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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 61

हरि-भक्ति का रहस्य — वर्णाश्रम-धर्म से परे

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

श्लोक 1 (padma.3.61.1)

सूत उवाच । एवमुक्ता पुरा विप्रा व्यासेनामिततेजसा । एतावदुक्त्वा भगवान्व्यासः सत्यवतीसुतः ।

sūta uvāca evamuktā purā viprā vyāsenāmitatejasā etāvaduktvā bhagavānvyāsaḥ satyavatīsutaḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार पूर्वकाल में अमित तेजस्वी व्यास द्वारा विप्रों से यह कहा गया। इतना कहकर भगवान् सत्यवती-पुत्र व्यास ने,

श्लोक 2 (padma.3.61.2)

समाश्वास्य मुनीन्सर्वान्जगाम च यथागतम् । भवद्भ्यस्तु मया प्रोक्तं वर्णाश्रमविधानकम् ।

samāśvāsya munīnsarvānjagāma ca yathāgatam bhavadbhyastu mayā proktaṁ varṇāśramavidhānakam

समस्त मुनियों को सांत्वना देकर जैसे आए थे वैसे ही चले गए। (उन्होंने कहा —) 'तुम्हें मैंने वर्णाश्रम की विधि बता दी है।

श्लोक 3 (padma.3.61.3)

एवं कृत्वा प्रियो विष्णोर्भवत्येव न चान्यथा । रहस्यं तत्र वक्ष्यामि शृणुत द्विजसत्तमाः ।

evaṁ kṛtvā priyo viṣṇorbhavatyeva na cānyathā rahasyaṁ tatra vakṣyāmi śṛṇuta dvijasattamāḥ

इस प्रकार करने से ही मनुष्य विष्णु का प्रिय बनता है, अन्यथा नहीं। अब मैं उसका रहस्य बताऊँगा — हे द्विजसत्तमो! सुनो।

श्लोक 4 (padma.3.61.4)

ये चात्र कथिता धर्मा वर्णाश्रमनिबंधनाः । हरिभक्तिकलांशांश समाना न हि ते द्विजाः ।

ye cātra kathitā dharmā varṇāśramanibaṁdhanāḥ haribhaktikalāṁśāṁśa samānā na hi te dvijāḥ

यहाँ जो वर्णाश्रम पर आधारित धर्म कहे गए हैं, हे द्विजो! वे हरिभक्ति के अंश के अंश के भी समान नहीं हैं।

श्लोक 5 (padma.3.61.5)

पुंसामेकेह वै साध्या हरिभक्तिः कलौ युगे । युगांतरेण धर्मा हि सेवितव्या नरेण हि ।

puṁsāmekeha vai sādhyā haribhaktiḥ kalau yuge yugāṁtareṇa dharmā hi sevitavyā nareṇa hi

कलियुग में मनुष्यों के लिए एकमात्र हरिभक्ति ही साध्य है। अन्य युगों में मनुष्य को (विविध विहित) धर्मों का सेवन करना चाहिए।

श्लोक 6 (padma.3.61.6)

कलौ नारायणं देवं यजते यः स धर्म्मभाक् । दामोदरं हृषीकेशं पुरुहूतं सनातनम् ।

kalau nārāyaṇaṁ devaṁ yajate yaḥ sa dharmmabhāk dāmodaraṁ hṛṣīkeśaṁ puruhūtaṁ sanātanam

कलियुग में जो देव नारायण की पूजा करता है, वही सच्चा धर्मात्मा है — दामोदर, हृषीकेश, पुरुहूत, सनातन।

श्लोक 7 (padma.3.61.7)

हृदि कृत्वा परं शांतं जितमेव जगत्त्रयम् । कलिकालोरगादंशात्किल्बिषात्कालकूटतः ।

hṛdi kṛtvā paraṁ śāṁtaṁ jitameva jagattrayam kalikāloragādaṁśātkilbiṣātkālakūṭataḥ

उस परम शांत को हृदय में स्थापित करके तीनों लोक निश्चय ही जीत लिए जाते हैं। कलियुग-रूपी सर्प से, पाप के विष से, कालकूट से —

श्लोक 8 (padma.3.61.8)

हरिभक्तिसुधां पीत्वा उल्लंघ्यो भवति द्विजः । किं जपैः श्रीहरेर्नाम गृहीतं यदि मानुषैः ।

haribhaktisudhāṁ pītvā ullaṁghyo bhavati dvijaḥ kiṁ japaiḥ śrīharernāma gṛhītaṁ yadi mānuṣaiḥ

हरिभक्ति-रूपी सुधा को पीकर द्विज इनसे परे उठ जाता है। यदि मनुष्यों ने श्रीहरि का नाम ही ले लिया है, तो अन्य जपों से क्या लाभ?

श्लोक 9 (padma.3.61.9)

किं स्नानैर्विष्णुपादांबु मस्तके येन धार्यते । किं यज्ञेन हरेः पादपद्मं येन धृतं हृदि ।

kiṁ snānairviṣṇupādāṁbu mastake yena dhāryate kiṁ yajñena hareḥ pādapadmaṁ yena dhṛtaṁ hṛdi

जो विष्णु के चरणामृत को अपने सिर पर धारण करता है, उसे स्नानों से क्या? जो हरि के चरण-कमल को अपने हृदय में धारण करता है, उसे यज्ञ से क्या?

श्लोक 10 (padma.3.61.10)

किं दानेन हरेः कर्म सभायां वै प्रकाशितम् । हरेर्गुणगणान्श्रुत्वा यः प्रहृष्येत्पुनः पुनः ।

kiṁ dānena hareḥ karma sabhāyāṁ vai prakāśitam harerguṇagaṇānśrutvā yaḥ prahṛṣyetpunaḥ punaḥ

जिसके हरि-कर्म सभा में प्रकाशित हो चुके हों, उसे दान से क्या? जो हरि के गुणों को सुनकर बार-बार हर्षित होता है,

श्लोक 11 (padma.3.61.11)

समाधिना प्रहृष्टस्य सा गतिः कृष्णचेतसः । तत्र विघ्नकराः प्रोक्ताः पाखंडालापपेशलाः ।

samādhinā prahṛṣṭasya sā gatiḥ kṛṣṇacetasaḥ tatra vighnakarāḥ proktāḥ pākhaṁḍālāpapeśalāḥ

यह समाधि से हर्षित, कृष्ण-चित्त वाले की ही गति है। वहाँ विघ्नकारी पाखंडियों की मधुरवाणी बताई गई है,

श्लोक 12 (padma.3.61.12)

नार्यस्तत्संगिनश्चापि हरिभक्तिविघातकाः । नारीणां नयनादेशः सुराणामपि दुर्जयः ।

nāryastatsaṁginaścāpi haribhaktivighātakāḥ nārīṇāṁ nayanādeśaḥ surāṇāmapi durjayaḥ

तथा स्त्रियाँ और उनसे संगति रखने वाले भी, जो हरिभक्ति के नाशक हैं। स्त्रियों के नेत्र-कटाक्ष की आज्ञा देवताओं के लिए भी दुर्जय है।

श्लोक 13 (padma.3.61.13)

स येन विजितो लोके हरिभक्तः स उच्यते । माद्यंति मुनयोप्यत्र नारीचरितलोलुपाः ।

sa yena vijito loke haribhaktaḥ sa ucyate mādyaṁti munayopyatra nārīcaritalolupāḥ

इस लोक में जिसने इसे जीत लिया, वही हरिभक्त कहलाता है। यहाँ मुनि भी स्त्रियों के आचरण के प्रति लोलुप होकर मदमत्त हो जाते हैं।

श्लोक 14 (padma.3.61.14)

हरिभक्तिः कुतः पुंसां नारीभक्तिजुषां द्विजाः । राक्षस्यः कामिनीवेषाश्चरंति जगति द्विजाः । नराणां बुद्धिकवलं कुर्वंति सततं हिताः ।

haribhaktiḥ kutaḥ puṁsāṁ nārībhaktijuṣāṁ dvijāḥ rākṣasyaḥ kāminīveṣāścaraṁti jagati dvijāḥ narāṇāṁ buddhikavalaṁ kurvaṁti satataṁ hitāḥ

हे द्विजो! स्त्री-भक्ति में रत मनुष्यों में हरिभक्ति कहाँ से हो सकती है? स्त्री का वेष धारण किए राक्षसियाँ जगत् में विचरण करती हैं, हे द्विजो! जो सतत हितैषी मनुष्यों की बुद्धि का ग्रास कर लेती हैं।

श्लोक 15 (padma.3.61.15)

तावद्विद्या प्रभवति तावज्ज्ञानं प्रवर्तते । तावत्सुनिर्मला मेधा सर्वशास्त्रविधारिणी ।

tāvadvidyā prabhavati tāvajjñānaṁ pravartate tāvatsunirmalā medhā sarvaśāstravidhāriṇī

तब तक ही विद्या प्रभावी रहती है, तब तक ही ज्ञान प्रवर्तित रहता है, तब तक ही सर्वशास्त्रों को धारण करने वाली निर्मल बुद्धि रहती है,

श्लोक 16 (padma.3.61.16)

तावज्जपस्तपस्तावत्तावतीर्थनिषेवणम् । तावच्च गुरुशुश्रूषा तावद्धि तरणे मतिः ।

tāvajjapastapastāvattāvatīrthaniṣevaṇam tāvacca guruśuśrūṣā tāvaddhi taraṇe matiḥ

तब तक ही जप-तप रहता है, तब तक ही तीर्थसेवन रहता है, तब तक ही गुरुसेवा और संसार-तरण की बुद्धि रहती है,

श्लोक 17 (padma.3.61.17)

तावत्प्रबोधो भवति विवेकस्तावदेव हि । तावत्सतां संगरुचिस्तावत्पौराणलालसा ।

tāvatprabodho bhavati vivekastāvadeva hi tāvatsatāṁ saṁgarucistāvatpaurāṇalālasā

तब तक ही जागृति होती है, तब तक ही विवेक रहता है; तब तक ही साधुजनों की संगति की रुचि रहती है, तब तक ही पुराण-श्रवण की उत्सुकता रहती है —

श्लोक 18 (padma.3.61.18)

यावत्सीमंतिनी लोलनयनांदोलनं नहि । जनोपरि पतेद्विप्राः सर्वधर्मविलोपनम् ।

yāvatsīmaṁtinī lolanayanāṁdolanaṁ nahi janopari patedviprāḥ sarvadharmavilopanam

जब तक स्त्री का चंचल नेत्र-कटाक्ष मनुष्य पर नहीं पड़ता। हे विप्रो! यह समस्त धर्म का नाशक है।

श्लोक 19 (padma.3.61.19)

तत्र ये हरिपादाब्जमधुलेशप्रसादिताः । तेषां न नारीलोलाक्षिक्षेपणं हि प्रभुर्भवेत् ।

tatra ye haripādābjamadhuleśaprasāditāḥ teṣāṁ na nārīlolākṣikṣepaṇaṁ hi prabhurbhavet

जो हरि के चरण-कमल के मधु-लेश से अनुगृहीत हुए हैं, उन पर स्त्री के चंचल नेत्रों का प्रभाव नहीं पड़ता।

श्लोक 20 (padma.3.61.20)

जन्मजन्म हृषीकेश सेवनं यैः कृतं द्विजाः । द्विजे दत्तं हुतं वह्नौ विरतिस्तत्र तत्र हि ।

janmajanma hṛṣīkeśa sevanaṁ yaiḥ kṛtaṁ dvijāḥ dvije dattaṁ hutaṁ vahnau viratistatra tatra hi

हे द्विजो! जन्म-जन्मांतर में जिन्होंने हृषीकेश की सेवा की है, द्विज को जो दिया गया, अग्नि में जो हवन किया गया — वहीं-वहीं मुक्ति है।

श्लोक 21 (padma.3.61.21)

नारीणां किल किं नाम सौंदर्य्यं परिचक्षते । भूषणानां च वस्त्राणां चाकचक्यं तदुच्यते ।

nārīṇāṁ kila kiṁ nāma sauṁdaryyaṁ paricakṣate bhūṣaṇānāṁ ca vastrāṇāṁ cākacakyaṁ taducyate

स्त्रियों का सौंदर्य किसे कहा जाता है? यह तो केवल आभूषणों और वस्त्रों की चमक-दमक ही है।

श्लोक 22 (padma.3.61.22)

स्नेहात्मज्ञानरहितं नारीरूपं कुतः स्मृतम् । पूयमूत्रपुरीषासृक्त्वङ्मेदोस्थिवसान्वितम् ।

snehātmajñānarahitaṁ nārīrūpaṁ kutaḥ smṛtam pūyamūtrapurīṣāsṛktvaṅmedosthivasānvitam

सच्चे आत्मज्ञान से रहित स्नेह में स्त्री का 'रूप' कहाँ से माना गया है? यह तो पीप, मूत्र, मल, रक्त, त्वचा, मेद, अस्थि और वसा से युक्त है —

श्लोक 23 (padma.3.61.23)

कलेवरं हि तन्नाम कुतः सौंदर्य्यमत्र हि । तदेवं पृथगाचिंत्य स्पृष्ट्वा स्नात्वा शुचिर्भवेत् ।

kalevaraṁ hi tannāma kutaḥ sauṁdaryyamatra hi tadevaṁ pṛthagāciṁtya spṛṣṭvā snātvā śucirbhavet

यही वास्तव में 'शरीर' नाम की वस्तु है — यहाँ सौंदर्य कहाँ है? इस प्रकार पृथक् विचार करके, स्पर्श करके स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।

श्लोक 24 (padma.3.61.24)

तैः संहितं शंरीरं हि दृश्यते सुंदरं जनैः । अहोतिदुर्दशा नॄणां दुर्दैव घटिता द्विजाः ।

taiḥ saṁhitaṁ śaṁrīraṁ hi dṛśyate suṁdaraṁ janaiḥ ahotidurdaśā nṝṇāṁ durdaiva ghaṭitā dvijāḥ

उन्हीं वस्तुओं से बना यह शरीर लोगों को सुंदर दिखाई देता है! हाय, हे द्विजो! मनुष्यों की कैसी दुर्दशा है, दुर्भाग्य से रचित!

श्लोक 25 (padma.3.61.25)

कुचावृतेंगे पुरुषो नारी बुद्ध्वा प्रवर्त्तते । का नारी वा पुमान्को वा विचारे सति किंचन ।

kucāvṛteṁge puruṣo nārī buddhvā pravarttate kā nārī vā pumānko vā vicāre sati kiṁcana

स्तनों से आवृत अंग को देखकर पुरुष उसे 'स्त्री' मानकर उसमें प्रवृत्त हो जाता है। परंतु विचार करने पर 'स्त्री' कौन है, अथवा 'पुरुष' कौन है — कुछ भी नहीं (अंतिम रूप से)।

श्लोक 26 (padma.3.61.26)

तस्मात्सर्वात्मना साधुर्नारीसंगं विवर्जयेत् । को नाम नारीमासाद्य सिद्धिं प्राप्नोति भूतले ।

tasmātsarvātmanā sādhurnārīsaṁgaṁ vivarjayet ko nāma nārīmāsādya siddhiṁ prāpnoti bhūtale

इसलिए साधु को सर्वात्मा से स्त्री-संग का त्याग करना चाहिए। इस पृथ्वी पर स्त्री को पाकर आखिर किसने सिद्धि प्राप्त की है?

श्लोक 27 (padma.3.61.27)

कामिनी कामिनीसंगि संगमित्यपि संत्यजेत् । तत्संगाद्रौरवमिति साक्षादेव प्रतीयते ।

kāminī kāminīsaṁgi saṁgamityapi saṁtyajet tatsaṁgādrauravamiti sākṣādeva pratīyate

काम्य स्त्री का, अथवा उससे जुड़े व्यक्ति का संग भी त्याग देना चाहिए। उस संग से रौरव नरक साक्षात् प्रतीत होता है।

श्लोक 28 (padma.3.61.28)

अज्ञानाल्लोलुपा लोकास्तत्र दैवेन वंचिताः । साक्षान्नरककुंडेस्मिन्नारीयोनौ पचेन्नरः ।

ajñānāllolupā lokāstatra daivena vaṁcitāḥ sākṣānnarakakuṁḍesminnārīyonau pacennaraḥ

अज्ञान से लोलुप लोग वहाँ भाग्य द्वारा ठगे जाते हैं। मनुष्य साक्षात् नरक-कुंड के समान स्त्री की योनि में पकता है।

श्लोक 29 (padma.3.61.29)

यत एवागतः पृथ्व्यां तस्मिन्नेव पुना रमेत् । यतः प्रसरते नित्यं मूत्रं रेतो मलोत्थितम् ।

yata evāgataḥ pṛthvyāṁ tasminneva punā ramet yataḥ prasarate nityaṁ mūtraṁ reto malotthitam

जहाँ से मनुष्य पृथ्वी पर आया है, वहीं पुनः रमण करना चाहता है। जहाँ से मूत्र, वीर्य और मल सदा प्रवाहित होते हैं,

श्लोक 30 (padma.3.61.30)

तत्रैव रमते लोकः कस्तस्मादशुचिर्भवेत् । तत्रातिकष्टं लोकेस्मिन्नहो दैवविडंबना ।

tatraiva ramate lokaḥ kastasmādaśucirbhavet tatrātikaṣṭaṁ lokesminnaho daivaviḍaṁbanā

वहीं मनुष्य रमण करता है — कौन उससे अशुद्ध न होगा? इस संसार में यह अत्यंत कष्टकारी है, हाय, कैसी दैवी विडंबना है!

श्लोक 31 (padma.3.61.31)

पुनः पुना रमेत्तत्र अहो निस्त्रपता नृणाम् । तस्माद्विचारयेद्धीमान्नारीदोषगणान्बहून् ।

punaḥ punā ramettatra aho nistrapatā nṛṇām tasmādvicārayeddhīmānnārīdoṣagaṇānbahūn

बार-बार वहीं रमण करते हैं — हाय, मनुष्यों की कैसी निर्लज्जता! इसलिए बुद्धिमान् को स्त्री के अनेक दोषों का विचार करना चाहिए।

श्लोक 32 (padma.3.61.32)

मैथुनाद्बलहानिः स्यान्निद्राति तरुणायते । निद्रयापहृतज्ञानः स्वल्पायुर्जायते नरः ।

maithunādbalahāniḥ syānnidrāti taruṇāyate nidrayāpahṛtajñānaḥ svalpāyurjāyate naraḥ

मैथुन से बल की हानि होती है, नींद आती है, समय व्यर्थ बीत जाता है। नींद से ज्ञान अपहृत होकर मनुष्य अल्पायु हो जाता है।

श्लोक 33 (padma.3.61.33)

तस्मात्प्रयत्नतो धीमान्नारीं मृत्युमिवात्मनः । पश्येद्गोविंदपादाब्जे मनो वै रमयेद्बुधः ।

tasmātprayatnato dhīmānnārīṁ mṛtyumivātmanaḥ paśyedgoviṁdapādābje mano vai ramayedbudhaḥ

इसलिए बुद्धिमान् को प्रयत्नपूर्वक स्त्री को अपनी मृत्यु के समान देखना चाहिए। विद्वान् को गोविंद के चरण-कमल में ही अपना मन रमाना चाहिए।

श्लोक 34 (padma.3.61.34)

इहामुत्र सुखं तद्धि गोविंदपदसेवनम् । विहाय को महामूढो नारीपादं हि सेवते ।

ihāmutra sukhaṁ taddhi goviṁdapadasevanam vihāya ko mahāmūḍho nārīpādaṁ hi sevate

इस लोक और परलोक का सुख गोविंद के चरणों की सेवा में ही निहित है। उसे छोड़कर कौन महामूर्ख स्त्री के चरणों की सेवा करता है?

श्लोक 35 (padma.3.61.35)

जनार्द्दनांघ्रिसेवा हि ह्यपुनर्भवदायिनी । नारीणां योनिसेवा हि योनिसंकटकारिणी ।

janārddanāṁghrisevā hi hyapunarbhavadāyinī nārīṇāṁ yonisevā hi yonisaṁkaṭakāriṇī

जनार्दन के चरणों की सेवा पुनर्जन्म से मुक्ति देने वाली है; स्त्रियों की योनि-सेवा योनि-संकट को उत्पन्न करने वाली है।

श्लोक 36 (padma.3.61.36)

पुनःपुनः पतेद्योनौ यंत्रनिष्पाचितो यथा । पुनस्तामेवाभिलषेद्विद्यादस्य विडंबनम् ।

punaḥpunaḥ patedyonau yaṁtraniṣpācito yathā punastāmevābhilaṣedvidyādasya viḍaṁbanam

मनुष्य बार-बार योनि में गिरता है, जैसे यंत्र में पिसा जाता हो। फिर भी वह उसी की कामना करता है — इसे उसकी अपनी विडंबना समझना चाहिए।

श्लोक 37 (padma.3.61.37)

ऊर्ध्वबाहुरहं वच्मि शृणु मे परमं वचः । गोविंदे धेहि हृदयं न योनौ यातनाजुषि ।

ūrdhvabāhurahaṁ vacmi śṛṇu me paramaṁ vacaḥ goviṁde dhehi hṛdayaṁ na yonau yātanājuṣi

मैं भुजाएँ उठाकर कहता हूँ, मेरा यह परम वचन सुनो — अपना हृदय गोविंद में लगाओ, यातनादायक योनि में नहीं।

श्लोक 38 (padma.3.61.38)

नारीसंगं परित्यज्य यश्चापि परिवर्त्तते । पदेपदेश्वमेधस्य फलमाप्नोति मानवः ।

nārīsaṁgaṁ parityajya yaścāpi parivarttate padepadeśvamedhasya phalamāpnoti mānavaḥ

जो स्त्री-संग का त्याग करके इस मार्ग से मुड़ता है, वह मनुष्य पग-पग पर अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 39 (padma.3.61.39)

कुलांगना दैवयोगादूढा यदि नृणां सती । पुत्रमुत्पाद्य यस्तत्र तत्संगं परिवर्जयेत् ।

kulāṁganā daivayogādūḍhā yadi nṛṇāṁ satī putramutpādya yastatra tatsaṁgaṁ parivarjayet

यदि दैवयोग से किसी मनुष्य को कोई कुलीन सती पत्नी प्राप्त हुई हो, और वह पुत्र उत्पन्न करके उसके साथ के संग का त्याग कर दे,

श्लोक 40 (padma.3.61.40)

तस्य तुष्टो जगन्नाथो भवत्येव न संशयः । नारीसंगो हि धर्मज्ञैरसत्संगः प्रकीर्त्यते ।

tasya tuṣṭo jagannātho bhavatyeva na saṁśayaḥ nārīsaṁgo hi dharmajñairasatsaṁgaḥ prakīrtyate

तो निश्चय ही जगन्नाथ उससे प्रसन्न होते हैं। धर्मज्ञों द्वारा स्त्री-संग को असत्संग ही कहा गया है।

श्लोक 41 (padma.3.61.41)

तस्मिन्सति हरौ भक्तिः सुदृढा नैव जायते । सर्वसंगं परित्यज्य हरौ भक्तिं समाचरेत् ।

tasminsati harau bhaktiḥ sudṛḍhā naiva jāyate sarvasaṁgaṁ parityajya harau bhaktiṁ samācaret

जब तक वह संग बना रहता है, तब तक हरि में सुदृढ़ भक्ति उत्पन्न नहीं होती। समस्त संग का त्याग करके हरि में भक्ति का आचरण करना चाहिए।

श्लोक 42 (padma.3.61.42)

हरिभक्तिश्च लोकेत्र दुर्ल्लभा हि मता मम । हरौ यस्य भवेद्भक्तिः स कृतार्थो न संशयः ।

haribhaktiśca loketra durllabhā hi matā mama harau yasya bhavedbhaktiḥ sa kṛtārtho na saṁśayaḥ

इस लोक में हरिभक्ति निश्चय ही दुर्लभ मानी गई है, मेरे विचार से। जिसकी हरि में भक्ति है, वह कृतार्थ है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 43 (padma.3.61.43)

तत्तदेवाचरेत्कर्म हरिः प्रीणाति येन हि । तस्मिंस्तुष्टे जगत्तुष्टं प्रीणिते प्रीणितं जगत् ।

tattadevācaretkarma hariḥ prīṇāti yena hi tasmiṁstuṣṭe jagattuṣṭaṁ prīṇite prīṇitaṁ jagat

उसे वही कर्म करना चाहिए जिससे हरि प्रसन्न हों। उनके प्रसन्न होने पर जगत् प्रसन्न होता है, उनके संतुष्ट होने पर जगत् संतुष्ट होता है।

श्लोक 44 (padma.3.61.44)

हरौ भक्तिं विना नॄणां वृथा जन्म प्रकीर्तितम् । ब्रह्मेशादि सुरा यस्य यजंते प्रीतिहेतवे ।

harau bhaktiṁ vinā nṝṇāṁ vṛthā janma prakīrtitam brahmeśādi surā yasya yajaṁte prītihetave

हरि के प्रति भक्ति के बिना मनुष्यों का जन्म व्यर्थ बताया गया है। जिनकी प्रसन्नता के लिए ब्रह्मा-शिव आदि देवता यजन करते हैं,

श्लोक 45 (padma.3.61.45)

नारायणमनाव्यक्तं न तं सेवेत को जनः । तस्य माता महाभागा पिता तस्य महाकृती ।

nārāyaṇamanāvyaktaṁ na taṁ seveta ko janaḥ tasya mātā mahābhāgā pitā tasya mahākṛtī

उस अव्यक्त नारायण की सेवा कौन नहीं करेगा? उसकी माता महाभाग्यशालिनी है, और उसका पिता महान् कृतार्थ है,

श्लोक 46 (padma.3.61.46)

जनार्द्दनपदद्वंद्वं हृदये येन धार्यते । जनार्दनजगद्वंद्य शरणागतवत्सल ।

janārddanapadadvaṁdvaṁ hṛdaye yena dhāryate janārdanajagadvaṁdya śaraṇāgatavatsala

जिसने अपने हृदय में जनार्दन के दोनों चरणों को धारण किया है — 'हे जनार्दन, जगत्वंद्य, शरणागतवत्सल!'

श्लोक 47 (padma.3.61.47)

इतीरयंति ये मर्त्या न तेषां निरये गतिः । ब्राह्मणा हि विशेषेण प्रत्यक्षं हरिरूपिणः ।

itīrayaṁti ye martyā na teṣāṁ niraye gatiḥ brāhmaṇā hi viśeṣeṇa pratyakṣaṁ harirūpiṇaḥ

जो मरणशील ऐसा कहते हैं, उनकी नरक में गति नहीं होती। विशेष रूप से ब्राह्मण साक्षात् हरि के ही रूप हैं।

श्लोक 48 (padma.3.61.48)

पूजयेयुर्यथायोगं हरिस्तेषां प्रसीदति । विष्णुर्ब्राह्मणरूपेण विचरेत्पृथिवीमिमाम् ।

pūjayeyuryathāyogaṁ haristeṣāṁ prasīdati viṣṇurbrāhmaṇarūpeṇa vicaretpṛthivīmimām

जो उन्हें यथोचित रूप से पूजते हैं, हरि उनसे प्रसन्न होते हैं। विष्णु ब्राह्मण के रूप में इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं।

श्लोक 49 (padma.3.61.49)

ब्राह्मणेन विना कर्म्म सिद्धिं प्राप्नोति नैव हि । द्विजपादांबुभक्त्या यैः पीत्वा शिरसि चार्पितम् ।

brāhmaṇena vinā karmma siddhiṁ prāpnoti naiva hi dvijapādāṁbubhaktyā yaiḥ pītvā śirasi cārpitam

ब्राह्मण के बिना कोई भी कर्म सिद्धि को प्राप्त नहीं होता। जिन्होंने भक्तिपूर्वक द्विज के चरणामृत का पान करके उसे सिर पर धारण किया,

श्लोक 50 (padma.3.61.50)

तर्पिता पितरस्तेन आत्मापि किल तारितः । ब्राह्मणानां मुखे येन दत्तं मधुरमर्चितम् ।

tarpitā pitarastena ātmāpi kila tāritaḥ brāhmaṇānāṁ mukhe yena dattaṁ madhuramarcitam

उनके द्वारा पितर तृप्त हो जाते हैं, और स्वयं उनकी आत्मा भी तर जाती है। ब्राह्मणों के मुख में जो मधुर, अर्चित भोजन दिया गया,

श्लोक 51 (padma.3.61.51)

साक्षात्कृष्णमुखे दत्तं तद्वै भुंक्ते हरिः स्वयम् । अहोतिदुर्ल्लभा लोका प्रत्यक्षे केशवे द्विजे ।

sākṣātkṛṣṇamukhe dattaṁ tadvai bhuṁkte hariḥ svayam ahotidurllabhā lokā pratyakṣe keśave dvije

वह साक्षात् कृष्ण के मुख में ही दिया गया है — हरि स्वयं उसे भोगते हैं। हाय, इस संसार में यह अत्यंत दुर्लभ है कि प्रत्यक्ष केशव-स्वरूप द्विज को (पहचाना जाए)।

श्लोक 52 (padma.3.61.52)

प्रतिमादिषु सेवंते तदभावे हि तत्क्रिया । ब्राह्मणानामधिष्ठानात्पृथ्वी धन्येति गीयते ।

pratimādiṣu sevaṁte tadabhāve hi tatkriyā brāhmaṇānāmadhiṣṭhānātpṛthvī dhanyeti gīyate

उस पहचान के अभाव में लोग मूर्तियों आदि की सेवा करते हैं। ब्राह्मणों के निवास के कारण ही पृथ्वी को धन्य कहा जाता है।

श्लोक 53 (padma.3.61.53)

तेषां पाणौ च यद्दत्तं हरिपाणौ तदर्पितम् । तेभ्यः कृतान्नमस्कारात्तिरस्कारो हि पाप्मताम् ।

teṣāṁ pāṇau ca yaddattaṁ haripāṇau tadarpitam tebhyaḥ kṛtānnamaskārāttiraskāro hi pāpmatām

उनके हाथ में जो दिया जाता है, वह हरि के हाथ में ही अर्पित हो जाता है। उन्हें किया गया नमस्कार पापों का तिरस्कार कर देता है।

श्लोक 54 (padma.3.61.54)

मुच्यते ब्रह्महत्यादि पापेभ्यो विप्रवंदनात् । तस्मात्सतां समाराध्यो ब्राह्मणो विष्णुबुद्धितः ।

mucyate brahmahatyādi pāpebhyo vipravaṁdanāt tasmātsatāṁ samārādhyo brāhmaṇo viṣṇubuddhitaḥ

विप्र-वंदन से ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए साधुजनों को विष्णु-बुद्धि से ब्राह्मण की आराधना करनी चाहिए।

श्लोक 55 (padma.3.61.55)

क्षुधितस्य द्विजस्यास्ये यत्किंचिद्दीयते यदि । प्रेत्य पीपूषधाराभिः सिंचते कल्पकोटिकम् ।

kṣudhitasya dvijasyāsye yatkiṁciddīyate yadi pretya pīpūṣadhārābhiḥ siṁcate kalpakoṭikam

यदि भूखे द्विज के मुख में कुछ भी दिया जाए, तो मृत्यु के बाद वह करोड़ों कल्पों तक अमृत की धाराओं से सिंचित होता है।

श्लोक 56 (padma.3.61.56)

द्विजतुंडं महाक्षेत्रमनूषरमकंटकम् । तत्र चेदुप्यते किंचित्कोटिकोटिफलं लभेत् ।

dvijatuṁḍaṁ mahākṣetramanūṣaramakaṁṭakam tatra cedupyate kiṁcitkoṭikoṭiphalaṁ labhet

द्विज का मुख एक महान् क्षेत्र है, ऊसर और कंटकरहित। यदि वहाँ कुछ भी बोया जाए, तो करोड़ों-करोड़ गुना फल मिलता है।

श्लोक 57 (padma.3.61.57)

सघृतं भोजनं चास्मै दत्त्वा कल्पं स मोदते । नानासुमिष्टमन्नं यो ददाति द्विजतुष्टये ।

saghṛtaṁ bhojanaṁ cāsmai dattvā kalpaṁ sa modate nānāsumiṣṭamannaṁ yo dadāti dvijatuṣṭaye

उसे घृत सहित भोजन देकर मनुष्य एक कल्प तक आनंदित रहता है। जो नाना प्रकार के स्वादिष्ट अन्न द्विज की तृप्ति के लिए देता है,

श्लोक 58 (padma.3.61.58)

तस्य लोका महाभोगाः कोटिकल्पांतमुक्तिदाः । ब्राह्मणं च पुरस्कृत्य ब्राह्मणेनानुकीर्तितम् ।

tasya lokā mahābhogāḥ koṭikalpāṁtamuktidāḥ brāhmaṇaṁ ca puraskṛtya brāhmaṇenānukīrtitam

उसे महाभोगमय लोक प्राप्त होते हैं, जो करोड़ों कल्पों के अंत में मुक्ति देने वाले हैं। ब्राह्मण को आगे रखकर, ब्राह्मण द्वारा कहे गए —

श्लोक 59 (padma.3.61.59)

पुराणं शृणुयान्नित्यं महापापदवानलम् । पुराणं सर्वतीर्थेषु तीर्थं चाधिकमुच्यते ।

purāṇaṁ śṛṇuyānnityaṁ mahāpāpadavānalam purāṇaṁ sarvatīrtheṣu tīrthaṁ cādhikamucyate

पुराण को नित्य सुनना चाहिए, जो महापापों का दावानल है। पुराण को समस्त तीर्थों में भी बढ़कर तीर्थ कहा गया है।

श्लोक 60 (padma.3.61.60)

यस्यैकपादश्रवणाद्धरिरेव प्रसीदति । यथा सूर्यवपुर्भूत्वा प्रकाशाय चरेद्धरिः ।

yasyaikapādaśravaṇāddharireva prasīdati yathā sūryavapurbhūtvā prakāśāya careddhariḥ

जिसके एक चरण को सुनने मात्र से हरि प्रसन्न हो जाते हैं। जैसे हरि सूर्य के शरीर में स्थित होकर प्रकाश के लिए विचरण करते हैं,

श्लोक 61 (padma.3.61.61)

सर्वेषां जगतामेव हरिरालोकहेतवे । तथैवांतःप्रकाशाय पुराणावयवो हरिः ।

sarveṣāṁ jagatāmeva harirālokahetave tathaivāṁtaḥprakāśāya purāṇāvayavo hariḥ

समस्त लोकों को आलोकित करने के लिए हरि ही कारण हैं, वैसे ही आंतरिक प्रकाश के लिए हरि पुराण के अवयव के रूप में —

श्लोक 62 (padma.3.61.62)

विचरेदिह भूतेषु पुराणं पावनं परम् । तस्माद्यदि हरेः प्रीतेरुत्पादे धीयते मतिः ।

vicarediha bhūteṣu purāṇaṁ pāvanaṁ param tasmādyadi hareḥ prīterutpāde dhīyate matiḥ

प्राणियों के बीच इस परम पावन पुराण के रूप में विचरण करते हैं। इसलिए यदि हरि की प्रसन्नता उत्पन्न करने में बुद्धि लगाई जाए,

श्लोक 63 (padma.3.61.63)

श्रोतव्यमनिशं पुंभिः पुराणं कृष्णरूपिणम् । विष्णुभक्तेन शांतेन श्रोतव्यमपि दुर्लभम् ।

śrotavyamaniśaṁ puṁbhiḥ purāṇaṁ kṛṣṇarūpiṇam viṣṇubhaktena śāṁtena śrotavyamapi durlabham

तो मनुष्यों को सतत कृष्ण-स्वरूप पुराण सुनना चाहिए। शांत विष्णुभक्त से ही उसे सुनना चाहिए, जो अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 64 (padma.3.61.64)

पुराणाख्यानममलममलीकरणं परम् । यस्मिन्वेदार्थमाहृत्य हरिणा व्यासरूपिणा ।

purāṇākhyānamamalamamalīkaraṇaṁ param yasminvedārthamāhṛtya hariṇā vyāsarūpiṇā

पुराण की कथा निर्मल है, परम शुद्धिकारक है — जिसमें वेद के अर्थ को लेकर व्यास-रूपधारी हरि द्वारा —

श्लोक 65 (padma.3.61.65)

पुराणं निर्मितं विप्र तस्मात्तत्परमो भवेत् । पुराणे निश्चितो धर्मो धर्मश्च केशवः स्वयम् ।

purāṇaṁ nirmitaṁ vipra tasmāttatparamo bhavet purāṇe niścito dharmo dharmaśca keśavaḥ svayam

हे विप्र! पुराण की रचना की गई, इसलिए वह परम है। पुराण में धर्म निश्चित है, और धर्म स्वयं केशव ही हैं।

श्लोक 66 (padma.3.61.66)

तस्मात्कृते पुराणे हि श्रुते विष्णुर्भवेदिति । साक्षात्स्वयं हरिर्विप्रः पुराणं च तथाविधम् ।

tasmātkṛte purāṇe hi śrute viṣṇurbhavediti sākṣātsvayaṁ harirvipraḥ purāṇaṁ ca tathāvidham

इसलिए पुराण रचे जाने पर और सुने जाने पर विष्णु स्वयं प्रकट होते हैं। साक्षात् स्वयं हरि ही ब्राह्मण हैं, और उसी प्रकार पुराण भी।

श्लोक 67 (padma.3.61.67)

एतयोः संगमासाद्य हरिरेव भेवन्नरः । तथा गंगांबुसेकेन नाशयेत्किल्बिषं स्वकम् ।

etayoḥ saṁgamāsādya harireva bhevannaraḥ tathā gaṁgāṁbusekena nāśayetkilbiṣaṁ svakam

इन दोनों के संगम को प्राप्त कर मनुष्य स्वयं हरि ही बन जाता है। इसी प्रकार गंगाजल के सिंचन से मनुष्य अपना पाप नष्ट कर देता है।

श्लोक 68 (padma.3.61.68)

केशवो द्रवरूपेण पापात्तारयते महीम् । वैष्णवो विष्णुभजनस्याकांक्षी यदि वर्तते ।

keśavo dravarūpeṇa pāpāttārayate mahīm vaiṣṇavo viṣṇubhajanasyākāṁkṣī yadi vartate

केशव जलरूप में पृथ्वी को पाप से तार देते हैं। यदि कोई वैष्णव विष्णु-भजन की कामना रखता है,

श्लोक 69 (padma.3.61.69)

गंगांबुसेकममलममलीकरणं चरेत् । विष्णुभक्तिप्रदा देवी गंगा भुवि च गीयते ।

gaṁgāṁbusekamamalamamalīkaraṇaṁ caret viṣṇubhaktipradā devī gaṁgā bhuvi ca gīyate

तो उसे गंगाजल का निर्मल, शुद्धिकारक सिंचन करना चाहिए। देवी गंगा को इस पृथ्वी पर विष्णु-भक्ति देने वाली कहा जाता है।

श्लोक 70 (padma.3.61.70)

विष्णुरूपा हि सा गंगा लोकविस्तारकारिणी ।

viṣṇurūpā hi sā gaṁgā lokavistārakāriṇī

वह गंगा निश्चय ही विष्णु का ही रूप है, जो समस्त लोकों में व्याप्त है।

श्लोक 71 (padma.3.61.71)

ब्राह्मणेषु पुराणेषु गंगायां गोषु पिप्पले । नारायणधिया पुंभिर्भक्तिः कार्या ह्यहैतुकी ।

brāhmaṇeṣu purāṇeṣu gaṁgāyāṁ goṣu pippale nārāyaṇadhiyā puṁbhirbhaktiḥ kāryā hyahaitukī

ब्राह्मणों में, पुराणों में, गंगा में, गौओं में, पीपल में — मनुष्यों को नारायण की बुद्धि से निष्काम भक्ति करनी चाहिए।

श्लोक 72 (padma.3.61.72)

प्रत्यक्षविष्णुरूपा हि तत्वज्ञैर्निश्चिता अमी । तस्मात्सततमभ्यर्च्या विष्णुभक्त्यभिलाषिणा ।

pratyakṣaviṣṇurūpā hi tatvajñairniścitā amī tasmātsatatamabhyarcyā viṣṇubhaktyabhilāṣiṇā

तत्त्वज्ञों ने इन्हें साक्षात् विष्णु-स्वरूप निश्चित किया है। इसलिए विष्णु-भक्ति के इच्छुक को इनकी सतत पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 73 (padma.3.61.73)

विष्णौ भक्तिं विना नॄणां निष्फलं जन्म उच्यते । कलिकालपयोराशिं पापग्राहसमाकुलम् ।

viṣṇau bhaktiṁ vinā nṝṇāṁ niṣphalaṁ janma ucyate kalikālapayorāśiṁ pāpagrāhasamākulam

विष्णु में भक्ति के बिना मनुष्यों का जन्म निष्फल कहा गया है। कलियुग का यह समुद्र, पाप-रूपी मगरमच्छों से भरा हुआ,

श्लोक 74 (padma.3.61.74)

विषयामज्जनावर्तं दुर्बोधफेनिलं परम् । महादुष्टजनव्याल महाभीमं भयानकम् ।

viṣayāmajjanāvartaṁ durbodhaphenilaṁ param mahāduṣṭajanavyāla mahābhīmaṁ bhayānakam

विषयों में डूबने के भँवरों वाला, गहन अज्ञान के फेन से भरा, दुष्ट जनों के महासर्पों वाला, अत्यंत भीषण और भयानक —

श्लोक 75 (padma.3.61.75)

दुस्तरं च तरंत्येव हरिभक्तितरि स्थिताः । तस्माद्यतेत वै लोको विष्णुभक्तिप्रसाधने ।

dustaraṁ ca taraṁtyeva haribhaktitari sthitāḥ tasmādyateta vai loko viṣṇubhaktiprasādhane

इस दुस्तर समुद्र को हरिभक्ति-रूपी नौका में स्थित लोग ही पार करते हैं। इसलिए लोगों को विष्णु-भक्ति की सिद्धि के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

श्लोक 76 (padma.3.61.76)

किं सुखं लभते जंतुरसद्वार्तावधारणे । हरेरद्भुतलीलस्य लीलाख्यानेन सज्जते ।

kiṁ sukhaṁ labhate jaṁturasadvārtāvadhāraṇe hareradbhutalīlasya līlākhyānena sajjate

व्यर्थ बातों को सुनने से प्राणी को क्या सुख मिलता है? उसे हरि की अद्भुत लीलाओं की कथाओं में संलग्न होना चाहिए।

श्लोक 77 (padma.3.61.77)

तद्विचित्रकथालोके नानाविषयमिश्रिताः । श्रोतव्या यदि वै नॄणां विषये सज्जते मनः ।

tadvicitrakathāloke nānāviṣayamiśritāḥ śrotavyā yadi vai nṝṇāṁ viṣaye sajjate manaḥ

उनकी विचित्र कथाएँ इस लोक में नाना विषयों से मिश्रित हैं; मनुष्यों को उन्हें सुनना चाहिए, चाहे उनका मन सांसारिक विषयों में भी लगा हो।

श्लोक 78 (padma.3.61.78)

निर्वाणे यदि वा चित्तं श्रोतव्या तदपि द्विजाः । हेलया श्रवणाच्चापि तस्य तुष्टो भवेद्धरिः ।

nirvāṇe yadi vā cittaṁ śrotavyā tadapi dvijāḥ helayā śravaṇāccāpi tasya tuṣṭo bhaveddhariḥ

अथवा हे द्विजो! यदि चित्त निर्वाण में लगा हो, तो भी इन्हें सुनना चाहिए। यहाँ तक कि उपेक्षा से सुनने पर भी हरि प्रसन्न हो जाते हैं।

श्लोक 79 (padma.3.61.79)

निष्क्रियोपि हृषीकेशो नानाकर्म चकार सः । शुश्रूषूणां हितार्थाय भक्तानां भक्तवत्सलः ।

niṣkriyopi hṛṣīkeśo nānākarma cakāra saḥ śuśrūṣūṇāṁ hitārthāya bhaktānāṁ bhaktavatsalaḥ

निष्क्रिय होते हुए भी हृषीकेश ने अनेक कर्म किए — अपने भक्तों के हितार्थ, उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिए, भक्तवत्सल होकर।

श्लोक 80 (padma.3.61.80)

न लभ्यते कर्मणापि वाजपेयशतादिना । राजसूयायुतेनापि यथा भक्त्या स लभ्यते ।

na labhyate karmaṇāpi vājapeyaśatādinā rājasūyāyutenāpi yathā bhaktyā sa labhyate

कर्म से, सौ वाजपेय आदि यज्ञों से भी, दस हजार राजसूय यज्ञों से भी वह उस तरह प्राप्त नहीं होते जैसे भक्ति से प्राप्त होते हैं।

श्लोक 81 (padma.3.61.81)

यत्पदं चेतसा सेव्यं सद्भिराचरितं मुहुः । भवाब्धितरणे सारमाश्रयध्वं हरेः पदम् ।

yatpadaṁ cetasā sevyaṁ sadbhirācaritaṁ muhuḥ bhavābdhitaraṇe sāramāśrayadhvaṁ hareḥ padam

जो पद मन से सेवनीय है और साधुजनों द्वारा बार-बार आचरित है — भवसागर को पार करने के लिए उस हरि के चरणों का आश्रय ही सार है।

श्लोक 82 (padma.3.61.82)

रे रे विषयसंलुब्धाः पामरा निष्ठुरा नराः । रौरवे हि किमात्मानमात्मना पातयिष्यथ ।

re re viṣayasaṁlubdhāḥ pāmarā niṣṭhurā narāḥ raurave hi kimātmānamātmanā pātayiṣyatha

अरे विषयों में लोलुप, नीच, निष्ठुर मनुष्यो! तुम रौरव नरक में अपने आप को क्यों गिराओगे?

श्लोक 83 (padma.3.61.83)

विना गोविंदसौम्यांघ्रिसेवनं मा गमिष्यति । अनायासेन दुःखानां तरणं यदि वांछथ ।

vinā goviṁdasaumyāṁghrisevanaṁ mā gamiṣyati anāyāsena duḥkhānāṁ taraṇaṁ yadi vāṁchatha

गोविंद के सौम्य चरणों की सेवा के बिना (मुक्ति) नहीं मिलेगी। यदि तुम अपने दुःखों से सहज ही तर जाना चाहते हो,

श्लोक 84 (padma.3.61.84)

भजध्वं कृष्णचरणावपुनर्भवकारणे । कुत एवागतो मर्त्यः कुत एव पुनर्व्रजेत् ।

bhajadhvaṁ kṛṣṇacaraṇāvapunarbhavakāraṇe kuta evāgato martyaḥ kuta eva punarvrajet

तो कृष्ण के उन दोनों चरणों की आराधना करो, जो पुनर्जन्म से मुक्ति के कारण हैं। मरणशील मनुष्य कहाँ से आया है, और आगे कहाँ जाएगा?

श्लोक 85 (padma.3.61.85)

एतद्विचार्य मतिमानाश्रयेद्धर्मसंग्रहम् । नानानरकसंपातादुत्थितो यदि पूरुषः ।

etadvicārya matimānāśrayeddharmasaṁgraham nānānarakasaṁpātādutthito yadi pūruṣaḥ

इसका विचार करके बुद्धिमान् को धर्म-संग्रह का आश्रय लेना चाहिए। यदि कोई पुरुष नाना नरकों में गिरने के बाद उठ खड़ा हो,

श्लोक 86 (padma.3.61.86)

स्थावरादि तनुं लब्ध्वा यदि भाग्यवशात्पुनः । मानुष्यं लभते तत्र गर्भवासोतिदुःखदः ।

sthāvarādi tanuṁ labdhvā yadi bhāgyavaśātpunaḥ mānuṣyaṁ labhate tatra garbhavāsotiduḥkhadaḥ

स्थावर आदि की देह पाकर, यदि भाग्यवश पुनः मनुष्य-योनि प्राप्त करे, तो वहाँ भी गर्भवास अत्यंत दुःखदायी है।

श्लोक 87 (padma.3.61.87)

ततः कर्मवशाज्जंतुर्यदि वा जायते भुवि । बाल्यादिबहुदोषेण पीडितो भवति द्विजाः ।

tataḥ karmavaśājjaṁturyadi vā jāyate bhuvi bālyādibahudoṣeṇa pīḍito bhavati dvijāḥ

फिर हे द्विजो! यदि कर्मवश प्राणी पृथ्वी पर जन्म लेता भी है, तो बाल्यावस्था के अनेक दोषों से पीड़ित होता है।

श्लोक 88 (padma.3.61.88)

पुनर्यौवनमासाद्य दारिद्र्येण प्रपीड्यते । रोगेण गुरुणा वापि अनावृष्ट्यादिना तथा ।

punaryauvanamāsādya dāridryeṇa prapīḍyate rogeṇa guruṇā vāpi anāvṛṣṭyādinā tathā

फिर यौवन को प्राप्त कर वह दरिद्रता से पीड़ित होता है, गंभीर रोग से, तथा अनावृष्टि आदि से भी।

श्लोक 89 (padma.3.61.89)

वार्द्धकेन लभेत्पीडामनिर्वाच्यामितस्ततः । मनसश्चलनाद्व्याधेस्ततो मरणमाप्नुयात् ।

vārddhakena labhetpīḍāmanirvācyāmitastataḥ manasaścalanādvyādhestato maraṇamāpnuyāt

वृद्धावस्था में इधर-उधर अवर्णनीय पीड़ा पाता है। मन के भ्रमित होने और व्याधि से उसे मृत्यु प्राप्त होती है।

श्लोक 90 (padma.3.61.90)

न तस्मादधिकं दुःखं संसारेप्यनुभूयते । ततः कर्म्मवशाज्जंतुर्यमलोके प्रपीड्यते ।

na tasmādadhikaṁ duḥkhaṁ saṁsārepyanubhūyate tataḥ karmmavaśājjaṁturyamaloke prapīḍyate

उससे बढ़कर कोई दुःख इस संसार में अनुभव नहीं किया जाता। फिर कर्मवश प्राणी यमलोक में पीड़ित होता है;

श्लोक 91 (padma.3.61.91)

तत्रातियातनां भुक्त्वा पुनरेव प्रजायते । जायते म्रियते जंतु म्रियते जायते पुनः ।

tatrātiyātanāṁ bhuktvā punareva prajāyate jāyate mriyate jaṁtu mriyate jāyate punaḥ

वहाँ अत्यंत यातना भोगकर वह पुनः जन्म लेता है। प्राणी जन्म लेता है, मरता है, फिर मरता है और फिर जन्म लेता है —

श्लोक 92 (padma.3.61.92)

अनाराधित गोविंदचरणे त्वीदृशी दशा । अनायासेन मरणं विनायासेन जीवनम् ।

anārādhita goviṁdacaraṇe tvīdṛśī daśā anāyāsena maraṇaṁ vināyāsena jīvanam

गोविंद के चरणों की आराधना न करने वाले की यही दशा है। सहज मृत्यु और सहज जीवन —

श्लोक 93 (padma.3.61.93)

अनाराधितगोविंदचरणस्य न जायते । धनं यदि भवेद्गेहे रक्षणात्तस्य किं फलम् ।

anārādhitagoviṁdacaraṇasya na jāyate dhanaṁ yadi bhavedgehe rakṣaṇāttasya kiṁ phalam

गोविंद के चरणों की आराधना न करने वाले को प्राप्त नहीं होते। यदि घर में धन हो, तो केवल उसकी रक्षा से क्या फल मिलता है?

श्लोक 94 (padma.3.61.94)

यदासौ कृष्यते याम्यैर्दूतैः किं धनमन्वियात् । तस्माद्द्विजातिसत्कार्यं द्रविणं सर्वसौख्यदम् ।

yadāsau kṛṣyate yāmyairdūtaiḥ kiṁ dhanamanviyāt tasmāddvijātisatkāryaṁ draviṇaṁ sarvasaukhyadam

जब वह यमदूतों द्वारा घसीटा जाता है, तब क्या धन उसके साथ जाएगा? इसलिए द्विजों के सत्कार में लगाया गया धन ही सर्वसुखदायक है।

श्लोक 95 (padma.3.61.95)

दानं स्वर्गस्य सोपानं दानं किल्बिषनाशनम् । गोविंदभक्तिभजनं महापुण्यविवर्द्धनम् ।

dānaṁ svargasya sopānaṁ dānaṁ kilbiṣanāśanam goviṁdabhaktibhajanaṁ mahāpuṇyavivarddhanam

दान स्वर्ग की सीढ़ी है, दान पाप का नाशक है। गोविंद-भक्ति का सेवन महापुण्य को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 96 (padma.3.61.96)

बलं यदि भवेन्मर्त्ये न वृथा तद्व्ययं चरेत् । हरेरग्रे नृत्यगीतं कुर्यादेवमतंद्रितः ।

balaṁ yadi bhavenmartye na vṛthā tadvyayaṁ caret hareragre nṛtyagītaṁ kuryādevamataṁdritaḥ

यदि मरणशील मनुष्य में बल हो, तो उसे व्यर्थ न गँवाए। आलस्यरहित होकर हरि के सामने नृत्य-गीत करना चाहिए।

श्लोक 97 (padma.3.61.97)

यत्किंचिद्विद्यते पुंसां तच्च कृष्णे समर्पयेत् । कृष्णार्पितं कुशलदमन्यार्पितमसौख्यदम् ।

yatkiṁcidvidyate puṁsāṁ tacca kṛṣṇe samarpayet kṛṣṇārpitaṁ kuśaladamanyārpitamasaukhyadam

मनुष्यों के पास जो कुछ भी हो, उसे कृष्ण को अर्पित कर देना चाहिए। कृष्ण को अर्पित वस्तु कल्याणदायी है, अन्यत्र अर्पित वस्तु सुखरहित है।

श्लोक 98 (padma.3.61.98)

चक्षुर्भ्यां श्रीहरेरेव प्रतिमादिनिरूपणम् । श्रोत्राभ्यां कलयेत्कृष्ण गुणनामान्यहर्निशम् ।

cakṣurbhyāṁ śrīharereva pratimādinirūpaṇam śrotrābhyāṁ kalayetkṛṣṇa guṇanāmānyaharniśam

अपने दोनों नेत्रों से केवल श्रीहरि की मूर्ति आदि का ही निरीक्षण करना चाहिए। दोनों कानों से दिन-रात कृष्ण के गुण और नाम ही सुनने चाहिए।

श्लोक 99 (padma.3.61.99)

जिह्वया हरिपादांबु स्वादितव्यं विचक्षणैः । घ्राणेनाघ्राय गोविंदपादाब्जतुलसीदलम् ।

jihvayā haripādāṁbu svāditavyaṁ vicakṣaṇaiḥ ghrāṇenāghrāya goviṁdapādābjatulasīdalam

विचक्षण पुरुषों को अपनी जिह्वा से हरि के चरणामृत का स्वाद लेना चाहिए। नासिका से गोविंद के चरण-कमल की तुलसी-पत्र को सूँघना चाहिए।

श्लोक 100 (padma.3.61.100)

त्वचा स्पृष्ट्वा हरेर्भक्तं मनसाध्याय तत्पदम् । कृतार्थो जायते जंतुर्नात्र कार्या विचारणा ।

tvacā spṛṣṭvā harerbhaktaṁ manasādhyāya tatpadam kṛtārtho jāyate jaṁturnātra kāryā vicāraṇā

त्वचा से हरि के भक्त का स्पर्श करके, मन से उनके चरणों का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार करने वाला प्राणी कृतार्थ हो जाता है, इसमें कोई विचारणा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 101 (padma.3.61.101)

तन्मना हि भवेत्प्राज्ञस्तथा स्यात्तद्गताशयः । तमेवांतेभ्येति लोको नात्र कार्या विचारणा ।

tanmanā hi bhavetprājñastathā syāttadgatāśayaḥ tamevāṁtebhyeti loko nātra kāryā vicāraṇā

बुद्धिमान् का मन उसी में लगा रहना चाहिए, और उसका आशय भी उसी में स्थित होना चाहिए। मनुष्य अंत में उसी को प्राप्त होता है जिसमें उसका मन लगा हो — इसमें कोई विचारणा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 102 (padma.3.61.102)

चेतसा चाप्यनुध्यातः स्वपदं यः प्रयच्छति । नारायणमनाद्यंतं न तं सेवेत को जनः ।

cetasā cāpyanudhyātaḥ svapadaṁ yaḥ prayacchati nārāyaṇamanādyaṁtaṁ na taṁ seveta ko janaḥ

मन से ध्यान किए जाने पर जो अपने पद को प्रदान करते हैं, उन अनादि-अनंत नारायण की सेवा कौन नहीं करेगा?

श्लोक 103 (padma.3.61.103)

सतत नियतचित्तो विष्णुपादारविंदे वितरणमनुशक्ति प्रीतये तस्य कुर्यात् । नतिमतिरतिमस्यांघ्रिद्वये संविदध्यात्स हि खलु नरलोके पूज्यतामाप्नुयाच्च ।

satata niyatacitto viṣṇupādāraviṁde vitaraṇamanuśakti prītaye tasya kuryāt natimatiratimasyāṁghridvaye saṁvidadhyātsa hi khalu naraloke pūjyatāmāpnuyācca

सतत संयमित चित्त होकर विष्णु के चरण-कमल में अपनी सामर्थ्य के अनुसार अर्पण उनकी प्रसन्नता के लिए करना चाहिए। उन्हीं दोनों चरणों में अपनी नम्र बुद्धि और प्रीति समर्पित कर देनी चाहिए — ऐसा करने वाला मनुष्यलोक में पूजनीयता को प्राप्त करता है।

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