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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 49

युधिष्ठिर का राज्याभिषेक एवं कृष्ण का प्रयाग-विषयक उपदेश

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (padma.3.49.1)

सूत उवाच । भ्रातृभिः सहिताः सर्वे पांडवा धर्मनिश्चयाः । ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्वागुरुदेवांस्त्वतर्पयन् ।

sūta uvāca bhrātṛbhiḥ sahitāḥ sarve pāṁḍavā dharmaniścayāḥ brāhmaṇebhyo namaskṛtvāgurudevāṁstvatarpayan

सूत जी ने कहा — धर्मनिश्चयी सभी पांडव अपने भाइयों सहित, ब्राह्मणों को नमस्कार करके, गुरुजनों और देवताओं को तर्पण देने लगे।

श्लोक 2 (padma.3.49.2)

वासुदेवोऽपि तत्रैव क्षणेनाभ्यागतस्तदा । पांडवैः सहितैः सर्वैः पूज्यमानः स माधवः ।

vāsudevo'pi tatraiva kṣaṇenābhyāgatastadā pāṁḍavaiḥ sahitaiḥ sarvaiḥ pūjyamānaḥ sa mādhavaḥ

उसी समय वासुदेव भी क्षणभर में वहाँ पधारे; वे माधव समस्त पांडवों सहित पूजित हुए।

श्लोक 3 (padma.3.49.3)

कृष्णेन सहितैः सर्वैः पुनरेव महात्मभिः । अभिषिक्तः स्वराज्ये तु धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

kṛṣṇena sahitaiḥ sarvaiḥ punareva mahātmabhiḥ abhiṣiktaḥ svarājye tu dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

कृष्ण सहित सभी महात्माओं ने पुनः धर्मपुत्र युधिष्ठिर का अपने ही राज्य में अभिषेक किया।

श्लोक 4 (padma.3.49.4)

एतस्मिन्नंतरे चैव मार्कंडेयो महात्मवान् । ततः स्वस्तीति चोक्त्वा वै क्षणादाश्रममागतः ।

etasminnaṁtare caiva mārkaṁḍeyo mahātmavān tataḥ svastīti coktvā vai kṣaṇādāśramamāgataḥ

इसी बीच महात्मा मार्कंडेय ने 'कल्याण हो' कहकर क्षणभर में अपने आश्रम को प्रस्थान किया।

श्लोक 5 (padma.3.49.5)

युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितस्तु सः । महादानं ददौ चाथ धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

yudhiṣṭhiro'pi dharmātmā bhrātṛbhiḥ sahitastu saḥ mahādānaṁ dadau cātha dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

धर्मात्मा युधिष्ठिर ने भी अपने भाइयों सहित महादान दिया — वह धर्मपुत्र युधिष्ठिर।

श्लोक 6 (padma.3.49.6)

यस्त्विदं कल्यमुत्थाय पठते वा शृणोति वा । मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ।

yastvidaṁ kalyamutthāya paṭhate vā śṛṇoti vā mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati

जो कोई प्रातःकाल उठकर इसे पढ़ता या सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 7 (padma.3.49.7)

वासुदेव उवाच । मम वाक्यं तु कर्तव्यं तव स्नेहाद्ब्रवीम्यहम् । नित्यं यज्ञरतो भूत्वा प्रयागे विगतज्वरः ।

vāsudeva uvāca mama vākyaṁ tu kartavyaṁ tava snehādbravīmyaham nityaṁ yajñarato bhūtvā prayāge vigatajvaraḥ

वासुदेव ने कहा — मेरे वचन का पालन करना चाहिए; मैं स्नेहवश तुमसे कहता हूँ। सदा यज्ञरत होकर, प्रयाग में चिंतारहित होकर —

श्लोक 8 (padma.3.49.8)

प्रयागं संस्मरन्नित्यं सहास्माभिर्युधिष्ठिर । स्वयं प्राप्स्यसि राजेंद्र स्वर्गलोकं तु शाश्वतम् ।

prayāgaṁ saṁsmarannityaṁ sahāsmābhiryudhiṣṭhira svayaṁ prāpsyasi rājeṁdra svargalokaṁ tu śāśvatam

हे युधिष्ठिर! हम सबके साथ नित्य प्रयाग का स्मरण करते हुए, हे राजेंद्र! तुम स्वयं शाश्वत स्वर्गलोक को प्राप्त करोगे।

श्लोक 9 (padma.3.49.9)

प्रयागमनुगच्छेद्वा वसते वापि यो नरः । सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोकं च गच्छति ।

prayāgamanugacchedvā vasate vāpi yo naraḥ sarvapāpaviśuddhātmā svargalokaṁ ca gacchati

जो भी मनुष्य प्रयाग जाता है या वहाँ निवास करता है, वह सर्वपाप से विशुद्ध आत्मा होकर स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 10 (padma.3.49.10)

प्रतिग्रहादुपावृत्तः सन्तुष्टो नियतः शुचिः ।

pratigrahādupāvṛttaḥ santuṣṭo niyataḥ śuciḥ

जो अनुचित दान-ग्रहण से विरत हो, संतुष्ट, संयमित और पवित्र हो —

श्लोक 11 (padma.3.49.11)

अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते । अकोपनश्च राजेंद्र सत्यवादी दृढव्रतः । आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ।

ahaṁkāranivṛttaśca sa tīrthaphalamaśnute akopanaśca rājeṁdra satyavādī dṛḍhavrataḥ ātmopamaśca bhūteṣu sa tīrthaphalamaśnute

तथा अहंकार से रहित हो — वह तीर्थ का फल पाता है। हे राजेंद्र! जो क्रोधरहित, सत्यवादी, दृढ़व्रती हो, और समस्त प्राणियों को अपने समान माने — वह तीर्थ का फल पाता है।

श्लोक 12 (padma.3.49.12)

ऋषिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवैश्चापि यथाक्रमम् । न हि शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते ।

ṛṣibhiḥ kratavaḥ proktā devaiścāpi yathākramam na hi śakyā daridreṇa yajñāḥ prāptuṁ mahīpate

ऋषियों और देवताओं द्वारा भी यथाक्रम यज्ञ बताए गए हैं; परंतु हे महीपते! निर्धन मनुष्य यज्ञों को प्राप्त नहीं कर सकता।

श्लोक 13 (padma.3.49.13)

बहूपकरणो यज्ञो नानासंभारसंभ्रमः । प्राप्यते विविधैरर्थ्यैः समृद्धैर्वा नरैः क्वचित् ।

bahūpakaraṇo yajño nānāsaṁbhārasaṁbhramaḥ prāpyate vividhairarthyaiḥ samṛddhairvā naraiḥ kvacit

बहुत उपकरणों वाला, नाना सामग्री जुटाने में व्यस्त यज्ञ, कहीं-कहीं ही विविध साधन-संपन्न या समृद्ध मनुष्यों द्वारा प्राप्त होता है।

श्लोक 14 (padma.3.49.14)

यो दरिद्रैरपि बुधैः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर । ततो यज्ञफलैः पुण्यैस्तन्निबोध जनेश्वर ।

yo daridrairapi budhaiḥ śakyaḥ prāptuṁ nareśvara tato yajñaphalaiḥ puṇyaistannibodha janeśvara

परंतु हे नरेश्वर! जो बुद्धिमान् निर्धनों द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है, हे जनेश्वर! उस यज्ञ-फल-तुल्य पुण्य को जानो।

श्लोक 15 (padma.3.49.15)

ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम । तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते ।

ṛṣīṇāṁ paramaṁ guhyamidaṁ bharatasattama tīrthābhigamanaṁ puṇyaṁ yajñairapi viśiṣyate

हे भरतसत्तम! यह ऋषियों का परम रहस्य है — तीर्थ में जाने का पुण्य यज्ञों से भी बढ़कर माना गया है।

श्लोक 16 (padma.3.49.16)

दशकोटिसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथापरे । माघमासे तु गंगायां गमिष्यंति नरर्षभ ।

daśakoṭisahasrāṇi triṁśatkoṭyastathāpare māghamāse tu gaṁgāyāṁ gamiṣyaṁti nararṣabha

हे नरर्षभ! दस अरब, और तीस करोड़ अन्य लोग भी माघ मास में गंगा को जाएँगे।

श्लोक 17 (padma.3.49.17)

स्वस्थो भव महाराज भुक्त्वा राज्यमकंटकम् । पुनर्द्रक्ष्यसि राजेंद्र यजमानो विशेषतः ।

svastho bhava mahārāja bhuktvā rājyamakaṁṭakam punardrakṣyasi rājeṁdra yajamāno viśeṣataḥ

हे महाराज! स्वस्थ रहो, कंटकरहित राज्य का भोग करो। हे राजेंद्र! यज्ञ करने वाले के रूप में तुम विशेष रूप से इसे पुनः देखोगे।

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