्लोक 13 (padma.3.41.13)

मृत्तिका लभनाद्वापि नरः पापाद्विमुच्यते । पंचकुंडानि राजेंद्र येषां मध्ये तु जाह्नवी ।

mṛttikā labhanādvāpi naraḥ pāpādvimucyate paṁcakuṁḍāni rājeṁdra yeṣāṁ madhye tu jāhnavī

अथवा वहाँ की मिट्टी प्राप्त करने से भी मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है। हे राजेंद्र! वहाँ पाँच कुंड हैं, जिनके बीच जाह्नवी बहती है।

श्लोक 14 (padma.3.41.14)

प्रयागे तु प्रविष्टस्य पापं क्षरति तत्क्षणात् । योजनानां सहस्रेषु गंगां स्मरति यो नरः ।

prayāge tu praviṣṭasya pāpaṁ kṣarati tatkṣaṇāt yojanānāṁ sahasreṣu gaṁgāṁ smarati yo naraḥ

प्रयाग में प्रवेश करने वाले का पाप उसी क्षण बह जाता है। जो मनुष्य हजारों योजन दूर से भी गंगा का स्मरण करता है,

श्लोक 15 (padma.3.41.15)

अपि दुष्कृतकर्मासौ लभते परमां गतिम् । कीर्तनान्मुच्यते पापैर्दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति ।

api duṣkṛtakarmāsau labhate paramāṁ gatim kīrtanānmucyate pāpairdṛṣṭvā bhadrāṇi paśyati

वह दुष्कर्मी होते हुए भी परम गति को प्राप्त करता है। उसके कीर्तन से मनुष्य पापों से मुक्त होता है, दर्शन से उसे सर्वत्र मंगल ही मंगल दिखाई देता है।

श्लोक 16 (padma.3.41.16)

अवगाह्य च पीत्वा च पुनात्यासप्तमं कुलम् । सत्यवादी जितक्रोधो अहिंसां परमास्थितः ।

avagāhya ca pītvā ca punātyāsaptamaṁ kulam satyavādī jitakrodho ahiṁsāṁ paramāsthitaḥ

उसमें डूबकर और उसका जल पीकर वह सात पीढ़ियों के कुल को पवित्र करता है। सत्यवादी, क्रोध पर विजय पाने वाला, परम अहिंसा में स्थित,

श्लोक 17 (padma.3.41.17)

धर्मानुसारी तत्त्वज्ञो गोब्राह्मणहिते रतः । गंगायमुनयोर्मध्ये स्नातो मुच्येत किल्बिषात् ।

dharmānusārī tattvajño gobrāhmaṇahite rataḥ gaṁgāyamunayormadhye snāto mucyeta kilbiṣāt

धर्मानुयायी, तत्त्वज्ञ, गौ और ब्राह्मणों के हित में रत मनुष्य गंगा-यमुना के मध्य स्नान करके पाप से मुक्त हो जाता है,

श्लोक 18 (padma.3.41.18)

मनसा चिंतितान्कामान्सम्यक्प्राप्नोति पुष्कलान् । ततो गत्त्वा प्रयागं तु सर्वदेवाभिरक्षितम् ।

manasā ciṁtitānkāmānsamyakprāpnoti puṣkalān tato gattvā prayāgaṁ tu sarvadevābhirakṣitam

और मन में सोची हुई प्रचुर कामनाओं को भलीभाँति प्राप्त करता है। तत्पश्चात् समस्त देवताओं द्वारा सुरक्षित प्रयाग को जाकर —

श्लोक 19 (padma.3.41.19)

ब्रह्मचारी वसेन्मासं पितृदेवांश्च तर्पयेत् । ईप्सिताँल्लभते कामान्यत्र तत्राभिजायते ।

brahmacārī vasenmāsaṁ pitṛdevāṁśca tarpayet īpsitā~llabhate kāmānyatra tatrābhijāyate

ब्रह्मचारी को एक मास निवास करके पितृ-देवताओं को तर्पण देना चाहिए; वह अपनी अभीष्ट कामनाओं को पाता है और जहाँ चाहे वहाँ जन्म लेता है।

श्लोक 20 (padma.3.41.20)

तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता । समागता महाभागा यमुना यत्र निम्नगाः ।

tapanasya sutā devī triṣu lokeṣu viśrutā samāgatā mahābhāgā yamunā yatra nimnagāḥ

त्रैलोक्यविख्यात सूर्यपुत्री देवी, महाभाग्यशालिनी यमुना, वहाँ नीचे की ओर बहने वाली (गंगा) से मिलती है।

श्लोक 21 (padma.3.41.21)

तत्र सन्निहितो नित्यं साक्षाद्देवो महेश्वरः । दुष्प्रापं मानुषैः पुण्यं प्रयागं तु युधिष्ठिर ।

tatra sannihito nityaṁ sākṣāddevo maheśvaraḥ duṣprāpaṁ mānuṣaiḥ puṇyaṁ prayāgaṁ tu yudhiṣṭhira

वहाँ साक्षात् देव महेश्वर सदा उपस्थित रहते हैं। हे युधिष्ठिर! प्रयाग का पुण्य मनुष्यों के लिए अत्यंत दुष्प्राप्य है।

श्लोक 22 (padma.3.41.22)

देवदानवगंधर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः । तत्रोपस्पृश्य राजेंद्र स्वर्गलोके महीयते ।

devadānavagaṁdharvā ṛṣayaḥ siddhacāraṇāḥ tatropaspṛśya rājeṁdra svargaloke mahīyate

देव, दानव, गंधर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण — हे राजेंद्र! वहाँ स्पर्श करके मनुष्य स्वर्गलोक में पूजित होता है।

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