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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 16

आश्विन पूर्णिमा लाजार्पण माहात्म्य

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (padma.4.16.1)

शौनक उवाच । कर्मणा केन भोः सूत चैनसां संक्षयो भवेत् । श्रीहरेश्च कृपा भूयात्तद्वदस्वानुकंपया ।

śaunaka uvāca karmaṇā kena bhoḥ sūta cainasāṁ saṁkṣayo bhavet śrīhareśca kṛpā bhūyāttadvadasvānukaṁpayā

शौनक बोले — हे सूत, किस कर्म से पापों का नाश होता है? और श्रीहरि की कृपा किस प्रकार प्राप्त होती है? कृपापूर्वक यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.4.16.2)

सूत उवाच । शृणु शौनक वक्ष्यामि शृण्वतां पापनाशनम् । येन विष्णोः कृपा स्याद्वै वृजिनक्षयकारिणी ।

sūta uvāca śṛṇu śaunaka vakṣyāmi śṛṇvatāṁ pāpanāśanam yena viṣṇoḥ kṛpā syādvai vṛjinakṣayakāriṇī

सूत बोले — हे शौनक, सुनो, मैं बताता हूँ — सुनने वालों के पापों का नाश करने वाला, जिससे विष्णु की, पाप-नाशक कृपा प्राप्त होती है।

श्लोक 3 (padma.4.16.3)

पौर्णमास्यां तु यो विप्र भक्तिभावसमन्वितः । कुर्य्यान्नानाविधानेन सपर्य्यां श्रीजगद्विभोः ।

paurṇamāsyāṁ tu yo vipra bhaktibhāvasamanvitaḥ kuryyānnānāvidhānena saparyyāṁ śrījagadvibhoḥ

जो द्विज पूर्णिमा को भक्तिभावपूर्वक नाना प्रकार से जगत के स्वामी श्रीहरि की पूजा करता है,

श्लोक 4 (padma.4.16.4)

कलुषं तस्य नश्येत कोटिजन्मार्जितं मुने । तस्मिन्श्रीरमणस्यास्य कृपा जाता भवेद्ध्रुवम् ।

kaluṣaṁ tasya naśyeta koṭijanmārjitaṁ mune tasminśrīramaṇasyāsya kṛpā jātā bhaveddhruvam

— हे मुने, उसका करोड़ों जन्मों का अर्जित पाप नष्ट हो जाता है; उस श्रीरमण (लक्ष्मीपति) की कृपा उस पर अवश्य होती है।

श्लोक 5 (padma.4.16.5)

द्वादश्यामन्नदानं यो भक्त्या कुर्याद्द्विजातये । तस्य नश्यंति पापानि तमांसी वारुणोदये ।

dvādaśyāmannadānaṁ yo bhaktyā kuryāddvijātaye tasya naśyaṁti pāpāni tamāṁsī vāruṇodaye

जो भक्तिपूर्वक द्वादशी को ब्राह्मण को अन्नदान करता है, उसके पाप, अनादिकाल से संचित अंधकार भी, नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 6 (padma.4.16.6)

यो नरः श्रीहरिं कुर्यात्स्नपनं पयसा द्विज । तत्प्रीतिः श्रीहरेः सद्यो द्वादश्यां शर्करादिभिः ।

yo naraḥ śrīhariṁ kuryātsnapanaṁ payasā dvija tatprītiḥ śrīhareḥ sadyo dvādaśyāṁ śarkarādibhiḥ

जो मनुष्य द्वादशी को दूध से श्रीहरि का स्नपन करता है, हे द्विज, शक्कर आदि से — उसे तत्काल श्रीहरि की प्रसन्नता प्राप्त होती है।

श्लोक 7 (padma.4.16.7)

मंत्रं विना तु यो विप्र दद्याच्छ्रीहरये किल । पाषाणसदृशं पुष्पं दाता याति अधोगतिम् ।

maṁtraṁ vinā tu yo vipra dadyācchrīharaye kila pāṣāṇasadṛśaṁ puṣpaṁ dātā yāti adhogatim

हे विप्र, जो मंत्र के बिना ही श्रीहरि को पुष्प अर्पित करता है, वह पुष्प पत्थर के समान है; ऐसा अर्पण करने वाला अधोगति को जाता है।

श्लोक 8 (padma.4.16.8)

क्ष्मासुराय च मूर्खाय पाषाणसदृशं तु यत् । दद्याद्दानं नरो यो वै तस्य पुण्यं न विद्यते ।

kṣmāsurāya ca mūrkhāya pāṣāṇasadṛśaṁ tu yat dadyāddānaṁ naro yo vai tasya puṇyaṁ na vidyate

जो मनुष्य किसी मूर्ख भूसुर को पत्थर के समान (व्यर्थ) दान देता है, उसका कोई पुण्य नहीं होता।

श्लोक 9 (padma.4.16.9)

विद्याहीनो द्विजो मोहाद्दानं गृह्णाति मूढधीः । कालानलं यथा जीर्णं तेन स निरयं व्रजेत् ।

vidyāhīno dvijo mohāddānaṁ gṛhṇāti mūḍhadhīḥ kālānalaṁ yathā jīrṇaṁ tena sa nirayaṁ vrajet

विद्याहीन मूढ़बुद्धि द्विज मोहवश दान ग्रहण करता है — जैसे जीर्ण काष्ठ काल की अग्नि को भस्म करने के समान वह नरक को जाता है।

श्लोक 10 (padma.4.16.10)

यथा दारुमयो हस्ती मृगश्चित्रमयो यथा । विद्याहीनो द्विजो विप्र त्रयस्ते नामधारकाः ।

yathā dārumayo hastī mṛgaścitramayo yathā vidyāhīno dvijo vipra trayaste nāmadhārakāḥ

जैसे काठ का हाथी और चित्रित मृग (केवल नाम के होते हैं), वैसे ही, हे विप्र, विद्याहीन द्विज — ये तीनों केवल नाममात्र धारण करने वाले हैं।

श्लोक 11 (padma.4.16.11)

यथाध्वनिस्थितं वारि पवनार्केण शुद्ध्यति । भक्त्या तु पार्षदं दृष्ट्वा तस्य नश्यति कल्मषम् ।

yathādhvanisthitaṁ vāri pavanārkeṇa śuddhyati bhaktyā tu pārṣadaṁ dṛṣṭvā tasya naśyati kalmaṣam

जैसे मार्ग में पड़ा जल वायु और सूर्य से शुद्ध हो जाता है, वैसे ही भक्तिपूर्वक विष्णु के पार्षद (सेवक) के दर्शन से पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 12 (padma.4.16.12)

यो नरश्चाश्विने मासि सघृतान्पूर्णिमा दिने । दद्याच्छ्रीहरये लाजान्क्रीडार्थं तु वराटिकाम् ।

yo naraścāśvine māsi saghṛtānpūrṇimā dine dadyācchrīharaye lājānkrīḍārthaṁ tu varāṭikām

जो मनुष्य आश्विन मास की पूर्णिमा को घी सहित लाजा (भुने हुए धान) और खेलने के लिए कौड़ियाँ श्रीहरि को अर्पित करता है,

श्लोक 13 (padma.4.16.13)

भक्त्या याति हरेः स्थानं पुनरावृत्तिवर्जितः । न दद्याद्यो नरो मोहात्तस्मिन्न तुष्टिदो हरिः ।

bhaktyā yāti hareḥ sthānaṁ punarāvṛttivarjitaḥ na dadyādyo naro mohāttasminna tuṣṭido hariḥ

— वह भक्तिपूर्वक हरि के धाम को जाता है, पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) से मुक्त होकर। जो मनुष्य मोहवश यह अर्पण नहीं करता, हरि उससे प्रसन्न नहीं होते।

श्लोक 14 (padma.4.16.14)

वराटिकां यावतीं यो हरये पौर्णिमादिने । तावद्दिनं हरेः स्थानं चाश्विने संवसेद्ध्रुवम् ।

varāṭikāṁ yāvatīṁ yo haraye paurṇimādine tāvaddinaṁ hareḥ sthānaṁ cāśvine saṁvaseddhruvam

पूर्णिमा के दिन जितनी कौड़ियाँ मनुष्य हरि को अर्पित करता है, उतने ही दिनों तक वह निश्चय ही आश्विन मास में हरि के धाम में निवास करता है।

श्लोक 15 (padma.4.16.15)

करवीरपुरे ह्यासीत्पुरा शूद्रोऽपि निर्द्दयः । कालद्विजो द्विजश्रेष्ठ नाम्ना पापी भयंकरः ।

karavīrapure hyāsītpurā śūdro'pi nirddayaḥ kāladvijo dvijaśreṣṭha nāmnā pāpī bhayaṁkaraḥ

पूर्वकाल में करवीरपुर नगर में कालद्विज नाम का एक निर्दयी शूद्र रहता था, हे द्विजश्रेष्ठ, एक भयंकर पापी।

श्लोक 16 (padma.4.16.16)

स्वकार्यनिरतः सोऽपि स्वामिकार्यप्रणाशकः । एकदा पंचतां यातो यमदूता भयंकराः ।

svakāryanirataḥ so'pi svāmikāryapraṇāśakaḥ ekadā paṁcatāṁ yāto yamadūtā bhayaṁkarāḥ

वह अपने ही कार्य में रत रहता था और अपने स्वामी के कार्य को नष्ट करने वाला था। एक बार जब उसकी मृत्यु हुई, तब भयंकर यमदूत —

श्लोक 17 (padma.4.16.17)

आगतास्तं समानेतुं यमस्यतु निकेतनम् । बद्ध्वा निन्युश्च तं दृष्ट्वा पृष्टवान्सचिवं यमः ।

āgatāstaṁ samānetuṁ yamasyatu niketanam baddhvā ninyuśca taṁ dṛṣṭvā pṛṣṭavānsacivaṁ yamaḥ

— उसे यमलोक ले जाने के लिए आए। उसे बाँधकर ले जाते समय, उसे देखकर यमराज ने अपने मंत्री से पूछा।

श्लोक 18 (padma.4.16.18)

यम उवाच । अस्य किं विद्यतेऽमात्य कर्मापि च शुभाशुभम् । कथयस्व समूलं तु चित्रगुप्त विचक्षण ।

yama uvāca asya kiṁ vidyate'mātya karmāpi ca śubhāśubham kathayasva samūlaṁ tu citragupta vicakṣaṇa

यमराज बोले — "हे अमात्य, इसके शुभ-अशुभ कर्म क्या हैं? हे विचक्षण चित्रगुप्त, समूल यह मुझे बताओ।"

श्लोक 19 (padma.4.16.19)

चित्रगुप्त उवाच । असौ पापी दुराचारः स्वामिकार्यप्रणाशकः । नास्ति पुण्यं चाणुमात्रं नरके परिपच्यताम् ।

citragupta uvāca asau pāpī durācāraḥ svāmikāryapraṇāśakaḥ nāsti puṇyaṁ cāṇumātraṁ narake paripacyatām

चित्रगुप्त बोले — "यह पापी दुराचारी है, अपने स्वामी के कार्य को नष्ट करने वाला है; इसमें कणमात्र भी पुण्य नहीं है — इसे नरक में पकने दिया जाए,

श्लोक 20 (padma.4.16.20)

शतमन्वन्तरं राजन्नागयोनौ च निष्ठुरः । पाषाणे जन्म चासाद्य गृहे स्थातुं निरंतरम् ।

śatamanvantaraṁ rājannāgayonau ca niṣṭhuraḥ pāṣāṇe janma cāsādya gṛhe sthātuṁ niraṁtaram

— हे राजन्, सौ मन्वंतरों तक, फिर निर्दयतापूर्वक नागयोनि में, और फिर पत्थर की योनि में जन्म पाकर वहीं निरंतर स्थिर रहे।"

श्लोक 21 (padma.4.16.21)

सूत उवाच । तावत्कालं ततो विप्र निरये स पपात ह । ततोऽप्यश्मगृहे नागयोनौ जातः सुदुःखितः ।

sūta uvāca tāvatkālaṁ tato vipra niraye sa papāta ha tato'pyaśmagṛhe nāgayonau jātaḥ suduḥkhitaḥ

सूत बोले — उतने काल तक, हे विप्र, वह नरक में गिरा रहा; फिर पत्थर के घर में नागयोनि में अत्यंत दुखी होकर जन्मा।

श्लोक 22 (padma.4.16.22)

एकदा चाश्विने मासि पौर्णमासीदिने द्विज । लाजान्वराटिका नागो बिलात्प्राक्षेपयद्बहिः ।

ekadā cāśvine māsi paurṇamāsīdine dvija lājānvarāṭikā nāgo bilātprākṣepayadbahiḥ

एक बार, हे द्विज, आश्विन मास की पूर्णिमा के दिन, उस नाग ने अपने बिल से लाजा और एक कौड़ी बाहर फेंकी।

श्लोक 23 (padma.4.16.23)

पतिता सा हरेरग्रे पापमस्य स्वयं हरिः । तूर्णं तु नाशयामास दयालुर्दुःखनाशकः ।

patitā sā hareragre pāpamasya svayaṁ hariḥ tūrṇaṁ tu nāśayāmāsa dayālurduḥkhanāśakaḥ

वह हरि के सामने गिरी; और दयालु, दुःख का नाश करने वाले हरि ने स्वयं तत्काल उसका पाप नष्ट कर दिया।

श्लोक 24 (padma.4.16.24)

कदाचित्प्राप्तकालस्तु पंचत्वं स जगाम ह । यमदूतास्तमानेतुं चागता बहुशो द्विज ।

kadācitprāptakālastu paṁcatvaṁ sa jagāma ha yamadūtāstamānetuṁ cāgatā bahuśo dvija

कुछ समय बाद, जब उसका काल आया, उसकी मृत्यु हो गई। यमदूत उसे ले जाने के लिए बार-बार आए, हे द्विज।

श्लोक 25 (padma.4.16.25)

बद्ध्वा नेतुं यदा चक्रुर्यमस्य सदनं प्रति । तदागता विष्णुदूताः शंखचक्रगदाधराः ।

baddhvā netuṁ yadā cakruryamasya sadanaṁ prati tadāgatā viṣṇudūtāḥ śaṁkhacakragadādharāḥ

जब उसे बाँधकर यमलोक ले जाने का उन्होंने निश्चय किया, तब शंख-चक्र-गदाधारी विष्णु के दूत वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 26 (padma.4.16.26)

पाशं छित्त्वा रथे दिव्ये तमाशुगतकिल्बिषम् । तत्र चारोपयामासुः यमदूताः पलायिताः ।

pāśaṁ chittvā rathe divye tamāśugatakilbiṣam tatra cāropayāmāsuḥ yamadūtāḥ palāyitāḥ

पाश को काटकर, तत्काल पापरहित हुए उसे दिव्य रथ पर बिठाया; यमदूत भाग गए।

श्लोक 27 (padma.4.16.27)

ततो निकेतनं विष्णोर्नागस्तैर्वेष्टितो ययौ । तत्र तस्थौ हरेरग्रे पुनरावर्त्तिवर्जितः ।

tato niketanaṁ viṣṇornāgastairveṣṭito yayau tatra tasthau hareragre punarāvarttivarjitaḥ

फिर वह नाग उनसे घिरा हुआ विष्णु के धाम को गया; वहाँ वह हरि के सामने पुनरावृत्ति से मुक्त होकर स्थित हो गया।

श्लोक 28 (padma.4.16.28)

भक्त्या यो हरये दद्याल्लाजांश्च सघृतान्द्विज । वराटिकां तस्य पुण्यं न जाने किं भवेद्ध्रुवम् ।

bhaktyā yo haraye dadyāllājāṁśca saghṛtāndvija varāṭikāṁ tasya puṇyaṁ na jāne kiṁ bhaveddhruvam

जो द्विज भक्तिपूर्वक हरि को घी सहित लाजा और कौड़ी अर्पित करता है, उसका पुण्य क्या होगा, मैं नहीं जानता, यह निश्चित है (अर्थात असीम है)!

श्लोक 29 (padma.4.16.29)

य इमं शृणुयाद्विप्र चाध्यायं पापनाशनम् । तस्य नश्यंति पापानि श्रीहरेः कृपयापि च ।

ya imaṁ śṛṇuyādvipra cādhyāyaṁ pāpanāśanam tasya naśyaṁti pāpāni śrīhareḥ kṛpayāpi ca

जो कोई, हे विप्र, इस पापनाशक अध्याय को सुनता है, उसके पाप श्रीहरि की कृपा से नष्ट हो जाते हैं।

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17