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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 10

लक्ष्मी-प्राकट्य और अमृत-मंथन

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (padma.4.10.1)

सूत उवाच । ऐरावतस्ततो जज्ञे तथैवोच्चैःश्रवा हयः । धन्वंतरिः पारिजातः सुरभिश्चाप्सरोदयः ।

sūta uvāca airāvatastato jajñe tathaivoccaiḥśravā hayaḥ dhanvaṁtariḥ pārijātaḥ surabhiścāpsarodayaḥ

सूत ने कहा — तब ऐरावत हाथी उत्पन्न हुआ, तथा उच्चैःश्रवा नामक अश्व भी; धन्वंतरि, पारिजात वृक्ष, कामधेनु तथा अप्सराओं की उत्पत्ति हुई।

श्लोक 2 (padma.4.10.2)

ततः प्रभातसमये द्वादश्यामुदिते रवौ । उत्पन्ना श्रीर्महालक्ष्मीः सर्वलक्षणशोभिता ।

tataḥ prabhātasamaye dvādaśyāmudite ravau utpannā śrīrmahālakṣmīḥ sarvalakṣaṇaśobhitā

फिर प्रातःकाल द्वादशी तिथि को सूर्योदय के समय, सर्वलक्षणों से सुशोभित श्री महालक्ष्मी प्रकट हुईं।

श्लोक 3 (padma.4.10.3)

ददृशुस्तां महादेवीं मातरं धर्मदेवताः । प्रहृष्टाः सर्वजंतूनां श्रीकृष्णहृदयालयाम् ।

dadṛśustāṁ mahādevīṁ mātaraṁ dharmadevatāḥ prahṛṣṭāḥ sarvajaṁtūnāṁ śrīkṛṣṇahṛdayālayām

धर्मदेवताओं ने अत्यंत हर्षित होकर उन महादेवी, समस्त प्राणियों की माता, श्रीकृष्ण के हृदय में निवास करने वाली उन्हें देखा।

श्लोक 4 (padma.4.10.4)

लक्ष्मीभ्राता शीतरश्मिर्जातश्च सुधया ततः । उत्पन्ना सा हरेर्जाया तुलसी लोकपावनी ।

lakṣmībhrātā śītaraśmirjātaśca sudhayā tataḥ utpannā sā harerjāyā tulasī lokapāvanī

लक्ष्मी के भाई शीतल किरणों वाले चंद्रमा उत्पन्न हुए, और फिर अमृत के साथ हरि की पत्नी, लोक-पावनी तुलसी उत्पन्न हुईं।

श्लोक 5 (padma.4.10.5)

तं शैलं पूर्ववत्स्थाप्य परिपूर्णमनोरथाः । समेत्य मातरं स्तुत्वा जेपुः श्रीसूक्तमुत्तमम् ।

taṁ śailaṁ pūrvavatsthāpya paripūrṇamanorathāḥ sametya mātaraṁ stutvā jepuḥ śrīsūktamuttamam

उस पर्वत को पूर्ववत् स्थापित करके, अपने मनोरथ पूर्ण होने पर, सबने माता के पास एकत्र होकर उनकी स्तुति की और उत्तम श्रीसूक्त का जप किया।

श्लोक 6 (padma.4.10.6)

ततः प्रसन्ना सा देवी सर्वान्देवानुवाच ह । वरं वृणीध्वं भद्रं वो वरदाहं सुरोत्तमाः ।

tataḥ prasannā sā devī sarvāndevānuvāca ha varaṁ vṛṇīdhvaṁ bhadraṁ vo varadāhaṁ surottamāḥ

तब प्रसन्न होकर उस देवी ने सब देवताओं से कहा — 'हे सुरश्रेष्ठो! वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं वरदायिनी हूँ।'

श्लोक 7 (padma.4.10.7)

देवा ऊचुः । प्रसीद कमले देवि सर्वमातर्हरिप्रिये । त्वया विना जगच्छून्यं कुरु प्राणप्ररक्षणम् ।

devā ūcuḥ prasīda kamale devi sarvamātarharipriye tvayā vinā jagacchūnyaṁ kuru prāṇaprarakṣaṇam

देवताओं ने कहा — हे कमले, हे देवी, हे सर्वमातः, हे हरिप्रिये! प्रसन्न होइए; आपके बिना जगत् शून्य है; प्राणों की रक्षा कीजिए।

श्लोक 8 (padma.4.10.8)

इत्युक्ता सा महालक्ष्मीः प्राह नारायणप्रिया । इदानीं सर्वजंतूनां प्राणरक्षां करोम्यहम् ।

ityuktā sā mahālakṣmīḥ prāha nārāyaṇapriyā idānīṁ sarvajaṁtūnāṁ prāṇarakṣāṁ karomyaham

यह सुनकर नारायणप्रिया महालक्ष्मी ने कहा — 'अब से मैं समस्त प्राणियों के प्राणों की रक्षा करूँगी।'

श्लोक 9 (padma.4.10.9)

ततो नारायणः श्रीमाञ्छंखचक्रगदाधरः । आविर्बभूव सहसा दयालुर्जगदीश्वरः ।

tato nārāyaṇaḥ śrīmāñchaṁkhacakragadādharaḥ āvirbabhūva sahasā dayālurjagadīśvaraḥ

तब श्रीमान् नारायण, शंख-चक्र-गदाधारी, दयालु जगदीश्वर सहसा प्रकट हुए।

श्लोक 10 (padma.4.10.10)

ततस्ते तुष्टुवुर्देवाः प्रणम्य जगतां पतिम् । कृतांजलिपुटाः प्रोचुः हर्षगद्गदभाषिणः ।

tataste tuṣṭuvurdevāḥ praṇamya jagatāṁ patim kṛtāṁjalipuṭāḥ procuḥ harṣagadgadabhāṣiṇaḥ

तब देवताओं ने जगत्पति को प्रणाम करके उनकी स्तुति की; हाथ जोड़कर, हर्ष से गद्गद वाणी में उन्होंने कहा —

श्लोक 11 (padma.4.10.11)

गृहाण मातरं विष्णो महिषीं वल्लभां तव । संसाररक्षणार्थाय लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यावत्प्रतिज्ञां नो चक्रे तावत्प्राहेंदिरा हरिम् ।

gṛhāṇa mātaraṁ viṣṇo mahiṣīṁ vallabhāṁ tava saṁsārarakṣaṇārthāya lakṣmīmanapagāminīm yāvatpratijñāṁ no cakre tāvatprāheṁdirā harim

'हे विष्णु! अपनी माता, अपनी प्रिय महिषी, संसार की रक्षा के लिए इस अविनाशिनी लक्ष्मी को ग्रहण कीजिए।' परंतु जब तक उन्होंने प्रतिज्ञा नहीं की, तब तक इंदिरा ने हरि से कहा —

श्लोक 12 (padma.4.10.12)

लक्ष्मीरुवाच । अविवाह्य कथं ज्येष्ठामलक्ष्मीं मधुसूदन । तस्याः कनिष्ठां मां नाथ विवाहं कर्तुमिच्छसि । ज्येष्ठायां च स्थितायां वै कनिष्ठा परिणीयते ।

lakṣmīruvāca avivāhya kathaṁ jyeṣṭhāmalakṣmīṁ madhusūdana tasyāḥ kaniṣṭhāṁ māṁ nātha vivāhaṁ kartumicchasi jyeṣṭhāyāṁ ca sthitāyāṁ vai kaniṣṭhā pariṇīyate

लक्ष्मी ने कहा — 'हे मधुसूदन! ज्येष्ठा अलक्ष्मी का विवाह किए बिना आप मुझ कनिष्ठा से विवाह करना चाहते हैं। हे नाथ! जब ज्येष्ठा उपस्थित हो, तो कनिष्ठा का विवाह कैसे हो सकता है?'

श्लोक 13 (padma.4.10.13)

सूत उवाच । इति श्रुत्वा ततो विष्णुर्ददौ चोद्दालकाय च । वेदवाक्यानुरूपेण ह्यलक्ष्मीं निर्जरैः सह ।

sūta uvāca iti śrutvā tato viṣṇurdadau coddālakāya ca vedavākyānurūpeṇa hyalakṣmīṁ nirjaraiḥ saha

सूत ने कहा — यह सुनकर विष्णु ने देवताओं सहित वेद-वाक्यों के अनुरूप अलक्ष्मी को उद्दालक को दे दिया।

श्लोक 14 (padma.4.10.14)

ततो नारायणः श्रीमान्लक्ष्मीमंगीचकार ह । ततः सुरगणाः सर्वे नमश्चक्रुः पुनःपुनः ।

tato nārāyaṇaḥ śrīmānlakṣmīmaṁgīcakāra ha tataḥ suragaṇāḥ sarve namaścakruḥ punaḥpunaḥ

तब श्रीमान् नारायण ने लक्ष्मी को स्वीकार किया; तब समस्त देवगणों ने बार-बार नमन किया।

श्लोक 15 (padma.4.10.15)

अथ ते चासुरान्सर्वान्जघ्नुः सर्वे बलाधिकाः । सर्वे ते क्रंदमानाश्च गताश्चैव दिशो दश ।

atha te cāsurānsarvānjaghnuḥ sarve balādhikāḥ sarve te kraṁdamānāśca gatāścaiva diśo daśa

तब अत्यंत बलशाली हुए वे सब देवता समस्त असुरों को मार भगाने लगे; वे सब असुर चीत्कार करते हुए दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 16 (padma.4.10.16)

सुधां तत्खादितुं चक्रुर्देवाः पंक्तिं यथाक्रमम् । श्रीविष्णोराज्ञया सर्वे चोचुश्चैव परस्परम् ।

sudhāṁ tatkhādituṁ cakrurdevāḥ paṁktiṁ yathākramam śrīviṣṇorājñayā sarve cocuścaiva parasparam

देवताओं ने क्रमानुसार पंक्ति बनाकर अमृत पीने की तैयारी की; श्रीविष्णु की आज्ञा से वे सब आपस में कहने लगे —

श्लोक 17 (padma.4.10.17)

त्वं च देहि त्वं च देहि त्वं च देहीति चाब्रुवन् । न शक्तोऽस्मि न शक्तोऽस्मि न शक्तोऽस्मीति चाब्रुवन् ।

tvaṁ ca dehi tvaṁ ca dehi tvaṁ ca dehīti cābruvan na śakto'smi na śakto'smi na śakto'smīti cābruvan

'तुम दो, तुम दो, तुम दो' — ऐसा वे एक-दूसरे से कहते थे; 'मैं समर्थ नहीं हूँ, मैं समर्थ नहीं हूँ, मैं समर्थ नहीं हूँ' — ऐसा वे कहते थे।

श्लोक 18 (padma.4.10.18)

ततो विष्णुः समुत्तस्थौ स्त्रीरूपं च दधार ह । चकार स्वर्णपात्रे तत्पीयूषपरिवेषणम् ।

tato viṣṇuḥ samuttasthau strīrūpaṁ ca dadhāra ha cakāra svarṇapātre tatpīyūṣapariveṣaṇam

तब विष्णु स्वयं उठे और स्त्री-रूप धारण किया; उन्होंने स्वर्ण-पात्र में उस अमृत को बाँटना आरंभ किया।

श्लोक 19 (padma.4.10.19)

पीयूषभक्षणं राहुर्यावत्कुर्याद्द्विजोत्तम । चंद्रसूर्यौ चोक्तवंतौ राक्षसोऽसौ छलागतः ।

pīyūṣabhakṣaṇaṁ rāhuryāvatkuryāddvijottama caṁdrasūryau coktavaṁtau rākṣaso'sau chalāgataḥ

हे द्विजोत्तम! जैसे ही राहु अमृत पीने लगा, चंद्र और सूर्य ने कहा — 'यह राक्षस छल से आया है।'

श्लोक 20 (padma.4.10.20)

ततः क्रुद्धो जगन्नाथो जघान स्वर्णपात्रतः । शिरस्तस्य पपातोर्व्यां केतुर्नाम्ना बभूव ह ।

tataḥ kruddho jagannātho jaghāna svarṇapātrataḥ śirastasya papātorvyāṁ keturnāmnā babhūva ha

तब क्रुद्ध हुए जगन्नाथ ने स्वर्ण-पात्र से ही उसका वध किया; उसका सिर पृथ्वी पर गिरा और केतु नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 21 (padma.4.10.21)

राहुकेतू ततस्तूर्णं गतौ तौ भयविह्वलौ । इदानीं तद्दिने प्राप्ते चंद्रसूर्यौ स युध्यति ।

rāhuketū tatastūrṇaṁ gatau tau bhayavihvalau idānīṁ taddine prāpte caṁdrasūryau sa yudhyati

तब राहु और केतु दोनों भयविह्वल होकर शीघ्र भाग गए। अब भी उस दिन के आने पर वह चंद्र-सूर्य से युद्ध करता है।

श्लोक 22 (padma.4.10.22)

कुर्याद्ग्रासं सैंहिकेयस्तत्क्षणं दुर्लभं भवेत् । सर्वं गंगासमं तोयं वेदव्याससमा द्विजाः ।

kuryādgrāsaṁ saiṁhikeyastatkṣaṇaṁ durlabhaṁ bhavet sarvaṁ gaṁgāsamaṁ toyaṁ vedavyāsasamā dvijāḥ

वह सैंहिकेय उन्हें ग्रस लेता है, और उस क्षण दान देना दुर्लभ हो जाता है। तब सारा जल गंगा के समान तथा सभी ब्राह्मण वेदव्यास के समान हो जाते हैं।

श्लोक 23 (padma.4.10.23)

स्नानं वायसतीर्थे यो गंगास्नानफलं लभेत् । दानमक्षयपुण्यं स्यात्कोटिजन्मार्जितं तथा ।

snānaṁ vāyasatīrthe yo gaṁgāsnānaphalaṁ labhet dānamakṣayapuṇyaṁ syātkoṭijanmārjitaṁ tathā

जो वायसतीर्थ में स्नान करता है, उसे गंगा-स्नान का फल मिलता है; तब दिया गया दान अक्षय पुण्यदायक होता है तथा करोड़ों जन्मों के पापों का नाशक होता है।

श्लोक 24 (padma.4.10.24)

पापं नश्येत्समूलं च किं पुनः क्रतुकोटिभिः । विद्यार्थी लभते विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्यते ।

pāpaṁ naśyetsamūlaṁ ca kiṁ punaḥ kratukoṭibhiḥ vidyārthī labhate vidyāṁ putrārthī putramāpyate

पाप जड़ से नष्ट हो जाता है — फिर करोड़ों यज्ञों की तो बात ही क्या! विद्यार्थी को विद्या प्राप्त होती है, पुत्रार्थी को पुत्र प्राप्त होता है,

श्लोक 25 (padma.4.10.25)

मोक्षार्थी लभते मोक्षं मंत्रसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् । इति ते कथितं विप्र समुद्रमथनं तु तत् ।

mokṣārthī labhate mokṣaṁ maṁtrasiddhirbhaveddhruvam iti te kathitaṁ vipra samudramathanaṁ tu tat

मोक्षार्थी को मोक्ष प्राप्त होता है, तथा मंत्र-सिद्धि निश्चय ही होती है। हे विप्र! इस प्रकार मैंने आपसे वह समुद्र-मंथन की कथा कही।

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