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पाताल खण्ड · अध्याय 20

गंडकी की महिमा

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (padma.5.20.1)

सुमतिरुवाच। अथ प्रयाते भूपाले सर्वलोकसमन्विते । महाभागैर्वैष्णवैश्च गायकैः कृष्णकीर्तनम्

sumatiruvāca atha prayāte bhūpāle sarvalokasamanvite mahābhāgairvaiṣṇavaiśca gāyakaiḥ kṛṣṇakīrtanam

सुमति ने कहा — तब समस्त प्रजा सहित प्रस्थान करते हुए राजा को महाभाग्यशाली वैष्णवों और गायकों द्वारा किए जाते कृष्ण-कीर्तन —

श्लोक 2 (padma.5.20.2)

शुश्रावासौ महाराजो मार्गे गोविंदकीर्तनम् । जय माधव भक्तानां शरण्य पुरुषोत्तम

śuśrāvāsau mahārājo mārge goviṁdakīrtanam jaya mādhava bhaktānāṁ śaraṇya puruṣottama

उस महाराज ने मार्ग में गोविंद-कीर्तन सुना — 'जय हो माधव! भक्तों के शरणदाता पुरुषोत्तम!'

श्लोक 3 (padma.5.20.3)

मार्गे तीर्थान्यनेकानि कुर्वन्पश्यन्महोदयम् । तापसब्राह्मणात्तेषां महिमानमथा शृणोत्

mārge tīrthānyanekāni kurvanpaśyanmahodayam tāpasabrāhmaṇātteṣāṁ mahimānamathā śṛṇot

मार्ग में अनेक तीर्थों को करते-देखते हुए उन्होंने महान् उदय वाले तापस ब्राह्मण से उनकी महिमा सुनी।

श्लोक 4 (padma.5.20.4)

विचित्रविष्णुवार्ताभिर्विनोदितमना नृपः । मार्गेमार्गे महाविष्णुं गापयामास गायकान्

vicitraviṣṇuvārtābhirvinoditamanā nṛpaḥ mārgemārge mahāviṣṇuṁ gāpayāmāsa gāyakān

विष्णु की विचित्र कथाओं से प्रसन्न मन वाले राजा ने मार्ग-मार्ग में गायकों से महाविष्णु का गान करवाया।

श्लोक 5 (padma.5.20.5)

दीनांधकृपणानां च पंगूनां वासनोचितम् । दानं ददौ महाराजो बुद्धिमान्विजितेंद्रियः

dīnāṁdhakṛpaṇānāṁ ca paṁgūnāṁ vāsanocitam dānaṁ dadau mahārājo buddhimānvijiteṁdriyaḥ

बुद्धिमान्, जितेंद्रिय महाराज ने दीन, अंध, दरिद्र और पंगुजनों को उनकी आवश्यकतानुसार दान दिया।

श्लोक 6 (padma.5.20.6)

अनेकतीर्थविरजमात्मानं भव्यतां गतम् । कुर्वन्ययौ स्वीयलोकैर्हरिध्यानपरायणः

anekatīrthavirajamātmānaṁ bhavyatāṁ gatam kurvanyayau svīyalokairharidhyānaparāyaṇaḥ

अनेक तीर्थों से अपने आपको निर्मल तथा उत्तम बनाते हुए, हरि-ध्यान में तत्पर होकर वे अपने लोगों सहित आगे बढ़े।

श्लोक 7 (padma.5.20.7)

नृपो गच्छन्ददर्शाग्रे नदीं पापप्रणाशिनीम् । चक्रांकितग्रावयुतां मुनिमानस निर्मलाम्

nṛpo gacchandadarśāgre nadīṁ pāpapraṇāśinīm cakrāṁkitagrāvayutāṁ munimānasa nirmalām

जाते हुए राजा ने आगे एक नदी देखी, जो पाप का नाश करने वाली थी, चक्र-चिह्नित पत्थरों से युक्त, मुनियों के मन के समान निर्मल,

श्लोक 8 (padma.5.20.8)

अनेकमुनिवृंदानां बहुश्रेणिविराजिताम् । सारसादिपतत्रीणां कूजितैरुपशोभिताम्

anekamunivṛṁdānāṁ bahuśreṇivirājitām sārasādipatatrīṇāṁ kūjitairupaśobhitām

अनेक मुनि-समूहों की पंक्तियों से सुशोभित, सारस आदि पक्षियों की कूक से सुशोभित।

श्लोक 9 (padma.5.20.9)

दृष्ट्वा पप्रच्छ विप्राग्र्यं तापसं धर्मकोविदम् । अनेकतीर्थमाहात्म्य विशेषज्ञानजृंभितम्

dṛṣṭvā papraccha viprāgryaṁ tāpasaṁ dharmakovidam anekatīrthamāhātmya viśeṣajñānajṛṁbhitam

उसे देखकर उन्होंने अनेक तीर्थों की विशेष महिमा के ज्ञान में निपुण, धर्म में कुशल, श्रेष्ठ तापस ब्राह्मण से पूछा —

श्लोक 10 (padma.5.20.10)

स्वामिन्केयं नदी पुण्या मुनिवृन्दनिषेविता । करोति मम चित्तस्य प्रमोदभरनिर्भरम्

svāminkeyaṁ nadī puṇyā munivṛndaniṣevitā karoti mama cittasya pramodabharanirbharam

'हे स्वामिन्! यह कौन-सी पुण्य नदी है, मुनि-समूहों से सेवित, जो मेरे चित्त को हर्ष से परिपूर्ण कर रही है?'

श्लोक 11 (padma.5.20.11)

इति श्रुत्वा वचस्तस्य राजराजस्य धीमतः । वक्तुं प्रचक्रमे विद्वांस्तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्

iti śrutvā vacastasya rājarājasya dhīmataḥ vaktuṁ pracakrame vidvāṁstīrthamāhātmyamuttamam

बुद्धिमान् राजराज का यह वचन सुनकर उस विद्वान् ने उस श्रेष्ठ तीर्थ की महिमा बताना आरंभ किया।

श्लोक 12 (padma.5.20.12)

ब्राह्मण उवाच। गंडकीयं नदी राजन्सुरासुरनिषेविता । पुण्योदकपरीवाह हतपातकसंचया

brāhmaṇa uvāca gaṁḍakīyaṁ nadī rājansurāsuraniṣevitā puṇyodakaparīvāha hatapātakasaṁcayā

ब्राह्मण ने कहा — 'हे राजन्! यह गंडकी नदी है, देव-दानवों द्वारा सेवित, इसका पुण्य जल संचित पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 13 (padma.5.20.13)

दर्शनान्मानसं पापं स्पर्शनात्कर्मजं दहेत् । वाचिकं स्वीय तोयस्य पानतः पापसंचयम्

darśanānmānasaṁ pāpaṁ sparśanātkarmajaṁ dahet vācikaṁ svīya toyasya pānataḥ pāpasaṁcayam

इसके दर्शन से मानसिक पाप, स्पर्श से कर्मजनित पाप, इसके विषय में कहने से वाचिक पाप, और इसका जल पीने से पापों का संचय जल जाता है।

श्लोक 14 (padma.5.20.14)

पुरा दृष्ट्वा प्रजानाथः प्रजाः सर्वा विपावनीः । स्वगंडविप्रुषोनेक पापघ्नीं सृष्टवानिमाम्

purā dṛṣṭvā prajānāthaḥ prajāḥ sarvā vipāvanīḥ svagaṁḍavipruṣoneka pāpaghnīṁ sṛṣṭavānimām

पूर्वकाल में प्रजापति ने समस्त प्रजा को पवित्र करने के योग्य देखकर अपने गाल की बूँदों से इस अनेक-पाप-नाशक नदी को रचा।

श्लोक 15 (padma.5.20.15)

एनां नदीं ये पुण्योदां स्पृशंति सुतरंगिणीम् । ते गर्भभाजो नैव स्युरपि पापकृतो नराः

enāṁ nadīṁ ye puṇyodāṁ spṛśaṁti sutaraṁgiṇīm te garbhabhājo naiva syurapi pāpakṛto narāḥ

जो लोग इस पुण्य-जल, सुंदर तरंगों वाली नदी को स्पर्श करते हैं, वे पापी मनुष्य होते हुए भी फिर कभी गर्भ में नहीं आते।

श्लोक 16 (padma.5.20.16)

अस्यां भवा ये चाश्मानश्चक्रचिह्नैरलंकृताः । ते साक्षाद्भगवंतो हि स्वस्वरूपधराः पराः

asyāṁ bhavā ye cāśmānaścakracihnairalaṁkṛtāḥ te sākṣādbhagavaṁto hi svasvarūpadharāḥ parāḥ

इसमें उत्पन्न जो पत्थर चक्र-चिह्नों से अलंकृत हैं, वे साक्षात् अपने ही स्वरूप को धारण करने वाले परम भगवान् हैं।

श्लोक 17 (padma.5.20.17)

शिलां संपूजयेद्यस्तु नित्यं चक्रयुतां नरः । न जातु स जनन्या वै जठरं समुपाविशेत्

śilāṁ saṁpūjayedyastu nityaṁ cakrayutāṁ naraḥ na jātu sa jananyā vai jaṭharaṁ samupāviśet

जो मनुष्य नित्य चक्रयुक्त शिला की पूजा करता है, वह कभी माता के गर्भ में प्रवेश नहीं करता।

श्लोक 18 (padma.5.20.18)

पूजयेद्यो नरो धीमाञ्छालग्रामशिलां वराम् । तेनाचारवता भाव्यं दंभलोभवियोगिना

pūjayedyo naro dhīmāñchālagrāmaśilāṁ varām tenācāravatā bhāvyaṁ daṁbhalobhaviyoginā

जो बुद्धिमान् मनुष्य श्रेष्ठ शालग्राम-शिला की पूजा करता है, उसे दंभ और लोभ से रहित, सदाचारी होना चाहिए,

श्लोक 19 (padma.5.20.19)

परदार परद्रव्यविमुखेन नरेण हि । पूजनीयः प्रयत्नेन शालग्रामः सचक्रकः

paradāra paradravyavimukhena nareṇa hi pūjanīyaḥ prayatnena śālagrāmaḥ sacakrakaḥ

पराई स्त्री और पराए धन से विमुख — ऐसा मनुष्य ही यत्नपूर्वक चक्रयुक्त शालग्राम की पूजा करे।

श्लोक 20 (padma.5.20.20)

द्वारवत्यां भवं चक्रं शिला वै गंडकीभवा । पुंसां क्षणाद्धरत्येव पापं जन्मशतार्जितम्

dvāravatyāṁ bhavaṁ cakraṁ śilā vai gaṁḍakībhavā puṁsāṁ kṣaṇāddharatyeva pāpaṁ janmaśatārjitam

द्वारका में उत्पन्न चक्र, तथा गंडकी में उत्पन्न शिला — दोनों मनुष्यों के सौ जन्मों के अर्जित पाप को क्षणभर में हर लेते हैं।

श्लोक 21 (padma.5.20.21)

अपि पापसहस्राणां कर्ता तावन्नरो भवेत् । शालग्रामशिलातोयं पीत्वा पूतो भवेत्क्षणात्

api pāpasahasrāṇāṁ kartā tāvannaro bhavet śālagrāmaśilātoyaṁ pītvā pūto bhavetkṣaṇāt

हजारों पापों का कर्ता मनुष्य भी शालग्राम-शिला का जल पीकर क्षणभर में पवित्र हो जाता है।

श्लोक 22 (padma.5.20.22)

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वेदपथि स्थितः । शालग्रामं पूजयित्वा गृहस्थो मोक्षमाप्नुयात्

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vedapathi sthitaḥ śālagrāmaṁ pūjayitvā gṛhastho mokṣamāpnuyāt

वेद-मार्ग में स्थित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र गृहस्थ शालग्राम की पूजा करके मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (padma.5.20.23)

न जातु चित्स्त्रिया कार्यं शालग्रामस्य पूजनम् । भर्तृहीनाथ सुभगा स्वर्गलोकहितैषिणी

na jātu citstriyā kāryaṁ śālagrāmasya pūjanam bhartṛhīnātha subhagā svargalokahitaiṣiṇī

स्त्री को कभी भी शालग्राम की पूजा नहीं करनी चाहिए — जब तक कि वह पतिरहित, सौभाग्यशालिनी, स्वर्गलोक की हितैषिणी न हो,

श्लोक 24 (padma.5.20.24)

मोहात्स्पृष्ट्वापि महिला जन्मशीलगुणान्विता । हित्वा पुण्यसमूहं सा सत्वरं नरकं व्रजेत्

mohātspṛṣṭvāpi mahilā janmaśīlaguṇānvitā hitvā puṇyasamūhaṁ sā satvaraṁ narakaṁ vrajet

सत्कुल में जन्मी, सुशील, सद्गुणों से युक्त स्त्री भी यदि मोहवश उसे स्पर्श कर बैठे, तो अपने पुण्य-समूह को त्यागकर वह शीघ्र नरक को जाती है।

श्लोक 25 (padma.5.20.25)

स्त्रीपाणिमुक्तपुष्पाणि शालग्रामशिलोपरि । पवेरधिकपातानि वदंति ब्राह्मणोत्तमाः

strīpāṇimuktapuṣpāṇi śālagrāmaśilopari paveradhikapātāni vadaṁti brāhmaṇottamāḥ

स्त्री के हाथ से छोड़े गए पुष्प शालग्राम-शिला पर वज्र से भी अधिक भारी पड़ते हैं, ऐसा श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं।

श्लोक 26 (padma.5.20.26)

चंदनं विषसंकाशं कुसुमं वज्रसंनिभम् । नैवेद्यं कालकूटाभं भवेद्भगवतः कृतम्

caṁdanaṁ viṣasaṁkāśaṁ kusumaṁ vajrasaṁnibham naivedyaṁ kālakūṭābhaṁ bhavedbhagavataḥ kṛtam

चंदन विष के समान, पुष्प वज्र के समान, तथा भगवान् को अर्पित नैवेद्य कालकूट विष के समान हो जाता है।

श्लोक 27 (padma.5.20.27)

तस्मात्सर्वात्मना त्याज्यं स्त्रिया स्पर्शः शिलोपरि । कुर्वती याति नरकं यावदिंद्राश्चतुर्दश

tasmātsarvātmanā tyājyaṁ striyā sparśaḥ śilopari kurvatī yāti narakaṁ yāvadiṁdrāścaturdaśa

इसलिए स्त्री द्वारा शिला का स्पर्श सर्वथा त्याज्य है; ऐसा करने वाली स्त्री चौदह इंद्रों के काल तक नरक को जाती है।

श्लोक 28 (padma.5.20.28)

अपि पापसमाचारो ब्रह्महत्यायुतोऽपि वा । शालग्रामशिलातोयं पीत्वा याति परां गतिम्

api pāpasamācāro brahmahatyāyuto'pi vā śālagrāmaśilātoyaṁ pītvā yāti parāṁ gatim

पापाचारी, यहाँ तक कि ब्रह्महत्या से युक्त मनुष्य भी शालग्राम-शिला का जल पीकर परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 29 (padma.5.20.29)

तुलसीचंदनं वारि शंखो घंटाथ चक्रकम् । शिला ताम्रस्य पात्रं तु विष्णोर्नामपदामृतम्

tulasīcaṁdanaṁ vāri śaṁkho ghaṁṭātha cakrakam śilā tāmrasya pātraṁ tu viṣṇornāmapadāmṛtam

तुलसी, चंदन, जल, शंख, घंटा तथा चक्र, शिला, ताम्र का पात्र — ये सब विष्णु के नाम और चरण-अमृत हैं।

श्लोक 30 (padma.5.20.30)

पदामृतं तु नवभिः पापराशिप्रदाहकम् । वदंति मुनयः शांताः सर्वशास्त्रार्थकोविदाः

padāmṛtaṁ tu navabhiḥ pāparāśipradāhakam vadaṁti munayaḥ śāṁtāḥ sarvaśāstrārthakovidāḥ

शांत, समस्त शास्त्रों के अर्थ में निपुण मुनि कहते हैं कि चरणामृत नौ गुना अधिक पापराशि को भस्म करने वाला है।

श्लोक 31 (padma.5.20.31)

सर्वतीर्थपरिस्नानात्सर्वक्रतुसमर्चनात् । पुण्यं भवति यद्राजन्बिंदौ बिंदौ तदद्भुतम्

sarvatīrthaparisnānātsarvakratusamarcanāt puṇyaṁ bhavati yadrājanbiṁdau biṁdau tadadbhutam

हे राजन्! समस्त तीर्थों में स्नान तथा समस्त यज्ञों की पूजा से जो पुण्य होता है, वह अद्भुत रूप से यहाँ बूँद-बूँद में विद्यमान है।

श्लोक 32 (padma.5.20.32)

शालग्रामशिला यत्र पूज्यते पुरुषोत्तमैः । तत्र योजनमात्रं तु तीर्थकोटिसमन्वितम्

śālagrāmaśilā yatra pūjyate puruṣottamaiḥ tatra yojanamātraṁ tu tīrthakoṭisamanvitam

जहाँ श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा शालग्राम-शिला पूजी जाती है, वहाँ एक योजन भर में करोड़ों तीर्थ उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 33 (padma.5.20.33)

शालग्रामाः समाः पूज्याः समेषु द्वितयं नहि । विषमा एव संपूज्या विषमेषु त्रयं नहि

śālagrāmāḥ samāḥ pūjyāḥ sameṣu dvitayaṁ nahi viṣamā eva saṁpūjyā viṣameṣu trayaṁ nahi

सम संख्या वाले शालग्राम पूज्य हैं, परंतु सम में दो कभी नहीं; विषम ही पूज्य हैं, विषम में तीन कभी नहीं।

श्लोक 34 (padma.5.20.34)

द्वारावती भवं चक्रं तथा वै गंडकीभवम् । उभयोः संगमो यत्र तत्र गंगा समुद्रगा

dvārāvatī bhavaṁ cakraṁ tathā vai gaṁḍakībhavam ubhayoḥ saṁgamo yatra tatra gaṁgā samudragā

द्वारावती में उत्पन्न चक्र, तथा गंडकी में उत्पन्न — जहाँ दोनों का संगम हो, वहाँ स्वयं समुद्रगामिनी गंगा ही विद्यमान है।

श्लोक 35 (padma.5.20.35)

रूक्षाः कुर्वंति पुरुषा नायुः श्रीबलवर्जितान् । तस्मात्स्निग्धा मनोहारि रूपिण्यो ददति श्रियम्

rūkṣāḥ kurvaṁti puruṣā nāyuḥ śrībalavarjitān tasmātsnigdhā manohāri rūpiṇyo dadati śriyam

खुरदुरी वस्तुएँ मनुष्यों को आयु, श्री और बल से रहित कर देती हैं; इसलिए स्निग्ध, मनोहर रूप वाली वस्तुएँ ही श्री प्रदान करती हैं।

श्लोक 36 (padma.5.20.36)

आयुष्कामो नरो यस्तु धनकामो हि यः पुमान् । पूजयन्सर्वमाप्नोति पारलौकिकमैहिकम्

āyuṣkāmo naro yastu dhanakāmo hi yaḥ pumān pūjayansarvamāpnoti pāralaukikamaihikam

जो मनुष्य आयु चाहता है, या जो धन चाहता है, वह पूजा करके इस लोक और परलोक — सब कुछ प्राप्त करता है।

श्लोक 37 (padma.5.20.37)

प्राणांतकाले पुंसस्तु भवेद्भाग्यवतो नृप । वाचि नाम हरेः पुण्यं शिला हृदि तदंतिके

prāṇāṁtakāle puṁsastu bhavedbhāgyavato nṛpa vāci nāma hareḥ puṇyaṁ śilā hṛdi tadaṁtike

हे राजन्! प्राणांतकाल में भाग्यशाली मनुष्य के वचन में हरि का पुण्य नाम, तथा हृदय के निकट वह शिला होती है —

श्लोक 38 (padma.5.20.38)

गच्छत्सु प्राणमार्गेषु यस्य विश्रंभतोऽपि चेत् । शालग्रामशिला स्फूर्तिस्तस्य मुक्तिर्न संशयः

gacchatsu prāṇamārgeṣu yasya viśraṁbhato'pi cet śālagrāmaśilā sphūrtistasya muktirna saṁśayaḥ

प्राण-मार्गों के जाते समय जिसे केवल विश्वासमात्र से भी शालग्राम-शिला का स्फुरण हो जाए, उसकी मुक्ति में संदेह नहीं।

श्लोक 39 (padma.5.20.39)

पुरा भगवता प्रोक्तमंबरीषाय धीमते । ब्राह्मणा न्यासिनः स्निग्धाः शालग्रामशिलास्तथा

purā bhagavatā proktamaṁbarīṣāya dhīmate brāhmaṇā nyāsinaḥ snigdhāḥ śālagrāmaśilāstathā

पूर्वकाल में भगवान् ने स्वयं बुद्धिमान् अंबरीष से कहा था — त्यागी ब्राह्मण, तथा स्निग्ध शालग्राम-शिलाएँ —

श्लोक 40 (padma.5.20.40)

स्वरूपत्रितयं मह्यमेतद्धि क्षितिमंडले । पापिनां पापनिर्हारं कर्तुं धृतमुदं च ता

svarūpatritayaṁ mahyametaddhi kṣitimaṁḍale pāpināṁ pāpanirhāraṁ kartuṁ dhṛtamudaṁ ca tā

ये मेरे तीन स्वरूप इस पृथ्वीमंडल पर विद्यमान हैं, पापियों के पाप को दूर करने में हर्षपूर्वक तत्पर।

श्लोक 41 (padma.5.20.41)

निंदंति पापिनो ये वा शालग्रामशिलां सकृत् । कुंभीपाके पचंत्याशु यावदाभूतसंप्लवम्

niṁdaṁti pāpino ye vā śālagrāmaśilāṁ sakṛt kuṁbhīpāke pacaṁtyāśu yāvadābhūtasaṁplavam

जो पापी एक बार भी शालग्राम-शिला की निंदा करते हैं, वे प्रलयकाल तक शीघ्र ही कुंभीपाक नरक में पकाए जाते हैं।

श्लोक 42 (padma.5.20.42)

पूजां समुद्यतं कर्तुं यो वारयति मूढधीः । तस्य मातापिताबंधुवर्गा नरकभागिनः

pūjāṁ samudyataṁ kartuṁ yo vārayati mūḍhadhīḥ tasya mātāpitābaṁdhuvargā narakabhāginaḥ

जो मूढ़बुद्धि पूजा करने के लिए तत्पर व्यक्ति को रोकता है, उसके माता-पिता तथा बंधुवर्ग भी नरक के भागी होते हैं।

श्लोक 43 (padma.5.20.43)

यो वा कथयति प्रेष्ठं शालग्रामार्चनं कुरु । सकृतार्थो नयत्याशु वैकुंठं स्वस्य पूर्वजान्

yo vā kathayati preṣṭhaṁ śālagrāmārcanaṁ kuru sakṛtārtho nayatyāśu vaikuṁṭhaṁ svasya pūrvajān

जो स्नेहवश किसी से कहता है 'शालग्राम की पूजा करो', वह तुरंत अपने पूर्वजों को भी वैकुंठ ले जाता है, कृतार्थ होकर।

श्लोक 44 (padma.5.20.44)

अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । मुनयो वीतरागाश्च कामक्रोधविवर्जिताः

atraivodāharaṁtīmamitihāsaṁ purātanam munayo vītarāgāśca kāmakrodhavivarjitāḥ

यहाँ भी वीतराग, काम-क्रोध से रहित मुनिजन यह पुरातन इतिहास कहते हैं —

श्लोक 45 (padma.5.20.45)

पुरा कीकटसंज्ञे वै देशे धर्मविवर्जिते । आसीत्पुल्कसजातीयो नरः शबरसंज्ञितः

purā kīkaṭasaṁjñe vai deśe dharmavivarjite āsītpulkasajātīyo naraḥ śabarasaṁjñitaḥ

पूर्वकाल में धर्महीन कीकट नामक देश में शबर नामधारी पुल्कस-जातीय एक मनुष्य था,

श्लोक 46 (padma.5.20.46)

नित्यं जंतुवधोद्युक्तः शरासनधरो मुहुः । तीर्थं प्रति यियासूनां बलाद्धरति जीवितम्

nityaṁ jaṁtuvadhodyuktaḥ śarāsanadharo muhuḥ tīrthaṁ prati yiyāsūnāṁ balāddharati jīvitam

जो नित्य प्राणि-वध में तत्पर रहता था, धनुष धारण किए, तीर्थयात्रा पर जाने वालों के प्राण बलपूर्वक हर लेता था।

श्लोक 47 (padma.5.20.47)

अनेकप्राणिहत्याकृत्परस्वे निरतः सदा । सदा रागादिसंयुक्तः कामक्रोधादिसंयुतः

anekaprāṇihatyākṛtparasve nirataḥ sadā sadā rāgādisaṁyuktaḥ kāmakrodhādisaṁyutaḥ

अनेक प्राणियों का घातक, सदा पराए धन में लीन, सदा राग आदि से युक्त, काम-क्रोध आदि से युक्त,

श्लोक 48 (padma.5.20.48)

विचरत्यनिशं भीमे वने प्राणिवधंकरः । विषसंसक्तबाणाग्र रूढचापगुणोद्धुरः

vicaratyaniśaṁ bhīme vane prāṇivadhaṁkaraḥ viṣasaṁsaktabāṇāgra rūḍhacāpaguṇoddhuraḥ

वह भयंकर वन में निरंतर प्राणि-वध करते हुए विचरण करता, विष-सने बाणों के अग्रभाग से युक्त, धनुष की डोरी चढ़ाए।

श्लोक 49 (padma.5.20.49)

सैकदा पर्यटन्व्याधः प्राणिमात्रभयंकरः । कालं प्राप्तं न जानाति समीपेऽप्युग्रमानसः

saikadā paryaṭanvyādhaḥ prāṇimātrabhayaṁkaraḥ kālaṁ prāptaṁ na jānāti samīpe'pyugramānasaḥ

एक बार समस्त प्राणियों को भयभीत करने वाला वह व्याध विचरण करते हुए, अपने निकट आए काल को भी नहीं जानता था, उग्र मन वाला।

श्लोक 50 (padma.5.20.50)

यमदूतास्तु संप्राप्ताः पाशमुद्गरपाणयः । ताम्रकेशा दीर्घनखा लंबदंष्ट्रा भयानकाः

yamadūtāstu saṁprāptāḥ pāśamudgarapāṇayaḥ tāmrakeśā dīrghanakhā laṁbadaṁṣṭrā bhayānakāḥ

तब हाथों में पाश-मुद्गर लिए, ताम्र-केश, लंबे नखों वाले, लटकते दाँतों वाले, भयानक यमदूत आ पहुँचे,

श्लोक 51 (padma.5.20.51)

श्यामा लोहस्यनिगडान्बिभ्रतो मोहकारकाः । बध्नंतु पापिनं ह्येनं प्राणिमात्रभयंकरम्

śyāmā lohasyanigaḍānbibhrato mohakārakāḥ badhnaṁtu pāpinaṁ hyenaṁ prāṇimātrabhayaṁkaram

श्याम वर्ण के, लोहे की बेड़ियाँ धारण किए, मोह उत्पन्न करने वाले — 'इस समस्त प्राणियों को भयभीत करने वाले पापी को बाँधो!'

श्लोक 52 (padma.5.20.52)

कदाचिन्मनसा नायं प्राणिमात्रोपकारकः । परदार परद्रव्य परद्रोहपरायणः

kadācinmanasā nāyaṁ prāṇimātropakārakaḥ paradāra paradravya paradrohaparāyaṇaḥ

'यह कभी मन से भी किसी प्राणी का उपकार करने वाला नहीं रहा; पराई स्त्री, पराए धन तथा पर-द्रोह में लीन —

श्लोक 53 (padma.5.20.53)

एतस्य जिह्वां महतीमहं निष्कासयाम्यतः । एको वदति चैतस्य चक्षुरुत्पाटयाम्यहम्

etasya jihvāṁ mahatīmahaṁ niṣkāsayāmyataḥ eko vadati caitasya cakṣurutpāṭayāmyaham

इसकी विशाल जिह्वा मैं खींच निकालता हूँ' — एक ने कहा — 'इसकी आँख मैं फोड़ देता हूँ,'

श्लोक 54 (padma.5.20.54)

एको वदति चैतस्य करौ कृंतामि पापिनः । अन्यो वदत्यहं कर्णौ कर्तयामि दुरात्मनः

eko vadati caitasya karau kṛṁtāmi pāpinaḥ anyo vadatyahaṁ karṇau kartayāmi durātmanaḥ

'इस पापी के हाथ मैं काटता हूँ' एक ने कहा; दूसरे ने कहा 'मैं इस दुरात्मा के कान काटता हूँ।'

श्लोक 55 (padma.5.20.55)

एवं वदंतः सुभृशं दन्तैर्दन्तनिपीडकाः । आगत्य तं दुरात्मानं सायुधास्तस्थुरुन्मदाः

evaṁ vadaṁtaḥ subhṛśaṁ dantairdantanipīḍakāḥ āgatya taṁ durātmānaṁ sāyudhāstasthurunmadāḥ

इस प्रकार दाँतों को कटकटाते हुए कहते हुए, हथियार लिए, उन्मत्त वे उस दुरात्मा के पास आकर खड़े हो गए।

श्लोक 56 (padma.5.20.56)

एको दूतस्तदा सर्परूपं धृत्वादशत्पदे । स दष्टमात्रः सहसा गतासुः पर्यजायत

eko dūtastadā sarparūpaṁ dhṛtvādaśatpade sa daṣṭamātraḥ sahasā gatāsuḥ paryajāyata

एक दूत ने तब सर्प का रूप धारण करके उसके पैर में डस लिया; डसते ही वह तुरंत प्राणहीन हो गया।

श्लोक 57 (padma.5.20.57)

तदा तं लोहपाशेन बद्ध्वा ते यमकिंकराः । कशाभिस्ताडयामासुर्मुद्गरैः प्राहरन्क्रुधा

tadā taṁ lohapāśena baddhvā te yamakiṁkarāḥ kaśābhistāḍayāmāsurmudgaraiḥ prāharankrudhā

तब उन यमकिंकरों ने उसे लोह-पाश से बाँधकर कोड़ों से पीटा, तथा क्रोध से मुद्गरों से प्रहार किया —

श्लोक 58 (padma.5.20.58)

अहो दुष्ट दुरात्मंस्त्वं कदाचिन्नाचरः शुभम् । मनसापि यतस्त्वां वै क्षेप्स्यामो रौरवेषु च

aho duṣṭa durātmaṁstvaṁ kadācinnācaraḥ śubham manasāpi yatastvāṁ vai kṣepsyāmo rauraveṣu ca

'अहो दुष्ट, दुरात्मा! तूने कभी शुभ आचरण नहीं किया, इसलिए मन से भी हम तुझे रौरव नरक में झोंकेंगे।

श्लोक 59 (padma.5.20.59)

त्वङ्मांसं वायसा रौद्रा भक्षयिष्यंति वै क्रुधा । आजन्मतस्तु भवता न कृतं हरिसेवनम्

tvaṅmāṁsaṁ vāyasā raudrā bhakṣayiṣyaṁti vai krudhā ājanmatastu bhavatā na kṛtaṁ harisevanam

क्रूर कौवे क्रोध से तेरा चमड़ा-मांस खाएँगे; जन्म से लेकर तूने कभी हरि की सेवा नहीं की।

श्लोक 60 (padma.5.20.60)

त्वया कलत्रपुत्राद्या द्रोहं कृत्वा सुपोषिताः । न कदाचित्स्मृतो देवः पापहारी जनार्दनः

tvayā kalatraputrādyā drohaṁ kṛtvā supoṣitāḥ na kadācitsmṛto devaḥ pāpahārī janārdanaḥ

तूने पत्नी-पुत्र आदि को द्रोह करके भी खूब पाला, किंतु पाप-हारी देव जनार्दन का कभी स्मरण नहीं किया।

श्लोक 61 (padma.5.20.61)

तस्मात्त्वां लोहशंकौ वा कुंभीपाके च रौरवे । धर्मराजाज्ञया सर्वे नेष्यामो बहुताडनैः

tasmāttvāṁ lohaśaṁkau vā kuṁbhīpāke ca raurave dharmarājājñayā sarve neṣyāmo bahutāḍanaiḥ

इसलिए धर्मराज की आज्ञा से हम सब तुझे बहुत ताड़ना देते हुए लोह-शंकु में, कुंभीपाक में, अथवा रौरव में ले जाएँगे।'

श्लोक 62 (padma.5.20.62)

एवमुक्त्वा यदानेतुं समैच्छन्यमकिंकराः । तावत्प्राप्तो महाविष्णुचरणाब्जपरायणः

evamuktvā yadānetuṁ samaicchanyamakiṁkarāḥ tāvatprāpto mahāviṣṇucaraṇābjaparāyaṇaḥ

ऐसा कहकर जब यमकिंकर उसे ले जाना चाहते थे, तभी महाविष्णु के चरणकमलों में परायण एक मुनि वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 63 (padma.5.20.63)

यमदूतास्तदा दृष्टा वैष्णवेन महात्मना । पाशमुद्गरदंडादिदुष्टायुधधरा गणाः

yamadūtāstadā dṛṣṭā vaiṣṇavena mahātmanā pāśamudgaradaṁḍādiduṣṭāyudhadharā gaṇāḥ

उस महात्मा वैष्णव ने तब यमदूतों को देखा — पाश, मुद्गर, दंड आदि दुष्ट अस्त्र धारण करने वाले गणों को —

श्लोक 64 (padma.5.20.64)

पुल्कसं लोहनिगडैर्बद्ध्वा यातुं समुद्यताः । बन्ध बन्ध ग्रसच्छिन्धि भिन्धि भिन्धीति वादिनः

pulkasaṁ lohanigaḍairbaddhvā yātuṁ samudyatāḥ bandha bandha grasacchindhi bhindhi bhindhīti vādinaḥ

पुल्कस को लोह-बेड़ियों से बाँधकर ले जाने को उद्यत, 'बाँधो, बाँधो, ग्रसो, काटो, भेदो, भेदो' कहते हुए।

श्लोक 65 (padma.5.20.65)

तदा कृपालुस्तं प्रेक्ष्य पद्मनाभपरायणः । अत्यंतकृपयायुक्तं चेतस्तत्र तदाकरोत्

tadā kṛpālustaṁ prekṣya padmanābhaparāyaṇaḥ atyaṁtakṛpayāyuktaṁ cetastatra tadākarot

तब पद्मनाभ-परायण उस दयालु ने उसे देखकर वहाँ अपने चित्त को अत्यंत करुणा से युक्त कर लिया —

श्लोक 66 (padma.5.20.66)

असौ महादुष्ट पीडां मा यातु मम सन्निधौ । मोचयाम्यहमद्यैव यमदूतेभ्य एव च

asau mahāduṣṭa pīḍāṁ mā yātu mama sannidhau mocayāmyahamadyaiva yamadūtebhya eva ca

'यह महादुष्ट मेरे सामने पीड़ा न भोगे। मैं इसे अभी, इसी क्षण, यमदूतों से भी मुक्त करता हूँ।'

श्लोक 67 (padma.5.20.67)

इति कृत्वा मतिं तस्मिन्कृपायुक्तो मुनीश्वरः । शालग्रामशिलां हस्ते गृहीत्वास्य गतोंऽतिके

iti kṛtvā matiṁ tasminkṛpāyukto munīśvaraḥ śālagrāmaśilāṁ haste gṛhītvāsya gatoṁ'tike

ऐसा निश्चय करके, करुणा से युक्त उस मुनीश्वर ने हाथ में शालग्राम-शिला लेकर उसके निकट जाकर —

श्लोक 68 (padma.5.20.68)

तस्य पादोदकं पुण्यं तुलसीदलमिश्रितम् । मुखे विनिक्षिपन्कर्णे रामनाम जजाप ह

tasya pādodakaṁ puṇyaṁ tulasīdalamiśritam mukhe vinikṣipankarṇe rāmanāma jajāpa ha

तुलसी-दल मिश्रित अपने पवित्र चरणामृत को उसके मुख में डालकर, उसके कान में राम-नाम का जप किया।

श्लोक 69 (padma.5.20.69)

तुलसीं मस्तके तस्य धारयामास वैष्णवः । शिलां हृदि महाविष्णोर्धृत्वा प्राह स वैष्णवः

tulasīṁ mastake tasya dhārayāmāsa vaiṣṇavaḥ śilāṁ hṛdi mahāviṣṇordhṛtvā prāha sa vaiṣṇavaḥ

उस वैष्णव ने तुलसी को उसके मस्तक पर धारण करा दी; महाविष्णु की शिला को उसके हृदय पर रखकर उस वैष्णव ने कहा —

श्लोक 70 (padma.5.20.70)

गच्छंतु यमदूता वै यातनासु परायणाः । शालग्रामशिलास्पर्शो दहतात्पातकं महत्

gacchaṁtu yamadūtā vai yātanāsu parāyaṇāḥ śālagrāmaśilāsparśo dahatātpātakaṁ mahat

'यातना देने में तत्पर यमदूत जाएँ; शालग्राम-शिला का स्पर्श इस महान् पाप को भस्म कर दे!'

श्लोक 71 (padma.5.20.71)

इत्युक्तवति तस्मिन्वै गणा विष्णोर्महाद्भुताः । आययुस्तस्य सविधे शिलास्पर्शाद्गतांहसः

ityuktavati tasminvai gaṇā viṣṇormahādbhutāḥ āyayustasya savidhe śilāsparśādgatāṁhasaḥ

उनके ऐसा कहते ही विष्णु के अत्यंत अद्भुत गण, शिला के स्पर्श से पाप-रहित हुए उसके पास आ पहुँचे।

श्लोक 72 (padma.5.20.72)

पीतवस्त्राः शंखचक्रगदापद्मविराजिताः । आगत्य मोचयामासुर्लोहपाशाद्दुरासदात्

pītavastrāḥ śaṁkhacakragadāpadmavirājitāḥ āgatya mocayāmāsurlohapāśāddurāsadāt

पीले वस्त्र धारण किए, शंख-चक्र-गदा-पद्म से सुशोभित वे आकर उसे उस दुर्गम लोह-पाश से मुक्त कर दिया।

श्लोक 73 (padma.5.20.73)

मोचयित्वा महापापकारकं पुल्कसं नरम् । ऊचुः किमर्थं बद्धोऽयं वैष्णवः पूज्यदेहभृत्

mocayitvā mahāpāpakārakaṁ pulkasaṁ naram ūcuḥ kimarthaṁ baddho'yaṁ vaiṣṇavaḥ pūjyadehabhṛt

महापापी पुल्कस मनुष्य को मुक्त करके उन्होंने कहा — 'यह पूज्य शरीरधारी वैष्णव क्यों बाँधा गया है?

श्लोक 74 (padma.5.20.74)

कस्याज्ञाकारका यूयं यदधर्मप्रकारकाः । मुंचंतु वैष्णवं त्वेनं किमर्थं विधृतो ह्ययम्

kasyājñākārakā yūyaṁ yadadharmaprakārakāḥ muṁcaṁtu vaiṣṇavaṁ tvenaṁ kimarthaṁ vidhṛto hyayam

तुम किसकी आज्ञा पालन करने वाले हो, जो इस प्रकार अधर्म कर रहे हो? इस वैष्णव को छोड़ो — इसे क्यों पकड़ा गया है?'

श्लोक 75 (padma.5.20.75)

इति वाक्यं समाकर्ण्य जगदुर्यमकिंकराः । धर्मराजाज्ञया प्राप्ता नेतुं पापिनमुद्यताः

iti vākyaṁ samākarṇya jagaduryamakiṁkarāḥ dharmarājājñayā prāptā netuṁ pāpinamudyatāḥ

यह वचन सुनकर यमकिंकरों ने कहा — 'हम धर्मराज की आज्ञा से इस पापी को ले जाने के लिए तत्पर होकर आए हैं।

श्लोक 76 (padma.5.20.76)

नासौ कदाचिन्मनसा प्राणिमात्रोपकारकः । प्राणिहत्या महापापकारी दुष्टशरीरभृत्

nāsau kadācinmanasā prāṇimātropakārakaḥ prāṇihatyā mahāpāpakārī duṣṭaśarīrabhṛt

यह कभी भी मन से भी किसी प्राणी का उपकारक नहीं रहा; प्राणि-हत्या के महापाप का कर्ता, दुष्ट शरीरधारी।

श्लोक 77 (padma.5.20.77)

नॄन्बहूंस्तीर्थयात्रायां गच्छतोऽसौ व्यलुंठयत् । परदाररतो नित्यं सर्वपापाधिकारकः

nṝnbahūṁstīrthayātrāyāṁ gacchato'sau vyaluṁṭhayat paradārarato nityaṁ sarvapāpādhikārakaḥ

तीर्थयात्रा में जाने वाले अनेक मनुष्यों को इसने लूटा; सदा पराई स्त्री में रत, समस्त पापों का अधिकारी।

श्लोक 78 (padma.5.20.78)

तस्मान्नेतुं वयं प्राप्ताः पापिनं पुल्कसं नरम् । भवद्भिर्मोचितः कस्मादकस्मादागतैर्भटैः

tasmānnetuṁ vayaṁ prāptāḥ pāpinaṁ pulkasaṁ naram bhavadbhirmocitaḥ kasmādakasmādāgatairbhaṭaiḥ

इसलिए हम इस पापी पुल्कस को ले जाने आए थे — अचानक आए तुम योद्धाओं ने इसे किसलिए छुड़ा दिया?'

श्लोक 79 (padma.5.20.79)

विष्णुदूता ऊचुः। ब्रह्महत्यादिकं पापं प्राणिकोटिवधोद्भवम् । शालग्रामशिलास्पर्शः सर्वं दहति तत्क्षणात्

viṣṇudūtā ūcuḥ brahmahatyādikaṁ pāpaṁ prāṇikoṭivadhodbhavam śālagrāmaśilāsparśaḥ sarvaṁ dahati tatkṣaṇāt

विष्णु के दूतों ने कहा — 'करोड़ों प्राणियों के वध से उत्पन्न ब्रह्महत्या आदि पाप को शालग्राम-शिला का स्पर्श उसी क्षण भस्म कर देता है।

श्लोक 80 (padma.5.20.80)

रामेति नाम यच्छ्रोत्रे विश्रंभादागतं यदि । करोति पापसंदाहं तूलं वह्निकणो यथा

rāmeti nāma yacchrotre viśraṁbhādāgataṁ yadi karoti pāpasaṁdāhaṁ tūlaṁ vahnikaṇo yathā

यदि 'राम' नाम केवल संयोग से भी कान में पड़ जाए, तो वह पाप को उसी प्रकार भस्म कर देता है जैसे अग्नि की चिंगारी रुई को।

श्लोक 81 (padma.5.20.81)

तुलसी मस्तके यस्य शिला हृदि मनोहरा । मुखे कर्णेऽथवा राम नाम मुक्तस्तदैव सः

tulasī mastake yasya śilā hṛdi manoharā mukhe karṇe'thavā rāma nāma muktastadaiva saḥ

जिसके मस्तक पर तुलसी, हृदय पर मनोहर शिला, तथा मुख या कान में राम-नाम हो, वह उसी क्षण मुक्त हो जाता है।

श्लोक 82 (padma.5.20.82)

तस्मादनेन तुलसी मस्तके विधृता पुरा । श्रावितं रामनामाशु शिला हृदि सुधारिता

tasmādanena tulasī mastake vidhṛtā purā śrāvitaṁ rāmanāmāśu śilā hṛdi sudhāritā

इसलिए इसके द्वारा मस्तक पर तुलसी पहले धारण की गई, राम-नाम शीघ्र सुनाया गया, तथा शिला हृदय पर भलीभाँति धारण कराई गई —

श्लोक 83 (padma.5.20.83)

तस्मात्पापसमूहोऽस्य दग्धः पुण्यकलेवरः । यास्यते परमं स्थानं पापिनां यत्सुदुर्ल्लभम्

tasmātpāpasamūho'sya dagdhaḥ puṇyakalevaraḥ yāsyate paramaṁ sthānaṁ pāpināṁ yatsudurllabham

इसलिए इसका पापसमूह भस्म हो गया है, इसका शरीर पुण्यमय हो गया है; यह उस परमधाम को जाएगा, जो पापियों को अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 84 (padma.5.20.84)

वर्षायुतं तत्र भुक्त्वा भोगान्सर्वमनोहरान् । भारते जन्म संप्राप्य समाराध्य जगद्गुरुम्

varṣāyutaṁ tatra bhuktvā bhogānsarvamanoharān bhārate janma saṁprāpya samārādhya jagadgurum

वहाँ दस हजार वर्षों तक समस्त मनोहर भोगों को भोगकर, भारत में जन्म प्राप्त करके, जगद्गुरु की आराधना करके —

श्लोक 85 (padma.5.20.85)

प्राप्स्यते परमं स्थानं सुरासुरसुदुर्ल्लभम् । न ज्ञातो महिमा सम्यक्छिलायाः परमेष्ठिनः

prāpsyate paramaṁ sthānaṁ surāsurasudurllabham na jñāto mahimā samyakchilāyāḥ parameṣṭhinaḥ

यह देव-दानवों को भी अत्यंत दुर्लभ उस परमधाम को प्राप्त करेगा। परमेष्ठी की इस शिला की महिमा पूर्णतः जानी नहीं जा सकी है —

श्लोक 86 (padma.5.20.86)

दृष्टा स्पृष्टार्चिता वापि सर्वपापहरा क्षणात् । इत्युक्त्वा विरताः सर्वे महाविष्णोर्गणा मुदा

dṛṣṭā spṛṣṭārcitā vāpi sarvapāpaharā kṣaṇāt ityuktvā viratāḥ sarve mahāviṣṇorgaṇā mudā

देखी, स्पर्श की या पूजी गई — वह क्षणभर में समस्त पाप हर लेती है।' यह कहकर महाविष्णु के सभी गण हर्षपूर्वक विदा हो गए।

श्लोक 87 (padma.5.20.87)

याम्यास्ते किंकरा राज्ञे कथयामासुरद्भुतम् । वैष्णवो हर्षमापेदे रघुनाथपरायणः

yāmyāste kiṁkarā rājñe kathayāmāsuradbhutam vaiṣṇavo harṣamāpede raghunāthaparāyaṇaḥ

यमदूतों ने राजा (यम) को यह अद्भुत बात कही; रघुनाथ-परायण वह वैष्णव हर्ष को प्राप्त हुआ।

श्लोक 88 (padma.5.20.88)

मुक्तोऽसौ यमपाशाच्च गमिष्यति परं पदम् । तदाजगाम विमलं किंकिणीजालमंडितम्

mukto'sau yamapāśācca gamiṣyati paraṁ padam tadājagāma vimalaṁ kiṁkiṇījālamaṁḍitam

'यह यमपाश से मुक्त होकर परमपद को जाएगा।' तभी घंटियों के जाल से सुशोभित एक निर्मल विमान आ पहुँचा,

श्लोक 89 (padma.5.20.89)

विमानं देवलोकात्तु मनोहारि महाद्भुतम् । तत्रारुह्य गतः स्वर्गं महापुण्यैर्निषेवितम्

vimānaṁ devalokāttu manohāri mahādbhutam tatrāruhya gataḥ svargaṁ mahāpuṇyairniṣevitam

देवलोक से आया मनोहर, अत्यंत अद्भुत विमान; उस पर आरूढ़ होकर वह महापुण्यों से सेवित स्वर्ग को गया।

श्लोक 90 (padma.5.20.90)

भोगान्भुक्त्वा स विपुलानाजगाम महीतलम् । काश्यां जन्म समासाद्य शुचिवाडवसत्कुले

bhogānbhuktvā sa vipulānājagāma mahītalam kāśyāṁ janma samāsādya śucivāḍavasatkule

वहाँ प्रचुर भोगों को भोगकर वह पुनः पृथ्वीतल पर आया, काशी में पवित्र ब्राह्मण-कुल में जन्म प्राप्त करके —

श्लोक 91 (padma.5.20.91)

आराध्य जगतामीशं गतवान्परमं पदम् । स पापी साधुसंगत्या शालग्रामशिलां स्पृशन्

ārādhya jagatāmīśaṁ gatavānparamaṁ padam sa pāpī sādhusaṁgatyā śālagrāmaśilāṁ spṛśan

जगत् के स्वामी की आराधना करके वह परमधाम को गया। वह पापी साधु-संगति से शालग्राम-शिला का स्पर्श करते हुए —

श्लोक 92 (padma.5.20.92)

महापीडाविनिर्मुक्तो गतवान्परमं पदम् । मया तेऽभिहितं राजन्गंडकीचरितं महत्

mahāpīḍāvinirmukto gatavānparamaṁ padam mayā te'bhihitaṁ rājangaṁḍakīcaritaṁ mahat

महापीड़ा से मुक्त होकर परमधाम को चला गया। हे राजन्! मैंने तुम्हें गंडकी का यह महान् चरित्र सुनाया है।

श्लोक 93 (padma.5.20.93)

श्रुत्वा विमुच्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विंदति

śrutvā vimucyate pāpairbhuktiṁ muktiṁ ca viṁdati

इसे सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त होकर भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है।"

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21