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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 45

प्रयाग में अनशन का फल एवं यमुना-महिमा

अध्याय 44अध्याय-सूचीअध्याय 46

श्लोक 1 (padma.3.45.1)

युधिष्ठिर उवाच । एतच्छ्रुत्वा प्रयागस्य यत्त्वया कीर्तनं कृतम् । विशुद्धमेतद्धृदयं प्रयागस्य च कीर्तनात् । अनाशकफलं ब्रूहि भगवंस्तत्र कीदृशम् ।

yudhiṣṭhira uvāca etacchrutvā prayāgasya yattvayā kīrtanaṁ kṛtam viśuddhametaddhṛdayaṁ prayāgasya ca kīrtanāt anāśakaphalaṁ brūhi bhagavaṁstatra kīdṛśam

युधिष्ठिर ने कहा — प्रयाग का यह जो कीर्तन आपने किया, उसे सुनकर, हे भगवन्! प्रयाग के कीर्तन से ही मेरा हृदय विशुद्ध हो गया है। वहाँ अनशन (उपवास द्वारा प्राण-त्याग) का फल कैसा है, यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.3.45.2)

मार्कंडेय उवाच । शृणु राजन्प्रयागे तु अनाशकफलं विभो । प्राप्नोति पुरुषो धीमान्श्रद्दधानश्च यादृशम् ।

mārkaṁḍeya uvāca śṛṇu rājanprayāge tu anāśakaphalaṁ vibho prāpnoti puruṣo dhīmānśraddadhānaśca yādṛśam

मार्कंडेय ने कहा — हे राजन्! सुनो, हे विभो! प्रयाग में श्रद्धावान् बुद्धिमान् पुरुष अनशन का जैसा फल पाता है।

श्लोक 3 (padma.3.45.3)

अहीनांगो विरोगश्च पंचेंद्रियसमन्वितः । अश्वमेधफलं तस्य गच्छतस्तु पदे पदे ।

ahīnāṁgo virogaśca paṁceṁdriyasamanvitaḥ aśvamedhaphalaṁ tasya gacchatastu pade pade

वह अंगहीनता और रोग से रहित, पाँचों इंद्रियों से युक्त होकर, वहाँ चलते हुए पग-पग पर अश्वमेध का फल पाता है।

श्लोक 4 (padma.3.45.4)

कुलानि तारयेद्राजन्दशपूर्वान्दशापरान् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो गच्छेत परमं पदम् ।

kulāni tārayedrājandaśapūrvāndaśāparān mucyate sarvapāpebhyo gaccheta paramaṁ padam

हे राजन्! वह अपने दस पूर्व और दस पश्चात् की पीढ़ियों को तार देता है; वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (padma.3.45.5)

युधिष्ठिर उवाच । महाभागोसि धर्मज्ञ दानं वदसि मे प्रभो । अल्पेनैव प्रधानेन बहून्धर्मानवाप्नुयात् ।

yudhiṣṭhira uvāca mahābhāgosi dharmajña dānaṁ vadasi me prabho alpenaiva pradhānena bahūndharmānavāpnuyāt

युधिष्ठिर ने कहा — हे धर्मज्ञ! आप महाभाग्यशाली हैं; हे प्रभो! आप मुझे ऐसे दान के विषय में बताते हैं जिससे थोड़े ही उपाय से बहुत धर्म प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 6 (padma.3.45.6)

अश्वमेधस्तु बहुभिः सुकृतैः प्राप्यते इह । एतन्मे संशयं ब्रूहि परं कौतूहलं हि मे ।

aśvamedhastu bahubhiḥ sukṛtaiḥ prāpyate iha etanme saṁśayaṁ brūhi paraṁ kautūhalaṁ hi me

यहाँ अश्वमेध तो अनेक सुकृत्यों से ही प्राप्त होता है। मेरे इस संशय को दूर कीजिए, क्योंकि मुझे इसकी अत्यंत जिज्ञासा है।

श्लोक 7 (padma.3.45.7)

मार्कंडेय उवाच । शृणु राजन्महावीर युदुक्तं पद्मयोनिना । ऋषीणां सन्निधौ पूर्वं कथ्यमानं मया श्रुतम् ।

mārkaṁḍeya uvāca śṛṇu rājanmahāvīra yuduktaṁ padmayoninā ṛṣīṇāṁ sannidhau pūrvaṁ kathyamānaṁ mayā śrutam

मार्कंडेय ने कहा — हे महावीर राजन्! जो पद्मयोनि (ब्रह्मा) द्वारा कहा गया था, और जो पूर्वकाल में मैंने ऋषियों के समीप सुना था, वह सुनो।

श्लोक 8 (padma.3.45.8)

पंचयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मंडलम् । प्रविशंस्तस्य तद्भूमावश्वमेधं पदे पदे ।

paṁcayojanavistīrṇaṁ prayāgasya tu maṁḍalam praviśaṁstasya tadbhūmāvaśvamedhaṁ pade pade

प्रयाग का मंडल पाँच योजन विस्तृत है; उस भूमि में प्रवेश करने वाले को पग-पग पर अश्वमेध का फल मिलता है।

श्लोक 9 (padma.3.45.9)

व्यतीतान्पुरुषान्सप्त भविष्यांश्च चतुर्दश । नरस्तारयते सर्वान्यस्तु प्राणान्परित्यजेत् ।

vyatītānpuruṣānsapta bhaviṣyāṁśca caturdaśa narastārayate sarvānyastu prāṇānparityajet

जो वहाँ अपने प्राण त्यागता है, वह अपने से पूर्व की सात और आने वाली चौदह पीढ़ियों को भी तार देता है।

श्लोक 10 (padma.3.45.10)

एवं ज्ञात्वा तु राजेंद्र सदा श्रद्धापरो भवेत् । अश्रद्दधानाः पुरुषाः पापोपहतचेतसः । न प्राप्नुवंति तत्स्थानं प्रयागं देवनिर्मितम् ।

evaṁ jñātvā tu rājeṁdra sadā śraddhāparo bhavet aśraddadhānāḥ puruṣāḥ pāpopahatacetasaḥ na prāpnuvaṁti tatsthānaṁ prayāgaṁ devanirmitam

हे राजेंद्र! यह जानकर मनुष्य को सदा श्रद्धापरायण रहना चाहिए। पाप से आहत चित्त वाले, श्रद्धाहीन पुरुष देवनिर्मित उस स्थान प्रयाग को प्राप्त नहीं करते।

श्लोक 11 (padma.3.45.11)

युधिष्ठिर उवाच । स्नेहाद्वा द्रव्यलोभाद्वा ये तु कामवशं गताः । कथं तीर्थफलं तेषां कथं पुण्यमवाप्नुयुः ।

yudhiṣṭhira uvāca snehādvā dravyalobhādvā ye tu kāmavaśaṁ gatāḥ kathaṁ tīrthaphalaṁ teṣāṁ kathaṁ puṇyamavāpnuyuḥ

युधिष्ठिर ने कहा — जो लोग स्नेह से या धन के लोभ से कामनाओं के वशीभूत होकर वहाँ जाते हैं, उन्हें तीर्थ का फल कैसे और पुण्य कैसे प्राप्त होता है?

श्लोक 12 (padma.3.45.12)

विक्रयं सर्वभांडानां कार्याकार्यमजानतः । प्रयागे का गतिस्तस्य एवं ब्रूहि महामुने ।

vikrayaṁ sarvabhāṁḍānāṁ kāryākāryamajānataḥ prayāge kā gatistasya evaṁ brūhi mahāmune

और जो समस्त वस्तुओं का व्यापार करता है, कार्य-अकार्य को न जानते हुए — प्रयाग में उसकी क्या गति होती है? हे महामुने! यह मुझे बताइए।

श्लोक 13 (padma.3.45.13)

मार्कंडेय उवाच । शृणु राजन्महागुह्यं सर्वपापप्रणाशनम् । मासं वसंस्तु राजेंद्र प्रयागे नियतेंद्रियः ।

mārkaṁḍeya uvāca śṛṇu rājanmahāguhyaṁ sarvapāpapraṇāśanam māsaṁ vasaṁstu rājeṁdra prayāge niyateṁdriyaḥ

मार्कंडेय ने कहा — हे राजन्! सर्वपापनाशक यह महागुह्य रहस्य सुनो। हे राजेंद्र! जो इंद्रियसंयमी होकर प्रयाग में एक मास निवास करता है,

श्लोक 14 (padma.3.45.14)

मुच्यते सर्वपापेभ्यः यथादिष्टं स्वयंभुवा । शुचिस्तु प्रयतो भूत्वाऽहिंसकः श्रद्धयान्वितः ।

mucyate sarvapāpebhyaḥ yathādiṣṭaṁ svayaṁbhuvā śucistu prayato bhūtvā'hiṁsakaḥ śraddhayānvitaḥ

वह स्वयंभू ब्रह्मा के आदेशानुसार समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। शुद्ध, संयमित, अहिंसक और श्रद्धायुक्त होकर —

श्लोक 15 (padma.3.45.15)

मुच्यते सर्वपापेभ्यः स गच्छेत्परमं पदम् । विश्रंभघातकानां तु प्रयागे शृणु तत्फलम् ।

mucyate sarvapāpebhyaḥ sa gacchetparamaṁ padam viśraṁbhaghātakānāṁ tu prayāge śṛṇu tatphalam

वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है। अब प्रयाग में विश्वासघातियों का फल सुनो —

श्लोक 16 (padma.3.45.16)

त्रिकालमेव स्नायीत आहारं भैक्ष्यमाचरेत् । त्रिभिर्मासैः प्रमुच्येत प्रयागात्तु न संशयः ।

trikālameva snāyīta āhāraṁ bhaikṣyamācaret tribhirmāsaiḥ pramucyeta prayāgāttu na saṁśayaḥ

वह दिन में तीन बार स्नान करे और केवल भिक्षा से मिला आहार ग्रहण करे; इस प्रकार तीन मास में वह प्रयाग के प्रभाव से निश्चय ही मुक्त हो जाता है।

श्लोक 17 (padma.3.45.17)

प्रज्ञानेन तु यस्येह तीर्थयात्रादिकं भवेत् । सर्वकामसमृद्धस्तु स्वर्गलोके महीयते ।

prajñānena tu yasyeha tīrthayātrādikaṁ bhavet sarvakāmasamṛddhastu svargaloke mahīyate

जो व्यक्ति सच्चे ज्ञान के साथ यह तीर्थयात्रा आदि करता है, वह समस्त कामनाओं से समृद्ध होकर स्वर्गलोक में पूजित होता है।

श्लोक 18 (padma.3.45.18)

स्थानं स लभते नित्यं धनधान्यसमाकुलम् । एवं ज्ञानेन संपूर्णः सदा भवति भोगवान् ।

sthānaṁ sa labhate nityaṁ dhanadhānyasamākulam evaṁ jñānena saṁpūrṇaḥ sadā bhavati bhogavān

उसे धन-धान्य से परिपूर्ण स्थान सदा प्राप्त होता है। इस प्रकार ज्ञान से संपूर्ण होकर वह सदा भोगयुक्त बना रहता है।

श्लोक 19 (padma.3.45.19)

तारिताः पितरस्तेन नरकात्प्रपितामहाः । धर्मानुसारे तत्त्वज्ञ पृच्छतस्ते पुनः पुनः । त्वत्प्रियार्थं समाख्यातं गुह्यमेतत्सनातनम् ।

tāritāḥ pitarastena narakātprapitāmahāḥ dharmānusāre tattvajña pṛcchataste punaḥ punaḥ tvatpriyārthaṁ samākhyātaṁ guhyametatsanātanam

उसके द्वारा उसके पितर और प्रपितामह भी नरक से तार दिए जाते हैं। हे धर्म और तत्त्व के ज्ञाता! तुम्हारे बार-बार पूछने पर, तुम्हारे प्रिय के लिए, मैंने यह सनातन रहस्य बताया है।

श्लोक 20 (padma.3.45.20)

युधिष्ठिर उवाच । अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं कुलम् । प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि दर्शनादेव तेऽद्य वै । त्वद्दर्शनात्तु धर्मात्मन्मुक्तोऽहं सर्वपातकैः ।

yudhiṣṭhira uvāca adya me saphalaṁ janma adya me saphalaṁ kulam prīto'smyanugṛhīto'smi darśanādeva te'dya vai tvaddarśanāttu dharmātmanmukto'haṁ sarvapātakaiḥ

युधिष्ठिर ने कहा — आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरा कुल सफल हुआ। मैं आज आपके दर्शन मात्र से प्रसन्न और अनुगृहीत हूँ। हे धर्मात्मन्! आपके दर्शन से मैं समस्त पातकों से मुक्त हो गया हूँ।

श्लोक 21 (padma.3.45.21)

मार्कंडेय उवाच । दिष्ट्या ते सफलं जन्म दिष्ट्या ते तारितं कुलम् । कीर्तनाद्वर्द्धते पुण्यं श्रुतं पापप्रणाशनम् ।

mārkaṁḍeya uvāca diṣṭyā te saphalaṁ janma diṣṭyā te tāritaṁ kulam kīrtanādvarddhate puṇyaṁ śrutaṁ pāpapraṇāśanam

मार्कंडेय ने कहा — सौभाग्य से तुम्हारा जन्म सफल हुआ है, सौभाग्य से तुम्हारा कुल तर गया है। कीर्तन से पुण्य बढ़ता है, और इसे सुनना पाप का नाश करता है।

श्लोक 22 (padma.3.45.22)

युधिष्ठिर उवाच । यमुनायां तु किं पुण्यं किं फलं तु महामुने । एतन्मे सर्वमाख्याहि यथादृष्टं यथाश्रुतम् ।

yudhiṣṭhira uvāca yamunāyāṁ tu kiṁ puṇyaṁ kiṁ phalaṁ tu mahāmune etanme sarvamākhyāhi yathādṛṣṭaṁ yathāśrutam

युधिष्ठिर ने कहा — हे महामुने! यमुना में क्या पुण्य है, और उसका फल क्या है? मुझे यह सब वैसा ही बताइए जैसा आपने देखा और सुना है।

श्लोक 23 (padma.3.45.23)

मार्कंडेय उवाच । तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता । समागता महाभागा यमुना यत्र निम्नगा ।

mārkaṁḍeya uvāca tapanasya sutā devī triṣu lokeṣu viśrutā samāgatā mahābhāgā yamunā yatra nimnagā

मार्कंडेय ने कहा — त्रैलोक्यविख्यात सूर्यपुत्री देवी, महाभाग्यशालिनी यमुना, वहाँ नीचे बहने वाली (गंगा) से मिलती है।

श्लोक 24 (padma.3.45.24)

येनैव निःसृता गङ्गा तेनैव यमुना गता । योजनानां सहस्रेषु कीर्तनात्पापनाशिनी ।

yenaiva niḥsṛtā gaṅgā tenaiva yamunā gatā yojanānāṁ sahasreṣu kīrtanātpāpanāśinī

जिस मार्ग से गंगा निकली, उसी मार्ग से यमुना भी गई; हजारों योजन दूर से भी उसका कीर्तन पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 25 (padma.3.45.25)

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर । कीर्त्तनाल्लभते पुण्यं दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति ।

tatra snātvā ca pītvā ca yamunāyāṁ yudhiṣṭhira kīrttanāllabhate puṇyaṁ dṛṣṭvā bhadrāṇi paśyati

हे युधिष्ठिर! यमुना में स्नान और पान करके मनुष्य कीर्तन मात्र से पुण्य पाता है; उसके दर्शन से उसे सर्वत्र मंगल ही दिखाई देता है।

श्लोक 26 (padma.3.45.26)

अवगाढा च पीत्वा च पुनात्यासप्तमं कुलम् । प्राणांस्त्यजति यस्तत्र स याति परमां गतिम् ।

avagāḍhā ca pītvā ca punātyāsaptamaṁ kulam prāṇāṁstyajati yastatra sa yāti paramāṁ gatim

उसमें डूबकर और उसका जल पीकर मनुष्य सात पीढ़ियों के कुल को पवित्र करता है। जो वहाँ अपने प्राण त्यागता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 27 (padma.3.45.27)

अग्नितीर्थमिति ख्यातं यमुना दक्षिणे तटे । पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थं हरवरं स्मृतम् ।

agnitīrthamiti khyātaṁ yamunā dakṣiṇe taṭe paścime dharmarājasya tīrthaṁ haravaraṁ smṛtam

यमुना के दक्षिण तट पर अग्नितीर्थ नाम से विख्यात स्थान है; पश्चिम में धर्मराज का, हरवर (शिव के श्रेष्ठ) का तीर्थ माना गया है।

श्लोक 28 (padma.3.45.28)

तत्र स्नात्वा दिवं यांति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः । एवं तीर्थसहस्राणि यमुना दक्षिणे तटे ।

tatra snātvā divaṁ yāṁti ye mṛtāste'punarbhavāḥ evaṁ tīrthasahasrāṇi yamunā dakṣiṇe taṭe

वहाँ स्नान करके मरने वाले स्वर्ग को जाते हैं, और उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इस प्रकार यमुना के दक्षिण तट पर सहस्रों तीर्थ हैं।

श्लोक 29 (padma.3.45.29)

उत्तरेण प्रवक्ष्यामि आदित्यस्य महात्मनः । तीर्थं तु विरजं नाम यत्र देवाः सवासवाः ।

uttareṇa pravakṣyāmi ādityasya mahātmanaḥ tīrthaṁ tu virajaṁ nāma yatra devāḥ savāsavāḥ

अब मैं महात्मा सूर्यदेव के उत्तर भाग के विषय में बताता हूँ। वहाँ विरज नामक तीर्थ है, जहाँ देवगण वासव सहित —

श्लोक 30 (padma.3.45.30)

उपासते स्म संध्यां तु नित्यकालं युधिष्ठिर । देवाः सेवंति तत्तीर्थं ये चान्ये विदुषो जनाः ।

upāsate sma saṁdhyāṁ tu nityakālaṁ yudhiṣṭhira devāḥ sevaṁti tattīrthaṁ ye cānye viduṣo janāḥ

हे युधिष्ठिर! वहाँ सदा-सर्वदा संध्या की उपासना करते हैं। देवगण और अन्य विद्वान् जन भी उस तीर्थ का सेवन करते हैं।

श्लोक 31 (padma.3.45.31)

श्रद्दधानपरो भूत्वा कुरु तीर्थाभिषेचनम् । अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापहराः शुभाः ।

śraddadhānaparo bhūtvā kuru tīrthābhiṣecanam anye ca bahavastīrthāḥ sarvapāpaharāḥ śubhāḥ

श्रद्धापूर्वक वहाँ तीर्थाभिषेक करो। और भी अनेक तीर्थ हैं, जो सर्वपापों का नाश करने वाले और शुभ हैं —

श्लोक 32 (padma.3.45.32)

तेषु स्नात्वा दिवं यांति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः । गंगा च यमुना चैव उभे तुल्यफले स्मृते ।

teṣu snātvā divaṁ yāṁti ye mṛtāste'punarbhavāḥ gaṁgā ca yamunā caiva ubhe tulyaphale smṛte

उनमें स्नान करके मरने वाले स्वर्ग को जाते हैं, और उनका पुनर्जन्म नहीं होता। गंगा और यमुना दोनों समान फलदायी मानी गई हैं;

श्लोक 33 (padma.3.45.33)

केवलं श्रेष्ठभावेन गंगा सर्वत्र पूज्यते । एवं कुरुष्व कौंतेय स्वर्गतीर्थाभिषेचनम् ।

kevalaṁ śreṣṭhabhāvena gaṁgā sarvatra pūjyate evaṁ kuruṣva kauṁteya svargatīrthābhiṣecanam

केवल श्रेष्ठता के भाव से गंगा सर्वत्र पूजित होती है। हे कौंतेय! इसी प्रकार स्वर्गदायी तीर्थ का अभिषेक करो,

श्लोक 34 (padma.3.45.34)

यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति । यस्त्विदं कल्य उत्थाय पठते च शृणोति वा ।

yāvajjīvakṛtaṁ pāpaṁ tatkṣaṇādeva naśyati yastvidaṁ kalya utthāya paṭhate ca śṛṇoti vā

जिससे जीवनभर किया गया पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। और जो कोई प्रातःकाल उठकर इसे पढ़ता या सुनता है,

श्लोक 35 (padma.3.45.35)

मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोकं च गच्छति ।

mucyate sarvapāpebhyaḥ svargalokaṁ ca gacchati

वह समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक को जाता है।

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