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पाताल खण्ड · अध्याय 109

इक्ष्वाकु का उद्धार: मंदराचल-दर्शन और शिवलिंग-पूजन विधि

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110

श्लोक 1 (padma.5.109.1)

शंभुरुवाच- अत्र ते कीर्तयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् । श्रुत्वा यां प्राप धर्मात्मा शिवभक्तिमनुत्तमाम्

śaṁbhuruvāca- atra te kīrtayiṣyāmi kathāṁ pāpapraṇāśinīm śrutvā yāṁ prāpa dharmātmā śivabhaktimanuttamām

शंभु ने कहा— इस विषय में मैं तुम्हें एक पापनाशक कथा सुनाऊँगा, जिसे सुनकर एक धर्मात्मा ने अनुपम शिव-भक्ति प्राप्त की थी।

श्लोक 2 (padma.5.109.2)

इक्ष्वाकुर्नाम विप्रेंद्रो महाविद्यो महामतिः । बहुशास्त्रप्रवीणश्च नीतिशास्त्रविशारदः

ikṣvākurnāma vipreṁdro mahāvidyo mahāmatiḥ bahuśāstrapravīṇaśca nītiśāstraviśāradaḥ

इक्ष्वाकु नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, महाविद्वान, महाबुद्धिमान, अनेक शास्त्रों में निपुण, नीतिशास्त्र में भी पारंगत।

श्लोक 3 (padma.5.109.3)

न यष्टा न च दाता च न देवानां च पूजकः । न चाध्यापयिता वेदं न व्याख्याता श्रुतस्य च

na yaṣṭā na ca dātā ca na devānāṁ ca pūjakaḥ na cādhyāpayitā vedaṁ na vyākhyātā śrutasya ca

वह न यज्ञकर्ता था, न दानी, न देवताओं का पूजक; न वेद पढ़ाने वाला, न श्रुति का व्याख्याता।

श्लोक 4 (padma.5.109.4)

न पुराणेतिहासानां श्रुतीनामागमस्य वा । यत्नाद्भोक्ता तथा देहसंस्कारैकप्रवर्तकः

na purāṇetihāsānāṁ śrutīnāmāgamasya vā yatnādbhoktā tathā dehasaṁskāraikapravartakaḥ

न पुराण-इतिहास, श्रुतियों या आगम का ज्ञाता; केवल भोजन में यत्नशील और शरीर के शृंगार में ही रत रहता था।

श्लोक 5 (padma.5.109.5)

तादृशस्य द्विजस्याथ समालक्ष्यायुरत्यगात् । लक्षांतरे तथैकस्मिन्वत्सरे मासि पंचमे

tādṛśasya dvijasyātha samālakṣyāyuratyagāt lakṣāṁtare tathaikasminvatsare māsi paṁcame

ऐसे उस ब्राह्मण की आयु दिखाई देते हुए भी बीत गई। एक वर्ष के पाँचवें मास में —

श्लोक 6 (padma.5.109.6)

तृतीय दिवसे रात्र्यां पुराणं श्रुतवानिदम् । स्वसंपादितवित्तस्य येन दानं न वै कृतम्

tṛtīya divase rātryāṁ purāṇaṁ śrutavānidam svasaṁpāditavittasya yena dānaṁ na vai kṛtam

तीसरे दिन, रात्रि में उसने यह पुराण सुना — जिसने अपने अर्जित धन का दान नहीं किया —

श्लोक 7 (padma.5.109.7)

दिनेदिने भुज्यमानं निःसारं स्यात्क्रमेण हि । वर्षाण्येव च तावंति नरके पच्यते ध्रुवम्

dinedine bhujyamānaṁ niḥsāraṁ syātkrameṇa hi varṣāṇyeva ca tāvaṁti narake pacyate dhruvam

वह प्रतिदिन भोगा जाता हुआ धन क्रमशः निःसार हो जाता है; और उतने ही वर्षों तक निश्चय ही नरक में पकता है।

श्लोक 8 (padma.5.109.8)

कृमियोनिसहस्रं च अनुभूय ततः परम् । दरिद्रो व्याधितोऽबंधुर्दुष्टभार्यो बहुप्रजः

kṛmiyonisahasraṁ ca anubhūya tataḥ param daridro vyādhito'baṁdhurduṣṭabhāryo bahuprajaḥ

कीड़े की योनि में हज़ारों जन्म भोगकर, फिर वह दरिद्र, रोगी, बंधुहीन, दुष्ट पत्नी वाला, अनेक संतानों से बोझिल —

श्लोक 9 (padma.5.109.9)

दिनेदिने भिक्षितेन याचितेन च जीवनम् । यन्न क्वापि च बीजानां मग्नानामथ मार्गणात्

dinedine bhikṣitena yācitena ca jīvanam yanna kvāpi ca bījānāṁ magnānāmatha mārgaṇāt

प्रतिदिन भीख और याचना से जीवन चलाता है, जिसके [शुभ] बीज कहीं भी अंकुरित नहीं होते —

श्लोक 10 (padma.5.109.10)

लब्धेनजीवनं कर्म भृत्यानामथ जीवनम् । मध्ये श्रोत्रविहीनश्च नेत्रहीनः स्खलन्मलः

labdhenajīvanaṁ karma bhṛtyānāmatha jīvanam madhye śrotravihīnaśca netrahīnaḥ skhalanmalaḥ

मिले हुए तुच्छ काम और सेवकों-जैसी सेवा से जीवन चलाता है; और बीच में बहरा, नेत्रहीन, मल टपकाता हुआ भी होता है।

श्लोक 11 (padma.5.109.11)

एवं पुराणं श्रुत्वा साविक्ष्वाकुर्भृशदुःखितः । मनसा चिंतयच्चेदं स्मारं स्मारं द्विजाधमः

evaṁ purāṇaṁ śrutvā sāvikṣvākurbhṛśaduḥkhitaḥ manasā ciṁtayaccedaṁ smāraṁ smāraṁ dvijādhamaḥ

इस प्रकार पुराण सुनकर वह इक्ष्वाकु अत्यंत दुःखी हो गया। बार-बार स्मरण करते हुए उस निकृष्ट ब्राह्मण ने मन में यह सोचा।

श्लोक 12 (padma.5.109.12)

रूपपुष्पैर्माहिष्मयी दुर्गापि फलवर्जिता । तथा पुराणरहिता विद्या नो गतिदर्शनी

rūpapuṣpairmāhiṣmayī durgāpi phalavarjitā tathā purāṇarahitā vidyā no gatidarśanī

रूप-पुष्पों से सज्जित होकर भी माहिष्मयी दुर्गा फल-रहित रह सकती है; वैसे ही पुराण-रहित विद्या भी सद्गति नहीं दिखाती।

श्लोक 13 (padma.5.109.13)

बहुशास्त्रं समभ्यस्य बहुवेदान्सविस्तरान् । पुंसोश्रुतपुराणस्य सम्यग्याति न दर्शनम्

bahuśāstraṁ samabhyasya bahuvedānsavistarān puṁsośrutapurāṇasya samyagyāti na darśanam

अनेक शास्त्रों और विस्तृत वेदों का अभ्यास करके भी, जिसने पुराण नहीं सुना, उसे सम्यक् दर्शन प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 14 (padma.5.109.14)

शंभुरुवाच- एवं चिंतयतस्तस्य अकालमरणं त्वभूत् । यमलोकं गतश्चाथ यमेन परिभाषितः

śaṁbhuruvāca- evaṁ ciṁtayatastasya akālamaraṇaṁ tvabhūt yamalokaṁ gataścātha yamena paribhāṣitaḥ

शंभु ने कहा— इस प्रकार सोचते हुए ही उसकी अकाल मृत्यु हो गई। वह यमलोक गया, और यम ने उसे संबोधित किया।

श्लोक 15 (padma.5.109.15)

यम उवाच- अनेकपापयुक्तोसि पुण्यं नैव महत्तव । न वेदाध्यापनात्प्राप्तं पापं च विदितं तव

yama uvāca- anekapāpayuktosi puṇyaṁ naiva mahattava na vedādhyāpanātprāptaṁ pāpaṁ ca viditaṁ tava

यम ने कहा— तुम अनेक पापों से युक्त हो, तुम्हारा कोई बड़ा पुण्य नहीं है। वेद पढ़ाने से भी तुमने कुछ प्राप्त नहीं किया, तुम्हारा पाप विदित है।

श्लोक 16 (padma.5.109.16)

कोटिवर्षाणि नरके तवस्थितिरिति द्विज । आयुरस्ति तवात्यल्पं गम्यतां पौर्विकीं तनुम्

koṭivarṣāṇi narake tavasthitiriti dvija āyurasti tavātyalpaṁ gamyatāṁ paurvikīṁ tanum

हे द्विज! नरक में करोड़ वर्ष तुम्हारा निवास होगा। परंतु तुम्हारी आयु अत्यंत अल्प शेष है, अपने पूर्व शरीर में जाओ।

श्लोक 17 (padma.5.109.17)

कुरु पुण्यं हितं दानं देवतापूजनं जपम् । सांगमध्यापनं विप्र भोजनं भस्मधारणम्

kuru puṇyaṁ hitaṁ dānaṁ devatāpūjanaṁ japam sāṁgamadhyāpanaṁ vipra bhojanaṁ bhasmadhāraṇam

पुण्य, हितकर दान, देवपूजा, जप करो; हे विप्र! अंगों सहित अध्यापन, [सात्त्विक] भोजन और भस्म-धारण करो।

श्लोक 18 (padma.5.109.18)

भज विश्वेश्वरं देवं देवदेवमुमापतिम् । तस्य प्रयत्नमात्रेण मम लोकं न गच्छसि

bhaja viśveśvaraṁ devaṁ devadevamumāpatim tasya prayatnamātreṇa mama lokaṁ na gacchasi

विश्वेश्वर देव, देवाधिदेव उमापति की आराधना करो। उनके प्रति केवल यत्न करने मात्र से ही तुम मेरे लोक नहीं आओगे।

श्लोक 19 (padma.5.109.19)

यत्किंचित्प्रत्यहं पापिन्पुराणं शृणु सादरम् । ततस्तच्छ्रवणादेव नेक्षसे मम यातनाः

yatkiṁcitpratyahaṁ pāpinpurāṇaṁ śṛṇu sādaram tatastacchravaṇādeva nekṣase mama yātanāḥ

हे पापी! जो कुछ भी हो, प्रतिदिन आदरपूर्वक पुराण सुनो; उसी श्रवण से तुम मेरी यातनाओं को नहीं देखोगे।

श्लोक 20 (padma.5.109.20)

यमस्य वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणः स्वां ययौ तनुम् । अथेशपूजनकृते यत्नमास्थाय स द्विजः

yamasya vacanaṁ śrutvā brāhmaṇaḥ svāṁ yayau tanum atheśapūjanakṛte yatnamāsthāya sa dvijaḥ

यम का यह वचन सुनकर ब्राह्मण अपने शरीर में लौट आया। फिर वह ब्राह्मण ईश्वर-पूजन के लिए प्रयत्नशील होकर —

श्लोक 21 (padma.5.109.21)

अगमन्मुनिवर्यं तु जाबालिशिवपूजकम् । तपः स्वाध्यायसंपन्नं श्रुतिस्मृतिविवेचकम्

agamanmunivaryaṁ tu jābāliśivapūjakam tapaḥ svādhyāyasaṁpannaṁ śrutismṛtivivecakam

शिव-पूजक श्रेष्ठ मुनि जाबालि के पास गया, जो तप और स्वाध्याय से संपन्न, श्रुति-स्मृति के विवेचक थे।

श्लोक 22 (padma.5.109.22)

पुराणतत्त्ववेत्तारं लक्षशिष्यसमावृतम् । जराशिथिलसर्वांगं वेदवेदांगपारगम्

purāṇatattvavettāraṁ lakṣaśiṣyasamāvṛtam jarāśithilasarvāṁgaṁ vedavedāṁgapāragam

पुराण-तत्त्व के ज्ञाता, लाख शिष्यों से घिरे, बुढ़ापे से शिथिल सारे अंगों वाले, वेद-वेदांग के पारगामी।

श्लोक 23 (padma.5.109.23)

द्रष्टुकामो ययौ शैलं मंदरं चारुकंदरम् । नानाविहंगसंपूर्णं नानापुष्पलतावृतम्

draṣṭukāmo yayau śailaṁ maṁdaraṁ cārukaṁdaram nānāvihaṁgasaṁpūrṇaṁ nānāpuṣpalatāvṛtam

उनके दर्शन की इच्छा से वह मंदराचल पर्वत गया, जिसकी गुफाएँ सुंदर थीं, जो नाना पक्षियों से भरा और नाना पुष्प-लताओं से घिरा था।

श्लोक 24 (padma.5.109.24)

सर्वर्तुकुसुमोपेतं नानागंधोपशोभितम् । किन्नराणां च मिथुनैर्गीतपूर्णमहागुहम्

sarvartukusumopetaṁ nānāgaṁdhopaśobhitam kinnarāṇāṁ ca mithunairgītapūrṇamahāguham

सब ऋतुओं के पुष्पों से युक्त, नाना सुगंधों से सुशोभित, किन्नर-युगलों के गीतों से भरी महागुफाओं वाला।

श्लोक 25 (padma.5.109.25)

अनेकरूपलावण्य वनितोषितपादपम् । लंबमानविचित्राभिस्ताभिः शोभितपादपम्

anekarūpalāvaṇya vanitoṣitapādapam laṁbamānavicitrābhistābhiḥ śobhitapādapam

अनेक रूप-लावण्य वाली स्त्रियों से प्रसन्न वृक्षों वाला, उनके विचित्र ढंग से लटकने से सुशोभित वृक्षों वाला।

श्लोक 26 (padma.5.109.26)

रतिश्रमप्रसुप्तानां बोधनादितषट्पदम् । कूजंति च पिकाः कामं वियुक्तानां युजे किल

ratiśramaprasuptānāṁ bodhanāditaṣaṭpadam kūjaṁti ca pikāḥ kāmaṁ viyuktānāṁ yuje kila

रति-श्रम से सोए हुओं को जगाते भ्रमरों वाला; कोयलें भी विरहिणियों के मिलन की कामना से बोल उठती थीं।

श्लोक 27 (padma.5.109.27)

नानामुनिगणाकीर्णं प्रशांतमृगचारिणम् । अप्सरोगणसंकीर्णं गंधर्वगणसेवितम्

nānāmunigaṇākīrṇaṁ praśāṁtamṛgacāriṇam apsarogaṇasaṁkīrṇaṁ gaṁdharvagaṇasevitam

अनेक मुनि-समूहों से भरा, शांत मृगों से विचरित, अप्सराओं के समूहों से थिरका हुआ, गंधर्व-समूहों से सेवित।

श्लोक 28 (padma.5.109.28)

नानासिद्धमुखोद्भूतगीतपूर्णवनांतरम् । विचित्रफलसंपूर्णं नानादेवालयान्वितम्

nānāsiddhamukhodbhūtagītapūrṇavanāṁtaram vicitraphalasaṁpūrṇaṁ nānādevālayānvitam

अनेक सिद्धों के मुख से निकले गीतों से भरे वनांतर वाला, विचित्र फलों से पूर्ण, नाना देवालयों से युक्त।

श्लोक 29 (padma.5.109.29)

प्रासादशतसंबाधं नानागृहसमन्वितम् । सिंहाननैर्गजमुखैरुलूकवदनैरथ

prāsādaśatasaṁbādhaṁ nānāgṛhasamanvitam siṁhānanairgajamukhairulūkavadanairatha

सैकड़ों प्रासादों से भरा, नाना घरों से युक्त; सिंह-मुख, हाथी-मुख, उल्लू-मुख वाले —

श्लोक 30 (padma.5.109.30)

अमुखैर्विमुखैरुग्रैरर्द्धवक्त्रैर्मृगीमुखैः । रुरुजंतुकगोधाहि वानरर्क्षमुखैरपि

amukhairvimukhairugrairarddhavaktrairmṛgīmukhaiḥ rurujaṁtukagodhāhi vānararkṣamukhairapi

मुखरहित, विमुख, उग्र, अर्ध-मुख, मृगी-मुख वाले, रुरु-मृग, छोटे जीव, गोह, सर्प, वानर और भालू के मुख वाले भी —

श्लोक 31 (padma.5.109.31)

व्याघ्रवृश्चिकभल्लूष्ट्रश्वानगर्दभतुंडकैः । समस्तजीववदनसदृशास्यैर्गणेश्वरैः । वल्लीमुखैर्वृक्षमुखैः शिलावक्त्रैरयोमुखैः

vyāghravṛścikabhallūṣṭraśvānagardabhatuṁḍakaiḥ samastajīvavadanasadṛśāsyairgaṇeśvaraiḥ vallīmukhairvṛkṣamukhaiḥ śilāvaktrairayomukhaiḥ

बाघ, बिच्छू, भालू, ऊँट, कुत्ते और गधे के मुख वाले; समस्त जीवों के मुखों जैसे मुख वाले गणेश्वर; लता-मुख, वृक्ष-मुख, पत्थर-मुख, लोहे-मुख वाले —

श्लोक 32 (padma.5.109.32)

शंखमुक्तादिजलजवदनैरुपशोभितम् । अधिकांगैरनंगैश्च जटिलैः शिखिमुंडितैः

śaṁkhamuktādijalajavadanairupaśobhitam adhikāṁgairanaṁgaiśca jaṭilaiḥ śikhimuṁḍitaiḥ

शंख-मोती आदि जलचरों के मुख से सुशोभित; अतिरिक्त अंगों वाले, अंगहीन, जटाधारी, शिखा-मुंडित —

श्लोक 33 (padma.5.109.33)

पत्रिवक्त्रैर्द्विषड्वक्त्रैस्त्रिविग्रहमुखैरपि । घंटास्यैः शूर्पवदनकर्णपादमुखैरपि

patrivaktrairdviṣaḍvaktraistrivigrahamukhairapi ghaṁṭāsyaiḥ śūrpavadanakarṇapādamukhairapi

पक्षी-मुख, बारह-मुख, त्रिशरीर-मुख वाले भी; घंटा-मुख, सूप-जैसे मुख-कान-पैर वाले भी —

श्लोक 34 (padma.5.109.34)

घंटामुखैर्वेणुमुखैः किंकिणीवदनैरपि । यादृग्वस्तु जगत्यस्ति तादृशास्यैरयोमुखैः

ghaṁṭāmukhairveṇumukhaiḥ kiṁkiṇīvadanairapi yādṛgvastu jagatyasti tādṛśāsyairayomukhaiḥ

घंटा-मुख, बाँसुरी-मुख, छोटी-घंटी-मुख वाले भी; संसार में जो-जो वस्तु है, उसी के समान मुख और लोहे के मुख वाले —

श्लोक 35 (padma.5.109.35)

कैश्चिन्निभृतकंदर्परूपलावण्यकोमलैः । कोटिसूर्यप्रतीकाशैश्चंद्र कोटिसमप्रभैः

kaiścinnibhṛtakaṁdarparūpalāvaṇyakomalaiḥ koṭisūryapratīkāśaiścaṁdra koṭisamaprabhaiḥ

कुछ ऐसे भी जो निश्चल कामदेव-सी रूप-लावण्य वाले कोमल थे; करोड़ों सूर्यों-सी और करोड़ों चंद्रमाओं-सी कांति वाले —

श्लोक 36 (padma.5.109.36)

नानावर्णैर्विश्वमुखैर्विश्वरूपैश्चतुर्मुखैः । द्विमुखैः पंचवक्त्रैश्च त्रिमुखैः षण्मुखैरपि

nānāvarṇairviśvamukhairviśvarūpaiścaturmukhaiḥ dvimukhaiḥ paṁcavaktraiśca trimukhaiḥ ṣaṇmukhairapi

नाना वर्णों, विश्व-मुखों, विश्वरूपों, चतुर्मुखों वाले; द्विमुख, पंचमुख, त्रिमुख, षण्मुख वाले भी —

श्लोक 37 (padma.5.109.37)

एकानेकमुखैः शांतैः सर्वदा सुखिभिर्युतम् । नानाभोगसमृद्धैश्च रतिकामसमैरपि

ekānekamukhaiḥ śāṁtaiḥ sarvadā sukhibhiryutam nānābhogasamṛddhaiśca ratikāmasamairapi

एक या अनेक मुखों वाले, शांत, सदा सुखी, नाना भोगों से समृद्ध, रति-काम के समान सुंदर —

श्लोक 38 (padma.5.109.38)

लक्ष्मीनारायणमुखैरुमेशसमविग्रहैः । नानारूपधरैश्चान्यैः सेवितं मंदराचलम्

lakṣmīnārāyaṇamukhairumeśasamavigrahaiḥ nānārūpadharaiścānyaiḥ sevitaṁ maṁdarācalam

लक्ष्मी-नारायण जैसे मुख वाले, उमा-शिव जैसे शरीर वाले, और नाना रूपधारी अन्य लोगों से सेवित उस मंदराचल को —

श्लोक 39 (padma.5.109.39)

धेनवो यत्र वेदाश्च मीमांसावत्स संयुताः । धर्मादयः सवर्ष्माणः पुराणानि च कर्मणा

dhenavo yatra vedāśca mīmāṁsāvatsa saṁyutāḥ dharmādayaḥ savarṣmāṇaḥ purāṇāni ca karmaṇā

जहाँ वेद ही गाय थे, मीमांसा उनका बछड़ा; धर्म आदि शरीरधारी थे, और पुराण भी अपने कर्म से —

श्लोक 40 (padma.5.109.40)

स्मृतीतिहासजातानि आगमाश्च शरीरिणः । स्थिताश्च मंदरे यत्र सशैलः पापनाशनः

smṛtītihāsajātāni āgamāśca śarīriṇaḥ sthitāśca maṁdare yatra saśailaḥ pāpanāśanaḥ

स्मृति-इतिहास-समूह और आगम भी शरीरधारी होकर वहीं मंदराचल पर स्थित थे, जो पाप का नाशक और पर्वत सहित था।

श्लोक 41 (padma.5.109.41)

तस्य मध्ये महापुण्यं पुरं परमशोभितम् । वापीतडागोपवनप्रासादशतशोभितम्

tasya madhye mahāpuṇyaṁ puraṁ paramaśobhitam vāpītaḍāgopavanaprāsādaśataśobhitam

उसके मध्य में एक अत्यंत पुण्यमय, परम शोभित नगर था — बावड़ियों, तालाबों, उपवनों और सैकड़ों प्रासादों से सुशोभित।

श्लोक 42 (padma.5.109.42)

सप्तप्राकारपरिखं रत्नाट्टालकसंयुतम् । गोपुरैर्नवभिर्युक्तं विचित्रगृहसंयुतम्

saptaprākāraparikhaṁ ratnāṭṭālakasaṁyutam gopurairnavabhiryuktaṁ vicitragṛhasaṁyutam

सात प्राकारों-खाइयों से घिरा, रत्न-अट्टालिकाओं से युक्त, नौ द्वारों वाला, विचित्र गृहों से युक्त।

श्लोक 43 (padma.5.109.43)

यस्य चाप्रतिमं तेज उष्णशीतादिवर्जितम् । तन्मध्ये नगरी पुण्या तन्मध्ये च सभा शुभा

yasya cāpratimaṁ teja uṣṇaśītādivarjitam tanmadhye nagarī puṇyā tanmadhye ca sabhā śubhā

जिसका तेज अनुपम था, सर्दी-गर्मी आदि से रहित। उसके मध्य में पवित्र नगरी थी, उसके मध्य में शुभ सभा थी।

श्लोक 44 (padma.5.109.44)

तस्यां भद्रासनं मध्ये वेदपादविचित्रितम् । सर्वोपनिषदाकॢप्तं पादपीठं सुशोभनम्

tasyāṁ bhadrāsanaṁ madhye vedapādavicitritam sarvopaniṣadākḷptaṁ pādapīṭhaṁ suśobhanam

उसके मध्य में वेद के चरणों से चित्रित भद्रासन था; सब उपनिषदों से बना, सुशोभित, पादपीठ भी था।

श्लोक 45 (padma.5.109.45)

पुराणान्यागमास्तस्य स्वस्तीति शिवपादयोः । तत्रासीनो महायोगी गोक्षीरसदृशाकृतिः

purāṇānyāgamāstasya svastīti śivapādayoḥ tatrāsīno mahāyogī gokṣīrasadṛśākṛtiḥ

पुराण और आगम शिव के चरणों में 'स्वस्ति' कहते हुए वहाँ थे। वहाँ गोक्षीर के समान कांति वाले महायोगी विराजमान थे —

श्लोक 46 (padma.5.109.46)

मंदस्मितसुचार्वास्योद्व्यष्टवर्षवयाः प्रभुः । दधान उरसामालां मणिरुद्राक्षकल्पिताम्

maṁdasmitasucārvāsyodvyaṣṭavarṣavayāḥ prabhuḥ dadhāna urasāmālāṁ maṇirudrākṣakalpitām

मंद मुस्कान से सुंदर मुख वाले, आठों-आठ वर्ष की आयु वाले प्रभु, वक्षस्थल पर मणि-रुद्राक्ष की माला धारण किए —

श्लोक 47 (padma.5.109.47)

बिभ्राण उपवीतं च कर्णिकारसमद्युतिः । सुरत्नकुंडलो देवः किरीटकनकांबरः

bibhrāṇa upavītaṁ ca karṇikārasamadyutiḥ suratnakuṁḍalo devaḥ kirīṭakanakāṁbaraḥ

यज्ञोपवीत धारण किए, कर्णिकार-पुष्प-सी कांति वाले, उत्तम रत्न-कुंडल वाले देव, मुकुट और स्वर्ण-वस्त्र धारी —

श्लोक 48 (padma.5.109.48)

नानाभूषणसंयुक्तो नानागंधविलेपनः । वामांकन्यस्तगिरिजो वीक्षमाणस्तदाननम्

nānābhūṣaṇasaṁyukto nānāgaṁdhavilepanaḥ vāmāṁkanyastagirijo vīkṣamāṇastadānanam

नाना आभूषणों से युक्त, नाना गंध-लेप वाले; बाईं गोद में गिरिजा को बिठाए, उनके मुख को देखते हुए —

श्लोक 49 (padma.5.109.49)

मुग्धां च सुमुखीं बालां नवयौवनशोभिताम् । भूषितां चारुसर्वांगीं बिभ्रतीं कनकांबुजम्

mugdhāṁ ca sumukhīṁ bālāṁ navayauvanaśobhitām bhūṣitāṁ cārusarvāṁgīṁ bibhratīṁ kanakāṁbujam

वह मुग्धा, सुमुखी बाला नवयौवन से शोभित, आभूषित, सर्वांगसुंदरी, स्वर्ण-कमल धारण किए हुए थी —

श्लोक 50 (padma.5.109.50)

आलिंग्य वामेनकरेण देवीं दक्षेण तस्या मुखमुन्नमय्य । स्पृष्ट्वा शिरो वामकरेण तस्या दक्षेण कुर्वंस्तिलकं च देवः

āliṁgya vāmenakareṇa devīṁ dakṣeṇa tasyā mukhamunnamayya spṛṣṭvā śiro vāmakareṇa tasyā dakṣeṇa kurvaṁstilakaṁ ca devaḥ

बाएँ हाथ से देवी का आलिंगन करके, दाहिने हाथ से उनका मुख ऊपर उठाकर; बाएँ हाथ से सिर छूकर, दाहिने हाथ से तिलक करते हुए देव —

श्लोक 51 (padma.5.109.51)

भक्तिर्वीजयते देवं प्रणव व्यजनेन च । पूजाकांतापि कुसुमैर्मालां देवाय बिभ्रती

bhaktirvījayate devaṁ praṇava vyajanena ca pūjākāṁtāpi kusumairmālāṁ devāya bibhratī

प्रणव-रूपी पंखे से भक्ति उन्हें हवा करती थी; पूजा-रूपी प्रिया भी फूलों की माला लिए देव को धारण करती थी —

श्लोक 52 (padma.5.109.52)

ज्ञप्तिर्विरक्तिर्वनिते बिभ्रत्यौ योगचामरे । समाधिः कार्यकर्तास्य धारणायोषिदस्य च

jñaptirviraktirvanite bibhratyau yogacāmare samādhiḥ kāryakartāsya dhāraṇāyoṣidasya ca

ज्ञप्ति और विरक्ति नामक दो स्त्रियाँ योग-चामर धारण करती थीं; समाधि उनकी कार्यकर्त्री थी, और धारणा भी एक स्त्री थी।

श्लोक 53 (padma.5.109.53)

यमाश्चनियमाश्चैव किंकरास्तस्य कीर्तिताः । प्राणायामः पुरोधास्तु प्रत्याहारः सुवर्णधृक्

yamāścaniyamāścaiva kiṁkarāstasya kīrtitāḥ prāṇāyāmaḥ purodhāstu pratyāhāraḥ suvarṇadhṛk

यम और नियम उनके सेवक कहे गए; प्राणायाम उनका पुरोहित था, प्रत्याहार सुवर्ण-धारक था।

श्लोक 54 (padma.5.109.54)

ध्यानं च द्रविणाध्यक्षः सत्यं सेनापतिस्तथा । ब्रह्मप्रभृतिकीटांताः पशवस्तत्पतिः शिवः

dhyānaṁ ca draviṇādhyakṣaḥ satyaṁ senāpatistathā brahmaprabhṛtikīṭāṁtāḥ paśavastatpatiḥ śivaḥ

ध्यान कोषाध्यक्ष था, सत्य सेनापति; ब्रह्मा से लेकर कीड़े तक सब प्राणी उनके पशु थे, और शिव उनके स्वामी (पशुपति) थे।

श्लोक 55 (padma.5.109.55)

पशूनां पालको धर्मः स्यादधर्मश्च तस्करः । मायापाशेन ते बद्धा मोचनी काशिका मृतिः

paśūnāṁ pālako dharmaḥ syādadharmaśca taskaraḥ māyāpāśena te baddhā mocanī kāśikā mṛtiḥ

पशुओं का पालक धर्म था, और अधर्म चोर; वे माया-पाश से बँधे थे, और काशी में मृत्यु ही उनकी मुक्तिदायिनी थी।

श्लोक 56 (padma.5.109.56)

नानाविधाश्च प्रमदा देवदेवमुमापतिम् । एतादृशमुमानाथं कोटिजंतुरनुस्मरेत्

nānāvidhāśca pramadā devadevamumāpatim etādṛśamumānāthaṁ koṭijaṁturanusmaret

नाना प्रकार की प्रमदाएँ देवाधिदेव उमापति की सेवा में थीं। ऐसे उमानाथ का स्मरण करोड़ों प्राणी करें —

श्लोक 57 (padma.5.109.57)

इष्टान्भोगानवाप्याथ शिवलोके महीयते । ब्रह्मविष्णुमहेंद्राद्यास्तत्पुरद्वारपालकाः

iṣṭānbhogānavāpyātha śivaloke mahīyate brahmaviṣṇumaheṁdrādyāstatpuradvārapālakāḥ

तो अभीष्ट भोगों को प्राप्त करके शिवलोक में महिमा प्राप्त करते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-महेंद्र आदि उस नगर के द्वारपाल थे —

श्लोक 58 (padma.5.109.58)

लक्ष्मीसरस्वतीदेव्यौ देहल्याद्यर्च्चनेक्षितेः । नियुक्ते देवदेवस्य देवाश्च सुरयोषितः

lakṣmīsarasvatīdevyau dehalyādyarccanekṣiteḥ niyukte devadevasya devāśca surayoṣitaḥ

लक्ष्मी और सरस्वती देवियाँ देहली आदि की पूजा-निगरानी में नियुक्त थीं; देवाधिदेव के लिए देवता और देवांगनाएँ भी सेवा में थीं।

श्लोक 59 (padma.5.109.59)

दास्यो देवाः समस्ताश्च दासा यस्य महात्मनः । एतादृशमहाशैलमिक्ष्वाकुः संददर्श ह

dāsyo devāḥ samastāśca dāsā yasya mahātmanaḥ etādṛśamahāśailamikṣvākuḥ saṁdadarśa ha

सब देवता उस महात्मा के दास-दासी थे। ऐसे उस महापर्वत को इक्ष्वाकु ने देखा।

श्लोक 60 (padma.5.109.60)

मुनिं प्रणम्य जाबालिमिदमाह वचस्तदा । गंतुकामो महाशैलं शक्तोस्यस्मिन्न वा मुने

muniṁ praṇamya jābālimidamāha vacastadā gaṁtukāmo mahāśailaṁ śaktosyasminna vā mune

मुनि जाबालि को प्रणाम करके उसने तब यह कहा— हे मुने! उस महापर्वत पर जाने की मेरी इच्छा है, क्या मैं समर्थ हूँ या नहीं?

श्लोक 61 (padma.5.109.61)

ममायुरल्पं कथितं यमेन ज्ञानिना पुरा

mamāyuralpaṁ kathitaṁ yamena jñāninā purā

पहले ज्ञानी यम ने मेरी आयु अल्प बताई थी।

श्लोक 62 (padma.5.109.62)

नरकश्च बहुःप्रोक्तः कथं श्रेयो भविष्यति । जाबालिरुवाच- मयापि सर्वमेतत्ते ज्ञातं दिव्येन चक्षुषा

narakaśca bahuḥproktaḥ kathaṁ śreyo bhaviṣyati jābāliruvāca- mayāpi sarvametatte jñātaṁ divyena cakṣuṣā

और बहुत नरक भी कहा गया है; कल्याण कैसे होगा? जाबालि ने कहा— मैंने भी दिव्य नेत्र से तुम्हारे विषय में यह सब जान लिया है।

श्लोक 63 (padma.5.109.63)

आयुर्दशदिनं ब्रह्मन्विद्वानपि न धर्मकृत् । न तपस्ते ह्यनभ्यासान्न च योगोऽल्पकालतः

āyurdaśadinaṁ brahmanvidvānapi na dharmakṛt na tapaste hyanabhyāsānna ca yogo'lpakālataḥ

हे ब्रह्मन्! तुम्हारी आयु दस दिन शेष है; विद्वान होते हुए भी तुम धर्मकर्ता नहीं रहे। अभ्यास न होने से तप संभव नहीं, अल्पकाल के कारण योग भी नहीं।

श्लोक 64 (padma.5.109.64)

न दानं द्रविणाभावादसामर्थ्यात्तथार्हणा । न यज्ञो न व्रतं पूर्तं न च पुण्यमनायुषः

na dānaṁ draviṇābhāvādasāmarthyāttathārhaṇā na yajño na vrataṁ pūrtaṁ na ca puṇyamanāyuṣaḥ

धन के अभाव से दान नहीं, असामर्थ्य से पूजा भी नहीं; न यज्ञ, न व्रत, न पूर्त-कर्म, न ही इतनी कम आयु में कोई पुण्य।

श्लोक 65 (padma.5.109.65)

न चाध्यापनतीर्थादि सेवाकालविरोधतः । तस्मात्तत्पापनाशाय प्रायश्चित्तं न विद्यते

na cādhyāpanatīrthādi sevākālavirodhataḥ tasmāttatpāpanāśāya prāyaścittaṁ na vidyate

न अध्यापन, न तीर्थ आदि, समय-विरोध के कारण सेवा भी नहीं। इसलिए उस पाप-नाश के लिए कोई सामान्य प्रायश्चित्त विद्यमान नहीं है।

श्लोक 66 (padma.5.109.66)

गतिप्रदं तथा धर्मं गच्छ वा तिष्ठ वा मुने । इक्ष्वाकुरुवाच-। यावज्जीवं प्रतिज्ञाय क्रियते यो वृषो द्विज

gatipradaṁ tathā dharmaṁ gaccha vā tiṣṭha vā mune ikṣvākuruvāca- yāvajjīvaṁ pratijñāya kriyate yo vṛṣo dvija

वह धर्म जो सद्गति दे, उसकी खोज में जाओ या यहीं रहो, हे मुने! इक्ष्वाकु ने कहा— हे द्विज! जीवनभर की प्रतिज्ञा लेकर जो व्रत किया जाता है —

श्लोक 67 (padma.5.109.67)

तेन पापपरीहारो भविष्यति सुनिश्चितम् । तं ब्रूहि येन धर्मेण मम पापं प्रणश्यति

tena pāpaparīhāro bhaviṣyati suniścitam taṁ brūhi yena dharmeṇa mama pāpaṁ praṇaśyati

उससे पाप का निवारण निश्चय ही होगा। मुझे वह धर्म बताइए जिससे मेरा पाप नष्ट हो —

श्लोक 68 (padma.5.109.68)

केन वा पुण्ययोगेन स्वर्गतिश्च भविष्यति । शरणं भव विप्रर्षे नरकादतिबिभ्यतः

kena vā puṇyayogena svargatiśca bhaviṣyati śaraṇaṁ bhava viprarṣe narakādatibibhyataḥ

या किस पुण्य-योग से स्वर्ग-गति प्राप्त होगी। हे विप्रर्षे! नरक से अत्यंत भयभीत मेरी शरण बनिए।

श्लोक 69 (padma.5.109.69)

सर्वधर्मफलं प्राहुः शरणागतपालनम् । जाबालिरुवाच- सत्यं स्वल्पेन कालेन न तादृग्लभ्यते वृषः

sarvadharmaphalaṁ prāhuḥ śaraṇāgatapālanam jābāliruvāca- satyaṁ svalpena kālena na tādṛglabhyate vṛṣaḥ

सब धर्मों का फल शरणागत की रक्षा ही कहा गया है। जाबालि ने कहा— यह सत्य है, परंतु इतने कम समय में ऐसा व्रत प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 70 (padma.5.109.70)

अमृतेत्वनृते शक्यं वक्तुं स्वप्नांतरेष्वपि । रहस्यमेकं किंचित्तु यस्य कस्यापि नोच्यते

amṛtetvanṛte śakyaṁ vaktuṁ svapnāṁtareṣvapi rahasyamekaṁ kiṁcittu yasya kasyāpi nocyate

स्वप्न में भी सत्य को असत्य कहा जा सकता है, परंतु एक निश्चित रहस्य है, जो किसी को भी सामान्यतः नहीं बताया जाता।

श्लोक 71 (padma.5.109.71)

इक्ष्वाकुरुवाच- शरणं पालय मुने कालो मे निर्गमिष्यति । जाबालिरुवाच- मम प्राणाधिकं विप्र रहस्यं श्रुतिचोदितम्

ikṣvākuruvāca- śaraṇaṁ pālaya mune kālo me nirgamiṣyati jābāliruvāca- mama prāṇādhikaṁ vipra rahasyaṁ śruticoditam

इक्ष्वाकु ने कहा— हे मुने! शरणागत की रक्षा कीजिए, मेरा समय बीता जा रहा है। जाबालि ने कहा— हे विप्र! श्रुति द्वारा प्रेरित मेरा यह रहस्य, प्राणों से भी अधिक प्रिय —

श्लोक 72 (padma.5.109.72)

शिवलिंगार्चनं नाम ब्रह्मादिभिरनुष्ठितम् । समस्तपापशमनं सर्वोपद्रवनाशनम्

śivaliṁgārcanaṁ nāma brahmādibhiranuṣṭhitam samastapāpaśamanaṁ sarvopadravanāśanam

शिवलिंग-अर्चन नामक है, ब्रह्मा आदि द्वारा भी अनुष्ठित; समस्त पाप को शांत करने वाला, सब उपद्रवों का नाशक —

श्लोक 73 (padma.5.109.73)

भुक्तिमुक्तिप्रदं तस्माच्छिवपूजां समाचर । नातिक्रामेद्यदि मुने शिवलिंगार्चनं शुभम्

bhuktimuktipradaṁ tasmācchivapūjāṁ samācara nātikrāmedyadi mune śivaliṁgārcanaṁ śubham

भोग और मोक्ष दोनों देने वाला। इसलिए शिव-पूजा का आचरण करो। हे मुने! यदि इस शुभ शिवलिंग-अर्चन का उल्लंघन न किया जाए —

श्लोक 74 (padma.5.109.74)

यः शंभुपूजां विच्छिंद्यात्तेन च्छिन्नं हि मे शिरः । वरं शूलविनिक्षेपो वरं शाल्मलिकर्षणम्

yaḥ śaṁbhupūjāṁ vicchiṁdyāttena cchinnaṁ hi me śiraḥ varaṁ śūlavinikṣepo varaṁ śālmalikarṣaṇam

जो शंभु की पूजा में विघ्न डालता है, उसके द्वारा मानो मेरा ही सिर काटा जाता है। शूल से बींधा जाना अच्छा, शाल्मलि वृक्ष पर घसीटा जाना अच्छा —

श्लोक 75 (padma.5.109.75)

वरं प्राणपरित्यागो नैव पूजाव्यतिक्रमः । वरं वह्निप्रपतनं वरं चाधःशिरः कृतम्

varaṁ prāṇaparityāgo naiva pūjāvyatikramaḥ varaṁ vahniprapatanaṁ varaṁ cādhaḥśiraḥ kṛtam

प्राण-त्याग अच्छा, परंतु पूजा में व्यतिक्रम नहीं। अग्नि में गिरना अच्छा, सिर के बल लटकना अच्छा —

श्लोक 76 (padma.5.109.76)

वरं स्वमलभुक्तिर्वा नेशपूजाव्यतिक्रमः । अपूजयित्वा चेशानं यो हि भुंक्ते नराधमः

varaṁ svamalabhuktirvā neśapūjāvyatikramaḥ apūjayitvā ceśānaṁ yo hi bhuṁkte narādhamaḥ

अपनी ही गंदगी खाना अच्छा, परंतु ईश-पूजा का उल्लंघन नहीं। ईशान की पूजा किए बिना जो नराधम भोजन करता है —

श्लोक 77 (padma.5.109.77)

पापानामन्नरूपाणां तस्य भोजनमुच्यते । अनुच्चार्य पदं शंभोर्भुङ्क्ते यदि च खादति

pāpānāmannarūpāṇāṁ tasya bhojanamucyate anuccārya padaṁ śaṁbhorbhuṅkte yadi ca khādati

उसका वह भोजन अन्न-रूपी पापों का ही भोजन कहा जाता है। शंभु के नाम का उच्चारण किए बिना जो खाता या चबाता है —

श्लोक 78 (padma.5.109.78)

शिवेति मंगलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते । भस्मीभवंति तस्याशु महापातककोटयः

śiveti maṁgalaṁ nāma yasya vāci pravartate bhasmībhavaṁti tasyāśu mahāpātakakoṭayaḥ

[उसमें दोष है]। परंतु जिसकी वाणी में 'शिव' यह मंगलमय नाम सदा रहता है, उसके करोड़ों महापाप भी शीघ्र ही भस्म हो जाते हैं।

श्लोक 79 (padma.5.109.79)

शिवं प्रदक्षिणीकृत्य यो नमस्यति मानवः । भूमेः प्रदक्षिणं कृत्वा यत्तत्पुण्यमवाप्नुयात्

śivaṁ pradakṣiṇīkṛtya yo namasyati mānavaḥ bhūmeḥ pradakṣiṇaṁ kṛtvā yattatpuṇyamavāpnuyāt

जो मनुष्य शिव की प्रदक्षिणा करके नमस्कार करता है, वह पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने के बराबर पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 80 (padma.5.109.80)

प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा नमस्कारं च पंचधा । पुनः प्रदक्षिणं कृत्वा नत्वा मुच्येत पातकैः

pradakṣiṇatrayaṁ kṛtvā namaskāraṁ ca paṁcadhā punaḥ pradakṣiṇaṁ kṛtvā natvā mucyeta pātakaiḥ

तीन प्रदक्षिणा और पाँच प्रकार से नमस्कार करके, फिर एक बार प्रदक्षिणा करके नमन करने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 81 (padma.5.109.81)

सर्ववाद्यानि यः कुर्यात्कारयेद्वा शिवालये । बलेन महता युक्तो वेदसेव्यत्र जायते

sarvavādyāni yaḥ kuryātkārayedvā śivālaye balena mahatā yukto vedasevyatra jāyate

जो शिवालय में सब वाद्य बजाता है या बजवाता है, वह महान बल से युक्त, वेद-सेवा के योग्य होकर जन्म लेता है।

श्लोक 82 (padma.5.109.82)

श्रावयेद्यः पुराणानि देवदेवं त्रिलोचनम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो वसेच्छिवपुरे कृती

śrāvayedyaḥ purāṇāni devadevaṁ trilocanam sarvapāpavinirmukto vasecchivapure kṛtī

जो त्रिनेत्र देवाधिदेव के पुराणों का श्रवण करवाता है, वह सब पापों से मुक्त होकर, कृतार्थ होकर शिवपुरी में निवास करता है।

श्लोक 83 (padma.5.109.83)

तं नित्यमादरेणेशो वक्ति वाक्यं प्रियं सदा । एतत्संक्षेपतः प्रोक्तमीशपूजनमुत्तमम्

taṁ nityamādareṇeśo vakti vākyaṁ priyaṁ sadā etatsaṁkṣepataḥ proktamīśapūjanamuttamam

उससे ईश सदा आदरपूर्वक प्रिय वचन कहते हैं। यह ईश-पूजन संक्षेप में उत्तम रूप से बताया गया है।

श्लोक 84 (padma.5.109.84)

अल्पायुश्च भवान्विप्र शिवपूजनमाचर । त्रिकालं वा द्विकालं वा एककालमथापि वा

alpāyuśca bhavānvipra śivapūjanamācara trikālaṁ vā dvikālaṁ vā ekakālamathāpi vā

हे विप्र! तुम्हारी आयु अल्प है, शिव-पूजन का आचरण करो — त्रिकाल में, या द्विकाल में, या एककाल में भी।

श्लोक 85 (padma.5.109.85)

यामं यामार्धमथवा शिवपूजनमाचर । वानप्रस्थाश्रमो भूत्वा वानप्रस्थकृताश्रयः

yāmaṁ yāmārdhamathavā śivapūjanamācara vānaprasthāśramo bhūtvā vānaprasthakṛtāśrayaḥ

एक याम, या आधे याम में भी शिव-पूजन करो। वानप्रस्थाश्रम बनकर, वानप्रस्थ के आश्रय में —

श्लोक 86 (padma.5.109.86)

वानप्रस्थप्रसूनैश्च प्रातःपूजय शंकरम् । श्रीफलैः शतपत्रैश्च पद्मसौगंधिकैरपि

vānaprasthaprasūnaiśca prātaḥpūjaya śaṁkaram śrīphalaiḥ śatapatraiśca padmasaugaṁdhikairapi

वानप्रस्थ के फूलों से प्रातःकाल शंकर की पूजा करो — बिल्वफल, शतपत्र-कमल, सौगंधिक-कमल से भी —

श्लोक 87 (padma.5.109.87)

नीपैर्जपाभिः पुन्नागैः करवीरैश्च पाटलैः । तुलस्याच रविदलैरपराजितया तथा

nīpairjapābhiḥ punnāgaiḥ karavīraiśca pāṭalaiḥ tulasyāca ravidalairaparājitayā tathā

कदंब, जपाकुसुम, पुन्नाग, कनेर और पाटल से; तुलसी, आक-पत्तों से, अपराजिता से भी —

श्लोक 88 (padma.5.109.88)

अपामार्गदलै रुद्र जटादमनकेन च । सर्वैरेभिः समफलैर्बिल्वपत्रैश्च धूर्तकैः

apāmārgadalai rudra jaṭādamanakena ca sarvairebhiḥ samaphalairbilvapatraiśca dhūrtakaiḥ

अपामार्ग-पत्तों से, हे रुद्र-भक्त! जटामासी और दमनक से; इन सबसे और इनके समान फलों तथा बिल्व-पत्रों और धतूरे से भी —

श्लोक 89 (padma.5.109.89)

द्रोणैः शिरीषैः शक्तैश्च दूर्वया कोरकैरपि । नंद्यावर्तैरक्षतैश्च तिलमिश्रैश्च केवलैः

droṇaiḥ śirīṣaiḥ śaktaiśca dūrvayā korakairapi naṁdyāvartairakṣataiśca tilamiśraiśca kevalaiḥ

द्रोण, शिरीष, शक्त फूलों से, दूर्वा और कलियों से भी; नंद्यावर्त, अक्षत और केवल तिल मिलाकर भी —

श्लोक 90 (padma.5.109.90)

अन्यैरपि यथाशक्ति प्रातः संपूजयेच्छिवम् । कर्णिकारैश्च सौवर्णर्दूवर्ययापि शिवार्चनम्

anyairapi yathāśakti prātaḥ saṁpūjayecchivam karṇikāraiśca sauvarṇardūvaryayāpi śivārcanam

और भी सामर्थ्य अनुसार अन्य फूलों से प्रातःकाल शिव की पूजा करो; कर्णिकार और सुनहरी दूर्वा से भी शिवार्चन हो सकता है।

श्लोक 91 (padma.5.109.91)

मुकुलैर्नार्चयेद्देवं चंपकैर्जलजं विना । जलजानां च सर्वेषां पत्राणामक्षतस्य च

mukulairnārcayeddevaṁ caṁpakairjalajaṁ vinā jalajānāṁ ca sarveṣāṁ patrāṇāmakṣatasya ca

बिना जलज पुष्प के, केवल चंपक-कलियों से देव की पूजा न करे। सब जलज पुष्पों, पत्तों और अक्षत की —

श्लोक 92 (padma.5.109.92)

कुशपुष्पस्य रजतसुवर्णकृतयोरपि । अन्यत्कृत्वा यथा यत्तु तैलपक्वं भवेन्नृप

kuśapuṣpasya rajatasuvarṇakṛtayorapi anyatkṛtvā yathā yattu tailapakvaṁ bhavennṛpa

और कुश-पुष्प की, चाँदी-सोने से बने पुष्पों की भी [बासीपन नहीं होता]। हे राजन्! तेल में पकाई गई अन्य कोई भी वस्तु —

श्लोक 93 (padma.5.109.93)

न तत्पर्युषितं प्रोक्तमपूपादि गमिष्यति । उक्षितं यत्फलायुक्तं तैलक्षाराम्लजीरकैः

na tatparyuṣitaṁ proktamapūpādi gamiṣyati ukṣitaṁ yatphalāyuktaṁ tailakṣārāmlajīrakaiḥ

बासी नहीं कही जाती; अपूप आदि भी इसी में आते हैं। तेल, क्षार, अम्ल और जीरे से छिड़का फल-युक्त भोजन —

श्लोक 94 (padma.5.109.94)

जले तत्प्रोक्षितं मूलफलशाकादिकं नृप । न च पर्युषितं प्रोक्तं गंगातोयं च सागरम्

jale tatprokṣitaṁ mūlaphalaśākādikaṁ nṛpa na ca paryuṣitaṁ proktaṁ gaṁgātoyaṁ ca sāgaram

हे राजन्! जल में छिड़के गए मूल-फल-शाक आदि भी बासी नहीं कहे जाते। गंगाजल, समुद्र —

श्लोक 95 (padma.5.109.95)

महानदीजलं सर्वं केदारजलमेव च । ह्रदरूपेण यत्तीर्थं कूपतीर्थेन राघव

mahānadījalaṁ sarvaṁ kedārajalameva ca hradarūpeṇa yattīrthaṁ kūpatīrthena rāghava

सब महानदियों का जल, केदार का जल भी; हे राघव! सरोवर-रूप तीर्थ या कूप-तीर्थ का जल भी —

श्लोक 96 (padma.5.109.96)

तडागवापीसरसां कूपेनापां च यद्भवेत् । तत्तीर्थतोयं सर्वं च न च पर्युषितं भवेत्

taḍāgavāpīsarasāṁ kūpenāpāṁ ca yadbhavet tattīrthatoyaṁ sarvaṁ ca na ca paryuṣitaṁ bhavet

तालाब-बावड़ी-सरोवर या कूप से प्राप्त जल भी — यह सब तीर्थ-जल कभी बासी नहीं होता।

श्लोक 97 (padma.5.109.97)

न रात्रौ जलमाहार्यं दिवा संपादयेज्जलम् । ससैकतं तथा धार्यं न च पर्युषितं हि तत्

na rātrau jalamāhāryaṁ divā saṁpādayejjalam sasaikataṁ tathā dhāryaṁ na ca paryuṣitaṁ hi tat

रात्रि में जल नहीं लाना चाहिए, दिन में ही जल का प्रबंध करना चाहिए। बालू-मिश्रित जल भी धारण किया जा सकता है, वह बासी नहीं होता।

श्लोक 98 (padma.5.109.98)

एवं विदित्वा पूजां त्वं शिवलिंगे समाचर । शंभुरुवाच- एवमुक्तोथ मुनिना इक्ष्वाकुर्ब्राह्मणप्रियः

evaṁ viditvā pūjāṁ tvaṁ śivaliṁge samācara śaṁbhuruvāca- evamuktotha muninā ikṣvākurbrāhmaṇapriyaḥ

यह सब जानकर तुम शिवलिंग में पूजा का आचरण करो। शंभु ने कहा— मुनि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, ब्राह्मणों को प्रिय वह इक्ष्वाकु —

श्लोक 99 (padma.5.109.99)

शिवपूजापरो भूत्वा दिनाष्टकमतिष्ठत । नवमेऽथ दिने प्राप्ते प्रातःकाले कृतार्चनः

śivapūjāparo bhūtvā dināṣṭakamatiṣṭhata navame'tha dine prāpte prātaḥkāle kṛtārcanaḥ

शिव-पूजा में तत्पर होकर आठ दिन तक स्थित रहा। फिर नौवें दिन आने पर, प्रातःकाल पूजा करके —

श्लोक 100 (padma.5.109.100)

मरणावसरे प्राप्ते शिवपूजां विधाय सः । स्वान्प्राणानुपहाराय तत्याजैव महेशितुः

maraṇāvasare prāpte śivapūjāṁ vidhāya saḥ svānprāṇānupahārāya tatyājaiva maheśituḥ

मृत्यु का अवसर आने पर उसने शिव-पूजा करके, अपने प्राणों को महेश के लिए उपहार-स्वरूप त्याग दिया।

श्लोक 101 (padma.5.109.101)

मृतं तमथ विज्ञाय यमदूताः समागताः । यमलोकप्रापका ये यतमास्थाय तस्थिरे

mṛtaṁ tamatha vijñāya yamadūtāḥ samāgatāḥ yamalokaprāpakā ye yatamāsthāya tasthire

उसे मृत जानकर यमदूत आ पहुँचे — जो यमलोक ले जाने वाले थे, यत्नपूर्वक वहाँ ठहर गए।

श्लोक 102 (padma.5.109.102)

शैवाश्चापि समायाता दूता वह्निमुखादयः । तेषामन्योन्यवादोभून्मामको मामकस्त्विति

śaivāścāpi samāyātā dūtā vahnimukhādayaḥ teṣāmanyonyavādobhūnmāmako māmakastviti

शैव दूत भी आ पहुँचे, वह्निमुख आदि। उनके बीच 'यह मेरा है, यह मेरा है' कहकर विवाद हो गया।

श्लोक 103 (padma.5.109.103)

अथ यामः पाशपाणिः शिवदूतमथार्दयत् । अथ वह्निमुखः क्रुद्धो यमदूतशतं ततः

atha yāmaḥ pāśapāṇiḥ śivadūtamathārdayat atha vahnimukhaḥ kruddho yamadūtaśataṁ tataḥ

तब पाश-हाथ वाले यम-दूत ने शिव-दूत को पीड़ा पहुँचाई। फिर क्रोधित वह्निमुख ने सैकड़ों यम-दूतों को —

श्लोक 104 (padma.5.109.104)

महाकायस्तथा भूत्वा गृहीत्वा च करेण तत् । शिरांसि च तथैकेनापीड्य चिच्छेद शष्पवत्

mahākāyastathā bhūtvā gṛhītvā ca kareṇa tat śirāṁsi ca tathaikenāpīḍya ciccheda śaṣpavat

विशाल शरीर धारण करके, हाथ से पकड़कर, एक ही हाथ से उनके सिर घास की भाँति काट डाले।

श्लोक 105 (padma.5.109.105)

मारयित्वा ततो दूतानादायेक्ष्वाकुमभ्यगात् । निवेदयामास च तं वीरभद्राय धीमते

mārayitvā tato dūtānādāyekṣvākumabhyagāt nivedayāmāsa ca taṁ vīrabhadrāya dhīmate

दूतों को मारकर, इक्ष्वाकु को लेकर वह गया, और बुद्धिमान वीरभद्र को यह सूचित किया।

श्लोक 106 (padma.5.109.106)

स चापि शंकरायाथ तं प्राह च महेश्वरः । त्वयाष्टदिनपूजैव कृता कृष्णा दिने दिने

sa cāpi śaṁkarāyātha taṁ prāha ca maheśvaraḥ tvayāṣṭadinapūjaiva kṛtā kṛṣṇā dine dine

वीरभद्र ने भी शंकर से कहा; तब महेश्वर ने उससे कहा — तुमने आठ दिन ही पूजा की, वह भी दिन-प्रतिदिन दोषयुक्त —

श्लोक 107 (padma.5.109.107)

त्वमनिंदः पुरा मां च लिंगं शिश्नाग्रमित्युत । तेनैव पापयोगेन शिश्नवक्त्रो भविष्यसि

tvamaniṁdaḥ purā māṁ ca liṁgaṁ śiśnāgramityuta tenaiva pāpayogena śiśnavaktro bhaviṣyasi

क्योंकि तुमने पहले मेरी निंदा की थी, लिंग को 'शिश्नाग्र' कहकर। उसी पाप-योग से तुम शिश्न-मुख बनोगे।

श्लोक 108 (padma.5.109.108)

शिश्नाग्रे विवरं चक्रं जिह्वानासादिवर्जितः । पूर्वं मन्नामवक्तृत्वाद्वक्ता चापि भविष्यसि

śiśnāgre vivaraṁ cakraṁ jihvānāsādivarjitaḥ pūrvaṁ mannāmavaktṛtvādvaktā cāpi bhaviṣyasi

शिश्न के अग्रभाग में एक छिद्र बनाकर, जिह्वा-नासिका आदि से रहित करके — पहले मेरे नाम का उच्चारण करने के कारण तुम फिर से वक्ता भी बनोगे।

श्लोक 109 (padma.5.109.109)

अथेशवचनात्सोपि तथाभूतोभवत्क्षणात् । शंभुरुवाच- य इदं शृणुयान्नित्यं पुराणाख्यानमुत्तमम्

atheśavacanātsopi tathābhūtobhavatkṣaṇāt śaṁbhuruvāca- ya idaṁ śṛṇuyānnityaṁ purāṇākhyānamuttamam

ईश्वर के इस वचन से वह भी उसी क्षण उसी रूप में बदल गया। शंभु ने कहा— जो कोई भी इस श्रेष्ठ पुराणाख्यान को नित्य सुनता है —

श्लोक 110 (padma.5.109.110)

विमुक्तपापबंधश्च शिवभक्तो भविष्यति । स याति च शिवस्थाने वक्ता चापि तथा भवेत्

vimuktapāpabaṁdhaśca śivabhakto bhaviṣyati sa yāti ca śivasthāne vaktā cāpi tathā bhavet

वह पाप-बंधन से मुक्त होकर शिवभक्त बनेगा। वह शिव के स्थान को जाता है, और वक्ता भी वैसे ही बनता है।

श्लोक 111 (padma.5.109.111)

यश्च वक्ति कथामेनां हरेण सदृशो भवेत् । उक्त्वा कथामिमां पूर्वमधीरो नाम भूमिपः

yaśca vakti kathāmenāṁ hareṇa sadṛśo bhavet uktvā kathāmimāṁ pūrvamadhīro nāma bhūmipaḥ

और जो इस कथा को कहता है, वह हर के समान हो जाता है। पहले इस कथा को कहकर अधीर नामक एक राजा —

श्लोक 112 (padma.5.109.112)

स्वर्गं स गतवान्राजा कृतपापोथ भार्यया

svargaṁ sa gatavānrājā kṛtapāpotha bhāryayā

पापी होते हुए भी अपनी पत्नी सहित स्वर्ग को गया।

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