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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 25

नाम एवं पुराण माहात्म्य

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

श्लोक 1 (padma.4.25.1)

शौनक उवाच । श्रीपदं विष्णुचरितं सर्वोपद्रवनाशनम् । सर्वपापक्षयकरं दुष्टग्रहनिवारणम् ।

śaunaka uvāca śrīpadaṁ viṣṇucaritaṁ sarvopadravanāśanam sarvapāpakṣayakaraṁ duṣṭagrahanivāraṇam

श्रीपद, विष्णु का चरित, जो समस्त उपद्रवों का नाश करने वाला, समस्त पापों का क्षय करने वाला, दुष्ट ग्रहों का निवारण करने वाला है,

श्लोक 2 (padma.4.25.2)

विष्णुसान्निध्यदं चैव चतुर्वर्गफलप्रदम् । यः शृणोति नरो भक्त्या चांते याति हरेर्गृहम् ।

viṣṇusānnidhyadaṁ caiva caturvargaphalapradam yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā cāṁte yāti harergṛham

और विष्णु की सांनिध्यता प्रदान करने वाला, चारों पुरुषार्थों का फल देने वाला है — जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, वह अंत में हरि के घर को जाता है।

श्लोक 3 (padma.4.25.3)

नामोच्चारणमाहात्म्यं श्रूयते महदद्भुतम् । यदुच्चारणमात्रेण नरो यायात्परं पदम् ।

nāmoccāraṇamāhātmyaṁ śrūyate mahadadbhutam yaduccāraṇamātreṇa naro yāyātparaṁ padam

नाम-उच्चारण की महिमा एक महान अद्भुत बात के रूप में सुनी जाती है, जिसके उच्चारणमात्र से मनुष्य परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (padma.4.25.4)

तद्वदस्वाधुना सूत विधानं नामकीर्तने । सूत उवाच । शृणु शौनक वक्ष्यामि संवादं मोक्षसाधनम् ।

tadvadasvādhunā sūta vidhānaṁ nāmakīrtane sūta uvāca śṛṇu śaunaka vakṣyāmi saṁvādaṁ mokṣasādhanam

हे सूत, अब मुझे नाम-कीर्तन की विधि बताइए। सूत बोले — हे शौनक, सुनो, मैं मोक्ष का साधन एक संवाद कहता हूँ।

श्लोक 5 (padma.4.25.5)

नारदः पृष्टवान्पूर्वं कुमारं तद्वदामि ते । एकदा यमुनातीरे निविष्टं शांतमानसम् ।

nāradaḥ pṛṣṭavānpūrvaṁ kumāraṁ tadvadāmi te ekadā yamunātīre niviṣṭaṁ śāṁtamānasam

पूर्वकाल में नारद ने कुमार (सनत्कुमार) से यह पूछा था; मैं तुम्हें वह बताता हूँ। एक बार यमुना तट पर शांतचित्त बैठे हुए —

श्लोक 6 (padma.4.25.6)

सनत्कुमारं पप्रच्छ नारदो रचिताञ्जलि । श्रुत्वा नानाविधान्धर्मान्धर्मव्यतिकरांस्तथा ।

sanatkumāraṁ papraccha nārado racitāñjali śrutvā nānāvidhāndharmāndharmavyatikarāṁstathā

सनत्कुमार से नारद ने, हाथ जोड़कर, नाना प्रकार के धर्मों और धर्म-विपर्ययों को सुनकर, पूछा।

श्लोक 7 (padma.4.25.7)

श्रीनारद उवाच । योऽसौ भगवता प्रोक्तो धर्मव्यतिकरो नृणाम् । कथं तस्य विनाशः स्यादुच्यतां भगवत्प्रिय ।

śrīnārada uvāca yo'sau bhagavatā prokto dharmavyatikaro nṛṇām kathaṁ tasya vināśaḥ syāducyatāṁ bhagavatpriya

श्रीनारद बोले — "भगवान द्वारा कहा गया मनुष्यों का जो धर्म-विपर्यय है, उसका नाश कैसे हो? हे भगवत्प्रिय, यह बताइए।"

श्लोक 8 (padma.4.25.8)

श्रीसनत्कुमार उवाच । शृणु नारद गोविंद प्रिय गोविंदधर्मवित् । यत्पृष्टं लोकनिर्मुक्तिकारणं तमसः परम् ।

śrīsanatkumāra uvāca śṛṇu nārada goviṁda priya goviṁdadharmavit yatpṛṣṭaṁ lokanirmuktikāraṇaṁ tamasaḥ param

श्रीसनत्कुमार बोले — "हे नारद, हे गोविंद के प्रिय, हे गोविंद-धर्म के ज्ञाता, सुनो — जो तुमने पूछा है, वह अंधकार से परे, लोकों की मुक्ति का कारण है —

श्लोक 9 (padma.4.25.9)

सर्वाचारविवर्जिताः शठधियो व्रात्या जगद्वञ्चकाः । दंभाहंकृतिपानपैशुनपराः पापाश्च ये निष्ठुराः ।

sarvācāravivarjitāḥ śaṭhadhiyo vrātyā jagadvañcakāḥ daṁbhāhaṁkṛtipānapaiśunaparāḥ pāpāśca ye niṣṭhurāḥ

जो सर्वाचार से रहित, कुटिलबुद्धि, व्रात्य, जगत को ठगने वाले, दंभ-अहंकार-मद्यपान-चुगली में लीन, पापी और निष्ठुर हैं,

श्लोक 10 (padma.4.25.10)

ये चान्ये धनदारपुत्रनिरताः सर्वेऽधमास्तेऽपि हि । श्रीगोविंदपदारविंदशरणाः शुद्धा भवंति द्विज ।

ye cānye dhanadāraputraniratāḥ sarve'dhamāste'pi hi śrīgoviṁdapadāraviṁdaśaraṇāḥ śuddhā bhavaṁti dvija

और अन्य जो केवल धन, पत्नी, पुत्र में लीन हैं — ये सब अधम भी, हे द्विज, श्रीगोविंद के चरणकमलों की शरण से शुद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 11 (padma.4.25.11)

तमपि देवकरं करुणाकरस्थविरजंगममुक्तिकरं परम् । अतिचरंत्यपराधपरा जना य इह तान्वपति ध्रुवनाम हि ।

tamapi devakaraṁ karuṇākarasthavirajaṁgamamuktikaraṁ param aticaraṁtyaparādhaparā janā ya iha tānvapati dhruvanāma hi

उस करुणा के आगार, अनादि, अचल-सचल, परम मुक्तिदाता को — जो लोग यहाँ अपराध करने में तत्पर हैं, उन्हें भी वह शाश्वत नाम निश्चय ही तार देता है।

श्लोक 12 (padma.4.25.12)

सर्वापराधकृदपि मुच्यते हरिसंश्रयः । हरेरप्यपराधान्यः कुर्याद्द्विपदपांसनः ।

sarvāparādhakṛdapi mucyate harisaṁśrayaḥ harerapyaparādhānyaḥ kuryāddvipadapāṁsanaḥ

समस्त अपराध करने वाला भी हरि की शरण से मुक्त हो जाता है। परंतु जो हरि का ही अपराध करता है, किसी द्विपद (मनुष्य भक्त) का अपमान करते हुए —

श्लोक 13 (padma.4.25.13)

नामाश्रयः कदाचित्स्यात्तरत्येव स नामतः । नाम्नो हि सर्वसुहृदो ह्यपराधात्पतत्यधः ।

nāmāśrayaḥ kadācitsyāttaratyeva sa nāmataḥ nāmno hi sarvasuhṛdo hyaparādhātpatatyadhaḥ

— यदि वह कभी नाम की शरण लेता भी है, तो नाममात्र से वह तर जाता है। परंतु समस्त मित्र रूप नाम का अपराध करने से मनुष्य नीचे गिर जाता है।

श्लोक 14 (padma.4.25.14)

श्रीनारद उवाच । के तेऽपराधा विप्रेंद्र नाम्नो भगवतः कृताः । विनिघ्नंति नृणां कृत्यं प्राकृतं ह्यानयंति च ।

śrīnārada uvāca ke te'parādhā vipreṁdra nāmno bhagavataḥ kṛtāḥ vinighnaṁti nṛṇāṁ kṛtyaṁ prākṛtaṁ hyānayaṁti ca

श्रीनारद बोले — "हे द्विजेंद्र, भगवान के नाम के वे कौन से अपराध हैं, जो मनुष्यों के पुण्य कर्म को नष्ट कर देते हैं और उन्हें सांसारिक, नीच स्वभाव में ले आते हैं?"

श्लोक 15 (padma.4.25.15)

श्रीसनत्कुमार उवाच । सतां निंदा नाम्नः परममपराधं वितनुते । यतः ख्यातिं यांतं कथमु सहते तद्विगर्हाम् । शुभस्य* श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादिसकलं । धियाभिन्नं पश्येत्स खलु हरिनामाहितकरः ।

śrīsanatkumāra uvāca satāṁ niṁdā nāmnaḥ paramamaparādhaṁ vitanute yataḥ khyātiṁ yāṁtaṁ kathamu sahate tadvigarhām śubhasya* śrīviṣṇorya iha guṇanāmādisakalaṁ dhiyābhinnaṁ paśyetsa khalu harināmāhitakaraḥ

श्रीसनत्कुमार बोले — "साधुओं की निंदा नाम के प्रति सबसे बड़ा अपराध है — क्योंकि जो प्रसिद्धि को प्राप्त हो चुका है, उसकी निंदा वह कैसे सहन करेगा? जो कोई भी इस लोक में शुभ श्रीविष्णु के गुण-नाम आदि समस्त को बुद्धि से भिन्न-भिन्न देखता है (अर्थात शिव और विष्णु में भेद मानता है), वह निश्चय ही हरि-नाम का अहित करने वाला है।

श्लोक 16 (padma.4.25.16)

*[कहीं ।(शिवस्य)] । गुरोरवज्ञा श्रुतिशास्त्रनिंदनं तथार्थवादो हरिनाम्नि कल्पनम् । नामापराधस्य हि पापबुद्धिर्न विद्यते तस्य यमैर्हि शुद्धिः ।

*[kahīṁ (śivasya)] guroravajñā śrutiśāstraniṁdanaṁ tathārthavādo harināmni kalpanam nāmāparādhasya hi pāpabuddhirna vidyate tasya yamairhi śuddhiḥ

गुरु का अनादर, श्रुति-शास्त्र की निंदा, हरि-नाम की महिमा को अर्थवाद (मात्र अतिशयोक्ति) मानना — इस प्रकार नाम का अपराध करने वाले की पापबुद्धि नहीं मिटती, और उसकी शुद्धि साधारण यमों (प्रायश्चित्तों) से भी नहीं होती।

श्लोक 17 (padma.4.25.17)

धर्मव्रतत्याग हुतादि सर्वशुभक्रिया साम्यमपि प्रमादः । अश्रद्दधानो विमुखोऽप्यशृण्वन्यश्चोपदेशः शिवनामापराधः ।

dharmavratatyāga hutādi sarvaśubhakriyā sāmyamapi pramādaḥ aśraddadhāno vimukho'pyaśṛṇvanyaścopadeśaḥ śivanāmāparādhaḥ

धर्म, व्रत, हवन आदि के त्याग और समस्त शुभ क्रियाओं को नाम के समान मान लेना भी एक प्रमाद (चूक) है; इसी प्रकार जो श्रद्धाहीन, विमुख अथवा न सुनने वाले को उपदेश देता है, वह भी नाम का अपराध है।

श्लोक 18 (padma.4.25.18)

श्रुत्वापि नाममाहात्म्यं यः प्रीतिरहितोऽधमः । अहं ममादि परमो नाम्नि सोऽप्यपराधकृत् ।

śrutvāpi nāmamāhātmyaṁ yaḥ prītirahito'dhamaḥ ahaṁ mamādi paramo nāmni so'pyaparādhakṛt

जो अधम नाम की महिमा सुनकर भी प्रेमरहित रहता है, "मैं" और "मेरा" में परम आसक्त रहता है, वह भी नाम-अपराधी है।

श्लोक 19 (padma.4.25.19)

एवं नारद शंकरेण कृपया मह्यं मुनीनां परं । प्रोक्तं नामसुखावहं भगवतो वर्ज्यं सदा यत्नतः । ये ज्ञात्वापि न वर्जयंति सहसा नाम्नोऽपराधान्दश । क्रुद्धा मातरमप्यभोजनपराः खिद्यंति ते बालवत् ।

evaṁ nārada śaṁkareṇa kṛpayā mahyaṁ munīnāṁ paraṁ proktaṁ nāmasukhāvahaṁ bhagavato varjyaṁ sadā yatnataḥ ye jñātvāpi na varjayaṁti sahasā nāmno'parādhāndaśa kruddhā mātaramapyabhojanaparāḥ khidyaṁti te bālavat

इस प्रकार, हे नारद, शंकर ने कृपापूर्वक मुनियों के हित के लिए यह परम रहस्य मुझसे कहा — जो नाम के सुख को लाने वाला है और सदा प्रयत्नपूर्वक त्यागने योग्य है। जो लोग जानकर भी नाम के इन दस अपराधों को तत्काल नहीं त्यागते, वे क्रोधित माता की तरह, जो भोजन त्याग बैठी हो, बालकों के समान स्वयं को कष्ट देते हैं।

श्लोक 20 (padma.4.25.20)

अपराधविमुक्तो हि नाम्नि जप्तं सदा चर । नाम्नैव तव देवर्षे सर्वं सेत्स्यति नान्यतः ।

aparādhavimukto hi nāmni japtaṁ sadā cara nāmnaiva tava devarṣe sarvaṁ setsyati nānyataḥ

अपराध से मुक्त होकर सदा नाम-जप में तत्पर रहना चाहिए। हे देवर्षि, तुम्हारा सब कुछ नाम से ही सिद्ध होगा, अन्य किसी उपाय से नहीं।"

श्लोक 21 (padma.4.25.21)

श्रीनारद उवाच । सनत्कुमार प्रिय साहसानां विवेकवैराग्यविवर्जितानाम् । देहप्रियार्थात्मपरायणानां मुक्तापराधाः प्रभवंति नः कथम् ।

śrīnārada uvāca sanatkumāra priya sāhasānāṁ vivekavairāgyavivarjitānām dehapriyārthātmaparāyaṇānāṁ muktāparādhāḥ prabhavaṁti naḥ katham

श्रीनारद बोले — "हे प्रिय सनत्कुमार, विवेक और वैराग्य से रहित, देह-सुख और स्वार्थ में लीन साहसी (दुःसाहसी) लोगों को अपराध-मुक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?"

श्लोक 22 (padma.4.25.22)

श्रीसनत्कुमार उवाच । जाते नामापराधे तु प्रमादे तु कथंचन । सदा संकीर्तयन्नाम तदेकशरणो भवेत् ।

śrīsanatkumāra uvāca jāte nāmāparādhe tu pramāde tu kathaṁcana sadā saṁkīrtayannāma tadekaśaraṇo bhavet

श्रीसनत्कुमार बोले — "यदि किसी प्रमाद से किसी प्रकार नाम का अपराध हो भी जाए, तो सदा नाम का ही संकीर्तन करते रहना चाहिए, उसी की एकमात्र शरण लेकर।

श्लोक 23 (padma.4.25.23)

नामापराधयुक्तानां नामान्येव हरंत्यघम् । अविश्रांति प्रयुक्तानि तान्येवार्थ कराणि यत् ।

nāmāparādhayuktānāṁ nāmānyeva haraṁtyagham aviśrāṁti prayuktāni tānyevārtha karāṇi yat

नाम के अपराधों से युक्त लोगों के भी वे पाप नाम ही हर लेते हैं — निरंतर जपे गए वे नाम ही सिद्धि प्रदान करने वाले होते हैं।

श्लोक 24 (padma.4.25.24)

नामैकं यस्य चिह्नं स्मरणपथगतं श्रोत्रमूलं गतं वा । शुद्धं वाऽशुद्धवर्णं व्यवहितरहितं तारयत्येव सत्यम् । तच्चेद्देहद्रविणजनितालोभपाखण्ड मध्ये । निक्षिप्तं स्यान्न फलजनकं शीघ्रमेवात्र विप्र ।

nāmaikaṁ yasya cihnaṁ smaraṇapathagataṁ śrotramūlaṁ gataṁ vā śuddhaṁ vā'śuddhavarṇaṁ vyavahitarahitaṁ tārayatyeva satyam tacceddehadraviṇajanitālobhapākhaṇḍa madhye nikṣiptaṁ syānna phalajanakaṁ śīghramevātra vipra

जिसका एक नाम ही चिह्न बन जाए, चाहे वह स्मरण के मार्ग में आया हो या केवल कान की जड़ तक पहुँचा हो, चाहे शुद्ध उच्चारण में हो या अशुद्ध में, बिना व्यवधान के — वह सत्य ही तार देता है। परंतु यदि वह देह और धन से उत्पन्न लोभ तथा पाखंड के बीच रखा जाए, तो, हे विप्र, वह यहाँ शीघ्र फलदायक नहीं होता।

श्लोक 25 (padma.4.25.25)

इदं रहस्यं परमं पुरा नारद शंकरात् । श्रुतं सर्वाशुभहरमपराधनिवारकम् ।

idaṁ rahasyaṁ paramaṁ purā nārada śaṁkarāt śrutaṁ sarvāśubhaharamaparādhanivārakam

यह परम रहस्य पूर्वकाल में नारद ने शंकर से सुना था, जो समस्त अशुभ का नाश करने वाला और अपराधों का निवारण करने वाला है।

श्लोक 26 (padma.4.25.26)

विदुर्विष्ण्वभिधानं ये ह्यपराधपरा नराः । तेषामपि भवेन्मुक्तिः पठनादेव नारद ।

vidurviṣṇvabhidhānaṁ ye hyaparādhaparā narāḥ teṣāmapi bhavenmuktiḥ paṭhanādeva nārada

जो मनुष्य अपराध में तत्पर होते हुए भी विष्णु के इस नाम-प्रवचन को जानते हैं, हे नारद, उनकी भी मुक्ति इसके पठनमात्र से हो जाती है।

श्लोक 27 (padma.4.25.27)

नाम्नो माहात्म्यमखिलं पुराणे परिगीयते । ततः पुराणमखिलं श्रोतुमर्हसि मानद ।

nāmno māhātmyamakhilaṁ purāṇe parigīyate tataḥ purāṇamakhilaṁ śrotumarhasi mānada

नाम की समस्त महिमा पुराण में गाई गई है; इसलिए, हे मानद, तुम्हें संपूर्ण पुराण सुनने योग्य है।

श्लोक 28 (padma.4.25.28)

पुराणश्रवणे श्रद्धा यस्य स्याद्भ्रातरन्वहम् । तस्य साक्षात्प्रसन्नः स्याच्छिवो विष्णुश्च सानुगः ।

purāṇaśravaṇe śraddhā yasya syādbhrātaranvaham tasya sākṣātprasannaḥ syācchivo viṣṇuśca sānugaḥ

हे भ्राता, जिसकी पुराण-श्रवण में प्रतिदिन श्रद्धा है, उस पर शिव और अनुचरों सहित विष्णु साक्षात् प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 29 (padma.4.25.29)

यत्स्नात्वा पुष्करे तीर्थे प्रयागे सिंधुसंगमे । तत्फलं द्विगुणं तस्य श्रद्धया वै शृणोति यः ।

yatsnātvā puṣkare tīrthe prayāge siṁdhusaṁgame tatphalaṁ dviguṇaṁ tasya śraddhayā vai śṛṇoti yaḥ

पुष्कर तीर्थ में, प्रयाग में, अथवा सिंधु-संगम में स्नान करने से जो फल मिलता है, श्रद्धापूर्वक जो इसे सुनता है, उसे उससे दोगुना फल मिलता है।

श्लोक 30 (padma.4.25.30)

ये पठंति पुराणानि शृण्वंति च समाहिताः । प्रत्यक्षरं लभंत्येते कपिलादानजं फलम् ।

ye paṭhaṁti purāṇāni śṛṇvaṁti ca samāhitāḥ pratyakṣaraṁ labhaṁtyete kapilādānajaṁ phalam

जो सावधानीपूर्वक पुराणों को पढ़ते और सुनते हैं, उन्हें प्रत्येक अक्षर पर कपिला-गौदान के समान फल प्राप्त होता है।

श्लोक 31 (padma.4.25.31)

अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्यां मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ।

aputro labhate putraṁ dhanārthī labhate dhanam vidyārthī labhate vidyāṁ mokṣārthī mokṣamāpnuyāt

निःसंतान पुत्र पाता है, धनार्थी धन पाता है, विद्यार्थी विद्या पाता है, मोक्षार्थी मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 32 (padma.4.25.32)

ये शृण्वंति पुराणानि कोटिजन्मार्जितं खलु । पापजालं तु ते हत्वा गच्छंति हरिमंदिरम् ।

ye śṛṇvaṁti purāṇāni koṭijanmārjitaṁ khalu pāpajālaṁ tu te hatvā gacchaṁti harimaṁdiram

जो पुराणों को सुनते हैं, वे करोड़ों जन्मों के अर्जित पाप-जाल को नष्ट कर हरि के मंदिर को जाते हैं।

श्लोक 33 (padma.4.25.33)

पुराणवाचकं विप्रं पूजयेद्भक्तिभावतः । गोभूहिरण्यवस्त्रैश्च गंधपुष्पादिभिर्मुने ।

purāṇavācakaṁ vipraṁ pūjayedbhaktibhāvataḥ gobhūhiraṇyavastraiśca gaṁdhapuṣpādibhirmune

हे मुने, पुराण-वाचक ब्राह्मण की भक्तिभावपूर्वक गौ, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र, गंध-पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 34 (padma.4.25.34)

कांस्यैर्विनिर्मितं पात्रं जलपात्रं मुदान्वितः । कर्णकुंडलकं चैव मुद्रिकां स्वर्णनिर्मिताम् ।

kāṁsyairvinirmitaṁ pātraṁ jalapātraṁ mudānvitaḥ karṇakuṁḍalakaṁ caiva mudrikāṁ svarṇanirmitām

कांसे से बना पात्र, जलपात्र हर्षपूर्वक, कर्णकुंडल और सुवर्ण से बनी अंगूठी,

श्लोक 35 (padma.4.25.35)

आसनं तु तथा दद्यात्पुष्पमाल्यं तपोधन । वित्तशाठ्यं न कुर्वीत दानं हीनफलं यतः ।

āsanaṁ tu tathā dadyātpuṣpamālyaṁ tapodhana vittaśāṭhyaṁ na kurvīta dānaṁ hīnaphalaṁ yataḥ

— और आसन भी देना चाहिए, हे तपोधन, पुष्पमाला सहित। धन में कंजूसी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि (कंजूसी से किया गया) दान हीन फल देने वाला होता है।

श्लोक 36 (padma.4.25.36)

पुराणं वाचयेद्विप्र सर्वकामार्थसिद्धये । सुवर्णं रजतं वस्त्रं पुष्पमाल्यं तु चंदनम् ।

purāṇaṁ vācayedvipra sarvakāmārthasiddhaye suvarṇaṁ rajataṁ vastraṁ puṣpamālyaṁ tu caṁdanam

समस्त कामनाओं की सिद्धि के लिए ब्राह्मण को पुराण का पाठ करना चाहिए; सुवर्ण, चाँदी, वस्त्र, पुष्पमाला और चंदन —

श्लोक 37 (padma.4.25.37)

दद्याद्यो पुस्तकं भक्त्या सगच्छेद्धरिमंदिरम् । कुर्वंति विधिनानेन संपूर्णं पुस्तकं च ये । तेषां नामानि लिंपेत चित्रगुप्तोऽर्चनाद्द्विज ।

dadyādyo pustakaṁ bhaktyā sagaccheddharimaṁdiram kurvaṁti vidhinānena saṁpūrṇaṁ pustakaṁ ca ye teṣāṁ nāmāni liṁpeta citragupto'rcanāddvija

— जो पुस्तक सहित भक्तिपूर्वक देता है, वह हरि के मंदिर को जाता है। जो इस विधि से संपूर्ण पुस्तक (लिखवाकर) तैयार कराते हैं, उनके नाम, हे द्विज, इस पूजा के प्रभाव से चित्रगुप्त अंकित करते हैं।

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