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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 50

विष्णु-भक्ति की प्रशंसा

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

श्लोक 1 (padma.3.50.1)

ऋषय ऊचुः । भवता कथितं सर्वं यत्किंचित्पृष्टमेव च । इदानीमपि पृच्छाम एकं वद महामते ।

ṛṣaya ūcuḥ bhavatā kathitaṁ sarvaṁ yatkiṁcitpṛṣṭameva ca idānīmapi pṛcchāma ekaṁ vada mahāmate

ऋषियों ने कहा — आपने जो कुछ भी पूछा गया, वह सब बता दिया। अब हम एक और बात पूछते हैं — हे महामते! बताइए।

श्लोक 2 (padma.3.50.2)

एतेषां खलु तीर्थानां सेवनाद्यत्फलं लभेत् । सर्वेषां किल कृत्वैकं कर्म केन च लभ्यते ।

eteṣāṁ khalu tīrthānāṁ sevanādyatphalaṁ labhet sarveṣāṁ kila kṛtvaikaṁ karma kena ca labhyate

इन समस्त तीर्थों के सेवन से जो फल मिलता है, वह सब एक ही कर्म करने से किस साधन द्वारा प्राप्त होता है?

श्लोक 3 (padma.3.50.3)

एतन्नो ब्रूहि सर्वज्ञ कर्मैवं यदि वर्तते । सूत उवाच । कर्मयोगः किल प्रोक्तो वर्णानां द्विजपूर्वशः ।

etanno brūhi sarvajña karmaivaṁ yadi vartate sūta uvāca karmayogaḥ kila prokto varṇānāṁ dvijapūrvaśaḥ

हे सर्वज्ञ! यदि ऐसा कोई कर्म है, तो हमें बताइए। सूत जी ने कहा — वर्णों के लिए, विशेषतः द्विजों के लिए, कर्मयोग बताया गया है।

श्लोक 4 (padma.3.50.4)

नानाविधो महाभागास्तत्र चैकं विशिष्यते । हरिभक्तिः कृता येन मनसा वचसा गिरा ।

nānāvidho mahābhāgāstatra caikaṁ viśiṣyate haribhaktiḥ kṛtā yena manasā vacasā girā

हे महाभागो! वह अनेक प्रकार का है, और उनमें एक विशिष्ट है — मन, वचन और वाणी से की गई हरिभक्ति।

श्लोक 5 (padma.3.50.5)

जितं तेन जितं तेन जितमेव न संशयः । हरिरेव समाराध्यः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ।

jitaṁ tena jitaṁ tena jitameva na saṁśayaḥ harireva samārādhyaḥ sarvadeveśvareśvaraḥ

उसी से विजय, उसी से विजय, निश्चय ही विजय प्राप्त होती है, इसमें संदेह नहीं। हरि ही आराधना के योग्य हैं, जो सभी देवेश्वरों के भी ईश्वर हैं।

श्लोक 6 (padma.3.50.6)

हरिनाममहामंत्रैर्नश्येत्पापपिशाचकम् । हरेः प्रदक्षिणं कृत्वा सकृदप्यमलाशयाः ।

harināmamahāmaṁtrairnaśyetpāpapiśācakam hareḥ pradakṣiṇaṁ kṛtvā sakṛdapyamalāśayāḥ

हरि के नाम के महामंत्रों से पाप-रूपी पिशाच नष्ट हो जाता है। निर्मल हृदय से हरि की एक बार भी प्रदक्षिणा करके —

श्लोक 7 (padma.3.50.7)

सर्वतीर्थसमाप्लावं लभंते यन्न संशयः । प्रतिमां च हरेर्दृष्ट्वा सर्वतीर्थफलं लभेत् ।

sarvatīrthasamāplāvaṁ labhaṁte yanna saṁśayaḥ pratimāṁ ca harerdṛṣṭvā sarvatīrthaphalaṁ labhet

मनुष्य को समस्त तीर्थों में स्नान करने के तुल्य फल मिलता है, इसमें संदेह नहीं। हरि की मूर्ति का दर्शन करके मनुष्य समस्त तीर्थों का फल पाता है।

श्लोक 8 (padma.3.50.8)

विष्णुनामपरं जप्त्वा सर्वमंत्रफलं लभेत् । विष्णुप्रसादतुलसीमाघ्राय द्विजसत्तमाः ।

viṣṇunāmaparaṁ japtvā sarvamaṁtraphalaṁ labhet viṣṇuprasādatulasīmāghrāya dvijasattamāḥ

विष्णु के परम नाम का जप करके मनुष्य समस्त मंत्रों का फल पाता है। हे द्विजसत्तमो! विष्णु के प्रसाद की तुलसी को सूँघकर —

श्लोक 9 (padma.3.50.9)

प्रचंडं विकरालं तद्यमस्यास्यं न पश्यति । सकृत्प्रणामी कृष्णस्य मातुः स्तन्यं पिबेन्नहि ।

pracaṁḍaṁ vikarālaṁ tadyamasyāsyaṁ na paśyati sakṛtpraṇāmī kṛṣṇasya mātuḥ stanyaṁ pibennahi

मनुष्य यम के उस प्रचंड, विकराल मुख को नहीं देखता। जो एक बार भी कृष्ण को प्रणाम करता है, वह पुनः माता के स्तन का पान नहीं करता।

श्लोक 10 (padma.3.50.10)

हरिपादे मनो येषां तेभ्यो नित्यं नमोनमः । पुल्कसः श्वपचो वापि ये चान्ये म्लेच्छजातयः ।

haripāde mano yeṣāṁ tebhyo nityaṁ namonamaḥ pulkasaḥ śvapaco vāpi ye cānye mlecchajātayaḥ

जिनका मन हरि के चरणों में रमा है, उन्हें बार-बार नमस्कार है। चांडाल, श्वपच अथवा अन्य म्लेच्छ जाति के लोग भी —

श्लोक 11 (padma.3.50.11)

तेऽपि वंद्या महाभागा हरिपादैकसेवकाः । किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।

te'pi vaṁdyā mahābhāgā haripādaikasevakāḥ kiṁ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā

यदि वे केवल हरि के चरणों के सेवक हैं, तो वे भी महाभाग्यशाली और वंदनीय हैं। फिर पुण्यशाली ब्राह्मण, भक्त और राजर्षि तो कहना ही क्या?

श्लोक 12 (padma.3.50.12)

हरौ भक्तिं विधायैव गर्भवासं न पश्यति । हरेरग्रे स्वनैरुच्चैर्नृत्यंस्तन्नामकृन्नरः ।

harau bhaktiṁ vidhāyaiva garbhavāsaṁ na paśyati hareragre svanairuccairnṛtyaṁstannāmakṛnnaraḥ

केवल हरि में भक्ति करने से मनुष्य पुनः गर्भवास नहीं देखता। जो पुरुष हरि के सामने उच्च स्वरों में नृत्य करते हुए उनका नाम गाता है,

श्लोक 13 (padma.3.50.13)

पुनाति भुवनं विप्रा गंगादि सलिलं यथा । दर्शनात्स्पर्शनात्तस्य आलापादपि भक्तितः ।

punāti bhuvanaṁ viprā gaṁgādi salilaṁ yathā darśanātsparśanāttasya ālāpādapi bhaktitaḥ

वह हे विप्रो! गंगा आदि के जल के समान संसार को पवित्र करता है। उसके दर्शन, स्पर्श, या भक्तिपूर्वक बातचीत से भी —

श्लोक 14 (padma.3.50.14)

ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः । हरेः प्रदक्षिणं कुर्वन्नुच्चैस्तन्नामकृन्नरः ।

brahmahatyādibhiḥ pāpairmucyate nātra saṁśayaḥ hareḥ pradakṣiṇaṁ kurvannuccaistannāmakṛnnaraḥ

मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। जो पुरुष उच्च स्वर में उनका नाम लेते हुए हरि की प्रदक्षिणा करता है,

श्लोक 15 (padma.3.50.15)

करतालादिसंधानं सुस्वरं कलशब्दितम् । ब्रह्महत्यादिकं पापं तेनैव करतालितम् ।

karatālādisaṁdhānaṁ susvaraṁ kalaśabditam brahmahatyādikaṁ pāpaṁ tenaiva karatālitam

करताल आदि के साथ, मधुर स्वर में, मंजुल ध्वनि से — उसी करतालध्वनि से ब्रह्महत्या आदि पाप भी बिखर जाते हैं।

श्लोक 16 (padma.3.50.16)

हरिभक्तिकथामुक्त्वा ख्यायिकां शृणुयाच्च यः । तस्य संदर्शनादेव पूतो भवति मानवः ।

haribhaktikathāmuktvā khyāyikāṁ śṛṇuyācca yaḥ tasya saṁdarśanādeva pūto bhavati mānavaḥ

जो हरिभक्ति की कथा कहता है या ऐसी कथा को सुनता है, उसके दर्शन मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है।

श्लोक 17 (padma.3.50.17)

किं पुनस्तस्य पापानामाशंका मुनिपुंगवाः । तीर्थानां च परं तीर्थं कृष्णनाम महर्षयः ।

kiṁ punastasya pāpānāmāśaṁkā munipuṁgavāḥ tīrthānāṁ ca paraṁ tīrthaṁ kṛṣṇanāma maharṣayaḥ

हे मुनिपुंगवो! फिर उसे पापों का भय कैसे हो सकता है? महर्षिगण कहते हैं कि तीर्थों में परम तीर्थ कृष्ण-नाम ही है।

श्लोक 18 (padma.3.50.18)

तीर्थीकुर्वंति जगतीं गृहीतं कृष्णनाम यैः । तस्मान्मुनिवराः पुण्यं नातः परतरं विदुः ।

tīrthīkurvaṁti jagatīṁ gṛhītaṁ kṛṣṇanāma yaiḥ tasmānmunivarāḥ puṇyaṁ nātaḥ parataraṁ viduḥ

जिन्होंने कृष्ण-नाम ग्रहण किया है, वे संपूर्ण पृथ्वी को तीर्थ बना देते हैं। इसलिए हे मुनिवरो! इससे बढ़कर कोई पुण्य नहीं जानना चाहिए।

श्लोक 19 (padma.3.50.19)

विष्णुप्रसादनिर्माल्यं भुक्त्वा धृत्वा च मस्तके । विष्णुरेव भवेन्मर्त्यो यमशोकविनाशनः ।

viṣṇuprasādanirmālyaṁ bhuktvā dhṛtvā ca mastake viṣṇureva bhavenmartyo yamaśokavināśanaḥ

विष्णु के प्रसाद-निर्माल्य का भोग करके और उसे सिर पर धारण करके, मरणशील मनुष्य स्वयं यम के शोक का नाशक विष्णु ही बन जाता है।

श्लोक 20 (padma.3.50.20)

अर्चनीयो नमस्कार्यो हरिरेव न संशयः । ये महाविष्णुमव्यक्तं देवं वापि महेश्वरम् ।

arcanīyo namaskāryo harireva na saṁśayaḥ ye mahāviṣṇumavyaktaṁ devaṁ vāpi maheśvaram

हरि ही पूजा और नमस्कार के योग्य हैं, इसमें संदेह नहीं। जो महाविष्णु के अव्यक्त देवत्व को, अथवा महेश्वर को —

श्लोक 21 (padma.3.50.21)

एकीभावेन पश्यंति न तेषां पुनरुद्भवः । तस्मादनादिनिधनं विष्णुमात्मानमव्ययम् ।

ekībhāvena paśyaṁti na teṣāṁ punarudbhavaḥ tasmādanādinidhanaṁ viṣṇumātmānamavyayam

एक ही मानकर देखते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिए अनादि-अनंत, अविनाशी आत्मस्वरूप विष्णु —

श्लोक 22 (padma.3.50.22)

हरिं चैकं प्रपश्यध्वं पूजयध्वं तथैव हि । ये समानं प्रपश्यंति हरिं वै देवतांतरम् ।

hariṁ caikaṁ prapaśyadhvaṁ pūjayadhvaṁ tathaiva hi ye samānaṁ prapaśyaṁti hariṁ vai devatāṁtaram

और हरि को एक ही समझकर देखो, और उसी प्रकार उनकी पूजा करो। जो हरि को किसी अन्य देवता के समान मानते हैं,

श्लोक 23 (padma.3.50.23)

ते यांति नरकान्घोरांन्न तांस्तु गणयेद्धीरः । मूर्खं वा पंडितं वापि ब्राह्मणं केशवप्रियम् ।

te yāṁti narakānghorāṁnna tāṁstu gaṇayeddhīraḥ mūrkhaṁ vā paṁḍitaṁ vāpi brāhmaṇaṁ keśavapriyam

वे घोर नरकों को जाते हैं; धीर पुरुष को उन्हें (सच्चे भक्तों में) गिनना भी नहीं चाहिए। चाहे मूर्ख हो या पंडित, केशव-प्रिय ब्राह्मण हो —

श्लोक 24 (padma.3.50.24)

श्वपाकं वा मोचयति नारायणः स्वयं प्रभुः । नारायणात्परो नास्ति पापराशि दवानलः ।

śvapākaṁ vā mocayati nārāyaṇaḥ svayaṁ prabhuḥ nārāyaṇātparo nāsti pāparāśi davānalaḥ

अथवा चांडाल भी हो — स्वयं प्रभु नारायण उसे मुक्त कर देते हैं। नारायण से बढ़कर कोई नहीं है; वे पापराशि के लिए दावानल हैं।

श्लोक 25 (padma.3.50.25)

कृत्वापि पातकं घोरं कृष्णनाम्ना विमुच्यते । स्वयं नारायणो देवः स्वनाम्नि जगतां गुरुः ।

kṛtvāpi pātakaṁ ghoraṁ kṛṣṇanāmnā vimucyate svayaṁ nārāyaṇo devaḥ svanāmni jagatāṁ guruḥ

घोर पातक करके भी मनुष्य कृष्ण-नाम से मुक्त हो जाता है। स्वयं देव नारायण, जो जगत् के गुरु हैं, ने अपने नाम में —

श्लोक 26 (padma.3.50.26)

आत्मनोऽभ्यधिकां शक्तिं स्थापयामास सुव्रताः । अत्र ये विवदंते वै आयासलघुदर्शनात् ।

ātmano'bhyadhikāṁ śaktiṁ sthāpayāmāsa suvratāḥ atra ye vivadaṁte vai āyāsalaghudarśanāt

हे सुव्रतो! अपने से भी अधिक शक्ति स्थापित कर दी है। जो लोग इस पर विवाद करते हैं, केवल परिश्रम की लघुता देखकर —

श्लोक 27 (padma.3.50.27)

फलानां गौरवाच्चापि ते यांति नरकं बहु । तस्माद्धरौ भक्तिमान्स्याद्धरिनामपरायणः ।

phalānāṁ gauravāccāpi te yāṁti narakaṁ bahu tasmāddharau bhaktimānsyāddharināmaparāyaṇaḥ

और उसके फलों की महत्ता के बावजूद भी विवाद करते हैं, वे अनेक नरकों को जाते हैं। इसलिए मनुष्य को हरि का भक्त होना चाहिए, हरि-नाम में तत्पर।

श्लोक 28 (padma.3.50.28)

पूजकं पृष्ठतो रक्षेन्नामिनं वक्षसि प्रभुः । हरिनाममहावज्रं पापपर्वतदारणे ।

pūjakaṁ pṛṣṭhato rakṣennāminaṁ vakṣasi prabhuḥ harināmamahāvajraṁ pāpaparvatadāraṇe

प्रभु केवल पूजा करने वाले की पीठ से रक्षा करते हैं, परंतु नाम लेने वाले को अपने वक्षस्थल पर रखते हैं। हरि का नाम पाप-पर्वत को विदीर्ण करने वाला महावज्र है।

श्लोक 29 (padma.3.50.29)

तस्य पादौ तु सफलौ तदर्थं गतिशालिनौ । तावेव धन्यावाख्यातौ यौ तु पूजाकरौ करौ ।

tasya pādau tu saphalau tadarthaṁ gatiśālinau tāveva dhanyāvākhyātau yau tu pūjākarau karau

वे ही चरण सफल हैं, वे ही सच्ची गति वाले हैं, जो उसी लक्ष्य की ओर चलते हैं; वे ही हाथ धन्य कहे गए हैं, जो उनकी पूजा करते हैं।

श्लोक 30 (padma.3.50.30)

उत्तमांगमुत्तमांगं तद्धरौ नम्रमेव यत् । सा जिह्वा या हरिं स्तौति तन्मनस्तत्पदानुगम् ।

uttamāṁgamuttamāṁgaṁ taddharau namrameva yat sā jihvā yā hariṁ stauti tanmanastatpadānugam

वही सिर सच्चा 'उत्तम अंग' है, जो हरि के सामने झुकता है। वही जिह्वा सच्ची है, जो हरि की स्तुति करती है; वही मन सच्चा है, जो उनके चरणों का अनुगामी है;

श्लोक 31 (padma.3.50.31)

तानि लोमानि चोच्यंते यानि तन्नाम्नि चोत्थितम् । कुर्वंति तच्च नेत्रांबु यदच्युतप्रसंगतः ।

tāni lomāni cocyaṁte yāni tannāmni cotthitam kurvaṁti tacca netrāṁbu yadacyutaprasaṁgataḥ

वे ही रोम सच्चे कहे जाते हैं, जो उनके नाम से खड़े हो जाते हैं; और वे ही नेत्र-जल सच्चा है, जो अच्युत के संपर्क से उत्पन्न होता है।

श्लोक 32 (padma.3.50.32)

अहो लोका अतितरां दैवदोषेण वंचिताः । नामोच्चारणमात्रेण मुक्तिदं न भजंति वै ।

aho lokā atitarāṁ daivadoṣeṇa vaṁcitāḥ nāmoccāraṇamātreṇa muktidaṁ na bhajaṁti vai

हाय! लोग अपने ही भाग्य के दोष से कितने ठगे गए हैं! केवल नाम के उच्चारण मात्र से मिलने वाली मुक्ति का वे सेवन नहीं करते।

श्लोक 33 (padma.3.50.33)

वंचितास्ते च कलुषाः स्त्रीणां संगप्रसंगतः । प्रतिष्ठंति च लोमानि येषां नो कृष्णशब्दने ।

vaṁcitāste ca kaluṣāḥ strīṇāṁ saṁgaprasaṁgataḥ pratiṣṭhaṁti ca lomāni yeṣāṁ no kṛṣṇaśabdane

स्त्रियों के संग की आसक्ति से वे ठगे और मलिन हुए हैं; जिनके रोम कृष्ण के नाम पर खड़े नहीं होते,

श्लोक 34 (padma.3.50.34)

ते मूर्खा ह्यकृतात्मानः पुत्रशोकादि विह्वलाः । रुदंति बहुलालापैर्न कृष्णाक्षरकीर्तने ।

te mūrkhā hyakṛtātmānaḥ putraśokādi vihvalāḥ rudaṁti bahulālāpairna kṛṣṇākṣarakīrtane

वे मूर्ख और असंस्कृत आत्मा वाले हैं, जो पुत्र-शोक आदि में व्याकुल होकर तो बहुत विलाप करते हुए रोते हैं, परंतु कृष्ण के अक्षरों के कीर्तन में नहीं रोते।

श्लोक 35 (padma.3.50.35)

जिह्वां लब्ध्वापि लोकेऽस्मिन्कृष्णनामजपेन्नहि । लब्ध्वापि मुक्तिसोपानं हेलयैव च्यवंति ते ।

jihvāṁ labdhvāpi loke'sminkṛṣṇanāmajapennahi labdhvāpi muktisopānaṁ helayaiva cyavaṁti te

इस लोक में जिह्वा पाकर भी वे कृष्ण-नाम का जप नहीं करते; मुक्ति की सीढ़ी पाकर भी वे केवल उपेक्षा से उससे गिर जाते हैं।

श्लोक 36 (padma.3.50.36)

तस्माद्यत्नेन वै विष्णुं कर्मयोगेन मानवः । कर्मयोगार्च्चितो विष्णुः प्रसीदत्येव नान्यथा ।

tasmādyatnena vai viṣṇuṁ karmayogena mānavaḥ karmayogārccito viṣṇuḥ prasīdatyeva nānyathā

इसलिए मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक कर्मयोग द्वारा विष्णु की उपासना करनी चाहिए; कर्मयोग से पूजित विष्णु ही प्रसन्न होते हैं, अन्यथा नहीं।

श्लोक 37 (padma.3.50.37)

तीर्थादप्यधिकं तीर्थं विष्णोर्भजनमुच्यते । सर्वेषां खलु तीर्थानां स्नानपानावगाहनैः ।

tīrthādapyadhikaṁ tīrthaṁ viṣṇorbhajanamucyate sarveṣāṁ khalu tīrthānāṁ snānapānāvagāhanaiḥ

विष्णु की भक्ति को तीर्थ से भी बढ़कर तीर्थ कहा गया है। समस्त तीर्थों में स्नान, पान और अवगाहन से —

श्लोक 38 (padma.3.50.38)

यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्फलं कृष्णसेवनात् । यजंते कर्मयोगेन धन्या एव नरा हरिम् ।

yatphalaṁ labhate martyastatphalaṁ kṛṣṇasevanāt yajaṁte karmayogena dhanyā eva narā harim

मनुष्य जो फल पाता है, वही फल कृष्ण की सेवा से मिलता है। धन्य हैं वे मनुष्य, जो कर्मयोग से हरि की उपासना करते हैं।

श्लोक 39 (padma.3.50.39)

तस्माद्भजध्वं मुनयः कृष्णं परममंगलम् ।

tasmādbhajadhvaṁ munayaḥ kṛṣṇaṁ paramamaṁgalam

इसलिए हे मुनियो! परम मंगलमय कृष्ण की उपासना करो।

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