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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 23

विष्णुपंचक माहात्म्य

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (padma.4.23.1)

शौनक उवाच । कथयस्व मुने सूत माहात्म्यं कलुषक्षयम् । शेषपंचदिनस्यापि कार्त्तिकस्यानुकंपया ।

śaunaka uvāca kathayasva mune sūta māhātmyaṁ kaluṣakṣayam śeṣapaṁcadinasyāpi kārttikasyānukaṁpayā

शौनक बोले — हे मुने सूत, कार्तिक के शेष पाँच दिनों की भी पापनाशक महिमा कृपापूर्वक मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.4.23.2)

सूत उवाच । शृणु शौनक यत्पृष्टं माहात्म्यं पापनाशनम् । वक्ष्याम्यहं वै चोर्जस्य शेषपंचदिनस्य च ।

sūta uvāca śṛṇu śaunaka yatpṛṣṭaṁ māhātmyaṁ pāpanāśanam vakṣyāmyahaṁ vai corjasya śeṣapaṁcadinasya ca

सूत बोले — हे शौनक, जो तुमने पूछा है, वह पापनाशक महिमा सुनो; मैं ऊर्जा (कार्तिक) के शेष पाँच दिनों की महिमा बताता हूँ।

श्लोक 3 (padma.4.23.3)

व्रतानां मुनिशार्दूल प्रवरं विष्णुपंचकम् । तस्मिन्यः पूजयेद्भक्त्या श्रीहरिं राधया सह ।

vratānāṁ muniśārdūla pravaraṁ viṣṇupaṁcakam tasminyaḥ pūjayedbhaktyā śrīhariṁ rādhayā saha

हे मुनिश्रेष्ठ, समस्त व्रतों में श्रेष्ठ विष्णुपंचक है। इसमें जो भक्तिपूर्वक श्रीहरि की, राधा सहित, पूजा करता है —

श्लोक 4 (padma.4.23.4)

गंधपुष्पैर्धूपदीपैर्वस्त्रैर्नानाविधैः फलैः । स याति विष्णुसदनं सर्वपापविवर्जितः ।

gaṁdhapuṣpairdhūpadīpairvastrairnānāvidhaiḥ phalaiḥ sa yāti viṣṇusadanaṁ sarvapāpavivarjitaḥ

— सुगंध, पुष्प, धूप, दीप, नाना प्रकार के वस्त्रों और फलों से, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के धाम को जाता है।

श्लोक 5 (padma.4.23.5)

ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवा यतिः । न प्राप्नोति परं स्थानमकृत्वा विष्णुपंचकम् ।

brahmacārī gṛhastho vā vānaprastho'thavā yatiḥ na prāpnoti paraṁ sthānamakṛtvā viṣṇupaṁcakam

ब्रह्मचारी हो, गृहस्थ हो, वानप्रस्थी हो अथवा यति हो, विष्णुपंचक किए बिना कोई भी परम पद को नहीं प्राप्त करता।

श्लोक 6 (padma.4.23.6)

सर्वपापहरं पुण्यं विख्यातं विष्णुपंचकम् । तत्र स्नानं तु यः कुर्यात्सर्वतीर्थफलं लभेत् ।

sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ vikhyātaṁ viṣṇupaṁcakam tatra snānaṁ tu yaḥ kuryātsarvatīrthaphalaṁ labhet

समस्त पापों को हरने वाला यह पुण्यमय विष्णुपंचक विख्यात है। जो इसमें स्नान करता है, वह समस्त तीर्थों का फल पाता है।

श्लोक 7 (padma.4.23.7)

श्रीहरेः पुरतो विप्र तुलस्याश्च समीपतः । प्रदीपं सर्पिषा पूर्णं दद्याद्यो भक्तिभावतः ।

śrīhareḥ purato vipra tulasyāśca samīpataḥ pradīpaṁ sarpiṣā pūrṇaṁ dadyādyo bhaktibhāvataḥ

हे विप्र, जो श्रीहरि के सामने और तुलसी के समीप घी से भरा दीपक भक्तिभावपूर्वक अर्पित करता है —

श्लोक 8 (padma.4.23.8)

नभसि श्रीहरेः प्रीत्यै याति स विष्णुमंदिरम् । पापी याति हरेर्धाम सत्यमेतन्मयोदितम् ।

nabhasi śrīhareḥ prītyai yāti sa viṣṇumaṁdiram pāpī yāti harerdhāma satyametanmayoditam

— आकाश में, श्रीहरि की प्रसन्नता के लिए, वह विष्णु के मंदिर को जाता है। पापी भी इससे हरि के धाम को जाता है — यह मैं सत्य कहता हूँ।

श्लोक 9 (padma.4.23.9)

स्नापयेच्चाच्युतं भक्त्या मधुक्षीरघृतादिभिः । दद्यात्किं नो हरिः प्रीतस्तस्मै साधुजनाय वै ।

snāpayeccācyutaṁ bhaktyā madhukṣīraghṛtādibhiḥ dadyātkiṁ no hariḥ prītastasmai sādhujanāya vai

जो भक्तिपूर्वक अच्युत को मधु, दूध, घी आदि से स्नान कराता है — उस साधुजन को प्रसन्न होकर हरि क्या नहीं देंगे?

श्लोक 10 (padma.4.23.10)

नैवेद्यं देवदेवेशं परमान्नं निवेदयेत् । तस्य पुण्यं प्रसंख्यातुं न शक्तो वै चतुर्मुखः ।

naivedyaṁ devadeveśaṁ paramānnaṁ nivedayet tasya puṇyaṁ prasaṁkhyātuṁ na śakto vai caturmukhaḥ

जो देवाधिदेव को नैवेद्य के रूप में उत्तम खीर अर्पित करता है, उसके पुण्य की गणना करने में चार मुख वाले ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 11 (padma.4.23.11)

अर्चयित्वा हृषीकेशमेकादश्यां समाहितः । निष्प्राप्य गोमयं सम्यक्मंत्रवत्समुपासते ।

arcayitvā hṛṣīkeśamekādaśyāṁ samāhitaḥ niṣprāpya gomayaṁ samyakmaṁtravatsamupāsate

एकादशी को सावधानीपूर्वक हृषीकेश की पूजा कर, विधिपूर्वक गोबर प्राप्त कर, उसे मंत्रपूर्वक धारण करते हैं।

श्लोक 12 (padma.4.23.12)

गोमूत्रं मंत्रवद्भूयो द्वादश्यां प्राशयेद्व्रती । क्षीरं तथा त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां तथा दधि ।

gomūtraṁ maṁtravadbhūyo dvādaśyāṁ prāśayedvratī kṣīraṁ tathā trayodaśyāṁ caturdaśyāṁ tathā dadhi

द्वादशी को व्रती को पुनः मंत्रपूर्वक गोमूत्र का सेवन करना चाहिए; इसी प्रकार त्रयोदशी को दूध, और चतुर्दशी को दही।

श्लोक 13 (padma.4.23.13)

संप्राप्य पापशुद्ध्यर्थं लंघयित्वा चतुर्दिनम् । पंचमे तु दिने स्नात्वा विधिवत्पूज्य केशवम् ।

saṁprāpya pāpaśuddhyarthaṁ laṁghayitvā caturdinam paṁcame tu dine snātvā vidhivatpūjya keśavam

— इस प्रकार पाप की शुद्धि के लिए इन्हें प्राप्त कर, चार दिन उपवास कर, पाँचवें दिन स्नान कर विधिवत केशव की पूजा करनी चाहिए,

श्लोक 14 (padma.4.23.14)

भोजयेद्ब्राह्मणान्भक्त्या तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम् । ततो नक्तं समश्नीयात्पंचगव्यं सुमंत्रितम् ।

bhojayedbrāhmaṇānbhaktyā tebhyo dadyācca dakṣiṇām tato naktaṁ samaśnīyātpaṁcagavyaṁ sumaṁtritam

— भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए। फिर रात्रि में सुमंत्रित पंचगव्य का सेवन करना चाहिए।

श्लोक 15 (padma.4.23.15)

एवं कर्तुमशक्तो यः फलमूलं च भोजनम् । कुर्याद्धविष्यं वा विप्र यथोक्तविधिना ह वै ।

evaṁ kartumaśakto yaḥ phalamūlaṁ ca bhojanam kuryāddhaviṣyaṁ vā vipra yathoktavidhinā ha vai

जो इस प्रकार करने में असमर्थ हो, उसे फल-मूल का भोजन करना चाहिए, अथवा, हे विप्र, यथोक्त विधि से हविष्यान्न का भोजन करना चाहिए।

श्लोक 16 (padma.4.23.16)

श्रीहरेः पंचकं विप्र कुर्याद्यस्तुलसीदलैः । पूजयेत्तं स विज्ञेयः स्वयं नारायणः प्रभुः ।

śrīhareḥ paṁcakaṁ vipra kuryādyastulasīdalaiḥ pūjayettaṁ sa vijñeyaḥ svayaṁ nārāyaṇaḥ prabhuḥ

हे विप्र, जो तुलसीदल से श्रीहरि का यह पंचक करता और उनकी पूजा करता है, उसे साक्षात् नारायण प्रभु ही जानना चाहिए।

श्लोक 17 (padma.4.23.17)

पुरा त्रेतायुगे शूद्रो दस्युवृत्तिपरायणः । नाम्ना दंडकरो नित्यं धर्मनिंदां करोति यः ।

purā tretāyuge śūdro dasyuvṛttiparāyaṇaḥ nāmnā daṁḍakaro nityaṁ dharmaniṁdāṁ karoti yaḥ

पूर्वकाल में त्रेतायुग में दंडकर नामक एक शूद्र था, जो दस्युवृत्ति में तत्पर, नित्य धर्म की निंदा करता था,

श्लोक 18 (padma.4.23.18)

असत्यभाषी मित्रघ्नो वेश्याविभ्रम लोलुपः । ब्रह्मस्वहारी क्रूरश्च परस्त्रीगमने रतः ।

asatyabhāṣī mitraghno veśyāvibhrama lolupaḥ brahmasvahārī krūraśca parastrīgamane rataḥ

— असत्यभाषी, मित्रघाती, वेश्याओं की चाहत में लोलुप, ब्राह्मण-धन का हरणकर्ता, क्रूर और पराई स्त्रियों के संग में रत,

श्लोक 19 (padma.4.23.19)

शरणागतहंता च पाखंडजनसंगभाक् । गोमांसाशी सुरापश्च परनिंदाकरः सदा ।

śaraṇāgatahaṁtā ca pākhaṁḍajanasaṁgabhāk gomāṁsāśī surāpaśca paraniṁdākaraḥ sadā

— शरणागत की हत्या करने वाला, पाखंडी लोगों की संगति करने वाला, गोमांस खाने वाला, मदिरापी और सदा दूसरों की निंदा करने वाला था,

श्लोक 20 (padma.4.23.20)

विश्वासघाती ज्ञातीनां वृत्तिच्छेदी द्विजोत्तम । दुष्टं सर्वे समालोक्य तादृशं तद्गृहे द्विजः ।

viśvāsaghātī jñātīnāṁ vṛtticchedī dvijottama duṣṭaṁ sarve samālokya tādṛśaṁ tadgṛhe dvijaḥ

— अपने ज्ञातिजनों के विश्वास को तोड़ने वाला और उनकी आजीविका को नष्ट करने वाला, हे द्विजोत्तम। ऐसे दुष्ट को देखकर —

श्लोक 21 (padma.4.23.21)

आगता ज्ञातयः क्रुद्धास्तस्य पापपरायणम् । ज्ञातय ऊचुः । रे रे मूढ दुराचार विनाशं प्रतिनीयते । या प्रतिष्ठार्जिता पूर्वैरस्माकं निर्मलेऽन्वये ।

āgatā jñātayaḥ kruddhāstasya pāpaparāyaṇam jñātaya ūcuḥ re re mūḍha durācāra vināśaṁ pratinīyate yā pratiṣṭhārjitā pūrvairasmākaṁ nirmale'nvaye

— उसके क्रोधित ज्ञातिजन आए। ज्ञातिजन बोले — "अरे मूर्ख, दुराचारी! तू हमारे निर्मल वंश में पूर्वजों द्वारा अर्जित प्रतिष्ठा को विनाश की ओर ले जा रहा है!"

श्लोक 22 (padma.4.23.22)

इति क्रुद्धा द्विजश्रेष्ठ अपकीर्तिभयादपि । पापिनां प्रवरं सर्वे तत्यजुस्तं कुलादरम् ।

iti kruddhā dvijaśreṣṭha apakīrtibhayādapi pāpināṁ pravaraṁ sarve tatyajustaṁ kulādaram

— इस प्रकार क्रोधित होकर, हे द्विजश्रेष्ठ, अपकीर्ति के भय से भी, उन सब पापियों में श्रेष्ठ उसके स्वजनों ने उसका कुल-सम्मान त्याग दिया।

श्लोक 23 (padma.4.23.23)

ततो गतो महारण्यं विनष्टाखिल वैभवः । कुर्यात्स दस्युभिः सार्द्धं दस्युकर्म निरंतरम् ।

tato gato mahāraṇyaṁ vinaṣṭākhila vaibhavaḥ kuryātsa dasyubhiḥ sārddhaṁ dasyukarma niraṁtaram

फिर, अपना सारा वैभव नष्ट होने पर, वह महावन को चला गया; वह डाकुओं के साथ निरंतर डाकुओं का ही कर्म करने लगा।

श्लोक 24 (padma.4.23.24)

पथि प्रगच्छतां तेषां भयाद्विप्र न खादितुम् । प्राप्तं किंचित्क्षुधार्त्तास्ते गताश्चान्य स्थलं प्रति ।

pathi pragacchatāṁ teṣāṁ bhayādvipra na khāditum prāptaṁ kiṁcitkṣudhārttāste gatāścānya sthalaṁ prati

मार्ग में जाने वालों के भय से, हे विप्र, वे खा नहीं पाते थे; भूख से पीड़ित होकर जो कुछ मिला, उसे लेकर वे दूसरे स्थान की ओर चले गए।

श्लोक 25 (padma.4.23.25)

तत्र प्रविष्टास्ते सर्वे दृष्ट्वा पुण्यजनान्बहून् । धात्रीमूले स्थितान्ब्रह्मन्वैष्णवान्द्विजसत्तमान् ।

tatra praviṣṭāste sarve dṛṣṭvā puṇyajanānbahūn dhātrīmūle sthitānbrahmanvaiṣṇavāndvijasattamān

वहाँ प्रवेश करते हुए उन सबने बहुत से पुण्यजनों को देखा, हे ब्रह्मन्, आँवले के मूल में बैठे वैष्णव, श्रेष्ठ द्विजों को।

श्लोक 26 (padma.4.23.26)

सर्वे ते दस्यवो विप्र गता दंडकरोऽपि सः । तेषां परिसरं गत्वा प्रणामं वै चकार ह ।

sarve te dasyavo vipra gatā daṁḍakaro'pi saḥ teṣāṁ parisaraṁ gatvā praṇāmaṁ vai cakāra ha

वे सभी डाकू, हे विप्र, दंडकर सहित, वहाँ गए। उनके समीप जाकर उसने प्रणाम किया।

श्लोक 27 (padma.4.23.27)

दंडकर उवाच । क्षुधार्तोऽहं द्विजश्रेष्ठाः प्राणा यास्यंति मे ध्रुवम् । ददध्वं खादितुं किंचिद्युष्माकं शरणं गतः ।

daṁḍakara uvāca kṣudhārto'haṁ dvijaśreṣṭhāḥ prāṇā yāsyaṁti me dhruvam dadadhvaṁ khādituṁ kiṁcidyuṣmākaṁ śaraṇaṁ gataḥ

दंडकर बोला — "हे द्विजश्रेष्ठो, मैं भूख से पीड़ित हूँ, मेरे प्राण निश्चय ही जाने वाले हैं। मुझे खाने को कुछ दीजिए, मैं आपकी शरण में आया हूँ।"

श्लोक 28 (padma.4.23.28)

आकर्ण्य वचनं तस्य चोचुस्ते धर्मतत्पराः । सर्वपापहरे त्वं च विख्याते विष्णुपंचके ।

ākarṇya vacanaṁ tasya cocuste dharmatatparāḥ sarvapāpahare tvaṁ ca vikhyāte viṣṇupaṁcake

उसके वचन सुनकर, धर्मपरायण उन लोगों ने कहा — "तुम इस समय समस्त पापों को हरने वाले विख्यात विष्णुपंचक में हो —

श्लोक 29 (padma.4.23.29)

कथमन्नं खादितुं ते वांछा त्वद्य हरेर्दिने । विशेषं ते ब्रूहि संज्ञा काते भवति सांप्रतम् ।

kathamannaṁ khādituṁ te vāṁchā tvadya harerdine viśeṣaṁ te brūhi saṁjñā kāte bhavati sāṁpratam

— आज, हरि के इस दिन ही, तुम अन्न खाने की इच्छा कैसे कर सकते हो? विशेष रूप से हमें बताओ, अभी तुम्हारी क्या पहचान है?"

श्लोक 30 (padma.4.23.30)

स उवाच मुदा विप्रा नाम्ना दंडकरोप्यहम् । सर्वपापसमायुक्तश्चोद्धारो मे कथं भवेत् ।

sa uvāca mudā viprā nāmnā daṁḍakaropyaham sarvapāpasamāyuktaścoddhāro me kathaṁ bhavet

उसने हर्षपूर्वक कहा, हे विप्रो — "मेरा नाम दंडकर है। समस्त पापों से युक्त हूँ, मेरा उद्धार कैसे हो सकता है?"

श्लोक 31 (padma.4.23.31)

ऊचुस्ते वै व्रतं श्रेष्ठं कुरुष्व विष्णुपंचकम् । विप्राणामाज्ञया विप्र चकार विष्णुपंचकम् ।

ūcuste vai vrataṁ śreṣṭhaṁ kuruṣva viṣṇupaṁcakam viprāṇāmājñayā vipra cakāra viṣṇupaṁcakam

उन्होंने कहा — "तुम विष्णुपंचक नामक श्रेष्ठ व्रत करो।" उन ब्राह्मणों की आज्ञा से, हे विप्र, उसने विष्णुपंचक व्रत किया।

श्लोक 32 (padma.4.23.32)

स प्रेत्य च हरेः स्थानमारुह्य स्यंदने वरे । आसाद्य श्रीहरेरूपं तस्थौ जन्मविवर्जितः ।

sa pretya ca hareḥ sthānamāruhya syaṁdane vare āsādya śrīharerūpaṁ tasthau janmavivarjitaḥ

मृत्यु के बाद वह एक श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ होकर हरि के धाम को गया, श्रीहरि के ही समान रूप को प्राप्त कर वह जन्म-रहित होकर वहाँ स्थित हो गया।

श्लोक 33 (padma.4.23.33)

य इदं शृणुयाद्भक्त्या चाख्यानं पापनाशनम् । कोटिजन्मार्जितं पापं तस्य नश्यति तत्क्षणात् ।

ya idaṁ śṛṇuyādbhaktyā cākhyānaṁ pāpanāśanam koṭijanmārjitaṁ pāpaṁ tasya naśyati tatkṣaṇāt

जो कोई इस पापनाशक आख्यान को भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके करोड़ों जन्मों का अर्जित पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

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