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पाताल खण्ड · अध्याय 113

विमानस्थ ब्राह्मण: पुराण-श्रवण की मर्यादा

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114

श्लोक 1 (padma.5.113.1)

श्रीराम उवाच- खे दृश्यंते विमानस्था नानारूपधराः शुभाः । सर्वकामफलोपेताः सुभार्य्याः शतयोषितः

śrīrāma uvāca- khe dṛśyaṁte vimānasthā nānārūpadharāḥ śubhāḥ sarvakāmaphalopetāḥ subhāryyāḥ śatayoṣitaḥ

श्रीराम ने कहा— आकाश में विमानों पर बैठे, नाना शुभ रूप धारण किए, सब कामनाओं के फल से युक्त, उत्तम पत्नियों वाले, सौ-सौ स्त्रियों से युक्त लोग दिखाई देते हैं।

श्लोक 2 (padma.5.113.2)

सहस्रनरनारीभिः पूज्यमानाः पदे पदे । गायंति विंशतिर्योषा रूपलावण्यकोमलाः

sahasranaranārībhiḥ pūjyamānāḥ pade pade gāyaṁti viṁśatiryoṣā rūpalāvaṇyakomalāḥ

हज़ारों नर-नारियों द्वारा पद-पद पर पूजित; रूप-लावण्य से कोमल बीस स्त्रियाँ गाती हैं —

श्लोक 3 (padma.5.113.3)

करंकवाहिनी चैका चामरासक्तबाहवः । तालवृंतद्वयं नार्य्यो वीजयंति प्रगृह्य वै

karaṁkavāhinī caikā cāmarāsaktabāhavaḥ tālavṛṁtadvayaṁ nāryyo vījayaṁti pragṛhya vai

एक करंडक-वाहिनी है, दूसरी की भुजाएँ चामर में लगी हैं; स्त्रियाँ दो ताड़-पंखे लेकर हवा करती हैं —

श्लोक 4 (padma.5.113.4)

सचक्रे चांकमध्ये स्या उपधानं तथापरः । एकस्याः करयोर्हस्तः स्तावकानेकसंयुतः

sacakre cāṁkamadhye syā upadhānaṁ tathāparaḥ ekasyāḥ karayorhastaḥ stāvakānekasaṁyutaḥ

एक चक्र सहित गोद में बैठी है, दूसरी तकिया बनी है; एक की भुजा अनेक स्तावकों (चाटुकारों) के हाथों से जुड़ी है —

श्लोक 5 (padma.5.113.5)

नानाविधपरीहास कृतोत्फुल्लमुखांबुजः । एकैकत्र विमाने तु दृश्यते चंद्रदीधितिः

nānāvidhaparīhāsa kṛtotphullamukhāṁbujaḥ ekaikatra vimāne tu dṛśyate caṁdradīdhitiḥ

नाना प्रकार के हास्य से खिला हुआ मुखकमल; और प्रत्येक विमान में एक चंद्र-सी कांति वाला दिखाई देता है।

श्लोक 6 (padma.5.113.6)

स्त्रीशतेषु विमानेषु दृश्यते ईश्वरः शुभः । एते किं पुण्यकर्तारो विष्णुमायाथवा मुने

strīśateṣu vimāneṣu dṛśyate īśvaraḥ śubhaḥ ete kiṁ puṇyakartāro viṣṇumāyāthavā mune

सैकड़ों स्त्रियों वाले विमानों में शुभ ईश्वर दिखाई देता है — क्या ये पुण्यकर्ता हैं, या यह विष्णु की माया है, हे मुने?

श्लोक 7 (padma.5.113.7)

शंभुरुवाच- एते हि ब्राह्मणाः पुण्या गृहस्थाश्रमवासिनः । येषामेव च स ग्रासो दत्तो दशरथेन ते

śaṁbhuruvāca- ete hi brāhmaṇāḥ puṇyā gṛhasthāśramavāsinaḥ yeṣāmeva ca sa grāso datto daśarathena te

शंभु ने कहा— ये सब पुण्यात्मा ब्राह्मण हैं, गृहस्थाश्रम में रहने वाले, जिन्हें दशरथ ने वह अन्न-दान दिया था।

श्लोक 8 (padma.5.113.8)

तेषां तु ममचित्तानां कदाचिदभवन्मतिः । यथेह सुखिनः सर्वे वयं चान्योपजीविनः

teṣāṁ tu mamacittānāṁ kadācidabhavanmatiḥ yatheha sukhinaḥ sarve vayaṁ cānyopajīvinaḥ

उनके मन में एक बार यह विचार आया — कि यहाँ हम सब सुखी हैं, और दूसरों के आश्रित होकर भी —

श्लोक 9 (padma.5.113.9)

अस्मानेवानुजीवंति शतशो मनुजा इह । येन पुण्येन च वयं सर्वेकामानुमोदिनः

asmānevānujīvaṁti śataśo manujā iha yena puṇyena ca vayaṁ sarvekāmānumodinaḥ

सैकड़ों मनुष्य यहाँ हमारे ही आश्रय से जीते हैं; किस पुण्य से हम सब कामनाओं में इस प्रकार आनंदित हैं —

श्लोक 10 (padma.5.113.10)

सुस्त्रीकृतोपचाराश्च सर्वे राज्यसुखान्विताः । जरामरणहीनाश्च युवानः सर्वदैव हि

sustrīkṛtopacārāśca sarve rājyasukhānvitāḥ jarāmaraṇahīnāśca yuvānaḥ sarvadaiva hi

सुंदर स्त्रियों की सेवा पाते हुए, सब राज्य-सुखों से युक्त, जरा-मृत्यु से रहित, सदा युवा —

श्लोक 11 (padma.5.113.11)

विचार्यैवं द्विजाः सर्वे वसिष्ठस्याश्रमं ययुः । आगतानथ संपूज्य वसिष्ठो वाक्यमुक्तवान्

vicāryaivaṁ dvijāḥ sarve vasiṣṭhasyāśramaṁ yayuḥ āgatānatha saṁpūjya vasiṣṭho vākyamuktavān

इस प्रकार विचार करके सब ब्राह्मण वसिष्ठ के आश्रम गए। आए हुओं की पूजा करके वसिष्ठ ने यह वचन कहा।

श्लोक 12 (padma.5.113.12)

किमर्थमागता यूयं शीघ्रं ब्रूत द्विजोत्तमाः । द्विजा ऊचुः - वयमिच्छामहे सर्वे सर्वसंपत्समन्विते

kimarthamāgatā yūyaṁ śīghraṁ brūta dvijottamāḥ dvijā ūcuḥ - vayamicchāmahe sarve sarvasaṁpatsamanvite

तुम किसलिए आए हो, शीघ्र बताओ, हे द्विजोत्तमो! द्विजों ने कहा— हम सब चाहते हैं कि सर्वसंपत्ति से युक्त —

श्लोक 13 (padma.5.113.13)

विमाने कामगे रोढुं तत्संपादय नो गुरो । तत्तेषां चिंतितं श्रुत्वा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्

vimāne kāmage roḍhuṁ tatsaṁpādaya no guro tatteṣāṁ ciṁtitaṁ śrutvā vasiṣṭho vākyamabravīt

इच्छानुसार चलने वाले विमान पर चढ़ें; हे गुरो! यह हमें प्राप्त कराइए। उनके इस विचार को सुनकर वसिष्ठ ने यह वचन कहा।

श्लोक 14 (padma.5.113.14)

पुराणं सर्वदा विप्राः श्रोतव्यं पापनाशनम् । धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षस्तत्रैव दृश्यते

purāṇaṁ sarvadā viprāḥ śrotavyaṁ pāpanāśanam dharmaścārthaśca kāmaśca mokṣastatraiva dṛśyate

हे विप्रो! पुराण सदा सुनना चाहिए, जो पाप का नाशक है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष वहीं देखे जाते हैं।

श्लोक 15 (padma.5.113.15)

तथेत्युक्त्वाथ सुनयः पुराणकुशलं मुनिम् । जग्मुरंगिरसं श्रेष्ठं सर्वशास्त्रविशारदम्

tathetyuktvātha sunayaḥ purāṇakuśalaṁ munim jagmuraṁgirasaṁ śreṣṭhaṁ sarvaśāstraviśāradam

'ऐसा ही हो' कहकर वे सुनीति ब्राह्मण पुराण में कुशल, सर्वशास्त्र-विशारद श्रेष्ठ मुनि अंगिरा के पास गए।

श्लोक 16 (padma.5.113.16)

सर्वागमपुराणज्ञं सदा सत्कर्म्मचारिणम् । इदमूचुर्नमस्कृत्य वयं सफलजीविनः

sarvāgamapurāṇajñaṁ sadā satkarmmacāriṇam idamūcurnamaskṛtya vayaṁ saphalajīvinaḥ

सब आगम-पुराणों के ज्ञाता, सदा सत्कर्म करने वाले उनसे प्रणाम करके यह कहा— हम सफल-जीवी हो गए।

श्लोक 17 (padma.5.113.17)

कृतकृत्या वयं ब्रह्मन्साक्षाद्दृष्टोऽसि यन्मुने । अंगिरा उवाच- यत्कार्यमागता यूयं तत्कार्यं करवाण्यहम्

kṛtakṛtyā vayaṁ brahmansākṣāddṛṣṭo'si yanmune aṁgirā uvāca- yatkāryamāgatā yūyaṁ tatkāryaṁ karavāṇyaham

हे ब्रह्मन्! हम कृतकृत्य हुए, क्योंकि हमने आपका साक्षात् दर्शन किया, हे मुने! अंगिरा ने कहा— जिस कार्य के लिए तुम आए हो, वह मैं करूँगा।

श्लोक 18 (padma.5.113.18)

पुराणं श्रोतुकामास्तु यूयमत्र समागताः । कीर्तयिष्ये विधानं वः समस्ताघविनाशनम्

purāṇaṁ śrotukāmāstu yūyamatra samāgatāḥ kīrtayiṣye vidhānaṁ vaḥ samastāghavināśanam

तुम पुराण सुनने की इच्छा से यहाँ आए हो; मैं तुम्हें वह विधान बताऊँगा, जो समस्त पाप का नाशक है।

श्लोक 19 (padma.5.113.19)

सर्वज्ञानप्रदं देवं तत्वविज्ञानसंभवम् । शिवभक्तिप्रदं हृद्यं विष्णुभक्तिप्रदं शुभम्

sarvajñānapradaṁ devaṁ tatvavijñānasaṁbhavam śivabhaktipradaṁ hṛdyaṁ viṣṇubhaktipradaṁ śubham

यह सर्वज्ञान देने वाला देव, तत्त्वज्ञान से उत्पन्न, शिवभक्ति देने वाला, हृदय को प्रिय, विष्णुभक्ति देने वाला, शुभ है —

श्लोक 20 (padma.5.113.20)

विचित्रस्वगतिप्राप्ति ज्ञानदं रमणीप्रदम् । नानाविधशुभज्ञानं रतितंत्रप्रकाशकम्

vicitrasvagatiprāpti jñānadaṁ ramaṇīpradam nānāvidhaśubhajñānaṁ ratitaṁtraprakāśakam

विचित्र स्वगति की प्राप्ति का ज्ञान देने वाला, आनंददायक; नाना प्रकार का शुभ ज्ञान देने वाला, कामतंत्र को प्रकाशित करने वाला —

श्लोक 21 (padma.5.113.21)

भुक्तिमुक्तिप्रधानं च विधिदर्शनदीपकम् । विचित्रभक्तिकथनं भक्तिसाहसकीर्तनम्

bhuktimuktipradhānaṁ ca vidhidarśanadīpakam vicitrabhaktikathanaṁ bhaktisāhasakīrtanam

भोग-मोक्ष का प्रधान साधन, विधि-दर्शन का दीपक; विचित्र भक्ति-कथन करने वाला, भक्ति के साहसिक कार्यों का कीर्तन करने वाला —

श्लोक 22 (padma.5.113.22)

व्रतप्रतिष्ठादानादि भस्मपूजाविधिप्रद्रम् । पुराणं पाद्ममुदितं ब्रह्मपद्मोपनिर्वृतम्

vratapratiṣṭhādānādi bhasmapūjāvidhipradram purāṇaṁ pādmamuditaṁ brahmapadmopanirvṛtam

व्रत-प्रतिष्ठा-दान आदि, भस्म-पूजा-विधि सिखाने वाला। यह पद्म पुराण, ब्रह्मा द्वारा प्रकट किया गया, कमल पर ही रचा गया —

श्लोक 23 (padma.5.113.23)

महेश्वरेण कथितं प्रमथाकृतिवर्णनम् । एतदन्यत्र कथितं पुराणे पाद्म एव तु

maheśvareṇa kathitaṁ pramathākṛtivarṇanam etadanyatra kathitaṁ purāṇe pādma eva tu

महेश्वर द्वारा कहा गया, प्रमथ-गणों के स्वरूप का वर्णन। यह अन्यत्र भी कहा गया है, पद्म पुराण में ही तो।

श्लोक 24 (padma.5.113.24)

दिलीपेनपुरापृष्टोवसिष्ठःप्रोक्तवानिदम् । तच्छृणुध्वं मुनिवरा ज्ञानं सर्वं भविष्यति

dilīpenapurāpṛṣṭovasiṣṭhaḥproktavānidam tacchṛṇudhvaṁ munivarā jñānaṁ sarvaṁ bhaviṣyati

पहले दिलीप द्वारा पूछे जाने पर वसिष्ठ ने यह कहा था। हे श्रेष्ठ मुनियो! उसे सुनो, सारा ज्ञान प्राप्त होगा।

श्लोक 25 (padma.5.113.25)

अथ तद्वचनाद्विप्राः पुराणश्रवणे रताः । कथं श्रोतव्यमधुना किं कृत्वेत्यब्रुवन्मुनिम्

atha tadvacanādviprāḥ purāṇaśravaṇe ratāḥ kathaṁ śrotavyamadhunā kiṁ kṛtvetyabruvanmunim

तब उस वचन से ब्राह्मण पुराण-श्रवण में रत होकर मुनि से कहने लगे— अब यह कैसे सुना जाए, क्या करके?

श्लोक 26 (padma.5.113.26)

सोऽपि सर्वं समाचष्ट शृणु धर्मं सनातनम् । नमस्कृत्य पुराणज्ञं दद्याच्चार्घासनं ततः

so'pi sarvaṁ samācaṣṭa śṛṇu dharmaṁ sanātanam namaskṛtya purāṇajñaṁ dadyāccārghāsanaṁ tataḥ

उन्होंने भी सब बताया— सनातन धर्म सुनो। पुराणज्ञ को प्रणाम करके फिर अर्घ्य और आसन देना चाहिए।

श्लोक 27 (padma.5.113.27)

निषीद तत्र चेत्युक्त्वा गंधपुष्पैः समर्चयेत् । आत्मयोगं च तांबूलमधिकं वा समर्पयेत्

niṣīda tatra cetyuktvā gaṁdhapuṣpaiḥ samarcayet ātmayogaṁ ca tāṁbūlamadhikaṁ vā samarpayet

'यहाँ बैठिए' कहकर गंध-पुष्प से उनकी पूजा करनी चाहिए। आत्म-योग और ताम्बूल भी प्रचुर मात्रा में अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 28 (padma.5.113.28)

ब्रूहि पुण्यकथां ब्रह्मन्पौराणिकीमितीरयेत् । न खट्वासनमारुह्य नोच्चासनमथापि वा

brūhi puṇyakathāṁ brahmanpaurāṇikīmitīrayet na khaṭvāsanamāruhya noccāsanamathāpi vā

'हे ब्रह्मन्! पौराणिक पुण्यकथा कहिए' — ऐसा कहना चाहिए। खाट के आसन पर चढ़कर या ऊँचे आसन पर बैठकर भी सुनना उचित नहीं है —

श्लोक 29 (padma.5.113.29)

नीचासनो वै शृणुयाद्धर्म्मकामार्थसिद्धये । शृण्वित्युक्त्वा पुराणज्ञ इमं मंत्रमुदीरयेत्

nīcāsano vai śṛṇuyāddharmmakāmārthasiddhaye śṛṇvityuktvā purāṇajña imaṁ maṁtramudīrayet

नीचे आसन पर बैठकर ही धर्म-काम-अर्थ की सिद्धि के लिए सुनना चाहिए। 'सुनते हैं' कहकर पुराणज्ञ यह मंत्र कहे —

श्लोक 30 (padma.5.113.30)

नमो हरिंहरमथो गणेशं भारतीमतः । इष्टदेवं नमस्कृत्वा पुराणं वक्तुमर्हति

namo hariṁharamatho gaṇeśaṁ bhāratīmataḥ iṣṭadevaṁ namaskṛtvā purāṇaṁ vaktumarhati

हरि, हर, फिर गणेश और भारती को नमस्कार; अपने इष्टदेव को प्रणाम करके ही पुराण कहने योग्य होता है।

श्लोक 31 (padma.5.113.31)

अर्द्धयामं प्रतिदिनं यदि वापीच्छया भवेत् । एवं पाठसमाप्तिं च श्रुत्वा कृत्यं समाचरेत्

arddhayāmaṁ pratidinaṁ yadi vāpīcchayā bhavet evaṁ pāṭhasamāptiṁ ca śrutvā kṛtyaṁ samācaret

प्रतिदिन आधा प्रहर, या इच्छानुसार समय तक। इस प्रकार पाठ की समाप्ति सुनकर उचित कार्य करना चाहिए।

श्लोक 32 (padma.5.113.32)

श्रोतुश्च तूष्णीं मननं तूष्णीं श्रवणमेव वा । अन्यथा भारती क्रुद्ध्येत् तत्क्रोधान्मूकता भवेत्

śrotuśca tūṣṇīṁ mananaṁ tūṣṇīṁ śravaṇameva vā anyathā bhāratī kruddhyet tatkrodhānmūkatā bhavet

श्रोता मौन होकर मनन करे, मौन होकर ही सुने। अन्यथा भारती क्रोधित हो जाएँगी, और उस क्रोध से गूँगापन हो सकता है।

श्लोक 33 (padma.5.113.33)

तस्मात्पुराणश्रोता च तांबूलादिसमर्पणम् । वक्तुश्च जीविकाकार्या स्वसामर्थ्यानुसारतः

tasmātpurāṇaśrotā ca tāṁbūlādisamarpaṇam vaktuśca jīvikākāryā svasāmarthyānusārataḥ

इसलिए पुराण-श्रोता को ताम्बूल आदि अर्पित करना चाहिए, और वक्ता की जीविका का प्रबंध अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए।

श्लोक 34 (padma.5.113.34)

पुराणप्रक्रमे देयं सचेलोद्गमनीयकम् । सूक्ष्मांबरमथो वापि वस्त्रद्वितयमर्पयेत्

purāṇaprakrame deyaṁ sacelodgamanīyakam sūkṣmāṁbaramatho vāpi vastradvitayamarpayet

पुराण के आरंभ में वस्त्र सहित उठावनी देनी चाहिए; या बारीक वस्त्र, या वस्त्र की एक जोड़ी अर्पित करनी चाहिए।

श्लोक 35 (padma.5.113.35)

आसनं तु महच्चित्रं रम्यमूर्जस्वलं मृदु । सुवर्णं वा तथा दद्याद्गो भू गेहादिकं तथा

āsanaṁ tu mahaccitraṁ ramyamūrjasvalaṁ mṛdu suvarṇaṁ vā tathā dadyādgo bhū gehādikaṁ tathā

बड़ा, सुंदर, रमणीय, मज़बूत, मुलायम आसन देना चाहिए; या वैसे ही स्वर्ण भी, और गौ, भूमि, घर आदि भी।

श्लोक 36 (padma.5.113.36)

एतत्समस्तं विप्रेंद्रा दक्षिणामूर्तिना पुरा । शंकरेण मुनीनां हि भाषितं च दिवौकसाम्

etatsamastaṁ vipreṁdrā dakṣiṇāmūrtinā purā śaṁkareṇa munīnāṁ hi bhāṣitaṁ ca divaukasām

हे विप्रेंद्रो! यह सब पहले दक्षिणामूर्ति शंकर द्वारा मुनियों और देवताओं को कहा गया था।

श्लोक 37 (padma.5.113.37)

अथ ते मुनयः सर्वे तं प्रणम्यासनस्थितम् । पृथक्पृथक्च तांबूलं दत्वा शुश्रूषवः स्थिताः

atha te munayaḥ sarve taṁ praṇamyāsanasthitam pṛthakpṛthakca tāṁbūlaṁ datvā śuśrūṣavaḥ sthitāḥ

तब वे सब मुनि उन्हें प्रणाम करके, आसन पर बैठे उन्हें अलग-अलग ताम्बूल देकर सुनने के लिए बैठ गए।

श्लोक 38 (padma.5.113.38)

तेनापि कथितं सर्वं पुराणं सर्वसंप्रदम् । उपांताध्यायपर्य्यंतं श्रुतवंतो द्विजोत्तमाः

tenāpi kathitaṁ sarvaṁ purāṇaṁ sarvasaṁpradam upāṁtādhyāyaparyyaṁtaṁ śrutavaṁto dvijottamāḥ

उन्होंने भी वह संपूर्ण, सब समृद्धि देने वाला पुराण सुनाया; उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उसे अंतिम अध्याय तक सुना।

श्लोक 39 (padma.5.113.39)

दिलीप उवाच- कामगेन विमानेन सर्वसंपत्समृद्धिना । सर्वतः सुखयुक्तेन पुण्यस्थानमुपस्थितम्

dilīpa uvāca- kāmagena vimānena sarvasaṁpatsamṛddhinā sarvataḥ sukhayuktena puṇyasthānamupasthitam

दिलीप ने कहा— इच्छानुसार चलने वाले विमान से, सब संपत्ति की समृद्धि से युक्त, सब ओर से सुखमय, पुण्य-स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 40 (padma.5.113.40)

वसिष्ठ उवाच- नालं पृष्टं त्वया राजन्नितोप्यतिशयांतरैः । क्रीडमाना भविष्यंति येन तत्पुण्यमुच्यते

vasiṣṭha uvāca- nālaṁ pṛṣṭaṁ tvayā rājannitopyatiśayāṁtaraiḥ krīḍamānā bhaviṣyaṁti yena tatpuṇyamucyate

वसिष्ठ ने कहा— हे राजन्! तुमने पर्याप्त नहीं पूछा, इससे भी बढ़कर बातें हैं। जिससे वे इस प्रकार क्रीड़ा करते हैं, वह पुण्य अब कहा जाता है।

श्लोक 41 (padma.5.113.41)

सुधाधवलितं कृत्वा शिववेश्मसमं ततः । स्त्रियो रूपविलासाढ्याः सर्वालंकारभूषिताः

sudhādhavalitaṁ kṛtvā śivaveśmasamaṁ tataḥ striyo rūpavilāsāḍhyāḥ sarvālaṁkārabhūṣitāḥ

चूने से सफेद, शिव के भवन जैसा बनाकर — रूप-विलास से समृद्ध, सब आभूषणों से भूषित स्त्रियाँ —

श्लोक 42 (padma.5.113.42)

नानासुगीतकुशला नानानृत्यविशारदाः । चतस्रोऽष्टौ षडथवा मर्द्दलध्वनिकाः स्त्रियः

nānāsugītakuśalā nānānṛtyaviśāradāḥ catasro'ṣṭau ṣaḍathavā marddaladhvanikāḥ striyaḥ

नाना सुंदर गीतों में कुशल, नाना नृत्यों में निपुण; चार, आठ या छह स्त्रियाँ मृदंग बजाने वाली —

श्लोक 43 (padma.5.113.43)

वशिन्यौ द्वे आवजिक्यौ कोणिकाधमने उभे । लासिक्यस्तु चतस्रः स्युः संतुष्टैकाथ गायिका

vaśinyau dve āvajikyau koṇikādhamane ubhe lāsikyastu catasraḥ syuḥ saṁtuṣṭaikātha gāyikā

दो वशिनी-वादिकाएँ, दो आवजिका-वादिकाएँ, कोणिका और बाँसुरी बजाने वाली दोनों; चार नर्तकियाँ हों, एक संतुष्ट गायिका —

श्लोक 44 (padma.5.113.44)

एका द्वे वा सुगीतज्ञेऽमुखरे हि प्रकीर्तिते । कोणवाद्यकृते द्वे तु तूष्णींभूताः षडष्ट वा

ekā dve vā sugītajñe'mukhare hi prakīrtite koṇavādyakṛte dve tu tūṣṇīṁbhūtāḥ ṣaḍaṣṭa vā

एक या दो उत्तम गीत-ज्ञाता, बहुत ऊँचे स्वर वाली नहीं, श्रेष्ठ मानी जाती हैं। कोण-वाद्य बजाने वाली दो, शेष छह या आठ मौन रहती हैं —

श्लोक 45 (padma.5.113.45)

सर्वा रूपविलासिन्यः सर्वाश्चापतितस्तनाः । रतितंत्राधिकुशलास्तत एवाविशंकिताः

sarvā rūpavilāsinyaḥ sarvāścāpatitastanāḥ ratitaṁtrādhikuśalāstata evāviśaṁkitāḥ

सब रूप-विलासयुक्त, सब की स्तन-रचना अटल; कामतंत्र में अत्यंत निपुण, इसलिए बिल्कुल निःशंक।

श्लोक 46 (padma.5.113.46)

सुसूक्ष्मा वस्त्रवेषाश्च विद्युच्चंचलदृष्टयः । एतादृशीभिर्योषाभिर्येन नृत्यं हि कारितम्

susūkṣmā vastraveṣāśca vidyuccaṁcaladṛṣṭayaḥ etādṛśībhiryoṣābhiryena nṛtyaṁ hi kāritam

अत्यंत बारीक वस्त्र-वेष वाली, बिजली-सी चंचल दृष्टि वाली — ऐसी स्त्रियों से जिसने नृत्य करवाया —

श्लोक 47 (padma.5.113.47)

एकस्मिन्दिवसे राजन्वत्सरान्सविमानगः । शतस्त्रीवीक्षितमुखो युवा बहुभिरर्चितः

ekasmindivase rājanvatsarānsavimānagaḥ śatastrīvīkṣitamukho yuvā bahubhirarcitaḥ

हे राजन्! एक ही दिन में वर्षों-जितना आनंद, विमानस्थ, सौ स्त्रियों द्वारा देखा गया मुख वाला, सदा युवा, अनेकों द्वारा पूजित —

श्लोक 48 (padma.5.113.48)

आनंदपोषसंपूर्णः क्रोधेर्ष्यादिविवर्जितः । पंचगंधविलिप्तांगः सचंद्रा हिदलाननः

ānaṁdapoṣasaṁpūrṇaḥ krodherṣyādivivarjitaḥ paṁcagaṁdhaviliptāṁgaḥ sacaṁdrā hidalānanaḥ

आनंद के पोषण से परिपूर्ण, क्रोध-ईर्ष्या आदि से रहित, पंचगंध से लिप्त शरीर वाला, चंद्रमा-सा मुख वाला —

श्लोक 49 (padma.5.113.49)

सूर्योपमस्तु योषाश्च सर्वास्ता दशनान्विताः । सद्योविकसितामोदि पारिजातकृतस्रजः

sūryopamastu yoṣāśca sarvāstā daśanānvitāḥ sadyovikasitāmodi pārijātakṛtasrajaḥ

सूर्य के समान वह, और वे सब स्त्रियाँ चमकीले दाँतों वाली, ताज़े खिले पारिजात-फूलों की मालाओं से सुगंधित —

श्लोक 50 (padma.5.113.50)

सर्वा विकसितारोहि रक्तसंधिकृतस्रजः । धम्मिल्ले वक्षसि तथा बिभ्रत्यः सुस्मिताधराः

sarvā vikasitārohi raktasaṁdhikṛtasrajaḥ dhammille vakṣasi tathā bibhratyaḥ susmitādharāḥ

सब खिली हुई सुंदरता वाली, लाल पुष्पों से जुड़ी मालाएँ धारण किए, जूड़े और वक्षस्थल पर धारण करती हुई, मुस्कुराते अधर वाली —

श्लोक 51 (padma.5.113.51)

चरत्येतादृशीभिस्तु नृत्यगीतानुमोदितः । एवं विमानगो भूत्वा उषित्वा कालमक्षयम्

caratyetādṛśībhistu nṛtyagītānumoditaḥ evaṁ vimānago bhūtvā uṣitvā kālamakṣayam

ऐसी स्त्रियों के साथ विचरता हुआ वह नृत्य-गीत से आनंदित होता है। इस प्रकार विमान पर विचरण करते हुए अक्षय काल तक निवास करके —

श्लोक 52 (padma.5.113.52)

पश्चाज्जायेत नृपतिरेवं कृत्वा पुनस्तथा । राज्यं स्वर्गफलं भुक्त्वा शिवभक्तो भविष्यति

paścājjāyeta nṛpatirevaṁ kṛtvā punastathā rājyaṁ svargaphalaṁ bhuktvā śivabhakto bhaviṣyati

फिर वह राजा के रूप में जन्म लेता है; इस प्रकार फिर से राज्य-रूपी स्वर्ग-फल भोगकर वह शिवभक्त बन जाता है।

श्लोक 53 (padma.5.113.53)

शंभुरुवाच-। दिलीपाय वसिष्ठोक्तं मुनीनामंगिरोब्रवीत् । ते तथा कृतवंतश्च तौर्य्यत्रिकमुमापतेः

śaṁbhuruvāca- dilīpāya vasiṣṭhoktaṁ munīnāmaṁgirobravīt te tathā kṛtavaṁtaśca tauryyatrikamumāpateḥ

शंभु ने कहा— दिलीप को वसिष्ठ द्वारा कहा गया यह वृत्तांत अंगिरा ने मुनियों को सुनाया। उन्होंने वैसा ही करके उमापति के तीनों (गीत-नृत्य-वाद्य) —

श्लोक 54 (padma.5.113.54)

श्रुत्वा पुराणं पाद्मं च समग्रं सुखिनो भवन् । त एते ब्राह्मणा राम विमानवरमास्थिताः

śrutvā purāṇaṁ pādmaṁ ca samagraṁ sukhino bhavan ta ete brāhmaṇā rāma vimānavaramāsthitāḥ

संपूर्ण पद्म पुराण सुनकर वे सुखी हुए। हे राम! ये वही ब्राह्मण अब श्रेष्ठ विमान पर स्थित हैं —

श्लोक 55 (padma.5.113.55)

दृश्यंते खे च सुखिनः सदा मुदितमानसाः । एतत्ते सर्वमाख्यातं पुराणेषु विनिश्चितम्

dṛśyaṁte khe ca sukhinaḥ sadā muditamānasāḥ etatte sarvamākhyātaṁ purāṇeṣu viniścitam

आकाश में सुखी, सदा प्रसन्नचित्त दिखाई देते हैं। यह सब तुम्हें पुराणों में निश्चित रूप से बताया गया है।

श्लोक 56 (padma.5.113.56)

इतः परं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि राघव

itaḥ paraṁ ca kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi rāghava

इससे आगे और क्या सुनना चाहते हो, हे राघव?

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