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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 8

शाकद्वीप का वर्णन

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (padma.3.8.1)

ऋषय ऊचुः । जंबूखंडस्त्वया प्रोक्तो यथावदिह सत्तमः । विष्कंभस्य च प्रब्रूहि परिमाणं हि तत्त्वतः

ṛṣaya ūcuḥ jaṁbūkhaṁḍastvayā prokto yathāvadiha sattamaḥ viṣkaṁbhasya ca prabrūhi parimāṇaṁ hi tattvataḥ

ऋषियों ने कहा — आपने जम्बूखंड का यथावत वर्णन किया है, हे श्रेष्ठ; अब उसकी चौड़ाई का वास्तविक प्रमाण भी कहिए,

श्लोक 2 (padma.3.8.2)

समुद्रस्य प्रमाणं च सम्यगच्छिद्र दर्शनः । शाकद्वीपं च नो ब्रूहि कुशद्वीपं च धार्मिकम्

samudrasya pramāṇaṁ ca samyagacchidra darśanaḥ śākadvīpaṁ ca no brūhi kuśadvīpaṁ ca dhārmikam

और समुद्र का प्रमाण भी, हे निर्दोष दृष्टि वाले। हमें शाकद्वीप, तथा धर्मपरायण कुशद्वीप के विषय में भी कहिए,

श्लोक 3 (padma.3.8.3)

शाल्मलं चैव तत्त्वेन क्रौंचद्वीपं तथैव च । सूत उवाच । विप्राः सुबहवो द्वीपाः यैरिदं संततं जगत् । सप्तद्वीपान्प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं द्विजपुंगवाः

śālmalaṁ caiva tattvena krauṁcadvīpaṁ tathaiva ca sūta uvāca viprāḥ subahavo dvīpāḥ yairidaṁ saṁtataṁ jagat saptadvīpānpravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ dvijapuṁgavāḥ

और यथार्थ रूप से शाल्मलद्वीप तथा इसी प्रकार क्रौंचद्वीप के विषय में भी। सूत जी ने कहा — हे विप्रो! बहुत से द्वीप हैं, जिनसे यह जगत निरंतर बँधा हुआ है; मैं सात द्वीपों का वर्णन करूँगा, हे द्विजश्रेष्ठो, सुनिए।

श्लोक 4 (padma.3.8.4)

अष्टादशसहस्राणि योजनानि द्विजोत्तमाः । षट्शतानि च पूर्णानि विष्कंभो जंबुपर्वतः

aṣṭādaśasahasrāṇi yojanāni dvijottamāḥ ṣaṭśatāni ca pūrṇāni viṣkaṁbho jaṁbuparvataḥ

हे द्विजोत्तमो! अठारह हजार छह सौ योजन पूरे — यही जम्बू पर्वत (द्वीप) की चौड़ाई है।

श्लोक 5 (padma.3.8.5)

लवणस्य समुद्रस्य विष्कंभो द्विगुणः स्मृतः । नानाजनपदाकीर्णो मणिविद्रुमचित्रितः

lavaṇasya samudrasya viṣkaṁbho dviguṇaḥ smṛtaḥ nānājanapadākīrṇo maṇividrumacitritaḥ

लवण समुद्र की चौड़ाई उससे दुगुनी मानी गई है; वह नाना जनपदों से भरा है, मणियों और मूँगों से चित्रित है,

श्लोक 6 (padma.3.8.6)

नैकधातुविचित्रैश्च पर्वतैरुपशोभितः । सिद्धचारणसंकीर्णैः सागरः परिमंडलः

naikadhātuvicitraiśca parvatairupaśobhitaḥ siddhacāraṇasaṁkīrṇaiḥ sāgaraḥ parimaṁḍalaḥ

और अनेक धातुओं से विचित्र पर्वतों से सुशोभित है, तथा सिद्ध-चारणों से भरा हुआ वह गोलाकार सागर है।

श्लोक 7 (padma.3.8.7)

शाकद्वीपं च वक्ष्यामि यथावदिह सत्तमाः । शृणुताद्य यथान्यायं ब्रुवतो मम धार्मिकाः

śākadvīpaṁ ca vakṣyāmi yathāvadiha sattamāḥ śṛṇutādya yathānyāyaṁ bruvato mama dhārmikāḥ

हे श्रेष्ठो! अब मैं यथावत शाकद्वीप का वर्णन करूँगा; हे धर्मपरायणो! आज मेरे कहे अनुसार, यथोचित क्रम से सुनिए।

श्लोक 8 (padma.3.8.8)

जंबुद्वीपप्रमाणेन द्विगुणः स द्विजर्षभाः । विष्कंभेन महाभागाः सागरोऽपि विभागशः

jaṁbudvīpapramāṇena dviguṇaḥ sa dvijarṣabhāḥ viṣkaṁbhena mahābhāgāḥ sāgaro'pi vibhāgaśaḥ

हे द्विजश्रेष्ठो, हे महाभाग्यशालियो! वह चौड़ाई में जम्बूद्वीप के प्रमाण से दुगुना है, और उसे घेरने वाला समुद्र भी अपने-अपने विभाग में उतना ही है,

श्लोक 9 (padma.3.8.9)

क्षीरोदो मुनिशार्दूला येन संपरिवारितः । तत्र पुण्याजनपदास्तत्र न म्रियते जनः

kṣīrodo muniśārdūlā yena saṁparivāritaḥ tatra puṇyājanapadāstatra na mriyate janaḥ

हे मुनिश्रेष्ठो! क्षीरसमुद्र से वह सर्वथा घिरा हुआ है। वहाँ पुण्यमय जनपद हैं, और वहाँ कोई भी असमय नहीं मरता।

श्लोक 10 (padma.3.8.10)

कुत एव हि दुर्भिक्षं क्षमा तेजोयुता हि ते । शाकद्वीपस्य संक्षेपो यथावन्मुनिसत्तमाः । उक्त एष महाभागाः किमन्यत्कथयामि वः

kuta eva hi durbhikṣaṁ kṣamā tejoyutā hi te śākadvīpasya saṁkṣepo yathāvanmunisattamāḥ ukta eṣa mahābhāgāḥ kimanyatkathayāmi vaḥ

वहाँ दुर्भिक्ष कहाँ से हो, क्योंकि वे तेज और सामर्थ्य से युक्त हैं? हे महाभाग्यशालियो! इस प्रकार शाकद्वीप का संक्षेप यथावत कहा गया — अब आपको और क्या कहूँ?

श्लोक 11 (padma.3.8.11)

ऋषय ऊचुः । शाकद्वीपस्य संक्षेपो यथावदिह धार्मिक । उक्तस्त्वया महाप्राज्ञ विस्तरं ब्रूहि तत्त्वतः

ṛṣaya ūcuḥ śākadvīpasya saṁkṣepo yathāvadiha dhārmika uktastvayā mahāprājña vistaraṁ brūhi tattvataḥ

ऋषियों ने कहा — हे धर्मपरायण महाप्राज्ञ! आपने शाकद्वीप का संक्षेप यथावत कह दिया; अब हमें वास्तविक विस्तार से कहिए।

श्लोक 12 (padma.3.8.12)

सूत उवाच । तथैव पर्वता विप्राः सप्तात्र मणिपर्वताः । रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि वर्णये

sūta uvāca tathaiva parvatā viprāḥ saptātra maṇiparvatāḥ ratnākarāstathā nadyasteṣāṁ nāmāni varṇaye

सूत जी ने कहा — हे विप्रो! उसी प्रकार वहाँ सात मणिमय पर्वत हैं; मैं उनके तथा वहाँ की नदियों के नाम बताता हूँ।

श्लोक 13 (padma.3.8.13)

अतीवगुणवत्सर्वं तत्त्वं पृच्छथ धार्मिकाः । देवर्षिगंधर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते

atīvaguṇavatsarvaṁ tattvaṁ pṛcchatha dhārmikāḥ devarṣigaṁdharvayutaḥ prathamo merurucyate

हे धर्मपरायणो! आप सब कुछ यथार्थ रूप से पूछते हैं, जो अत्यंत गुणवान है। पहला पर्वत मेरु कहलाता है, जो देवर्षियों और गंधर्वों से युक्त है।

श्लोक 14 (padma.3.8.14)

प्रागायतो महाभागा मलयोनाम पर्वतः । ततो मेघाः प्रवर्त्तंते प्रभवंति च सर्वशः

prāgāyato mahābhāgā malayonāma parvataḥ tato meghāḥ pravarttaṁte prabhavaṁti ca sarvaśaḥ

हे महाभाग्यशालियो! पूर्व की ओर फैला हुआ मलय नामक पर्वत है; उससे मेघ उत्पन्न होते हैं और सब प्रकार से उमड़ते हैं।

श्लोक 15 (padma.3.8.15)

ततः परेण मुनयो जलधारो महागिरिः । ततो नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम्

tataḥ pareṇa munayo jaladhāro mahāgiriḥ tato nityamupādatte vāsavaḥ paramaṁ jalam

हे मुनियो! उससे आगे जलधार नामक महापर्वत है; उससे वासव (इंद्र) सदा उत्तम जल ग्रहण करते हैं,

श्लोक 16 (padma.3.8.16)

ततो वर्षं प्रभवति वर्षाकाले द्विजोत्तमाः । उच्चैर्गिरी रैवतको यत्र नित्यं प्रतिष्ठितम्

tato varṣaṁ prabhavati varṣākāle dvijottamāḥ uccairgirī raivatako yatra nityaṁ pratiṣṭhitam

जिससे वर्षाकाल में वर्षा होती है, हे द्विजोत्तमो। वहाँ ऊँचा रैवतक पर्वत है, जहाँ आकाश में सदा रेवती नक्षत्र स्थापित रहता है,

श्लोक 17 (padma.3.8.17)

रेवती दिवि नक्षत्रं पितामहकृतो विधिः । उत्तरेण तु विप्रेंद्राः श्यामो नाम महागिरिः

revatī divi nakṣatraṁ pitāmahakṛto vidhiḥ uttareṇa tu vipreṁdrāḥ śyāmo nāma mahāgiriḥ

जो पितामह ब्रह्मा द्वारा किया गया विधान है। हे विप्रश्रेष्ठो! उत्तर में श्याम नामक एक विशाल पर्वत है,

श्लोक 18 (padma.3.8.18)

नवमेघप्रभः प्रांशुः श्रीमानुज्ज्वलविग्रहः । यतः श्यामत्वमापन्नाः प्रजा मुदितमानसाः

navameghaprabhaḥ prāṁśuḥ śrīmānujjvalavigrahaḥ yataḥ śyāmatvamāpannāḥ prajā muditamānasāḥ

जो नए मेघ के समान प्रभावाला, ऊँचा, श्रीसंपन्न और उज्ज्वल रूप वाला है; उसी से प्रजा श्यामवर्ण को प्राप्त हुई और प्रसन्नचित्त हुई।

श्लोक 19 (padma.3.8.19)

ऋषय ऊचुः । सुमहान्संशयोऽस्माकं प्राप्तोयं सूत यत्त्वया । प्रजाः कथं सूत सम्यक्संप्राप्ताः श्यामतामिह

ṛṣaya ūcuḥ sumahānsaṁśayo'smākaṁ prāptoyaṁ sūta yattvayā prajāḥ kathaṁ sūta samyaksaṁprāptāḥ śyāmatāmiha

ऋषियों ने कहा — हे सूत! आपने जो कहा, उससे हमें बड़ा संशय हुआ है — प्रजा भला यहाँ किस प्रकार श्यामवर्ण को ठीक से प्राप्त हुई, हे सूत?

श्लोक 20 (padma.3.8.20)

सूत उवाच । सर्वेष्वेव महाप्राज्ञा द्वीपेषु मुनिपुंगवाः । गौरः कृष्णश्च पतगस्तयोर्वर्णांतरे द्विजाः

sūta uvāca sarveṣveva mahāprājñā dvīpeṣu munipuṁgavāḥ gauraḥ kṛṣṇaśca patagastayorvarṇāṁtare dvijāḥ

सूत जी ने कहा — हे महाप्राज्ञो, हे मुनिश्रेष्ठो! सभी द्वीपों में एक श्वेत और एक श्याम पक्षी होते हैं, और हे द्विजो, उन दोनों के बीच की एक मिश्रित वर्ण की संतान भी होती है —

श्लोक 21 (padma.3.8.21)

श्यामो यस्मात्प्रवृत्तो वै तस्मात्श्यामगिरिः स्मृतः । ततः परं मुनिश्रेष्ठा दुर्गशैलो महोदयः

śyāmo yasmātpravṛtto vai tasmātśyāmagiriḥ smṛtaḥ tataḥ paraṁ muniśreṣṭhā durgaśailo mahodayaḥ

चूँकि वहाँ से श्याम पक्षी उत्पन्न हुआ, इसलिए वह श्याम-पर्वत कहलाया। हे मुनिश्रेष्ठो! उससे आगे दुर्गशैल नामक समृद्धिशाली पर्वत है,

श्लोक 22 (padma.3.8.22)

केशरी केशरयुतो यतो वातः प्रवर्त्तते । तेषां योजनविष्कंभो द्विगुणः प्रविभागशः

keśarī keśarayuto yato vātaḥ pravarttate teṣāṁ yojanaviṣkaṁbho dviguṇaḥ pravibhāgaśaḥ

और केशर से युक्त केशरी पर्वत, जहाँ से वायु उत्पन्न होती है। उनकी योजन-चौड़ाई क्रमशः दुगुनी-दुगुनी है।

श्लोक 23 (padma.3.8.23)

वर्षाणि तेषु विप्रेंद्राः संप्रोक्तानि मनीषिभिः । महामेरुर्महाकाशो जलदः कुमुदोत्तरम्

varṣāṇi teṣu vipreṁdrāḥ saṁproktāni manīṣibhiḥ mahāmerurmahākāśo jaladaḥ kumudottaram

हे विप्रश्रेष्ठो! उनमें स्थित वर्ष (प्रदेश) विद्वानों द्वारा कहे गए हैं — महामेरु, महाकाश, जलध और कुमुदोत्तर,

श्लोक 24 (padma.3.8.24)

जलधारो महाप्राज्ञः सुकुमार इति स्मृतः । रेवतस्य तु कौमारः श्यामश्च मणिकांचनः

jaladhāro mahāprājñaḥ sukumāra iti smṛtaḥ revatasya tu kaumāraḥ śyāmaśca maṇikāṁcanaḥ

हे महाप्राज्ञ! जलधार का सुकुमार नाम से स्मरण किया जाता है; रैवतक का कौमार, और श्याम का मणिकांचन,

श्लोक 25 (padma.3.8.25)

केशरस्याथ मौदाकी परेण तु महान्पुमान् । परिवार्य्यं तु विप्रेंद्रा दैर्घ्यं ह्रस्वत्वमेव च

keśarasyātha maudākī pareṇa tu mahānpumān parivāryyaṁ tu vipreṁdrā dairghyaṁ hrasvatvameva ca

केशर का मौदाकी, और उससे आगे महापुरुष (नामक वर्ष) है। हे विप्रश्रेष्ठो! उनका घेराव, तथा उनकी लंबाई और छोटापन भी इसी क्रम में जानिए।

श्लोक 26 (padma.3.8.26)

जंबूद्वीपेन संख्यातस्तस्य मध्ये महाद्रुमः । शाको नाम महाप्राज्ञाः प्रजास्तस्य सहानुगाः

jaṁbūdvīpena saṁkhyātastasya madhye mahādrumaḥ śāko nāma mahāprājñāḥ prajāstasya sahānugāḥ

जम्बूद्वीप के प्रमाण से गिना गया, उसके मध्य में एक महावृक्ष है; हे महाप्राज्ञो! उसे शाक (सागौन) कहते हैं, और उसकी प्रजा उसी के अनुगामी हैं।

श्लोक 27 (padma.3.8.27)

तत्र पुण्या जनपदाः पूज्यते तत्र शंकरः । तत्र गच्छंति सिद्धाश्च चारणा दैवतानि च

tatra puṇyā janapadāḥ pūjyate tatra śaṁkaraḥ tatra gacchaṁti siddhāśca cāraṇā daivatāni ca

वहाँ पुण्यमय जनपद हैं, और वहाँ शंकर की पूजा होती है; वहाँ सिद्ध, चारण और देवता भी जाते हैं,

श्लोक 28 (padma.3.8.28)

धार्मिकाश्च प्रजाः सर्वाः चत्वारो गतमत्सराः । वर्णाः स्वकर्मनिरता न च स्तेनोऽत्र दृश्यते

dhārmikāśca prajāḥ sarvāḥ catvāro gatamatsarāḥ varṇāḥ svakarmaniratā na ca steno'tra dṛśyate

और सभी धर्मपरायण प्रजा, ईर्ष्यारहित चारों वर्ण, अपने-अपने कर्म में तत्पर रहते हैं — वहाँ कोई चोर दिखाई नहीं देता।

श्लोक 29 (padma.3.8.29)

दीर्घायुषो महाप्राज्ञा जरामृत्युविवर्जिताः । प्रजास्तत्र विवर्द्धंते वर्षास्विव समुद्रगाः

dīrghāyuṣo mahāprājñā jarāmṛtyuvivarjitāḥ prajāstatra vivarddhaṁte varṣāsviva samudragāḥ

हे महाप्राज्ञो! दीर्घायु, जरा और मृत्यु से रहित प्रजा वहाँ उसी प्रकार बढ़ती है जैसे वर्षाकाल में नदियाँ बढ़ती हैं।

श्लोक 30 (padma.3.8.30)

नद्यः पुण्यजलास्तत्र गंगा च बहुधा गता । सुकुमारी कुमारी च शीता शीतोदका तथा

nadyaḥ puṇyajalāstatra gaṁgā ca bahudhā gatā sukumārī kumārī ca śītā śītodakā tathā

वहाँ पुण्यजल वाली नदियाँ हैं — अनेक धाराओं में बहती गंगा, सुकुमारी, कुमारी, शीता और इसी प्रकार शीतोदका,

श्लोक 31 (padma.3.8.31)

महानदी च भो विप्रास्तथा मणिजला नदी । इक्षुवर्द्धनिका चैव नदी मुनिवराः स्मृताः

mahānadī ca bho viprāstathā maṇijalā nadī ikṣuvarddhanikā caiva nadī munivarāḥ smṛtāḥ

और, हे विप्रो, महानदी, तथा मणिजला नदी भी; और हे श्रेष्ठ मुनियो, इक्षुवर्धनिका नदी भी स्मरण की गई है।

श्लोक 32 (padma.3.8.32)

ततः प्रवृत्ताः पुण्योदा नद्यः परमशोभनाः । सहस्राणां शतान्येव यतो वर्षति वासवः

tataḥ pravṛttāḥ puṇyodā nadyaḥ paramaśobhanāḥ sahasrāṇāṁ śatānyeva yato varṣati vāsavaḥ

उनसे आगे सैकड़ों-हजारों की संख्या में अन्य अत्यंत सुंदर पुण्यजल नदियाँ बहती हैं, जिन पर वासव (इंद्र) वर्षा करते हैं।

श्लोक 33 (padma.3.8.33)

न तासां नामधेयानि परिस्मर्तुं तथैव च । शक्यंते परिसंख्यातुं पुण्यास्ता हि सरिद्वराः

na tāsāṁ nāmadheyāni parismartuṁ tathaiva ca śakyaṁte parisaṁkhyātuṁ puṇyāstā hi saridvarāḥ

उन सबके नाम स्मरण रखना भी संभव नहीं, गिनना तो दूर की बात है — वे नदियों में श्रेष्ठ इतनी पुण्यमयी हैं।

श्लोक 34 (padma.3.8.34)

ततः पुण्या जनपदाश्चत्वारो लोकविश्रुताः । मृगाश्च मशकाश्चैव मानसा मल्लकास्तथा

tataḥ puṇyā janapadāścatvāro lokaviśrutāḥ mṛgāśca maśakāścaiva mānasā mallakāstathā

फिर वहाँ चार पुण्यमय जनपद हैं, जो संसार में विख्यात हैं — मृग, मशक, मानस और इसी प्रकार मल्लक।

श्लोक 35 (padma.3.8.35)

मृगाश्च ब्रह्मभूयिष्ठाः स्वकर्मनिरता द्विजाः । मशकेषु तु राजन्या धार्मिकाः सर्वकामदाः

mṛgāśca brahmabhūyiṣṭhāḥ svakarmaniratā dvijāḥ maśakeṣu tu rājanyā dhārmikāḥ sarvakāmadāḥ

हे द्विजो! मृगजन प्रायः ब्राह्मण हैं, अपने कर्म में तत्पर; मशकों में क्षत्रिय हैं, धर्मपरायण और सब कामनाएँ पूर्ण करने वाले।

श्लोक 36 (padma.3.8.36)

मानसाश्च महाभागा वैश्यधर्मोपजीविनः । सर्वकामसमायुक्ताः शूरा धर्मार्थनिश्चिताः

mānasāśca mahābhāgā vaiśyadharmopajīvinaḥ sarvakāmasamāyuktāḥ śūrā dharmārthaniścitāḥ

हे महाभाग्यशालियो! मानस लोग वैश्यधर्म से जीवनयापन करते हैं, सब कामनाओं से युक्त, शूरवीर, धर्म और अर्थ में दृढ़ निश्चय वाले।

श्लोक 37 (padma.3.8.37)

शूद्रास्तु मल्लका नित्यं पुरुषा धर्मशीलिनः । न तत्र राजा विप्रेंद्रा न दंडो न च दंडिकाः

śūdrāstu mallakā nityaṁ puruṣā dharmaśīlinaḥ na tatra rājā vipreṁdrā na daṁḍo na ca daṁḍikāḥ

मल्लक लोग सदा शूद्र होते हैं, धर्मशील पुरुष। हे विप्रश्रेष्ठो! वहाँ न कोई राजा है, न दंड है, न दंड देने वाले हैं।

श्लोक 38 (padma.3.8.38)

स्वधर्मेणैव धर्मज्ञास्ते रक्षंति परस्परम् । एतावदेव शक्यं तु तत्र द्वीपे प्रभाषितुम्

svadharmeṇaiva dharmajñāste rakṣaṁti parasparam etāvadeva śakyaṁ tu tatra dvīpe prabhāṣitum

वे धर्म के ज्ञाता होकर अपने-अपने धर्म से ही एक-दूसरे की रक्षा करते हैं। उस द्वीप के विषय में इतना ही कहा जा सकता है।

श्लोक 39 (padma.3.8.39)

एतदेव च श्रोतव्यं शाकद्वीपे महौजसि

etadeva ca śrotavyaṁ śākadvīpe mahaujasi

अत्यंत तेजस्वी शाकद्वीप के विषय में इतना ही सुनना चाहिए।

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