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पाताल खण्ड · अध्याय 10

शत्रुघ्न को शिक्षा

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (padma.5.10.1)

शेष उवाच। इत्थं संशृण्वतो धर्मान्वसंतः समुपस्थितः । यत्र यज्ञ क्रियादीनां प्रारंभः सुमहात्मनाम्

śeṣa uvāca itthaṁ saṁśṛṇvato dharmānvasaṁtaḥ samupasthitaḥ yatra yajña kriyādīnāṁ prāraṁbhaḥ sumahātmanām

शेष जी ने कहा — इस प्रकार धर्मों को सुनते हुए वसंत ऋतु आ पहुँची, जिसमें महात्माओं के यज्ञ-कर्म का प्रारंभ होता है।

श्लोक 2 (padma.5.10.2)

दृष्ट्वा तं समयं धीमान्वसिष्ठः कलशोद्भवः । रामचंद्रं महाराजं प्रत्युवाच यथोचितम्

dṛṣṭvā taṁ samayaṁ dhīmānvasiṣṭhaḥ kalaśodbhavaḥ rāmacaṁdraṁ mahārājaṁ pratyuvāca yathocitam

उस समय को देखकर बुद्धिमान् कलश-जन्मा वसिष्ठ ने महाराज रामचंद्र से यथोचित कहा —

श्लोक 3 (padma.5.10.3)

वसिष्ठ उवाच। रामचंद्र महाबाहो समयः पर्यभूत्तव । हयो यत्र प्रमुच्येत यज्ञार्थं परिपूजितः

vasiṣṭha uvāca rāmacaṁdra mahābāho samayaḥ paryabhūttava hayo yatra pramucyeta yajñārthaṁ paripūjitaḥ

वसिष्ठ ने कहा — "हे महाबाहु रामचंद्र! तुम्हारा वह समय आ गया है, जब विधिपूर्वक पूजित घोड़े को यज्ञ के लिए छोड़ना चाहिए।

श्लोक 4 (padma.5.10.4)

सामग्री क्रियतां तत्र आहूयंतां द्विजोत्तमाः । करोतु पूजां भगवान्ब्राह्मणानां यथोचिताम्

sāmagrī kriyatāṁ tatra āhūyaṁtāṁ dvijottamāḥ karotu pūjāṁ bhagavānbrāhmaṇānāṁ yathocitām

वहाँ सामग्री तैयार की जाए, श्रेष्ठ द्विजों को बुलाया जाए; भगवान् ब्राह्मणों की यथोचित पूजा करें।

श्लोक 5 (padma.5.10.5)

दीनांधकृपणानां च दानं स्वांते समुत्थितम् । ददातु विधिवत्तेषां प्रतिपूज्याधिमान्य च

dīnāṁdhakṛpaṇānāṁ ca dānaṁ svāṁte samutthitam dadātu vidhivatteṣāṁ pratipūjyādhimānya ca

हृदय से उठे हुए दान को दीन, अंध और दरिद्रजनों को विधिपूर्वक, सम्मानपूर्वक दें।

श्लोक 6 (padma.5.10.6)

भवान्कनकसत्पत्न्या दीक्षितोऽत्र व्रतं चर । भूमिशायी ब्रह्मचारी वसुभोगविवर्जितः

bhavānkanakasatpatnyā dīkṣito'tra vrataṁ cara bhūmiśāyī brahmacārī vasubhogavivarjitaḥ

आप स्वर्णमयी पत्नी सहित यहाँ दीक्षित होकर व्रत का पालन करें — भूमि पर शयन करते हुए, ब्रह्मचारी रहते हुए, धन-भोग का त्याग करते हुए,

श्लोक 7 (padma.5.10.7)

मृगशृंगधरः कट्यां मेखलाजिनदंडभृत् । करोतु यज्ञसंभारं सर्वद्रव्यसमन्वितम्

mṛgaśṛṁgadharaḥ kaṭyāṁ mekhalājinadaṁḍabhṛt karotu yajñasaṁbhāraṁ sarvadravyasamanvitam

कमर में मृगशृंग, मेखला, मृगचर्म और दंड धारण करते हुए — यज्ञ की सम्पूर्ण द्रव्य-सामग्री तैयार करें।"

श्लोक 8 (padma.5.10.8)

इति श्रुत्वा महद्वाक्यं वसिष्ठस्य यथार्थकम् । उवाच लक्ष्मणं धीमान्नानार्थपरिबृंहितम्

iti śrutvā mahadvākyaṁ vasiṣṭhasya yathārthakam uvāca lakṣmaṇaṁ dhīmānnānārthaparibṛṁhitam

वसिष्ठ जी की यह सत्य, महान् वाणी सुनकर बुद्धिमान् राम ने अनेक अर्थों से युक्त वचन लक्ष्मण से कहा —

श्लोक 9 (padma.5.10.9)

श्रीराम उवाच। शृणु लक्ष्मण मद्वाक्यं श्रुत्वा तत्कुरु सत्वरम् । हयमानय यत्नेन वाजिमेधक्रियोचितम्

śrīrāma uvāca śṛṇu lakṣmaṇa madvākyaṁ śrutvā tatkuru satvaram hayamānaya yatnena vājimedhakriyocitam

श्रीराम ने कहा — "हे लक्ष्मण! मेरी बात सुनो, और सुनकर शीघ्र वही करो — अश्वमेध की क्रिया के योग्य घोड़े को यत्नपूर्वक ले आओ।"

श्लोक 10 (padma.5.10.10)

शेष उवाच। श्रुत्वा वाक्यं रघुपतेः शत्रुजिल्लक्ष्मणस्तदा । सेनापतिमुवाचेदं वचो विविधवर्णनम्

śeṣa uvāca śrutvā vākyaṁ raghupateḥ śatrujillakṣmaṇastadā senāpatimuvācedaṁ vaco vividhavarṇanam

शेष जी ने कहा — रघुपति का यह वचन सुनकर शत्रुविजयी लक्ष्मण ने सेनापति से विविध वर्णन से युक्त यह वचन कहा —

श्लोक 11 (padma.5.10.11)

लक्ष्मण उवाच। वीराकर्णय मे वचः सुमधुरं श्रुत्वा त्वरातः पुनः । कार्यं तत्क्षितिपालमौलिमुकुटैर्घृष्टांघ्रि रामाज्ञया । सेनां कालबलप्रभंजनबलप्रोद्यत्समर्थांगिनीं । सज्जां सद्रथहस्तिपत्तिसुहयारोहैर्विधे ह्यन्विताम्

lakṣmaṇa uvāca vīrākarṇaya me vacaḥ sumadhuraṁ śrutvā tvarātaḥ punaḥ kāryaṁ tatkṣitipālamaulimukuṭairghṛṣṭāṁghri rāmājñayā senāṁ kālabalaprabhaṁjanabalaprodyatsamarthāṁginīṁ sajjāṁ sadrathahastipattisuhayārohairvidhe hyanvitām

लक्ष्मण ने कहा — "हे वीर! मेरी मधुर वाणी सुनकर तुरंत वही करो जो राम की आज्ञा से, जिनके चरण राजाओं के मुकुटों से घिसे रहते हैं, करणीय है — काल के समान बलशाली, समर्थ अंगों वाली सेना को उत्तम रथ, हाथी, पैदल तथा उत्तम अश्वारोहियों सहित सुसज्जित करो।

श्लोक 12 (padma.5.10.12)

सज्जीयतां वायुजवास्तुरंगास्तरंगमाला ललितांघ्रिपाताः । सदश्वचारैर्बहुशस्त्रधारिभिः संरोहिता वैरिबलप्रहारिभिः

sajjīyatāṁ vāyujavāsturaṁgāstaraṁgamālā lalitāṁghripātāḥ sadaśvacārairbahuśastradhāribhiḥ saṁrohitā vairibalaprahāribhiḥ

वायु के समान वेगवान्, लहर के समान चंचल चाल वाले घोड़े, अनेक शस्त्रधारी कुशल अश्वारोहियों से युक्त, शत्रु-सेना पर प्रहार करने वाले तैयार किए जाएँ।

श्लोक 13 (padma.5.10.13)

संलक्ष्यतां हस्तिनः पर्वताभा आधोरणैः प्रासकुंताग्रहस्तैः । शूरैः सास्त्रैर्भूरिदानोपहाराः क्षीबाणस्ते सर्वशस्त्रास्त्रपूर्णाः

saṁlakṣyatāṁ hastinaḥ parvatābhā ādhoraṇaiḥ prāsakuṁtāgrahastaiḥ śūraiḥ sāstrairbhūridānopahārāḥ kṣībāṇaste sarvaśastrāstrapūrṇāḥ

पर्वत के समान हाथी, हाथ में भाला-बरछे लिए महावतों सहित, शस्त्रधारी शूरवीरों सहित, अनेक दान बहाते हुए, मदमस्त, समस्त शस्त्रास्त्रों से परिपूर्ण, चिह्नित किए जाएँ।

श्लोक 14 (padma.5.10.14)

विततबहुसमृद्धिभ्राजमाना रथा मे पवनजवनवेगैर्वाजिभिर्युज्यमानाः । विविधरिपुविनाशस्मारकैरायुधास्त्रैर्भृतवलभिविभागानीयतां सूतवृंदैः

vitatabahusamṛddhibhrājamānā rathā me pavanajavanavegairvājibhiryujyamānāḥ vividharipuvināśasmārakairāyudhāstrairbhṛtavalabhivibhāgānīyatāṁ sūtavṛṁdaiḥ

अपार समृद्धि से देदीप्यमान मेरे रथ, वायु के समान वेगवान् घोड़ों से युक्त, अनेक शत्रु-नाश की स्मृति दिलाने वाले शस्त्रास्त्रों से भरे हुए, सारथियों के समूहों द्वारा भाग-भाग में लाए जाएँ।

श्लोक 15 (padma.5.10.15)

पत्तयः शतशो मह्यमायांत्वस्त्राग्न्यपाणयः । हयमेधार्हवाहस्य रक्षणे विततोद्यमाः

pattayaḥ śataśo mahyamāyāṁtvastrāgnyapāṇayaḥ hayamedhārhavāhasya rakṣaṇe vitatodyamāḥ

हाथों में अस्त्र और अग्नि लिए सैकड़ों पैदल सैनिक मेरे पास आएँ, जो अश्वमेध के योग्य वाहन की रक्षा में पूर्णतः तत्पर हों।"

श्लोक 16 (padma.5.10.16)

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः । सेनानी कालजिन्नामा कारयामास सज्जताम्

ityākarṇya vacastasya lakṣmaṇasya mahātmanaḥ senānī kālajinnāmā kārayāmāsa sajjatām

महात्मा लक्ष्मण के इस वचन को सुनकर कालजित् नामक सेनापति ने सब कुछ तैयार करवाया।

श्लोक 17 (padma.5.10.17)

दशध्रुवकमंडितो लघुसुरोमशोभान्वितो विविक्तगलशुक्तिभृद्विततकंठको शेमणिः मुखे विशदकांतिधृत्त्वसितकांतिभृत्कर्णयोर्व्यराजत तदाह यो धृतकराग्ररश्मिच्छटः

daśadhruvakamaṁḍito laghusuromaśobhānvito viviktagalaśuktibhṛdvitatakaṁṭhako śemaṇiḥ mukhe viśadakāṁtidhṛttvasitakāṁtibhṛtkarṇayorvyarājata tadāha yo dhṛtakarāgraraśmicchaṭaḥ

दस आभूषणों से सज्जित, मृदु रोमों की शोभा से युक्त, कंठ में स्वच्छ शंख-आभूषण तथा विस्तृत रत्नजड़ित कंठहार धारण किए, मुख की उज्ज्वल कांति से तथा कानों की श्याम कांति से देदीप्यमान वह घोड़ा किरणों की छटा से युक्त अयाल धारण किए हुए सुशोभित हो रहा था।

श्लोक 18 (padma.5.10.18)

कलासंशोभितमुखः स्फुरद्रत्नविशोभितः । मुक्ताफलानां मालाभिः शोभितो निर्ययौ हयः

kalāsaṁśobhitamukhaḥ sphuradratnaviśobhitaḥ muktāphalānāṁ mālābhiḥ śobhito niryayau hayaḥ

कलात्मक आभूषणों से सुशोभित मुख वाला, चमकते रत्नों से सुशोभित, मोतियों की मालाओं से अलंकृत वह घोड़ा बाहर निकला।

श्लोक 19 (padma.5.10.19)

श्वेतातपत्ररचितः सितचामरशोभितः । बहुशोभापरीतांगो निर्ययौ हयराट्ततः

śvetātapatraracitaḥ sitacāmaraśobhitaḥ bahuśobhāparītāṁgo niryayau hayarāṭtataḥ

श्वेत छत्र से सुसज्जित, श्वेत चँवरों से सुशोभित, अपार शोभा से युक्त शरीर वाला वह अश्वराज तब बाहर निकला।

श्लोक 20 (padma.5.10.20)

अग्रतो मध्यतश्चैके पृष्ठतः सैनिकास्तथा । देवा हरिं यथापूर्वं सेवंते सेवनोचितम्

agrato madhyataścaike pṛṣṭhataḥ sainikāstathā devā hariṁ yathāpūrvaṁ sevaṁte sevanocitam

कुछ सैनिक आगे, कुछ मध्य में, कुछ पीछे — जैसे देवता हरि की उचित सेवा में सदा से संलग्न रहते हैं।

श्लोक 21 (padma.5.10.21)

अथ सैन्यं समाहूय सर्वमाज्ञापयत्तदा । हस्त्यश्वरथपादातवृन्दैः सुबहुसंकुलम्

atha sainyaṁ samāhūya sarvamājñāpayattadā hastyaśvarathapādātavṛndaiḥ subahusaṁkulam

तब सम्पूर्ण सेना को बुलाकर उन्होंने आज्ञा दी — हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों के समूहों से अत्यंत घनी वह सेना।

श्लोक 22 (padma.5.10.22)

ततस्ततः समेतानां सैन्यानां श्रूयते ध्वनिः । ततो दुंदुभिनादोऽभूत्तस्मिन्पुरवरे तदा

tatastataḥ sametānāṁ sainyānāṁ śrūyate dhvaniḥ tato duṁdubhinādo'bhūttasminpuravare tadā

चारों ओर से एकत्र हुई सेनाओं की गर्जना सुनाई देने लगी; तब उस श्रेष्ठ नगर में दुंदुभियों का घोष होने लगा।

श्लोक 23 (padma.5.10.23)

तन्निनादेन शूराणां प्रियेण महता तदा । कंपंति गिरिशृंगाणि प्रासादा विचलंति च

tanninādena śūrāṇāṁ priyeṇa mahatā tadā kaṁpaṁti giriśṛṁgāṇi prāsādā vicalaṁti ca

वीरों की उस विशाल, प्रिय ध्वनि से पर्वत-शिखर काँपने लगे और महल हिलने लगे।

श्लोक 24 (padma.5.10.24)

हेषारवो महानासीद्वाजिनां मुह्यतां नृप । रथांगघातसंघुष्टा धरा संचलतीव सा

heṣāravo mahānāsīdvājināṁ muhyatāṁ nṛpa rathāṁgaghātasaṁghuṣṭā dharā saṁcalatīva sā

हे राजन्! मदमस्त घोड़ों की महान् हिनहिनाहट होने लगी; रथ-चक्रों की घर्घराहट से गूँजती हुई पृथ्वी मानो हिलने लगी।

श्लोक 25 (padma.5.10.25)

चलितैर्गजयूथैश्च पृथ्वी रुद्धा समंततः । रजस्तु प्रचलत्तत्र जनांतर्द्धानमादधात्

calitairgajayūthaiśca pṛthvī ruddhā samaṁtataḥ rajastu pracalattatra janāṁtarddhānamādadhāt

चलती हुई हाथियों की पंक्तियों से पृथ्वी चारों ओर से अवरुद्ध हो गई; उठती हुई धूल ने लोगों को अदृश्य कर दिया।

श्लोक 26 (padma.5.10.26)

निर्जगाम महासैन्यं छत्रैः संछाद्य भास्करम् । सेनान्याकालजिन्नाम्ना प्रेरितं जनसंकुलम्

nirjagāma mahāsainyaṁ chatraiḥ saṁchādya bhāskaram senānyākālajinnāmnā preritaṁ janasaṁkulam

कालजित् नामक सेनापति द्वारा प्रेरित, लोगों से भरी विशाल सेना छत्रों से सूर्य को ढकते हुए निकल पड़ी।

श्लोक 27 (padma.5.10.27)

गर्जंतस्तलवीराग्र्याः कुर्वंतो रणसंभ्रमम् । रघुनाथस्य यागाय सज्जास्ते प्रययुर्मुदा

garjaṁtastalavīrāgryāḥ kurvaṁto raṇasaṁbhramam raghunāthasya yāgāya sajjāste prayayurmudā

गर्जन करते हुए, युद्ध की हलचल मचाते हुए सर्वश्रेष्ठ अग्रणी वीर रघुनाथ के यज्ञ के लिए हर्षपूर्वक तैयार होकर चल पड़े।

श्लोक 28 (padma.5.10.28)

मृगमदमयमंगेष्वंगरागं दधानाः कुसुमविमलमालाशोभितस्वोत्तमांगाः । मुकुटकटकभूषाभूषितांगाः समस्ताः प्रययुरवनिनाथप्रेरितास्तेऽपि सर्वे

mṛgamadamayamaṁgeṣvaṁgarāgaṁ dadhānāḥ kusumavimalamālāśobhitasvottamāṁgāḥ mukuṭakaṭakabhūṣābhūṣitāṁgāḥ samastāḥ prayayuravanināthapreritāste'pi sarve

अंगों पर कस्तूरी का अंगराग धारण किए, स्वच्छ पुष्प-मालाओं से सुशोभित उत्तम मस्तक वाले, मुकुट-कड़ों से अलंकृत शरीर वाले वे सभी, पृथ्वीपति द्वारा प्रेरित होकर एक साथ चल पड़े।

श्लोक 29 (padma.5.10.29)

इत्येवं ते महाराजं ययुः सेनाचरा वराः । धनुर्धराः पाशधराः खड्गधाराः स्फुटक्रमाः

ityevaṁ te mahārājaṁ yayuḥ senācarā varāḥ dhanurdharāḥ pāśadharāḥ khaḍgadhārāḥ sphuṭakramāḥ

इस प्रकार वे श्रेष्ठ सैनिक महाराज के पास गए — धनुर्धर, पाशधारी, तलवार धारण किए हुए, स्पष्ट अनुशासित चाल वाले।

श्लोक 30 (padma.5.10.30)

एवं शनैःशनैः प्राप्तो मंडपं यागचिह्नितम् । हयः खुरक्षततलां भूमिं कुर्वन्नभः प्लवन्

evaṁ śanaiḥśanaiḥ prāpto maṁḍapaṁ yāgacihnitam hayaḥ khurakṣatatalāṁ bhūmiṁ kurvannabhaḥ plavan

इस प्रकार धीरे-धीरे वह घोड़ा यज्ञ-चिह्नित मंडप तक पहुँचा, अपने खुरों से भूमि को क्षत-विक्षत करता हुआ, मानो आकाश में उड़ता हुआ।

श्लोक 31 (padma.5.10.31)

रामो दृष्ट्वा हरिं प्राप्तं बहुसंतुष्टमानसः । वसिष्ठं प्रेरयामास क्रियाकर्तव्यतां प्रति

rāmo dṛṣṭvā hariṁ prāptaṁ bahusaṁtuṣṭamānasaḥ vasiṣṭhaṁ prerayāmāsa kriyākartavyatāṁ prati

घोड़े को पहुँचा हुआ देखकर राम का मन अत्यंत संतुष्ट हुआ; उन्होंने वसिष्ठ को यज्ञ-कर्म सम्पन्न करने के लिए प्रेरित किया।

श्लोक 32 (padma.5.10.32)

वसिष्ठो राममाहूय स्वर्णपत्नीसमन्वितम् । प्रयोगं कारयामास ब्रह्महत्यापनोदनम्

vasiṣṭho rāmamāhūya svarṇapatnīsamanvitam prayogaṁ kārayāmāsa brahmahatyāpanodanam

वसिष्ठ ने स्वर्णमयी पत्नी सहित राम को बुलाकर ब्रह्महत्या के पाप को दूर करने वाला प्रयोग सम्पन्न करवाया।

श्लोक 33 (padma.5.10.33)

ब्रह्मचर्यव्रतधरो मृगशृंगपरिग्रहः । तत्कर्म कारयामास रामः परपुरंजयः

brahmacaryavratadharo mṛgaśṛṁgaparigrahaḥ tatkarma kārayāmāsa rāmaḥ parapuraṁjayaḥ

ब्रह्मचर्य-व्रत धारण किए, मृगशृंग हाथ में लिए, शत्रुनगरों के विजेता राम ने वह कर्म सम्पन्न करवाया।

श्लोक 34 (padma.5.10.34)

प्रारेभे यागकर्मार्थं कुंडं मण्डपसंमितम् । तत्राचार्योभवद्धीमान्वेदशास्त्रविचारवित्

prārebhe yāgakarmārthaṁ kuṁḍaṁ maṇḍapasaṁmitam tatrācāryobhavaddhīmānvedaśāstravicāravit

यज्ञ-कर्म के लिए मंडप के अनुरूप कुंड का निर्माण आरंभ किया गया; वहाँ आचार्य वेद-शास्त्र के विचार में निपुण एक बुद्धिमान् मुनि हुए।

श्लोक 35 (padma.5.10.35)

वसिष्ठो रघुनाथस्य कुलपूर्वगुरुर्मुनिः । ब्रह्मंस्तत्राचरद्ब्रह्मकर्मागस्त्यस्तपोनिधिः

vasiṣṭho raghunāthasya kulapūrvagururmuniḥ brahmaṁstatrācaradbrahmakarmāgastyastaponidhiḥ

हे ब्रह्मन्! रघुनाथ के कुल के पूर्वगुरु मुनि वसिष्ठ ने वहाँ ब्रह्म-कर्म का आचरण किया, तपोनिधि अगस्त्य सहित।

श्लोक 36 (padma.5.10.36)

वाल्मीकिर्मुनिरध्वर्युर्मुनिः कण्वस्तु द्वारपः । अष्टौ द्वाराणि तत्रासन्सतोरण शुभानि वै

vālmīkirmuniradhvaryurmuniḥ kaṇvastu dvārapaḥ aṣṭau dvārāṇi tatrāsansatoraṇa śubhāni vai

मुनि वाल्मीकि अध्वर्यु थे, मुनि कण्व द्वारपाल थे; वहाँ आठ द्वार थे, तोरणों से सुशोभित तथा शुभ।

श्लोक 37 (padma.5.10.37)

द्वारि द्वारि द्वयं विप्र ब्राह्मणस्याधिमंत्रवित् । पूर्वद्वारि मुनिश्रेष्ठौ देवलासित संज्ञितौ

dvāri dvāri dvayaṁ vipra brāhmaṇasyādhimaṁtravit pūrvadvāri muniśreṣṭhau devalāsita saṁjñitau

हे विप्र! प्रत्येक द्वार पर मंत्र में निपुण दो-दो ब्राह्मण थे। पूर्वद्वार पर देवल और असित नामक दो श्रेष्ठ मुनि थे।

श्लोक 38 (padma.5.10.38)

दक्षिणद्वारि भूमानौ कश्यपात्री तपोनिधी । पश्चिमद्वारि ऋषभौ जातूकर्ण्योऽथ जाजलिः

dakṣiṇadvāri bhūmānau kaśyapātrī taponidhī paścimadvāri ṛṣabhau jātūkarṇyo'tha jājaliḥ

दक्षिण द्वार पर महान्, तपोनिधि कश्यप और अत्रि थे। पश्चिम द्वार पर दो श्रेष्ठ, जातूकर्ण्य और जाजलि थे।

श्लोक 39 (padma.5.10.39)

उत्तरद्वारि तु मुनी द्वौ द्वितैकत तापसौ । एवं द्वारविधिं कृत्वा वसिष्ठः कलशोद्भवः

uttaradvāri tu munī dvau dvitaikata tāpasau evaṁ dvāravidhiṁ kṛtvā vasiṣṭhaḥ kalaśodbhavaḥ

उत्तर द्वार पर द्वित और एकत नामक दो तपस्वी मुनि थे। इस प्रकार द्वार-विधि सम्पन्न करके कलश-जन्मा वसिष्ठ ने —

श्लोक 40 (padma.5.10.40)

हयवर्यस्य सत्पूजां कर्तुमारभत द्विज । सुवासिन्यः स्त्रियस्तत्र वासोलंकारभूषिताः

hayavaryasya satpūjāṁ kartumārabhata dvija suvāsinyaḥ striyastatra vāsolaṁkārabhūṣitāḥ

हे द्विज! श्रेष्ठ घोड़े की सत्पूजा आरंभ की। वहाँ सुहागिनें, वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित,

श्लोक 41 (padma.5.10.41)

हरिद्राक्षतगंधाद्यैः पूजयामासुरर्चितम् । नीराजनं ततः कृत्वा धूपयित्वागुरूक्षणैः

haridrākṣatagaṁdhādyaiḥ pūjayāmāsurarcitam nīrājanaṁ tataḥ kṛtvā dhūpayitvāgurūkṣaṇaiḥ

हल्दी, अक्षत, चंदन आदि से उसकी पूजा करने लगीं। फिर आरती करके, अगर से धूप देकर —

श्लोक 42 (padma.5.10.42)

वर्धापनं ततो वेश्याश्चक्रुस्ता वाडवाज्ञया । एवं संपूज्य विमले भाले चंदनचर्चिते

vardhāpanaṁ tato veśyāścakrustā vāḍavājñayā evaṁ saṁpūjya vimale bhāle caṁdanacarcite

ब्राह्मणों की आज्ञा से वेश्याओं ने वर्धापन (मंगल-गान) किया। इस प्रकार पूजा करके, चंदन से लिप्त निर्मल माथे पर —

श्लोक 43 (padma.5.10.43)

कुंकुमादिकगंधाढ्ये सर्वशोभासमन्विते । बबंध भास्वरं पत्रं तप्तहाटकनिर्मितम्

kuṁkumādikagaṁdhāḍhye sarvaśobhāsamanvite babaṁdha bhāsvaraṁ patraṁ taptahāṭakanirmitam

कुंकुम आदि सुगंधों से युक्त, सम्पूर्ण शोभा से सज्जित तपे हुए सोने से बना चमकता हुआ पत्र बाँधा।

श्लोक 44 (padma.5.10.44)

तत्रालिखद्दाशरथेः प्रतापबलमूर्जितम् । सूर्यवंशध्वजो धन्वी धनुर्दीक्षा गुरुर्गुरुः

tatrālikhaddāśaratheḥ pratāpabalamūrjitam sūryavaṁśadhvajo dhanvī dhanurdīkṣā gururguruḥ

उस पर दशरथ-पुत्र के प्रताप और बल का वर्णन लिखा — सूर्यवंश की ध्वजा, धनुर्धारी, धनुर्विद्या की दीक्षा के गुरुओं के भी गुरु,

श्लोक 45 (padma.5.10.45)

यं देवाः सासुराः सर्वे नमंति मणिमौलिभिः । तस्यात्मजो वीरबलदर्पहारी रघूद्वहः

yaṁ devāḥ sāsurāḥ sarve namaṁti maṇimaulibhiḥ tasyātmajo vīrabaladarpahārī raghūdvahaḥ

जिन्हें असुरों सहित सभी देवता अपने रत्नजड़ित मुकुटों से नमस्कार करते हैं; उनके पुत्र, वीरों के बल का गर्व हरने वाले, रघुकुल के धारक —

श्लोक 46 (padma.5.10.46)

रामचंद्रो महाभागः सर्वशूरशिरोमणिः । तन्माता कोसलनृपपत्नीगर्भसमुद्भवा

rāmacaṁdro mahābhāgaḥ sarvaśūraśiromaṇiḥ tanmātā kosalanṛpapatnīgarbhasamudbhavā

महाभाग्यशाली रामचंद्र, समस्त शूरवीरों के शिरोमणि; कोसल-नरेश की पत्नी के गर्भ से उत्पन्न उनकी माता —

श्लोक 47 (padma.5.10.47)

तस्याः कुक्षिभवं रत्नं रामः शत्रुक्षयंकरः । करोति हयमेधं वै ब्राह्मणेन सुशिक्षितः

tasyāḥ kukṣibhavaṁ ratnaṁ rāmaḥ śatrukṣayaṁkaraḥ karoti hayamedhaṁ vai brāhmaṇena suśikṣitaḥ

उनके गर्भ से उत्पन्न रत्न, शत्रुनाशक राम, ब्राह्मण द्वारा सुशिक्षित होकर यह अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं।

श्लोक 48 (padma.5.10.48)

रावणाभिधविप्रेंद्र वधपापापनुत्तये । मोचितस्तेन वाहानां मुख्योऽसौ वाजिनां वरः

rāvaṇābhidhavipreṁdra vadhapāpāpanuttaye mocitastena vāhānāṁ mukhyo'sau vājināṁ varaḥ

हे विप्रेंद्र रावण-नामक के वध के पाप को दूर करने के लिए, उनके द्वारा घोड़ों में श्रेष्ठ यह मुख्य अश्व मुक्त किया गया है,

श्लोक 49 (padma.5.10.49)

महाबलपरीवार परिखाभिः सुरक्षितः । तद्रक्षकोऽस्ति तद्भ्राता शत्रुघ्नो लवणांतकः

mahābalaparīvāra parikhābhiḥ surakṣitaḥ tadrakṣako'sti tadbhrātā śatrughno lavaṇāṁtakaḥ

जो महान् सेना और खाइयों से सुरक्षित है; उसका रक्षक उनका भाई शत्रुघ्न है, लवणासुर का अंत करने वाला।

श्लोक 50 (padma.5.10.50)

हस्त्यश्वरथपादात सेनासंघसमन्वितः । यस्य राज्ञ इति श्रेष्ठो मानः स्यात्स्वबलोन्मदात्

hastyaśvarathapādāta senāsaṁghasamanvitaḥ yasya rājña iti śreṣṭho mānaḥ syātsvabalonmadāt

हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना के समूह सहित — 'जो राजा अपने बल के मद से यह श्रेष्ठ मान रखता हो —

श्लोक 51 (padma.5.10.51)

वयं धनुर्धराः शूराः श्रेष्ठा वयमिहोत्कटाः । ते गृह्णंतु बलाद्वाहं रत्नमालाविभूषितम्

vayaṁ dhanurdharāḥ śūrāḥ śreṣṭhā vayamihotkaṭāḥ te gṛhṇaṁtu balādvāhaṁ ratnamālāvibhūṣitam

हम धनुर्धर, शूरवीर, यहाँ सर्वश्रेष्ठ और उग्र हैं' — वे बलपूर्वक रत्नमाला से विभूषित इस घोड़े को पकड़ें!

श्लोक 52 (padma.5.10.52)

मनोवेगं कामजवं सर्वगत्यधिभास्वरम् । ततो मोचयिता भ्राता शत्रुघ्नो लीलया हयम्

manovegaṁ kāmajavaṁ sarvagatyadhibhāsvaram tato mocayitā bhrātā śatrughno līlayā hayam

मन के समान वेगवान्, इच्छा के समान तीव्र, सब गतियों में सर्वाधिक तेजस्वी — तब भाई शत्रुघ्न लीलापूर्वक घोड़े को छुड़ा लेंगे,

श्लोक 53 (padma.5.10.53)

शरासनविनिर्मुक्त वत्सदंतैः शिखाशितैः

śarāsanavinirmukta vatsadaṁtaiḥ śikhāśitaiḥ

धनुष से छूटे हुए, बछड़े के दाँत के समान तीखे, अत्यंत तीक्ष्ण बाणों से —

श्लोक 54 (padma.5.10.54)

इत्येवमादि विलिलेख महामुनींद्रः । श्रीरामचंद्र भुजवीर्यलसत्प्रतापम् । शोभानिधानमतिचंचलवायुवेगं । पातालभूतलविशेषगतिं मुमोच

ityevamādi vililekha mahāmunīṁdraḥ śrīrāmacaṁdra bhujavīryalasatpratāpam śobhānidhānamaticaṁcalavāyuvegaṁ pātālabhūtalaviśeṣagatiṁ mumoca

इस प्रकार और भी बहुत कुछ महामुनींद्र ने लिख दिया — श्रीरामचंद्र की भुजाओं के बल से देदीप्यमान प्रताप, शोभा का निधान, अत्यंत चंचल वायु के समान वेग वाले उस घोड़े को उन्होंने पाताल और पृथ्वीतल की विशेष गति के लिए छोड़ दिया।

श्लोक 55 (padma.5.10.55)

शत्रुघ्नमादिदेशाथ रामः शस्त्रभृतां वरः । याहि वाहस्य रक्षार्थं पृष्ठतः स्वैरगामिनः

śatrughnamādideśātha rāmaḥ śastrabhṛtāṁ varaḥ yāhi vāhasya rakṣārthaṁ pṛṣṭhataḥ svairagāminaḥ

तब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम ने शत्रुघ्न को आदेश दिया — "स्वच्छंद विचरण करते हुए घोड़े की रक्षा के लिए उसके पीछे-पीछे जाओ।

श्लोक 56 (padma.5.10.56)

शत्रुघ्न गच्छ वाहस्य मार्गं भद्रं भवेत्तव । भवेतां शत्रुविजयौ रिपुकर्षण ते भुजौ

śatrughna gaccha vāhasya mārgaṁ bhadraṁ bhavettava bhavetāṁ śatruvijayau ripukarṣaṇa te bhujau

हे शत्रुघ्न! जाओ, घोड़े का मार्ग तुम्हारे लिए मंगलमय हो; हे शत्रुओं को कुचलने वाले! तुम्हारी दोनों भुजाओं को शत्रु पर विजय प्राप्त हो।

श्लोक 57 (padma.5.10.57)

ये योद्धारः प्रतिरणगतास्ते त्वया वारणीया-। वाहं रक्ष स्वकगुणगणैः संयुतः सन्महोर्व्याम् । सुप्तान्भ्रष्टान्विगतवसनान्भीतभीतांस्तु नम्रां-। स्तान्मा हन्याः सुकृतकृतिनो येन शंसंति कर्म

ye yoddhāraḥ pratiraṇagatāste tvayā vāraṇīyā- vāhaṁ rakṣa svakaguṇagaṇaiḥ saṁyutaḥ sanmahorvyām suptānbhraṣṭānvigatavasanānbhītabhītāṁstu namrāṁ- stānmā hanyāḥ sukṛtakṛtino yena śaṁsaṁti karma

जो योद्धा युद्ध में सामने आएँ, उन्हें तुम्हें रोकना है — किन्तु इस विशाल पृथ्वी पर अपने ही गुणों से युक्त होकर घोड़े की रक्षा करो। सोए हुए, गिरे हुए, वस्त्रहीन, अत्यंत भयभीत तथा झुके हुए लोगों को कभी मत मारना — क्योंकि इन्हीं के व्यवहार से सज्जनों के कर्म की प्रशंसा होती है।

श्लोक 58 (padma.5.10.58)

विरथा भयसंत्रस्ता ये वदंति वयं तव । ते त्वया न हि हंतव्याः शत्रुघ्न सुकृतैषिणा

virathā bhayasaṁtrastā ye vadaṁti vayaṁ tava te tvayā na hi haṁtavyāḥ śatrughna sukṛtaiṣiṇā

जो रथहीन, भय से त्रस्त होकर कहें 'हम तुम्हारे हैं' — हे पुण्य के अभिलाषी शत्रुघ्न! उन्हें तुम्हें कभी नहीं मारना चाहिए।

श्लोक 59 (padma.5.10.59)

यो हन्याद्विमदं मत्तं सुप्तं मग्नं भयातुरम् । तावकोऽहं ब्रुवाणं च स व्रजत्यधमां गतिम्

yo hanyādvimadaṁ mattaṁ suptaṁ magnaṁ bhayāturam tāvako'haṁ bruvāṇaṁ ca sa vrajatyadhamāṁ gatim

जो निर्मद, मत्त, सोए हुए, डूबे हुए, भय से आतुर तथा 'मैं तुम्हारा हूँ' कहने वाले को मार डालता है, वह अधम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 60 (padma.5.10.60)

परस्वे चित्तवृत्तिं त्वं मा कृथाः पारदारिके । नीचे रतिं न कुर्वीथाः सर्वसद्गुणपूरितः

parasve cittavṛttiṁ tvaṁ mā kṛthāḥ pāradārike nīce ratiṁ na kurvīthāḥ sarvasadguṇapūritaḥ

दूसरे के धन में और पराई स्त्री में अपना मन कभी मत लगाना; समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण होकर नीचता में रुचि मत रखना।

श्लोक 61 (padma.5.10.61)

वृद्धानां प्रेरणं पूर्वं मा कुर्वीथा रणं जय । पूज्यपूजातिक्रमं त्वं मा विधेहि दयान्वितः

vṛddhānāṁ preraṇaṁ pūrvaṁ mā kurvīthā raṇaṁ jaya pūjyapūjātikramaṁ tvaṁ mā vidhehi dayānvitaḥ

हे विजेता! युद्ध में वृद्धजनों को पहले मत उकसाना; दयायुक्त होकर पूज्यजनों की पूजा का उल्लंघन कभी मत करना।

श्लोक 62 (padma.5.10.62)

गां विप्रं च नमस्कुर्या वैष्णवं धर्मसंयुतम् । अभिवाद्य यतो गच्छेस्तत्र सिद्धिमवाप्नुयाः

gāṁ vipraṁ ca namaskuryā vaiṣṇavaṁ dharmasaṁyutam abhivādya yato gacchestatra siddhimavāpnuyāḥ

गाय तथा वैष्णव धर्म से युक्त ब्राह्मण को नमस्कार करना; जहाँ भी जाओ, वहाँ अभिवादन करके ही सिद्धि प्राप्त करोगे।

श्लोक 63 (padma.5.10.63)

विष्णुः सर्वेश्वरः साक्षी सर्वव्यापकदेहभृत् । ये तदीया महाबाहो तद्रूपा विचरंति हि

viṣṇuḥ sarveśvaraḥ sākṣī sarvavyāpakadehabhṛt ye tadīyā mahābāho tadrūpā vicaraṁti hi

विष्णु सबके स्वामी, साक्षी, सर्वव्यापी शरीरधारी हैं; जो उनके अपने भक्त उन्हीं के रूप में विचरण करते हैं —

श्लोक 64 (padma.5.10.64)

ये स्मरंति महाविष्णुं सर्वभूतहृदि स्थितम् । ते मंतव्या महाविष्णु समरूपा रघूद्वह

ye smaraṁti mahāviṣṇuṁ sarvabhūtahṛdi sthitam te maṁtavyā mahāviṣṇu samarūpā raghūdvaha

जो समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित महाविष्णु का स्मरण करते हैं, हे रघुकुलधारक! उन्हें महाविष्णु के समान ही समझना चाहिए।

श्लोक 65 (padma.5.10.65)

यस्य स्वीयो न पारक्यो यस्य मित्रसमो रिपुः । ते वैष्णवाः क्षणादेव पापिनं पावयंति हि

yasya svīyo na pārakyo yasya mitrasamo ripuḥ te vaiṣṇavāḥ kṣaṇādeva pāpinaṁ pāvayaṁti hi

जिनके लिए न कोई अपना है, न पराया, जिनके लिए शत्रु भी मित्र के समान है — ऐसे वैष्णव पापी को भी क्षणभर में पवित्र कर देते हैं।

श्लोक 66 (padma.5.10.66)

येषां प्रियं भागवतं येषां वै ब्राह्मणाः प्रियाः । वैकुंठात्प्रेषितास्तेऽत्र लोकपावनहेतवे

yeṣāṁ priyaṁ bhāgavataṁ yeṣāṁ vai brāhmaṇāḥ priyāḥ vaikuṁṭhātpreṣitāste'tra lokapāvanahetave

जिन्हें भगवद्भक्त प्रिय हैं, जिन्हें ब्राह्मण प्रिय हैं — वे इस लोक की पवित्रता के लिए वैकुण्ठ से भेजे गए हैं।

श्लोक 67 (padma.5.10.67)

येषां वक्त्रे हरेर्नाम हृदि विष्णुः सनातनः । उदरे विष्णुनैवेद्यः स श्वपाकोऽपि वैष्णवः

yeṣāṁ vaktre harernāma hṛdi viṣṇuḥ sanātanaḥ udare viṣṇunaivedyaḥ sa śvapāko'pi vaiṣṇavaḥ

जिनके मुख में हरि का नाम है, हृदय में सनातन विष्णु हैं, उदर में केवल विष्णु को अर्पित नैवेद्य ही है — वह चांडाल भी वैष्णव है।

श्लोक 68 (padma.5.10.68)

येषां वेदाः प्रियतमा न च संसारजं सुखम् । स्वधर्मनिरता ये च तान्नमस्कुर्विहान्वितान्

yeṣāṁ vedāḥ priyatamā na ca saṁsārajaṁ sukham svadharmaniratā ye ca tānnamaskurvihānvitān

जिन्हें वेद सबसे प्रिय हैं, संसार का सुख नहीं, जो अपने ही धर्म में तत्पर हैं — उन्हें अपने साथियों सहित नमस्कार करना।

श्लोक 69 (padma.5.10.69)

शिवे विष्णौ न वा भेदो न च ब्रह्ममहेशयोः । तेषां पादरजः पूतं वहाम्यघविनाशनम्

śive viṣṇau na vā bhedo na ca brahmamaheśayoḥ teṣāṁ pādarajaḥ pūtaṁ vahāmyaghavināśanam

शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं, न ब्रह्मा और महेश में; उनके चरणों की पवित्र धूल मैं पाप का नाश करने वाली मानकर धारण करता हूँ।

श्लोक 70 (padma.5.10.70)

गौरी गंगा महालक्ष्मीर्यस्य नास्ति पृथक्तया । ते मंतव्या नराः सर्वे स्वर्गलोकादिहागताः

gaurī gaṁgā mahālakṣmīryasya nāsti pṛthaktayā te maṁtavyā narāḥ sarve svargalokādihāgatāḥ

जिनके लिए गौरी, गंगा और महालक्ष्मी में कोई भेद नहीं — उन सभी मनुष्यों को स्वर्गलोक से यहाँ आया हुआ मानना चाहिए।

श्लोक 71 (padma.5.10.71)

शरणागतरक्षी च मानदानपरायणः । यथाशक्ति हरेः प्रीत्यै स ज्ञेयो वैष्णवोत्तमः

śaraṇāgatarakṣī ca mānadānaparāyaṇaḥ yathāśakti hareḥ prītyai sa jñeyo vaiṣṇavottamaḥ

शरणागत की रक्षा करने वाला, सम्मान और दान में तत्पर, अपनी शक्ति के अनुसार हरि की प्रसन्नता के लिए कार्य करने वाला — वही श्रेष्ठ वैष्णव जानना चाहिए।

श्लोक 72 (padma.5.10.72)

यस्य नाम महापापराशिं दहति सत्वरम् । तदीय चरणद्वंद्वे भक्तिर्यस्य स वैष्णवः

yasya nāma mahāpāparāśiṁ dahati satvaram tadīya caraṇadvaṁdve bhaktiryasya sa vaiṣṇavaḥ

जिसका नाम महापाप की राशि को तुरंत भस्म कर देता है, और जिसे उसके चरण-युगल में भक्ति है — वही वैष्णव है।

श्लोक 73 (padma.5.10.73)

इंद्रियाणि वशे येषां मनोऽपि हरिचिंतकम् । तान्नमस्कृत्य पूयात्सह्या जन्ममरणांतिकात्

iṁdriyāṇi vaśe yeṣāṁ mano'pi hariciṁtakam tānnamaskṛtya pūyātsahyā janmamaraṇāṁtikāt

जिनकी इंद्रियाँ वश में हैं, जिनका मन भी हरि-चिंतन में लगा है — उन्हें नमस्कार करके जन्म-मृत्यु के अंत तक पार होना चाहिए।

श्लोक 74 (padma.5.10.74)

परस्त्रियं त्वं करवालवत्त्यजन्भवेर्यशोभूषणभूतिभूमिः । एवं ममादेशमथाचरंश्च लभेः परं धाम सुयोगमीड्यम्

parastriyaṁ tvaṁ karavālavattyajanbhaveryaśobhūṣaṇabhūtibhūmiḥ evaṁ mamādeśamathācaraṁśca labheḥ paraṁ dhāma suyogamīḍyam

तलवार के समान पराई स्त्री का त्याग करते हुए तुम कीर्ति, आभूषण और ऐश्वर्य के आधार बनोगे; इस प्रकार मेरे आदेश का पालन करते हुए तुम पूज्य, उत्तम, सुंदर परमधाम को प्राप्त करोगे।"

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11