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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 11

सुभगा व्रत की कथा

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (padma.4.11.1)

शौनक उवाच । इदानीं श्रोतुमिच्छामि कथयस्व यथार्थतः । हरिस्वरूपिणा साक्षाद्वेदव्यासेन शासित ।

śaunaka uvāca idānīṁ śrotumicchāmi kathayasva yathārthataḥ harisvarūpiṇā sākṣādvedavyāsena śāsita

शौनक बोले — अब मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ; जो साक्षात् हरिस्वरूप वेदव्यास द्वारा कहा गया है, वह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.4.11.2)

निरहंकार हे सूत लोकानुग्रहकारक । केन स्यात्सुभगा नारी पापिनी च सुदुर्भगा ।

nirahaṁkāra he sūta lokānugrahakāraka kena syātsubhagā nārī pāpinī ca sudurbhagā

हे निरहंकार सूत, लोकों का कल्याण करने वाले! किस कारण स्त्री सौभाग्यशाली होती है और किस कारण पापिनी स्त्री अत्यंत दुर्भाग्यशाली होती है?

श्लोक 3 (padma.4.11.3)

पतिप्रियांग केन स्याद्रूपिता चक्षुषोः सुधा । केन वा जायते लक्ष्मीस्तन्मे ब्रूहि तपोधन ।

patipriyāṁga kena syādrūpitā cakṣuṣoḥ sudhā kena vā jāyate lakṣmīstanme brūhi tapodhana

किस कारण स्त्री का शरीर पति को प्रिय और नेत्रों के लिए अमृत के समान बनता है? और किस कारण उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होती है — हे तपोधन, यह मुझे बताइए।

श्लोक 4 (padma.4.11.4)

सूत उवाच । यदि पुण्यमिदं विप्र वृत्तं परमदुर्लभम् । शृणुष्व भोः समासेन कथयामि विधानतः ।

sūta uvāca yadi puṇyamidaṁ vipra vṛttaṁ paramadurlabham śṛṇuṣva bhoḥ samāsena kathayāmi vidhānataḥ

सूत बोले — हे विप्र, यदि यह अत्यंत दुर्लभ पुण्यमय वृत्तांत सुनना चाहते हो, तो सुनो; मैं इसे संक्षेप में विधिपूर्वक कहता हूँ।

श्लोक 5 (padma.4.11.5)

आसीद्भद्रश्रवा राजा युगे द्वापरसंज्ञके । सौराष्ट्रदेशवासी च वेदवेदांगपारगः ।

āsīdbhadraśravā rājā yuge dvāparasaṁjñake saurāṣṭradeśavāsī ca vedavedāṁgapāragaḥ

द्वापर युग में सौराष्ट्र देश में भद्रश्रवा नामक राजा थे, जो वेद-वेदांगों में पारंगत थे।

श्लोक 6 (padma.4.11.6)

भार्या तस्य च संजाता नाम्ना सुरतिचंद्रिका । तस्यां बभूवुः श्रीराज्ञः सप्तपुत्रा मनोरमाः ।

bhāryā tasya ca saṁjātā nāmnā suraticaṁdrikā tasyāṁ babhūvuḥ śrīrājñaḥ saptaputrā manoramāḥ

उनकी पत्नी का नाम सुरतिचंद्रिका था। उनसे उस श्रीमान राजा के सात मनोहर पुत्र हुए।

श्लोक 7 (padma.4.11.7)

ततोऽभिजाता दुहिता सुंदरी सत्यवादिनी । श्यामबाला च विप्रेंद्र नाम्ना प्रीतिकरी पितुः ।

tato'bhijātā duhitā suṁdarī satyavādinī śyāmabālā ca vipreṁdra nāmnā prītikarī pituḥ

उनके पश्चात एक सुंदरी और सत्यवादिनी कन्या उत्पन्न हुई, हे विप्रेंद्र, जिसका नाम श्यामबाला था और जो अपने पिता को अत्यंत प्रिय थी।

श्लोक 8 (padma.4.11.8)

अथैकदा श्यामबाला सुवर्णसिकतासु च । गूढैर्मनोहरै रत्नैः सखिभिः क्रीडितुं मुदा ।

athaikadā śyāmabālā suvarṇasikatāsu ca gūḍhairmanoharai ratnaiḥ sakhibhiḥ krīḍituṁ mudā

एक दिन श्यामबाला सुनहरी रेत पर अपनी सखियों के साथ छिपे हुए मनोहर रत्नों से आनंदपूर्वक खेलने गई।

श्लोक 9 (padma.4.11.9)

जगाम नीपवृक्षस्य तलं परमदुर्लभम् । एतस्मिन्नंतरे विप्र लक्ष्मीः संसारतारिणी ।

jagāma nīpavṛkṣasya talaṁ paramadurlabham etasminnaṁtare vipra lakṣmīḥ saṁsāratāriṇī

वह एक अत्यंत उत्तम कदंब वृक्ष के नीचे गई। इसी बीच, हे विप्र, संसार से तारने वाली लक्ष्मी —

श्लोक 10 (padma.4.11.10)

लोकानां नीतिदा साथ समायाता स्वयं पुरः । धृत्वा च ब्राह्मणीरूपं पलितांगी च भूसुर ।

lokānāṁ nītidā sātha samāyātā svayaṁ puraḥ dhṛtvā ca brāhmaṇīrūpaṁ palitāṁgī ca bhūsura

— जो लोकों को नीति प्रदान करने वाली हैं, स्वयं ब्राह्मणी का रूप धारण कर, वृद्धा शरीर में, हे भूसुर, सामने आ गईं।

श्लोक 11 (padma.4.11.11)

अखिलानां च लोकानां शास्तू राज्ञः क्षयं विना । केषां क्षुद्रतराणां हि गृहे गच्छामि सांप्रतम् ।

akhilānāṁ ca lokānāṁ śāstū rājñaḥ kṣayaṁ vinā keṣāṁ kṣudratarāṇāṁ hi gṛhe gacchāmi sāṁpratam

उन्होंने मन में सोचा — "समस्त लोकों के शासक राजा के घर के अतिरिक्त और किस क्षुद्र के घर अभी जाऊँ?"

श्लोक 12 (padma.4.11.12)

इति संचिंत्य मनसा गता राजनिकेतनम् । सुवर्णभित्तिभिर्युक्तं पताकाभिरलंकृतम् ।

iti saṁciṁtya manasā gatā rājaniketanam suvarṇabhittibhiryuktaṁ patākābhiralaṁkṛtam

ऐसा विचार कर वे राजभवन की ओर गईं, जो सुवर्ण की दीवारों से युक्त और ध्वजाओं से सुशोभित था।

श्लोक 13 (padma.4.11.13)

सिंहद्वारमतिक्रम्य प्राह दौवारिकीं ततः । द्वारं जहि हि भो द्वारि नियुक्ते शुभलक्षणे ।

siṁhadvāramatikramya prāha dauvārikīṁ tataḥ dvāraṁ jahi hi bho dvāri niyukte śubhalakṣaṇe

सिंहद्वार को पार कर उन्होंने द्वारपालिका से कहा — "हे शुभ लक्षणों वाली द्वारपालिके, द्वार खोल दे।

श्लोक 14 (padma.4.11.14)

यामि वेगेन पश्यामि राज्ञीं सुरतिचंद्रिकाम् । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या रत्नदंडकरा च सा । कोकिलावाक्यवन्मुक्तं परमं हर्षमाययौ ।

yāmi vegena paśyāmi rājñīṁ suraticaṁdrikām tacchrutvā vacanaṁ tasyā ratnadaṁḍakarā ca sā kokilāvākyavanmuktaṁ paramaṁ harṣamāyayau

मैं शीघ्र जाकर रानी सुरतिचंद्रिका के दर्शन करना चाहती हूँ।" उसका यह वचन सुनकर, रत्नदण्ड धारण करने वाली उस द्वारपालिका को कोयल की मीठी वाणी सुनने के समान परम हर्ष हुआ।

श्लोक 15 (padma.4.11.15)

द्वारनियुक्तोवाच । किं नाम वहसे वृद्धे कः पतिस्तावकः पुनः । आगतासि कथं किं ते कार्य्यं राज्ञ्याश्च दर्शने । कस्मात्किं ब्रूहि विप्रे त्वं श्रोतुं कौतुहलं हि मे ।

dvāraniyuktovāca kiṁ nāma vahase vṛddhe kaḥ patistāvakaḥ punaḥ āgatāsi kathaṁ kiṁ te kāryyaṁ rājñyāśca darśane kasmātkiṁ brūhi vipre tvaṁ śrotuṁ kautuhalaṁ hi me

द्वारपालिका बोली — "हे वृद्धे, तुम्हारा नाम क्या है और तुम्हारे पति कौन हैं? तुम कैसे आई हो, रानी के दर्शन का तुम्हें क्या प्रयोजन है? हे विप्रे, यह सब मुझे बताओ, मुझे सुनने की उत्सुकता है।"

श्लोक 16 (padma.4.11.16)

वृद्धोवाच । शृणु पोष्ये महाराज पत्न्या दंडकरे यदा । श्रोतुं कौतूहलं तेऽस्ति मदागमनकारणम् ।

vṛddhovāca śṛṇu poṣye mahārāja patnyā daṁḍakare yadā śrotuṁ kautūhalaṁ te'sti madāgamanakāraṇam

वृद्धा बोली — "हे पोष्ये, सुनो; जब तुम मुझसे पूछ ही रही हो तो मैं अपने आने का कारण बताती हूँ।

श्लोक 17 (padma.4.11.17)

प्रसिद्धा कमला नाम्ना चाहं प्राणेश्वरो मम । भुवनेश इति ख्यातो नाम्ना द्वारवतीपुरी ।

prasiddhā kamalā nāmnā cāhaṁ prāṇeśvaro mama bhuvaneśa iti khyāto nāmnā dvāravatīpurī

मैं कमला नाम से विख्यात हूँ, और मेरे प्राणेश्वर भुवनेश नाम से प्रसिद्ध हैं; हमारी नगरी का नाम द्वारवती है।

श्लोक 18 (padma.4.11.18)

तस्यां वै वर्त्तते पोष्ये मम प्राणेश्वरस्ततः । आगताहं रत्नवेत्रकरे शृणु सकौतुकम् ।

tasyāṁ vai varttate poṣye mama prāṇeśvarastataḥ āgatāhaṁ ratnavetrakare śṛṇu sakautukam

वहीं, हे पोष्ये, मेरे प्राणेश्वर निवास करते हैं। हे रत्नवेत्रधारिणी, मैं वहीं से आई हूँ; कुतूहलपूर्वक सुनो।

श्लोक 19 (padma.4.11.19)

ममागमनकार्यं हि वच्मीदानीं तवाग्रतः । पुरासीद्वैश्यकुलजा राज्ञी तव च दुःखिनी ।

mamāgamanakāryaṁ hi vacmīdānīṁ tavāgrataḥ purāsīdvaiśyakulajā rājñī tava ca duḥkhinī

अब मैं अपने आने का प्रयोजन तुम्हारे सामने कहती हूँ — पहले तुम्हारी इस राजा की रानी वैश्यकुल में जन्मी और दुःखी थी।

श्लोक 20 (padma.4.11.20)

एकस्मिन्दिवसे पोष्ये पतिना कलहः कृतः । तया नार्या च दुःखिन्या ततो वै भर्तृपीडिता ।

ekasmindivase poṣye patinā kalahaḥ kṛtaḥ tayā nāryā ca duḥkhinyā tato vai bhartṛpīḍitā

एक दिन, हे पोष्ये, उसका अपने पति से कलह हुआ; उस दुःखी स्त्री को पति ने पीड़ित किया।

श्लोक 21 (padma.4.11.21)

बहिर्भूय द्रुतं गेहाद्रुदंती च पुनः पुनः । तस्याश्च रोदनं श्रुत्वा चागताहं समीपतः ।

bahirbhūya drutaṁ gehādrudaṁtī ca punaḥ punaḥ tasyāśca rodanaṁ śrutvā cāgatāhaṁ samīpataḥ

वह घर से बाहर निकलकर बार-बार रोती हुई भागी। उसका रुदन सुनकर मैं उसके समीप गई।

श्लोक 22 (padma.4.11.22)

अपृच्छं सर्ववृत्तांतं कथितो वै यथार्थतः । तया ततो व्रतवरमुपदेशं ददाम्यहम् ।

apṛcchaṁ sarvavṛttāṁtaṁ kathito vai yathārthataḥ tayā tato vratavaramupadeśaṁ dadāmyaham

मैंने उससे सारा वृत्तांत पूछा और उसने यथार्थ रूप से सब कह दिया। तब मैंने उसे श्रेष्ठ व्रत का उपदेश दिया।

श्लोक 23 (padma.4.11.23)

ममोपदेशतः सा वै चक्रे व्रतवरं मुदा । तस्य प्रसादाद्भो द्वाःस्थे संजाता सुखिता च सा ।

mamopadeśataḥ sā vai cakre vratavaraṁ mudā tasya prasādādbho dvāḥsthe saṁjātā sukhitā ca sā

मेरे उपदेश से उसने आनंदपूर्वक वह श्रेष्ठ व्रत किया। उसके प्रसाद से, हे द्वारपालिके, वह सुखी हो गई।

श्लोक 24 (padma.4.11.24)

कदाचिद्वैश्यकुलजा पत्या मृत्योर्वशं गता । समानेतुं ततस्तौ तु विहिताखिलघातकौ ।

kadācidvaiśyakulajā patyā mṛtyorvaśaṁ gatā samānetuṁ tatastau tu vihitākhilaghātakau

एक बार वह वैश्यकुलजा अपने पति सहित मृत्यु के वश में आ गई। तब उन दोनों को लाने के लिए सभी संहारकारी दूत नियुक्त किए गए।

श्लोक 25 (padma.4.11.25)

किंकरान्प्रेषयामास चंडाद्यान्धर्मराट्प्रभुः । यमाज्ञया समायाता यमदूता भयंकराः ।

kiṁkarānpreṣayāmāsa caṁḍādyāndharmarāṭprabhuḥ yamājñayā samāyātā yamadūtā bhayaṁkarāḥ

धर्मराज ने चंड आदि अपने किंकरों को भेजा। यमराज की आज्ञा से भयंकर यमदूत आए।

श्लोक 26 (padma.4.11.26)

बद्ध्वा तौ चर्मपाशेन लोहमुद्गरपाणयः । उद्यमं चक्रिरे गंतुं यमस्य शरणं प्रति ।

baddhvā tau carmapāśena lohamudgarapāṇayaḥ udyamaṁ cakrire gaṁtuṁ yamasya śaraṇaṁ prati

उन दोनों को चर्मपाश से बाँधकर, लोहमुद्गर हाथों में लिए हुए वे यमलोक की ओर ले जाने के लिए उद्यत हुए।

श्लोक 27 (padma.4.11.27)

अत्रांतरे च लक्ष्म्यास्ते दूता विष्णुपरायणाः । समानेतुं समायाताः शंखचक्रगदाधराः ।

atrāṁtare ca lakṣmyāste dūtā viṣṇuparāyaṇāḥ samānetuṁ samāyātāḥ śaṁkhacakragadādharāḥ

इसी बीच शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले, विष्णुभक्त लक्ष्मी के दूत उन्हें लाने के लिए आ पहुँचे।

श्लोक 28 (padma.4.11.28)

दृष्ट्वा तथाविधांस्तांश्च यमदूताः पलायिताः । लक्ष्मीदूता महात्मानः स्वप्रकाशादयस्तथा ।

dṛṣṭvā tathāvidhāṁstāṁśca yamadūtāḥ palāyitāḥ lakṣmīdūtā mahātmānaḥ svaprakāśādayastathā

ऐसे तेजस्वी दूतों को देखकर यमदूत भाग गए। स्वयं प्रकाशमान वे महात्मा लक्ष्मी के दूत —

श्लोक 29 (padma.4.11.29)

पाशं छित्त्वा समारोप्य राजहंसयुते रथे । जग्मुर्लक्ष्मीपुरं सर्वे सहसाकाशवर्त्मना ।

pāśaṁ chittvā samāropya rājahaṁsayute rathe jagmurlakṣmīpuraṁ sarve sahasākāśavartmanā

— उनके पाश को काटकर, उन्हें राजहंसों से युक्त रथ पर बिठाकर, सब तत्काल आकाश-मार्ग से लक्ष्मीपुर चले गए।

श्लोक 30 (padma.4.11.30)

यावद्वारं व्रतवरं कृत्वा वैश्या च सा तदा । तावत्कल्पसहस्राणि तस्थतुः कमलापुरे ।

yāvadvāraṁ vratavaraṁ kṛtvā vaiśyā ca sā tadā tāvatkalpasahasrāṇi tasthatuḥ kamalāpure

उस वैश्यपत्नी ने जितनी बार वह उत्तम व्रत किया था, उतने ही हज़ार कल्पों तक वे दोनों कमलापुर में रहे।

श्लोक 31 (padma.4.11.31)

पुण्यशेषस्य भोगार्थं जातौ राजान्वयेऽधुना । व्रतं च विस्मृतौ द्वाःस्थे राजसंपत्तिगर्वितौ । तस्माच्च तव तस्यापि चोपदेशार्थमागता ।

puṇyaśeṣasya bhogārthaṁ jātau rājānvaye'dhunā vrataṁ ca vismṛtau dvāḥsthe rājasaṁpattigarvitau tasmācca tava tasyāpi copadeśārthamāgatā

शेष पुण्य के भोग के लिए अब वे दोनों राजवंश में जन्मे हैं। परंतु, हे द्वारपालिके, राजसंपत्ति के अभिमान में वे दोनों उस व्रत को भूल गए हैं; इसीलिए मैं तुम्हें और उसे भी उपदेश देने आई हूँ।"

श्लोक 32 (padma.4.11.32)

द्वाःस्थोवाच । केनैव तु विधानेन वृद्धे व्रतवरं कृतम् । कस्मिन्मासे व्रतं श्रेष्ठं देवता का च पूज्यते ।

dvāḥsthovāca kenaiva tu vidhānena vṛddhe vratavaraṁ kṛtam kasminmāse vrataṁ śreṣṭhaṁ devatā kā ca pūjyate

द्वारपालिका बोली — "हे वृद्धे, किस विधि से यह श्रेष्ठ व्रत किया जाता है? किस मास में यह व्रत श्रेष्ठ माना जाता है और किस देवता की पूजा की जाती है?

श्लोक 33 (padma.4.11.33)

एतन्मे पृच्छतो मातर्यथावद्वक्तुमर्हसि । कमलोवाच । कार्त्तिके च व्यतिक्रांते मार्गशीर्षे समागते । तस्मिन्मासे च भो पोष्ये वासरे गुरुसंज्ञके ।

etanme pṛcchato mātaryathāvadvaktumarhasi kamalovāca kārttike ca vyatikrāṁte mārgaśīrṣe samāgate tasminmāse ca bho poṣye vāsare gurusaṁjñake

हे माता, यह पूछने पर आप मुझे यथावत् बताने योग्य हैं।" कमला बोलीं — "कार्तिक मास बीत जाने पर जब मार्गशीर्ष आता है, उस मास में, हे पोष्ये, गुरुवार के दिन —

श्लोक 34 (padma.4.11.34)

ततः पूर्वाह्णसमये सकलैर्व्रतिभिर्वृता । नारायणेन सहितां लक्ष्मीं संपूजयेत्ततः ।

tataḥ pūrvāhṇasamaye sakalairvratibhirvṛtā nārāyaṇena sahitāṁ lakṣmīṁ saṁpūjayettataḥ

— पूर्वाह्ण काल में समस्त व्रतियों से घिरी हुई स्त्री को नारायण सहित लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 35 (padma.4.11.35)

मिष्टैः पायसयुक्तैश्च भुक्तैश्च खंडमिश्रितैः । लक्ष्मीं संतोषयेत्प्रेष्ये ततः संप्रार्थयेदिदम् ।

miṣṭaiḥ pāyasayuktaiśca bhuktaiśca khaṁḍamiśritaiḥ lakṣmīṁ saṁtoṣayetpreṣye tataḥ saṁprārthayedidam

मिष्ठान्न, खीर और शक्कर मिश्रित भोजन से लक्ष्मी को संतुष्ट करना चाहिए, हे प्रेष्ये, और फिर यह प्रार्थना करनी चाहिए —

श्लोक 36 (padma.4.11.36)

त्रैलोक्यपूजिते देवि कमले विष्णुवल्लभे । यथा त्वमचला कृष्णे तथा भव मयि स्थिता ।

trailokyapūjite devi kamale viṣṇuvallabhe yathā tvamacalā kṛṣṇe tathā bhava mayi sthitā

'हे त्रैलोक्यपूजिते देवी कमले, विष्णुवल्लभे! जैसे तुम कृष्ण में अचल भाव से स्थित हो, वैसे ही मुझमें स्थिर रहो।

श्लोक 37 (padma.4.11.37)

ईश्वरी कमले देवि शरणं च भवानघे । नानोपहारद्रव्यैश्च लक्ष्मीमाज्ञाप्य तोषयेत् ।

īśvarī kamale devi śaraṇaṁ ca bhavānaghe nānopahāradravyaiśca lakṣmīmājñāpya toṣayet

हे ईश्वरी कमले देवी, हे अनघे, तुम मेरी शरण बनो।' नाना प्रकार के उपहार-द्रव्यों से लक्ष्मी को प्रार्थना कर संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 38 (padma.4.11.38)

शास्त्रैश्च पूजयेद्देवीं महोत्सवसमन्विताम् । ततो नैवेद्यशेषांश्च दत्वा ब्राह्मणसत्तमम् ।

śāstraiśca pūjayeddevīṁ mahotsavasamanvitām tato naivedyaśeṣāṁśca datvā brāhmaṇasattamam

शास्त्रोक्त विधि से महोत्सवपूर्वक देवी की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात नैवेद्य के शेष भाग को श्रेष्ठ ब्राह्मण को देकर —

श्लोक 39 (padma.4.11.39)

आत्मानं स्वपतिं पुत्रान्पोष्येऽन्यानपि सेवकान् । द्वितीये तु गुरोर्वारे विशेषं शृणु सुंदरि ।

ātmānaṁ svapatiṁ putrānpoṣye'nyānapi sevakān dvitīye tu gurorvāre viśeṣaṁ śṛṇu suṁdari

— स्वयं, अपने पति, पुत्रों, हे पोष्ये, तथा अन्य सेवकों को भी भोजन कराना चाहिए। दूसरे गुरुवार के विशेष विधान को सुनो, हे सुंदरी।

श्लोक 40 (padma.4.11.40)

चित्रधूलीप्रशस्तैश्च भ्राष्ट्रैर्गोधूमनिर्मितैः । तोषयेत्कमलादेव्याः कुर्य्याद्वै भक्तिभावतः ।

citradhūlīpraśastaiśca bhrāṣṭrairgodhūmanirmitaiḥ toṣayetkamalādevyāḥ kuryyādvai bhaktibhāvataḥ

गेहूँ से बने विविध भुने हुए श्रेष्ठ पदार्थों से भक्तिभाव से देवी कमला को संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 41 (padma.4.11.41)

तृतीये खंडसंयुक्तं दध्योदननिवेदनम् । शामाक शालि कासारैश्चतुर्थे पूजयेन्मुदा ।

tṛtīye khaṁḍasaṁyuktaṁ dadhyodananivedanam śāmāka śāli kāsāraiścaturthe pūjayenmudā

तीसरे गुरुवार को शक्कर मिश्रित दही-भात अर्पित करना चाहिए; चौथे गुरुवार को श्यामाक और शालि चावल की मिठाइयों से आनंदपूर्वक —

श्लोक 42 (padma.4.11.42)

लक्ष्मीदेवीं प्रयत्नेन रत्नदंडकरे ततः । लक्ष्मीदेवी प्रीतये तु ब्राह्मणान्पूजयेद्धनैः ।

lakṣmīdevīṁ prayatnena ratnadaṁḍakare tataḥ lakṣmīdevī prītaye tu brāhmaṇānpūjayeddhanaiḥ

— प्रयत्नपूर्वक लक्ष्मी देवी की पूजा करनी चाहिए, हे रत्नदण्डधारिणी। लक्ष्मी देवी की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मणों को धन,

श्लोक 43 (padma.4.11.43)

वस्त्रालंकारभोज्यैश्च फलैर्नानाविधैस्तथा । पोष्योवाच । अत्रैव तिष्ठ भो वृद्धे राज्ञीं सुरतिचंद्रिकाम् ।

vastrālaṁkārabhojyaiśca phalairnānāvidhaistathā poṣyovāca atraiva tiṣṭha bho vṛddhe rājñīṁ suraticaṁdrikām

वस्त्र, आभूषण, भोजन और विविध फलों से पूजना चाहिए।" तब उस पोष्या ने कहा — "हे वृद्धे, तुम यहीं ठहरो; मैं रानी सुरतिचंद्रिका को —

श्लोक 44 (padma.4.11.44)

विज्ञाप्य त्वां नयिष्यामि मा क्रोधं कुरु सत्तमे । इत्युक्त्वा सा तु चार्वंगी गता राज्ञीसमीपतः ।

vijñāpya tvāṁ nayiṣyāmi mā krodhaṁ kuru sattame ityuktvā sā tu cārvaṁgī gatā rājñīsamīpataḥ

— सूचित कर तुम्हें ले जाऊँगी; हे सत्तमे, क्रोध मत करो।" ऐसा कहकर वह सुंदरांगी रानी के समीप गई।

श्लोक 45 (padma.4.11.45)

शिरस्यंजलिमाधाय पोष्या ब्रह्मन्समूलतः । आरभ्य सांगपर्यंतं यदूचे कमलालया ।

śirasyaṁjalimādhāya poṣyā brahmansamūlataḥ ārabhya sāṁgaparyaṁtaṁ yadūce kamalālayā

सिर पर अंजलि रखकर उस पोष्या ने, हे ब्रह्मन्, आदि से अंत तक कमलालया ने जो कुछ कहा था, वह सब —

श्लोक 46 (padma.4.11.46)

तत्सर्वं कथयामास राज्ञीं सुरतिचंद्रिकाम् । द्वारपालीवचः श्रुत्वा राज्ञी सुरतिचंद्रिका ।

tatsarvaṁ kathayāmāsa rājñīṁ suraticaṁdrikām dvārapālīvacaḥ śrutvā rājñī suraticaṁdrikā

— रानी सुरतिचंद्रिका को कह सुनाया। द्वारपालिका के वचन सुनकर रानी सुरतिचंद्रिका —

श्लोक 47 (padma.4.11.47)

जगाम ब्राह्मणीपार्श्वं सगर्वा प्राह सुंदर । राज्ञ्युवाच । वृद्धे ब्राह्मणि किं वृत्तं चोपदेशार्थमागता ।

jagāma brāhmaṇīpārśvaṁ sagarvā prāha suṁdara rājñyuvāca vṛddhe brāhmaṇi kiṁ vṛttaṁ copadeśārthamāgatā

— गर्व से भरी हुई ब्राह्मणी के पास गई और बोली, हे सुंदर। रानी बोली — "हे वृद्धे ब्राह्मणि, क्या बात है, तुम उपदेश देने आई हो?

श्लोक 48 (padma.4.11.48)

कथयस्व चिरं मह्यं भयं त्यक्त्वा यथासुखम् । ब्राह्मण्युवाच । तवानीतिमहं दृष्ट्वा गंतुमिच्छामि चंचला ।

kathayasva ciraṁ mahyaṁ bhayaṁ tyaktvā yathāsukham brāhmaṇyuvāca tavānītimahaṁ dṛṣṭvā gaṁtumicchāmi caṁcalā

निर्भय होकर मुझे सुखपूर्वक विस्तार से बताओ।" ब्राह्मणी बोली — "तुम्हारी अनीति देखकर, मैं चंचल स्वभाव की, अब जाना चाहती हूँ।

श्लोक 49 (padma.4.11.49)

कथयिष्यामि किं दुष्टे व्रतं परमदुर्लभम् । इंदिरावासरे चाद्य चांडालेन करोषि यत् ।

kathayiṣyāmi kiṁ duṣṭe vrataṁ paramadurlabham iṁdirāvāsare cādya cāṁḍālena karoṣi yat

दुष्टे, मैं तुम्हें क्या बताऊँ इस अत्यंत दुर्लभ व्रत के विषय में — जब आज इंदिरा के दिन ही तुम एक चांडाल के साथ यह करती हो,

श्लोक 50 (padma.4.11.50)

तद्दृष्टं मयि का दुष्टे तद्गेहे गर्वितेऽधुना । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणीवाक्यं क्रोधसंरक्तलोचना ।

taddṛṣṭaṁ mayi kā duṣṭe tadgehe garvite'dhunā tacchrutvā brāhmaṇīvākyaṁ krodhasaṁraktalocanā

— जो मैंने स्वयं देखा है, हे दुष्ट, तुम्हारे ही घर में, अभिमान से भरी हुई।" ब्राह्मणी के ये वचन सुनकर, क्रोध से लाल नेत्रों वाली रानी ने —

श्लोक 51 (padma.4.11.51)

जरंतीं ब्राह्मणीं चैव प्रहारं च चकार सा । ततः सा कमला वृद्धा क्रंदमाना पलायिता ।

jaraṁtīṁ brāhmaṇīṁ caiva prahāraṁ ca cakāra sā tataḥ sā kamalā vṛddhā kraṁdamānā palāyitā

— उस वृद्ध ब्राह्मणी पर प्रहार कर दिया। तब वह वृद्धा कमला रोती हुई वहाँ से भाग गई।

श्लोक 52 (padma.4.11.52)

क्रीडमाना ततः श्यामा ब्राह्मणीक्रन्दनध्वनिम् । आगतास्याः समीपं तु श्रुत्वा बाला तपोधना ।

krīḍamānā tataḥ śyāmā brāhmaṇīkrandanadhvanim āgatāsyāḥ samīpaṁ tu śrutvā bālā tapodhanā

उस समय खेल रही श्यामा (श्यामबाला) ने ब्राह्मणी के रुदन की ध्वनि सुनकर, वह तपस्विनी बालिका उसके समीप आई।

श्लोक 53 (padma.4.11.53)

श्यामाबालोवाच । वृद्धे व्यथेदृशी केन दत्ता तुभ्यं वदस्व मे । तस्या वचनमाकर्ण्य शोकगद्गदया गिरा ।

śyāmābālovāca vṛddhe vyathedṛśī kena dattā tubhyaṁ vadasva me tasyā vacanamākarṇya śokagadgadayā girā

श्यामाबाला बोली — "हे वृद्धे, यह कैसी पीड़ा तुम्हें किसने दी है? मुझे बताओ।" उसका यह वचन सुनकर शोक से गद्गद वाणी में —

श्लोक 54 (padma.4.11.54)

कमला कथितं सर्वं वृत्तांतं द्विजसत्तम । श्यामाबाला ततः श्रुत्वा व्रतं परमदुर्ल्लभम् ।

kamalā kathitaṁ sarvaṁ vṛttāṁtaṁ dvijasattama śyāmābālā tataḥ śrutvā vrataṁ paramadurllabham

— कमला ने सारा वृत्तांत कह सुनाया, हे द्विजसत्तम। श्यामाबाला उस अत्यंत दुर्लभ व्रत को सुनकर —

श्लोक 55 (padma.4.11.55)

शास्त्रोक्तविधिना चक्रे सश्रद्धं च सभक्तितः । त्रिवारे परिपूर्णे तु तुर्यवारे समागते ।

śāstroktavidhinā cakre saśraddhaṁ ca sabhaktitaḥ trivāre paripūrṇe tu turyavāre samāgate

— शास्त्रोक्त विधि से श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उसे किया। तीन बार पूर्ण होने पर, चौथी बार आने पर —

श्लोक 56 (padma.4.11.56)

विवाहकर्मसंसिद्धं द्विजलक्ष्मीप्रसादतः । श्रीसिद्धेश्वरदेवस्य नृपतेर्भूपतेजसः ।

vivāhakarmasaṁsiddhaṁ dvijalakṣmīprasādataḥ śrīsiddheśvaradevasya nṛpaterbhūpatejasaḥ

— द्विजों की और लक्ष्मी की कृपा से उसका विवाह-कार्य सिद्ध हुआ — तेजस्वी राजा श्रीसिद्धेश्वरदेव के —

श्लोक 57 (padma.4.11.57)

मालाधरो नाम सुतो गृहीत्वा तां गृहं गतः । अथ तस्यां गतायां तु ब्रह्मन्शृणुष्व कौतुकम् ।

mālādharo nāma suto gṛhītvā tāṁ gṛhaṁ gataḥ atha tasyāṁ gatāyāṁ tu brahmanśṛṇuṣva kautukam

— मालाधर नामक पुत्र ने उसे ग्रहण कर अपने घर ले जाया। अब वह वहाँ चली गई; हे ब्रह्मन्, आगे का कौतुक सुनो।

श्लोक 58 (padma.4.11.58)

राज्ञीगृहे च सर्वाणि स्थितानि सुबहूनि च । द्रव्याणि केन नीतानि न ज्ञातान्यपि भूसुर ।

rājñīgṛhe ca sarvāṇi sthitāni subahūni ca dravyāṇi kena nītāni na jñātānyapi bhūsura

रानी के घर में जो बहुत-सी वस्तुएँ रखी थीं, वे किसके द्वारा ले जाई गईं, हे भूसुर, यह किसी को ज्ञात नहीं हुआ।

श्लोक 59 (padma.4.11.59)

निर्वित्ता बुद्धिहीना सा चान्नवस्त्रविवर्जिता । उपविष्टा च केनापि गंतुं च दुहितुर्गृहम् ।

nirvittā buddhihīnā sā cānnavastravivarjitā upaviṣṭā ca kenāpi gaṁtuṁ ca duhiturgṛham

निर्धन और बुद्धिहीन हुई वह रानी अन्न-वस्त्र से वंचित हो गई, और किसी की प्रेरणा से अपनी पुत्री के घर जाने के लिए तैयार हुई।

श्लोक 60 (padma.4.11.60)

प्रेषयामास भर्त्तारं किंचित्प्रार्थनहेतवे । तस्य मालाधरस्यापि ग्रामे च सरसीतटे ।

preṣayāmāsa bharttāraṁ kiṁcitprārthanahetave tasya mālādharasyāpi grāme ca sarasītaṭe

उसने किसी याचना के हेतु अपने पति को पहले भेजा। वह मालाधर के गाँव में, एक सरोवर के तट पर,

श्लोक 61 (padma.4.11.61)

कालेन कियता विप्र प्रविवेश च कष्टतः । तस्माज्जलं समानेतुं तस्या दास्यः समागताः । तं दृष्ट्वा दुःखिनां श्रेष्ठं पप्रच्छुः सानुकंपिताः ।

kālena kiyatā vipra praviveśa ca kaṣṭataḥ tasmājjalaṁ samānetuṁ tasyā dāsyaḥ samāgatāḥ taṁ dṛṣṭvā duḥkhināṁ śreṣṭhaṁ papracchuḥ sānukaṁpitāḥ

— कठिनाई से कुछ समय पश्चात, हे विप्र, प्रवेश कर पाया। जल लाने के लिए वहाँ उसकी दासियाँ आईं; उस दुखियारे को देखकर उन्होंने दयापूर्वक पूछा।

श्लोक 62 (padma.4.11.62)

दास्य ऊचुः । कस्त्वं कुतः समायातो मांसरक्तविवर्ज्जितः । रूक्षांगो रूक्षकेशश्च तत्सर्वं कथयस्व नः ।

dāsya ūcuḥ kastvaṁ kutaḥ samāyāto māṁsaraktavivarjjitaḥ rūkṣāṁgo rūkṣakeśaśca tatsarvaṁ kathayasva naḥ

दासियाँ बोलीं — "तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, मांस-रक्त से रहित, रूखे शरीर और रूखे बालों वाले? यह सब हमें बताओ।"

श्लोक 63 (padma.4.11.63)

दरिद्र उवाच । श्यामाबालापिता चाहं सौराष्ट्रनगरागतः । कथयध्वं च भो दास्यः श्यामाबालासमीपतः ।

daridra uvāca śyāmābālāpitā cāhaṁ saurāṣṭranagarāgataḥ kathayadhvaṁ ca bho dāsyaḥ śyāmābālāsamīpataḥ

दरिद्र बोला — "मैं श्यामाबाला का पिता हूँ, सौराष्ट्र नगर से आया हूँ। हे दासियों, श्यामाबाला के पास जाकर यह कह दो।"

श्लोक 64 (padma.4.11.64)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कौतूहलसमन्विताः । परस्परमुखाः सर्वा जहसुः स्वपुरं गताः ।

tacchrutvā vacanaṁ tasya kautūhalasamanvitāḥ parasparamukhāḥ sarvā jahasuḥ svapuraṁ gatāḥ

उसके ये वचन सुनकर, कुतूहल से भरी हुई वे सब आपस में मुँह देखकर हँस पड़ीं और अपने घर लौट गईं।

श्लोक 65 (padma.4.11.65)

श्यामाबाला च कथितं सर्वं वृत्तं च भो द्विज । श्रुत्वैतद्वचनं तासां प्रेषयामास सेवकान् ।

śyāmābālā ca kathitaṁ sarvaṁ vṛttaṁ ca bho dvija śrutvaitadvacanaṁ tāsāṁ preṣayāmāsa sevakān

उन्होंने श्यामाबाला को सारा वृत्तांत कह सुनाया, हे द्विज। यह सुनकर उसने सेवकों को भेजा।

श्लोक 66 (padma.4.11.66)

पुष्पतैलं दिव्यवस्त्रं चंदनं पर्णवीटिकाम् । घोटकं च तथा दत्वा पितरं प्रति सुंदरी ।

puṣpatailaṁ divyavastraṁ caṁdanaṁ parṇavīṭikām ghoṭakaṁ ca tathā datvā pitaraṁ prati suṁdarī

उस सुंदरी ने अपने पिता के लिए पुष्प-तेल, दिव्य वस्त्र, चंदन, पान का बीड़ा —

श्लोक 67 (padma.4.11.67)

गत्वाथ सर्वे ते भृत्याः कृत्वा सुवेषमुत्तमम् । श्यामाबालागृहं निन्युर्देवराजगृहोपमम् ।

gatvātha sarve te bhṛtyāḥ kṛtvā suveṣamuttamam śyāmābālāgṛhaṁ ninyurdevarājagṛhopamam

— और एक घोड़ा भी भेजा। फिर वे सभी सेवक जाकर उन्हें उत्तम वेश में सजाकर, देवराज के भवन के समान —

श्लोक 68 (padma.4.11.68)

श्यामाबाला ततश्चैव पितरं दुखिनां वरम् । श्याल्यन्नं सघृतं चैव भोजयामास यत्नतः ।

śyāmābālā tataścaiva pitaraṁ dukhināṁ varam śyālyannaṁ saghṛtaṁ caiva bhojayāmāsa yatnataḥ

— श्यामाबाला के घर ले आए। तब श्यामाबाला ने उस दुखियों में श्रेष्ठ अपने पिता को घी सहित शालि-अन्न प्रयत्नपूर्वक खिलाया।

श्लोक 69 (padma.4.11.69)

तुर्येषु समतीतेषु दिवसेषु तपोधन । प्रेषयामास तं दत्वा गुप्तपात्रस्थितं धनम् ।

turyeṣu samatīteṣu divaseṣu tapodhana preṣayāmāsa taṁ datvā guptapātrasthitaṁ dhanam

चार दिन बीत जाने पर, हे तपोधन, उसने उसे गुप्त पात्र में रखा धन देकर विदा किया।

श्लोक 70 (padma.4.11.70)

ततः प्रविश्य स्वगृहे धनं पात्रान्तरस्थितम् । ददर्शांगारनिचयं रुरोद भृशदुःखितः ।

tataḥ praviśya svagṛhe dhanaṁ pātrāntarasthitam dadarśāṁgāranicayaṁ ruroda bhṛśaduḥkhitaḥ

फिर अपने घर पहुँचकर, पात्र के भीतर रखे धन को देखा तो वह केवल कोयले का ढेर निकला; अत्यंत दुखी होकर वह रोने लगा।

श्लोक 71 (padma.4.11.71)

दुहितुः सदनं यातुं निःससार गृहागतः । तत्रैव सरसीकूले प्रविवेश च दुःखिनी ।

duhituḥ sadanaṁ yātuṁ niḥsasāra gṛhāgataḥ tatraiva sarasīkūle praviveśa ca duḥkhinī

वह फिर अपनी पुत्री के घर जाने के लिए घर से निकल पड़ा। वहीं सरोवर के किनारे वह दुखियारी माता भी पहुँची।

श्लोक 72 (padma.4.11.72)

तथैनां च समानीतां यथा स्याः प्राणवल्लभाम् । तथैव पूजयामास मातृस्नेहात्पतिव्रता ।

tathaināṁ ca samānītāṁ yathā syāḥ prāṇavallabhām tathaiva pūjayāmāsa mātṛsnehātpativratā

उस पतिव्रता श्यामाबाला ने उसे भी वैसे ही ले जाकर, मातृस्नेह से, अपने प्राणों से प्रिय के समान पूजा-सम्मान किया।

श्लोक 73 (padma.4.11.73)

एतस्मिन्समये विप्र लक्ष्मीवासरमुत्तमम् । श्यामाबाला कारयितुं मनश्चक्रे च मातरम् ।

etasminsamaye vipra lakṣmīvāsaramuttamam śyāmābālā kārayituṁ manaścakre ca mātaram

इसी समय, हे विप्र, श्यामाबाला ने अपनी माता से लक्ष्मी का उत्तम व्रत करवाने का मन बनाया।

श्लोक 74 (padma.4.11.74)

तस्या माता दरिद्राणि भुक्त्वा वैकांतिकेपि च । शावकानां तु चोच्छिष्टं लक्ष्मीकोपसमन्विता ।

tasyā mātā daridrāṇi bhuktvā vaikāṁtikepi ca śāvakānāṁ tu cocchiṣṭaṁ lakṣmīkopasamanvitā

उसकी माता, जो पहले दरिद्रावस्था में एकांत में पशु-शावकों का जूठा अन्न भी खा चुकी थी, लक्ष्मी के कोप से युक्त थी —

श्लोक 75 (padma.4.11.75)

इंदिरायास्तृतीयानि वासराणि गतान्यपि । चतुर्थवासरे तां तत्कारयामास सा दृढम् ।

iṁdirāyāstṛtīyāni vāsarāṇi gatānyapi caturthavāsare tāṁ tatkārayāmāsa sā dṛḍham

— इंदिरा के तीन गुरुवार बीत जाने पर भी, चौथे गुरुवार को श्यामाबाला ने दृढ़तापूर्वक उससे वह व्रत करवाया।

श्लोक 76 (padma.4.11.76)

आगता नगरं सा वै राज्ञी सुरतिचंद्रिका । दृष्ट्वा गृहं तथा दिव्यमिंदिरायाः प्रसादतः ।

āgatā nagaraṁ sā vai rājñī suraticaṁdrikā dṛṣṭvā gṛhaṁ tathā divyamiṁdirāyāḥ prasādataḥ

जब रानी सुरतिचंद्रिका नगर में आई और इंदिरा की कृपा से घर को इतना दिव्य देखा —

श्लोक 77 (padma.4.11.77)

श्यामाबाला च विप्रेंद्र कदाचित्समये पुनः । मातुर्गृहं गता चाथ ऐश्वर्यस्य दिदृक्षया ।

śyāmābālā ca vipreṁdra kadācitsamaye punaḥ māturgṛhaṁ gatā cātha aiśvaryasya didṛkṣayā

— तब, हे विप्रेंद्र, एक बार पुनः श्यामाबाला अपनी माता के ऐश्वर्य को देखने की इच्छा से उसके घर गई।

श्लोक 78 (padma.4.11.78)

श्यामाबालां ततो दूराद्दृष्ट्वा संकुपिता च सा । न पश्यामि मुखं तस्या इत्युक्त्वालक्षिता स्थिता ।

śyāmābālāṁ tato dūrāddṛṣṭvā saṁkupitā ca sā na paśyāmi mukhaṁ tasyā ityuktvālakṣitā sthitā

उसे दूर से देखकर माता क्रोधित हो गई और "मैं इसका मुँह नहीं देखूँगी" ऐसा कहकर छिपकर खड़ी हो गई।

श्लोक 79 (padma.4.11.79)

गत्वा गृहांतरालं च गृहीत्वा सैंधवं च सा । आगता स्वगृहं किंचित्तूष्णीं लक्ष्मीसमाश्रितम् ।

gatvā gṛhāṁtarālaṁ ca gṛhītvā saiṁdhavaṁ ca sā āgatā svagṛhaṁ kiṁcittūṣṇīṁ lakṣmīsamāśritam

वह घर के भीतरी कक्ष में जाकर सेंधा नमक लेकर आई और चुपचाप, लक्ष्मी के आश्रय से युक्त, अपने घर में कुछ लेकर आई।

श्लोक 80 (padma.4.11.80)

राजा स्वामी च पप्रच्छ तां साध्वीं पतिदेवताम् । किमानीतं त्वया कांते कथयस्व ममाग्रतः ।

rājā svāmī ca papraccha tāṁ sādhvīṁ patidevatām kimānītaṁ tvayā kāṁte kathayasva mamāgrataḥ

राजा (उसके पति मालाधर) ने उस साध्वी पतिव्रता से पूछा — "हे प्रिये, तुम क्या लाई हो? मुझे बताओ।"

श्लोक 81 (padma.4.11.81)

कांतोवाच । राज्यसारं समानीतं दर्शयिष्यामि भोजने । इत्युक्त्वा सा तदा पाकं कृत्वा च लवणं विना ।

kāṁtovāca rājyasāraṁ samānītaṁ darśayiṣyāmi bhojane ityuktvā sā tadā pākaṁ kṛtvā ca lavaṇaṁ vinā

प्रिया ने कहा — "मैं राज्य का सार लाई हूँ; भोजन में दिखाऊँगी।" ऐसा कहकर उसने नमक के बिना ही भोजन पकाया,

श्लोक 82 (padma.4.11.82)

अन्नादिकं ततो दत्वा मालाधराय भूभुजे । ततो मालाधरो राजा व्यंजनं लवणवर्जितम् ।

annādikaṁ tato datvā mālādharāya bhūbhuje tato mālādharo rājā vyaṁjanaṁ lavaṇavarjitam

— और वह अन्न आदि राजा मालाधर को परोसा। तब राजा मालाधर ने नमक-रहित उस व्यंजन को —

श्लोक 83 (padma.4.11.83)

भुक्त्वा वैगुण्यतां प्राप्तो राज्यसारं ददौ च सा । तदा हृष्टमना राजा भोजनं कृतवान्द्विज ।

bhuktvā vaiguṇyatāṁ prāpto rājyasāraṁ dadau ca sā tadā hṛṣṭamanā rājā bhojanaṁ kṛtavāndvija

— खाकर उसमें दोष पाया; तब उसने राज्य का सार दिया। तब प्रसन्नचित्त होकर राजा ने भोजन किया, हे द्विज।

श्लोक 84 (padma.4.11.84)

प्रशशंस च तां नारीं धन्याधन्या इति ब्रुवन् । एतद्व्रतं च या नारी न करोति महादरात् ।

praśaśaṁsa ca tāṁ nārīṁ dhanyādhanyā iti bruvan etadvrataṁ ca yā nārī na karoti mahādarāt

और उस स्त्री की प्रशंसा करते हुए "धन्य है, परम धन्य है" कहा। जो स्त्री इस व्रत को अत्यंत श्रद्धा से नहीं करती —

श्लोक 85 (padma.4.11.85)

जन्मजन्मनि सा नारी दरिद्रा दुर्भगा भवेत् । इदं या शृणुयाद्भक्त्या पठेद्यो वा समाहितः ।

janmajanmani sā nārī daridrā durbhagā bhavet idaṁ yā śṛṇuyādbhaktyā paṭhedyo vā samāhitaḥ

— वह स्त्री जन्म-जन्म में दरिद्र और दुर्भाग्यशाली होती है। जो कोई इसे भक्तिपूर्वक सुनता या एकाग्रचित्त होकर पढ़ता है,

श्लोक 86 (padma.4.11.86)

सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो लक्ष्मीलोकं लभेच्च सः । इमां व्रतकथां या तु न श्रुत्वा क्रियते व्रतम् । तस्या व्रतफलं चैव नश्यत्येव न संशयः ।

sarvapāpairvinirmukto lakṣmīlokaṁ labhecca saḥ imāṁ vratakathāṁ yā tu na śrutvā kriyate vratam tasyā vrataphalaṁ caiva naśyatyeva na saṁśayaḥ

वह सब पापों से मुक्त होकर लक्ष्मीलोक को प्राप्त करता है। परंतु जो इस व्रत-कथा को सुने बिना ही व्रत करता है, उसके व्रत का फल निश्चय ही नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

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