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पाताल खण्ड · अध्याय 111

राजा विधृत का अंतिम वचन: शिव-नाम के अंश-मात्र की शक्ति

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

श्लोक 1 (padma.5.111.1)

श्रीराम उवाच- महेशनाममाहात्म्यं पूजामाहात्म्यमेव च । नमस्कारस्य माहात्म्यं दृष्टिमाहात्म्यमेव च

śrīrāma uvāca- maheśanāmamāhātmyaṁ pūjāmāhātmyameva ca namaskārasya māhātmyaṁ dṛṣṭimāhātmyameva ca

श्रीराम ने कहा— महेश के नाम की महिमा, पूजा की महिमा, नमस्कार की महिमा और दर्शन की महिमा भी —

श्लोक 2 (padma.5.111.2)

जलदानस्य माहात्म्यं धूपदानस्य सत्तम । दीपगंधादिदानस्य माहात्म्यं वद मे गुरो

jaladānasya māhātmyaṁ dhūpadānasya sattama dīpagaṁdhādidānasya māhātmyaṁ vada me guro

जल-दान की महिमा, हे सत्तम! धूप-दान की, दीप-गंध आदि दान की महिमा भी मुझे बताइए, हे गुरो!

श्लोक 3 (padma.5.111.3)

शंभुरुवाच- एकैकनाममाहात्म्यं विस्तरान्न हि शक्यते । संक्षेपेण च ते वच्मि शृणु राघव सादरम्

śaṁbhuruvāca- ekaikanāmamāhātmyaṁ vistarānna hi śakyate saṁkṣepeṇa ca te vacmi śṛṇu rāghava sādaram

शंभु ने कहा— प्रत्येक नाम की महिमा विस्तार से कहना संभव नहीं है; मैं तुम्हें संक्षेप में कहता हूँ, हे राघव! आदरपूर्वक सुनो।

श्लोक 4 (padma.5.111.4)

पुरा त्रेतायुगे राजा विधृतो नाम वीर्यवान् । मृते पितरि बालोसौ भूमिराज्येभिषेचितः

purā tretāyuge rājā vidhṛto nāma vīryavān mṛte pitari bālosau bhūmirājyebhiṣecitaḥ

प्राचीनकाल में त्रेतायुग में विधृत नामक एक बलवान राजा था। पिता की मृत्यु होने पर वह बालक ही पृथ्वी के राज्य पर अभिषिक्त हुआ।

श्लोक 5 (padma.5.111.5)

समानवयसः सर्वान्समीपस्थांश्चकार सः । ये वृद्धा ये च विद्वांसस्ते च तस्य न संमताः

samānavayasaḥ sarvānsamīpasthāṁścakāra saḥ ye vṛddhā ye ca vidvāṁsaste ca tasya na saṁmatāḥ

उसने अपने समान आयु वालों को ही अपने निकट रखा। जो वृद्ध और विद्वान थे, वे उसे मान्य नहीं थे।

श्लोक 6 (padma.5.111.6)

युवानः संमता दुष्टा अकार्यकरणास्तथा । सुस्त्र्यानयनदक्षाश्च चोरकर्मविशारदाः

yuvānaḥ saṁmatā duṣṭā akāryakaraṇāstathā sustryānayanadakṣāśca corakarmaviśāradāḥ

दुष्ट युवक, अकार्य करने वाले, सुंदर स्त्रियों को लाने में दक्ष, चोरी में निपुण —

श्लोक 7 (padma.5.111.7)

भांडवार्तारता लास्यनिपुणास्तस्य संमताः । वशीकरणमंत्रज्ञा वस्त्रौषधविदस्तथा

bhāṁḍavārtāratā lāsyanipuṇāstasya saṁmatāḥ vaśīkaraṇamaṁtrajñā vastrauṣadhavidastathā

भाँड-विदूषकों की बातों में रत, नृत्य में निपुण उसे मान्य थे; वशीकरण-मंत्र जानने वाले, वस्त्र और औषधि के ज्ञाता भी —

श्लोक 8 (padma.5.111.8)

गीतनर्तनशीलाश्च धूर्त्ता द्यूतविदः प्रियाः । पितृसंमतकर्तॄणां त्यागं चक्रे स पार्थिवः

gītanartanaśīlāśca dhūrttā dyūtavidaḥ priyāḥ pitṛsaṁmatakartṝṇāṁ tyāgaṁ cakre sa pārthivaḥ

गीत-नृत्य में रत, धूर्त, जुआरी उसे प्रिय थे। पिता द्वारा नियुक्त कर्मचारियों को उस राजा ने त्याग दिया।

श्लोक 9 (padma.5.111.9)

विचार्य स च तैः सार्द्धं दुष्टैः कार्यमकारयत् । एतादृशांस्तथा चान्यान्दुष्टान्सह युयोज ह

vicārya sa ca taiḥ sārddhaṁ duṣṭaiḥ kāryamakārayat etādṛśāṁstathā cānyānduṣṭānsaha yuyoja ha

वह उन दुष्टों के साथ विचार करके ही कार्य करवाता था। इसी प्रकार उसने और भी अनेक दुष्टों को अपने साथ जोड़ लिया।

श्लोक 10 (padma.5.111.10)

एतदुक्तिमुपालंब्य शिष्टं सुहृदमत्यजत् । उरोमुष्टिं च फेत्कारं ये कुर्युस्तस्य ते प्रियाः

etaduktimupālaṁbya śiṣṭaṁ suhṛdamatyajat uromuṣṭiṁ ca phetkāraṁ ye kuryustasya te priyāḥ

इसी उक्ति का सहारा लेकर उसने अपने सुसंस्कृत मित्रों को त्याग दिया। जो छाती पीटकर और फेत्कार की आवाज़ निकालते थे, वे उसे प्रिय थे।

श्लोक 11 (padma.5.111.11)

भगलक्षणतत्त्वज्ञा रतितंत्रविशारदाः । राजनीतिविहीनं तद्राज्यं समभवत्तदा

bhagalakṣaṇatattvajñā ratitaṁtraviśāradāḥ rājanītivihīnaṁ tadrājyaṁ samabhavattadā

स्त्रियों के गुप्त लक्षणों के ज्ञाता, कामशास्त्र में निपुण — तब उसका राज्य राजनीति से रहित हो गया।

श्लोक 12 (padma.5.111.12)

गजाश्वरथमुष्ट्राजं गोमहिष्यादिकं च यत् । तत्सर्वं नाशमापन्नमपहारायतस्ततः

gajāśvarathamuṣṭrājaṁ gomahiṣyādikaṁ ca yat tatsarvaṁ nāśamāpannamapahārāyatastataḥ

हाथी, घोड़े, रथ, ऊँट-बकरी, गौ-भैंस आदि — यह सब नष्ट हो गया, चारों ओर से लूटा जाने के कारण।

श्लोक 13 (padma.5.111.13)

रत्नानि वसुधान्यानि न दृश्यंते पुरे तदा । अथ भूपांतरेणासौ निर्जितः प्रपलायितः

ratnāni vasudhānyāni na dṛśyaṁte pure tadā atha bhūpāṁtareṇāsau nirjitaḥ prapalāyitaḥ

तब नगर में रत्न और धन-धान्य दिखाई नहीं देते थे। फिर किसी अन्य राजा से हारकर वह भाग गया।

श्लोक 14 (padma.5.111.14)

महारण्यमथो गत्वा गिरिदुर्गमकल्पयत् । तत्र चाल्पपरीवारश्चोरवृत्तिं समाश्रितः

mahāraṇyamatho gatvā giridurgamakalpayat tatra cālpaparīvāraścoravṛttiṁ samāśritaḥ

महावन में जाकर उसने पर्वत में एक दुर्ग बना लिया। वहाँ थोड़े से परिवार सहित उसने चोरी की वृत्ति अपना ली।

श्लोक 15 (padma.5.111.15)

सुवर्णवस्त्रधान्यादि रत्नगंधादिकं तथा । तत्रतत्र विनिर्दिश्य चोरानायानवंचकान्

suvarṇavastradhānyādi ratnagaṁdhādikaṁ tathā tatratatra vinirdiśya corānāyānavaṁcakān

स्वर्ण, वस्त्र, धान्य आदि, रत्न-गंध आदि की — यहाँ-वहाँ लक्ष्य बताकर वह चोरों और ठगों को भेजता था —

श्लोक 16 (padma.5.111.16)

बंधाद्यकारयत्तैस्तु द्रव्याहरणकर्मणि । यदाहारो न विद्येत तदाहारमकल्पयत्

baṁdhādyakārayattaistu dravyāharaṇakarmaṇi yadāhāro na vidyeta tadāhāramakalpayat

और उनसे बँधवाकर द्रव्य-हरण करवाता था। जब भोजन उपलब्ध न होता, तो वह भोजन का अन्य प्रबंध करता था।

श्लोक 17 (padma.5.111.17)

गोमहिष्यादिमांसेन यद्यन्नं नोपलभ्यते । अश्वीय नरमांसेन भोजनं पर्य्यकल्पयत्

gomahiṣyādimāṁsena yadyannaṁ nopalabhyate aśvīya naramāṁsena bhojanaṁ paryyakalpayat

यदि गौ-भैंस आदि के मांस से अन्न न मिले, तो घोड़े और मनुष्य के मांस से भी भोजन का प्रबंध करवाता था।

श्लोक 18 (padma.5.111.18)

एतादृशमभूद्वृत्तं संध्योपासादिवर्जितम् । एकस्तु सचिवस्तस्य सुरापो नाम राक्षसः

etādṛśamabhūdvṛttaṁ saṁdhyopāsādivarjitam ekastu sacivastasya surāpo nāma rākṣasaḥ

संध्या-उपासना आदि से रहित उसका आचरण ऐसा ही हो गया। उसका एक मंत्री सुरापा नामक राक्षस था।

श्लोक 19 (padma.5.111.19)

नियुंक्ते सर्वकालं तमाहरप्रहरेति च । एवं रक्षोमते स्थित्वा नानादेशगतान्नरान्

niyuṁkte sarvakālaṁ tamāharaprahareti ca evaṁ rakṣomate sthitvā nānādeśagatānnarān

वह उसे सदा 'ले आओ, मार डालो' यह आज्ञा देता था। इस प्रकार उस राक्षस की सलाह पर चलते हुए, वह नाना देशों से आए मनुष्यों को —

श्लोक 20 (padma.5.111.20)

नृसहस्रपरीवारो ह्यादद्यादकृपालयः । स्वस्याभिमतयोषास्तु ज्ञात्वा ज्ञात्वा समाहरत्

nṛsahasraparīvāro hyādadyādakṛpālayaḥ svasyābhimatayoṣāstu jñātvā jñātvā samāharat

हज़ारों पुरुषों के साथ, निर्दयी होकर, पकड़ लेता था। अपनी पसंद की स्त्रियों को जान-जानकर वह उठा लेता था।

श्लोक 21 (padma.5.111.21)

किंचित्कालं च ता भुक्त्वा तासां मांसमभक्षयत् । एवं हत्वा नरान्नारी राज्यं चक्रे सुदुःसहम्

kiṁcitkālaṁ ca tā bhuktvā tāsāṁ māṁsamabhakṣayat evaṁ hatvā narānnārī rājyaṁ cakre suduḥsaham

कुछ समय उन्हें भोगकर वह उनका मांस भी खा लेता था। इस प्रकार पुरुषों-स्त्रियों को मारकर उसने अत्यंत असह्य राज्य चलाया।

श्लोक 22 (padma.5.111.22)

एवं वर्षसहस्रं तु राज्यं कृत्वा नराधमः । जराशिथिलसर्वांगो वलीपलितदूषितः

evaṁ varṣasahasraṁ tu rājyaṁ kṛtvā narādhamaḥ jarāśithilasarvāṁgo valīpalitadūṣitaḥ

इस प्रकार वह निकृष्ट राजा हज़ार वर्ष तक राज्य करके, बुढ़ापे से शिथिल सारे अंगों वाला, झुर्रियों और सफेद बालों से दूषित हो गया।

श्लोक 23 (padma.5.111.23)

निर्जीवमभवत्स्थानं समंताद्दशयोजनम् । अथ मृत्युदिनं प्राप्तं राज्ञस्तस्य महात्मनः

nirjīvamabhavatsthānaṁ samaṁtāddaśayojanam atha mṛtyudinaṁ prāptaṁ rājñastasya mahātmanaḥ

दस योजन तक की भूमि निर्जीव हो गई थी। फिर उस महात्मा राजा की मृत्यु का दिन आ पहुँचा।

श्लोक 24 (padma.5.111.24)

मृत्युकालेथ संप्राप्ते स्नातं भूमिगतं नृपम् । तस्य चानुचराः सर्वे परिवार्योपतस्थिरे

mṛtyukāletha saṁprāpte snātaṁ bhūmigataṁ nṛpam tasya cānucarāḥ sarve parivāryopatasthire

मृत्यु का समय आने पर स्नान करके भूमि पर लेटे हुए राजा को उसके सब अनुचरों ने घेरकर खड़े होकर देखा।

श्लोक 25 (padma.5.111.25)

सुरापः सचिवः प्राह किं कार्यं मम चादिश । अथ राजा तथा शक्तो निर्गतायुस्तदार्दितः

surāpaḥ sacivaḥ prāha kiṁ kāryaṁ mama cādiśa atha rājā tathā śakto nirgatāyustadārditaḥ

मंत्री सुरापा ने कहा— क्या करना है, मुझे आज्ञा दीजिए। तब समर्थ होते हुए भी जीवन-रहित होता, पीड़ित वह राजा —

श्लोक 26 (padma.5.111.26)

नाभेरधस्तु क्षीणासुः कथंचिद्वाक्यमुक्तवान् । त्वं सर्वकाले दैत्येंद्र प्रहरप्राहराहर

nābheradhastu kṣīṇāsuḥ kathaṁcidvākyamuktavān tvaṁ sarvakāle daityeṁdra praharaprāharāhara

नाभि के नीचे से क्षीण प्राण होते हुए, किसी प्रकार यह वचन बोला— हे दैत्येंद्र! तुम सदा प्रहार करो, प्रहार करो, हरण करो!

श्लोक 27 (padma.5.111.27)

इत्यथोक्त्वा ममारासौ यमदूताः समाययुः । विचित्रं बंधने यत्नं चक्रुस्ताडनतत्पराः

ityathoktvā mamārāsau yamadūtāḥ samāyayuḥ vicitraṁ baṁdhane yatnaṁ cakrustāḍanatatparāḥ

यह कहकर वह मर गया। यमदूत आ पहुँचे और प्रहार करने में तत्पर होकर उसे बाँधने का विचित्र प्रयत्न करने लगे।

श्लोक 28 (padma.5.111.28)

चूर्णिता बंधपाशाश्च हेतिदंडाश्च चूर्णिताः । तद्गात्रस्पर्शमात्रे च तदद्भुतमिवाभवत्

cūrṇitā baṁdhapāśāśca hetidaṁḍāśca cūrṇitāḥ tadgātrasparśamātre ca tadadbhutamivābhavat

परंतु उनके बंधन-पाश चूर्ण हो गए, और शस्त्र-दंड भी चूर्ण हो गए। उसके शरीर के स्पर्श मात्र से यह अद्भुत बात हुई।

श्लोक 29 (padma.5.111.29)

अथायातः स्वयं मृत्युः पाशेनैनमयोजयत् । मृत्युपाशमपिच्छिन्नं वीक्ष्य मृत्युरचिंतयत्

athāyātaḥ svayaṁ mṛtyuḥ pāśenainamayojayat mṛtyupāśamapicchinnaṁ vīkṣya mṛtyuraciṁtayat

फिर स्वयं मृत्यु आकर उसे अपने पाश से बाँधने लगा। मृत्यु के पाश को भी कटा हुआ देखकर मृत्यु सोचने लगा।

श्लोक 30 (padma.5.111.30)

सर्वमर्त्यमृतिर्दृष्टा दृष्टा नैतादृशी क्वचित् । इति चिंतापरे मृत्यौ ज्वालावक्त्रः प्रतापवान्

sarvamartyamṛtirdṛṣṭā dṛṣṭā naitādṛśī kvacit iti ciṁtāpare mṛtyau jvālāvaktraḥ pratāpavān

मैंने सब मनुष्यों की मृत्यु देखी है, परंतु ऐसी कभी नहीं देखी। इस प्रकार मृत्यु के चिंतित होने पर, प्रतापी ज्वालावक्त्र —

श्लोक 31 (padma.5.111.31)

वीरभद्रेण निर्दिष्टः सहसायाच्च शूलभृत् । ज्वालावक्त्रमथालोक्य मृत्युस्तूर्णं पलाययौ

vīrabhadreṇa nirdiṣṭaḥ sahasāyācca śūlabhṛt jvālāvaktramathālokya mṛtyustūrṇaṁ palāyayau

वीरभद्र द्वारा भेजा जाकर, त्रिशूलधारी, अचानक वहाँ आ पहुँचा। ज्वालावक्त्र को देखकर मृत्यु तुरंत भाग गया।

श्लोक 32 (padma.5.111.32)

पलायमानं तं दृष्ट्वा मृत्युं वह्निमुखस्तदा । अरे रे चोर चोर त्वं तिष्ठतिष्ठ क्व यास्यसि

palāyamānaṁ taṁ dṛṣṭvā mṛtyuṁ vahnimukhastadā are re cora cora tvaṁ tiṣṭhatiṣṭha kva yāsyasi

भागते हुए मृत्यु को देखकर वह्निमुख ने कहा— अरे-अरे चोर, चोर! रुको, रुको, कहाँ जाते हो?

श्लोक 33 (padma.5.111.33)

एनसो मुच्यते चोरः शूलारोपणमात्रतः । एवमाभाष्य मृत्युं तं शूलप्रोतमकल्पयत्

enaso mucyate coraḥ śūlāropaṇamātrataḥ evamābhāṣya mṛtyuṁ taṁ śūlaprotamakalpayat

चोर शूल पर चढ़ाए जाने मात्र से पाप से मुक्त हो जाता है। यह कहकर उसने मृत्यु को त्रिशूल पर पिरो दिया।

श्लोक 34 (padma.5.111.34)

शूलं स्कंधगतं कृत्वा दूतान्संग्रथ्य रज्जुना । पादशृंखलविन्यस्तानादाय नृपमध्यगात्

śūlaṁ skaṁdhagataṁ kṛtvā dūtānsaṁgrathya rajjunā pādaśṛṁkhalavinyastānādāya nṛpamadhyagāt

त्रिशूल को कंधे पर रखकर, दूतों को रस्सी से बाँधकर, पैरों में सांकल डालकर, राजा को भी लेकर वह चल पड़ा।

श्लोक 35 (padma.5.111.35)

विमानवरमारोप्य गीतवाद्यसुशोभितम् । वीरांतिकमथो गत्वा सर्वमस्मै न्यवेदयत्

vimānavaramāropya gītavādyasuśobhitam vīrāṁtikamatho gatvā sarvamasmai nyavedayat

गीत-वाद्य से सुशोभित उत्तम विमान पर सबको चढ़ाकर, वीर (वीरभद्र) के पास जाकर उसने सब कुछ निवेदित किया।

श्लोक 36 (padma.5.111.36)

वीरभद्रोपि तत्सर्वं शंकरायामितात्मने । नानामुनिगणैर्देवैर्ब्रह्मविष्णुपुरः सुरैः

vīrabhadropi tatsarvaṁ śaṁkarāyāmitātmane nānāmunigaṇairdevairbrahmaviṣṇupuraḥ suraiḥ

वीरभद्र ने भी वह सब अमित-आत्मा शंकर से — जो नाना मुनि-समूहों और देवताओं से, ब्रह्मा-विष्णु आदि देवताओं से आगे —

श्लोक 37 (padma.5.111.37)

सेव्यमानाय देवाय पार्वतीसहिताय च । प्रणिपत्य निवेद्याथ शूलस्थंमृत्युमेव च

sevyamānāya devāya pārvatīsahitāya ca praṇipatya nivedyātha śūlasthaṁmṛtyumeva ca

सेवित थे, पार्वती सहित उन देव को — प्रणाम करके निवेदित किया, त्रिशूल पर चढ़े मृत्यु का वृत्तांत भी।

श्लोक 39 (padma.5.111.39)

तूष्णीं बभूव विश्वात्मा वीरभद्रः प्रतापवान् । अग्न्याननं वीक्ष्य शिवो विगर्हयन्कथं त्वयैतद्गणसाहसं कृतम् । बिभेषि मृत्योर्न कथं यमाधिकाद्वदस्व सर्वं परमार्थतो मे

tūṣṇīṁ babhūva viśvātmā vīrabhadraḥ pratāpavān agnyānanaṁ vīkṣya śivo vigarhayankathaṁ tvayaitadgaṇasāhasaṁ kṛtam bibheṣi mṛtyorna kathaṁ yamādhikādvadasva sarvaṁ paramārthato me

विश्वात्मा, प्रतापी वीरभद्र मौन हो गए। अग्नि-मुख (वह्निमुख) को देखकर शिव ने निंदा करते हुए कहा— तुमने गण होकर यह साहस कैसे किया? तुम मृत्यु से, जो यम से भी बढ़कर है, क्यों नहीं डरते? मुझे सब यथार्थ रूप से बताओ।

श्लोक 40 (padma.5.111.40)

प्रणम्य तं वह्निमुखोऽतिरोषो मृत्युं समालोक्य ननर्त हर्षात् । उवाच चौर्यं कृतमेव मृत्युना तदेष शूलेऽपि मया प्ररोहितः

praṇamya taṁ vahnimukho'tiroṣo mṛtyuṁ samālokya nanarta harṣāt uvāca cauryaṁ kṛtameva mṛtyunā tadeṣa śūle'pi mayā prarohitaḥ

वह्निमुख ने प्रणाम करके, अत्यंत क्रोधित होकर, मृत्यु को देखकर हर्ष से नृत्य किया, और कहा— मृत्यु ने ही चोरी की थी, इसीलिए मैंने इसे त्रिशूल पर भी चढ़ा दिया।

श्लोक 41 (padma.5.111.41)

विमोचयामास शिवोपि मृत्युं दूतानशेषान्निरुजश्चकार । मृत्युं समालोक्य शिवो बभाषे मन्नाम एषां मरणे समास्ते

vimocayāmāsa śivopi mṛtyuṁ dūtānaśeṣānnirujaścakāra mṛtyuṁ samālokya śivo babhāṣe mannāma eṣāṁ maraṇe samāste

शिव ने मृत्यु को मुक्त कर दिया, और सब दूतों को भी नीरोग कर दिया। मृत्यु को देखकर शिव ने कहा— इस राजा की मृत्यु के समय मेरा ही नाम उपस्थित था।

श्लोक 42 (padma.5.111.42)

मच्चेतसामन्यधियां च नामहीनाक्षरं वाधिकवर्णयुक्तम् । ममैव लोकं प्रददामि सत्यं ह्यनेन नाम प्रहरेति भाषितम्

maccetasāmanyadhiyāṁ ca nāmahīnākṣaraṁ vādhikavarṇayuktam mamaiva lokaṁ pradadāmi satyaṁ hyanena nāma prahareti bhāṣitam

चाहे मेरे प्रति समर्पित चित्तों का हो, या अन्य विचार वालों का, नाम में अक्षर कम हो या अधिक वर्ण हों — मैं उसे अपना ही लोक देता हूँ; क्योंकि सत्य में इसने 'प्रहर' नाम कहा है।

श्लोक 43 (padma.5.111.43)

प्रशब्दमात्रं त्वधिकं हरेतिपदप्रदं वै पदमीरयंति । आरादमूंस्त्वं जपतो नमस्व मदीयवाक्यं च यमं वदस्व

praśabdamātraṁ tvadhikaṁ haretipadapradaṁ vai padamīrayaṁti ārādamūṁstvaṁ japato namasva madīyavākyaṁ ca yamaṁ vadasva

'प्र' शब्द मात्र अतिरिक्त होकर 'हर' पद देने वाला ही पद बन जाता है — यह विद्वान कहते हैं। जाओ, दूर से ही उन्हें प्रणाम करो जो मेरा जप करते हैं, और मेरा यह वचन यम से कहो।

श्लोक 44 (padma.5.111.44)

नतिं यतिं कीर्तिमुपास्तिमाश्रिता दास्यं च कैंकर्य्यमथ श्रुतिंवदाः । पंचाक्षरोक्तिं शतरुद्रियोक्तिं शिवस्य कुर्वंति न ते विचार्याः

natiṁ yatiṁ kīrtimupāstimāśritā dāsyaṁ ca kaiṁkaryyamatha śrutiṁvadāḥ paṁcākṣaroktiṁ śatarudriyoktiṁ śivasya kurvaṁti na te vicāryāḥ

प्रणाम, संयम, कीर्तन, उपासना, शरणागति, दास्य और सेवा, श्रुति-पाठ, पंचाक्षर-मंत्र और शतरुद्रीय-पाठ करने वालों की — शिव के इन भक्तों की तुम्हें कोई जाँच नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 45 (padma.5.111.45)

मन्नामरुद्राक्षविभूतिधारणो ममाग्रतो यस्तु पुराणवक्ता । सर्वेषु पापेष्वपि तेषु सत्सु प्रशास्म्यहं नैव यमाधिकारः

mannāmarudrākṣavibhūtidhāraṇo mamāgrato yastu purāṇavaktā sarveṣu pāpeṣvapi teṣu satsu praśāsmyahaṁ naiva yamādhikāraḥ

मेरे नाम, रुद्राक्ष और भस्म को धारण करने वाला, मेरे सामने पुराण कहने वाला — उसमें सभी पाप विद्यमान हों तब भी मैं ही उसका शासक हूँ, यम का अधिकार वहाँ नहीं चलता।

श्लोक 46 (padma.5.111.46)

ये चापि पापान्वितमायिनो नराः परान्नवस्त्रादिवधूभुजश्च । वाराणसीमृत्युपराश्च ये वै श्रीशैलमर्त्याश्च न ते विचार्याः

ye cāpi pāpānvitamāyino narāḥ parānnavastrādivadhūbhujaśca vārāṇasīmṛtyuparāśca ye vai śrīśailamartyāśca na te vicāryāḥ

जो पापी और मायावी मनुष्य दूसरे का अन्न-वस्त्र और पत्नी भी भोगते हैं, परंतु काशी में मृत्यु पाते हैं, या श्रीशैल के मरणशील हैं — उनकी भी जाँच मत करो।

श्लोक 47 (padma.5.111.47)

यूकाश्च दंशा अपि मत्कुणाश्च मृगादयः कीटपिपीलिकाश्च । सरीसृपा वृश्चिकशूकराश्च काशीमृताः शंकरमाप्नुवंति

yūkāśca daṁśā api matkuṇāśca mṛgādayaḥ kīṭapipīlikāśca sarīsṛpā vṛścikaśūkarāśca kāśīmṛtāḥ śaṁkaramāpnuvaṁti

जूँ, डाँस, खटमल, मृग आदि, कीड़े-चींटियाँ, सरीसृप, बिच्छू और सूअर भी — काशी में मरने पर शंकर को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 48 (padma.5.111.48)

इदं नामगृणन्ध्यायेद्यो वै हृत्पद्ममंदिरे । त्रियंबकं विरूपाक्षं सोमं सोमार्द्धभूषणम्

idaṁ nāmagṛṇandhyāyedyo vai hṛtpadmamaṁdire triyaṁbakaṁ virūpākṣaṁ somaṁ somārddhabhūṣaṇam

जो कोई इस नाम का उच्चारण करते हुए हृदय-कमल के मंदिर में ध्यान करता है — त्र्यंबक, विरूपाक्ष, सोम, चंद्र-आभूषण वाले —

श्लोक 49 (padma.5.111.49)

त्रिनेत्रकं त्रयीनेत्रं सोमसूर्याग्निलोचनम् । तं नमस्कृत्य दूरस्थो भवमृत्यो ममाज्ञया

trinetrakaṁ trayīnetraṁ somasūryāgnilocanam taṁ namaskṛtya dūrastho bhavamṛtyo mamājñayā

त्रिनेत्र, तीनों वेदों के नेत्र वाले, चंद्र-सूर्य-अग्नि नेत्र वाले उस देव को — उन्हें प्रणाम करके, हे मृत्यु! मेरी आज्ञा से दूर रहो।

श्लोक 50 (padma.5.111.50)

अथाकर्ण्य शिवप्रोक्तं मृत्युस्तुष्टाव शंकरम् । नमस्ते देवतानाथ नमस्ते देवमूर्तये

athākarṇya śivaproktaṁ mṛtyustuṣṭāva śaṁkaram namaste devatānātha namaste devamūrtaye

तब शिव के इस वचन को सुनकर मृत्यु ने शंकर की स्तुति की— हे देवनाथ! आपको नमस्कार, हे देवमूर्ति! आपको नमस्कार।

श्लोक 51 (padma.5.111.51)

सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं पशूनां पतये नमः । अथ देवो महादेवो मृत्युं प्राह वरं वृणु

sarvajñāya namastubhyaṁ paśūnāṁ pataye namaḥ atha devo mahādevo mṛtyuṁ prāha varaṁ vṛṇu

हे सर्वज्ञ! आपको नमस्कार, हे पशुपति! नमस्कार। तब महादेव ने मृत्यु से कहा— वर माँगो।

श्लोक 52 (padma.5.111.52)

स्तोत्रेणानेन तुष्टोस्मि मृत्युर्वरमयाचत । त्वदीयं पालय विभो मां च शंकर पापिनम्

stotreṇānena tuṣṭosmi mṛtyurvaramayācata tvadīyaṁ pālaya vibho māṁ ca śaṁkara pāpinam

मैं इस स्तोत्र से संतुष्ट हूँ। मृत्यु ने वर माँगा— हे शंकर! अपने ही सेवक, पापी मुझ मृत्यु की भी रक्षा कीजिए।

श्लोक 53 (padma.5.111.53)

तथेत्युक्त्वा मृत्युमीशो गच्छ वत्सेति चाब्रवीत् । यमलोकं गतः सोपि यमायाशेषमुक्तवान्

tathetyuktvā mṛtyumīśo gaccha vatseti cābravīt yamalokaṁ gataḥ sopi yamāyāśeṣamuktavān

'ऐसा ही हो' कहकर ईश्वर ने मृत्यु से कहा— हे वत्स! जाओ। वह भी यमलोक जाकर यम से सब कुछ कह आया।

श्लोक 54 (padma.5.111.54)

शंभुरुवाच- य इदं शृणुयान्नित्यं पुण्याख्यानमनुत्तमम् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यो याति शंकरसन्निधिम्

śaṁbhuruvāca- ya idaṁ śṛṇuyānnityaṁ puṇyākhyānamanuttamam vimuktaḥ sarvapāpebhyo yāti śaṁkarasannidhim

शंभु ने कहा— जो कोई भी इस अनुपम पुण्य-आख्यान को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर शंकर के सान्निध्य को प्राप्त होता है।

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