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पाताल खण्ड · अध्याय 22

नीलगिरि की महिमा

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (padma.5.22.1)

सुमतिरुवाच। अथ सर्वं दिनं नीत्वा हरिस्मरणकीर्तनैः । रात्रौ सुष्वाप गंगाया रोधस्युरुफलप्रदे

sumatiruvāca atha sarvaṁ dinaṁ nītvā harismaraṇakīrtanaiḥ rātrau suṣvāpa gaṁgāyā rodhasyuruphalaprade

सुमति ने कहा — तब सम्पूर्ण दिन हरि के स्मरण-कीर्तन में बिताकर, महान् फल देने वाले गंगा के तट पर उन्होंने रात्रि में शयन किया।

श्लोक 2 (padma.5.22.2)

ददर्श स्वप्नमध्ये तु स स्वात्मानं चतुर्भुजम् । शंखचक्रगदापद्मशार्ङ्गकोदंडधारिणम्

dadarśa svapnamadhye tu sa svātmānaṁ caturbhujam śaṁkhacakragadāpadmaśārṅgakodaṁḍadhāriṇam

उन्होंने स्वप्न में अपने आपको चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदा-पद्म-शार्ङ्ग-धनुष धारण किए हुए देखा,

श्लोक 3 (padma.5.22.3)

नृत्यंतं पुरुषोत्तमस्य पुरतः शर्वादि देवैः सह । श्रीमद्भिः स्वतनूयुतैररिगदांबूत्थाब्जहेत्यादिभिः । विष्वक्सेनवरैर्गणैः सुतनुभिः श्रीशंसदोपासितं । दृष्ट्वा विस्मयमाप लोकविषयं हर्षं तथात्यद्भुतम्

nṛtyaṁtaṁ puruṣottamasya purataḥ śarvādi devaiḥ saha śrīmadbhiḥ svatanūyutairarigadāṁbūtthābjahetyādibhiḥ viṣvaksenavarairgaṇaiḥ sutanubhiḥ śrīśaṁsadopāsitaṁ dṛṣṭvā vismayamāpa lokaviṣayaṁ harṣaṁ tathātyadbhutam

शर्व आदि देवताओं सहित, अपने-अपने श्रीमान् शरीरों वाले, गदा-कमल-चक्र आदि धारण करने वाले, सुंदर विष्वक्सेन के श्रेष्ठ गणों तथा साक्षात् श्री द्वारा सेवित पुरुषोत्तम के समक्ष नृत्य करते हुए — यह देखकर उन्हें लोकातीत, अत्यंत अद्भुत विस्मय और हर्ष प्राप्त हुआ।

श्लोक 4 (padma.5.22.4)

ददतं मनसोऽभीष्टं पुरुषोत्तमसंज्ञितम् । आत्मानं च कृपापात्रममन्यत महामतिः

dadataṁ manaso'bhīṣṭaṁ puruṣottamasaṁjñitam ātmānaṁ ca kṛpāpātramamanyata mahāmatiḥ

पुरुषोत्तम-नामधारी उस मन के अभीष्ट को देने वाले को देखकर उस महाबुद्धिमान् ने अपने आपको कृपा का पात्र मान लिया।

श्लोक 5 (padma.5.22.5)

इत्येवं स्वप्नविषये ददर्श नृपसत्तमः । प्रातः प्रबुद्धो विप्राय जगाद स्वप्नमीक्षितम्

ityevaṁ svapnaviṣaye dadarśa nṛpasattamaḥ prātaḥ prabuddho viprāya jagāda svapnamīkṣitam

इस प्रकार स्वप्न में उस श्रेष्ठ राजा ने यह देखा; प्रातःकाल जागकर उन्होंने ब्राह्मण को अपना देखा हुआ स्वप्न बताया।

श्लोक 6 (padma.5.22.6)

तच्छ्रुत्वा वाडवो धीमान्कथयामास विस्मितः । राजंस्त्वयासौ दृष्टो यः पुरुषोत्तमसंज्ञितः

tacchrutvā vāḍavo dhīmānkathayāmāsa vismitaḥ rājaṁstvayāsau dṛṣṭo yaḥ puruṣottamasaṁjñitaḥ

यह सुनकर बुद्धिमान् ब्राह्मण ने विस्मित होकर कहा — 'हे राजन्! आपने उन्हीं का दर्शन किया है, जो पुरुषोत्तम-नामधारी हैं।

श्लोक 7 (padma.5.22.7)

दास्यते शंखचक्रादिचिह्नितां स्वतनुं हरिः । इति श्रुत्वा तु तद्वाक्यं रत्नग्रीवो महामनाः

dāsyate śaṁkhacakrādicihnitāṁ svatanuṁ hariḥ iti śrutvā tu tadvākyaṁ ratnagrīvo mahāmanāḥ

हरि आपको शंख-चक्र आदि से चिह्नित अपना स्वरूप प्रदान करेंगे।' यह वचन सुनकर महामना रत्नग्रीव ने —

श्लोक 8 (padma.5.22.8)

दापयामास दानानि दीनानां मानसोचितम् । स्नात्वा गंगाब्धिसंयोगे तर्पयित्वा पितॄन्सुरान्

dāpayāmāsa dānāni dīnānāṁ mānasocitam snātvā gaṁgābdhisaṁyoge tarpayitvā pitṝnsurān

दीनों को उनकी आवश्यकतानुसार दान दिलवाया; गंगा-सागर संगम में स्नान करके पितरों और देवताओं को तर्पण देकर —

श्लोक 9 (padma.5.22.9)

गायन्हरिगुणग्रामं प्रत्यैक्षत च दर्शनम् । ततो मध्याह्नसमये दिविदुंदुभयो मुहुः

gāyanhariguṇagrāmaṁ pratyaikṣata ca darśanam tato madhyāhnasamaye dividuṁdubhayo muhuḥ

हरि के गुण-समूह का गान करते हुए वे दर्शन की प्रतीक्षा करने लगे। तब मध्याह्न के समय आकाश में बार-बार दुंदुभियाँ —

श्लोक 10 (padma.5.22.10)

जघ्नुः सुरकराघात बहुशब्दसुशब्दिताः । अकस्मात्पुष्पवृष्टिश्च बभूव नृपमस्तके

jaghnuḥ surakarāghāta bahuśabdasuśabditāḥ akasmātpuṣpavṛṣṭiśca babhūva nṛpamastake

देवताओं के हाथों के प्रहार से बजकर महान् मधुर ध्वनि से गूँज उठीं; और अचानक राजा के मस्तक पर पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 11 (padma.5.22.11)

धन्योसि नृपवर्यस्त्वं नीलं पश्याक्षिगोचरम्

dhanyosi nṛpavaryastvaṁ nīlaṁ paśyākṣigocaram

'धन्य हो, श्रेष्ठ राजा! अब नील को अपनी आँखों के सामने देखो!'

श्लोक 12 (padma.5.22.12)

शृणोतीति यदा वाक्यं नृपो देवप्रणोदितम् । तदा स सूर्यकोटीनामधिकांति धरोद्भुतः

śṛṇotīti yadā vākyaṁ nṛpo devapraṇoditam tadā sa sūryakoṭīnāmadhikāṁti dharodbhutaḥ

देवता द्वारा प्रेरित यह वचन जब राजा ने सुना, तब करोड़ों सूर्यों से अधिक कांतिवाला, अद्भुत —

श्लोक 13 (padma.5.22.13)

राज्ञोऽक्षिगोचरो जातो नीलनामा महागिरिः । राजतैः कानकैः शृंगैः समंतात्परिराजितः

rājño'kṣigocaro jāto nīlanāmā mahāgiriḥ rājataiḥ kānakaiḥ śṛṁgaiḥ samaṁtātparirājitaḥ

नील नामक वह महापर्वत राजा की आँखों के सामने प्रकट हुआ, चारों ओर चाँदी और सोने के शिखरों से सुशोभित।

श्लोक 14 (padma.5.22.14)

किमग्निः प्रज्वलत्येष द्वितीयः किमु भास्करः । किमयं वैद्युतः पुंजो ह्यकस्मात्स्थिरकांतिधृक्

kimagniḥ prajvalatyeṣa dvitīyaḥ kimu bhāskaraḥ kimayaṁ vaidyutaḥ puṁjo hyakasmātsthirakāṁtidhṛk

'क्या यह अग्नि जल रही है? क्या यह दूसरा सूर्य है? क्या यह बिजली का पुंज है, जो अचानक इतनी स्थिर कांति धारण किए हुए है?'

श्लोक 15 (padma.5.22.15)

तापस ब्राह्मणो दृष्ट्वा नीलप्रस्थं सुशोभितम् । राज्ञे निवेदयामास एष पुण्यो महागिरिः

tāpasa brāhmaṇo dṛṣṭvā nīlaprasthaṁ suśobhitam rājñe nivedayāmāsa eṣa puṇyo mahāgiriḥ

तापस ब्राह्मण ने नील की सुशोभित ढलान को देखकर राजा से निवेदन किया — 'यही वह पुण्यमय महापर्वत है।'

श्लोक 16 (padma.5.22.16)

तच्छ्रुत्वा नृपतिश्रेष्ठः शिरसा प्रणनाम ह । धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि नीलो मे दृष्टिगोचरः

tacchrutvā nṛpatiśreṣṭhaḥ śirasā praṇanāma ha dhanyo'smi kṛtakṛtyo'smi nīlo me dṛṣṭigocaraḥ

यह सुनकर उस श्रेष्ठ राजा ने सिर झुकाकर प्रणाम किया — 'मैं धन्य हूँ, मैं कृतकृत्य हूँ, नील मेरी दृष्टि के गोचर हो गया।'

श्लोक 17 (padma.5.22.17)

अमात्यो राजपत्नी च करम्बस्तंतुवायकः । नीलदर्शनसंहृष्टा बभूवुः पुरुषर्षभ

amātyo rājapatnī ca karambastaṁtuvāyakaḥ nīladarśanasaṁhṛṣṭā babhūvuḥ puruṣarṣabha

हे पुरुषर्षभ! मंत्री, रानी तथा तंतुवायक करंब — ये सब नील के दर्शन से हर्षित हो उठे।

श्लोक 18 (padma.5.22.18)

पंचैते विजये काले नीलपर्वतमारुहन् । महादुंदुभिनिर्घोषाञ्च्छृण्वन्तो ह्यमरैः कृतान्

paṁcaite vijaye kāle nīlaparvatamāruhan mahāduṁdubhinirghoṣāñcchṛṇvanto hyamaraiḥ kṛtān

ये पाँचों विजय के समय, अमरों द्वारा किए गए दुंदुभियों के महान् घोष को सुनते हुए नील पर्वत पर चढ़े।

श्लोक 19 (padma.5.22.19)

तस्योपरितने शृंगे चित्रपादपराजिते । ददर्श हाटकाबद्धं देवालयमनुत्तमम्

tasyoparitane śṛṁge citrapādaparājite dadarśa hāṭakābaddhaṁ devālayamanuttamam

उसके ऊपरी शिखर पर, विचित्र वृक्षों से सुशोभित, उन्होंने स्वर्ण से बँधा हुआ अनुपम देवमंदिर देखा,

श्लोक 20 (padma.5.22.20)

ब्रह्मागत्य सदा पूजां करोति परमेष्ठिनः । नैवेद्यं कुरुते यत्र हरिसंतोषकारकम्

brahmāgatya sadā pūjāṁ karoti parameṣṭhinaḥ naivedyaṁ kurute yatra harisaṁtoṣakārakam

जहाँ ब्रह्मा आकर सदा परमेष्ठी की पूजा करते हैं, जहाँ वे हरि को संतुष्ट करने वाला नैवेद्य अर्पित करते हैं।

श्लोक 21 (padma.5.22.21)

दृष्ट्वाथ तत्र विमलं देवायतनमुत्तमम् । प्रविवेश परीवारैः पंचभिः सह संवृतः

dṛṣṭvātha tatra vimalaṁ devāyatanamuttamam praviveśa parīvāraiḥ paṁcabhiḥ saha saṁvṛtaḥ

वहाँ उस निर्मल, श्रेष्ठ देवमंदिर को देखकर वे अपने पाँचों साथियों सहित घिरे हुए भीतर गए।

श्लोक 22 (padma.5.22.22)

तत्र दृष्ट्वा जातरूपे महामणिविचित्रिते । सिंहासने विराजंतं चतुर्भुजमनोहरम्

tatra dṛṣṭvā jātarūpe mahāmaṇivicitrite siṁhāsane virājaṁtaṁ caturbhujamanoharam

वहाँ उन्होंने शुद्ध स्वर्ण के, महामणियों से अद्भुत रूप से जड़े सिंहासन पर विराजमान, मनोहर चतुर्भुज को देखा,

श्लोक 23 (padma.5.22.23)

चंड प्रचंड विजय जयादिभिरुपासितम् । प्रणनाम सपत्नीको राजा सेवकसंयुतः

caṁḍa pracaṁḍa vijaya jayādibhirupāsitam praṇanāma sapatnīko rājā sevakasaṁyutaḥ

चंड, प्रचंड, विजय, जय आदि द्वारा सेवित। राजा ने अपनी पत्नी तथा सेवकों सहित प्रणाम किया।

श्लोक 24 (padma.5.22.24)

प्रणम्य परमात्मानं महाराजः सुरोत्तमम् । स्नापयामास विधिवद्वेदोक्तैः स्नानमंत्रकैः

praṇamya paramātmānaṁ mahārājaḥ surottamam snāpayāmāsa vidhivadvedoktaiḥ snānamaṁtrakaiḥ

उस परमात्मा, श्रेष्ठ देव को प्रणाम करके महाराज ने वेदोक्त स्नान-मंत्रों से विधिपूर्वक उनका स्नान करवाया।

श्लोक 25 (padma.5.22.25)

अर्घ्यपाद्यादिकं चक्रे प्रीतेन मनसा नृपः । चंदनेन विलिप्यैनं सुवस्त्रे विनिवेद्य च

arghyapādyādikaṁ cakre prītena manasā nṛpaḥ caṁdanena vilipyainaṁ suvastre vinivedya ca

राजा ने प्रसन्न मन से अर्घ्य-पाद्य आदि किया; उन्हें चंदन से लेपकर, सुंदर वस्त्र अर्पित करके —

श्लोक 26 (padma.5.22.26)

धूपमारार्तिकं कृत्वा सर्वस्वादुमनोहरम् । नैवेद्यं भगवन्मूर्त्यै न्यवेदयदथो नृपः

dhūpamārārtikaṁ kṛtvā sarvasvādumanoharam naivedyaṁ bhagavanmūrtyai nyavedayadatho nṛpaḥ

धूप-आरती करके, राजा ने सम्पूर्ण स्वादिष्ट, मनोहर नैवेद्य उस भगवद्-मूर्ति को अर्पित किया।

श्लोक 27 (padma.5.22.27)

प्रणम्य च स्तुतिं चक्रे तापसब्राह्मणेन च । यथामतिगुणग्रामगुंफितस्तोत्रसंचयैः

praṇamya ca stutiṁ cakre tāpasabrāhmaṇena ca yathāmatiguṇagrāmaguṁphitastotrasaṁcayaiḥ

प्रणाम करके, तापस ब्राह्मण सहित उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार गुण-समूहों से गुम्फित स्तोत्र-समूहों द्वारा स्तुति की।

श्लोक 28 (padma.5.22.28)

राजोवाच। एकस्त्वं पुरुषः साक्षाद्भगवान्प्रकृतेः परः । कार्यकारणतो भिन्नो महत्तत्त्वादिपूजितः

rājovāca ekastvaṁ puruṣaḥ sākṣādbhagavānprakṛteḥ paraḥ kāryakāraṇato bhinno mahattattvādipūjitaḥ

राजा ने कहा — 'आप ही अकेले साक्षात् पुरुष, भगवान्, प्रकृति से परे, कार्य-कारण से भिन्न, महत्तत्त्व आदि द्वारा पूजित हैं।

श्लोक 29 (padma.5.22.29)

त्वन्नाभिकमलाज्जज्ञे ब्रह्मा सृष्टिविचक्षणः । तथा संहारकर्ता च रुद्रस्त्वन्नेत्रसंभवः

tvannābhikamalājjajñe brahmā sṛṣṭivicakṣaṇaḥ tathā saṁhārakartā ca rudrastvannetrasaṁbhavaḥ

आपके नाभि-कमल से सृष्टि में निपुण ब्रह्मा उत्पन्न हुए; वैसे ही संहारकर्ता रुद्र आपके नेत्र से उत्पन्न हुए।

श्लोक 30 (padma.5.22.30)

त्वयाज्ञप्तः करोत्यस्य विश्वस्य परिचेष्टितम् । त्वत्तो जातं पुराणाद्यज्जगत्स्थास्नु चरिष्णु च

tvayājñaptaḥ karotyasya viśvasya pariceṣṭitam tvatto jātaṁ purāṇādyajjagatsthāsnu cariṣṇu ca

आपकी आज्ञा से वे इस विश्व की समस्त चेष्टा करते हैं; आपसे ही, पुराण-पुरुष से, यह स्थावर-जंगम जगत् उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 31 (padma.5.22.31)

चेतनाशक्तिमाविश्य त्वमेनं चेतयस्यहो । तव जन्म तु नास्त्येव नांतस्तव जगत्पते । वृद्धिक्षयपरीणामास्त्वयि संत्येव नो विभो

cetanāśaktimāviśya tvamenaṁ cetayasyaho tava janma tu nāstyeva nāṁtastava jagatpate vṛddhikṣayaparīṇāmāstvayi saṁtyeva no vibho

इस चेतना-शक्ति में प्रवेश करके, अहो! आप ही इसे चेतनता प्रदान करते हैं। हे जगत्पते! आपका न जन्म है, न अंत; हे विभो! वृद्धि-क्षय-परिणाम आपमें नहीं हैं।

श्लोक 32 (padma.5.22.32)

तथापि भक्तरक्षार्थं धर्मस्थापनहेतवे । करोषि जन्मकर्माणि ह्यनुरूपगुणानि च

tathāpi bhaktarakṣārthaṁ dharmasthāpanahetave karoṣi janmakarmāṇi hyanurūpaguṇāni ca

फिर भी भक्तों की रक्षा हेतु, धर्म-स्थापना के लिए, आप उपयुक्त जन्म-कर्म और गुण धारण करते हैं।

श्लोक 33 (padma.5.22.33)

त्वया मात्स्यं वपुर्धृत्वा शंखस्तु निहतोसुरः । वेदाः सुरक्षिता ब्रह्मन्महापुरुषपूर्वज

tvayā mātsyaṁ vapurdhṛtvā śaṁkhastu nihatosuraḥ vedāḥ surakṣitā brahmanmahāpuruṣapūrvaja

आपने मत्स्य-शरीर धारण करके शंख नामक असुर को मारा; हे ब्रह्मन्, महापुरुष के पूर्वज! वेद आपके द्वारा सुरक्षित किए गए।

श्लोक 34 (padma.5.22.34)

शेषो न वेत्ति महि ते भारत्यपि महेश्वरी । किमुतान्ये महाविष्णो मादृशास्तु कुबुद्धयः

śeṣo na vetti mahi te bhāratyapi maheśvarī kimutānye mahāviṣṇo mādṛśāstu kubuddhayaḥ

शेष भी आपकी महिमा नहीं जानते, महेश्वरी भारती भी नहीं जानतीं; हे महाविष्णो! फिर मुझ जैसे कुबुद्धियों की तो बात ही क्या!

श्लोक 35 (padma.5.22.35)

मनसा त्वां न चाप्नोति वागियं परमेश्वरी । तस्मादहं कथं त्वां वै स्तोतुं स्यामीश्वरः प्रभो

manasā tvāṁ na cāpnoti vāgiyaṁ parameśvarī tasmādahaṁ kathaṁ tvāṁ vai stotuṁ syāmīśvaraḥ prabho

यह परमेश्वरी वाणी भी मन से आपको प्राप्त नहीं कर पाती; तो हे ईश्वर, प्रभो! मैं आपकी स्तुति कैसे कर सकूँगा?'

श्लोक 36 (padma.5.22.36)

इति स्तुत्वा स शिरसा प्रणाममकरोन्मुहुः । गद्गदस्वरसंयुक्तो रोमहर्षांकितांगकः

iti stutvā sa śirasā praṇāmamakaronmuhuḥ gadgadasvarasaṁyukto romaharṣāṁkitāṁgakaḥ

इस प्रकार स्तुति करके उन्होंने बार-बार सिर झुकाकर प्रणाम किया, गद्गद स्वर से युक्त, रोमांचित शरीर वाले।

श्लोक 37 (padma.5.22.37)

इति स्तुत्या प्रहृष्टात्मा भगवान्पुरुषोत्तमः । उवाच वचनं सत्यं राजानं प्रति सार्थकम्

iti stutyā prahṛṣṭātmā bhagavānpuruṣottamaḥ uvāca vacanaṁ satyaṁ rājānaṁ prati sārthakam

इस स्तुति से हृदय में प्रसन्न होकर भगवान् पुरुषोत्तम ने राजा से सत्य तथा सार्थक वचन कहा —

श्लोक 38 (padma.5.22.38)

श्रीभगवानुवाच। तव स्तुत्या प्रहर्षोऽभून्मम राजन्महामते । जानीहि त्वं महाराज मां च प्रकृतितः परम्

śrībhagavānuvāca tava stutyā praharṣo'bhūnmama rājanmahāmate jānīhi tvaṁ mahārāja māṁ ca prakṛtitaḥ param

श्रीभगवान् ने कहा — 'हे राजन्, महामते! तुम्हारी स्तुति से मुझे अत्यंत हर्ष हुआ है। हे महाराज! जान लो कि तुम भी और मैं भी प्रकृति से परे हैं।

श्लोक 39 (padma.5.22.39)

नैवेद्यभक्षणं त्वं हि शीघ्रं कुरु मनोहरम् । चतुर्भुजत्वमाप्तः सन्गंतासि परमं पदम्

naivedyabhakṣaṇaṁ tvaṁ hi śīghraṁ kuru manoharam caturbhujatvamāptaḥ sangaṁtāsi paramaṁ padam

अब शीघ्र इस मनोहर नैवेद्य का भक्षण करो; चतुर्भुजत्व प्राप्त करके तुम परमपद को जाओगे।

श्लोक 40 (padma.5.22.40)

त्वत्कृत्स्तुतिरत्नेन यो मां स्तोष्यति मानवः । तस्यापि दर्शनं दास्ये भुक्तिमुक्तिवरप्रदम्

tvatkṛtstutiratnena yo māṁ stoṣyati mānavaḥ tasyāpi darśanaṁ dāsye bhuktimuktivarapradam

तुम्हारे रचे इस स्तुति-रत्न से जो भी मनुष्य मेरी स्तुति करेगा, उसे भी मैं भोग-मोक्ष देने वाला अपना दर्शन प्रदान करूँगा।'

श्लोक 41 (padma.5.22.41)

इत्येवं वचनं राजा श्रुत्वा भगवतोदितम् । नैवेद्यभक्षणं चक्रे चतुर्भिः सह सेवकैः

ityevaṁ vacanaṁ rājā śrutvā bhagavatoditam naivedyabhakṣaṇaṁ cakre caturbhiḥ saha sevakaiḥ

भगवान् द्वारा कहा गया यह वचन सुनकर राजा ने अपने चार सेवकों सहित नैवेद्य का भक्षण किया।

श्लोक 42 (padma.5.22.42)

ततो विमानं संप्राप्तं किंकिणीजालमंडितम् । अप्सरोवृंदसंसेव्यं सर्वभोगसमन्वितम्

tato vimānaṁ saṁprāptaṁ kiṁkiṇījālamaṁḍitam apsarovṛṁdasaṁsevyaṁ sarvabhogasamanvitam

तब घंटियों के जाल से सुशोभित, अप्सराओं के समूहों से सेवित, समस्त भोगों से युक्त एक विमान वहाँ आ पहुँचा,

श्लोक 43 (padma.5.22.43)

पुरुषोत्तमसंज्ञं च पश्यन्राजा स धार्मिकः । ववंदे चरणौ तस्य कृपापात्रकृतात्मकः

puruṣottamasaṁjñaṁ ca paśyanrājā sa dhārmikaḥ vavaṁde caraṇau tasya kṛpāpātrakṛtātmakaḥ

पुरुषोत्तम-नामधारी उन्हें देखते हुए, कृपा-पात्र बना अपना आपको मानते हुए वह धर्मपरायण राजा उनके चरणों में वंदना करने लगा।

श्लोक 44 (padma.5.22.44)

तदाज्ञया विमाने स आरुह्य महिलायुतः । जगाम पश्यतस्तस्य दिवि वैकुंठमद्भुतम्

tadājñayā vimāne sa āruhya mahilāyutaḥ jagāma paśyatastasya divi vaikuṁṭhamadbhutam

उनकी आज्ञा से विमान पर अपनी पत्नी सहित आरूढ़ होकर वे, उनके देखते-देखते ही, आकाश में अद्भुत वैकुंठ को चले गए।

श्लोक 45 (padma.5.22.45)

मंत्री धर्मपरो राज्ञः सर्वधर्मविदुत्तमः । ययौ साकं विमानेन ललनावृन्दसेवितः

maṁtrī dharmaparo rājñaḥ sarvadharmaviduttamaḥ yayau sākaṁ vimānena lalanāvṛndasevitaḥ

राजा का धर्मपरायण मंत्री, समस्त धर्मों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, दिव्य स्त्रियों के समूह से सेवित उसी विमान पर साथ ही गया।

श्लोक 46 (padma.5.22.46)

तापसब्राह्मणस्तत्र सर्वतीर्थावगाहकः । चतुर्भुजत्वं संप्राप्तो ययौ देवैर्विमानिभिः

tāpasabrāhmaṇastatra sarvatīrthāvagāhakaḥ caturbhujatvaṁ saṁprāpto yayau devairvimānibhiḥ

समस्त तीर्थों में स्नान कर चुका वह तापस ब्राह्मण भी चतुर्भुजत्व प्राप्त करके देवताओं के साथ विमानों पर गया।

श्लोक 47 (padma.5.22.47)

करंबोऽपि महाराज गानपुण्येन दर्शनम् । प्राप्तो ययौ सुरावासं सर्वदेवादिदुर्ल्लभम्

karaṁbo'pi mahārāja gānapuṇyena darśanam prāpto yayau surāvāsaṁ sarvadevādidurllabham

हे महाराज! करंब भी अपने गान के पुण्य से दर्शन प्राप्त करके, समस्त देवताओं आदि को भी दुर्लभ देव-निवास को गया।

श्लोक 48 (padma.5.22.48)

सर्वे प्रचलिता विष्णुलोकं परममद्भुतम् । चतुर्भुजाः शंखचक्रगदापाथोजधारिणः

sarve pracalitā viṣṇulokaṁ paramamadbhutam caturbhujāḥ śaṁkhacakragadāpāthojadhāriṇaḥ

सभी चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए हुए विष्णु के परम अद्भुत लोक की ओर चल पड़े।

श्लोक 49 (padma.5.22.49)

सर्वे मेघश्रियः शुद्धा लसदंभोजपाणयः । हारकेयूरकटकैर्भूषितांगा ययुर्दिवम्

sarve meghaśriyaḥ śuddhā lasadaṁbhojapāṇayaḥ hārakeyūrakaṭakairbhūṣitāṁgā yayurdivam

सभी मेघ के समान श्रीयुक्त, शुद्ध, देदीप्यमान कमल-हाथों वाले, हार-केयूर-कड़ों से सुशोभित शरीर वाले, स्वर्ग को गए।

श्लोक 50 (padma.5.22.50)

तद्विमानावलीर्दृष्ट्वा लोकैः प्रकृतिभिस्तदा । दुंदुभीनां तु निर्घोषस्तैः कृतः कर्णगोचरः

tadvimānāvalīrdṛṣṭvā lokaiḥ prakṛtibhistadā duṁdubhīnāṁ tu nirghoṣastaiḥ kṛtaḥ karṇagocaraḥ

उन विमानों की पंक्ति को देखकर उनकी प्रजा ने तब उनके द्वारा किए गए दुंदुभियों के घोष को सुना।

श्लोक 51 (padma.5.22.51)

तदैको ब्राह्मणो ह्यासीद्विष्णुपादाब्जवल्लभः । गतस्तद्विरहाकृष्टचेता जातश्चतुर्भुजः

tadaiko brāhmaṇo hyāsīdviṣṇupādābjavallabhaḥ gatastadvirahākṛṣṭacetā jātaścaturbhujaḥ

उस समय एक ब्राह्मण था, विष्णु के चरणकमलों का प्रिय, जो उनके वियोग की उत्कण्ठा से आकृष्ट मन होकर स्वयं चतुर्भुज हो गया।

श्लोक 52 (padma.5.22.52)

तच्चित्रं वीक्ष्य लोकास्ते प्रशंसंतो महोदयम् । गंगासागरसंयोगे स्नात्वाऽगुस्तं पुरं प्रति

taccitraṁ vīkṣya lokāste praśaṁsaṁto mahodayam gaṁgāsāgarasaṁyoge snātvā'gustaṁ puraṁ prati

उस अद्भुत घटना को देखकर, इस महान् उदय की प्रशंसा करते हुए वे लोग गंगा-सागर संगम में स्नान करके उस नगरी की ओर गए —

श्लोक 53 (padma.5.22.53)

अहो भाग्यं भूमिपते रत्नग्रीवस्य सन्मतेः । जगामानेन देहेन तद्विष्णोः परमं पदम्

aho bhāgyaṁ bhūmipate ratnagrīvasya sanmateḥ jagāmānena dehena tadviṣṇoḥ paramaṁ padam

'अहो, सन्मति भूमिपति रत्नग्रीव का कैसा सौभाग्य! वे इसी शरीर से विष्णु के उस परमधाम को चले गए!

श्लोक 54 (padma.5.22.54)

राजन्नसौ नीलगिरिः पुरुषोत्तमसत्कृतः । यं वीक्ष्यैव व्रजंत्यद्धा वैकुंठं परमायनम्

rājannasau nīlagiriḥ puruṣottamasatkṛtaḥ yaṁ vīkṣyaiva vrajaṁtyaddhā vaikuṁṭhaṁ paramāyanam

हे राजन्! यह वही नीलगिरि है, पुरुषोत्तम द्वारा सम्मानित — जिसे देखने मात्र से लोग साक्षात् वैकुंठ, उस परम गंतव्य को जाते हैं।

श्लोक 55 (padma.5.22.55)

एतन्नीलस्य माहात्म्यं यः शृणोति स भाग्यवान् । यः श्रावयति लोकान्वै तौ गच्छेतां परं पदम्

etannīlasya māhātmyaṁ yaḥ śṛṇoti sa bhāgyavān yaḥ śrāvayati lokānvai tau gacchetāṁ paraṁ padam

इस नील की महिमा को जो सुनता है, वह भाग्यशाली है; और जो लोगों को सुनाता है, वे दोनों परमपद को जाते हैं।

श्लोक 56 (padma.5.22.56)

एतच्छ्रुत्वा तु दुःस्वप्नो नश्यति स्मृतिमात्रतः । प्रांते संसारनिस्तारं ददाति पुरुषोत्तमः

etacchrutvā tu duḥsvapno naśyati smṛtimātrataḥ prāṁte saṁsāranistāraṁ dadāti puruṣottamaḥ

इसे सुनकर स्मरणमात्र से बुरा स्वप्न भी नष्ट हो जाता है; अंत में पुरुषोत्तम संसार से मुक्ति प्रदान करते हैं।

श्लोक 57 (padma.5.22.57)

योऽसौ नीलाधिवासी च स रामः पुरुषोत्तमः । सीतासाक्षान्महालक्ष्मीः सर्वकारणकारणम्

yo'sau nīlādhivāsī ca sa rāmaḥ puruṣottamaḥ sītāsākṣānmahālakṣmīḥ sarvakāraṇakāraṇam

जो यह नील-निवासी हैं, वे ही राम, पुरुषोत्तम हैं; सीता साक्षात् महालक्ष्मी हैं, समस्त कारणों के कारण।

श्लोक 58 (padma.5.22.58)

हयमेधं चरित्वा स लोकान्वै पावयिष्यति । यन्नामब्रह्महत्यायाः प्रायश्चित्ते प्रदिश्यते

hayamedhaṁ caritvā sa lokānvai pāvayiṣyati yannāmabrahmahatyāyāḥ prāyaścitte pradiśyate

अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करके वे लोकों को पवित्र करेंगे; जिनका नाम ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त के रूप में बताया जाता है।

श्लोक 59 (padma.5.22.59)

इदानीं त्वद्धयः प्राप्तो नीलेपर्वतसत्तमे । पुरुषोत्तमदेवं त्वं नमस्कुरु महामते

idānīṁ tvaddhayaḥ prāpto nīleparvatasattame puruṣottamadevaṁ tvaṁ namaskuru mahāmate

अब तुम्हारा घोड़ा इस श्रेष्ठ नीलपर्वत पर पहुँच चुका है; हे महामते! पुरुषोत्तम देव को नमस्कार करो।

श्लोक 60 (padma.5.22.60)

तत्र निष्पापिनो भूत्वा यास्यामः परमं पदम् । यस्य प्रसादाद्बहवो निस्तीर्णा भवसागरात्

tatra niṣpāpino bhūtvā yāsyāmaḥ paramaṁ padam yasya prasādādbahavo nistīrṇā bhavasāgarāt

वहाँ निष्पाप होकर हम परमपद को जाएँगे — जिनकी कृपा से अनेक लोग भवसागर से पार हुए हैं।'

श्लोक 61 (padma.5.22.61)

एवं प्रवदतस्तस्य प्राप्तोऽश्वो नीलपर्वतम् । वायुवेगेन पृथिवीं कुर्वन्संक्षुण्णमंडलाम्

evaṁ pravadatastasya prāpto'śvo nīlaparvatam vāyuvegena pṛthivīṁ kurvansaṁkṣuṇṇamaṁḍalām

इस प्रकार वे यह कह ही रहे थे कि घोड़ा वायु के वेग से पृथ्वी को कँपाता हुआ नील पर्वत पर पहुँच गया।

श्लोक 62 (padma.5.22.62)

तदा राजापि तत्पृष्ठचारी नीलाभिधं गिरिम् । प्राप्तो गंगाब्धिसंयोगे स्नात्वागात्पुरुषोत्तमम्

tadā rājāpi tatpṛṣṭhacārī nīlābhidhaṁ girim prāpto gaṁgābdhisaṁyoge snātvāgātpuruṣottamam

तब उसके पीछे चलने वाले राजा (शत्रुघ्न) भी नील नामक पर्वत पर पहुँचे; गंगा-सागर संगम में स्नान करके वे पुरुषोत्तम के पास गए।

श्लोक 63 (padma.5.22.63)

स्तुत्वा नत्वा च देवेशं सुरासुरनमस्कृतम् । जातं कृतार्थमात्मानममन्यत स शत्रुहा

stutvā natvā ca deveśaṁ surāsuranamaskṛtam jātaṁ kṛtārthamātmānamamanyata sa śatruhā

देव-दानवों द्वारा नमस्कृत उस देवाधिदेव की स्तुति और वंदना करके, वे शत्रुहंता अपने आपको कृतार्थ मानने लगे।

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