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पाताल खण्ड · अध्याय 23

राजकुमारों के युद्ध की कथा

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (padma.5.23.1)

शेष उवाच। क्षणं स्थित्वा तृणान्यत्त्वा ययौ वाजी मनोजवः । वीरश्रेणीवृतः पत्रं भाले धृत्वा सचामरः

śeṣa uvāca kṣaṇaṁ sthitvā tṛṇānyattvā yayau vājī manojavaḥ vīraśreṇīvṛtaḥ patraṁ bhāle dhṛtvā sacāmaraḥ

शेष जी ने कहा — क्षणभर ठहरकर, घास खाकर मन के समान वेगवान् वह घोड़ा वीरों की पंक्तियों से घिरा, माथे पर पत्र धारण किए, चँवर सहित आगे बढ़ा,

श्लोक 2 (padma.5.23.2)

शत्रुघ्नेन सुवीरेण लक्ष्मीनिधि नृपेण च । पुष्कलेनोग्रवाहेन प्रतापाग्र्येण रक्षितः

śatrughnena suvīreṇa lakṣmīnidhi nṛpeṇa ca puṣkalenogravāhena pratāpāgryeṇa rakṣitaḥ

श्रेष्ठ वीर शत्रुघ्न, राजा लक्ष्मीनिधि, पुष्कल तथा प्रताप में अग्रगण्य उग्रवाहन प्रतापाग्र्य द्वारा रक्षित।

श्लोक 3 (padma.5.23.3)

ययौ पुरीं स चक्रांकां सुबाहुपरिरक्षिताम् । अनेकवीरकोटीभी रक्षितोऽनुगतः प्रभो

yayau purīṁ sa cakrāṁkāṁ subāhuparirakṣitām anekavīrakoṭībhī rakṣito'nugataḥ prabho

हे प्रभो! वह करोड़ों वीरों द्वारा रक्षित होकर सुबाहु द्वारा सुरक्षित, चक्र-चिह्नित उस नगरी की ओर गया।

श्लोक 4 (padma.5.23.4)

तदा पुत्रोस्य दमनो मृगयामास्थितो महान् । ददर्शाश्वं भालपत्रं चंदनादिकचर्चितम्

tadā putrosya damano mṛgayāmāsthito mahān dadarśāśvaṁ bhālapatraṁ caṁdanādikacarcitam

तब उनके पुत्र दमन ने, जो महान् शिकार में लगे थे, चंदन आदि से लिप्त माथे के पत्र वाले उस घोड़े को देखा।

श्लोक 5 (padma.5.23.5)

विलोक्य सेवकं प्राह कस्याश्वो मेऽक्षिगोचरः । भाले पत्रं धृतं किं नु चामरं किंतु शोभनम्

vilokya sevakaṁ prāha kasyāśvo me'kṣigocaraḥ bhāle patraṁ dhṛtaṁ kiṁ nu cāmaraṁ kiṁtu śobhanam

उसे देखकर उन्होंने सेवक से कहा — 'यह किसका घोड़ा मेरी दृष्टि में है? इसके माथे पर यह पत्र क्या है, और यह सुंदर चँवर क्या है?'

श्लोक 6 (padma.5.23.6)

इति राज्ञोवचः श्रुत्वा सेवकः प्रययौ ततः । यत्रासौ वर्तते वाजी भालपत्रः सुशोभनः

iti rājñovacaḥ śrutvā sevakaḥ prayayau tataḥ yatrāsau vartate vājī bhālapatraḥ suśobhanaḥ

राजा का यह वचन सुनकर सेवक वहाँ गया, जहाँ वह सुंदर, माथे पर पत्र वाला घोड़ा था,

श्लोक 7 (padma.5.23.7)

गृहीत्वा तं केशसंघे रत्नमालाविभूषितम् । निनाय चाग्रे भूपस्य सुबाहुकुलधारिणः

gṛhītvā taṁ keśasaṁghe ratnamālāvibhūṣitam nināya cāgre bhūpasya subāhukuladhāriṇaḥ

और उसे केश-समूह से पकड़कर, रत्नमाला से विभूषित उस घोड़े को सुबाहु-कुल के राजा के सामने ले गया।

श्लोक 8 (padma.5.23.8)

स पत्रं वाचयामास सुंदराक्षरशोभितम् । अयोध्याधिपतिश्चासीद्राजा दशरथो बली

sa patraṁ vācayāmāsa suṁdarākṣaraśobhitam ayodhyādhipatiścāsīdrājā daśaratho balī

उसने सुंदर अक्षरों से सुशोभित पत्र को पढ़ा — 'बलवान् राजा दशरथ अयोध्या के स्वामी थे।

श्लोक 9 (padma.5.23.9)

तस्यात्मजो रामभद्रः सर्वशूरशिरोमणिः । नान्योस्ति तत्समः पृथ्व्यां धनुर्धरणविक्रमः

tasyātmajo rāmabhadraḥ sarvaśūraśiromaṇiḥ nānyosti tatsamaḥ pṛthvyāṁ dhanurdharaṇavikramaḥ

उनके पुत्र रामभद्र समस्त शूरवीरों के शिरोमणि हैं; पृथ्वी पर उनके समान धनुर्धारण में पराक्रमी कोई अन्य नहीं है।

श्लोक 10 (padma.5.23.10)

तेनासौ मोचितो वाजी चंदनादिकचर्चितः । तं पालयति धर्मात्मा शत्रुघ्नः परवीरहा

tenāsau mocito vājī caṁdanādikacarcitaḥ taṁ pālayati dharmātmā śatrughnaḥ paravīrahā

उनके द्वारा चंदन आदि से लिप्त यह घोड़ा मुक्त किया गया है; धर्मात्मा, शत्रुवीरों का संहारक शत्रुघ्न इसकी रक्षा करते हैं।

श्लोक 11 (padma.5.23.11)

ये च शूरा वयं वीरा धनुर्हस्ता इमे वयम् । ते गृह्णंतु बलाद्वाहं रत्नमालाविभूषितम्

ye ca śūrā vayaṁ vīrā dhanurhastā ime vayam te gṛhṇaṁtu balādvāhaṁ ratnamālāvibhūṣitam

जो भी शूरवीर, हम जैसे धनुर्धर वीर हों, वे बलपूर्वक इस रत्नमाला से विभूषित घोड़े को पकड़ लें;

श्लोक 12 (padma.5.23.12)

तं च मोक्ष्यति शत्रुघ्नः सर्ववीरशिरोमणिः । अन्यथा पादयोस्तस्य प्रणतिं यांतु धन्विनः

taṁ ca mokṣyati śatrughnaḥ sarvavīraśiromaṇiḥ anyathā pādayostasya praṇatiṁ yāṁtu dhanvinaḥ

समस्त वीरों के शिरोमणि शत्रुघ्न उसे पुनः छुड़ा लेंगे — अन्यथा धनुर्धर उनके चरणों में प्रणाम करें।'

श्लोक 13 (padma.5.23.13)

इत्यभिप्रायमालोक्य जगाद नृपनंदनः । राम एव धनुर्धारी न वयं क्षत्त्रियाः स्मृताः

ityabhiprāyamālokya jagāda nṛpanaṁdanaḥ rāma eva dhanurdhārī na vayaṁ kṣattriyāḥ smṛtāḥ

इस अभिप्राय को समझकर राजपुत्र ने कहा — 'क्या राम ही अकेले धनुर्धारी हैं? क्या हम क्षत्रिय नहीं कहलाते?

श्लोक 14 (padma.5.23.14)

ताते मेऽवस्थिते पृथ्व्यां कोऽयं गर्वो महान्भुवि । प्राप्नोतु गर्वस्य फलं मम निर्मुक्तसायकैः

tāte me'vasthite pṛthvyāṁ ko'yaṁ garvo mahānbhuvi prāpnotu garvasya phalaṁ mama nirmuktasāyakaiḥ

मेरे पिता के पृथ्वी पर विद्यमान रहते यह कितना बड़ा गर्व है इस संसार में! मेरे छोड़े बाणों से उसे अपने गर्व का फल मिले।

श्लोक 15 (padma.5.23.15)

अद्य मे निशिता बाणाः शत्रुघ्नं किंशुकं यथा । पुष्पितं विदधत्वद्धा क्षतावृतशरीरकम्

adya me niśitā bāṇāḥ śatrughnaṁ kiṁśukaṁ yathā puṣpitaṁ vidadhatvaddhā kṣatāvṛtaśarīrakam

आज मेरे तीक्ष्ण बाण शत्रुघ्न को घावों से ढके शरीर वाले, पुष्पित पलाश वृक्ष के समान बना दें!

श्लोक 16 (padma.5.23.16)

दारयंतु कपोलांश्च सायका मम दंतिनाम् । अश्वान्पश्यंतु शतशो रुधिरौघपरिप्लुतान्

dārayaṁtu kapolāṁśca sāyakā mama daṁtinām aśvānpaśyaṁtu śataśo rudhiraughapariplutān

मेरे बाण उसके हाथियों के कपोलों को फाड़ दें; उसके घोड़े सैकड़ों की संख्या में रक्तधाराओं में डूबे दिखें!

श्लोक 17 (padma.5.23.17)

पिबंतु योगिनीसंघा रुधिराणि नृमस्तकैः । शिवा भवंतु संतुष्टा मद्वैरिक्रव्यभक्षणैः

pibaṁtu yoginīsaṁghā rudhirāṇi nṛmastakaiḥ śivā bhavaṁtu saṁtuṣṭā madvairikravyabhakṣaṇaiḥ

योगिनियों के समूह मनुष्यों के सिरों से रक्त पिएँ; मेरे शत्रुओं के मांस के भक्षण से शृगालिनियाँ संतुष्ट हों!

श्लोक 18 (padma.5.23.18)

पश्यंतु सुभटास्तस्य मम बाहुबलं महत् । कोदंडदंडनिर्मुक्ताः शरकोटीर्विमुंचतः

paśyaṁtu subhaṭāstasya mama bāhubalaṁ mahat kodaṁḍadaṁḍanirmuktāḥ śarakoṭīrvimuṁcataḥ

उसके योद्धा धनुष की डोरी से छूटे मेरे करोड़ों बाणों को छोड़ते हुए मेरी महान् भुजबल को देखें!'

श्लोक 19 (padma.5.23.19)

इत्थमुक्त्वा महीपस्य तनुजो दमनाभिधः । स्वपुरं प्रेषयित्वा तं प्रहृष्टोऽभवदुद्भटः

itthamuktvā mahīpasya tanujo damanābhidhaḥ svapuraṁ preṣayitvā taṁ prahṛṣṭo'bhavadudbhaṭaḥ

इस प्रकार कहकर, राजा के पुत्र दमन ने अपने नगर को यह समाचार भेजकर उग्र, अत्यंत हर्षित हो उठे।

श्लोक 20 (padma.5.23.20)

सेनापतिमुवाचेदं सज्जीकुरु महामते । सेनां परिमितां मह्यं वैरिवृंदनिवारणे

senāpatimuvācedaṁ sajjīkuru mahāmate senāṁ parimitāṁ mahyaṁ vairivṛṁdanivāraṇe

उन्होंने अपने सेनापति से कहा — 'हे महामते! शत्रु-समूह को रोकने के लिए मेरे लिए पर्याप्त सेना तैयार करो।'

श्लोक 21 (padma.5.23.21)

सज्जां सेनां विधायाशु संमुखो रणमंडले । स्थितवान्या वदत्युग्रस्तावत्प्राप्ता हयानुगाः

sajjāṁ senāṁ vidhāyāśu saṁmukho raṇamaṁḍale sthitavānyā vadatyugrastāvatprāptā hayānugāḥ

शीघ्र सेना तैयार करके वे रणभूमि में सामने खड़े हो गए; वे उग्र अभी बोल ही रहे थे कि घोड़े के अनुगामी वहाँ पहुँच गए।

श्लोक 22 (padma.5.23.22)

क्वासौ हयो महाराज्ञो भालपत्रेण चिह्नितः । पप्रच्छुस्ते तु चान्योन्यमतिव्याकुलिता मुहुः

kvāsau hayo mahārājño bhālapatreṇa cihnitaḥ papracchuste tu cānyonyamativyākulitā muhuḥ

'माथे के पत्र से चिह्नित उस महाराज का घोड़ा कहाँ है?' — वे अत्यंत व्याकुल होकर बार-बार आपस में पूछने लगे।

श्लोक 23 (padma.5.23.23)

तावद्ददर्श पुरतः प्रतापाग्र्यः परंतपः । सज्जीभूतं तु कटकं वीरशब्दनिनादितम्

tāvaddadarśa purataḥ pratāpāgryaḥ paraṁtapaḥ sajjībhūtaṁ tu kaṭakaṁ vīraśabdanināditam

तभी शत्रुओं को संतप्त करने वाले, प्रताप में अग्रगण्य उन्होंने सामने वीरों की गर्जना से गूँजती हुई तैयार सेना देखी।

श्लोक 24 (padma.5.23.24)

तत्रावदञ्जनाः केचिन्नीतोऽश्वोऽनेन भूपते । अन्यथा संमुखस्तिष्ठेत्कथं वीरो बलानुगः

tatrāvadañjanāḥ kecinnīto'śvo'nena bhūpate anyathā saṁmukhastiṣṭhetkathaṁ vīro balānugaḥ

वहाँ कुछ श्यामवर्ण लोगों ने कहा — 'हे भूपते! इसी ने घोड़ा लिया है; अन्यथा वीर सेना सहित सामने कैसे खड़ा होता?'

श्लोक 25 (padma.5.23.25)

इत्याकर्ण्य प्रतापाग्र्यः प्रेषयामास सेवकम् । स गत्वा तत्र पप्रच्छ कुत्राश्वो रामभूपतेः

ityākarṇya pratāpāgryaḥ preṣayāmāsa sevakam sa gatvā tatra papraccha kutrāśvo rāmabhūpateḥ

यह सुनकर प्रतापाग्र्य ने एक सेवक भेजा; उसने वहाँ जाकर पूछा — 'राजा राम का घोड़ा कहाँ है?

श्लोक 26 (padma.5.23.26)

केन नीतः कुतो नीतो रामं जानाति नो कुधीः । यं शक्रप्रमुखा देवा बलिमादाय सन्नताः

kena nītaḥ kuto nīto rāmaṁ jānāti no kudhīḥ yaṁ śakrapramukhā devā balimādāya sannatāḥ

किसने और कहाँ ले लिया? क्या यह कुबुद्धि राम को नहीं जानता, जिनकी बलि लेकर इंद्र आदि देवगण भी झुके रहते हैं?

श्लोक 27 (padma.5.23.27)

तस्य वै धर्मराजस्य कुपितं तु बलं महत् । सर्वथा हि ग्रसिष्येत प्रणतिं चेन्न यास्यति

tasya vai dharmarājasya kupitaṁ tu balaṁ mahat sarvathā hi grasiṣyeta praṇatiṁ cenna yāsyati

उस धर्मराज की महान् सेना क्रुद्ध होने पर, यदि यह प्रणाम को नहीं जाएगा, तो सब कुछ ग्रस लेगी।'

श्लोक 28 (padma.5.23.28)

इत्थमुक्तं समाकर्ण्य तदा राजसुतो बली । तं वै धिक्कारयामास वाग्जालेन सुदुर्मनाः

itthamuktaṁ samākarṇya tadā rājasuto balī taṁ vai dhikkārayāmāsa vāgjālena sudurmanāḥ

यह कहा जाने पर उस बलशाली, अत्यंत दुर्मना राजपुत्र ने उसे वाक्-जाल से धिक्कारा —

श्लोक 29 (padma.5.23.29)

मयानीतो यज्ञहयः पत्रचिह्नाद्यलंकृतः । ये शूरास्ते तु मां जित्वा मोचयंतु बलादिह

mayānīto yajñahayaḥ patracihnādyalaṁkṛtaḥ ye śūrāste tu māṁ jitvā mocayaṁtu balādiha

'मैंने ही पत्र-चिह्न आदि से अलंकृत यह यज्ञ-घोड़ा लिया है; जो शूरवीर हों, वे मुझे जीतकर यहाँ बलपूर्वक इसे छुड़ा लें।'

श्लोक 30 (padma.5.23.30)

सेवकस्तद्वचः श्रुत्वा रोषपूर्णो हसन्ययौ । राज्ञे निवेदयामास यथावदुपवर्णितम्

sevakastadvacaḥ śrutvā roṣapūrṇo hasanyayau rājñe nivedayāmāsa yathāvadupavarṇitam

सेवक यह वचन सुनकर क्रोध से भरकर हँसते हुए चला गया, और राजा से यथावत् सब कुछ निवेदन कर दिया।

श्लोक 31 (padma.5.23.31)

तच्छ्रुत्वा रोषताम्राक्षः प्रतापाग्र्यो महाबलः । ययौ योद्धुं राजपुत्रं महावीरपुरस्कृतम्

tacchrutvā roṣatāmrākṣaḥ pratāpāgryo mahābalaḥ yayau yoddhuṁ rājaputraṁ mahāvīrapuraskṛtam

यह सुनकर क्रोध से लाल आँखों वाले, महाबली प्रतापाग्र्य महावीर से सम्मानित उस राजपुत्र से युद्ध करने चले।

श्लोक 32 (padma.5.23.32)

रथेन कनकांगेन चतुर्वाजिसुशोभिना । सुकूबरेण सर्वास्त्रपूरितेन ययौ बली

rathena kanakāṁgena caturvājisuśobhinā sukūbareṇa sarvāstrapūritena yayau balī

स्वर्णांगों वाले, चार श्रेष्ठ घोड़ों से सुशोभित, सुंदर हरण वाले, समस्त अस्त्रों से भरे रथ पर वे बलशाली चले।

श्लोक 33 (padma.5.23.33)

धनुष्टंकारयामास महाबलसमन्वितः । पुनःपुनर्जहासोच्चैः कोपादुद्गमिताश्रुकः

dhanuṣṭaṁkārayāmāsa mahābalasamanvitaḥ punaḥpunarjahāsoccaiḥ kopādudgamitāśrukaḥ

महाबल से युक्त उन्होंने धनुष टंकारा, तथा क्रोध से आँसू बहाते हुए बार-बार ऊँचे स्वर में हँसे।

श्लोक 34 (padma.5.23.34)

अश्ववाहा गजारूढाः खड्गोल्लसितपाणयः । अन्वयुस्ते प्रतापाग्र्यं रोषपूर्णाकुलेक्षणम्

aśvavāhā gajārūḍhāḥ khaḍgollasitapāṇayaḥ anvayuste pratāpāgryaṁ roṣapūrṇākulekṣaṇam

अश्वारोही, गजारूढ़, हाथों में चमकती तलवारें लिए वे क्रोध से व्याकुल दृष्टि वाले प्रतापाग्र्य के पीछे-पीछे चले।

श्लोक 35 (padma.5.23.35)

हस्तिनः पत्तयश्चैव कोटिशः प्रधनोद्यताः । चिरकालमभीप्संतो रणं वीरेणकारितम्

hastinaḥ pattayaścaiva koṭiśaḥ pradhanodyatāḥ cirakālamabhīpsaṁto raṇaṁ vīreṇakāritam

करोड़ों हाथी और पैदल सैनिक भी युद्ध के लिए उद्यत, चिरकाल से उस वीर द्वारा कराए गए इस युद्ध की कामना करते हुए।

श्लोक 36 (padma.5.23.36)

तदोद्यतं समाज्ञाय रिपुसैन्यं नृपात्मजः । प्रत्युज्जगाम वीराग्र्यो महाबलपरीवृतः

tadodyataṁ samājñāya ripusainyaṁ nṛpātmajaḥ pratyujjagāma vīrāgryo mahābalaparīvṛtaḥ

तब शत्रु-सेना को उद्यत जानकर वह वीरश्रेष्ठ राजपुत्र भी महासेना से घिरा हुआ सामने गया।

श्लोक 37 (padma.5.23.37)

सन्नद्धः कवची खड्गी शरासनधरो युवा । लीलयैव ययौ योद्धुं मृगराड्गजतामिव

sannaddhaḥ kavacī khaḍgī śarāsanadharo yuvā līlayaiva yayau yoddhuṁ mṛgarāḍgajatāmiva

कवचधारी, तलवारधारी, धनुर्धारी वह युवा हाथी के समक्ष सिंह के समान लीलापूर्वक युद्ध करने चला।

श्लोक 38 (padma.5.23.38)

तदा योधाः प्रकुपिताः परस्परवधैषिणः । छिंधि भिंधीति भाषंतो रणकार्यविशारदाः

tadā yodhāḥ prakupitāḥ parasparavadhaiṣiṇaḥ chiṁdhi bhiṁdhīti bhāṣaṁto raṇakāryaviśāradāḥ

तब एक-दूसरे के वध की कामना करने वाले, क्रुद्ध, युद्ध-कार्य में निपुण योद्धा 'काटो, भेदो' कहने लगे —

श्लोक 39 (padma.5.23.39)

पत्तयः पत्तिसंघेन गजारूढाश्च सादिभिः । रथारूढा रथस्थैश्च वाहारूढाश्वसंस्थितैः

pattayaḥ pattisaṁghena gajārūḍhāśca sādibhiḥ rathārūḍhā rathasthaiśca vāhārūḍhāśvasaṁsthitaiḥ

पैदल सैनिकों की टुकड़ी के विरुद्ध पैदल सैनिक, हाथी-सवारों के विरुद्ध अश्वारोही, रथारूढ़ों के विरुद्ध रथारूढ़, तथा घोड़े पर बैठे लोगों के विरुद्ध घोड़े पर बैठे लोग।

श्लोक 40 (padma.5.23.40)

गजा भिन्ना द्विधा जाता हयाश्च द्विदलीकृताः । अनेकनरमस्तिष्कैर्मेदिनीपूरिता ह्यभूत्

gajā bhinnā dvidhā jātā hayāśca dvidalīkṛtāḥ anekanaramastiṣkairmedinīpūritā hyabhūt

हाथी दो भागों में विभक्त हो गए, घोड़े भी दो टुकड़ों में कट गए; पृथ्वी अनेक मनुष्यों के मस्तिष्क से भर गई।

श्लोक 41 (padma.5.23.41)

तदा प्रकुपितो राजा प्रतापाग्र्यो महाबलः । स्वसैन्यकदनोद्युक्तं राजपुत्रं समीक्ष्य च

tadā prakupito rājā pratāpāgryo mahābalaḥ svasainyakadanodyuktaṁ rājaputraṁ samīkṣya ca

तब क्रुद्ध होकर महाबली राजा प्रतापाग्र्य ने अपनी सेना को नष्ट करने में तत्पर राजपुत्र को देखकर —

श्लोक 42 (padma.5.23.42)

उवाच सारथिं तत्र प्रापयाश्वान्यतो मम । सैन्यस्य कदनासक्तो राजपुत्रो महारथः

uvāca sārathiṁ tatra prāpayāśvānyato mama sainyasya kadanāsakto rājaputro mahārathaḥ

वहाँ सारथि से कहा — 'मेरे घोड़ों को अन्यत्र ले चलो — यह महारथी राजपुत्र मेरी सेना के संहार में लगा हुआ है।'

श्लोक 43 (padma.5.23.43)

अथ वीरशिरोरत्न नमितांघ्रिर्नृपात्मजः । ययौ संमुखमेवास्य प्रतापाग्र्यस्य वीर्यवान्

atha vīraśiroratna namitāṁghrirnṛpātmajaḥ yayau saṁmukhamevāsya pratāpāgryasya vīryavān

तब वह वीरशिरोमणि, जिनके चरणों में वीर झुकते थे, वह पराक्रमी राजपुत्र स्वयं प्रतापाग्र्य के सामने ही गया।

श्लोक 44 (padma.5.23.44)

सारथिः प्रापयामास प्रतापाग्र्यस्य वाजिनः । यत्रासौ दमनो वीरः सर्वशूरशिरोमणिः

sārathiḥ prāpayāmāsa pratāpāgryasya vājinaḥ yatrāsau damano vīraḥ sarvaśūraśiromaṇiḥ

सारथि प्रतापाग्र्य के घोड़ों को वहाँ ले गया, जहाँ समस्त शूरवीरों के शिरोमणि वीर दमन थे।

श्लोक 45 (padma.5.23.45)

गत्वा तमाह्वयामास राजपुत्रं रणोद्यतम् । रथे पुरटनिर्णिक्ते तिष्ठन्कोदंडदंडभृत्

gatvā tamāhvayāmāsa rājaputraṁ raṇodyatam rathe puraṭanirṇikte tiṣṭhankodaṁḍadaṁḍabhṛt

वहाँ जाकर उन्होंने युद्ध के लिए तत्पर राजपुत्र को ललकारा, स्वर्ण-जटित रथ पर खड़े, धनुष की डोरी थामे हुए —

श्लोक 46 (padma.5.23.46)

रे राजपुत्र क शिशो त्वया बद्धोऽश्वसत्तमः । न ज्ञातोसि महाराजः सर्ववीरेंद्र सेवितः

re rājaputra ka śiśo tvayā baddho'śvasattamaḥ na jñātosi mahārājaḥ sarvavīreṁdra sevitaḥ

'रे राजपुत्र, बालक! तूने कहाँ इस श्रेष्ठ घोड़े को बाँधा है? तू मुझे नहीं जानता — समस्त वीरेंद्रों द्वारा सेवित महाराजा,

श्लोक 47 (padma.5.23.47)

यस्य प्रतापं दैत्येंद्रो न शक्तः सोढुमद्भुतम् । तस्य त्वं वाजिनं नीत्वा गतोऽसि पुटभेदनम्

yasya pratāpaṁ daityeṁdro na śaktaḥ soḍhumadbhutam tasya tvaṁ vājinaṁ nītvā gato'si puṭabhedanam

जिसके अद्भुत प्रताप को दैत्येंद्र भी सहन नहीं कर सका — तूने उसका घोड़ा लेकर अपने नगर की ओर मार्ग लिया है!

श्लोक 48 (padma.5.23.48)

मां जानीहि पुरः प्राप्तं कालरूपं तु वैरिणम् । मुंचाश्वमर्भ गच्छाशु बालक्रीडनकं कुरु

māṁ jānīhi puraḥ prāptaṁ kālarūpaṁ tu vairiṇam muṁcāśvamarbha gacchāśu bālakrīḍanakaṁ kuru

मुझे साक्षात् काल-रूप शत्रु सामने आया हुआ जान; घोड़ा छोड़ दे, बालक, शीघ्र जा, बालोचित खेल कर।

श्लोक 49 (padma.5.23.49)

कस्यात्मजस्त्वं कुत्रत्यः कथं नोऽदीर्घदर्शिना । धृतोऽश्वस्त्वथ संजाता घृणा मम शिशो त्वयि

kasyātmajastvaṁ kutratyaḥ kathaṁ no'dīrghadarśinā dhṛto'śvastvatha saṁjātā ghṛṇā mama śiśo tvayi

तू किसका पुत्र है, कहाँ का है, कैसे इस अदूरदर्शिता से यह घोड़ा पकड़ लिया? हे शिशु! मुझमें अब तेरे प्रति दया उत्पन्न हो रही है।'

श्लोक 50 (padma.5.23.50)

इत्थमाकर्ण्य दमनः स्मितं चक्रे महामनाः । उवाच च प्रतापाग्र्यं तृणीकुर्वंश्च तद्बलम्

itthamākarṇya damanaḥ smitaṁ cakre mahāmanāḥ uvāca ca pratāpāgryaṁ tṛṇīkurvaṁśca tadbalam

यह सुनकर महामना दमन ने मुस्कुराते हुए, उसकी सेना को तिनके के समान मानते हुए प्रतापाग्र्य से कहा —

श्लोक 51 (padma.5.23.51)

दमन उवाच। मया बद्धो बलादश्वो नीतः स्वपुटभेदनम् । नार्पयिष्येऽद्य सप्राणः कुरु युद्धं महाबल

damana uvāca mayā baddho balādaśvo nītaḥ svapuṭabhedanam nārpayiṣye'dya saprāṇaḥ kuru yuddhaṁ mahābala

दमन ने कहा — 'मैंने ही बलपूर्वक घोड़े को पकड़कर अपने नगर ले जाया है; आज मैं इसे जीवित रहते हुए नहीं सौंपूँगा, युद्ध कर, हे महाबल!

श्लोक 52 (padma.5.23.52)

त्वया यदुक्तं बालस्त्वं गत्वा क्रीडनकं कुरु । तन्मे पश्य महाराज क्रीडनं रणमूर्धनि

tvayā yaduktaṁ bālastvaṁ gatvā krīḍanakaṁ kuru tanme paśya mahārāja krīḍanaṁ raṇamūrdhani

तूने जो कहा — बालक हो, जाकर खेल करो — हे महाराज! अब रणभूमि में मेरा वह खेल देख!'

श्लोक 53 (padma.5.23.53)

शेष उवाच। इत्युक्त्वा सगुणं चापं विधाय सुभुजां गजः । शराणां शतमाधत्त प्रतापाग्र्यस्य वक्षसि

śeṣa uvāca ityuktvā saguṇaṁ cāpaṁ vidhāya subhujāṁ gajaḥ śarāṇāṁ śatamādhatta pratāpāgryasya vakṣasi

शेष जी ने कहा — यह कहकर, महाबाहुओं में गजराज-समान उन्होंने डोरी सहित धनुष उठाकर प्रतापाग्र्य के वक्ष में सौ बाण लगा दिए।

श्लोक 54 (padma.5.23.54)

संधाय बाणशतकं शंखं दध्मौ प्रतापवान् । तेन शंखनिनादेन कातराणां भयं ह्यभूत्

saṁdhāya bāṇaśatakaṁ śaṁkhaṁ dadhmau pratāpavān tena śaṁkhaninādena kātarāṇāṁ bhayaṁ hyabhūt

सौ बाण चढ़ाकर उस प्रतापी ने शंख फूँका; उस शंखनाद से कातर पुरुषों को भय हुआ।

श्लोक 55 (padma.5.23.55)

ताडयामास हृदये बाणानां शतकेन सः । प्रतापाग्र्यः प्रचिच्छेद लघुहस्तः सुपर्वणः

tāḍayāmāsa hṛdaye bāṇānāṁ śatakena saḥ pratāpāgryaḥ praciccheda laghuhastaḥ suparvaṇaḥ

उन्होंने सौ बाणों से उसके हृदय पर प्रहार किया; प्रतापाग्र्य ने शीघ्र हाथों से जुड़े हुए तीक्ष्ण बाणों से उन्हें काट डाला।

श्लोक 56 (padma.5.23.56)

स बाणच्छेदनं दृष्ट्वा कुपितो व्यसृजच्छरान् । कंकपक्षान्वितांस्तीक्ष्णभल्लान्राजात्मजो बली

sa bāṇacchedanaṁ dṛṣṭvā kupito vyasṛjaccharān kaṁkapakṣānvitāṁstīkṣṇabhallānrājātmajo balī

अपने बाणों का यह छेदन देखकर क्रुद्ध हुए बलशाली राजपुत्र ने बगुले के पंखों वाले तीक्ष्ण भल्ल बाण छोड़े।

श्लोक 57 (padma.5.23.57)

आकाशे भुवि मध्ये च बाणा ददृशिरेऽञ्चिताः । स्वनामचिह्नितास्तीक्ष्णधारापातसुशोभिताः

ākāśe bhuvi madhye ca bāṇā dadṛśire'ñcitāḥ svanāmacihnitāstīkṣṇadhārāpātasuśobhitāḥ

आकाश में, पृथ्वी पर तथा मध्य में सुसज्जित बाण दिखाई देने लगे, अपने ही नाम से चिह्नित, तीक्ष्ण धारों से गिरते हुए सुशोभित।

श्लोक 58 (padma.5.23.58)

शरास्तद्बाहु हृदये लग्ना वह्निकणान्बहून् । सृजंतः कुर्वते सैन्यदाहनं तदभून्महत्

śarāstadbāhu hṛdaye lagnā vahnikaṇānbahūn sṛjaṁtaḥ kurvate sainyadāhanaṁ tadabhūnmahat

उसकी भुजा और हृदय में लगे बाण अनेक अग्नि-कण उत्पन्न करते हुए सेना में महान् दाह उत्पन्न करने लगे।

श्लोक 59 (padma.5.23.59)

प्रतापाग्र्यः प्रकुपितस्तिष्ठतिष्ठेति च ब्रुवन् । शरेण दशसंख्येन ताडयामास मूर्धनि

pratāpāgryaḥ prakupitastiṣṭhatiṣṭheti ca bruvan śareṇa daśasaṁkhyena tāḍayāmāsa mūrdhani

क्रुद्ध प्रतापाग्र्य ने 'ठहर, ठहर' कहते हुए दस बाणों से उसके सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 60 (padma.5.23.60)

ते बाणा राजपुत्रस्य ललाटे परिनिष्ठिताः । विराजंते स्म च मुने दशशाखास्तरोरिव

te bāṇā rājaputrasya lalāṭe pariniṣṭhitāḥ virājaṁte sma ca mune daśaśākhāstaroriva

हे मुने! राजपुत्र के ललाट में स्थिर वे बाण वृक्ष की दस शाखाओं के समान सुशोभित हो रहे थे।

श्लोक 61 (padma.5.23.61)

तेन बाणप्रहारेण विव्यथेन महामनाः । यष्टिकाप्रहतो यद्वत्कुंजरः सप्तवर्षकः

tena bāṇaprahāreṇa vivyathena mahāmanāḥ yaṣṭikāprahato yadvatkuṁjaraḥ saptavarṣakaḥ

उस बाण-प्रहार से वह महामना उतना ही व्यथित हुआ, जितना लाठी से मारा गया सात वर्ष का हाथी।

श्लोक 62 (padma.5.23.62)

बाणान्धनुषि संधाय मुमोच त्रिशताञ्छुभान् । सुवर्णपुंखरचितान्महाकालानलोपमान्

bāṇāndhanuṣi saṁdhāya mumoca triśatāñchubhān suvarṇapuṁkharacitānmahākālānalopamān

धनुष में बाण चढ़ाकर उसने महाकाल-अग्नि के समान, स्वर्ण-पंख वाले तीन सौ श्रेष्ठ बाण छोड़े।

श्लोक 63 (padma.5.23.63)

ते बाणास्तु प्रतापाग्र्य वक्षो भित्त्वा गता ह्यधः । शोणिताक्ता यथा रामचंद्र भक्ति पराङ्मुखाः

te bāṇāstu pratāpāgrya vakṣo bhittvā gatā hyadhaḥ śoṇitāktā yathā rāmacaṁdra bhakti parāṅmukhāḥ

हे प्रतापाग्र्य! वे बाण उसका वक्ष भेदकर, रामचंद्र-भक्ति से विमुख जीवों के समान, रक्त से सने नीचे चले गए।

श्लोक 64 (padma.5.23.64)

प्रतापाग्र्यः प्रकुपितः शरान्मुंचन्सहस्रशः । अकरोद्विरथं सूनुं सुबाहोस्तत्क्षणाद्द्रुतम्

pratāpāgryaḥ prakupitaḥ śarānmuṁcansahasraśaḥ akarodvirathaṁ sūnuṁ subāhostatkṣaṇāddrutam

क्रुद्ध प्रतापाग्र्य ने सहस्रों बाण छोड़ते हुए उसी क्षण शीघ्रता से सुबाहु-पुत्र को रथहीन कर दिया।

श्लोक 65 (padma.5.23.65)

चतुर्भिश्च तुरो वाहान्द्वाभ्यां ध्वजमशातयत् । एकेन सारथेः कायाच्छिरो मह्यामपातयत्

caturbhiśca turo vāhāndvābhyāṁ dhvajamaśātayat ekena sāratheḥ kāyācchiro mahyāmapātayat

चार बाणों से उसके घोड़े मारे, दो से ध्वज गिरा दिया, एक से सारथि का सिर भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 66 (padma.5.23.66)

चतुर्भिस्ताडयामास तं सूनुं नृपतेः पुनः । तत्क्षणाच्चापमेकेन गुणयुक्तं तु चिच्छिदे

caturbhistāḍayāmāsa taṁ sūnuṁ nṛpateḥ punaḥ tatkṣaṇāccāpamekena guṇayuktaṁ tu cicchide

चार बाणों से उन्होंने राजा के पुत्र पर पुनः प्रहार किया; तभी एक बाण से डोरी सहित धनुष काट डाला।

श्लोक 67 (padma.5.23.67)

सोऽन्यरथं समारुह्य हयरत्नसुशोभितम् । धनुः करे समादाय सज्यं चक्रे महामनाः

so'nyarathaṁ samāruhya hayaratnasuśobhitam dhanuḥ kare samādāya sajyaṁ cakre mahāmanāḥ

वे दूसरे, रत्नजड़ित घोड़ों वाले रथ पर आरूढ़ होकर, हाथ में धनुष लेकर उस महामना ने उसे चढ़ा लिया।

श्लोक 68 (padma.5.23.68)

प्रत्युवाच प्रतापाग्र्यं त्वया विक्रांतमद्भुतम् । पश्येदानीं पराक्रांतिं धनुषो मम सद्भट

pratyuvāca pratāpāgryaṁ tvayā vikrāṁtamadbhutam paśyedānīṁ parākrāṁtiṁ dhanuṣo mama sadbhaṭa

उन्होंने प्रतापाग्र्य से कहा — 'तुम्हारा पराक्रम अद्भुत रहा है; अब हे श्रेष्ठ योद्धा! मेरे धनुष का पराक्रम देखो।'

श्लोक 69 (padma.5.23.69)

एवमुक्त्वा तु दमनो बाणान्दश समाददे । चतुर्भिश्चतुरो वाहान्निनाय यमसादनम्

evamuktvā tu damano bāṇāndaśa samādade caturbhiścaturo vāhānnināya yamasādanam

यह कहकर दमन ने दस बाण उठाए; चार से उसके चारों घोड़ों को यमलोक भेज दिया।

श्लोक 70 (padma.5.23.70)

चतुर्भिस्तिलशः कृत्तो रथश्चक्रसमन्वितः । एकेन हृदि विव्याध बाणेनैकेन सारथिम्

caturbhistilaśaḥ kṛtto rathaścakrasamanvitaḥ ekena hṛdi vivyādha bāṇenaikena sārathim

चार से चक्र सहित रथ को तिल-तिल कटवा दिया, एक बाण से हृदय बींध दिया, एक बाण से सारथि को।

श्लोक 71 (padma.5.23.71)

जगर्ज शंखमापूर्य शंखशब्दसमन्वितः । तत्कर्म पूजयामास साधु वीर महाबल

jagarja śaṁkhamāpūrya śaṁkhaśabdasamanvitaḥ tatkarma pūjayāmāsa sādhu vīra mahābala

शंख फूँककर उन्होंने शंख-ध्वनि सहित गर्जना की; उस कर्म की सराहना हुई — 'साधु, वीर, महाबल!'

श्लोक 72 (padma.5.23.72)

इति विक्रांतमालोक्य प्रतापाग्र्यो रुषान्वितः । अन्यं रथं समास्थाय ययौ योद्धुं नृपात्मजम्

iti vikrāṁtamālokya pratāpāgryo ruṣānvitaḥ anyaṁ rathaṁ samāsthāya yayau yoddhuṁ nṛpātmajam

यह पराक्रम देखकर क्रोध से भरे प्रतापाग्र्य ने दूसरे रथ पर आरूढ़ होकर राजपुत्र से युद्ध करने चले —

श्लोक 73 (padma.5.23.73)

उवाच वीर पश्य त्वं मम विक्रांतमद्भुतम् । इत्युक्त्वाशु मुमोचौघाञ्छराणां शितपर्वणाम्

uvāca vīra paśya tvaṁ mama vikrāṁtamadbhutam ityuktvāśu mumocaughāñcharāṇāṁ śitaparvaṇām

और कहा — 'हे वीर! अब मेरा अद्भुत पराक्रम देख।' यह कहकर उन्होंने शीघ्र तीक्ष्ण, जुड़े हुए बाणों की धारा छोड़ी।

श्लोक 74 (padma.5.23.74)

शराः सर्वत्र दृश्यंते कुंजरेषु हयेषु च । परब्रह्मेव सर्वत्र व्याप्ताश्चांतरगोचराः

śarāḥ sarvatra dṛśyaṁte kuṁjareṣu hayeṣu ca parabrahmeva sarvatra vyāptāścāṁtaragocarāḥ

बाण सर्वत्र दिखाई देने लगे, हाथियों और घोड़ों में भी, परब्रह्म के समान सर्वत्र व्याप्त, भीतर तक पहुँचते हुए।

श्लोक 75 (padma.5.23.75)

तं राजपुत्रं शितबाणकोटिभि -। र्व्याप्तं विधायाशु जगर्ज विक्रमी । संहर्षयन्स्वीयगणान्परान्महान् । कुर्वन्हृदा शून्यतमान्गतासुकान्

taṁ rājaputraṁ śitabāṇakoṭibhi - rvyāptaṁ vidhāyāśu jagarja vikramī saṁharṣayansvīyagaṇānparānmahān kurvanhṛdā śūnyatamāngatāsukān

उस राजपुत्र को करोड़ों तीक्ष्ण बाणों से आच्छादित करके, वह पराक्रमी शीघ्र गरज उठा, अपनी सेना को हर्षित करते हुए, महान् शत्रुओं को हृदय से शून्य, प्राणहीन बनाते हुए।

श्लोक 76 (padma.5.23.76)

स राजपुत्रः शितसायकव्रजैः । संपूर्णमात्मानमवेक्ष्य रोषितः । जग्राह शस्त्राणि दुरंतविक्रमो । धनुश्च धुन्वन्भुजदंडयोर्महान्

sa rājaputraḥ śitasāyakavrajaiḥ saṁpūrṇamātmānamavekṣya roṣitaḥ jagrāha śastrāṇi duraṁtavikramo dhanuśca dhunvanbhujadaṁḍayormahān

वह राजपुत्र, तीक्ष्ण बाणों के समूह से अपने आपको पूर्णतः आच्छादित देखकर क्रुद्ध हो उठा, असीम पराक्रमी उसने अपनी दोनों विशाल भुजाओं में धनुष को हिलाते हुए शस्त्र उठा लिए।

श्लोक 77 (padma.5.23.77)

चकर्त सर्वाण्यस्त्राणि शस्त्राणि च महाबलः । रोषताम्रेक्षणो मुंचञ्छरान्वैरिविदारिणः

cakarta sarvāṇyastrāṇi śastrāṇi ca mahābalaḥ roṣatāmrekṣaṇo muṁcañcharānvairividāriṇaḥ

क्रोध से लाल नेत्रों वाले, शत्रुओं को विदीर्ण करने वाले बाण छोड़ते हुए उस महाबली ने सभी अस्त्र-शस्त्रों को काट डाला।

श्लोक 78 (padma.5.23.78)

तच्छस्त्रजालं निर्धूय राजपुत्रो जगाद तम् । क्षमस्वैकं प्रहारं मे यदि शूरोसि मारिष

tacchastrajālaṁ nirdhūya rājaputro jagāda tam kṣamasvaikaṁ prahāraṁ me yadi śūrosi māriṣa

उस शस्त्र-जाल को झाड़कर राजपुत्र ने उससे कहा — 'हे मारिष! यदि तुम शूरवीर हो, तो मेरा एक ही प्रहार सह लो।

श्लोक 79 (padma.5.23.79)

यद्यनेन भवंतं वै रथाच्चेत्पातयामि न । प्रतिज्ञां शृणु मे वीर मम गर्वेण निर्मिताम्

yadyanena bhavaṁtaṁ vai rathāccetpātayāmi na pratijñāṁ śṛṇu me vīra mama garveṇa nirmitām

यदि मैं इससे तुम्हें रथ से नीचे न गिरा दूँ, तो हे वीर! मेरे गर्व से रची यह प्रतिज्ञा सुनो —

श्लोक 80 (padma.5.23.80)

वेदं निंदंति ये मत्ता हेतुवादविचक्षणाः । तेषां पापं ममैवास्तु नरकार्णवमज्जकम्

vedaṁ niṁdaṁti ye mattā hetuvādavicakṣaṇāḥ teṣāṁ pāpaṁ mamaivāstu narakārṇavamajjakam

जो मदमत्त, केवल तर्क-वितर्क में निपुण लोग वेद की निंदा करते हैं, उनका पाप मुझे ही लगे, नरक-सागर में डुबाने वाला!'

श्लोक 81 (padma.5.23.81)

इत्युक्त्वा बाणमासाद्य कोदंडे कालसन्निभम् । ज्वालामालाकुलं तीक्ष्णं निषंगादुद्धृतं वरम्

ityuktvā bāṇamāsādya kodaṁḍe kālasannibham jvālāmālākulaṁ tīkṣṇaṁ niṣaṁgāduddhṛtaṁ varam

यह कहकर उन्होंने तूणीर से निकाला हुआ काल के समान, ज्वालामाला से घिरा, तीक्ष्ण, श्रेष्ठ बाण धनुष पर चढ़ाया।

श्लोक 82 (padma.5.23.82)

स मुक्तो नृपवर्येण हृदि लक्ष्यीकृतः शरः । जगाम तरसा तं वै कालानलसमप्रभः

sa mukto nṛpavaryeṇa hṛdi lakṣyīkṛtaḥ śaraḥ jagāma tarasā taṁ vai kālānalasamaprabhaḥ

उस श्रेष्ठ राजा द्वारा छोड़ा गया, हृदय को लक्ष्य बनाया हुआ वह बाण कालाग्नि के समान वेग से उसकी ओर गया।

श्लोक 83 (padma.5.23.83)

प्रतापाग्र्यः शरं दृष्ट्वा स्वपातनसमुद्यतम् । बाणान्धनुष्यथाधत्त शरच्छेदायवै शितान्

pratāpāgryaḥ śaraṁ dṛṣṭvā svapātanasamudyatam bāṇāndhanuṣyathādhatta śaracchedāyavai śitān

अपने पतन के लिए तत्पर उस बाण को देखकर प्रतापाग्र्य ने उसे काटने के लिए धनुष पर तीक्ष्ण बाण चढ़ाए।

श्लोक 84 (padma.5.23.84)

स बाणः सर्वबाणांस्तांश्छिंदन्मध्यत एव हि । जगाम वै प्रतापाग्र्यहृदयं धैर्यसंयुतम्

sa bāṇaḥ sarvabāṇāṁstāṁśchiṁdanmadhyata eva hi jagāma vai pratāpāgryahṛdayaṁ dhairyasaṁyutam

वह बाण उन सभी बाणों को मध्य से ही काटता हुआ धैर्यवान् प्रतापाग्र्य के हृदय तक जा पहुँचा।

श्लोक 85 (padma.5.23.85)

संलग्नो हृदि नालीकः प्रविवेश तदंतरम् । राजाकृतप्रहारस्तु पपात धरणीतले

saṁlagno hṛdi nālīkaḥ praviveśa tadaṁtaram rājākṛtaprahārastu papāta dharaṇītale

हृदय में लगा वह बाण उसके भीतर प्रवेश कर गया; उस प्रहार से आहत राजा पृथ्वीतल पर गिर पड़े।

श्लोक 86 (padma.5.23.86)

मूर्च्छितं चेतनाहीनं रथोपस्थाद्गतं भुवि । सारथिस्तं समादायापोवाह रणमंडलात्

mūrcchitaṁ cetanāhīnaṁ rathopasthādgataṁ bhuvi sārathistaṁ samādāyāpovāha raṇamaṁḍalāt

मूर्च्छित, चेतनाहीन, रथ के आसन से भूमि पर गिरे हुए उन्हें सारथि उठाकर रणभूमि से बाहर ले गया।

श्लोक 87 (padma.5.23.87)

हाहाकारोमहानासीद्बलं भग्नं गतं ततः । यत्र शत्रुघ्ननामासौ वीरकोटिपरीवृतः

hāhākāromahānāsīdbalaṁ bhagnaṁ gataṁ tataḥ yatra śatrughnanāmāsau vīrakoṭiparīvṛtaḥ

वहाँ महान् हाहाकार मच गया, सेना टूटकर वहाँ भाग गई जहाँ करोड़ों वीरों से घिरे शत्रुघ्न नामधारी वे थे।

श्लोक 88 (padma.5.23.88)

राजात्मजो जयं प्राप्य प्रतापाग्र्यं विजित्य सः । प्रतीक्षां तु चकारास्य शत्रुघ्नस्य च भूपतेः

rājātmajo jayaṁ prāpya pratāpāgryaṁ vijitya saḥ pratīkṣāṁ tu cakārāsya śatrughnasya ca bhūpateḥ

राजपुत्र विजय प्राप्त करके, प्रतापाग्र्य को जीतकर, अब उन शत्रुघ्न महाराज की प्रतीक्षा करने लगा।

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