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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 59

यति-धर्म का निरूपण

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (padma.3.59.1)

व्यास उवाच । एवं वनाश्रमे स्थित्वा तृतीयं भागमायुषः । चतुर्थं चायुषो भागं संन्यासेन नयेत्क्रमात् ।

vyāsa uvāca evaṁ vanāśrame sthitvā tṛtīyaṁ bhāgamāyuṣaḥ caturthaṁ cāyuṣo bhāgaṁ saṁnyāsena nayetkramāt

व्यास जी ने कहा — इस प्रकार वनाश्रम में आयु का तीसरा भाग बिताकर, आयु के चौथे भाग को क्रमशः संन्यास में व्यतीत करना चाहिए।

श्लोक 2 (padma.3.59.2)

अग्नीनात्मनि संस्थाप्य द्विजः प्रव्रजितो भवेत् । योगाभ्यासरतः शांतो ब्रह्मविद्यापरायणः ।

agnīnātmani saṁsthāpya dvijaḥ pravrajito bhavet yogābhyāsarataḥ śāṁto brahmavidyāparāyaṇaḥ

अग्नियों को अपने ही में स्थापित करके द्विज को प्रव्रजित (संन्यासी) हो जाना चाहिए — योगाभ्यास में रत, शांत, ब्रह्मविद्या में परायण।

श्लोक 3 (padma.3.59.3)

यदा मनसि संपन्नं वैराग्यं सर्ववस्तुषु । तदा संन्यासमिच्छेच्च पतितः स्याद्विपर्यये ।

yadā manasi saṁpannaṁ vairāgyaṁ sarvavastuṣu tadā saṁnyāsamicchecca patitaḥ syādviparyaye

जब मन में समस्त वस्तुओं के प्रति संपूर्ण वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तभी संन्यास की इच्छा करनी चाहिए; इसके विपरीत करने पर मनुष्य पतित हो जाता है।

श्लोक 4 (padma.3.59.4)

प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा पुनः । दांतः शुक्लकषायोसौ ब्रह्माश्रममुपाश्रयेत् ।

prājāpatyāṁ nirūpyeṣṭimāgneyīmathavā punaḥ dāṁtaḥ śuklakaṣāyosau brahmāśramamupāśrayet

प्राजापत्य यज्ञ या पुनः आग्नेयी यज्ञ का विधान करके, संयमी, श्वेत या गेरुए वस्त्रधारी वह ब्रह्माश्रम (संन्यास) का आश्रय ले।

श्लोक 5 (padma.3.59.5)

ज्ञानसंन्यासिनः केचिद्वेदसंन्यासिनोऽपरे । कर्मसंन्यासिनस्त्वन्ये त्रिविधाः परिकीर्तिताः ।

jñānasaṁnyāsinaḥ kecidvedasaṁnyāsino'pare karmasaṁnyāsinastvanye trividhāḥ parikīrtitāḥ

कुछ ज्ञान-संन्यासी होते हैं, अन्य वेद-संन्यासी, और अन्य कर्म-संन्यासी — इस प्रकार तीन प्रकार के संन्यासी कहे गए हैं।

श्लोक 6 (padma.3.59.6)

यः सर्वत्र विनिर्मुक्तो निर्द्वंद्वश्चैव निर्भयः । प्रोच्यते ज्ञानसंन्यासी आत्मन्येव व्यवस्थितः ।

yaḥ sarvatra vinirmukto nirdvaṁdvaścaiva nirbhayaḥ procyate jñānasaṁnyāsī ātmanyeva vyavasthitaḥ

जो सर्वत्र से मुक्त, द्वंद्वरहित और भयरहित होकर केवल आत्मा में स्थित रहता है, वह ज्ञान-संन्यासी कहलाता है।

श्लोक 7 (padma.3.59.7)

वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं निराशीर्निष्परिग्रहः । प्रोच्यते वेदसंन्यासी मुमुक्षुर्विजितेंद्रियः ।

vedamevābhyasennityaṁ nirāśīrniṣparigrahaḥ procyate vedasaṁnyāsī mumukṣurvijiteṁdriyaḥ

जो नित्य केवल वेद का अभ्यास करता है, इच्छारहित, अपरिग्रही, मोक्षेच्छु, जितेंद्रिय — वह वेद-संन्यासी कहलाता है।

श्लोक 8 (padma.3.59.8)

यस्त्वग्निमात्मसाकृत्वा ब्रह्मार्पणपरो द्विजः । ज्ञेयः स कर्मसंन्यासी महायज्ञपरायणः ।

yastvagnimātmasākṛtvā brahmārpaṇaparo dvijaḥ jñeyaḥ sa karmasaṁnyāsī mahāyajñaparāyaṇaḥ

और जो द्विज अग्नि को अपने में समाहित करके ब्रह्मार्पण में तत्पर रहता है, वह कर्म-संन्यासी जानना चाहिए, जो महायज्ञ में परायण है।

श्लोक 9 (padma.3.59.9)

त्रयाणामपि चैतेषां ज्ञानी त्वभ्यधिको मतः । न तस्य विद्यते कार्यं न लिंगं वा विपश्चितः ।

trayāṇāmapi caiteṣāṁ jñānī tvabhyadhiko mataḥ na tasya vidyate kāryaṁ na liṁgaṁ vā vipaścitaḥ

इन तीनों में ज्ञानी को श्रेष्ठ माना गया है। विद्वान् के लिए न कोई कर्तव्य शेष रहता है, न कोई बाह्य चिह्न।

श्लोक 10 (padma.3.59.10)

निर्ममो निर्भयः शांतो निर्द्वंद्वः पर्णभोजनः । जीर्णकौपीनवासाः स्यान्नग्नो वा ध्यानतत्परः ।

nirmamo nirbhayaḥ śāṁto nirdvaṁdvaḥ parṇabhojanaḥ jīrṇakaupīnavāsāḥ syānnagno vā dhyānatatparaḥ

ममतारहित, भयरहित, शांत, द्वंद्वरहित, पत्तों पर निर्वाह करने वाला, जीर्ण कौपीन धारण करने वाला अथवा नग्न, ध्यान में तत्पर।

श्लोक 11 (padma.3.59.11)

ब्रह्मचारी जिताहारो ग्रामादन्नं समाहरेत् । अध्यात्मरतिरासीत निरपेक्षो निराशिषः ।

brahmacārī jitāhāro grāmādannaṁ samāharet adhyātmaratirāsīta nirapekṣo nirāśiṣaḥ

ब्रह्मचारी, संयमित आहार वाला, गाँव से अन्न एकत्र करे। वह आध्यात्मिक रति में रहे, निरपेक्ष और इच्छारहित।

श्लोक 12 (padma.3.59.12)

आत्मनैव सहायेन सुखार्थं विचरेदिह । नाभिनंदेत मरणं नाभिनंदेत जीवनम् ।

ātmanaiva sahāyena sukhārthaṁ vicarediha nābhinaṁdeta maraṇaṁ nābhinaṁdeta jīvanam

अपनी ही आत्मा को सहायक मानकर वह सुख के लिए इस लोक में विचरण करे। न मृत्यु का अभिनंदन करे, न जीवन का।

श्लोक 13 (padma.3.59.13)

कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा । नाध्येतव्यं न वर्तव्यं श्रोतव्यं न कदाचन ।

kālameva pratīkṣeta nirdeśaṁ bhṛtako yathā nādhyetavyaṁ na vartavyaṁ śrotavyaṁ na kadācana

जैसे भृत्य अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही वह केवल समय की प्रतीक्षा करे। अब न कुछ पढ़ना है, न कुछ करना है, न कुछ सुनना है।

श्लोक 14 (padma.3.59.14)

एवं ज्ञानपरो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते । एकवासाथ वा विद्वान्कौपीनाच्छादनोपि वा ।

evaṁ jñānaparo yogī brahmabhūyāya kalpate ekavāsātha vā vidvānkaupīnācchādanopi vā

इस प्रकार ज्ञानपरायण योगी ब्रह्म-स्वरूप होने के योग्य हो जाता है। विद्वान् एक वस्त्र धारण कर सकता है, या केवल कौपीन-आच्छादन भी,

श्लोक 15 (padma.3.59.15)

मुंडी शिखी वाथ भवेत्त्रिदंडी निष्परिग्रहः । काषायवासाः सततं ध्यानयोगपरायणः ।

muṁḍī śikhī vātha bhavettridaṁḍī niṣparigrahaḥ kāṣāyavāsāḥ satataṁ dhyānayogaparāyaṇaḥ

मुंडित सिर वाला या शिखाधारी हो सकता है, त्रिदंडधारी और अपरिग्रही; सदा गेरुए वस्त्र पहने, ध्यान-योग में परायण।

श्लोक 16 (padma.3.59.16)

ग्रामांते वृक्षमूले वा वसेद्देवालयेपि वा । समः शत्रौ तथा मित्रे तथा मानापमानयोः ।

grāmāṁte vṛkṣamūle vā vaseddevālayepi vā samaḥ śatrau tathā mitre tathā mānāpamānayoḥ

उसे गाँव के छोर पर, या वृक्ष की जड़ में, अथवा देवालय में भी निवास करना चाहिए। शत्रु और मित्र में, तथा मान-अपमान में भी समान भाव रखना चाहिए।

श्लोक 17 (padma.3.59.17)

भैक्ष्येण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेत्क्वच्चित् । यस्तु मोहेन वान्यस्मादेकान्नादी भवेद्यतिः ।

bhaikṣyeṇa vartayennityaṁ naikānnādī bhavetkvaccit yastu mohena vānyasmādekānnādī bhavedyatiḥ

उसे सदा भिक्षा से ही जीवन-यापन करना चाहिए, किसी एक घर के अन्न पर कभी निर्भर न रहे। जो यति मोहवश या अन्य कारण से एक ही घर के अन्न पर निर्भर हो जाता है,

श्लोक 18 (padma.3.59.18)

न तस्य निष्कृतिः काचिद्धर्मशास्त्रेषु दृश्यते । रागद्वेषवियुक्तात्मा समलोष्टाश्मकांचनः ।

na tasya niṣkṛtiḥ kāciddharmaśāstreṣu dṛśyate rāgadveṣaviyuktātmā samaloṣṭāśmakāṁcanaḥ

उसके लिए धर्मशास्त्रों में कोई प्रायश्चित्त नहीं देखा गया है। जिसकी आत्मा राग-द्वेष से मुक्त हो, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सुवर्ण को समान माने,

श्लोक 19 (padma.3.59.19)

प्राणिहिंसानिवृत्तश्च मौनी स्यात्सर्वनिस्पृहः । दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।

prāṇihiṁsānivṛttaśca maunī syātsarvanispṛhaḥ dṛṣṭipūtaṁ nyasetpādaṁ vastrapūtaṁ jalaṁ pibet

जो प्राणि-हिंसा से विरत हो, मौनी हो और सर्वथा निःस्पृह हो। वह दृष्टि से शुद्ध किए हुए स्थान पर ही पैर रखे, वस्त्र से छाना हुआ जल पिए।

श्लोक 20 (padma.3.59.20)

सत्यपूतां वदेद्वाणीं मनःपूतं समाचरेत् । नैकत्र निवसेद्देशे वर्षाभ्योन्यत्र भिक्षुकः ।

satyapūtāṁ vadedvāṇīṁ manaḥpūtaṁ samācaret naikatra nivaseddeśe varṣābhyonyatra bhikṣukaḥ

वह सत्य से पवित्र वाणी बोले, मन से पवित्र आचरण करे। भिक्षुक को वर्षा ऋतु के अतिरिक्त एक ही स्थान पर निवास नहीं करना चाहिए।

श्लोक 21 (padma.3.59.21)

स्नात्वा शौचयुतो नित्यं कमंडलुकरः शुचिः । ब्रह्मचर्यरतो नित्यं वनवासरतो भवेत् ।

snātvā śaucayuto nityaṁ kamaṁḍalukaraḥ śuciḥ brahmacaryarato nityaṁ vanavāsarato bhavet

स्नान करके, नित्य शुद्धि से युक्त, हाथ में कमंडल लिए, शुद्ध, सदा ब्रह्मचर्य में रत, वह वनवास में रत रहे।

श्लोक 22 (padma.3.59.22)

मोक्षशास्त्रेषु निरतो ब्रह्मसूत्री जितेंद्रियः । दंभाहंकारनिर्मुक्तो निंदापैशुन्यवर्जितः ।

mokṣaśāstreṣu nirato brahmasūtrī jiteṁdriyaḥ daṁbhāhaṁkāranirmukto niṁdāpaiśunyavarjitaḥ

मोक्षशास्त्रों में रत, ब्रह्मसूत्रधारी, जितेंद्रिय, दंभ-अहंकार से मुक्त, निंदा और चुगली से रहित,

श्लोक 23 (padma.3.59.23)

आत्मज्ञानगुणोपेतो यदि मोक्षमवाप्नुयात् । अभ्यसेत्सततं देवं प्रणवाख्यं सनातनम् ।

ātmajñānaguṇopeto yadi mokṣamavāpnuyāt abhyasetsatataṁ devaṁ praṇavākhyaṁ sanātanam

आत्मज्ञान के गुण से युक्त, यदि वह मोक्ष पाना चाहता है, तो सनातन देव प्रणव (ओंकार) का सतत अभ्यास करे।

श्लोक 24 (padma.3.59.24)

स्नात्वाचम्य विधानेन शुचिर्देवालयादिषु । यज्ञोपवीती शांतात्मा कुशपाणिः समाहितः ।

snātvācamya vidhānena śucirdevālayādiṣu yajñopavītī śāṁtātmā kuśapāṇiḥ samāhitaḥ

स्नान और विधिपूर्वक आचमन करके, देवालयों आदि में शुद्ध होकर, यज्ञोपवीतधारी, शांतात्मा, हाथ में कुश लिए, समाहित होकर —

श्लोक 25 (padma.3.59.25)

धौतकाषायवसनो तस्मिञ्छन्नतनूरुहः । अधियज्ञं ब्रह्मजपेदाधिदैविकमेव च ।

dhautakāṣāyavasano tasmiñchannatanūruhaḥ adhiyajñaṁ brahmajapedādhidaivikameva ca

धुले हुए गेरुए वस्त्र पहने, शरीर के रोम ढके हुए, वह अधियज्ञ रूप में तथा आधिदैविक रूप में भी ब्रह्म-मंत्र का जप करे,

श्लोक 26 (padma.3.59.26)

आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत् । पुत्रेषु चाथ निवसन्ब्रह्मचारी यतिर्मुनिः ।

ādhyātmikaṁ ca satataṁ vedāntābhihitaṁ ca yat putreṣu cātha nivasanbrahmacārī yatirmuniḥ

तथा सदा आध्यात्मिक रूप में भी, जैसा वेदांत में कहा गया है। और चाहे पुत्रों के बीच निवास करते हुए भी, ब्रह्मचारी, यति, मुनि —

श्लोक 27 (padma.3.59.27)

वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं स याति परमां गतिम् । अहिंसासत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं तपः परम् ।

vedamevābhyasennityaṁ sa yāti paramāṁ gatim ahiṁsāsatyamasteyaṁ brahmacaryaṁ tapaḥ param

वह सदा केवल वेद का ही अभ्यास करे; वह परम गति को प्राप्त होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और परम तप —

श्लोक 28 (padma.3.59.28)

क्षमादया च संतोषो व्रतान्यस्य विशेषतः । वेदांतज्ञाननिष्ठो वा पंचयज्ञान्समाहितः ।

kṣamādayā ca saṁtoṣo vratānyasya viśeṣataḥ vedāṁtajñānaniṣṭho vā paṁcayajñānsamāhitaḥ

क्षमा, दया और संतोष — ये उसके विशेष व्रत हैं। अथवा वेदांत-ज्ञान में निष्ठ होकर, समाहित होकर पंचयज्ञ करे;

श्लोक 29 (padma.3.59.29)

कुर्य्यादहरहः स्नात्वा भिक्षार्थे नैव तेन हि । होममंत्रान्जपेन्नित्यं कालेकाले समाहितः ।

kuryyādaharahaḥ snātvā bhikṣārthe naiva tena hi homamaṁtrānjapennityaṁ kālekāle samāhitaḥ

उसे प्रतिदिन स्नान करके यह करना चाहिए, परंतु भिक्षा प्राप्ति के लिए नहीं। उसे प्रत्येक समय पर समाहित होकर होम-मंत्रों का सदा जप करना चाहिए।

श्लोक 30 (padma.3.59.30)

स्वाध्यायं चान्वहं कुर्य्यात्सावित्रीं संध्ययोर्जपेत् । ध्यायीत सततं देवमेकांतं परमेश्वरम् ।

svādhyāyaṁ cānvahaṁ kuryyātsāvitrīṁ saṁdhyayorjapet dhyāyīta satataṁ devamekāṁtaṁ parameśvaram

उसे प्रतिदिन स्वाध्याय करना चाहिए और दोनों संध्याओं में सावित्री का जप करना चाहिए। उसे सतत उस एकाकी, परमेश्वर देव का ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 31 (padma.3.59.31)

एकान्नं वर्जयेन्नित्यं कामं क्रोधं परिग्रहम् । एकवासा द्विवासा वा शिखी यज्ञोपवीतवान् । कमंडलुकरो विद्वांस्त्रिदंडो याति तत्परम् ।

ekānnaṁ varjayennityaṁ kāmaṁ krodhaṁ parigraham ekavāsā dvivāsā vā śikhī yajñopavītavān kamaṁḍalukaro vidvāṁstridaṁḍo yāti tatparam

उसे सदा एक घर के अन्न पर निर्भरता, तथा काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करना चाहिए। चाहे एक वस्त्र हो या दो, शिखाधारी, यज्ञोपवीतधारी, हाथ में कमंडल लिए विद्वान् त्रिदंडधारी उस परम पद को प्राप्त होता है।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60