पाताल खण्ड · अध्याय 101
राजा की मृत्यु: नरक-दर्शन और तीन वैशाखों की शक्ति
श्लोक 1 (padma.5.101.1)
यम उवाच- अथ कालकटाक्षेण लक्षितो नृपतिस्तदा । मृतोऽतिरतिसेवोत्थ क्षयक्षीणकलेवरः
yama uvāca- atha kālakaṭākṣeṇa lakṣito nṛpatistadā mṛto'tiratisevottha kṣayakṣīṇakalevaraḥ
यम ने कहा— तब काल की कुदृष्टि से चिह्नित वह राजा, अत्यधिक रति-सेवन से क्षीण-क्षय शरीर वाला होकर मर गया।
श्लोक 2 (padma.5.101.2)
नीयमानो यमगणैस्ताड्यमानो मुहुर्मुहुः । क्रन्दमानो महारावान्स स्मरन्निजपातकम्
nīyamāno yamagaṇaistāḍyamāno muhurmuhuḥ krandamāno mahārāvānsa smarannijapātakam
यमगणों द्वारा ले जाया जाता हुआ, बार-बार पीटा जाता हुआ, अपने ही पाप का स्मरण करता हुआ वह ऊँचे स्वर में चिल्ला रहा था।
श्लोक 3 (padma.5.101.3)
विष्णुदूतैः समागम्य ताडयित्वा ममानुगान् । धर्मवानयमित्युक्त्वा विमानमथ रोपितः
viṣṇudūtaiḥ samāgamya tāḍayitvā mamānugān dharmavānayamityuktvā vimānamatha ropitaḥ
तब विष्णु के दूतों ने आकर मेरे अनुचरों को पीटकर, 'यह धर्मवान है' यह कहकर उसे विमान पर बिठा दिया।
श्लोक 4 (padma.5.101.4)
नीतो हरिपुरं भूपः स्तूयमानोऽप्सरोगणैः । प्रातःस्नानेन वैशाखमासस्य क्षीणपातकः
nīto haripuraṁ bhūpaḥ stūyamāno'psarogaṇaiḥ prātaḥsnānena vaiśākhamāsasya kṣīṇapātakaḥ
वैशाखमास के प्रातःस्नान से पापक्षीण हुआ वह राजा अप्सराओं के समूह द्वारा स्तुत होकर हरिपुर की ओर ले जाया गया।
श्लोक 5 (padma.5.101.5)
अथ धर्मविहीनोऽयमिति मत्वा च तैः पुनः । देवदूतैर्निदेशेन विष्णोर्भूमिपतिस्तदा । अदूरादेव निरयवर्त्मना स समाहितः
atha dharmavihīno'yamiti matvā ca taiḥ punaḥ devadūtairnideśena viṣṇorbhūmipatistadā adūrādeva nirayavartmanā sa samāhitaḥ
परंतु तब उन दिव्य दूतों ने 'यह अन्य धर्म से रहित है' यह सोचकर, विष्णु की ही आज्ञा से, उस भूपति को थोड़ी ही दूर पर पुनः नरक-मार्ग पर मोड़ दिया।
श्लोक 6 (padma.5.101.6)
स गच्छन्नपि शुश्राव जीवानां क्रंदतां पुनः । निरये पच्यमानानामारावं विविधं तदा
sa gacchannapi śuśrāva jīvānāṁ kraṁdatāṁ punaḥ niraye pacyamānānāmārāvaṁ vividhaṁ tadā
वह जाते हुए भी नरक में पकते हुए जीवों की बार-बार चिल्लाती हुई नाना प्रकार की चीत्कार सुनता रहा।
श्लोक 7 (padma.5.101.7)
पापिनां क्वथ्यमानानामाक्रंदमतिदारुणम् । श्रुत्वा विस्मयवान्विप्र राजाभूदतिदुःखितः
pāpināṁ kvathyamānānāmākraṁdamatidāruṇam śrutvā vismayavānvipra rājābhūdatiduḥkhitaḥ
उबाले जाते हुए पापियों की अत्यंत भयंकर चीत्कार सुनकर, हे विप्र! राजा विस्मित होकर अत्यंत दुःखी हो गया।
श्लोक 8 (padma.5.101.8)
प्रोवाच दूताः किमयमाक्रंदो दारुणः श्रुतः । पुनर्न श्रूयते तन्मे कारणं वक्तुमर्हथ
provāca dūtāḥ kimayamākraṁdo dāruṇaḥ śrutaḥ punarna śrūyate tanme kāraṇaṁ vaktumarhatha
उसने कहा— हे दूतो! यह जो भयंकर चीत्कार सुनाई पड़ी और फिर सुनाई नहीं दी, इसका कारण मुझे बताइए।
श्लोक 9 (padma.5.101.9)
दूता ऊचु- जंतवस्त्यक्तमर्यादाः पापास्त्वाचारवर्जिताः । निरयेषु च घोरेषु तामिस्रादिषु पातिताः
dūtā ūcu- jaṁtavastyaktamaryādāḥ pāpāstvācāravarjitāḥ nirayeṣu ca ghoreṣu tāmisrādiṣu pātitāḥ
दूतों ने कहा— मर्यादा त्याग करने वाले, पापी, आचारहीन प्राणी भयंकर नरकों में — तामिस्र आदि में — गिराए गए हैं।
श्लोक 10 (padma.5.101.10)
कृतपातकिनस्त्वत्र प्राणत्यागादनंतरम् । याम्यं पंथानमाश्रित्य दुःखमश्नंति दारुणम्
kṛtapātakinastvatra prāṇatyāgādanaṁtaram yāmyaṁ paṁthānamāśritya duḥkhamaśnaṁti dāruṇam
यहाँ पाप करने वाले प्राणत्याग के तुरंत बाद यम-मार्ग का आश्रय लेकर भयंकर दुःख भोगते हैं।
श्लोक 11 (padma.5.101.11)
यमस्य पुरुषैर्घोरैः कृष्यमाणा इतस्ततः । अंधकारे निपतिता भक्ष्यंते ह्यतिदारुणैः
yamasya puruṣairghoraiḥ kṛṣyamāṇā itastataḥ aṁdhakāre nipatitā bhakṣyaṁte hyatidāruṇaiḥ
यम के भयंकर पुरुषों द्वारा इधर-उधर घसीटे जाकर, अंधकार में गिरकर, वे अत्यंत भयंकर प्राणियों द्वारा खाए जाते हैं —
श्लोक 12 (padma.5.101.12)
श्वभिः शृगालैः क्रव्यादैः काककंकबकादिभिः । अग्नितुंडैर्वृकव्याघ्रैर्भुजगैर्वृश्चिकादिभिः
śvabhiḥ śṛgālaiḥ kravyādaiḥ kākakaṁkabakādibhiḥ agnituṁḍairvṛkavyāghrairbhujagairvṛścikādibhiḥ
कुत्तों, सियारों, मांसभक्षियों, कौओं-बाजों-बगुलों आदि द्वारा; अग्निमुख भेड़ियों-बाघों, सर्पों-बिच्छुओं आदि द्वारा।
श्लोक 13 (padma.5.101.13)
अग्निना दाह्यमानाश्च तुद्यमानाश्च कंटकैः । क्रकचैः पाट्यमानाश्च पीड्यमानाश्च तृष्णया
agninā dāhyamānāśca tudyamānāśca kaṁṭakaiḥ krakacaiḥ pāṭyamānāśca pīḍyamānāśca tṛṣṇayā
अग्नि से जलाए जाते हुए, काँटों से बींधे जाते हुए, आरे से चीरे जाते हुए, प्यास से पीड़ित होते हुए —
श्लोक 14 (padma.5.101.14)
क्षुधया बाध्यमानाश्च घोरैर्व्याधिगणैस्तथा । पूयशोणितगंधेन मूर्छ्यमानाः पदेपदे
kṣudhayā bādhyamānāśca ghorairvyādhigaṇaistathā pūyaśoṇitagaṁdhena mūrchyamānāḥ padepade
भूख से पीड़ित होते हुए, भयंकर रोगों के समूहों से, हर कदम पर मवाद-रक्त की गंध से मूर्च्छित होते हुए —
श्लोक 15 (padma.5.101.15)
क्वाथ्यंते च क्वचित्तैलैस्ताड्यन्ते मुशलैः क्वचित् । आयसीषु प्रपच्यंते शिलासु क्वचिदेव च
kvāthyaṁte ca kvacittailaistāḍyante muśalaiḥ kvacit āyasīṣu prapacyaṁte śilāsu kvacideva ca
कहीं तेल में उबाले जाते हैं, कहीं मूसलों से पीटे जाते हैं; कहीं लोहे की शिलाओं पर पकाए जाते हैं।
श्लोक 16 (padma.5.101.16)
क्वचिद्वांतमथाश्नंति क्वचित्पूयमसृक्क्वचित् । क्वचिद्विष्ठां क्वचिन्मांसं पूतिगंधिषु दारुणम्
kvacidvāṁtamathāśnaṁti kvacitpūyamasṛkkvacit kvacidviṣṭhāṁ kvacinmāṁsaṁ pūtigaṁdhiṣu dāruṇam
कहीं वमन खाना पड़ता है, कहीं मवाद, कहीं रक्त; कहीं विष्ठा, कहीं दुर्गंधित सड़े मांस को खाना पड़ता है — भयंकर!
श्लोक 17 (padma.5.101.17)
कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च वह्नितुंडैः क्वचित्क्वचित् । केशशोणितमांसासृग्वसास्थिनिकरेषु च
kṛmibhirbhakṣyamāṇāśca vahnituṁḍaiḥ kvacitkvacit keśaśoṇitamāṁsāsṛgvasāsthinikareṣu ca
कीड़ों द्वारा खाए जाते हुए, कहीं-कहीं अग्निमुख प्राणियों द्वारा, बाल-रक्त-मांस-रुधिर-मेद-हड्डियों के ढेरों में —
श्लोक 18 (padma.5.101.18)
अस्थिताः कुणपाः कीर्णाः कृमिभिर्भक्षिताः स्फुटम् । काककंकमहागृध्रवदनैर्ध्वंसितेषु च
asthitāḥ kuṇapāḥ kīrṇāḥ kṛmibhirbhakṣitāḥ sphuṭam kākakaṁkamahāgṛdhravadanairdhvaṁsiteṣu ca
अस्थिर, बिखरे हुए शव, कीड़ों द्वारा स्पष्ट खाए जाते हुए, कौओं-बाजों-गिद्धों की चोंचों से नष्ट होते हुए —
श्लोक 19 (padma.5.101.19)
शिवदुर्गंधनीरंध्र संघट्टशतकोटिषु । करपत्रशिलापत्रतप्त निस्तैलकेषु च
śivadurgaṁdhanīraṁdhra saṁghaṭṭaśatakoṭiṣu karapatraśilāpatratapta nistailakeṣu ca
सैकड़ों करोड़ सियारों की दुर्गंधित, सघन भीड़ में; तपे हुए, तेलरहित पत्थर-आरों में —
श्लोक 20 (padma.5.101.20)
लोहतैलवसास्तंभ कूटशाल्मलसद्मसु । क्षुरकंटककीलोग्र ज्वालास्तंभविभातिषु
lohatailavasāstaṁbha kūṭaśālmalasadmasu kṣurakaṁṭakakīlogra jvālāstaṁbhavibhātiṣu
लोहे-तेल-चर्बी के स्तंभों वाले, कपटी शाल्मलि-गृहों में; छुरे-काँटे-कीलों की भयंकर, ज्वाला-स्तंभों से चमकती जगहों में —
श्लोक 21 (padma.5.101.21)
तप्तं वैतरणीपूयपूरितेषु पृथक्पृथक् । असिपत्रवनोत्कृत्त नरनारीस्तनेषु च
taptaṁ vaitaraṇīpūyapūriteṣu pṛthakpṛthak asipatravanotkṛtta naranārīstaneṣu ca
तप्त, मवाद से भरी वैतरणी में अलग-अलग; तलवार-पत्तों के वन में कटे हुए नर-नारियों के स्तनों के बीच —
श्लोक 22 (padma.5.101.22)
घोरांधकारग्रहणदारुणेषु मुहुर्मुहुः । पापच्यमानाः क्रंदंतो दारुणैर्विविधैर्वधैः
ghorāṁdhakāragrahaṇadāruṇeṣu muhurmuhuḥ pāpacyamānāḥ kraṁdaṁto dāruṇairvividhairvadhaiḥ
घोर अंधकार के भयंकर आवरण में बार-बार, विविध भयंकर वधों से चिल्लाते हुए पाप में पकते हुए —
श्लोक 23 (padma.5.101.23)
कंठेषु बद्धपाशाश्च भुजगावेष्टिताः क्वचित् । पीड्यमानास्तथा यंत्रैः कृष्यमाणाश्च जानुभिः
kaṁṭheṣu baddhapāśāśca bhujagāveṣṭitāḥ kvacit pīḍyamānāstathā yaṁtraiḥ kṛṣyamāṇāśca jānubhiḥ
कंठ में बँधे पाशों से, कहीं सर्पों से लिपटे हुए, यंत्रों से पीड़ित होते हुए, घुटनों के बल घसीटे जाते हुए —
श्लोक 24 (padma.5.101.24)
भग्नपृष्ठशिरोग्रीवाः स्तब्धकंठाः सुदारुणाः । कूटागारे भ्राम्यमाणाः शरीरैर्यातनाक्षमैः
bhagnapṛṣṭhaśirogrīvāḥ stabdhakaṁṭhāḥ sudāruṇāḥ kūṭāgāre bhrāmyamāṇāḥ śarīrairyātanākṣamaiḥ
टूटी पीठ-सिर-गर्दन वाले, जकड़े कंठ वाले, अत्यंत भयंकर, यातना सहने योग्य शरीरों से कपटी गृह में घुमाए जाते हुए —
श्लोक 25 (padma.5.101.25)
पीड्यंते पापिनो राजन्क्रंदमाना विकर्मिणः । सहितं विषयास्वादैः क्रंदनं तैर्विधीयते
pīḍyaṁte pāpino rājankraṁdamānā vikarmiṇaḥ sahitaṁ viṣayāsvādaiḥ kraṁdanaṁ tairvidhīyate
हे राजन्! दुष्कर्मी पापी इस प्रकार चिल्लाते हुए पीड़ित होते हैं; उनका यह चीत्कार पहले चखे गए विषय-सुखों के अनुरूप ही किया जाता है।
श्लोक 26 (padma.5.101.26)
भुज्यते च कृतं पूर्वमेतत्सर्वैश्च जंतुभिः । परस्त्रीषु कृतः संगः प्रीतये दुःखदो हि सः
bhujyate ca kṛtaṁ pūrvametatsarvaiśca jaṁtubhiḥ parastrīṣu kṛtaḥ saṁgaḥ prītaye duḥkhado hi saḥ
और सभी प्राणी अपने ही पूर्वकृत कर्म को भोगते हैं; परस्त्री के साथ सुख के लिए किया गया संग निश्चय ही ऐसा दुःखदायी बनता है।
श्लोक 27 (padma.5.101.27)
मुहूर्तविषयास्वादो जातोऽनेकाब्ददुःखदः । वपुषस्तव राजेंद्र प्रातःस्नानस्य माधवे
muhūrtaviṣayāsvādo jāto'nekābdaduḥkhadaḥ vapuṣastava rājeṁdra prātaḥsnānasya mādhave
क्षणभर का विषय-आस्वादन अनेक वर्षों तक दुःख देने वाला बन गया है। परंतु हे राजेंद्र! माधवमास के प्रातःस्नान से —
श्लोक 28 (padma.5.101.28)
विधिना पावनस्यैते प्राप्य स्पर्शं च मारुतः । लब्धसौख्याः क्षणं जाता महसाप्यायितास्तव
vidhinā pāvanasyaite prāpya sparśaṁ ca mārutaḥ labdhasaukhyāḥ kṣaṇaṁ jātā mahasāpyāyitāstava
विधिपूर्वक पवित्र हुए तुम्हारे शरीर का स्पर्श पाकर वायु ने इन्हें छू दिया, जिससे ये क्षणभर के लिए सुखी हो गए, तुम्हारे ही तेज से तृप्त होकर।
श्लोक 29 (padma.5.101.29)
आक्रंदरहितास्तेन जातास्ते निरये स्थिताः । नामापि पुण्यशीलानां श्रुतं सौख्याय कीर्तितम्
ākraṁdarahitāstena jātāste niraye sthitāḥ nāmāpi puṇyaśīlānāṁ śrutaṁ saukhyāya kīrtitam
उससे वे नरकवासी होते हुए भी चीत्कार-रहित हो गए। पुण्यशीलों का नाम भी सुना जाने पर सुख के लिए कहा गया है।
श्लोक 30 (padma.5.101.30)
जायते तद्वपुस्पर्शवायुस्पर्शः सुखावहः । यम उवाच- इति दूतवचः श्रुत्वा स राजा करुणानिधिः
jāyate tadvapusparśavāyusparśaḥ sukhāvahaḥ yama uvāca- iti dūtavacaḥ śrutvā sa rājā karuṇānidhiḥ
उस शरीर को छूकर आया वायु का स्पर्श सुखदायी हो जाता है। यम ने कहा— यह दूत का वचन सुनकर वह करुणा के सागर राजा —
श्लोक 31 (padma.5.101.31)
प्रत्युवाच हतान्दूतान्विष्णोरद्भुतकर्मणः । कोमलं हृदयं नूनं साधूनां नवनीतवत्
pratyuvāca hatāndūtānviṣṇoradbhutakarmaṇaḥ komalaṁ hṛdayaṁ nūnaṁ sādhūnāṁ navanītavat
अद्भुत कर्मी विष्णु के उन मारे गए दूतों को उत्तर देने लगा। सज्जनों का हृदय निश्चय ही मक्खन के समान कोमल होता है —
श्लोक 32 (padma.5.101.32)
वह्निसंतापसंतप्तं तद्यथा द्रवति स्फुटम् । राजोवाच- नार्तं जंतुमहं हित्वा पीडितुं गंतुमुत्सहे
vahnisaṁtāpasaṁtaptaṁ tadyathā dravati sphuṭam rājovāca- nārtaṁ jaṁtumahaṁ hitvā pīḍituṁ gaṁtumutsahe
जो अग्नि के संताप से तप्त होकर वैसे ही स्पष्ट पिघल जाता है। राजा ने कहा— मैं किसी दुःखी प्राणी को छोड़कर, उसे पीड़ा में रखकर, जाने का साहस नहीं करता।
श्लोक 33 (padma.5.101.33)
तं पापिष्ठं धिगार्तानामार्तिं शक्तो न हंति यः । मदंगसंगमोच्छिष्टवायुस्पर्शेन ते यदि
taṁ pāpiṣṭhaṁ dhigārtānāmārtiṁ śakto na haṁti yaḥ madaṁgasaṁgamocchiṣṭavāyusparśena te yadi
उस पापिष्ठ को धिक्कार है जो पीड़ितों की पीड़ा को दूर करने में समर्थ होते हुए भी नहीं हरता। यदि मेरे शरीर के संसर्ग से बचे हुए वायु के स्पर्श से —
श्लोक 34 (padma.5.101.34)
जंतवः सुखिनो जातास्तस्मात्तत्र नयंतु माम् । पवित्रयंति जननीमवनीमपि ते नराः
jaṁtavaḥ sukhino jātāstasmāttatra nayaṁtu mām pavitrayaṁti jananīmavanīmapi te narāḥ
ये प्राणी सुखी हो गए हैं, तो मुझे भी वहीं ले चलो। वे मनुष्य अपनी जननी पृथ्वी को भी पवित्र करते हैं —
श्लोक 35 (padma.5.101.35)
परतापच्छिदो ये तु चंदना इव चंदनम् । परोपकृतये ये तु पीड्यंते कृतिनो हि ते
paratāpacchido ye tu caṁdanā iva caṁdanam paropakṛtaye ye tu pīḍyaṁte kṛtino hi te
जो चंदन की भाँति दूसरों के संताप को हरते हैं; जो परोपकार के लिए स्वयं पीड़ा सहते हैं, वे ही सचमुच कृतार्थ हैं।
श्लोक 36 (padma.5.101.36)
संतस्त एव ये लोके परदुःखविदारणाः । आर्तानामार्तिनाशार्थं प्राणा येषां तृणोपमाः
saṁtasta eva ye loke paraduḥkhavidāraṇāḥ ārtānāmārtināśārthaṁ prāṇā yeṣāṁ tṛṇopamāḥ
वे ही सच्चे संत हैं जो लोक में दूसरों के दुःख को विदीर्ण करते हैं, जिनके प्राण भी पीड़ितों की पीड़ा हरने के लिए तिनके के समान हैं।
श्लोक 37 (padma.5.101.37)
तैरियं धार्यते भूमिर्नरैः परहितोद्यतैः । मनसो यत्सुखं नित्यं तत्स्वर्गो नरकोपमः
tairiyaṁ dhāryate bhūmirnaraiḥ parahitodyataiḥ manaso yatsukhaṁ nityaṁ tatsvargo narakopamaḥ
ऐसे ही परहित में तत्पर मनुष्यों द्वारा यह पृथ्वी धारण की जाती है। मन का जो सुख है, वही नित्य है — उसके बिना स्वर्ग भी नरक-सम है।
श्लोक 38 (padma.5.101.38)
तस्मात्परसुखेनैव सुखिनः साधवः सदा । वरं निरयपातोऽत्र वरं प्राणवियोजनम्
tasmātparasukhenaiva sukhinaḥ sādhavaḥ sadā varaṁ nirayapāto'tra varaṁ prāṇaviyojanam
इसलिए साधुजन दूसरों के सुख से ही सदा सुखी रहते हैं। यहाँ नरक में गिरना अच्छा, प्राण त्याग देना अच्छा —
श्लोक 39 (padma.5.101.39)
न पुनः क्षणमार्तानामार्तिनाशमृते सुखम् । दूता ऊचु- जंतवो निरये घोरे पच्यंते तेत्र पापिनः
na punaḥ kṣaṇamārtānāmārtināśamṛte sukham dūtā ūcu- jaṁtavo niraye ghore pacyaṁte tetra pāpinaḥ
परंतु पीड़ितों की पीड़ा दूर किए बिना क्षणभर का भी सुख अच्छा नहीं। दूतों ने कहा— जो प्राणी घोर नरक में पकते हैं, वे पापी —
श्लोक 40 (padma.5.101.40)
स्वकर्मैवोपजीवंति मोहस्थानं न विद्यते । यैर्न दत्तं न च हुतं तीर्थे स्नानं न वा कृतम्
svakarmaivopajīvaṁti mohasthānaṁ na vidyate yairna dattaṁ na ca hutaṁ tīrthe snānaṁ na vā kṛtam
अपने ही कर्मों से जीते हैं; इसमें मोह का कोई स्थान नहीं है। जिन्होंने न दान दिया, न हवन किया, न तीर्थ में स्नान किया —
श्लोक 41 (padma.5.101.41)
पुनर्नोपकृतं भक्त्या सुकृतं न कृतं परम् । नेष्टं न तप्तं नो जप्तं यैर्न हृष्टतया नृप
punarnopakṛtaṁ bhaktyā sukṛtaṁ na kṛtaṁ param neṣṭaṁ na taptaṁ no japtaṁ yairna hṛṣṭatayā nṛpa
न भक्तिपूर्वक किसी का उपकार किया, न कोई श्रेष्ठ सुकृत्य किया; न यज्ञ, न तप, न जप — जिन्होंने हे राजन्! हर्षपूर्वक कुछ नहीं किया —
श्लोक 42 (padma.5.101.42)
परस्मिन्निह घोरेषु पच्यंते निरयेषु ते । दुःशीला ये दुराचारा विहाराहारनिंदिताः
parasminniha ghoreṣu pacyaṁte nirayeṣu te duḥśīlā ye durācārā vihārāhāraniṁditāḥ
वे यहाँ इसके बाद इन भयंकर नरकों में पकते हैं; जो दुःशील, दुराचारी, विहार और आहार में निंदित हैं —
श्लोक 43 (padma.5.101.43)
परापकारिणः पापकारिणो दुर्विहारिणः । विदारिणो हि मर्मोक्त्या पापाः परहृदां हि ये
parāpakāriṇaḥ pāpakāriṇo durvihāriṇaḥ vidāriṇo hi marmoktyā pāpāḥ parahṛdāṁ hi ye
जो दूसरों को हानि पहुँचाने वाले, पापकर्मी, दुर्व्यवहारी हैं; जो मर्मभेदी वचनों से दूसरों के हृदय को विदीर्ण करने वाले पापी हैं —
श्लोक 44 (padma.5.101.44)
निरये ते विपच्यंते ये परस्त्रीविहारिणः । एहि नूनं महीपाल गच्छामो हरिमंदिरम्
niraye te vipacyaṁte ye parastrīvihāriṇaḥ ehi nūnaṁ mahīpāla gacchāmo harimaṁdiram
वे नरक में पकते हैं, जो परस्त्रीगामी हैं। हे महीपाल! आइए, अब हम हरिमंदिर को चलें।
श्लोक 45 (padma.5.101.45)
न ते पुण्यवता युक्तमिहस्था तु मतः परम् । राजोवाच- यद्यहं सुकृती दूताः कस्मादस्मिन्महाभये
na te puṇyavatā yuktamihasthā tu mataḥ param rājovāca- yadyahaṁ sukṛtī dūtāḥ kasmādasminmahābhaye
पुण्यवान आपके लिए यहाँ रहना उचित नहीं है — यही हमारा अंतिम विचार है। राजा ने कहा— हे दूतो! यदि मैं सुकृती हूँ, तो इस महाभयंकर —
श्लोक 46 (padma.5.101.46)
नारके पथि वा नीतः किं वा मे सुकृतं परम् । मयापि न कृतं तादृक्सुकृतं कामशालिना
nārake pathi vā nītaḥ kiṁ vā me sukṛtaṁ param mayāpi na kṛtaṁ tādṛksukṛtaṁ kāmaśālinā
नरक-मार्ग पर मुझे क्यों ले जाया गया? और मेरा वह श्रेष्ठ सुकृत्य क्या है? काम में लीन मैंने भी तो वैसा सुकृत्य नहीं किया।
श्लोक 47 (padma.5.101.47)
कथं पुरि हरेर्गंता संशयानोऽहमस्मि वै । दूता ऊचु- सुकृतं न कृतं सत्यं त्वया कामवशात्मना
kathaṁ puri harergaṁtā saṁśayāno'hamasmi vai dūtā ūcu- sukṛtaṁ na kṛtaṁ satyaṁ tvayā kāmavaśātmanā
तो मैं हरि की नगरी में जाने वाला कैसे हूँ? मुझे इसमें संशय है। दूतों ने कहा— यह सत्य है कि काम के वशीभूत होकर आपने पूर्ण सुकृत्य नहीं किया —
श्लोक 48 (padma.5.101.48)
नेष्टं यज्ञैर्न वा यज्ञावशिष्टं भवताशितम् । किंतु माधवमासे यद्विधिना वत्सरत्रयम्
neṣṭaṁ yajñairna vā yajñāvaśiṣṭaṁ bhavatāśitam kiṁtu mādhavamāse yadvidhinā vatsaratrayam
न यज्ञों से यजन किया, न यज्ञ-अवशेष का भोजन किया। परंतु माधवमास में जो तीन वर्षों तक विधिपूर्वक —
श्लोक 49 (padma.5.101.49)
प्रातः स्नात्वा गुरुवचः प्रेरितेन पुरा त्वया । भक्त्या संपूजितो विष्णुर्विश्वेशो मधुसूदनः
prātaḥ snātvā guruvacaḥ preritena purā tvayā bhaktyā saṁpūjito viṣṇurviśveśo madhusūdanaḥ
गुरु के वचन से प्रेरित होकर आपने पहले प्रातः स्नान करके, भक्तिपूर्वक विश्वेश मधुसूदन विष्णु की पूजा की थी —
श्लोक 50 (padma.5.101.50)
महापापातिपापौघ निहंता भक्तवत्सलः । सर्वधर्मैकसारेण तेनैकेन नरेश्वर
mahāpāpātipāpaugha nihaṁtā bhaktavatsalaḥ sarvadharmaikasāreṇa tenaikena nareśvara
जो महापापों और अत्यंत पापों के समूह का नाशक, भक्तों का वत्सल है — हे नरेश्वर! उसी एक, सर्वधर्मों के सार से —
श्लोक 51 (padma.5.101.51)
नीयते पुण्यभवनं पूज्यमानो मरुद्गणैः । महतामपि पापानां निहंता माधवोऽर्चितः
nīyate puṇyabhavanaṁ pūjyamāno marudgaṇaiḥ mahatāmapi pāpānāṁ nihaṁtā mādhavo'rcitaḥ
आप पुण्य-भवन की ओर ले जाए जा रहे हैं, मरुद्गणों द्वारा पूजित होकर। महापापों का भी नाशक पूजित माधव है।
श्लोक 52 (padma.5.101.52)
तथैव माधवो मासो मर्त्यानां विधिनोदितः । यथैव विस्फुलिंगेन ज्वाल्यते तृणसंचयः
tathaiva mādhavo māso martyānāṁ vidhinoditaḥ yathaiva visphuliṁgena jvālyate tṛṇasaṁcayaḥ
वैसे ही मनुष्यों द्वारा विधिवत मनाया गया माधवमास भी — जैसे एक चिनगारी से घास का ढेर जल उठता है —
श्लोक 53 (padma.5.101.53)
प्रातःस्नानेन वैशाखे तथाघौघोऽपि दह्यते । तावद्वपुषि पापानि प्रभवंति महान्त्यपि
prātaḥsnānena vaiśākhe tathāghaugho'pi dahyate tāvadvapuṣi pāpāni prabhavaṁti mahāntyapi
वैसे ही वैशाख के प्रातःस्नान से पाप-समूह भी जल जाता है। शरीर में पाप, चाहे कितने भी बड़े हों, तब तक ही बलवान रहते हैं —
श्लोक 54 (padma.5.101.54)
यावन्न माधवे मासि तीर्थे मज्जति चोषसि । वैशाखे मासि यो युक्तो यथोक्तनियमैर्नरः
yāvanna mādhave māsi tīrthe majjati coṣasi vaiśākhe māsi yo yukto yathoktaniyamairnaraḥ
जब तक कि माधवमास में तीर्थ में प्रातःकाल डुबकी न लगाई जाए। जो मनुष्य वैशाखमास में कथित नियमों से युक्त होता है —
श्लोक 55 (padma.5.101.55)
हरिभक्त्यैव पापौघैर्मुक्तोऽच्युतगृहं व्रजेत् । आजन्मनो हि सुकृतं यत्त्वया न पुरा कृतम्
haribhaktyaiva pāpaughairmukto'cyutagṛhaṁ vrajet ājanmano hi sukṛtaṁ yattvayā na purā kṛtam
वह हरि-भक्ति से ही पापसमूह से मुक्त होकर अच्युत के घर को जाता है। जन्म से लेकर जो सुकृत्य आपने पहले नहीं किया —
श्लोक 56 (padma.5.101.56)
तेन त्वं निरयस्थानमार्गं नीतो नरेश्वर । अथ भूमिपते तूर्णमस्माभिस्तु मरुद्गणैः
tena tvaṁ nirayasthānamārgaṁ nīto nareśvara atha bhūmipate tūrṇamasmābhistu marudgaṇaiḥ
उसी के कारण, हे नरेश्वर! आप नरक-स्थान के मार्ग पर ले जाए गए थे। परंतु अब, हे भूपते! हम मरुद्गणों द्वारा शीघ्र ही —
श्लोक 57 (padma.5.101.57)
स्तूयमानो विमानेन गच्छ गोविंदमंदिरम्
stūyamāno vimānena gaccha goviṁdamaṁdiram
विमान द्वारा स्तुत होकर आप गोविंद के मंदिर को जाइए।