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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 7

भारतवर्ष में चार युग

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (padma.3.7.1)

ऋषय ऊचुः । भारतस्यास्य वर्षस्य तथा हैमवतस्य च । प्रमाणमायुषः सूत बलं चापि शुभाशुभम्

ṛṣaya ūcuḥ bhāratasyāsya varṣasya tathā haimavatasya ca pramāṇamāyuṣaḥ sūta balaṁ cāpi śubhāśubham

ऋषियों ने कहा — हे सूत! इस भारतवर्ष और हैमवत वर्ष की आयु का प्रमाण, तथा शुभ-अशुभ बल भी,

श्लोक 2 (padma.3.7.2)

अनागतमतिक्रांतं वर्तमानं च सत्तम । आचक्ष्व नो विस्तरेण हरिवर्षं तथैव च

anāgatamatikrāṁtaṁ vartamānaṁ ca sattama ācakṣva no vistareṇa harivarṣaṁ tathaiva ca

जो बीत चुका, जो आने वाला है और जो वर्तमान है, हे श्रेष्ठ — वह सब हमें विस्तार से कहिए, और इसी प्रकार हरिवर्ष का भी।

श्लोक 3 (padma.3.7.3)

सूत उवाच । चत्वारि भारते वर्षे युगानि मुनिपुंगवाः । कृतं त्रेता द्वापरं च तिष्यं च द्विजसत्तमाः

sūta uvāca catvāri bhārate varṣe yugāni munipuṁgavāḥ kṛtaṁ tretā dvāparaṁ ca tiṣyaṁ ca dvijasattamāḥ

सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो! भारतवर्ष में चार युग हैं — कृत, त्रेता, द्वापर और तिष्य (कलि), हे द्विजश्रेष्ठो!

श्लोक 4 (padma.3.7.4)

पूर्वे कृतयुगं नाम ततस्त्रेतायुगं द्विजाः । तत्पश्चाद्द्वापरं चाथ ततस्तिष्यः प्रवर्तते

pūrve kṛtayugaṁ nāma tatastretāyugaṁ dvijāḥ tatpaścāddvāparaṁ cātha tatastiṣyaḥ pravartate

पहले कृतयुग होता है, हे द्विजो, फिर त्रेतायुग; उसके पश्चात द्वापर, और फिर तिष्य (कलि) प्रवृत्त होता है।

श्लोक 5 (padma.3.7.5)

चत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां मुनिपुंगवाः । आयुः संख्या कृतयुगे संख्याता हि तपोधनाः

catvāri tu sahasrāṇi varṣāṇāṁ munipuṁgavāḥ āyuḥ saṁkhyā kṛtayuge saṁkhyātā hi tapodhanāḥ

हे मुनिश्रेष्ठो! कृतयुग में आयु की गणना चार हजार वर्ष मानी गई है, हे तपोधनो।

श्लोक 6 (padma.3.7.6)

तथा त्रीणि सहस्राणि त्रेतायामायुषो विदुः । द्वे सहस्रे द्वापरे तु भुवि तिष्ठंति सांप्रतम्

tathā trīṇi sahasrāṇi tretāyāmāyuṣo viduḥ dve sahasre dvāpare tu bhuvi tiṣṭhaṁti sāṁpratam

इसी प्रकार त्रेता में आयु तीन हजार वर्ष जानी जाती है; द्वापर में दो हजार वर्ष अभी पृथ्वी पर स्थित है।

श्लोक 7 (padma.3.7.7)

तत्प्रमाणस्थितिर्ह्यस्ति तिष्ये तु मुनिपुंगवाः । गर्भस्थाश्च म्रियंतेऽत्र तथा जाता म्रियंति च

tatpramāṇasthitirhyasti tiṣye tu munipuṁgavāḥ garbhasthāśca mriyaṁte'tra tathā jātā mriyaṁti ca

हे मुनिश्रेष्ठो! तिष्य (कलियुग) में तो आयु की स्थिति ऐसी है कि वहाँ गर्भ में ही प्राणी मर जाते हैं, और जन्म लेकर भी शीघ्र मर जाते हैं।

श्लोक 8 (padma.3.7.8)

महाबला महासत्त्वाः प्रज्ञागुणसमन्विताः । प्रजायंते च जाताश्च शतशोऽथ सहस्रशः

mahābalā mahāsattvāḥ prajñāguṇasamanvitāḥ prajāyaṁte ca jātāśca śataśo'tha sahasraśaḥ

महाबली, महातेजस्वी, प्रज्ञा और गुणों से संपन्न प्राणी उत्पन्न होते हैं, और उत्पन्न होकर सैकड़ों-हजारों की संख्या में बढ़ते हैं।

श्लोक 9 (padma.3.7.9)

द्विजाः कृतयुगे विप्रा बलिनः प्रियदर्शनाः । प्रजायंते च जाताश्च मुनयो वै तपोधनाः

dvijāḥ kṛtayuge viprā balinaḥ priyadarśanāḥ prajāyaṁte ca jātāśca munayo vai tapodhanāḥ

हे विप्रो! कृतयुग में द्विज बलवान और सुंदर उत्पन्न होते हैं; वहाँ जन्म लेने वाले मुनि भी तपस्या में समृद्ध होते हैं।

श्लोक 10 (padma.3.7.10)

महोत्साहा महात्मानो धार्मिकाः सत्यवादिनः । प्रियदर्शा वपुष्मंतो महावीर्य्या धनुर्धराः

mahotsāhā mahātmāno dhārmikāḥ satyavādinaḥ priyadarśā vapuṣmaṁto mahāvīryyā dhanurdharāḥ

वे महान उत्साह वाले, महात्मा, धार्मिक, सत्यवादी, सुंदर, बलिष्ठ शरीर वाले, महापराक्रमी और धनुर्धर होते हैं।

श्लोक 11 (padma.3.7.11)

वीरा हि युधि जायंते क्षत्रियाः शूरसंमताः । त्रेतायां क्षत्रियास्तावत्सर्वे वै चक्रवर्तिनः

vīrā hi yudhi jāyaṁte kṣatriyāḥ śūrasaṁmatāḥ tretāyāṁ kṣatriyāstāvatsarve vai cakravartinaḥ

युद्ध में वीर क्षत्रिय जन्म लेते हैं, जो शूरवीर माने जाते हैं। त्रेतायुग में तो सभी क्षत्रिय चक्रवर्ती सम्राट होते हैं।

श्लोक 12 (padma.3.7.12)

सर्ववर्णाश्च जायंते सदैव द्वापरे युगे । महोत्साहा वीर्यवंतः परस्परवधैषिणः

sarvavarṇāśca jāyaṁte sadaiva dvāpare yuge mahotsāhā vīryavaṁtaḥ parasparavadhaiṣiṇaḥ

द्वापरयुग में सभी वर्ण समान रूप से उत्पन्न होते हैं, महान उत्साह और पराक्रम वाले, परंतु एक-दूसरे के वध की इच्छा रखने वाले भी होते हैं।

श्लोक 13 (padma.3.7.13)

तेजसांधेनसंयुक्ताः क्रोधनाः पुरुषाः किल । लुब्धाश्चानृतकाश्चैव तिष्ये जायंति भो द्विजाः

tejasāṁdhenasaṁyuktāḥ krodhanāḥ puruṣāḥ kila lubdhāścānṛtakāścaiva tiṣye jāyaṁti bho dvijāḥ

हे द्विजो! तिष्ययुग (कलि) में मनुष्य क्रोधी, अंध-तेज से युक्त, लोभी और असत्यभाषी उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 14 (padma.3.7.14)

ईर्ष्या मानस्तथा क्रोधो मायासूया तथैव च । तिष्ये भवंति भूतानां रागो लोभश्च सत्तमाः

īrṣyā mānastathā krodho māyāsūyā tathaiva ca tiṣye bhavaṁti bhūtānāṁ rāgo lobhaśca sattamāḥ

हे श्रेष्ठो! तिष्ययुग में प्राणियों में ईर्ष्या, अभिमान, क्रोध, माया और असूया, तथा राग और लोभ उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 15 (padma.3.7.15)

संक्षेपो वर्त्तते विप्रा द्वापरे युगमध्यगे । गुणोत्तरं हैमवतं हरिवर्षं ततः परम्

saṁkṣepo varttate viprā dvāpare yugamadhyage guṇottaraṁ haimavataṁ harivarṣaṁ tataḥ param

हे विप्रो! इस प्रकार द्वापरयुग के मध्य का संक्षेप कहा गया। इसके गुणों में हैमवत वर्ष श्रेष्ठ है, और उससे भी आगे हरिवर्ष है।

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