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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 18

अगम्यागमन प्रायश्चित्त

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (padma.4.18.1)

शौनक उवाच । अगम्यागमनं सूत कुर्याद्यो वै विमोहितः । तस्य शुद्धिर्भवेत्केन कथयस्व समूलतः ।

śaunaka uvāca agamyāgamanaṁ sūta kuryādyo vai vimohitaḥ tasya śuddhirbhavetkena kathayasva samūlataḥ

शौनक बोले — हे सूत, जो मोहग्रस्त होकर अगम्यागमन (निषिद्ध संभोग) करता है, उसकी शुद्धि किस प्रकार होती है? यह मुझे समूल बताइए।

श्लोक 2 (padma.4.18.2)

सूत उवाच । अभिगच्छति चांडालीं श्वपाकीं यो द्विजोत्तमः । उपवासत्रयं कुर्यात्प्राजापत्यं चरेत्ततः ।

sūta uvāca abhigacchati cāṁḍālīṁ śvapākīṁ yo dvijottamaḥ upavāsatrayaṁ kuryātprājāpatyaṁ carettataḥ

सूत बोले — जो द्विजोत्तम चांडाल-स्त्री या श्वपाकी (कुत्ता-भक्षी की स्त्री) के पास जाता है, उसे तीन दिन उपवास करना चाहिए और फिर प्राजापत्य व्रत करना चाहिए —

श्लोक 3 (padma.4.18.3)

सशिखं वपनं चैव दद्याद्गोद्वयमेव च । यथार्थदक्षिणां दत्वा शुद्धिमाप्नोति स द्विजः ।

saśikhaṁ vapanaṁ caiva dadyādgodvayameva ca yathārthadakṣiṇāṁ datvā śuddhimāpnoti sa dvijaḥ

— शिखा सहित मुंडन कराकर दो गौएँ देनी चाहिए; यथोचित दक्षिणा देकर वह द्विज शुद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 4 (padma.4.18.4)

क्षत्त्रियो वापि चांडालीं वैश्यो वा यदि गच्छति । प्राजापत्यं सकृच्छ्रं च दद्याद्गोमिथुनद्वयम् ।

kṣattriyo vāpi cāṁḍālīṁ vaiśyo vā yadi gacchati prājāpatyaṁ sakṛcchraṁ ca dadyādgomithunadvayam

यदि क्षत्रिय या वैश्य चांडाल-स्त्री के पास जाए, तो उसे प्राजापत्य और एक कृच्छ्र व्रत करना चाहिए तथा दो जोड़ी गौएँ देनी चाहिए।

श्लोक 5 (padma.4.18.5)

अनुगच्छति शूद्रो हि श्वपाकीं च तपोधन । चतुर्गोमिथुनं दद्यात्प्राजापत्यं व्रतं चरेत् ।

anugacchati śūdro hi śvapākīṁ ca tapodhana caturgomithunaṁ dadyātprājāpatyaṁ vrataṁ caret

हे तपोधन, यदि शूद्र श्वपाकी के पास जाता है, तो उसे चार जोड़ी गौएँ देनी चाहिए और प्राजापत्य व्रत करना चाहिए।

श्लोक 6 (padma.4.18.6)

मातरं यदि वा गच्छेद्भगिनीं स्वसुतामपि । वधूं च मोहितो गच्छंस्त्रीणि कृच्छ्राण्यथाचरेत् ।

mātaraṁ yadi vā gacchedbhaginīṁ svasutāmapi vadhūṁ ca mohito gacchaṁstrīṇi kṛcchrāṇyathācaret

यदि कोई मोहवश माता, बहन, अपनी पुत्री अथवा पुत्रवधू के पास जाए, तो उसे तीन कृच्छ्र व्रत करने चाहिए।

श्लोक 7 (padma.4.18.7)

चांद्रायणत्रयं कृत्वा दद्याद्गोमिथुनत्रयम् । सशिखं वपनं कृत्वा पंचगव्यं पिबेत्ततः ।

cāṁdrāyaṇatrayaṁ kṛtvā dadyādgomithunatrayam saśikhaṁ vapanaṁ kṛtvā paṁcagavyaṁ pibettataḥ

तीन चांद्रायण व्रत कर तीन जोड़ी गौएँ देनी चाहिए; शिखा सहित मुंडन कराकर फिर पंचगव्य पीना चाहिए।

श्लोक 8 (padma.4.18.8)

हुते ह्यग्नौ तथाप्यत्र शुद्ध्यत्येवं तपोधन । पितृदारान्द्विजश्रेष्ठ मातुश्च भगिनीं तथा ।

hute hyagnau tathāpyatra śuddhyatyevaṁ tapodhana pitṛdārāndvijaśreṣṭha mātuśca bhaginīṁ tathā

अग्नि में हवन करने पर भी, इस प्रकार शुद्धि होती है, हे तपोधन। हे द्विजश्रेष्ठ, पिता की पत्नी (सौतेली माता), माता की बहन,

श्लोक 9 (padma.4.18.9)

गुरुपत्नीं मातुलानीं भ्रातुर्भार्यां स्वगोत्रजाम् । यदि गच्छति मोहेन प्राजापत्यद्वयं चरेत् ।

gurupatnīṁ mātulānīṁ bhrāturbhāryāṁ svagotrajām yadi gacchati mohena prājāpatyadvayaṁ caret

— गुरु-पत्नी, मामी, भाई की पत्नी अथवा अपने गोत्र की स्त्री के पास यदि कोई मोहवश जाए, तो उसे दो प्राजापत्य व्रत करने चाहिए —

श्लोक 10 (padma.4.18.10)

चांद्रायणत्रयं ब्रह्मन्पंचगोमिथुनानि च । विप्रेभ्यो दक्षिणां दद्याच्छुध्यते नात्र संशयः ।

cāṁdrāyaṇatrayaṁ brahmanpaṁcagomithunāni ca viprebhyo dakṣiṇāṁ dadyācchudhyate nātra saṁśayaḥ

— हे ब्रह्मन्, तीन चांद्रायण व्रत और पाँच गौएँ भी देनी चाहिए; ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर वह शुद्ध हो जाता है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 11 (padma.4.18.11)

गां च गच्छति यो मूढ उपवासत्रयं चरेत् । धेनुं दत्त्वा तथा चान्नं शुद्ध्यत्यत्र न संशयः ।

gāṁ ca gacchati yo mūḍha upavāsatrayaṁ caret dhenuṁ dattvā tathā cānnaṁ śuddhyatyatra na saṁśayaḥ

जो मूर्ख गाय के साथ (पापाचार) करता है, उसे तीन दिन उपवास करना चाहिए; दुधारू गाय और अन्न देकर वह शुद्ध हो जाता है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 12 (padma.4.18.12)

वेश्यां खरीं शूकरीं च कपिं तुं महिषीं द्विज । आकंठतः समाक्षिप्य गोमयोदककर्द्दमे ।

veśyāṁ kharīṁ śūkarīṁ ca kapiṁ tuṁ mahiṣīṁ dvija ākaṁṭhataḥ samākṣipya gomayodakakarddame

हे द्विज, जो वेश्या, गधी, सूअरी, बंदरिया अथवा भैंस के साथ संभोग करता है, उसे गोबर-जल के कीचड़ में गर्दन तक डूबकर —

श्लोक 13 (padma.4.18.13)

तत्र तिष्ठेन्निराहारो त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति । सशिखं वपनं कृत्वा त्रिरात्रमुपवासयेत् ।

tatra tiṣṭhennirāhāro trirātreṇaiva śuddhyati saśikhaṁ vapanaṁ kṛtvā trirātramupavāsayet

— बिना भोजन किए वहीं रहना चाहिए; तीन रात में वह शुद्ध हो जाता है। शिखा सहित मुंडन कराकर उसे तीन रात उपवास करना चाहिए;

श्लोक 14 (padma.4.18.14)

एकरात्रं जले स्थित्वा शुद्ध्यत्येव न संशयः । ब्राह्मणीं तु यदा गच्छेत्यो नरः काममोहितः ।

ekarātraṁ jale sthitvā śuddhyatyeva na saṁśayaḥ brāhmaṇīṁ tu yadā gacchetyo naraḥ kāmamohitaḥ

— एक रात जल में खड़े रहकर वह निश्चय ही शुद्ध हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। जो मनुष्य कामवश किसी ब्राह्मणी के पास जाता है,

श्लोक 15 (padma.4.18.15)

प्राजापत्यत्रयं कुर्य्याच्चांद्रायणत्रयं तथा । गोत्रयं तु तथा दद्याच्छुद्ध्यत्येव तपोधन ।

prājāpatyatrayaṁ kuryyāccāṁdrāyaṇatrayaṁ tathā gotrayaṁ tu tathā dadyācchuddhyatyeva tapodhana

— उसे तीन प्राजापत्य व्रत, तीन चांद्रायण व्रत तथा तीन गौओं का दान करना चाहिए; इस प्रकार, हे तपोधन, वह शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 16 (padma.4.18.16)

ब्राह्मणी पंचगव्यं तु पंचरात्रं पिबेद्द्विज । गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुध्यत्यत्र न संशयः ।

brāhmaṇī paṁcagavyaṁ tu paṁcarātraṁ pibeddvija godvayaṁ dakṣiṇāṁ dadyācchudhyatyatra na saṁśayaḥ

ब्राह्मणी को (ऐसे ही अपराध में) पाँच रात पंचगव्य पीना चाहिए, हे द्विज, और दक्षिणा में दो गौएँ देनी चाहिए; इस प्रकार वह शुद्ध हो जाती है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 17 (padma.4.18.17)

परांगनां यदागच्छेत्कृच्छ्रं सांतपनं चरेत् । यथार्गला तथा योषित्तस्मात्तां परिवर्जयेत् ।

parāṁganāṁ yadāgacchetkṛcchraṁ sāṁtapanaṁ caret yathārgalā tathā yoṣittasmāttāṁ parivarjayet

जो पराई स्त्री के पास जाता है, उसे कठोर सांतपन व्रत करना चाहिए; पराई स्त्री द्वार की अर्गला (बंद कुंडी) के समान है, इसलिए उसका सर्वथा त्याग करना चाहिए।

श्लोक 18 (padma.4.18.18)

वर्णबाह्यां तथा नीचामनुगच्छेत्सकृन्नरः । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं शुद्ध्यत्येव न संशयः ।

varṇabāhyāṁ tathā nīcāmanugacchetsakṛnnaraḥ prājāpatyaṁ caretkṛcchraṁ śuddhyatyeva na saṁśayaḥ

जो वर्ण से बाहर की या नीच जाति की स्त्री के पास एक बार भी जाए, उसे कठोर प्राजापत्य व्रत करना चाहिए; इस प्रकार वह निश्चय ही शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 19 (padma.4.18.19)

अंगारसदृशी योषित्सर्पिः कुंभसमः पुमान् । तस्याः परिसरे ब्रह्मन्न स्थातव्यं कदाचन ।

aṁgārasadṛśī yoṣitsarpiḥ kuṁbhasamaḥ pumān tasyāḥ parisare brahmanna sthātavyaṁ kadācana

दुष्ट स्त्री अंगारे के समान है, और (उसके पास जाने वाला) पुरुष घी से भरे घड़े के समान है; हे ब्रह्मन्, उसके निकट कभी नहीं रहना चाहिए।

श्लोक 20 (padma.4.18.20)

जारेण जनयेद्गर्भं या च नारी कुलांतका । त्याज्या सा सर्वथा ब्रंह्मस्तत्र दोषो न विद्यते ।

jāreṇa janayedgarbhaṁ yā ca nārī kulāṁtakā tyājyā sā sarvathā braṁhmastatra doṣo na vidyate

जो स्त्री पर-पुरुष से गर्भ धारण कर अपने कुल का विनाश करती है, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिए, हे ब्रह्मन्; इसमें (त्यागने वाले का) कोई दोष नहीं है।

श्लोक 21 (padma.4.18.21)

या च नारी गृहाद्गच्छेत्त्यक्त्वा बंधून्स्वकानपि । नष्टा सा च कुलभ्रष्टा न तस्याः संगमः पुनः ।

yā ca nārī gṛhādgacchettyaktvā baṁdhūnsvakānapi naṣṭā sā ca kulabhraṣṭā na tasyāḥ saṁgamaḥ punaḥ

और जो स्त्री अपने बंधुओं को भी त्यागकर घर से चली जाती है, वह नष्ट और कुल-भ्रष्ट हो जाती है; उससे पुनः संबंध नहीं रखना चाहिए।

श्लोक 22 (padma.4.18.22)

या च नारी यदा गच्छेन्मोहिता परपूरुषम् । प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं पंचगव्यं पिबेत्ततः ।

yā ca nārī yadā gacchenmohitā parapūruṣam prājāpatyaṁ caretkṛcchraṁ paṁcagavyaṁ pibettataḥ

और जो स्त्री मोहवश पर-पुरुष के पास जाती है, उसे कठोर प्राजापत्य व्रत करना चाहिए और फिर पंचगव्य पीना चाहिए —

श्लोक 23 (padma.4.18.23)

गोद्वयं तु ततो दद्याच्छुध्यत्येव न संशयः । ब्राह्मणी बालिशा ब्रह्मन्मोहिता परपूरुषम् ।

godvayaṁ tu tato dadyācchudhyatyeva na saṁśayaḥ brāhmaṇī bāliśā brahmanmohitā parapūruṣam

— और फिर दो गौएँ देनी चाहिए; इस प्रकार वह निश्चय ही शुद्ध हो जाती है। हे ब्रह्मन्, कोई भोली ब्राह्मणी मोहवश पर-पुरुष के पास —

श्लोक 24 (padma.4.18.24)

यदा गच्छेत्तदा त्याज्या जनैर्दोषो न विद्यते । यो गच्छेद्ब्राह्मणीं विप्र भूसुरः काममोहितः । गो तिलांश्च तदा दद्याच्छुद्ध्यत्यत्र न संशयः ।

yadā gacchettadā tyājyā janairdoṣo na vidyate yo gacchedbrāhmaṇīṁ vipra bhūsuraḥ kāmamohitaḥ go tilāṁśca tadā dadyācchuddhyatyatra na saṁśayaḥ

— जब जाती है, तब लोगों द्वारा उसका त्याग कर देना चाहिए, इसमें कोई दोष नहीं। हे विप्र, जो भूसुर कामवश किसी ब्राह्मणी के पास जाए, उसे गौ और तिल दान करना चाहिए; इस प्रकार वह शुद्ध होता है — इसमें संदेह नहीं।

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