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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 17

विष्णुपादोदक माहात्म्य

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (padma.4.17.1)

शौनक उवाच । विष्णुपादोदकस्यापि माहात्म्यं पापनाशनम् । कथयस्व महाप्राज्ञ समूलं मे कृपार्णव ।

śaunaka uvāca viṣṇupādodakasyāpi māhātmyaṁ pāpanāśanam kathayasva mahāprājña samūlaṁ me kṛpārṇava

शौनक बोले — हे महाप्राज्ञ, हे कृपासागर, विष्णु के चरणोदक की भी पापनाशक महिमा मुझे समूल कहिए।

श्लोक 2 (padma.4.17.2)

सूत उवाच । समस्तपातकध्वंसि विष्णुपादोदकं शुभम् । कणमात्रं वहेद्यस्तु सर्वतीर्थफलं लभेत् ।

sūta uvāca samastapātakadhvaṁsi viṣṇupādodakaṁ śubham kaṇamātraṁ vahedyastu sarvatīrthaphalaṁ labhet

सूत बोले — विष्णु के चरणों को धोया हुआ शुभ जल समस्त पापों का नाश करने वाला है; जो कोई इसका कणमात्र भी धारण करता है, वह समस्त तीर्थों का फल पाता है।

श्लोक 3 (padma.4.17.3)

विष्णुपादोदकं ब्रह्मन्स्पर्शतः पापनाशनम् । अकालमरणं नास्ति गंगास्नानफलं लभेत् ।

viṣṇupādodakaṁ brahmansparśataḥ pāpanāśanam akālamaraṇaṁ nāsti gaṁgāsnānaphalaṁ labhet

हे ब्रह्मन्, विष्णु का चरणोदक स्पर्शमात्र से पाप का नाश करने वाला है; उसे अकालमृत्यु नहीं होती, और उसे गंगास्नान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (padma.4.17.4)

विष्णुपादोदकं पापी यः पिबेत्तस्य किल्बिषम् । शरीरस्थं क्षयं याति कृतं ब्रह्मन्न संशयः ।

viṣṇupādodakaṁ pāpī yaḥ pibettasya kilbiṣam śarīrasthaṁ kṣayaṁ yāti kṛtaṁ brahmanna saṁśayaḥ

जो पापी विष्णु का चरणोदक पीता है, उसका शरीर में स्थित पाप, चाहे कितना भी दृढ़ क्यों न हो, नष्ट हो जाता है, हे ब्रह्मन्, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 5 (padma.4.17.5)

तुलसीपर्णसंयुक्तं विष्णुपादोदकं द्विज । यो वहेच्छिरसा भक्त्या चांते याति हरेर्गृहम् ।

tulasīparṇasaṁyuktaṁ viṣṇupādodakaṁ dvija yo vahecchirasā bhaktyā cāṁte yāti harergṛham

जो द्विज भक्तिपूर्वक तुलसीदल सहित विष्णु के चरणोदक को सिर पर धारण करता है, वह अंत में हरि के धाम को जाता है।

श्लोक 6 (padma.4.17.6)

मेरुतुल्यसुवर्णानि दत्त्वा यत्फलमाप्यते । हरिपादोदकं स्पृष्ट्वा प्राप्यते तत्फलं नरैः ।

merutulyasuvarṇāni dattvā yatphalamāpyate haripādodakaṁ spṛṣṭvā prāpyate tatphalaṁ naraiḥ

मेरु पर्वत के बराबर सुवर्ण दान करने से जो फल मिलता है, वही फल मनुष्यों को हरि के चरणोदक का स्पर्श करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (padma.4.17.7)

धेनुकोटिसहस्राणि यत्फलं लभते नरैः । दत्वा पादोदकं स्पृष्ट्वा तत्फलं प्राप्यते ध्रुवम् ।

dhenukoṭisahasrāṇi yatphalaṁ labhate naraiḥ datvā pādodakaṁ spṛṣṭvā tatphalaṁ prāpyate dhruvam

करोड़ों गौओं का दान करने से मनुष्यों को जो फल मिलता है, वही फल चरणोदक का स्पर्श करने से निश्चय ही प्राप्त होता है।

श्लोक 8 (padma.4.17.8)

यज्ञकोटिसहस्राणि कृत्वा यत्फलमाप्यते । हरिपादोदकं स्पृष्ट्वा तस्मात्कोटिगुणं नरैः ।

yajñakoṭisahasrāṇi kṛtvā yatphalamāpyate haripādodakaṁ spṛṣṭvā tasmātkoṭiguṇaṁ naraiḥ

सहस्र-करोड़ यज्ञ करने से जो फल मिलता है, हरि के चरणोदक का स्पर्श करने से मनुष्यों को उससे करोड़ों गुना फल मिलता है।

श्लोक 9 (padma.4.17.9)

कोटिकन्याप्रदानेन यत्फलं लभ्यते जनैः । विष्णुपादोदकं स्पृष्ट्वा फलं तस्माद्द्विजाधिकम् ।

koṭikanyāpradānena yatphalaṁ labhyate janaiḥ viṣṇupādodakaṁ spṛṣṭvā phalaṁ tasmāddvijādhikam

करोड़ों कन्याओं के दान से जो फल लोगों को मिलता है, विष्णु के चरणोदक का स्पर्श उससे भी अधिक फल देने वाला है, हे द्विज।

श्लोक 10 (padma.4.17.10)

दंतिकोटिप्रदानेन सप्तिकोटिप्रदानतः । यत्फलं लभते मर्त्यः स्पृष्ट्वा पादोदकं हरेः ।

daṁtikoṭipradānena saptikoṭipradānataḥ yatphalaṁ labhate martyaḥ spṛṣṭvā pādodakaṁ hareḥ

करोड़ों हाथियों और करोड़ों घोड़ों के दान से मनुष्य को जो फल मिलता है, वही फल हरि के चरणोदक का स्पर्श करने से मिलता है।

श्लोक 11 (padma.4.17.11)

दत्वा मर्त्यः सप्तद्वीपां ससस्यां यत्फलं लभेत् । विष्णुपादोदकं स्पृष्ट्वा तस्माद्विप्राधिकं लभेत् ।

datvā martyaḥ saptadvīpāṁ sasasyāṁ yatphalaṁ labhet viṣṇupādodakaṁ spṛṣṭvā tasmādviprādhikaṁ labhet

सस्य सहित सातों द्वीपों के दान से मनुष्य को जो फल मिलता है, हे विप्र, विष्णु के चरणोदक का स्पर्श उससे भी अधिक फल देता है।

श्लोक 12 (padma.4.17.12)

शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि संक्षेपेणाधिकं किमु । विष्णुपादोदकं स्पृष्ट्वा पापी याति हरेर्गृहम् ।

śṛṇu vipra pravakṣyāmi saṁkṣepeṇādhikaṁ kimu viṣṇupādodakaṁ spṛṣṭvā pāpī yāti harergṛham

सुनो, हे विप्र, मैं संक्षेप में और भी अधिक बताता हूँ — विष्णु के चरणोदक का स्पर्श करके पापी भी हरि के धाम को जाता है।

श्लोक 13 (padma.4.17.13)

शौनक उवाच । स्पृष्ट्वा पीत्वा पुरा केन प्राणिना प्रापि वै गृहम् । कथयस्व हरेः सूत मम त्वं चानुकंपया ।

śaunaka uvāca spṛṣṭvā pītvā purā kena prāṇinā prāpi vai gṛham kathayasva hareḥ sūta mama tvaṁ cānukaṁpayā

शौनक बोले — पूर्वकाल में किस प्राणी ने इसका स्पर्श और पान करके हरि के धाम को प्राप्त किया? हे सूत, मुझ पर कृपा करके यह मुझे बताइए।

श्लोक 14 (padma.4.17.14)

सूत उवाच । पुरा त्रेतायुगे पापी नाम्ना विप्रः सुदर्शनः । जनार्द्दनदिने नित्यमश्नीयात्स द्विजोत्तम ।

sūta uvāca purā tretāyuge pāpī nāmnā vipraḥ sudarśanaḥ janārddanadine nityamaśnīyātsa dvijottama

सूत बोले — पूर्वकाल में त्रेतायुग में सुदर्शन नामक एक पापी ब्राह्मण था, हे द्विजोत्तम, जो जनार्दन के पवित्र दिन भी नित्य भोजन करता था।

श्लोक 15 (padma.4.17.15)

शास्त्रनिंदाकरो नित्यं व्रतनिंदाकरः सदा । असावन्यं न जानाति केवलं स्वोदरं विना ।

śāstraniṁdākaro nityaṁ vrataniṁdākaraḥ sadā asāvanyaṁ na jānāti kevalaṁ svodaraṁ vinā

वह सदा शास्त्रों की निंदा करने वाला, सदा व्रतों की निंदा करने वाला था। वह अपने पेट के अतिरिक्त किसी और को नहीं जानता था।

श्लोक 16 (padma.4.17.16)

एकदा प्राप्तकालस्तु निधनं प्राप्तवान्द्विज । यमदूताः समायाता बद्ध्वा नीतो यमालयम् ।

ekadā prāptakālastu nidhanaṁ prāptavāndvija yamadūtāḥ samāyātā baddhvā nīto yamālayam

एक बार, हे द्विज, समय आने पर उसकी मृत्यु हो गई। यमदूत आए, उसे बाँधकर यमलोक ले गए।

श्लोक 17 (padma.4.17.17)

तं दृष्ट्वा यमुनाभ्राता पप्रच्छ सचिवं रुषा । भोऽमात्य चास्य यत्पुण्यं पापं वद समूलतः ।

taṁ dṛṣṭvā yamunābhrātā papraccha sacivaṁ ruṣā bho'mātya cāsya yatpuṇyaṁ pāpaṁ vada samūlataḥ

उसे देखकर यमुना के भाई यमराज ने क्रोधपूर्वक अपने मंत्री से पूछा — "हे अमात्य, इसके पुण्य-पाप समूल बताओ।

श्लोक 18 (padma.4.17.18)

असौ विप्रो महापापी क्रूरकर्म्मेव दृश्यते ।

asau vipro mahāpāpī krūrakarmmeva dṛśyate

यह ब्राह्मण महापापी और क्रूरकर्मा प्रतीत होता है।"

श्लोक 19 (padma.4.17.19)

चित्रगुप्त उवाच । आकर्णय चास्य पापं पुण्यं नास्त्यणुमात्रकम् । वासरेऽपि हरेर्नित्यमकरोद्भोजनं विभो ।

citragupta uvāca ākarṇaya cāsya pāpaṁ puṇyaṁ nāstyaṇumātrakam vāsare'pi harernityamakarodbhojanaṁ vibho

चित्रगुप्त बोले — "इसका पाप सुनिए, इसमें कणमात्र भी पुण्य नहीं है। हे विभो, यह हरि के दिन भी नित्य भोजन करता था।

श्लोक 20 (padma.4.17.20)

वासरे कमलाभर्तुश्चाश्नीयाद्यो नराधमः । पुरीषं सोऽश्नीयाद्राजन्निरयं याति दारुणम् ।

vāsare kamalābhartuścāśnīyādyo narādhamaḥ purīṣaṁ so'śnīyādrājannirayaṁ yāti dāruṇam

जो नराधम कमलापति के दिन (एकादशी को) भोजन करता है, हे राजन्, वह मानो मल ही खाता है, और भयंकर नरक को जाता है।

श्लोक 21 (padma.4.17.21)

मन्वंतरशतं देहि स्थानं तु निरयेऽप्यमुम् । ग्रामक्रोडस्य योनौ हि ततो जन्म भविष्यति ।

manvaṁtaraśataṁ dehi sthānaṁ tu niraye'pyamum grāmakroḍasya yonau hi tato janma bhaviṣyati

इसे नरक में सौ मन्वंतरों तक स्थान दीजिए; फिर इसका जन्म ग्राम-सूकर की योनि में होगा।"

श्लोक 22 (padma.4.17.22)

सूत उवाच । यमाज्ञया ततो विप्र तस्य दूतैर्भयंकरैः । पातितस्तु पुरीषे वै मन्वंतरशताधिकम् ।

sūta uvāca yamājñayā tato vipra tasya dūtairbhayaṁkaraiḥ pātitastu purīṣe vai manvaṁtaraśatādhikam

सूत बोले — तब, हे विप्र, यमराज की आज्ञा से भयंकर दूतों ने उसे सौ मन्वंतरों से अधिक समय तक मल में डाले रखा।

श्लोक 23 (padma.4.17.23)

ततो मुक्तोऽभवच्चासौ पृथिव्यां ग्रामसूकरः । चिरं नरकमश्नीयाद्धरिवासरभोजनात् ।

tato mukto'bhavaccāsau pṛthivyāṁ grāmasūkaraḥ ciraṁ narakamaśnīyāddharivāsarabhojanāt

फिर वह उससे मुक्त होकर पृथ्वी पर ग्राम-सूकर हुआ; हरि के दिन भोजन करने के कारण उसने लंबे समय तक नरक का ही भोजन किया।

श्लोक 24 (padma.4.17.24)

ततो विप्र प्राप्तकालः पंचत्वं स जगाम ह । काकयोनौ पुनर्जन्म लेभेऽसौ विड्भुजः सदा ।

tato vipra prāptakālaḥ paṁcatvaṁ sa jagāma ha kākayonau punarjanma lebhe'sau viḍbhujaḥ sadā

फिर, हे विप्र, समय आने पर उसकी पुनः मृत्यु हुई, और वह पुनः कौवे की योनि में जन्मा, सदा मल भक्षण करने वाला।

श्लोक 25 (padma.4.17.25)

एकस्मिन्दिवसे विप्र श्रीहरेश्चरणोदकम् । द्वारदेशेस्थितं पीत्वा सर्वपापविवर्जितः ।

ekasmindivase vipra śrīhareścaraṇodakam dvāradeśesthitaṁ pītvā sarvapāpavivarjitaḥ

एक दिन, हे विप्र, वह किसी द्वार के पास खड़े होकर श्रीहरि का चरणोदक पी गया, और समस्त पापों से मुक्त हो गया।

श्लोक 26 (padma.4.17.26)

तस्मिन्नेव दिने काकः पतितः शबरस्य च । काले मृत्युदशां प्राप्तो व्याधेन वायसोपि च ।

tasminneva dine kākaḥ patitaḥ śabarasya ca kāle mṛtyudaśāṁ prāpto vyādhena vāyasopi ca

उसी दिन वह कौआ किसी शिकारी का शिकार बन गया; समय आने पर वह कौआ भी शिकारी के बाण से मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 27 (padma.4.17.27)

आगते स्यंदने दिव्ये राजहंसयुते शुभे । आरुह्य बलिभुग्विप्र ययौ स हरिमंदिरम् ।

āgate syaṁdane divye rājahaṁsayute śubhe āruhya balibhugvipra yayau sa harimaṁdiram

तब एक दिव्य, शुभ, राजहंसों से युक्त रथ आया; उस पर आरूढ़ होकर वह पूर्व बलिभुक (कौआ) हरि के मंदिर को गया।

श्लोक 28 (padma.4.17.28)

पादोदकस्य माहात्म्यं कथितं पापनाशनम् । यः शृणोति नरः पापी तस्य पापं विनश्यति ।

pādodakasya māhātmyaṁ kathitaṁ pāpanāśanam yaḥ śṛṇoti naraḥ pāpī tasya pāpaṁ vinaśyati

यह चरणोदक की पापनाशक महिमा मैंने कह सुनाई; जो पापी भी इसे सुनता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।

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