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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 12

ब्राह्मण-पालन

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (padma.4.12.1)

शौनक उवाच । केन पुण्येन भो सूत चान्येन गतपातकः । नरो याति हरेः स्थानं तद्वदस्वानुकंपया ।

śaunaka uvāca kena puṇyena bho sūta cānyena gatapātakaḥ naro yāti hareḥ sthānaṁ tadvadasvānukaṁpayā

शौनक बोले — हे सूत, किस पुण्य से तथा और किस उपाय से मनुष्य पापरहित होकर हरि के धाम को जाता है? कृपापूर्वक यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.4.12.2)

सूत उवाच । ब्राह्मणस्य धनैः प्राणान्प्राणैर्वापि द्विजोत्तम । रक्षां करोति यो मर्त्यो विष्णुलोकं स गच्छति ।

sūta uvāca brāhmaṇasya dhanaiḥ prāṇānprāṇairvāpi dvijottama rakṣāṁ karoti yo martyo viṣṇulokaṁ sa gacchati

सूत बोले — हे द्विजोत्तम, जो मनुष्य धन से अथवा अपने प्राणों से भी ब्राह्मण के प्राणों की रक्षा करता है, वह विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 3 (padma.4.12.3)

पुरा राजा दीननाथो द्वापरे संज्ञके युगे । आसीदपुत्रो बलवान्वैष्णवः स तु याजकः ।

purā rājā dīnanātho dvāpare saṁjñake yuge āsīdaputro balavānvaiṣṇavaḥ sa tu yājakaḥ

पूर्वकाल में द्वापर युग में दीननाथ नामक राजा था, जो बलवान, वैष्णव और यज्ञकर्ता था, परंतु उसके कोई पुत्र नहीं था।

श्लोक 4 (padma.4.12.4)

एकदा गालवं राजा पप्रच्छ विनयान्वितः । केन पुण्येन जायेत पुत्रो वै करुणार्णव ।

ekadā gālavaṁ rājā papraccha vinayānvitaḥ kena puṇyena jāyeta putro vai karuṇārṇava

एक दिन विनयपूर्वक राजा ने गालव मुनि से पूछा — "हे करुणासागर, किस पुण्य से पुत्र प्राप्त होता है?

श्लोक 5 (padma.4.12.5)

वदस्व मुनिशार्दूल करिष्यामि तवाज्ञया । येषां नृणां नास्ति सुतो जीवनं हि निरर्थकम् ।

vadasva muniśārdūla kariṣyāmi tavājñayā yeṣāṁ nṛṇāṁ nāsti suto jīvanaṁ hi nirarthakam

हे मुनिश्रेष्ठ, मुझे बताइए, मैं आपकी आज्ञा के अनुसार करूँगा। जिन मनुष्यों के पुत्र नहीं होता, उनका जीवन निरर्थक है।"

श्लोक 6 (padma.4.12.6)

गालव उवाच । राजन्शृणुष्वावहितो यत्पृष्टोऽस्मि तवाग्रतः । कथयामि समासेन पुत्रस्योद्भवकारणम् ।

gālava uvāca rājanśṛṇuṣvāvahito yatpṛṣṭo'smi tavāgrataḥ kathayāmi samāsena putrasyodbhavakāraṇam

गालव बोले — "हे राजन्, ध्यानपूर्वक सुनो; तुमने जो पूछा है, वह मैं संक्षेप में पुत्रोत्पत्ति का कारण बताता हूँ।

श्लोक 7 (padma.4.12.7)

क्रतुं च नरमेधाख्यं कुरुष्व राजसत्तम । तदा ते संततिः स्याद्वै सर्वलक्षणसंयुता ।

kratuṁ ca naramedhākhyaṁ kuruṣva rājasattama tadā te saṁtatiḥ syādvai sarvalakṣaṇasaṁyutā

हे राजश्रेष्ठ, नरमेध नामक क्रतु करो; तब तुम्हारी संतान समस्त शुभ लक्षणों से युक्त होगी।"

श्लोक 8 (padma.4.12.8)

राजोवाच । नरमेधं महायज्ञं यज्ञानां प्रवरं द्विज । कीदृशं नरमानीय करिष्यामि गुरो वद ।

rājovāca naramedhaṁ mahāyajñaṁ yajñānāṁ pravaraṁ dvija kīdṛśaṁ naramānīya kariṣyāmi guro vada

राजा बोले — "हे द्विज, यज्ञों में श्रेष्ठ इस महायज्ञ नरमेध के लिए कैसे मनुष्य को लाकर मैं यह करूँ, हे गुरो, बताइए।"

श्लोक 9 (padma.4.12.9)

गालव उवाच । सुंदरांगः सुवदनः समस्तशास्त्रविद्भवेत् । सत्कुले यदि जातः स तदा यज्ञाय कल्पते ।

gālava uvāca suṁdarāṁgaḥ suvadanaḥ samastaśāstravidbhavet satkule yadi jātaḥ sa tadā yajñāya kalpate

गालव बोले — "जो सुंदर अंगों वाला, सुमुख और समस्त शास्त्रों का ज्ञाता हो, यदि वह सत्कुल में उत्पन्न हुआ हो, तभी वह यज्ञ के योग्य होता है।

श्लोक 10 (padma.4.12.10)

अंगहीनः कृष्णवर्णो मूर्खो योग्यो भवेन्नहि । इत्युक्ते गालवे विप्र स राजा मनुजेश्वरः ।

aṁgahīnaḥ kṛṣṇavarṇo mūrkho yogyo bhavennahi ityukte gālave vipra sa rājā manujeśvaraḥ

जो अंगहीन, काले वर्ण का या मूर्ख हो, वह योग्य नहीं होता।" गालव मुनि के ऐसा कहने पर, हे विप्र, मनुजेश्वर उस राजा ने —

श्लोक 11 (padma.4.12.11)

प्रेषयामास दूतांश्च कथयित्वा मुनेर्वचः । द्रविणं बहु दत्वा च गालवप्रमुखान्द्विजान् ।

preṣayāmāsa dūtāṁśca kathayitvā munervacaḥ draviṇaṁ bahu datvā ca gālavapramukhāndvijān

— मुनि के वचन कहकर दूतों को भेजा, और बहुत धन देकर गालव आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों को —

श्लोक 12 (padma.4.12.12)

यज्ञार्थे वरयामास समस्तशास्त्रपारगान् । ततो राजाज्ञया दूताः देशं देशं मुदा गताः ।

yajñārthe varayāmāsa samastaśāstrapāragān tato rājājñayā dūtāḥ deśaṁ deśaṁ mudā gatāḥ

— यज्ञ के लिए, जो समस्त शास्त्रों में पारंगत थे, वरण किया। फिर राजा की आज्ञा से दूत हर्षपूर्वक देश-देश गए,

श्लोक 13 (padma.4.12.13)

ग्रामे ग्रामे द्विजश्रेष्ठ पत्तनेऽपि समाहिताः । कुत्रापि न प्राप्तवंतो गता जनपदं ततः ।

grāme grāme dvijaśreṣṭha pattane'pi samāhitāḥ kutrāpi na prāptavaṁto gatā janapadaṁ tataḥ

गाँव-गाँव, हे द्विजश्रेष्ठ, और नगरों में भी सावधानीपूर्वक ढूँढते रहे — कहीं भी वे उपयुक्त पुरुष नहीं पा सके, तब वे दूसरे जनपद में गए,

श्लोक 14 (padma.4.12.14)

नाम्ना दशपुरं विप्र प्रकीर्णं गुणिभिर्द्विजैः । यत्र नारीः सुकेशीश्च मृगशावक चक्षुषः ।

nāmnā daśapuraṁ vipra prakīrṇaṁ guṇibhirdvijaiḥ yatra nārīḥ sukeśīśca mṛgaśāvaka cakṣuṣaḥ

जिसका नाम दशपुर था, हे विप्र, जो गुणवान द्विजों से भरा हुआ था, जहाँ सुंदर केश वाली, मृगशावक के समान नेत्रों वाली स्त्रियों को —

श्लोक 15 (padma.4.12.15)

दृष्ट्वा मुह्यंति पुरुषाश्चंद्रमुख्यश्च ता यतः । तस्मिन्पुरे मनोरम्ये कृष्णदेव इति द्विजः ।

dṛṣṭvā muhyaṁti puruṣāścaṁdramukhyaśca tā yataḥ tasminpure manoramye kṛṣṇadeva iti dvijaḥ

— देखकर पुरुष मोहित हो जाते थे, और चंद्रमुखी स्त्रियाँ भी। उस मनोरम नगर में कृष्णदेव नामक एक ब्राह्मण था,

श्लोक 16 (padma.4.12.16)

आसीत्पुत्रैस्त्रिभिः सार्द्धं भार्यया च सुशीलया । वैष्णवः प्रियवादी च विष्णुपूजारतः सदा ।

āsītputraistribhiḥ sārddhaṁ bhāryayā ca suśīlayā vaiṣṇavaḥ priyavādī ca viṣṇupūjārataḥ sadā

जो अपने तीन पुत्रों और सुशील पत्नी के साथ रहता था — वैष्णव, प्रियवादी, सदा विष्णु-पूजा में तत्पर,

श्लोक 17 (padma.4.12.17)

साग्निकः पितृभक्तश्च वैष्णवानां प्रियंकरः । प्रार्थनां चक्रुरथ ते राज्ञो दूता द्विजोत्तमम् ।

sāgnikaḥ pitṛbhaktaśca vaiṣṇavānāṁ priyaṁkaraḥ prārthanāṁ cakruratha te rājño dūtā dvijottamam

अग्निहोत्री, पितरों का भक्त और वैष्णवों का प्रियकारी। तब राजा के दूतों ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से प्रार्थना की —

श्लोक 18 (padma.4.12.18)

पुत्रं देहीति देहीति वद ब्राह्मणसत्तम । नास्ति राज्ञो द्विजश्रेष्ठ पुत्रः संतापनाशनः ।

putraṁ dehīti dehīti vada brāhmaṇasattama nāsti rājño dvijaśreṣṭha putraḥ saṁtāpanāśanaḥ

"हे ब्राह्मणसत्तम, अपना पुत्र हमें दे दो, दे दो। हे द्विजश्रेष्ठ, राजा के पास शोक मिटाने वाला कोई पुत्र नहीं है।

श्लोक 19 (padma.4.12.19)

तदर्थं नरमेधाख्ये यज्ञेभव स दीक्षितः । नेष्यामस्तव पुत्रं वै बलिं दातुं महाक्रतौ ।

tadarthaṁ naramedhākhye yajñebhava sa dīkṣitaḥ neṣyāmastava putraṁ vai baliṁ dātuṁ mahākratau

इसीलिए वह नरमेध नामक यज्ञ के लिए दीक्षित हुआ है। हम तुम्हारे पुत्र को उस महायज्ञ में बलि देने के लिए ले जाएँगे।

श्लोक 20 (padma.4.12.20)

सुवर्णानां चतुर्लक्षं ब्रह्मन्नय समाहितः । सुखेन यदि दातव्यो नो पुत्रः पुत्रलालसात् ।

suvarṇānāṁ caturlakṣaṁ brahmannaya samāhitaḥ sukhena yadi dātavyo no putraḥ putralālasāt

हे ब्रह्मन्, सावधानी से चार लाख स्वर्ण-मुद्राएँ ले लो, यदि पुत्र की लालसा के कारण तुम सुखपूर्वक हमें पुत्र दे सको —

श्लोक 21 (padma.4.12.21)

तदा बलेन नेष्यामो राजाज्ञाकारिणो वयम् । दूतानां वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणौ शोकविह्वलौ ।

tadā balena neṣyāmo rājājñākāriṇo vayam dūtānāṁ vacanaṁ śrutvā brāhmaṇau śokavihvalau

— नहीं तो, राजा की आज्ञा पालन करने वाले हम, बलपूर्वक ले जाएँगे।" दूतों के ये वचन सुनकर वे दोनों ब्राह्मण शोक से विह्वल —

श्लोक 22 (padma.4.12.22)

अभूतां विगतप्राणाविव संशयमानसौ । किं धनेन सुवर्णेन जीवनेनापि सद्मना । प्रोवाचेदं वचः सोऽपि ब्राह्मणो राजपूरुषान् ।

abhūtāṁ vigataprāṇāviva saṁśayamānasau kiṁ dhanena suvarṇena jīvanenāpi sadmanā provācedaṁ vacaḥ so'pi brāhmaṇo rājapūruṣān

— हो गए, मानो प्राणरहित से हो गए हों, मन में संशययुक्त। "धन से, स्वर्ण से, यहाँ तक कि जीवन और घर से भी क्या लाभ?" ऐसा कहकर उस ब्राह्मण ने राजपुरुषों से यह कहा —

श्लोक 23 (padma.4.12.23)

ब्राह्मण उवाच । यदि दूताः समानेतुं पुत्रं शोकतमोपहम् । आगता निश्चितं यूयं शृणुध्वं वचनं मम ।

brāhmaṇa uvāca yadi dūtāḥ samānetuṁ putraṁ śokatamopaham āgatā niścitaṁ yūyaṁ śṛṇudhvaṁ vacanaṁ mama

ब्राह्मण बोला — "यदि तुम दूत मेरे पुत्र को ले जाने के लिए ही आए हो, शोक के अंधकार से युक्त होकर, तो निश्चय ही मेरी बात सुनो।

श्लोक 24 (padma.4.12.24)

स्थित्वा पृथिव्यां को भ्रष्टां राजाज्ञां कर्तुमिच्छति । पुत्रं हित्वा किंतु यूयं वृद्धं मां नयत द्विजम् ।

sthitvā pṛthivyāṁ ko bhraṣṭāṁ rājājñāṁ kartumicchati putraṁ hitvā kiṁtu yūyaṁ vṛddhaṁ māṁ nayata dvijam

इस पृथ्वी पर रहकर राजा की आज्ञा को भ्रष्ट करने की इच्छा कौन करेगा? परंतु मेरे पुत्र को छोड़कर मुझ वृद्ध द्विज को ही ले जाओ।"

श्लोक 25 (padma.4.12.25)

इति तस्य वचः श्रुत्वा दूताः क्रोधसमन्विताः । बलात्कारेण तद्गेहे सुवर्णानि च तत्यजुः ।

iti tasya vacaḥ śrutvā dūtāḥ krodhasamanvitāḥ balātkāreṇa tadgehe suvarṇāni ca tatyajuḥ

उसके ऐसे वचन सुनकर दूत क्रोध से भर गए और बलपूर्वक स्वर्ण-मुद्राओं को उसके घर में ही छोड़ दिया,

श्लोक 26 (padma.4.12.26)

यदा नेतुं मनश्चक्रुस्तत्पुत्रं किल ते क्रुधा । बद्धांजलिपुटोभूत्वा रुदन्प्रोवोच स द्विजः ।

yadā netuṁ manaścakrustatputraṁ kila te krudhā baddhāṁjalipuṭobhūtvā rudanprovoca sa dvijaḥ

और क्रोधवश उसके पुत्र को ही ले जाने का मन बना लिया। तब वह द्विज हाथ जोड़कर रोता हुआ बोला —

श्लोक 27 (padma.4.12.27)

पुत्राणां ज्येष्ठपुत्रं मे हित्वान्यं पुत्रमुत्तमम् । नयतेति वचो वक्तुं वक्त्रेनायाति हे जनाः ।

putrāṇāṁ jyeṣṭhaputraṁ me hitvānyaṁ putramuttamam nayateti vaco vaktuṁ vaktrenāyāti he janāḥ

"मेरे ज्येष्ठ पुत्र को छोड़कर मेरे किसी अन्य श्रेष्ठ पुत्र को ले जाओ" — यह कहते-कहते उसके मुख से यह वचन निकल पड़ा, हे जनो!

श्लोक 28 (padma.4.12.28)

द्विजस्य वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणीं रुदतीं सतीम् । प्रोचुर्दूताः कनीयांसं पुत्रं देहीति सत्तम ।

dvijasya vacanaṁ śrutvā brāhmaṇīṁ rudatīṁ satīm procurdūtāḥ kanīyāṁsaṁ putraṁ dehīti sattama

द्विज के वचन सुनकर और उसकी रोती हुई साध्वी पत्नी को देखकर, दूतों ने कहा, हे सत्तम — "छोटे पुत्र को दे दो।"

श्लोक 29 (padma.4.12.29)

तेषामिति वचः श्रुत्वा ब्राह्मणी भूमितस्तदा । पपात वात्यया सार्द्धं रंभेव भृशदुःखिनी ।

teṣāmiti vacaḥ śrutvā brāhmaṇī bhūmitastadā papāta vātyayā sārddhaṁ raṁbheva bhṛśaduḥkhinī

उनके ऐसे वचन सुनकर वह ब्राह्मणी उसी क्षण भूमि पर, तूफान से टूटे हुए केले के वृक्ष के समान, अत्यंत दुखी होकर गिर पड़ी,

श्लोक 30 (padma.4.12.30)

मुद्गरं सा समादाय मौलौ चाताडयद्बलात् । कनिष्ठं मत्सुतं दूता नापि दास्यामि सर्वथा ।

mudgaraṁ sā samādāya maulau cātāḍayadbalāt kaniṣṭhaṁ matsutaṁ dūtā nāpi dāsyāmi sarvathā

और मूसल उठाकर उसने अपने ही सिर पर बलपूर्वक प्रहार किया, कहते हुए — "हे दूतों, मैं अपने सबसे छोटे पुत्र को किसी भी तरह नहीं दूँगी!"

श्लोक 31 (padma.4.12.31)

एतस्मिन्समये विप्र विप्रस्य मध्यमः सुतः । प्रोवाच विनयाविष्टः प्रणम्य पितरौ रुदन् ।

etasminsamaye vipra viprasya madhyamaḥ sutaḥ provāca vinayāviṣṭaḥ praṇamya pitarau rudan

इसी समय, हे विप्र, उस ब्राह्मण के मंझले पुत्र ने विनयपूर्वक, माता-पिता को प्रणाम कर, रोते हुए कहा —

श्लोक 32 (padma.4.12.32)

माता यदि विषं दद्यात्पित्रा विक्रीयते सुतः । राजा हरति सर्वस्वं कस्तत्र पालको भवेत् ।

mātā yadi viṣaṁ dadyātpitrā vikrīyate sutaḥ rājā harati sarvasvaṁ kastatra pālako bhavet

"यदि माता विष देने लगे, पिता पुत्र को बेचने लगे, राजा सब कुछ छीन लेने लगे — तो फिर वहाँ रक्षक कौन होगा?

श्लोक 33 (padma.4.12.33)

इत्युक्त्वा तत्सुतो मूर्ध्ना प्रणम्य पितरौ सह । दूतैर्जगाम त्वरितै राज्ञोऽस्य दीक्षितस्य च ।

ityuktvā tatsuto mūrdhnā praṇamya pitarau saha dūtairjagāma tvaritai rājño'sya dīkṣitasya ca

ऐसा कहकर उस पुत्र ने माता-पिता दोनों को सिर झुकाकर प्रणाम किया और शीघ्रता करने वाले उन दूतों के साथ उस दीक्षित राजा के पास चला गया।

श्लोक 34 (padma.4.12.34)

अथ तौ ब्राह्मणौ पुत्रविच्छेदक्लिष्टमानसौ । रुदित्वा च रुदित्वा च अंधभावं प्रजग्मतुः ।

atha tau brāhmaṇau putravicchedakliṣṭamānasau ruditvā ca ruditvā ca aṁdhabhāvaṁ prajagmatuḥ

तब वे दोनों ब्राह्मण, पुत्र-वियोग से क्लिष्टमन, रोते-रोते अंधे हो गए।

श्लोक 35 (padma.4.12.35)

अथ ते पथ्यगच्छंत विश्वामित्रमुनेः किल । आश्रमं शिष्ययुक्तं च सेवितं मृगशावकैः ।

atha te pathyagacchaṁta viśvāmitramuneḥ kila āśramaṁ śiṣyayuktaṁ ca sevitaṁ mṛgaśāvakaiḥ

फिर वे (दूत बालक सहित) मार्ग में विश्वामित्र मुनि के आश्रम पर पहुँचे, जो शिष्यों से युक्त और मृगशावकों से सेवित था।

श्लोक 36 (padma.4.12.36)

स मुनी राजपुरुषान्दृष्ट्वा पप्रच्छ सादरम् । के यूयं हो कुत्र गता यथाका वृत्तिरुच्यताम् ।

sa munī rājapuruṣāndṛṣṭvā papraccha sādaram ke yūyaṁ ho kutra gatā yathākā vṛttirucyatām

उन मुनि ने राजपुरुषों को देखकर आदरपूर्वक पूछा — "तुम कौन हो, कहाँ जा रहे हो, तुम्हारी वृत्ति कैसी है, यह बताओ।"

श्लोक 37 (padma.4.12.37)

राजदूता ऊचुः । शृणुष्वावहितो विप्र राज्ञः पुत्रो न जायते । तदर्थं नरमेधाख्ये यज्ञे राजा सुदीक्षितः ।

rājadūtā ūcuḥ śṛṇuṣvāvahito vipra rājñaḥ putro na jāyate tadarthaṁ naramedhākhye yajñe rājā sudīkṣitaḥ

राजदूत बोले — "हे विप्र, ध्यानपूर्वक सुनो — राजा के कोई पुत्र नहीं है। इसीलिए राजा नरमेध नामक यज्ञ के लिए भलीभाँति दीक्षित हुआ है;

श्लोक 38 (padma.4.12.38)

नयामस्तत्र बल्यर्थमिमं ब्राह्मणपुत्रकम् । इति तेषां वचः श्रुत्वा स विप्रः सदयोऽभवत् ।

nayāmastatra balyarthamimaṁ brāhmaṇaputrakam iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā sa vipraḥ sadayo'bhavat

हम इस ब्राह्मण-पुत्र को वहाँ बलि के लिए ले जा रहे हैं।" उनके ये वचन सुनकर वह ब्राह्मण (मुनि) करुणा से भर गया।

श्लोक 39 (padma.4.12.39)

प्राणा ममापि गच्छंतु सुखी भवतु बालकः । बालकार्थे द्विजार्थे च स्वाम्यर्थे ये जना इह ।

prāṇā mamāpi gacchaṁtu sukhī bhavatu bālakaḥ bālakārthe dvijārthe ca svāmyarthe ye janā iha

(उसने सोचा —) "मेरे भी प्राण चले जाएँ, पर यह बालक सुखी रहे। बालक के लिए, द्विज के लिए, स्वामी के लिए जो लोग यहाँ —

श्लोक 40 (padma.4.12.40)

त्यजन्ति तृणवत्प्राणांस्तेषां लोकाः सनातनाः । विमृश्येति मुनिः स्वांते स प्रोवाच द्विजर्षभः ।

tyajanti tṛṇavatprāṇāṁsteṣāṁ lokāḥ sanātanāḥ vimṛśyeti muniḥ svāṁte sa provāca dvijarṣabhaḥ

— तिनके के समान प्राणों का त्याग करते हैं, उन्हें सनातन लोक प्राप्त होते हैं।" ऐसा मन में विचार कर वह द्विजश्रेष्ठ मुनि बोले —

श्लोक 41 (padma.4.12.41)

यज्ञे बलिं समादातुमिमं ब्राह्मणबालकम् । हित्वा मां नयथाथाशु ह्ययं बालक उत्तमः ।

yajñe baliṁ samādātumimaṁ brāhmaṇabālakam hitvā māṁ nayathāthāśu hyayaṁ bālaka uttamaḥ

"यज्ञ में बलि के लिए इस ब्राह्मण-बालक को ले जाने के बजाय, मुझे लेकर शीघ्र चलो — क्योंकि यह उत्तम बालक —

श्लोक 42 (padma.4.12.42)

संसारे जन्मसंप्राप्य न लब्धं सुखमत्र च । अनेन बालकेनापि मरिष्यति कथं त्वयम् ।

saṁsāre janmasaṁprāpya na labdhaṁ sukhamatra ca anena bālakenāpi mariṣyati kathaṁ tvayam

— संसार में जन्म पाकर अभी तक सुख नहीं पा सका है। इस बालक के साथ भी यह लोक कैसे मरने देगा?

श्लोक 43 (padma.4.12.43)

आगतेऽस्मिन्गृहाद्दूताः पितरावस्य दुःखितौ । हतभाग्यौ गतो नूनं यमस्येव गृहं प्रति ।

āgate'smingṛhāddūtāḥ pitarāvasya duḥkhitau hatabhāgyau gato nūnaṁ yamasyeva gṛhaṁ prati

जब दूत बिना बालक के घर आएँगे, तब इसके दुखी माता-पिता निश्चय ही, अभागे होकर, मानो यमराज के घर की ओर ही चले जाएँगे।"

श्लोक 44 (padma.4.12.44)

एवं तस्य वचः श्रुत्वा दूताः प्रोचुरथ द्विजम् । भूपालस्य विनाज्ञां वै दीननाथस्य भूसुर ।

evaṁ tasya vacaḥ śrutvā dūtāḥ procuratha dvijam bhūpālasya vinājñāṁ vai dīnanāthasya bhūsura

उसके ऐसे वचन सुनकर दूतों ने उस द्विज से कहा — "हे भूसुर, राजा की आज्ञा के बिना, हे प्राज्ञ,

श्लोक 45 (padma.4.12.45)

नेतुं त्वां पलितं प्राज्ञ नेष्यामो हि कथं वयम् । एवमुक्त्वा च ते दूता जग्मू राज्ञः पुरीं तदा ।

netuṁ tvāṁ palitaṁ prājña neṣyāmo hi kathaṁ vayam evamuktvā ca te dūtā jagmū rājñaḥ purīṁ tadā

हम तुम श्वेतकेश वाले को कैसे ले जा सकते हैं?" ऐसा कहकर वे दूत तब बालक सहित राजा की नगरी को चले गए।

श्लोक 46 (padma.4.12.46)

स मुनिर्दूतसंघैश्च गतवान्यज्ञमंदिरम् । राजानं कथयामासुर्दूता विप्रस्य चेष्टितम् ।

sa munirdūtasaṁghaiśca gatavānyajñamaṁdiram rājānaṁ kathayāmāsurdūtā viprasya ceṣṭitam

वह मुनि भी दूतों के समूह के साथ यज्ञमंदिर को गए। दूतों ने राजा से उस विप्र (मुनि) की चेष्टा कह सुनाई।

श्लोक 47 (padma.4.12.47)

तच्छ्रुत्वाशंकितमनाः प्रोवाचेदं वचः स तम् । मुने यद्यपि मे यज्ञे कृते पुत्रो भविष्यति ।

tacchrutvāśaṁkitamanāḥ provācedaṁ vacaḥ sa tam mune yadyapi me yajñe kṛte putro bhaviṣyati

यह सुनकर, मन में आशंकित होकर, राजा ने उनसे यह वचन कहा — "हे मुने, यदि मेरे यज्ञ करने से मुझे पुत्र प्राप्त हो भी जाए,

श्लोक 48 (padma.4.12.48)

बलिं विनापि भो ब्रह्मन्तदा विप्रसुतं नय ।

baliṁ vināpi bho brahmantadā viprasutaṁ naya

तो भी, हे ब्रह्मन्, बलि के बिना ही उस विप्र-पुत्र को वापस ले जाओ।"

श्लोक 49 (padma.4.12.49)

मुनिरुवाच । यज्ञे त्वया कृते राजन्महापुत्रो भविष्यति । अत्र ते संशयो मा भूदमोघमपि दर्शनम् ।

muniruvāca yajñe tvayā kṛte rājanmahāputro bhaviṣyati atra te saṁśayo mā bhūdamoghamapi darśanam

मुनि बोले — "हे राजन्, यज्ञ करने से तुम्हें महान पुत्र प्राप्त होगा। इसमें तुम्हें कोई संदेह न रहे; यह दर्शन भी कभी निष्फल नहीं होता।"

श्लोक 50 (padma.4.12.50)

इति तस्य वचः श्रुत्वा राजात्यंतसहर्षकः । चक्रे पूर्णाहुतिं यज्ञे समस्तैर्मुनिभिः सह ।

iti tasya vacaḥ śrutvā rājātyaṁtasaharṣakaḥ cakre pūrṇāhutiṁ yajñe samastairmunibhiḥ saha

उनके ये वचन सुनकर राजा अत्यंत हर्षित हुआ और समस्त मुनियों के साथ यज्ञ में पूर्णाहुति दी।

श्लोक 51 (padma.4.12.51)

अथातः स मुनिः श्रेष्ठो ब्राह्मणस्य सुतं च तम् । गृह्य दशपुरं नाम नगरं गतवांस्तदा ।

athātaḥ sa muniḥ śreṣṭho brāhmaṇasya sutaṁ ca tam gṛhya daśapuraṁ nāma nagaraṁ gatavāṁstadā

फिर उस श्रेष्ठ मुनि ने ब्राह्मण के पुत्र को साथ लेकर दशपुर नामक नगर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 52 (padma.4.12.52)

भवनं तस्य गत्वा च उक्तवान्वचनं मुनिः । गृहे त्वं तिष्ठसे विप्र तिष्ठामि मृतवन्मुने ।

bhavanaṁ tasya gatvā ca uktavānvacanaṁ muniḥ gṛhe tvaṁ tiṣṭhase vipra tiṣṭhāmi mṛtavanmune

उसके घर पहुँचकर मुनि ने कहा — "हे विप्र, तुम घर में ही रहते हो, और मैं मृतक के समान रहता हूँ, हे मुने —

श्लोक 53 (padma.4.12.53)

राजा बलेन मे पुत्रं नीतवान्किं करोम्यहम् । पुत्रे गते च भो विप्र दंपत्योरावयोः पुनः ।

rājā balena me putraṁ nītavānkiṁ karomyaham putre gate ca bho vipra daṁpatyorāvayoḥ punaḥ

राजा बलपूर्वक मेरे पुत्र को ले गया, अब मैं क्या करूँ?" पुत्र के चले जाने पर, हे विप्र, उन दोनों दंपती के —

श्लोक 54 (padma.4.12.54)

गतानि चांधभावं वै क्रंदनैर्लोचनान्यपि । अथासौ मुनिशार्दूलः पुत्रं पश्य नयेति च ।

gatāni cāṁdhabhāvaṁ vai kraṁdanairlocanānyapi athāsau muniśārdūlaḥ putraṁ paśya nayeti ca

— नेत्र भी रोते-रोते अंधे हो गए थे। तब वह मुनिश्रेष्ठ "अपने पुत्र को देखो" कहते हुए —

श्लोक 55 (padma.4.12.55)

उक्तवांस्तौ यदा विप्र ब्राह्मणौ जातहर्षकौ । पुत्रायाकारणं कृत्वा गतावेतौ बहिः क्षणात् ।

uktavāṁstau yadā vipra brāhmaṇau jātaharṣakau putrāyākāraṇaṁ kṛtvā gatāvetau bahiḥ kṣaṇāt

— जब यह कहा, हे विप्र, तब वे दोनों हर्षित ब्राह्मण-दंपती अपने पुत्र के आने की खुशी में क्षणभर में बाहर निकल आए।

श्लोक 56 (padma.4.12.56)

मुनेर्वचनसिद्धित्वात्तत्क्षणं लोचनं तयोः । आलोकं तु गतं तूर्णं पुत्रस्य दर्शनादपि ।

munervacanasiddhitvāttatkṣaṇaṁ locanaṁ tayoḥ ālokaṁ tu gataṁ tūrṇaṁ putrasya darśanādapi

मुनि के वचन की सिद्धि से, उसी क्षण उनकी आँखें, पुत्र के दर्शन मात्र से, शीघ्र दृष्टि पा गईं।

श्लोक 57 (padma.4.12.57)

पुत्रस्य मुखपद्मं तौ लोचनैरलिसंनिभैः । पीत्वा मुनिं चिरंतं च नमस्कृत्य पुनः पुनः ।

putrasya mukhapadmaṁ tau locanairalisaṁnibhaiḥ pītvā muniṁ ciraṁtaṁ ca namaskṛtya punaḥ punaḥ

भ्रमर के समान नेत्रों से पुत्र के मुखकमल का पान करते हुए, वे मुनि को बार-बार प्रणाम कर —

श्लोक 58 (padma.4.12.58)

प्रोचतुर्वचनं विप्रा ब्राह्मणौ प्रियवादिनौ । अहो मुने जीवदानमावयोः सुकृतं किल ।

procaturvacanaṁ viprā brāhmaṇau priyavādinau aho mune jīvadānamāvayoḥ sukṛtaṁ kila

— प्रियवादी उन दोनों ब्राह्मणों ने कहा — "अहो मुने, हमें जीवनदान देना आपका महान पुण्य-कर्म है।"

श्लोक 59 (padma.4.12.59)

तयोरेव वचः श्रुत्वा स मुनिः करुणार्णवः । दत्वाशिषं च तौ विप्र जगाम निजमाश्रमम् ।

tayoreva vacaḥ śrutvā sa muniḥ karuṇārṇavaḥ datvāśiṣaṁ ca tau vipra jagāma nijamāśramam

उनके ये वचन सुनकर वह करुणासागर मुनि, हे विप्र, उन्हें आशीर्वाद देकर अपने आश्रम को लौट गए।

श्लोक 60 (padma.4.12.60)

मुनिः करगतं चैव कृत्वा विष्णोः परं पदम् । तपस्तेपे महाभागो दैवतैरपि दुर्ल्लभम् ।

muniḥ karagataṁ caiva kṛtvā viṣṇoḥ paraṁ padam tapastepe mahābhāgo daivatairapi durllabham

वह परम भाग्यशाली मुनि, विष्णु के परम पद को हृदय में धारण कर, देवताओं के लिए भी दुर्लभ ऐसी तपस्या करने लगे।

श्लोक 61 (padma.4.12.61)

किंचित्काले गते विप्र तस्य राज्ञोऽभवत्सुतः । सुंदरो राजयोग्यश्च इंदुःक्षीरनिधाविव । पुत्रोत्सवे सोऽपि विप्र राजा दत्वा धनानि वै ।

kiṁcitkāle gate vipra tasya rājño'bhavatsutaḥ suṁdaro rājayogyaśca iṁduḥkṣīranidhāviva putrotsave so'pi vipra rājā datvā dhanāni vai

कुछ समय बीतने पर, हे विप्र, उस राजा को क्षीरसागर से चंद्रमा के समान सुंदर और राजयोग्य पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्रोत्सव में राजा ने भी, हे विप्र, बहुत धन देकर —

श्लोक 62 (padma.4.12.62)

बुभुजे देववद्भूम्यां विशोको जातकौतुकः । विप्रान्पालयते यस्तु प्राणान्दत्वा धनान्यपि ।

bubhuje devavadbhūmyāṁ viśoko jātakautukaḥ viprānpālayate yastu prāṇāndatvā dhanānyapi

— शोकरहित और कौतुकपूर्ण होकर, पृथ्वी पर देवता के समान आनंद भोगा। जो मनुष्य प्राण और धन देकर भी ब्राह्मणों की रक्षा करता है,

श्लोक 63 (padma.4.12.63)

स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्ल्लभम् । पठंति येऽत्र भक्त्या च शृण्वंति विप्रतः कथाम् ।

sa yāti viṣṇubhavanaṁ punarāvṛttidurllabham paṭhaṁti ye'tra bhaktyā ca śṛṇvaṁti viprataḥ kathām

वह विष्णु के उस भवन को जाता है, जहाँ से पुनरागमन दुर्लभ है। जो कोई इसे यहाँ भक्तिपूर्वक पढ़ता है या ब्राह्मण के मुख से सुनता है —

श्लोक 64 (padma.4.12.64)

आख्यानं श्लोकमेकं वा गच्छंति विष्णुमंदिरम् ।

ākhyānaṁ ślokamekaṁ vā gacchaṁti viṣṇumaṁdiram

— इस आख्यान का एक श्लोक मात्र भी, वह विष्णु के मंदिर (धाम) को जाता है।

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