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पाताल खण्ड · अध्याय 36

लोमश द्वारा राम-चरित्र का कथन

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

श्लोक 1 (padma.5.36.1)

एतच्छ्रुत्वा तु विप्रेन्द्रो लोमशात्परमं महत् । पुनः पप्रच्छ तमृषिं सर्वज्ञं योगिनां वरम्

etacchrutvā tu vipreṁdro lomaśātparamaṁ mahat punaḥ papraccha tamṛṣiṁ sarvajñaṁ yogināṁ varam

यह परम महान् उपदेश लोमश से सुनकर उस विप्रेंद्र ने पुनः उस सर्वज्ञ, योगियों में श्रेष्ठ ऋषि से प्रश्न किया।

श्लोक 2 (padma.5.36.2)

आरण्यक उवाच। मुनिश्रेष्ठ वदैतन्मे पृच्छामि त्वां महामते । गुरवः कृपया युक्ता भाषंते सेवकेऽखिलम्

āraṇyaka uvāca muniśreṣṭha vadaitanme pṛcchāmi tvāṁ mahāmate guravaḥ kṛpayā yuktā bhāṣaṁte sevake'khilam

आरण्यक ने कहा — "हे मुनिश्रेष्ठ! हे महामते! मैं आपसे यह पूछता हूँ, मुझे बताइए। गुरुजन कृपायुक्त होकर अपने सेवक को सब कुछ बताते हैं।

श्लोक 3 (padma.5.36.3)

कोऽसौ रामो महाभाग यो नित्यं ध्यायते त्वया । तस्य कानि चरित्राणि वदस्व त्वं द्विजर्षभ

ko'sau rāmo mahābhāga yo nityaṁ dhyāyate tvayā tasya kāni caritrāṇi vadasva tvaṁ dvijarṣabha

हे महाभाग! कौन हैं वे राम, जिनका आप नित्य ध्यान करते हैं? हे द्विजर्षभ! उनके क्या-क्या चरित्र हैं, मुझे बताइए।

श्लोक 4 (padma.5.36.4)

किमर्थमवतीर्णोऽसौ कस्मान्मानुषतां गतः । तत्सर्वं कथयाशु त्वं मम संशयनुत्तये

kimarthamavatīrṇo'sau kasmānmānuṣatāṁ gataḥ tatsarvaṁ kathayāśu tvaṁ mama saṁśayanuttaye

वे किस कारण अवतरित हुए, तथा किस कारण मनुष्यता को प्राप्त हुए? यह सब मुझे शीघ्र बताइए, जिससे मेरा संशय दूर हो।"

श्लोक 5 (padma.5.36.5)

शेष उवाच। इति वाक्यं समाकर्ण्य मुनेः परमशोभनम् । लोमशः कथयामास रामचारित्रमद्भुतम्

śeṣa uvāca iti vākyaṁ samākarṇya muneḥ paramaśobhanam lomaśaḥ kathayāmāsa rāmacāritramadbhutam

शेष जी ने कहा — मुनि के इस परम शोभन प्रश्न को सुनकर लोमश ने राम के अद्भुत चरित्र का वर्णन किया।

श्लोक 6 (padma.5.36.6)

लोकान्निरयसंमग्नाञ्ज्ञात्वा योगेश्वरेश्वरः । कीर्तिं प्रथयितुं लोके यया घोरं तरिष्यति

lokānnirayasaṁmagnāñjñātvā yogeśvareśvaraḥ kīrtiṁ prathayituṁ loke yayā ghoraṁ tariṣyati

संसार को नरक में डूबा हुआ जानकर योगेश्वरों के भी ईश्वर ने अपनी कीर्ति को संसार में फैलाने हेतु, जिससे उस घोर संसार को पार किया जा सके —

श्लोक 7 (padma.5.36.7)

एवं ज्ञात्वा दयावार्धिः परमेशो मनोहरः । अवतारं चकारात्र चतुर्धा सश्रियान्वितः

evaṁ jñātvā dayāvārdhiḥ parameśo manoharaḥ avatāraṁ cakārātra caturdhā saśriyānvitaḥ

यह जानकर वह दयासागर, मनोहर परमेश्वर, लक्ष्मी सहित यहाँ चार रूपों में अवतरित हुए।

श्लोक 8 (padma.5.36.8)

पुरा त्रेतायुगे प्राप्ते पूर्णांशो रघुनन्दनः । सूर्यवंशे समुत्पन्नो रामो राजीवलोचनः

purā tretāyuge prāpte pūrṇāṁśo raghunandanaḥ sūryavaṁśe samutpanno rāmo rājīvalocanaḥ

पूर्व त्रेतायुग के आने पर, वे पूर्णांश रघुनंदन, सूर्यवंश में कमल-नेत्र राम के रूप में उत्पन्न हुए।

श्लोक 9 (padma.5.36.9)

स रामो लक्ष्मणसखः काकपक्षधरो युवा । तातस्य वचनात्तौ तु विश्वामित्रमनुव्रतौ

sa rāmo lakṣmaṇasakhaḥ kākapakṣadharo yuvā tātasya vacanāttau tu viśvāmitramanuvratau

वे राम, लक्ष्मण के सखा, काकपक्ष धारण करने वाले युवा, अपने पिता के वचन से विश्वामित्र के अनुव्रती होकर —

श्लोक 10 (padma.5.36.10)

यज्ञसंरक्षणार्थाय राज्ञा दत्तौ कुमारकौ । दांतौ धनुर्धरौ वीरौ विश्वामित्रमनुव्रतौ

yajñasaṁrakṣaṇārthāya rājñā dattau kumārakau dāntau dhanurdharau vīrau viśvāmitramanuvratau

राजा द्वारा यज्ञ की रक्षा हेतु वे दोनों संयमी, धनुर्धर, वीर, विश्वामित्र के अनुव्रती कुमार सौंपे गए।

श्लोक 11 (padma.5.36.11)

पथि प्रव्रजतोस्तत्र ताटका नाम राक्षसी । संगता च वने घोरे तयोर्वै विघ्नकारणात्

pathi pravrajatostatra tāṭakā nāma rākṣasī saṁgatā ca vane ghore tayorvai vighnakāraṇāt

मार्ग में जाते हुए उन दोनों को उस भयंकर वन में ताटका नामक राक्षसी विघ्न-कारण से मिली।

श्लोक 12 (padma.5.36.12)

ऋषेरनुज्ञया रामस्ताटकां यमयातनाम् । प्रावेशयद्धनुर्वेदविद्याभ्यासेन राघवः

ṛṣeranujñayā rāmastāṭakāṁ yamayātanām prāveśayaddhanurvedavidyābhyāsena rāghavaḥ

ऋषि की अनुमति से राम ने धनुर्वेद-विद्या के अभ्यास से ताटका को यमयातना में भेज दिया।

श्लोक 13 (padma.5.36.13)

यस्य पादतलस्पर्शाच्छिला वासवयोगजा । अहल्या गौतमवधूः पुनर्जाता स्वरूपिणी

yasya pādatalasparśācchilā vāsavayogajā ahalyā gautamavadhūḥ punarjātā svarūpiṇī

जिनके चरणतल के स्पर्श से इंद्र के संसर्ग से बनी वह शिला — गौतम-पत्नी अहल्या — पुनः अपने स्वरूप में जीवित हो उठी।

श्लोक 14 (padma.5.36.14)

विश्वामित्रस्य यज्ञे तु सुप्रवृत्ते रघूत्तमः । मारीचं च सुबाहुं च जघान परमेषुभिः

viśvāmitrasya yajñe tu supravṛtte raghūttamaḥ mārīcaṁ ca subāhuṁ ca jaghāna parameṣubhiḥ

विश्वामित्र के यज्ञ के सुसंपन्न होते समय उस रघुश्रेष्ठ ने मारीच और सुबाहु का वध अपने श्रेष्ठ बाणों से किया।

श्लोक 15 (padma.5.36.15)

ईश्वरस्य धनुर्भग्नं जनकस्य गृहे स्थितम् । रामः पंचदशे वर्षे षड्वर्षामथ मैथिलीम्

īśvarasya dhanurbhagnaṁ janakasya gṛhe sthitam rāmaḥ paṁcadaśe varṣe ṣaḍvarṣāmatha maithilīm

जनक के घर में रखा शिवधनुष टूट गया; राम ने पंद्रहवें वर्ष में, तब छह वर्ष की मैथिली से,

श्लोक 16 (padma.5.36.16)

उपयेमे विवाहेन रम्यां सीतामयोनिजाम् । कृतकृत्यस्तदा जातः सीतां संप्राप्य राघवः

upayeme vivāhena ramyāṁ sītāmayonijām kṛtakṛtyastadā jātaḥ sītāṁ saṁprāpya rāghavaḥ

विवाह किया — रमणीय सीता से, जो अयोनिज थीं। सीता को प्राप्त कर राघव तब कृतकृत्य हो गए।

श्लोक 17 (padma.5.36.17)

ततो द्वादश वर्षाणि रेमे रामस्तया सह । सप्तविंशतिमे वर्षे यौवराज्यमकल्पयत्

tato dvādaśa varṣāṇi reme rāmastayā saha saptaviṁśatime varṣe yauvarājyamakalpayat

फिर बारह वर्षों तक राम उनके साथ आनंदपूर्वक रहे; सत्ताईसवें वर्ष में युवराज्याभिषेक की व्यवस्था की गई।

श्लोक 18 (padma.5.36.18)

राजानमथ कैकेयी वरद्वयमयाचत । तयोरेकेन रामस्तु ससीतः सह लक्ष्मणः

rājānamatha kaikeyī varadvayamayācata tayorekena rāmastu sasītaḥ saha lakṣmaṇaḥ

तब कैकेयी ने राजा से दो वर माँगे; उनमें से एक के द्वारा राम को, सीता सहित, लक्ष्मण सहित —

श्लोक 19 (padma.5.36.19)

जटाधरः प्रव्रजतुवर्षाणीह चतुर्दश । भरतस्तु द्वितीयेन यौवराज्याधिपोऽस्तु मे

jaṭādharaḥ pravrajatuvarṣāṇīha caturdaśa bharatastu dvitīyena yauvarājyādhipo'stu me

जटाधारी होकर चौदह वर्षों तक वनवास हेतु प्रव्रजित किया गया; तथा दूसरे वर से भरत मेरे लिए युवराज्य के अधिपति हों।

श्लोक 20 (padma.5.36.20)

जानकी लक्ष्मणसखं रामं प्राव्राजयन्नृपः । त्रिरात्रमुदकाहारश्चतुर्थेऽह्नि फलाशनः

jānakī lakṣmaṇasakhaṁ rāmaṁ prāvrājayannṛpaḥ trirātramudakāhāraścaturthe'hni phalāśanaḥ

राजा ने जानकी और लक्ष्मण-सखा राम को वनवास दिया; तीन रात्रि तक जल का आहार लिया, चौथे दिन फल का भक्षण किया।

श्लोक 21 (padma.5.36.21)

पंचमे चित्रकूटे तु रामस्थानमकल्पयत् । अथ त्रयोदशे वर्षे पंचवट्यां महामुने

paṁcame citrakūṭe tu rāmasthānamakalpayat atha trayodaśe varṣe paṁcavaṭyāṁ mahāmune

पाँचवें दिन चित्रकूट में राम का निवास स्थापित हुआ। हे महामुने! तब तेरहवें वर्ष में पंचवटी में —

श्लोक 22 (padma.5.36.22)

रामो विरूपयामास शूर्पणखां निशाचरीम् । वने विचरतस्तस्य जानक्या सहितस्य च

rāmo virūpayāmāsa śūrpaṇakhāṁ niśācarīm vane vicaratastasya jānakyā sahitasya ca

जानकी सहित वन में विचरण करते हुए राम ने राक्षसी शूर्पणखा को विरूप कर दिया।

श्लोक 23 (padma.5.36.23)

आगतो राक्षसस्तां तु हर्तुं पापविपाकतः । ततो माघासिताष्टम्यां मुहूर्ते वृंदसंज्ञिते

āgato rākṣasastāṁ tu hartuṁ pāpavipākataḥ tato māghāsitāṣṭamyāṁ muhūrte vṛṁdasaṁjñite

तब पाप के परिपाक से वह राक्षस उसे हरने आया; तब माघ कृष्ण अष्टमी को, वृंद नामक मुहूर्त में,

श्लोक 24 (padma.5.36.24)

राघवाभ्यां विना सीतां जहार दशकंधरः । तेनैवं ह्रियमाणा सा चक्रंद कुररी यथा

rāghavābhyāṁ vinā sītāṁ jahāra daśakaṁdharaḥ tenaivaṁ hriyamāṇā sā cakraṁda kururī yathā

राघव भाइयों की अनुपस्थिति में दशकंधर रावण ने सीता का हरण किया; इस प्रकार हरी जाती हुई वह कुररी पक्षी की भाँति विलाप करने लगीं।

श्लोक 25 (padma.5.36.25)

रामरामेति मां रक्ष रक्ष मां रक्षसा हृताम् । यथा श्येनः क्षुधाक्रांतः क्रंदंतीं वर्तिकां नयेत्

rāmarāmeti māṁ rakṣa rakṣa māṁ rakṣasā hṛtām yathā śyenaḥ kṣudhākrāṁtaḥ kraṁdaṁtīṁ vartikāṁ nayet

"हे राम! हे राम! मुझे बचाओ, राक्षस द्वारा हरी जा रही मुझे बचाओ!" — जैसे भूख से ग्रस्त बाज विलाप करती बटेर को ले जाता है,

श्लोक 26 (padma.5.36.26)

तथा कामवशं प्राप्तो रावणो जनकात्मजाम् । नयत्येवं जनकजां जटायुः पक्षिराट्तदा

tathā kāmavaśaṁ prāpto rāvaṇo janakātmajām nayatyevaṁ janakajāṁ jaṭāyuḥ pakṣirāṭtadā

वैसे ही कामवश हुआ रावण जनकसुता को ले जाने लगा। तब पक्षिराज जटायु ने,

श्लोक 27 (padma.5.36.27)

युयुधे राक्षसेंद्रेण स रावणहतोऽपतत् । मार्गशुक्लनवम्यां तु वसंतीं रावणालये

yuyudhe rākṣaseṁdreṇa sa rāvaṇahato'patat mārgaśuklanavamyāṁ tu vasaṁtīṁ rāvaṇālaye

राक्षसेंद्र रावण से युद्ध किया; रावण द्वारा मारे जाकर वे गिर पड़े। मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी को वे रावण के भवन में रहने लगीं।

श्लोक 28 (padma.5.36.28)

संपातिर्दशमे मास आचख्यौ वानरेषु ताम् । एकादश्यां महेंद्राद्रे पुःप्लुवे शतयोजनम्

saṁpātirdaśame māsa ācakhyau vānareṣu tām ekādaśyāṁ mahendrādre puḥpluve śatayojanam

दसवें मास में संपाति ने वानरों को उनके विषय में बताया; ग्यारहवें दिन महेंद्र पर्वत से सौ योजन की समुद्र-छलांग हुई।

श्लोक 29 (padma.5.36.29)

हनूमान्निशि तस्यां तु लंकायां पर्यकालयत् । तद्रात्रिशेषे सीताया दर्शनं हि हनूमतः

hanūmānniśi tasyāṁ tu laṁkāyāṁ paryakālayat tadrātriśeṣe sītāyā darśanaṁ hi hanūmataḥ

उस रात्रि में हनुमान ने लंका में विचरण किया; उस रात्रि के अंत में हनुमान को सीता का दर्शन हुआ।

श्लोक 30 (padma.5.36.30)

द्वादश्यां शिंशपावृक्षे हनूमान्पर्यवस्थितः । तस्यां निशायां जानक्या विश्वासाय च संकथा

dvādaśyāṁ śiṁśapāvṛkṣe hanūmānparyavasthitaḥ tasyāṁ niśāyāṁ jānakyā viśvāsāya ca saṁkathā

द्वादशी को हनुमान शिंशपा वृक्ष में स्थित रहे; उसी रात्रि जानकी के विश्वास हेतु संवाद हुआ।

श्लोक 31 (padma.5.36.31)

अक्षादिभिस्त्रयोदश्यां ततो युद्धमवर्तत । ब्रह्मास्त्रेण चतुर्दश्यां बद्धः शक्रजिता कपिः

akṣādibhistrayodaśyāṁ tato yuddhamavartata brahmāstreṇa caturdaśyāṁ baddhaḥ śakrajitā kapiḥ

त्रयोदशी को अक्ष आदि से युद्ध हुआ; चतुर्दशी को इंद्रजित द्वारा ब्रह्मास्त्र से वानर बाँध लिए गए।

श्लोक 32 (padma.5.36.32)

वह्निना पुच्छयुक्तेन लंकाया दहनं कृतम् । पूर्णिमायां महेंद्राद्रौ पुनरागमनं कपेः

vahninā pucchayuktena laṁkāyā dahanaṁ kṛtam pūrṇimāyāṁ mahendrādrau punarāgamanaṁ kapeḥ

पूँछ में लगी अग्नि से लंका का दहन किया गया; पूर्णिमा को वानर का महेंद्र पर्वत पर पुनरागमन हुआ।

श्लोक 33 (padma.5.36.33)

मार्गासितप्रतिपदः पंचभिः पथिवासरैः । पुनरागत्य षष्ठेऽह्नि ध्वस्तं मधुवनं किल

mārgāsitapratipadaḥ paṁcabhiḥ pathivāsaraiḥ punarāgatya ṣaṣṭhe'hni dhvastaṁ madhuvanaṁ kila

मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा से पाँच दिनों की यात्रा से लौटकर छठे दिन मधुवन को नष्ट किया गया।

श्लोक 34 (padma.5.36.34)

सप्तम्यां प्रत्यभिज्ञानदानं सर्वनिवेदनम् । अष्टम्युत्तरफल्गुन्यां मुहूर्ते विजयाभिधे

saptamyāṁ pratyabhijñānadānaṁ sarvanivedanam aṣṭamyuttaraphalgunyāṁ muhūrte vijayābhidhe

सप्तमी को पहचान-चिह्न देना तथा सारा वृत्तांत निवेदित करना हुआ; अष्टमी को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में, विजय नामक मुहूर्त में,

श्लोक 35 (padma.5.36.35)

मध्यं प्राप्ते सहस्रांशौ प्रस्थानं राघवस्य च । रामः कृत्वा प्रतिज्ञां तु प्रयातो दक्षिणां दिशम्

madhyaṁ prāpte sahasrāṁśau prasthānaṁ rāghavasya ca rāmaḥ kṛtvā pratijñāṁ tu prayāto dakṣiṇāṁ diśam

सूर्य के मध्याह्न पहुँचने पर राघव ने प्रस्थान किया; प्रतिज्ञा करके राम दक्षिण दिशा की ओर चले —

श्लोक 36 (padma.5.36.36)

तीर्त्वाहं सागरमपि हनिष्ये राक्षसेश्वरम् । दक्षिणाशां प्रयातस्य सुग्रीवोऽप्यभवत्सखा

tīrtvāhaṁ sāgaramapi haniṣye rākṣaseśvaram dakṣiṇāśāṁ prayātasya sugrīvo'pyabhavatsakhā

"समुद्र को भी पार कर मैं राक्षसराज का वध करूँगा।" दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए उनके सुग्रीव भी सखा बने।

श्लोक 37 (padma.5.36.37)

वासरैः सप्तभिः सिंधोः स्कंधावारनिवेशनम् । पौषशुक्लप्रतिपदस्तृतीयायावदंबुधेः

vāsaraiḥ saptabhiḥ siṁdhoḥ skaṁdhāvāraniveśanam pauṣaśuklapratipadastṛtīyāyāvadaṁbudheḥ

सात दिनों में समुद्र के तट पर शिविर स्थापित हुआ; पौष शुक्ल प्रतिपदा से तृतीया तक, समुद्र के निकट,

श्लोक 38 (padma.5.36.38)

उपस्थानं ससैन्यस्य राघवस्य बभूव ह । बिभीषणश्चतुर्थ्यां तु रामेण सह संगतः

upasthānaṁ sasainyasya rāghavasya babhūva ha bibhīṣaṇaścaturthyāṁ tu rāmeṇa saha saṁgataḥ

राघव अपनी सेना सहित वहाँ उपस्थित हुए; चतुर्थी को विभीषण राम से आ मिले।

श्लोक 39 (padma.5.36.39)

समुद्रतरणार्थाय पंचम्यां मंत्र उद्यतः । प्रायोपवेशनं चक्रे रामो दिनचतुष्टयम्

samudrataraṇārthāya paṁcamyāṁ maṁtra udyataḥ prāyopaveśanaṁ cakre rāmo dinacatuṣṭayam

पंचमी को समुद्र पार करने हेतु मंत्रणा उद्यत हुई; राम ने चार दिनों तक प्रायोपवेशन किया।

श्लोक 40 (padma.5.36.40)

समुद्रवरलाभश्च सहोपायप्रदर्शनम् । ततो दशम्यामारंभस्त्रयोदश्यां समापनम्

samudravaralābhaśca sahopāyapradarśanam tato daśamyāmāraṁbhastrayodaśyāṁ samāpanam

तब समुद्र से वर की प्राप्ति उपाय के प्रदर्शन सहित हुई; तत्पश्चात् दशमी से सेतु-निर्माण आरंभ होकर त्रयोदशी को समाप्त हुआ।

श्लोक 41 (padma.5.36.41)

चतुर्दश्यां सुवेलाद्रौ रामः सैन्यं न्यवेशयत् । पौर्णमास्यां द्वितीयां तं त्रिदिनैः सैन्यतारणम्

caturdaśyāṁ suveladrau rāmaḥ sainyaṁ nyaveśayat paurṇamāsyāṁ dvitīyāṁ taṁ tridinaiḥ sainyatāraṇam

चतुर्दशी को सुवेल पर्वत पर राम ने अपनी सेना को स्थापित किया; पूर्णिमा से द्वितीया तक, तीन दिनों में सेना को पार कराया गया।

श्लोक 42 (padma.5.36.42)

तीर्त्वा तोयनिधिं रामो वानरेश्वरसैन्यवान् । रुरोध च पुरीं लंकां सीतार्थं सह लक्ष्मणः

tīrtvā toyanidhiṁ rāmo vānareśvarasainyavān rurodha ca purīṁ laṁkāṁ sītārthaṁ saha lakṣmaṇaḥ

समुद्र को पार करके वानरेश्वर की सेना सहित राम ने लक्ष्मण के साथ सीता के लिए लंका नगरी का घेराव किया।

श्लोक 43 (padma.5.36.43)

तृतीयादि दशम्यंतं निवेशश्च दिनाष्टकम् । शुकसारणयोस्तत्र प्राप्तिरेकादशे दिने

tṛtīyādi daśamyaṁtaṁ niveśaśca dināṣṭakam śukasāraṇayostatra prāptirekādaśe dine

तृतीया से दशमी तक, आठ दिनों में शिविर स्थापित हुआ; वहाँ ग्यारहवें दिन शुक और सारण का आगमन हुआ।

श्लोक 44 (padma.5.36.44)

पौषासिताख्यद्वादश्यां सैन्यसंख्यानमेव च । शार्दूलेन कपींद्राणां सहसारोपवर्णनम्

pauṣāsitākhyadvādaśyāṁ sainyasaṁkhyānameva ca śārdūlena kapīṁdrāṇāṁ sahasāropavarṇanam

पौष कृष्ण द्वादशी को सेना की गणना हुई, तथा शार्दूल द्वारा वानरसेनापतियों का वर्णन किया गया।

श्लोक 45 (padma.5.36.45)

त्रयोदश्या अमावास्यां लंकायां दिवसैस्त्रिभिः । रावणः सैन्यसंख्यानं रणोत्साहं तदाकरोत्

trayodaśyā amāvāsyāṁ laṁkāyāṁ divasaistribhiḥ rāvaṇaḥ sainyasaṁkhyānaṁ raṇotsāhaṁ tadākarot

त्रयोदशी से अमावस्या तक, तीन दिनों में लंका में रावण ने अपनी सेना की गणना की तथा युद्धोत्साह बढ़ाया।

श्लोक 46 (padma.5.36.46)

प्रययावंगदो दौत्यं माघशुक्लाद्यवासरे । सीतायाश्च ततो भर्तुर्मायामूर्द्धादिदर्शनम्

prayayāvaṁgado dautyaṁ māghaśuklādyavāsare sītāyāśca tato bharturmāyāmūrddhādidarśanam

माघ शुक्ल प्रतिपदा को अंगद दूत बनकर गए; फिर सीता को माया द्वारा अपने पति का सिर आदि दिखाया गया।

श्लोक 47 (padma.5.36.47)

माघद्वितीयादि दिनैः सप्तभिर्यावदष्टमी । रक्षसां वानराणां च युद्धमासीच्च संकुलम्

māghadvitīyādi dinaiḥ saptabhiryāvadaṣṭamī rakṣasāṁ vānarāṇāṁ ca yuddhamāsīcca saṁkulam

माघ द्वितीया से सात दिनों तक, अष्टमी तक, राक्षसों और वानरों के बीच घमासान युद्ध हुआ।

श्लोक 48 (padma.5.36.48)

माघशुक्लनवम्यां तु रात्राविंद्रजिता रणे । रामलक्ष्मणयोर्नागपाशबंधः कृतः किल

māghaśuklanavamyāṁ tu rātrāviṁdrajitā raṇe rāmalakṣmaṇayornāgapāśabaṁdhaḥ kṛtaḥ kila

माघ शुक्ल नवमी को रात्रि में युद्धस्थल में इंद्रजित द्वारा राम और लक्ष्मण को नागपाश से बाँधा गया।

श्लोक 49 (padma.5.36.49)

आकुलेषु कपीशेषु निरुत्साहेषु सर्वशः । नागपाशविमोक्षार्थं दशम्यां पवनोऽजपत्

ākuleṣu kapīśeṣu nirutsāheṣu sarvaśaḥ nāgapāśavimokṣārthaṁ daśamyāṁ pavano'japat

वानरराज सभी दिशाओं में व्याकुल और उत्साहहीन हो गए; तब नागपाश से मुक्ति हेतु दशमी को पवनदेव ने —

श्लोक 50 (padma.5.36.50)

कर्णे स्वरूपं रामस्य गरुडागमनं ततः । एकादश्यां च द्वादश्यां धूम्राक्षस्य वधः कृतः

karṇe svarūpaṁ rāmasya garuḍāgamanaṁ tataḥ ekādaśyāṁ ca dvādaśyāṁ dhūmrākṣasya vadhaḥ kṛtaḥ

— राम के कान में उनका अपना स्वरूप कह सुनाया, तत्पश्चात् गरुड़ का आगमन हुआ। ग्यारहवीं और द्वादशी को धूम्राक्ष का वध हुआ।

श्लोक 51 (padma.5.36.51)

त्रयोदश्यां तु तेनैव निहतः कंपनो रणे । माघशुक्लचतुर्दश्या यावत्कृष्णादिवासरम्

trayodaśyāṁ tu tenaiva nihataḥ kaṁpano raṇe māghaśuklacaturdaśyā yāvatkṛṣṇādivāsaram

त्रयोदशी को उसी द्वारा युद्ध में कंपन का वध हुआ। माघ शुक्ल चतुर्दशी से कृष्णपक्ष के प्रथम दिन तक —

श्लोक 52 (padma.5.36.52)

त्रिदिनेन प्रहस्तस्य नीलेन विहितो वधः । माघकृष्णद्वितीयायाश्चतुर्थ्यं तं त्रिभिर्दिनैः

tridinena prahastasya nīlena vihito vadhaḥ māghakṛṣṇadvitīyāyāścaturthyaṁ taṁ tribhirdinaiḥ

— तीन दिनों में नील द्वारा प्रहस्त का वध किया गया। माघ कृष्ण द्वितीया से चतुर्थी तक, तीन दिनों में,

श्लोक 53 (padma.5.36.53)

रामेण तुमुले युद्धे रावणो द्रावितो रणात् । पंचम्या अष्टमीयावद्रावणेन प्रबोधितः

rāmeṇa tumule yuddhe rāvaṇo drāvito raṇāt paṁcamyā aṣṭamīyāvadrāvaṇena prabodhitaḥ

घमासान युद्ध में राम द्वारा रावण रणभूमि से भगा दिया गया। पंचमी से अष्टमी तक रावण द्वारा कुंभकर्ण को जगाया गया।

श्लोक 54 (padma.5.36.54)

कुंभकर्णस्तदा चक्रेऽभ्यवहारं चतुर्दिनम् । कुंभकर्णो दिनैः षड्भिर्नवम्यास्तु चतुर्दशीम्

kuṁbhakarṇastadā cakre'bhyavahāraṁ caturdinam kuṁbhakarṇo dinaiḥ ṣaḍbhirnavamyāstu caturdaśīm

कुंभकर्ण ने तब चार दिनों तक भोजन किया। छह दिनों में, नवमी से चतुर्दशी तक,

श्लोक 55 (padma.5.36.55)

रामेण निहतो युद्धे बहुवानरभक्षकः । अमावास्यादिने शोकादवहारो बभूव ह

rāmeṇa nihato yuddhe bahuvānarabhakṣakaḥ amāvāsyādine śokādavahāro babhūva ha

बहुत वानरों को भक्षण करने वाला कुंभकर्ण युद्ध में राम द्वारा मारा गया। अमावस्या के दिन शोक के कारण युद्धविराम हुआ।

श्लोक 56 (padma.5.36.56)

फाल्गुनादिप्रतिपदश्चतुर्थ्यंतं चतुर्दिनैः । बिसतंतुप्रभृतयो निहताः पंचराक्षसाः

phālgunādipratipadaścaturthyaṁtaṁ caturdinaiḥ bisataṁtuprabhṛtayo nihatāḥ paṁcarākṣasāḥ

फाल्गुन प्रतिपदा से चतुर्थी तक, चार दिनों में बिसतंतु आदि पाँच राक्षस मारे गए।

श्लोक 57 (padma.5.36.57)

पंचम्याः सप्तमी यावदतिकायवधस्तथा । अष्टम्याद्वादशी यावन्निहतौ दिनपंचकात्

paṁcamyāḥ saptamī yāvadatikāyavadhastathā aṣṭamyādvādaśī yāvannihatau dinapaṁcakāt

पंचमी से सप्तमी तक अतिकाय का वध हुआ; अष्टमी से द्वादशी तक, पाँच दिनों में दो राक्षस मारे गए।

श्लोक 58 (padma.5.36.58)

निकुंभकुंभावूर्ध्वं तु मकराक्षस्त्रिभिर्दिनैः । फाल्गुनासितद्वितीयायां दिने शक्रजिता जितम्

nikuṁbhakuṁbhāvūrdhvaṁ tu makarākṣastribhirdinaiḥ phālgunāsitadvitīyāyāṁ dine śakrajitā jitam

निकुंभ और कुंभ, तथा उसके बाद मकराक्ष — तीन दिनों में मारे गए; फाल्गुन कृष्ण द्वितीया को इंद्रजित द्वारा विजय प्राप्त की गई।

श्लोक 59 (padma.5.36.59)

तृतीयादिसप्तम्यंतं दिनपंचकमेव च । ओषध्यानयनव्यग्रादवहारो बभूव ह

tṛtīyādisaptamyaṁtaṁ dinapaṁcakameva ca oṣadhyānayanavyagrādavahāro babhūva ha

तृतीया से सप्तमी तक, पाँच दिनों में, औषधि लाने में व्यग्रता के कारण युद्धविराम हुआ।

श्लोक 60 (padma.5.36.60)

ततस्त्रयोदशीयावद्दिनैः पंचभिरिंद्रजित् । लक्ष्मणेन हतो युद्धे विख्यातबलपौरुषः

tatastrayodaśīyāvaddinaiḥ paṁcabhiriṁdrajit lakṣmaṇena hato yuddhe vikhyātabalapauruṣaḥ

तत्पश्चात् त्रयोदशी तक, पाँच दिनों में, प्रसिद्ध बल-पौरुष वाले इंद्रजित का लक्ष्मण द्वारा युद्ध में वध हुआ।

श्लोक 61 (padma.5.36.61)

चतुर्दश्यां दशग्रीवो दीक्षां प्रापावहारतः । अमावास्यादिने प्रायाद्युद्धाय दशकंधरः

caturdaśyāṁ daśagrīvo dīkṣāṁ prāpāvahārataḥ amāvāsyādine prayādyuddhāya daśakaṁdharaḥ

चतुर्दशी को दशग्रीव ने युद्धविराम के कारण दीक्षा ली; अमावस्या के दिन दशकंधर युद्ध हेतु निकल पड़ा।

श्लोक 62 (padma.5.36.62)

चैत्रशुक्लप्रतिपदः पंचमीदिनपंचकैः । रावणे युद्ध्यमाने तु प्रचुरो रक्षसां वधः

caitraśuklapratipadaḥ paṁcamīdinapaṁcakaiḥ rāvaṇe yuddhyamāne tu pracuro rakṣasāṁ vadhaḥ

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से पंचमी तक, पाँच दिनों में, रावण के युद्ध करते हुए राक्षसों का प्रचुर वध हुआ।

श्लोक 63 (padma.5.36.63)

चैत्रषष्ठ्याष्टमी यावन्महापार्श्वादि मारणम् । चैत्रशुक्लनवम्यां तु सौमित्रेः शक्तिभेदनम्

caitraṣaṣṭhyāṣṭamī yāvanmahāpārśvādi māraṇam caitraśuklanavamyāṁ tu saumitreḥ śaktibhedanam

चैत्र षष्ठी से अष्टमी तक महापार्श्व आदि का वध हुआ; चैत्र शुक्ल नवमी को सौमित्र का शक्ति द्वारा भेदन हुआ।

श्लोक 64 (padma.5.36.64)

कोपाविष्टेन रामेण द्रावितो दशकंधरः । द्रोणाद्रिरांजनेयेन लक्ष्मणार्थमुपाहृतः

kopāviṣṭena rāmeṇa drāvito daśakaṁdharaḥ droṇādrirāṁjaneyena lakṣmaṇārthamupāhṛtaḥ

क्रोधाविष्ट राम ने दशकंधर को रणभूमि से भगा दिया; अंजनी-पुत्र हनुमान ने लक्ष्मण के लिए द्रोणाचल पर्वत ला दिया।

श्लोक 65 (padma.5.36.65)

दशम्यामवहारोभूद्रात्रौ युद्धे तु रक्षसाम् । एकादश्यां तु रामाय रथं मातलिसारथिः

daśamyāmavahārobhūdrātrau yuddhe tu rakṣasām ekādaśyāṁ tu rāmāya rathaṁ mātalisārathiḥ

दशमी को रात्रि में राक्षसों के युद्ध में विराम हुआ; ग्यारहवीं को रथी मातलि ने राम के लिए रथ —

श्लोक 66 (padma.5.36.66)

प्रेरितो वासवेनाजावर्पयामास भक्तितः । कोपवानथ द्वादश्या यावत्कृष्णचतुर्दशी

prerito vāsavenājāvarpayāmāsa bhaktitaḥ kopavānatha dvādaśyā yāvatkṛṣṇacaturdaśī

— इंद्र द्वारा भेजे जाकर भक्तिपूर्वक युद्धस्थल में अर्पित किया। तब क्रोधित होकर द्वादशी से कृष्णपक्ष चतुर्दशी तक —

श्लोक 67 (padma.5.36.67)

अष्टादशदिनै रामो रावणं द्वैरथेऽवधीत् । संग्रामे तुमुले जाते रामो जयमवाप्तवान्

aṣṭādaśadinai rāmo rāvaṇaṁ dvairathe'vadhīt saṁgrāme tumule jāte rāmo jayamavāptavān

— अठारह दिनों में राम ने द्वंद्व-युद्ध में रावण का वध किया। घमासान संग्राम होने पर राम ने विजय प्राप्त की।

श्लोक 68 (padma.5.36.68)

माघशुक्लद्वितीयायाश्चैत्रकृष्ण चतुर्दशीम् । सप्ताशीतिदिनेष्वेव मध्यं पंचदशाहकम्

māghaśukladvitīyāyāścaitrakṛṣṇa caturdaśīm saptāśītidineṣveva madhyaṁ paṁcadaśāhakam

माघ शुक्ल द्वितीया से चैत्र कृष्ण चतुर्दशी तक — इन सत्तासी दिनों में, पंद्रह दिनों के मध्यांतर सहित,

श्लोक 69 (padma.5.36.69)

युद्धावहारः संग्रामो द्वासप्तति दिनान्यभूत् । संस्कारो रावणादीनाममावस्या दिनेऽभवत्

yuddhāvahāraḥ saṁgrāmo dvāsaptati dinānyabhūt saṁskāro rāvaṇādīnāmamāvasyā dine'bhavat

युद्ध और युद्धविराम मिलाकर संग्राम बहत्तर दिनों का हुआ। रावण आदि का संस्कार अमावस्या के दिन हुआ।

श्लोक 70 (padma.5.36.70)

वैशाखादि तिथौ राम उवास रणभूमिषु । अभिषिक्तो द्वितीयायां लंकाराज्ये विभीषणः

vaiśākhādi tithau rāma uvāsa raṇabhūmiṣu abhiṣikto dvitīyāyāṁ laṁkārājye vibhīṣaṇaḥ

वैशाख की प्रथम तिथि से राम रणभूमियों में ही ठहरे रहे; द्वितीया को विभीषण लंका-राज्य पर अभिषिक्त हुए।

श्लोक 71 (padma.5.36.71)

सीताशुद्धिस्तृतीयायां देवेभ्यो वरलंभनम् । हत्वा चिरेण लंकेशं लक्ष्मणाग्रज एव सः

sītāśuddhistṛtīyāyāṁ devebhyo varalaṁbhanam hatvā cireṇa laṁkeśaṁ lakṣmaṇāgraja eva saḥ

तृतीया को सीता की शुद्धि हुई, तथा देवताओं से वरों की प्राप्ति हुई; दीर्घकाल पश्चात् लंकेश का वध करके लक्ष्मण के वही अग्रज —

श्लोक 72 (padma.5.36.72)

गृहीत्वा जानकीं पुण्यां दुःखितां राक्षसेन तु । आदाय परया प्रीत्या जानकीं स न्यवर्तत

gṛhītvā jānakīṁ puṇyāṁ duḥkhitāṁ rākṣasena tu ādāya parayā prītyā jānakīṁ sa nyavartata

राक्षस द्वारा दुःखित की गई पवित्र जानकी को लेकर, परम प्रेम से जानकी को ग्रहण कर वे लौट चले।

श्लोक 73 (padma.5.36.73)

वैशाखस्य चतुर्थ्यां तु रामः पुष्पकमाश्रितः । विहायसा निवृत्तस्तु भूयोऽयोध्यां पुरीं प्रति

vaiśākhasya caturthyāṁ tu rāmaḥ puṣpakamāśritaḥ vihāyasā nivṛttastu bhūyo'yodhyāṁ purīṁ prati

वैशाख की चतुर्थी को राम पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर आकाश-मार्ग से पुनः अयोध्या नगरी की ओर लौट चले।

श्लोक 74 (padma.5.36.74)

पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पंचम्यां माधवस्य तु । भरद्वाजाश्रमे रामः सगणः समुपाविशत्

pūrṇe caturdaśe varṣe paṁcamyāṁ mādhavasya tu bharadvājāśrame rāmaḥ sagaṇaḥ samupāviśat

चौदह वर्ष पूर्ण होने पर, वैशाख की पंचमी को राम अपने गण सहित भरद्वाज के आश्रम में विराजमान हुए।

श्लोक 75 (padma.5.36.75)

नंदिग्रामे तु षष्ठ्यां स भरतेन समागतः । सप्तम्यामभिषिक्तोऽसावयोध्यायां रघूद्वहः

naṁdigrāme tu ṣaṣṭhyāṁ sa bharatena samāgataḥ saptamyāmabhiṣikto'sāvayodhyāyāṁ raghūdvahaḥ

षष्ठी को नंदिग्राम में वे भरत से आ मिले; सप्तमी को वे रघुकुल के धारक अयोध्या में अभिषिक्त हुए।

श्लोक 76 (padma.5.36.76)

दशैकाधिकमासांस्तुचतुर्दशाहानि मैथिली । उवास राम रहिता रावणस्य निवेशने

daśaikādhikamāsāṁstucaturdaśāhāni maithilī uvāsa rāma rahitā rāvaṇasya niveśane

मैथिली राम से विलग होकर रावण के निवास में ग्यारह महीने और चौदह दिन तक रहीं।

श्लोक 77 (padma.5.36.77)

द्विचत्वारिंशक वर्षे रामो राज्यमकारयत् । सीतायाश्च त्रयस्त्रिंशद्वत्सराश्च तदाभवन्

dvicatvāriṁśaka varṣe rāmo rājyamakārayat sītāyāśca trayastriṁśadvatsarāśca tadābhavan

बयालीसवें वर्ष में राम ने राज्य किया; तथा उस समय सीता के तैंतीस वर्ष थे।

श्लोक 78 (padma.5.36.78)

स चतुर्दशवर्षांते प्रविश्य च पुरीं प्रभुः । अयोध्यां मुदितो रामो हत्वा रावणमाहवे

sa caturdaśavarṣāṁte praviśya ca purīṁ prabhuḥ ayodhyāṁ mudito rāmo hatvā rāvaṇamāhave

चौदह वर्षों की समाप्ति पर, युद्ध में रावण का वध करके प्रसन्न प्रभु राम ने अयोध्या नगरी में प्रवेश किया।

श्लोक 79 (padma.5.36.79)

भ्रातृभिः सहितस्तत्र रामो राज्यमथाकरोत् । राज्यं प्रकुर्वतस्तस्य पुरोधा वदतां वरः

bhrātṛbhiḥ sahitastatra rāmo rājyamathākarot rājyaṁ prakurvatastasya purodhā vadatāṁ varaḥ

वहाँ भाइयों सहित राम ने तब राज्य किया। राज्य करते हुए उनके पुरोहित, वक्ताओं में श्रेष्ठ —

श्लोक 80 (padma.5.36.80)

अगस्त्यः कुंभसंभूतिस्तमागंता रघोः पतिम् । तद्वाक्याद्रघुनाथोऽसौ करिष्यति हयक्रतुम्

agastyaḥ kuṁbhasaṁbhūtistamāgaṁtā raghoḥ patim tadvākyādraghunātho'sau kariṣyati hayakratum

— कुंभ से उत्पन्न अगस्त्य उन रघुपति के पास आएँगे; उनके वचन से ही यह रघुनाथ हयमेध-यज्ञ करेंगे।

श्लोक 81 (padma.5.36.81)

तस्यागमिष्यति हयो ह्याश्रमे तव सुव्रत । तस्य योधाः प्रमुदिता आयास्यंति तवाश्रमम्

tasyāgamiṣyati hayo hyāśrame tava suvrata tasya yodhāḥ pramuditā āyāsyaṁti tavāśramam

हे सुव्रत! उनका वह अश्व तुम्हारे आश्रम में आएगा; उनके हर्षित योद्धा तुम्हारे आश्रम में पधारेंगे।

श्लोक 82 (padma.5.36.82)

तेषामग्रे रामकथाः करिष्यसि मनोहराः । तैः साकं त्वमयोध्यायां गंतासि वै द्विजर्षभ

teṣāmagre rāmakathāḥ kariṣyasi manoharāḥ taiḥ sākaṁ tvamayodhyāyāṁ gaṁtāsi vai dvijarṣabha

उनके समक्ष तुम मनोहर राम-कथाएँ सुनाओगे; हे द्विजर्षभ! उनके साथ ही तुम अयोध्या को जाओगे।

श्लोक 83 (padma.5.36.83)

दृष्ट्वा राममयोध्यायां पद्मपत्रनिभेक्षणम् । तत्क्षणादेव संसारवार्धिनिस्तारवान्भव

dṛṣṭvā rāmamayodhyāyāṁ padmapatranibhekṣaṇam tatkṣaṇādeva saṁsāravārdhinistāravānbhava

अयोध्या में कमल-पत्र के समान नेत्रों वाले राम का दर्शन करके तुम उसी क्षण संसार-सागर से पार हो जाओगे।

श्लोक 84 (padma.5.36.84)

इत्युक्त्वा मां मुनिवरो लोमशः सर्वबुद्धिमान् । उवाच ते किं प्रष्टव्यं तदाहमवदं हि तम्

ityuktvā māṁ munivaro lomaśaḥ sarvabuddhimān uvāca te kiṁ praṣṭavyaṁ tadāhamavadaṁ hi tam

मुझसे ऐसा कहकर सर्वबुद्धिमान श्रेष्ठ मुनि लोमश ने कहा — "तुम्हें और क्या पूछना है?" — तब मैंने उनसे कहा —

श्लोक 85 (padma.5.36.85)

ज्ञातं त्वत्कृपया सर्वं रामचारित्रमद्भुतम् । त्वत्प्रसादादवाप्स्येऽहं रामस्य चरणांबुजम्

jñātaṁ tvatkṛpayā sarvaṁ rāmacāritramadbhutam tvatprasādādavāpsye'haṁ rāmasya caraṇāṁbujam

"आपकी कृपा से मैंने राम का यह समस्त अद्भुत चरित्र जान लिया; आपकी कृपा से मैं राम के चरण-कमलों को प्राप्त करूँगा।"

श्लोक 86 (padma.5.36.86)

मया नमस्कृतः पश्चाज्जगाम स मुनीश्वरः । तत्प्रसादान्मयावाप्तं रामस्य चरणार्चनम्

mayā namaskṛtaḥ paścājjagāma sa munīśvaraḥ tatprasādānmayāvāptaṁ rāmasya caraṇārcanam

मेरे द्वारा प्रणाम किए जाने के पश्चात् वे मुनीश्वर चले गए। उनकी कृपा से मुझे राम के चरणों की अर्चना प्राप्त हुई।

श्लोक 87 (padma.5.36.87)

सोऽहं स्मरामि रामस्य चरणावन्वहं मुहुः । गायामि तस्य चरितं मुहुर्मुहुरतंद्रितः

so'haṁ smarāmi rāmasya caraṇāvanvahaṁ muhuḥ gāyāmi tasya caritaṁ muhurmuhuratandritaḥ

वह मैं राम के चरणों का निरंतर, बारंबार स्मरण करता हूँ; बिना थके, बार-बार उनके चरित्र का गान करता हूँ।

श्लोक 88 (padma.5.36.88)

पावयामि जनानन्यान्गानेन स्वांतहारिणा । हृष्यामि तन्मुनेर्वाक्यं स्मारंस्मारं तदीक्षया

pāvayāmi janānanyāngānena svāṁtahāriṇā hṛṣyāmi tanmunervākyaṁ smāraṁ smāraṁ tadīkṣayā

अपने हृदय को हरने वाले गान से मैं अन्य लोगों को पवित्र करता हूँ; उस मुनि के वचन को बार-बार स्मरण करते हुए, उनकी दृष्टि से हर्षित होता हूँ।

श्लोक 89 (padma.5.36.89)

धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं सभाग्योऽहं महीतले । रामचंद्र पदांभोज दिदृक्षा मे भविष्यति

dhanyo'haṁ kṛtakṛtyo'haṁ sabhāgyo'haṁ mahītale rāmacaṁdra padāṁbhoja didṛkṣā me bhaviṣyati

मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, इस पृथ्वी पर सौभाग्यशाली हूँ; रामचंद्र के चरण-कमलों के दर्शन की लालसा मुझमें बनी रहेगी।

श्लोक 90 (padma.5.36.90)

तस्मात्सर्वात्मना रामो भजनीयो मनोहरः । वंदनीयो हि सर्वेषां संसाराब्धितितीर्षया

tasmātsarvātmanā rāmo bhajanīyo manoharaḥ vaṁdanīyo hi sarveṣāṁ saṁsārābdhititīrṣayā

अतः रामचंद्र, वह मनोहर, सर्वात्मना भजनीय हैं; संसार-सागर से तरने की इच्छा रखने वाले सभी के लिए वंदनीय हैं।

श्लोक 91 (padma.5.36.91)

तस्माद्यूयं किमर्थं वै प्राप्ताः को वानराधिपः । यागं करोति धर्मात्मा हयमेधं महाक्रतुम्

tasmādyūyaṁ kimarthaṁ vai prāptāḥ ko vānarādhipaḥ yāgaṁ karoti dharmātmā hayamedhaṁ mahākratum

अतः आप किस कारण यहाँ पधारे हैं? वह वानराधिप कौन है — जो धर्मात्मा उस महायज्ञ हयमेध का अनुष्ठान कर रहे हैं?

श्लोक 92 (padma.5.36.92)

तत्सर्वं कथयंत्वत्र यां तु वाहस्य पालने । स्मरंतु रघुनाथांघ्रिं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः

tatsarvaṁ kathayaṁtvatra yāṁ tu vāhasya pālane smaraṁtu raghunāthāṁghriṁ smṛtvā smṛtvā punaḥ punaḥ

वह सब यहाँ बताया जाए; तथा अश्व की रक्षा में लगे हुए लोग बार-बार रघुनाथ के चरणों का स्मरण करते रहें।

श्लोक 93 (padma.5.36.93)

इति वाक्यं समाकर्ण्य मुनेर्विस्मयमागताः । रघुनाथं स्मरंतस्ते प्रोचुरारण्यकं मुनिम्

iti vākyaṁ samākarṇya munervismayamāgatāḥ raghunāthaṁ smaraṁtaste procurāraṇyakaṁ munim

मुनि के इस वचन को सुनकर विस्मित होकर, रघुनाथ का स्मरण करते हुए, उन्होंने मुनि आरण्यक से कहा।

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